कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना
बोधसागर
( ११ )
सोरठा-अविरल भक्ति तुम्हार, पूरे भागते पाइये ।
विनवों बारम्बार, पुरुष दरश करवावहू ॥
ज्ञानी वचन-चौपाई
नाम पदार्थ देउँ मैं तोहीं । तैं राजा चीन्हा दृढ मोहीं ॥
पुरुष नाम एक यज्ञ कराओं । जेहि नाम ते हंस बचाओं ॥
जरी केर एक चन्दोवा तानो । कञ्चन केर सिंहासन आनो ॥
दिवालगिरी लागे जरकेरा । मोतिन झालर लागु घनेरा ॥
मोतिन लै भर थार धराऊँ । तापर आरति जोति लसाऊँ ॥
कंचन कलसा पाँचो वाती । झारीजल हीर लै पाती ॥
पूंगी फल औ स्वेत मिठाई । चन्दन पान धरो तहैं लाई ॥
कदलीफल उत्तम तहैं जानो । मेवा अष्ट युक्त प्रमानो ॥
कदलीपत्र कपूर सुगन्धा । आमपत्र लै चहु दिशि बन्धा ॥
सात हाथ वस्तर ले स्वेता । पुष्प गुलाब कहौ मरु केता ॥
नौ रतन लै थार धरायी । मनि मानिकके मध्य रहायी ॥
यह सब विधि जब दीनबतायी । राजा सबही लीन सजारी ॥
चौका बैठे सतगुरु जबहीं । रानी गाय चरण गहे तबहीं ॥
सवा लाख दीपक तहैं बारी । बहु आनन्द शब्द विस्तारी ॥
सब मिलि हाथ नारियल लीन्हा । आगे धरा दण्डवत कीन्हा ॥
राजा तृण धरे मुख माँहीं । भये अधीन बांधि कर आहीं ॥
राजा भोपाल वचन
तुम दीननके आहु दयाला । कृपा कीन्ह मोहि प्रतिपाला ॥
अब जनि मोसन करहु दुराई । अपने कर लीजै सुकताई ॥
यहि संसार नाहिं मम काजा । दारुण महा काल है राजा ॥
अब तुम आपन लोकदिखाओ । महा पुरुष के दर्श कराओ ॥
राजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना
( १२ )
शोपालबोध
सत्गुरु वचन
नौ नारी मिलि विन्ती करई । कुवर पचास ठाढ़ तहँ रहई ॥
बेटी एक सुरजकी जोती । ताहि लिलार पुहे जनु मोती ॥
साहब चरण धरा तिन आई । अब हम चरणछोड़ि नहिं जायी ॥
कीन्ह आरती नरयर मोरा । सकल जीवके तिनुका तोरा ॥
सुकृत अंश बुलाये ज्ञानी । पुरुष दरश कर राजा आनी ॥
लै अमरावहु लोक द्वारा । पल महाँ लाय ठाढ़ बैठारा ॥
दिना चार लगी राख्यो काया । वेगी जाय पुरुष पहाँ आया ॥
लिखिलिखिपान सबन कहँदीना । सकलो जीव वन्दन कीना ॥
जेते जीव परवाना पावा । तेते हंसा लोक सिधावा ॥
काया छोड़ि हंस चले आगे । सत्य सुकृत के चरनन लागे ॥
लागी डोर पुरुषके पास । तवै दूत यक कियो तमाशा ॥
सुकृत संग हंस सब जेते । आये दूत कला धरि तेते ॥
छाप तिलक तब विरचि बनायी । मारगमाँहि ठाढ़ भय आयी ॥
आओ हंस पुरुषके पास । नातो होवै ठाट विनाशा ॥
बोले दूत हंस कहँ जायी । हम गुरुज्ञानी तोंहि सहायी ॥
हमरे संग चलो हो राजा । हमरे शरण काल उठि भाजा ॥
हंस रूप तुम धरि बटपारा । हम नहिं फन्दा परै तुम्हारा ॥
सुकृत कहै हंस चलि आज । हमरे संग काल नहिं पाऊ ॥
बाएँ अंग कालका धारा । दहिने पाँजी अहै हमारा ॥
ताहि द्वार होय सुरति लगाओ । बेगि दरश पुरुषके पाओ ॥
सुकृत सागर पहुँचे जायी । अहो हंस तुम लेहु नहायी ॥
सकल हंस मिलि पैठि नहावा । निरखै द्रौप द्रौपका भावा ॥
बोधसागर
( १३ )
देखहिं लोक लोककी रचना । तब टेके सुकृतके चरना ॥
बैठे लोकमहँ हंस निहारा । जहँवाँ पुरुष आप विस्तारा ॥
सकल हंस तहँ बैठे पांती । सोरह रवि हंसनकी कांती ॥
पुहुप सेज सब हंस विराजा । तहँवाँ बुझाय नहिं रंक औ राजा ॥
कंचन भूमि देख अति शोभा । बरनौ कहा हंस तहँ लोभा ॥
राजा कीन्ह दण्डवत जबहीं । रानी पुत्र कीन्ह पुनि तवहीं ॥
अब नहिं भवमहँ जाऊ लिवायी । अति आनन्द बहुत सुखपायी ॥
सुकृत बचन
सुकृत उत्तर कहै समझायी । चलू राय गहिर जनि लायी ॥
जो तुम गहर लगावहु राजा । विनशे ठाट तब होय अकाजा ॥
तब पछतैहो राय भुपाला । ततक्षण बेगि चलो यहि हाला ॥
राजा भोपाल बचन
विनशे ठाट होय जरि छारा । अब नहिं छोड़ब चरण तुम्हारा ॥
ऐसा लोक छोड़ि नहिं जायब । बार बार तुहि माथ नवायब ॥
छन्द-राजा करै बहु बीन्ती तुम दीन बन्धु दयाल हौ ॥
हंसन नायक परम लायक काटिया फन्दा काल हौ ॥
चरण शरण आधीन समरथ शरण राखो आपनो ॥
दास जानि बन्ध छोरो काल तेहि नहिं पावनो ॥
सोरठा-अब हम शरण तुम्हार, दास जानि दाया करो ॥
आयो पुरुष दरबार, आपन कै प्रतिपालिये ॥
बचन-चौपाई
एती विन्ती राजा ठानी । ज्ञानी देश जलन्धर जानी ॥
भवसागर सो ज्ञानी आये । पुरुष दरश कीन्हा तब जाये ॥
दिना चार ऐसेहि चलि गयऊ । राजा खबरि कोई नहिं दयऊ ॥
( १४ )
भोपालबोध
तबै पौरिया रावपहँ जायी । महल देखि कोइ नाहिँ रहायी ॥
कहँवा राजा कहँवा रानी । कहँवा पुत्र कुवँर रजधानी ॥
कहँवा बेटी है चन्द्रावति । ताकर रूप बरनो कौनी गति ॥
कहँवा रानी कामसुंगगा । परिमल अंग बसत जेहि संगगा ॥
रोवत गयउ पौरिया द्वारा । जाय सबन सों कीन्ह पुकारा ॥
जाति कुटुम्ब सब देखन आये । जिन राजा ते बहु सुख पाये ॥
साखी-देखत अमिहत राजाकी, भयी अचम्भो बात ॥
रोवत कुटुम्ब दीवान मिलि, किन यह कीन निपात ॥
नगर लोग व्याकुल भये, घरघर रोवन लाग ॥
की यहि राजा मारिया, सबहिन केर अभाग ॥
चौपाई
कहै पौरिया सुनो दिवाना । तुम हम बूझो हम सब जाना ॥
जिन्दा एक नगरमें आया । तासों राजा कौन ऊँकाया ॥
कह्यो राय मैं बहुत चिताई । तुरतहिँ जिन्दा कहँ मरवायी ॥
राजा बात नहीं पतियावा । वच सुनि राजा मोहि रिसावा ॥
राजा कहै मुक्तिकरदाता । अस नहिँ जाने करै निपाता ॥
मोर कहा माना नहिँ भाई । जस कीन्हा तस फल नित पाई ॥
साखी-वचन पौरिया सुनतही, विकल भये सब कोय ॥
आज गरासे राय कहँ, काल आसै लोय ॥
चौपाई
नगर लोग तब कीन्ह विचारा । सब मिलि भागौ करौ सम्हारा ॥
भूलि अन्य शब्द नहिँ चीन्हा । मारन काल तिहुँ पुर दीन्हा ॥
साखी-सुकृत अंश न पाइया, अन्धा गये भुलाय ॥
धन्य राम भोपाल है, गहे शब्द चित लाय ॥
मंत्रि आदिका राजाको महलमें न देखकर पश्चात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना
बोधसागर
( १५ )
छन्द-गये राजा लोक कहैं तजिया सब मान गुमान हो ॥
इमि हंस धर्मनि जो मिले तुम देहु ताको पान हो ॥
कहै कबीर जो शब्द मानै सकल तजि नामे गहै ॥
अपवर्ग निश्चय ताहि कहैं नहि पला पकडत काल है ॥
सोरठा-जो हंसा इमि होय, शब्द सार तासों कहो ॥
काग चाल तिन खोय, हंस चाल गहि लोक लो ॥
इति श्रीप्रबंधभोपालबोध समाप्त
इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससम्वादे भोपालबोधवर्णनो
नाम चतुर्थस्तरंगः
इति
श्रीबोधसागरान्तर्गत
ग्रन्थभोपालबोध
समाप्त
भारतपथिक कबीरपंथी-
स्वामी श्रीगुगलानन्दद्वारा संशोधित
श्री-जगजीवनबोध
मुद्रक एवं प्रकाशकः
खेमराज श्रीकृष्णदासः,
अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्गः, बम्बई-४०० ००४
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सर्वज्ञः सर्वशक्तिः
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
श्रीगणेशाय नमः
A faint, stylized illustration of Lord Ganesha seated on a lotus. He is depicted with four arms, holding a small object in his hands. Above him is a traditional umbrella (chhatra). The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a very faded print.
श्रीगणेशाय नमः
धर्मदास साहबका गर्भविषय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर
सत्यकबीराय नमः
सत्यं शुद्धं गुणातीतं कंजपर्णसमुद्भवम् ।
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सद्गुरुं प्रणतोऽभ्यहम् ॥
अथ श्रीबोधसागरे
पंचमस्तत्रंगः
ग्रन्थ जगजीवन बोध
( गर्भ चिंतावनी )
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कह सुनहु स्वामी । कहो गरभकी अन्तर्यामी ॥
कैसे जीव गरभ में आवे । कैसे जीव जठर दुख पावे ॥
कैसे जीव परवशै भयऊ । कैसे इन्द्री देह बनयऊ ॥
कैसे जीव अपने पद परसे । कैसे जीव समरथ पद परसे ॥
कैसे जीव कौल बँधावे । कैसे साहब दर्शन पावे ॥
सो सब भेद कहो गुरु ज्ञानी । घट भीतरका भेद बखानी ॥
सतगुरु-वचन
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । तुम घट भली बुद्धि परकासा ॥
प्रथमें सत्य नाम गुण गाऊँ । घट भीतर का भेद बताऊँ ॥
सबही जीव गर्भ में जावैं । कौल बान्ध कै बाहर धावैं ॥
चूके कौल गरभ का भाई । बारम्बार गरभ में जाई ॥
नौ नाथ सिद्धि चौरासी भारी । उनहुँ देह गरभमें धारी ॥
गर्भोत्पत्ति वर्णन
( २२ )
जगजीवनबोध
नौ अवतार विष्णु जो लीन्हा । उनहूँ गरभ वसेरा कीन्हा ॥
तेतिस कोटी देव कहाये । गरभ वास महाँ देह बनाये ॥
जोगी जंगम औ तप धारी । गर्भवास में देह सवारी ॥
गर्भ वास तब छूटे भाई । जब समरथ गुरु बाहँ गहाई ॥
गर्भोत्पत्ति वर्णन
नारि पुरुष बांधे संयोगा । कामबाण लगि देहसुख भोगा ॥
सप्त धातुका अंग बनाया । जिह्वा दांत सुख कान उपाया ॥
हाथ पावैं रु शीस निर्माया । सुन्दर रूप बनी बहु काया ॥
नख शिख काहू नर बहु कीन्हा । दशही द्वार युक्ति करि लीन्हा ॥
दश द्वार नौ नाडि बनायी । ऐसे सबतर बन्ध लगायी ॥
दीन्हा ठेक बहतर भारी । नाडी बन्धन बहुत अपारी ॥
नाद विन्दुसों काथ निरमायी । तामैं प्रकृती आन समायी ॥
हृद कारिगर हुन्नर कीन्हा । जैसे दूधमें जामन दीन्हा ॥
तीनसों साठ चार बन्ध लायी । सोलह खाईं तहां बनायी ॥
सोलह खाईं चौदह दर्वाजा । अठहूँ हाथ गढ़ खूब विराजा ॥
छाजे महल अधिकही छाजा । तामैं जीव जो आनि विराजा ॥
अजब महल बहु खूब बनाया । छठे महल हंस चितवन लाया ॥
छठे मांस में सुरती आयी । दुख सुखकी तब पारख पायी ॥
छै मासको भयो जब प्रानी । दुख सुखकी मति सबै पहिचानी ॥
ओंघे सुख झूले लटकंता । मैल बहुत तहाँ कीच रहता ॥
जठर अग्नि तहाँ बहुत सतावै । संकट गर्भ तहाँ अन्त न आवै ॥
बहुत सांकीरी पिंजार पोई । तडफटै बहुत निकसे नहिं जोई ॥
सुखसों बोल निकसि नहिं आवै । करुना करि मन में पछितावै ॥
अरुझे श्वास रोवै मन माहीं । कौन करमगति लागी आहीं ॥
करुणा करि मन में पछितावै । ज्यों करीब कंठ करद बैठावै ॥
जगजीवनका गर्भके कष्टसे व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कौल करना
बोधसागर
( २३ )
ता दुःखकी गति कासु कहीजै । करम उनमानतहैं दुःख सहीजै॥
यदि आलोच करै मनमाही । संगी मित्र कोइ दीखत नाही ॥
पिछला जनम जब सूझा भाई । तब जिव दिलमा चिता आई ॥
स्त्री मित्र कुटुम्ब परिवारा । सुत नाती औ सैन पियारा ॥
संगी सुजन बन्धु औ भाई । गरभ कि चीन्ह परी नहिं ताई ॥
महा दुःख सो गरभ में पावे । बहुत वैराग हियामें आवे ॥
सूझी सकल बाहरकी बाती । जो जिव पिछली होती जाती ॥
जब जिव गरभमें ज्ञान विचारा । अब मैं सुमरूं सिरजन हारा ॥
सोच मोह जिव कछू न कीजै । अब सदगुरु का शरणा लीजै ॥
जिव अपने दिल माहि विचारे । तब समरथ को कीन पुकारे ॥
सुनु धर्मदास यक कथा सुनाऊँ । यक राजाको जस बने बनाऊँ ॥
राय जगजीवन ताहिकर नामा । जब वह पहुँच्यो एही ठामा ॥
करन विन्ती लागु अधीरू । सतगुरु कहैं तब कीन्ही टेरू ॥
जगजीवन वचन
साहिब संकट दूर निवारो । मैं निज खानाजाद तुम्हारो ॥
दिल मैं करूणा करै अतिभारी । अब मोहि साहब लेहु उबारी ॥
करै अस्तुति बहुते सुधिलावै । तुम वितु खाविन्द कौन छुडावै ॥
अब दुःख दूर निवारो स्वामी । कौल कहूँ प्रभु अन्तरयामी ॥
बाहर निकारो आदि सनेही । बहु दुःख पावै मेरी देही ॥
मैं जन प्रभुको दास कहाऊँ । आन देव के निकट न जाऊँ ॥
सतगुरुका होय रहों चेरा । दम दम नाम उचारूँ तेरा ॥
नित उठि गुरु चरणामृत लेऊँ । तन मन धने निछावर देऊँ ॥
जो मैं तन सों कहूँ कमाई । अर्थमाल मैं गुरुहि चढाई ॥
कुबुद्धि सीख काहु नहिं मानूं । हराम माल जहर करिजानूं ॥
कुलकी त्यागूं मान बढाई । निर्मल ज्ञान एक संत सगाई ॥
( २४ )
जगजीवनबोध
रात दिवस ऐसे लव लाऊँ । करत फुरत भक्ति गुरु कराऊँ ॥
दुःख सुख परे सो तनसे सहूँ । भक्ति दृढ़े गुरु चरणै रहूँ ॥
परत्रिया ताकूँ नहिं कोई । जननी बहन करि देखूँ सोई ॥
दुष्ट बैन कबहुँ नहिं खोलूँ । शीतल बैन सदा सुख बोलूँ ॥
स्वास उस्वासमों रटना लाऊँ । आन उपाय एको नहिं चाऊँ ॥
तन मन धन निछावर देखूँ । सतगुरु का चरणामृत लेऊँ ॥
सतगुरु कहैं सोई अब करिहौँ । आज्ञा लोप पाओं नहिं धरिहौँ ॥
और सकल बैरी कर जानूँ । सद्गुरु कहैं मित्र कर मानूँ ॥
ज्ञान बतावै सोई गुरुदाता । तन मन धन अरपूँ उन ताता ॥
तन मन धन मैं उनको देखूँ । नित उठि गुरुचरणामृत लेऊँ ॥
यहि गर्भवासमें कौल बधाऊँ । बाहर निकारो धुर निबाऊँ ॥
जो मैं छूटूँ गरभ सबेही । तन मन अरपूँ औ गुरु देही ॥
एक नाम सांचा कर मानूँ । और सबै मिथ्या कर जानूँ ॥
कहा अस्तुति करें गुसाई । बहुत दुःख पावत हूँ या ठाई ॥
यहां कोई मित्र नहिं भाई । मातु पिता नहिं लोग लुगाई ॥
देवी देवका कछु न चालै । गुरु विन कौन करै प्रतिपालै ॥
अब तो खबर परी यहि ठाहीं । और कोईका चालै नाहीं ॥
पिछली बात मैं हृदय जानी । कोई काहूँका नहीं रे प्राणी ॥
अपने साथ चलेगा सोई । जो कछु सुकृत करे सो होई ॥
मद माया में जीव भरमाया । सो तो कोई काम न आया ॥
बहुत विचार किया मैं सोई । अन्तकाल अपनो नहिं कोई ॥
ऐसी करुणा करै विचारा । दया करो दुःख भंजन हारा ॥
साहिब वचन
तब साहिब यों कहै पुकारा । कहि समझाया तोहि बारम्बारा ॥
अनेक बार गरभमें आया । तैं रतीकर्म भरम नहिं पाया ॥
साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकर गर्भसे मुक्त करना
बोधसागर
( २५ )
कई बेर तैं कौल बँधावा । कई बार तैं गर्भ में आवा ॥
गर्भ में ज्ञान उपजा है तोही । संकटमें सुमिरे सब कोही ॥
बाहर निकसि नहिं उपजे ज्ञाना । अंधकार अहंकार समाना ॥
बार अनेक भुलाना भाई । नहिं सतगुरु की दीक्षा पाई ॥
गरभ त्रास तब छूटै भाई । जब सतगुरु कहैं बाँह समार्ई ॥
जगजीवन वचन
बोलत वचन कहो गुरु देवा । जीवकी अवधि बताओ भेवा ॥
दीन दयाल दया गुरु कीजै । बूडत जीव आपन करि लीजै ॥
दयावंत गुरु दीन दयाला । मुक्तिरूप जीवन प्रतिपाला ॥
मोको अभय दान गुरु दीजै । अन्दर ज्ञान उजालो कीजै ॥
सतगुरु वचन
गरभ बासमें कौल बन्धावा । सो कैसे तैं न बाहर निर्वावा ॥
बडु संकट तोहि उपजे ज्ञाना । बाहर निकसत सब विसराना ॥
जोई जीव कौल निर्वाहै । सोई नहिं गरभवास मईं आहै ॥
जगजीवन वचन
अब नाहीं भूलें गुरु देवा । तन मन लाय कहूं गुरु सेवा ॥
मोकैं बाहिर काढो स्वामी । कौल न चूकैं अन्तर्यामी ॥
सतगुरु वचन
कौल बोल सब चौकस कीना । तबहीं गर्भ सों बाहर लीना ॥
नौवे मास जो बाहर आया । लोग कुटुम्ब सबही सुख पाया ॥
सबही हरष करें मन माई । पुत्र हेतु सब करें बधाई ॥
बाजा बाजे करै उछावा । गीत नाद आधिके चितआवा ॥
सबै सजन मिलि गूड़ बँटावा । रैन समय तिय मंगल गावा ॥
नगरलोक सब करें बधाई । घर घर साजे देह लुगाई ॥
घर राजाके जनम सो पढ़या । कौल किया सो सब विसरैया ॥
पीसुन मिले सबहिं धुतारा । सबहीं ज्ञान भुलावन हारा ॥
पिशुन कर्म वर्णन
( २६ )
जगजीवन बोध
ताका नाम सुनो रे भाई । महा जालके फन्द फँदाई ॥
झूठे झूठ मिले संसारा । नरक कुण्ड में नाखन हारा ॥
पिसुन कर्म वर्णन
प्रथम माता
माता मनमें करै बखाना । यह भल उग्यो आजुको भाना ॥
बालक जन्मा मोरे कोखा । जन्म भरे की भागी धोखा ॥
नाइन
नाइन एक बधार्ई लायी । तीन तो एकै बात जनायी ॥
मेरा कहा करो तुम कामा । नाक छेदि कहो नाथू नामा ॥
नाल औवल पीसो गाढो । दिहली को तब बालक काढो ॥
यह तो बात मैं गुप्त सुनायी । सुवा जिवाका तो सुहि दायी ॥
पिता
पिताके मनमें ऐसी आवैं । उमगे हरष हिय नाहि समावैं ॥
बाटे पान मिठाइ बहुत । धन्य भाग्य मोर जनम्यो पूता ॥
काका
काका कहै मैं उतरूं पारा । बालक खेले घरके द्वारा ॥
कर्म जोर मोरें बड कीन्हा । क्षेत्रपाल मोहि बालक दीन्हा ॥
दादा
दादा सुनिकै दौरे आये । पोता देख बहुत सुख पाये ॥
दासी हाथे कुवैर मैगाया । हेतु प्रीति से कण्ठ लगाया ॥
दादी
दादीके मन हर्ष अपारा । लेत बलाई बारंबारा ॥
मैं करी बहुत सतियनकी सेवा । भये प्रसन्न मोर कुलदेवा ॥
नानी
नानी आवत वेगि उठाया । सुख चुम्बा है कण्ठ लगाया ॥
लून ले शिर ऊपर वारा । द्रव्य माल पुनि बहुत उतारा ॥
बोधसागर
( २७ )
नाना
अब नाना मुख देखन आया । दौहित्रा देखि अधिक मुख पाया ॥
उमँगे हरष हिये न अमायी । कंचन चूरा दिया बधायी ॥
भुआ
बहुत करै हरष भुआ बाई । दिन दिन अधिकी करै बधाई ॥
मुख चुम्बा दै कंठ लगावे । हिये हर्ष उमँग नहिं मावे ॥
मौसी
मौसी मन बहु हर्ष उठावै । धन्य बहिन को कोख तरावै ॥
मुख चूमे अरु कण्ठ लगावै । अतिशय उमँग हिये नहिं मावै ॥
अडोसी पडोसी
बुढिया एक जो बोले आयी । तिन यक बात कही समझायी ॥
बालक तैल लौन सों लीजै । लौना नाम कहे धरि दीजै ॥
दूसरी पडोसिन
दूजी कहै सुनो रे बाई । बालक डारो छीतर माई ॥
सांचो टोना यही कहावों । इनको छीतर कहि बतलावो ॥
तीसरी पडोसिन
तिया तीसरी बोले सयानी । मैं जान्यों सो काडु न जानी ॥
कोदरा बरोबर तौल के लीजै । याकर नाग कोदरसिंह कीजै ॥
चौथी पडोसिन
चमरिन गोद यहीको डारो । मोल लेइ पुनि ताहि उजारो ॥
चमरूसिंह नाम यहि केरा । बालक याते जिवै घनेरा ॥
पांचवी पडोसिन
याको धूर गुनौरे डारो । दूत पराछित या विधि मारो ॥
घूरन सिंहै अरु गेनौ नामा । दीजे ताहि सुधरे सब कामा ॥
( २८ )
जगजीवनबोध
छठी पडोसिन
यह सब बात बताओ माई । चूल्हे डारो चुल्हन कहाई ॥
जेती नारि आर्यों तेहि बारा । सबहिन आपन मता उचारा ॥
कोह काहू कोह काहु बतावैं । स्यानप आपन सबहि जतावैं ॥
ओझा और स्याने
बुढवै एक जो सीस धुनावैं । वाके शिर पर भैरों आवैं ॥
सो कह हमको बैल बधाओ । भैरोंसिघ कही बतलाओ ॥
देवी पूजक एक तब आया । देवीसिंह तब नाम बताया ॥
गाजी मुर्गी कोह चढ़ावैं । गाजीदीन तब नाम बतावैं ॥
यहि विधि अनेकनहू आये । आपन आपन उक्ति सुनाये ॥
पुरोहित
घरको पुरोहित ऐसी कही । मनको मनोरथ पूरण सही ॥
यह तो बडा सपूत कहावै । इनके तुलै कोह नहीं आवै ॥
पुरोहित कह यजमान है मेरा । कुल देवी भैरोंका चेरा ॥
चारण और भाट
चारण भाट जपै महामाई । भोजक भाट तहां चलि आई ॥
सबही मिलि दीनी आशीशा । महामाइ सुत कीन्ह बरखीशा ॥
मुसलमान फकीर
दवैश एक कहै समुझाई । नाम फकीरा कहो रे भाई ॥
बांधि गांठ गले में दीजे । सब पीरों का चारण लीजे ॥
योगी
जोगी एक तहां चलि आया । मेरी भभूत का परचा पाया ॥
कहा हमारा सुनिकै लीजे । याका नाम सदाशिव दीजे ॥
दिगम्बर
यन्त्र मन्त्र जतीकरि लाये । करि तावीज गले पहराये ॥
व्रत्र वटु सूअरदांत मंगायी । एक सुपारी माहि मढायी ॥
पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भका कौल भूल जाना और संसारी बंधनोंमें मगन होना
बाधसागर
( २१ )
भोजपत्रमें यंत्र मढाया । सात भांतिका रेशम लाया ॥
गूगल बारि धूप लै कीन्हा । सो पहिराय गलेमें दीन्हा ॥
पण्डित लोग
ब्राह्मण सबही नगरके आये । पत्रा पोथी साथहिं लाये ॥
पीपल केरे पान मँगाया । लगन साधिके नाम सुनाया ॥
जगजीवन नाम जनमका सही । याका मरण होय ना कबही ॥
द्रव्य माल दक्षिणा दीना । जनमपत्रिका लिखाय जो लीना ॥
बहु विधि सो संस्कार कराया । मोह फाँसमें पकरि दवाया ॥
गर्भ कौल तो सब विसराना । अमर रहनका जतन बहुठाना ॥
एक सो बात गुप्त ना होई । स्याना लोग कहैं सब कोई ॥
फन्द अनेकन में फन्दई । कौल किया सब गया भुलाई ॥
झूठे झूठ मिलै सब कोई । इन्ते काज एको नहिं होई ॥
पिछली कौल सबै विसरानी । महा जालमें बँधे प्राणी ॥
यह सब झूठे पाखण्ड साजू । इनसँ सरे न एको काजू ॥
साखी-कहैं कबीर सब चेतहूँ, आगे काल कराल ।
आल जँजाल तम छाडिके, पिछले लोक सँभाल ॥
चोपाई
जौन कौल गर्भ में कीया । मूरख विसारि-सब दीया ॥
फिर भी कठिन हो गया भाई । तुम करिहौ कौन उपाई ॥
इतने सब मिलि करहिं बधाई । तामें तेरा कौन सहाई ॥
तुम अबकी चेतौ जो नाहीं । मानुष जनम भाग बड पाही ॥
साखी-ये तेरे मित्र नहीं, सब वैरी करि जान ।
उबरा चाहो कालते, गुरुहि मित्र कर मान ॥
चोपाई
एक जीव बेरी बहुताई । यूथ युत्थ बाटन सब लाई ॥
कोई जीवको का तकसीरा । सबको जडिया मोह जँजीरा ॥
( ३० )
जगजीवनबोध
ज्ञान ध्यान जिव कैसे पावैं । इतने पिशुन ताहि भरमावैं ॥
देखो दिलै करि ज्ञान विचारा । किहिविधि उतरो भवजल पारा ॥
रे कुबुद्धि दुख में मत झूले । पिछला काल बोल मति भूलै ॥
इक दिन फेरि परैगा गाढा । सुशुक बांधि यम करिहैं ठाढा ॥
तुम मति जानो अमर है काया । यह दीसै सुपनेकी माया ॥
यहि चकचौंध भुलो मति कोई । संवल फूल जैसा तन होई ॥
जैसे नींद में सुपना आवै । जागि परै तब कछू न पावै ॥
यह तन ऐसे देखो भाई । झूठे झूठ मिलैं सब आई ॥
दिनाचार चटक दिखलावै । अन्तकाल ग्रासन कूँ धावै ॥
काल जंजाल सो छूटा जाई । गुरुसे प्रीति करो रे भाई ॥
सतगुरु ऐसी युक्ति लखावै । जासे जीव परम पद पावै ॥
सुनो जीव अबूझ की बाता । जनम गवाँवै करम कमाता ॥
हर्ष मोह मैं सबहि सुनाऊँ । जेते घर में सबहि दिखाऊँ ॥
एक वर्ष लगि डोल डोलावै । पशू रूपमें जनम गँवावै ॥
उखली जीभ तोतला बोलै । मातु पिता सब हर्षित डोलै ॥
आज जंजाल बोले बहकावे । त्यों त्यों हरष हिये नहिं मावे ॥
परी करै औ ऊभा धावै । बाहर भीतर दौड़ा आवै ॥
कंचन घँघुर बेगि गढ़ाई । रेशम केरी डोर पोवाई ॥
सोना रूपा बहु पहिराया । हीरा मोती भूल भुलाया ॥
बालन सँग में खेलन जावै । नाच कूद के घरही आवै ॥
मनमें आनंद करै चँचलाई । सोच फिकर कछु व्यापे नाई ॥
करै कुतूहल मनमें सोई । दिन दिन तेज सवाया होई ॥
आकुल बोलै सोच न आने । कूर कपट कर बहु सुख गाने ॥
संकटका दिन चित्त न आवै । करै अनीति जोई मन भावै ॥
चित्तमें दुर्मति रहै अति घनी । महा दुष्ट बुद्धि पापी सनी ॥
द्वादश वर्षकी भयी है देही । अनन्त उपाय करै नर केही ॥