सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( ३१ )

प्रगट काम काया के भीतर । सोच फिकिर नहिं व्यापे अंतर॥
अन्ध करै बहुत अहंकारा । निरखै तिरिया घर घर द्वारा॥
परवश दूती आनि मिलावै । जोर करै तो पकरि मगावै ॥
नाहकको तू कान लगावै । नहिं मानै तो यमघर जावै ॥
अघ करमी होय तन डोलै । जोर बहुत गरभ सो बोलै ॥
आंखिन माहीं वर्षे लोई । ज्ञान ध्यानकी सुधि ना होई ॥
गुरु चरचाके निकट न जावै । हँसी मसखरीसों मन भावै ॥
झूठी बात करै लबराई । तासों हेतु करै मितराई ॥

साखी—यह नर गरभ भुलाइया, देखि मायाको झोल ।
कहै कबीर सब चेतहु, सुमिरि पाछलो कौल ॥

चौपाई

इन्द्री स्नेह न मानै चेता । माया गर्ब फिरै मैमंता ॥
ईगुण प्रगटा अन्तर माहीं । कामातुर होय करी विवाही ॥
पहले विवाही एक लुगाई । बहुत प्रेम सँग ताहि लिवाई ॥
विषय विवेक फिर उपजा भारी । पीछे व्याही सुन्दरि नारी ॥
अँगारस्वरूप कामिनि अधिकार्ई । कामातुरसों रहे लपटाई ॥
महा अनन्द भये मन माहीं । एक पलक सँग छाड़े नाहीं ॥
करै खवासी कहत है दासी । बन्धा मोह जाल की फांसी ॥
खिदमतगार सहेली घनी । कई नायिका कई रामजनी ॥
नव नव खण्डके महल बनाये । सेना केरे कलस चढाये ॥
करी बिछावन तहैं बडभारी । गादी तकिया बहुत अपारी ॥
बहुत मोलको अतर मँगावै । फूलन केरी सेज बिछावै ॥
कहैं लगि बरनूं यह विस्तारा । मायाविनको बार न पारा ॥
टपका स्वाद भया तर अन्धा । आवै यम तब करै बहु फंदा ॥
नित नित त्रिया नई संयोगा । खान पान और षट रस भोगा ॥

सद्गुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखे बागमें ठहरना, उसका हरा हो जाना और राजाका खबर पाकर बाग देखने आना फिर कबीर साहबसे मिलना

( ३२ )

जगजीवनबोध

मता विषय रस कछू न सूझे । भैरों भूत शीतला पूजै ॥
भूलै कौल गरभकी बांधी । अब चकचौंध आई आंधी ॥
सबही जीव कौलकरि आवै । बाहर निकसि सब बिसरावै ॥

सतगुरुके आगमन

ऐसे जीव भूल रहे सारे । तब सतगुरु आइ पगु धारे ॥
जीव चितावन सतगुरु आये । अलीदास धोबी समझाये ॥
और हंस बहुत चेताये । फिरत फिरत पाटनपुर आये ॥

सतगुरुका पाटनपुरमें पहुँचना

सतगुरु आये पाटन ठाऊँ । जगजीवन राय बसै तेहि गाऊँ ॥
राय न मानै भक्ति विचारा । हँसे भक्तको बारम्बारा ॥
भक्त रूप सब शहर निहारा । कोउ न मानै कहा हमारा ॥
तब आपन मन कीन विचारा । कैसे मानै शब्द हमारा ॥
जाइ बाग में आसन कीन्हा । गुप्त रहे काहू नहिँ चीन्हा ॥
द्रादश वर्ष भये बाग सुखाने । सुलगे काछ होय पुराने ॥
चार कोस तेहि बाग लम्बाई । तीन कोसकी है चकलाई ॥
तहाँ जाय आसन हम कीन्हा । रहौं गुप्त काहू नहिँ चीन्हा ॥
तहवाँ मैं कौतुक अस कीया । सूखे बाग हरा कर दीया ॥
विकसे पुढुप जीव सब जागे । सबने हरियर देखा बागे ॥
माली जाय कै दीन बधाई । जागा भाग तुम्हारा भाई ॥
देखा बाग जाय तेहि वारा । फल फूलनका अन्त न पारा ॥
हर्षा माली बाहर आया । देखा बाग बहुत सुख पाया ॥
फूलन छाब भरी दुइ चारी । नाना विधिके फूल अपारी ॥
नाना विधिके मेवा लाया । ले माली दरबारि आया ॥
बैठा राजा सभा मैझारा । उमरावनको तहाँ न पारा ॥
माली सब ले धरी रसाला । राजा पूछ करे ततकाला ॥

बोधसागर

( ३३ )

राजा जगजीवन बचन

कौन देश तैं माली आया । फूल अन्नप कहाँसे लाया ॥
कौन बाग के फलन विशेषा । कानो सुनी न आँख न देखा ॥

माली बचन

नौ लखा बाग रहा होय आया । फल प्रसून सब नये बनाया ॥
सुनिके राजा हरषा भारी । संग उठी चली परजा सारी ॥

राजा बचन

कहु दिवान यह कौन प्रकारा । समझि बूझिके करो विचारा ॥
ज्योतिषी पण्डित सवैं बुलाये । पत्रा पोथी सबहीं लाये ॥

ज्योतिषी बचन

लगन सोधि सब ऐसी कही । कोइ पुरुष यहाँ आये सही ॥
है कोइ नर कै कोइ पखेहू । सोधो जाय बाग सब हेहू ॥
हेरे राय बागके माहीं । बैठे संत यक ध्यान लगाहीं ॥
राजा जाय धरा तब पाई । नगर भरेकी परजा आई ॥
कहे राजा धन मेरो भागा । दर्शन पाय अमर होय लागा ॥
आलसी घर गंगा आयी । मिटि गई गर्मी भयी शितलायी ॥

सतगुरु बचन

तब राजासों कही पुकारी । सुन राजा एक बात हमारी ॥
हम जनि भार चढाओ भाई । काहे को तुम देहु बड़ाई ॥
अच्छा बाग विमल हम चीन्हा । तासो आये आसन कीन्हा ॥
ऐसा तुमहीं बाग बनाया । नाना विध के रख लगाया ॥
आसन किया देखि हम ठारी । बहुत फूल फलकी अधिकारी ॥

राजा बचन

फिर कै राजा शीस नवाया । द्वादश वर्ष भये बाग सुखाया ॥
सूखा बाग भये बहु बारा । नहिं कोइ लोक आहे संसारा ॥

नं. ५ कबीरसागर - ३

सद्गुरुका राजाको गर्भका कौल याद दिलाना

( ३४ )

जगजीवनबोध

छाडी फल फूलनकी आसा । कोइ न आवै बागके पास । ॥
तुम समर्थ पग धारे आई । हरा हुआ बाग सब ठाई ॥
राजा कहै दया अब कीजै । मोकूँ मुक्तिदान फल दीजै ॥
मेरे मस्तक धरहू हाथा । मैं रहूँ सतगुरु तुम्हारे साथ । ॥

सतगुरु वचन

तुमको कौल भुलाना भाई । किया सो कौल गया बिसराई ॥
संकट गरभ में बाचा दीन्ह । बाहरनिकसि करमबहु कीन्ह ॥
किया कौल जब गये भुलाई । तब हम आइके चरित दिखाई ॥
बहु विधि बात कही चेताई । बाहर निकसि बुद्धि पलटाई ॥
तुमको तो कछु सूझत नाही । फन्दा मोहजाल के माहीं ॥
आवै यम दश द्वार मून्दी । तबहीं बांधि करेगा कून्दी ॥
सोच बूझ देख मन माहीं । इतने में तेरा कौन सहाहीं ॥
पिसुन मिलै सब वार न पारा । नरक बास में नाखन हारा ॥
बहु विधि तुमसों शब्द पुकारा । किया कौन नर भूल गवौरा ॥
घर घर हम सब कही पुकारी । कोइ न मानै कही हमारी ॥

हे राजा जब तू मातृगर्भमें था तब तू वचनवद्ध हुआ था कि भजनके अतिरिक्त अब और कुछ न करेगे । उस दुःखमें तो तू पुकारता था तथा हाय हाय करता था, कि मुझको इस दुःखसे निकालो । जब तू गर्भके बाहर आया तब तू अपनी प्रतिज्ञा भूल गया और शारीरिक कामना तथा पशुधर्मके वशीभूत होकर तूने कौन कौनसे कुकर्म न किये ? सत्यगुरुकी दयाको तू एकबारगी भूल गया, भोगविलासमें फँसकर अन्धा हो गया और मायाने तेरे ज्ञानको बिलकुल ही नष्ट कर दिया । जब यमदूत आवेगे और तेरी मुश्कें बांधकर नरक में लेजावेंगे तब तेरा कौन मित्र सहायता करेगा ? और तुझको उनसे कौन छुड़ावेगा ? राजा ! तू सोच तथा समझ कि, वे लोग जिन्हें तू अपना

राजाका सद्गुरुसे उद्धारकी विनती करना

बोधसागर

( ३५ )

मित्र समझता है उनमें से कौन तेरा उस समय सहायक होगा ?
कौन तुझको नरकसे बचावेगा ? गर्भमें मैंने तुझको बहुत सम-
झाया था सो हे गँवार ! तू उन सब बातोंको भूल गया मैंने
सबसे घर घर पुकार कर कहा मेरा कहना किसी मूर्खने न
माना । इतनी बात सुनकर राजा बोला ।

राजा बचन-चौपाई

अब तो गुरु होहु सहाई । मोकों यमसे लेहु छुड़ाई ॥
सबही करम बरुसकै दीजे । हूबत मोहि उबारके लीजे ॥
सैन करी पालकी मँगाई । लै सद्गुरु को माहिं बिठाई ॥
पाँव उधार काँध धर लीन्हा । तबही महल पयाना कीन्हा ॥
सद्गुरु पग धर महलके माहीं । सब रानिनको राय बुलाहीं ॥
समरथ दर्शन दीन्हा आनी । धनधन भाग्य तुम्हारो रानी ॥
सद्गुरु को पलँगा बैठाई । सब मिलि पाँव पखारो आई ॥
राजा भाखे शीश नवाई । मोकों राखो गुरु शरनाई ॥
करिये सद्गुरु जीवको काजा । दया करो मैं लाऊँ साजा ॥
अब हम शरना लेब तुम्हारी । दया करो तन दुखत हमारी ॥

सतगुरु बचन

तब कहे सतगुरु लेहु सँभारी । राजा सुनहु बात हमारी ॥
कस चले राजा लोक हमारे । मैं नहिं देखूँ लगन तुम्हारे ॥
कोटिन ज्ञान कथे असरारा । बिना लगन नहिं जीव उबारा ॥
जो कोई बूझे भक्ति हमारी । ताको चहिये लगन सँचारी ॥
जैसे लगन चकोरकी होई । चन्द्र सनेह अँगार चुगोई ॥
ऐसे लगन गुरुसे होई । धर्मराय शिर पग धर सोई ॥
तुम तो हो मोटे महाराजा । कैसे छोड़िहौ कुल मर्यादा ॥
कैसे छोड़िहौ मान बड़ाई । कैसे छोड़िहौ मुख चतुराई ॥
कैसे छोड़िहौ हाथी असवारा । कैसे छोड़िहौ अंथ भँडारा ॥

सद्गुरुका राजाको आरती करनेका उपदेश देना

( ३६ )

जगजीवनबोध

कैसे छोड़िहौ काम तरंगा । कैसे राजसे करो मन भंगा ॥
कैसे छोड़िहौ कनक जवाहिरा । कैसे छोड़िहौ कुल परिवारा ॥
तुम तो उनकी बांधी आसा । हम तो राजा कथैं निरासा ॥
जो तुम तजु अन्तरकी बाथा । तबहीं चलो हमारे साथा ॥
भक्ति कठिन करी ना जाई । काहे को हिंस करत हो राई ॥

राजा वचन

राजा कहे दोऊ कर जोरी । सुनिये समरथ बिनती मोरी ॥
नगरके सब षट् बरन बुलाऊं । यहि अवसर सब माल लुटाऊं ॥
तुम तो कह्यो बाहर लेव वासा । मैं तो देहकी छोड़ों आसा ॥
अमृत वचन पियाओ आनी । हंस उबार करो निरबानी ॥
नगर कोटकी छोड़ी आसा । निश दिन रहूं तुम्हारे पास ॥
हुकुम करो सोई मैं लाऊं । करो दया मैं शीस नवाऊं ॥
उमँग उठे हर्षित मन मोरा । थकित भये जनु चन्द्र चकोरा ॥
सूखा बाग जो फल परकाशा । तबते पूजी मनकी आशा ॥
कसनी कसो सो सहुँ शरीरा । तबहुँ प्रीत न छोड़ूँ तीरा ॥
जो तुम कहो सो भक्ति कराऊँ । दया करो तो शीश चढाऊँ ॥

सतगुरु वचन

तब समरथ अस शब्द उचारा । अब आरति का करो विस्तारा ॥
चार गुरुको चौक पुराओ । तिनका तोरायके जल अरपाओ ॥
राजा गर्भ निवारौं तोरा । भाव भक्तिसे करो निहोरा ॥
भाव भक्ति हम चाहें राजा । धन सम्पत्तिसे न कछु काजा ॥

राजा वचन

दया करो सो साज मँगाऊँ । कौन वस्तु ले आगे आऊँ ॥
मैं हूँ जीव मतीका भोरा । कहैं जानूँ चौका के व्योरा ॥
समरथ कहौ मैं आनूँ सोही । चौका जुगति बताओ मोही ॥
करहु गुरु चौका विस्तारी । जीवहि यमसों लेहु उबारी ॥

राजाका पहलेके हंसोंका हाल पूछना और सद्गुरुका उत्तर देना

बोधसागर

( ३७ )

सतगुरु वचन

चार गुरु को साज मँगाओ । चार सवा सौ पान लै आओ॥
चार सवा सेर कन्द मँगाओ । आठ अंश नारियल लै आओ॥
चार माला अरु लोटा चारो । सतगुरु आगे लाकर धारो ॥
चार थाली चार गादी कीजे । चार चँदोवा ताने लीजे ॥
चार कलस जल भरि धरवाओ । तब सतगुरुके आगे आओ ॥
सब यह साज आगे धरि दीन्हा । तब सतगुरुसे विन्ती कीन्हा ॥

राजा वचन

मैं हूँ जीव करम बहु कीना । कैसे यमसों करिहो भीना ॥
गिनत गिनत नहिं आवे चीना । बारम्बार मैं औगुन कीना ॥
ऐसा करम किया मैं भारी । कैसे यमसे लेहो उबारी ॥
एक बात गुरु कहौ विचारी । मोसम पतित आगे कोइ तारी॥
तब सतगुरु बहुत विहँसाने । फिर राजासों निरणय ठाने ॥

सतगुरु वचन

सतगुरु सत्यसुकृत मम नाऊँ । जाइ मथुरामें धारेउँ पाऊँ ॥
खेमसरी ग्वालिनी उबारी । बहुत जीव लै लोक सिधारी ॥
द्वादश पहुँचे पुरुष हजुरी । और हंस द्रौपन मँझुरी ॥
त्रेता युगे मुनिन्दर नाऊँ । नगर अयोध्या धारे पाऊँ ॥
हंस बयालिस लीन्हा लारा । पहुँचे तहाँ पुरुष दरबारा ॥
और हंस द्रौप महाँ गयऊँ । जिन जैसी जिव देह बनयऊँ ॥
अब द्वापरका कहुँ विचारा । नरहर राजका किया उधारा ॥
सात सौ हंस पावन कीन्हा । कुटुम्ब सहित पयाना दीन्हा ॥
चन्द्रविजय घर इन्दुमति नारी । संकट राजा लीन उबारी ॥
केता पूछो जीव सनेही । गिनत गिनत ना आवे छेही ॥
युगन युगन भवसागर आऊँ । जो समझे तेहि लोक पठाऊँ ॥

( ३८ )

जगजीवनबोध

शब्द हमारा मानै कोई । तौ नहिं जाय यमपुरी सोई ॥
इतनी बात कही समझायी । दिल राजाके प्रतीति समायी ॥

राजा वचन

धन्य भाग मेरा कुल कर्मा । कोटित यज्ञ कियो तप धर्मा ॥
सत्यगुरु आयदरस मोहि दीन्हा । बूझत हंस उबार कै लीन्हा ॥
हो प्रभु मोर करो निवैरा । मै तो चरण कमलका चेरा ॥
कहु सन्देश नगर में भाई । जय जीवन राय लोकको जाई ॥
नेगी जोगी सबहि बुलायी । और नगरकी परजा आई ॥
चन्दनका सिंहासन कीन्हा । चौका पूरि कलश धरि दीना ॥
सतगुरु शब्द उचारे लीना । युक्ति साजि गादी पगु दीना ॥
सब रानिनको बेगि बुलायी । करि दण्डवत् गुरुचरणा आयी ॥
जीव प्रति नरियल ले आये । सो सतगुरु को आनि चढ़ाये ॥

सारखी-सब रानी बिन्ती करें, सुनु समरथ चित लाय ।

महा अकरमी जीव हम, सबहि लेहु सुकताय ॥

चौपाई

जेठी रानी चन्द्रमति जोई । सतगुरुकी गति जानी सोई ॥
दूजी रानी है मनकी युक्ती । निर्भय होय करै गुरु भक्ती ॥
तीजी रानी है मनपोई । लज्या कारण ना मानै कोई ॥
चौथी रानी भानुमति आही । जीवत सती सुजानो ताही ॥
पांचवीं रानी धन्ना बाई । कलावंत होय आगे आई ॥
छठवीं रानी प्राणप्यारी । पूजे सन्त वह लाज निवारी ॥
सतई रानी है सत मामा । निर्भय होय जपै गुरु नामा ॥
अठवीं आनन्दकला है रानी । सतगुरुसों प्रीति निज ठानी ॥
नौवीं रानी नामपियारी । भक्तिवंत जाने संसारी ॥
दशवीं रानी है दिल दायक । सब रानीकी सो है नायक ॥
ग्यारहवीं रानी है रंगरोपा । ताके कारन राव नहिं लोपा ॥

राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद्गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरका हठ करना पीछे शरणमें आना

बोधसागर

( ३९ )

बारहवीं रानी सूरजमती । हंस रूप है ताकी गती ॥
द्वादश रानी सब बनि आयी । एक अंग होय सब भक्ति करायी ॥
राजा छडीदार पठवाई । तो वो कुँवरको लाय बुलाई ॥

छडीदार बचन

छडीदार कहै कर जोरी । राजकुँवर सुनु विन्ती मोरी ॥
राजा रानि गुरु चरणै आये । ताते तुमको बेगि बुलाये ॥
गरभवाससों करै निरुवारा । तुरत चलो जनि लावो बारा ॥

कुँवर बचन

तुम छडीदार कहो बात विचारी । कैसा गुरु है सो अधिकारी ॥

छडीदार बचन

हम मति हीन कछु नहि जाना । निश्चय आही पुरुष पुराना ॥
यह सुपने नाहीं कहुँ देखा । सुर मुनि नारद शारद पेखा ॥

कुँवर बचन

कुँवर बीनती कीन सुहाती । सुनतैं बात जुडानी छाती ॥
हंस रूप चारों हैं भाई । उमंग हरष हिये नाहि समाई ॥
जहाँ सतगुरु आसन कीन्हा । कुँवर चार आइ दर्शन लीन्हा ॥
बडा कुँवर वह सूरजभाना । गुरु स्वरूप हृदय में आना ॥
दूजा कुँवर इन्द्रमन दासा । शब्दै पीवै शब्दकी आसा ॥
तीजै कहिये चतुर्भुज कुमारा । शब्द सुनत वह सीस उतारा ॥
चौथा कुँवर विक्रम दासा । जिन तन मनकी छोडी आसा ॥
चारों कुँवर धरे गुरु पाई । तन मन धन सब प्रीति चढाई ॥
कदलौ केर पतवार धरायी । गज मुक्ताहल चौक पुरायी ॥
नरियल मोरि के मालूम कीन्हा । लिखि परवाना सबकूँ दीन्हा ॥
इतने हंस भये मन भावन । तिनको सतगुरु कीन्हा पावन ॥
तन मन धन सो बदला कीन्हा । शिरके साँट साहबको चीन्हा ॥
करी निछावर मेटे गर्भफेरा । अब तो भई भगतिकी वेरा ॥

कुकर्मी जीवके उद्धारका उपाय

( ४० )

जगजीवनबोध

सतगुरु वचन

तुमरी राय भली बनि आही । तुम गरभवासकीकौल निबाही॥
जोई कौल गरभका पालै । ताको सतगुरु होहि दयालै ॥
गरभ कौल कोई चूके भाई । असंख्य जन्म चौरासी जाई ॥

साखी-गरभ कौल चूके नहीं, वोही हंस सुजान ।
चौरासी भरमें नहीं, सो पहुँचे यहि परमान ॥

राजा--वचन चौपाई

राजा कहै दोऊ कर जोरी । सुनु समरथ यह विन्ती मोरी॥
महाकुर्मी जो होय प्रानी । करमनसे कैसे होय छुटानी ॥

सतगुरु वचन

तब समरथ गुरु शब्द उचारा । करमन काटि कहैं निरवारा ॥
असंख्यजन्म कर्म किय आयी । पान पान में करम कटायी ॥
जो जिव कर्म करै निरवारा । पाख पाख में कर्म सुधारा ॥
विना पान नहि कर्म कटाई । कोटिन ज्ञान करै जो भाई ॥
रेखा गुंज विचारै जानी । विना गुंज करै जिव हानी ॥
युग छत्र सो हंस उबारा । छत्र मुनी से उतरे पारा ॥
युग बन्धन ते शिष्य करीजै । असंख्यजन्मका कर्म जो छीजै॥
जैसा जीव तैसा होय पाना । सबही करम होय छय माना ॥
लगन जैमुनि आवै हाथा । धर्मराय तेहि नावै माथा ॥
गुरुशिष्य युक्ति एकजो आवै । पारसपान छत्र मुनि पावै ॥
पान एकोतर लैहैं जोई । असंख्य जन्मका कर्म नशाई ॥

राजा वचन

राजा सतगुरु विनती लायी । लगन जैमुनि देहु बतायी ॥
लगन जैमुनी कैसे पावै । कैसे सतगुरु सों लौ लावै ॥
कौन जुगति चरनामृत लेही । कैसे करै जो बने विदेही ॥

बोधसागर

( ४१ )

कौन वस्तु कहाँ लै आवै । काह भेट गुरु आगे धरावै ॥
लोकलोक गुरु कहो समझायी । कहौ हंस कहैं जाय समायी ॥
कैसे पावै लोक निवासा । कौन कौन घर करिहै वासा ॥

सतगुरु बचन

तब सतगुरु अस बचन उचारा । शिष्य होय सौपूँ भंडारा ॥
शिष्य होय सँवारे देही । लोक द्वीपकी गम्य तब लेही ॥
शिष्य होय गुरुवश करलीजै । तन मन धनही नथर कीजै ॥
जो कछु आपन भक्ति करावै । पान पान सँग लोक पहुँचावै ॥
ताकी देह बनत है भाई । तामें हंस तब जाय समाई ॥
जोइ वस्तु ध्यानमाँहि चढावै । सोई हंसा सत्यलोक पहुँचावै ॥
ताका नाम रेवती भाई । विना शिष्य कोइ पावै नाई ॥
तन मन धनको नेह न आवै । तब जिव लगन जैसुनी पावै ॥
तब राजा मन हरष अपारी । करहु शिष्य जाऊँ बलिहारी ॥

कुँवर बचन

कुँवर कहै विलम्ब किमि साहूँ । दया करो हो शीस उताहूँ ॥

रानी बचन

रानी मनमें हर्ष अनन्दा । मानों ऊगे कोटिक चन्दा ॥
तन मनसे करिहौं गुरु सेवा । हमको शिष्य करहु गुरु देवा ॥
अन्तर बात सब देहु बनायी । जैसे सीप मोती कूँ भायी ॥

सतगुरु बचन

करनी कठिन सत्य करिजानो । कहनि करनि बहुभेद बखानो ॥
कठिन करनी टले जो भाई । ताकर जीव बहुत दुख पाई ॥
शिष्य होय जब कौल बँधावे । तन मन धन सब आनि चढावे ॥
किये कौल निबाहे पूरा । करे गुरुसेवा शिष्य सोइ शूरा ॥
पूरा होय के शूर कहावे । सतगुरु बचन सदा लौलावे ॥

१ भाव ।

( ४२ )

जगजीवनबोध

करी कौल निर्बाहे नाहीं । ऐसो शिष्य सो यम मुख जाहीं ॥
तन मन चढावे वही सुख पावे । आखिर धन यौवन बहि जावे ॥
कौल करे सो जाल भुलाई । अँटके भव में नाहिं सहाई ॥
किया कौल टालि जो देई । बहु दुख संकट माथे लेई ॥
होय दुखी दुख देह समावै । ताकी देह रोग है आवै ॥
गुरु को दोष देहु जन कोई । आज्ञा मेटे सजा तेहि होई ॥
सो जिव कदी न उतरे पारा । करन द्वेष जो गुरु से धारा ॥
अन धन ताकहैं चहिये भाई । जापर सतगुरु होहि सहाई ॥
कर्म सतगुरु दया कटावे । साहब ध्यान सो फल यह पावे ॥
गुरु छोडि जो कर्म करावे । उन मनमें जो लीन रहावे ॥
सो नहिं पावै वस्तु अपारा । मनमें देखहु करहु विचारा ॥
सहज भक्ति करो तुम भाई । होय शिष्य नहिं डर कछु ताई ॥
सहज भक्ति राजा तुम करहु । शिष्य होइ भक्ति पद तरहु ॥
सहज भक्ति सबही सुखदाई । कठिन कमाई दुस्तर भाई ॥
कठिन कमाई खाँडेकी धारा । सहज भक्तिसे उतरो पारा ॥
सदा सुखारि भक्ति रस पीजै । मूली ऊपर घर नहिं कीजै ॥

राजा वचन

सब कर्म कठिन सहज कर जानू । तन मन धन कर लोभ न आनू ॥
हमको सीख अब देउ गुसाई । कौल कहैं सो चूंकू नाई ॥
जो कहैं चूकि कौल हम जावै । अपनी करनी हम भरि पावै ॥
कौल चुके सो मूँढ गवारा । विनु स्वारथ जग होवे ख्वारा ॥
रंकके हाथ रतन जो आवे । कौडी बदले काह गवाँवे ॥
अब सतगुरु दाया मोहि कीजै । चूके कौलका फलहि कहीजै ॥
फिर कैसे सो सुख पावे । कैसे वह फिर कौलमें आवे ॥
कैसे निर्धन धनै बहोरे । कैसे रोगी रोग सो छोरे ॥
अब करु शिष्य शब्द मुहिदीजै । नहिं तो देह त्याग हम कीजै ॥

आरती कराकर राजा तथा अन्य जीवोंका पान लेना

बोधसागर

( ४३ )

साखी-चरण वन्दुँ कर जोरिके, सतगुरु सुनो पुकार ।
लगत जैसुनि जब मिले, तबही करब अहार ॥
सतगुरु वचन-चौपाई

ऐसे कष्ट करो मत भाई । करो विचार मैं कहूँ सुनाई ॥
करो आरती साज मँगाओ । लेई पान परम सुख पाओ ॥
प्रथम सिंहासन लाइ बिछाओ । सर्वजीव एकसुरति होय आओ॥
सवा सै पान जीव प्रति लाओ । सवा सेर महाकन्द मँगाओ ॥
कपडा बस्तर धातु धराओ । ताँबा पीतल बर्तन लाओ ॥
सोना रूपा मोती हीरा । लाल जवाहिर बने सो चीरा॥
जैसो साज जोई लैं आवै । तैसो हँसा देह बनावै ॥
इतनी साज नहीं बनि आवै । ताके हेतु यह गौ ठहरावै ॥
गौ नाम पृथ्वी का होई । पृथ्वी नाम यह देह संजार्ई ॥
सोधन चले अग्रकी धारा । अगर वास तहैं होय अपारा ॥
पान संग सो देउँ पहुँचायी । लोक जात सो बार न आयी ॥
जब सतगुरु आज्ञा फरमायी । तब राजा सब साज मँगायी॥
सब ही राज जब आनि धरावा । तब सतगुरुको तरुत बिठावा ॥
जुगति साजि चरणामृत लीन्हा । तन मन धन अर्पण करदीना ॥
पुनि सतगुरु पान सो लीना । जैसो जीव तैसो तेहि दीना ॥
पाइ पान सबही चित दीना । होय अधीन सत्य सुख लीना॥
तब सतगुरु यक वचन उचारा । सबहीको कह्यो करन विचारा ॥

सतगुरु वचन

सुनु राजा यक कहूँ विचारा । मानो राजा कहा हमारा ॥
जो वस्तु तुम हम सो पाओ । रखो चेत नहि अनत गँवाओ ॥
जुगाओ शब्दै करो कमाई । हट करि रखो नहि देहु गवाई॥
सेवा करत सुरति चलि जायी । तबहि कालघर बजे बधायी ॥
जे जिव शब्द सुरति पर चाले । सबही विधि सो होय निहाले ॥

तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्न भिन्न लोककी प्राप्ति

( ४४ )

जगजीवनबोध

सारखी-शिष्य होय तनै छिपाइ, ताका कहूँ विचार ।
कहै कबीर निर्भय नहीं, निश्चय यमके द्वार ॥

राजा वचन-चौपाई

राजा कहै सुनो गुरु मोरा । मैं लागत हूँ चरने तोरा ॥
सहस्र अठासी लोक बताओ । भिन्न भिन्न कै मोहि बुझाओ ॥
कौन हंस कहँ करै बसेरा । सब ही हंस कर कहँ २ डेरा ॥
उत्तर समरथ कहो बुझायी । यह सन्देह उठा मन आयी ॥
खेमसरी को कहा संदेशा । द्वादश हंस उन सँग उपदेशा ॥
चारों युगका कहा संदेशा । बहुते हंस बतायो भेशा ॥
बहुते जीवहि बोध बताये । तन छूटे सब कहाँ समाये ॥
बहुत हंस पहुँचे निज ठाई । तिनकर पता कह्यो समझाई ॥
और हंस कहाँको गयऊ । ताका बहुत संदेहा ठयऊ ॥

सतगुरु वचन

हे राजा तोहि कहि समझाऊँ । भिन्न २ कै वरनि बताऊँ ॥
जे जे जीव परवाना पावैं । सो सो जीव सत्यलोक सिधवैं ॥
परवाना की यहि अधिकाई । हंस विगोय ना कबहुँ जाई ॥
जो हंसा नहि देह बनावै । सो सब मानसरोवर जावै ॥
मान सरोवर दीप अमाना । होइ है चार भानु परमाना ॥
परवाना की यह अधिकाई । योनि गरभ बहुरि नहि आई ॥
ताते ताहि वृत्तान्त बतायी । सकल कामना तोर मिटायी ॥
सत्य सत्य सबको समझायी । जब गुरुको चरणामृत पायी ॥
जो कछु करै सुकृत कमाई । सो सब पान पर देहि चढाई ॥
हेत द्वीपमें पहुँचे जाई । तब ही हंसा देह बसाई ॥
ऐसी विधि जो पान चढावै । निज स्वरूप जीव सो पावै ॥
तापर हंस होय असवारा । पचासी पवन परे सरदारा ॥

राजाका सद्गुरुसे लोक लेजानेको विनती करना

बोधसागर

( ४५ )

जो ऐसी नाहीं बनि आवै । ताके पान संग वृषभ चढावै ॥
वृषभ चढावे पावे सोई । पढुप दीप रूप बहु होई ॥
वृषभ नाम नील है भाई । उनकी शोभा बहुतहिं पाई ॥
नाम नील वरन है स्वेता । ताको रूप कहा कहु केता ॥
जो वृषभ नहीं बनि आवै । तो लै गौ सो देह बनावै ॥
गौ देह सो पान जो पावे । मंजुल करि वह हंस रहावे ॥
दश हजार सुर झलके देही । पहुँचे हंसा होय विदेही ॥
हीरा मोती लाल जवहिरा । पान चढे पुनि देह उजिहिरा ॥
बस्तर दे पुनि पान चढावे । ज्ञान दीपमें लै पहुँचावे ॥
पांच सौ सूर्य समान सरूपा । परसत तहाँ सो होय अनूपा ॥
कंचन रूपा धातु चढावै । तैसो शोभा देहमें पावै ॥
कहुँ पुकार करो निवैरा । देह विना कहँ करै बसेरा ॥

राजा वचन

धरे राम सतगुरुको पाऊ । हो सतगुरु तुम हंस मुकताऊ ॥
सत्यगुरु मैं तुव बलि जाऊ । सर्व भेद तुम मोहिं बताऊ ॥
कछु न मोसे राखु दुराई । देत हौं तुमको पुरुष दुहाई ॥
जो तुम कहौं करौं मैं सोई । तुमसो दिल पतियाना मोई ॥
कृपा करो मैं प्रीति लगाऊँ । कसनी देहु सो सकल सहाऊँ ॥

सतगुरु वचन

तब सतगुरु कहे समझायी । काहे को तुम देत दुहायी ॥
सबही कहौं तुम पूछो तैसी । लोक राह है सो पुनि जैसी ॥
गही बाँहि उबारै तोहि राई । यहि हंसन की अहे कमाई ॥
जो तुम किरिया दीन्हा मोई । कछु न तुम सौं राखूं गोई ॥
यह कहिसतगुरु युगति बनाया । ले राजाको अंक मिलाया ॥
अंक मिला कटी सब माया । पारस रूप जो भई काया ॥

सद्गुरुका प्रसाद पाना

( ४६ )

जगजीवनबोध

अंक मिलाया भये नृप पारस । उघडी दृष्टि अधिक भै आरस॥
लोक द्रौप दृष्टि भै आई । भिन्न भिन्न सब द्रौप दिखाई ॥
भये राजा मन महा अनन्दा । मानो ऊँगे पूर्ण चन्दा ॥

राजा वचन

धन सतगुरु तुम्हरी बलिहारी । बूडत जीव तुम लीन्ह उबारी ॥
अब सतगुरु प्रसाद कछु कीजै । महा प्रसाद जीवनको दीजै ॥

सतगुरु वचन

सतगुरु कहै सुनो तुम राई । महा प्रसादकी जुगति बताई ॥
कंचन केरी थार मँगाओ । अमृतकी झारी भर लाओ ॥
आसन डारिके पुरुष बैठोओ । स्वेत बहुत सब हंस ले आओ ॥
इतना करि तब चरण खटारो । होय अधीन तन मनको मारो ॥
सुनि राजा सब युक्ती लीन्हा । सतगुरुको बहु बन्दन कीन्हा ॥
चरणखटारि पोंछि जब लियऊ । आसन बिठाय पुरुष कहँ दियऊ ॥
तब सतगुरु अस करबे लीना । सीथ प्रसाद सबनकूँ दीना ॥
पाय प्रसाद भये बड भागा । शून्य महल मन मोहरा जागा ॥
कहै समरथ कहु कैसा स्वादा । कहत बने नहि बनत अघादा ॥

सारखी-महाप्रसाद के करतही, निःतत्त्व होय जाय ।

रंचक घटमें संचरे, सतगुरु लोक दिखाय ॥

राजा वचन--चौपाई

सतगुरु कहिये बात विशेषा । लोक द्रौप सबही हम देखा ॥
धन्य सतगुरु तुम्हारे बलि जाऊँ । लोक द्रौप सब दृष्टिहि पाऊँ ॥

सतगुरु वचन

चौका युक्ती नहीं बनि आवै । महा प्रसाद कै देह बनावै ॥
तुमसे राजा कहु समझायी । पाख मास भै पान तुम पायी ॥
पुरुष पान सो पावे जबहीं । अगम ज्ञान सो सूझे तबहीं ॥

पान माहात्म्य

बोधसागर

( ४७ )

यही ज्ञान मैं भेद समझायी । तुम हंसन से कहो बुझायी ॥
हमरो प्रतिहार पान है भाई । पलपल खबर हंसकी लाई ॥
सोई वस्तु लै लोक पहुँचावे । सोई पान संग हंसन आवे ॥
जाका तुमसे कहूँ विचारा । पान लहे सो हंस हमारा ॥
जैसुनि लगन पान जो पावे । निर्भय लोक हमारे आवे ॥
पान परख विन झूठ कडिहारा । धोखे लेइ जिवन कर भारा ॥
धर्मराय माँगि है पाना । जब ही हंसा करे निर्वाना ॥
साखी-सब ही पहुँचे लोकमें, चढै पानपर अंक ।
कटे कर्म सब जन्मके, हंस होय निःशंक ॥

हंस ( राजा ) वचन-बोपाई

हंस कहे सुनो गुरुदेवा । जीवकि अवधि बताओ भेवा ॥
जादिन अंत अवस्था आवे । ताकर भेद हंस किमि पावे ॥
सोम शुक्र दिन औ बुधवारा । ताका कहिये चन्द्र सरदारा ॥
आपनि आपनि चौकी आवै । तौ यह जीव बहुत सुख पावै ॥
चले चूक चौकी कर फेरा । तौ कायानगरमें होय बखेरा ॥
गुरुबारका भेद बताऊँ । दो भावै गुरु दरस दिखाऊँ ॥
एकै आवै एक न आवै । ता दिन जीव बहुत दुःख पावै ॥
बार तिथि चौकी चूक करही । तो निश्चय ना बाचै देही ॥
सरब भेद मैं तोहि बताया । विरले हंस भेद यह पाया ॥
तुम सों हंस कहूँ समझायी । गुप्त भेद ना बाहिर जायी ॥
अब हम पृथ्वी परिक्रमा जावै । भूले हसन करें चितावै ॥
तुम राजा बैठि राज कराओ । सार शब्द जपन चित लाओ ॥

राजा वचन

जब सतगुरु तहाँ ऐसो कहिया । तब राजा मन चिता भइया ॥
राजा चरण धरयो तब आई । तुम विनु कैसे रहूँ गुसाई ॥
हमको राखो चरण लगायी । नहि देहु सत्यलोक पठायी ॥

सद्गुरुका पाटनसे चलनेका विचार प्रगट करना और वहाँके हंसोंकी विनती

( ४८ )

जगजीवनबोध

करक संक्रान्ति चन्द्रकी भाई । जल तत्त्व ते चन्द्र कहाई ॥
जब चन्दा घर चन्दा सोई । रोग व्याधि शोक ना होई ॥
चन्द्र पेलिके सूर समावे । पास छः में लोकहिं जावे ॥
अब पाँच तत्त्वका कई बखाना । जानेगा कोइ हंस सुजाना ॥
परबत पंच काया के बारै । गुरु गम हंसा करै विचारै ॥
पीत वरन है मन्दिर वारा । तामें पुरुष दरश गुरु सारा ॥
स्वेत वरन है पुरुष परमाना । ताका दरश करै कोइ स्याना ॥
तीजे लालवरन पुरुष परमाना । देखत हैं सो हंस सुजाना ॥
चौथा हरा रंग है सूरत । ताको ध्यान धरि देखिये सूरत ॥
पाँचवें स्याम वरन अधिकारा । सो देखै कोइ हंसा प्यारा ॥
जो कोइ इनसै सुरति लगावै । स्वास स्वासकी खबर बतावै ॥
रवि मंगल शनिश्चर वारा । तापर सूर होय असवारा ॥

कालज्ञान

सतगुरु वचन

सतगुरु कहै सुनो रे भाई । अगम के भेद कई समझाई ॥
भिन्न भिन्न करके भेद बताऊँ । आगम कहिये दृष्टि दिखाऊँ ॥
वर्ष छः मास मासका भाऊँ । पाख आठदिन बरनि सुनाऊँ ॥
इंगला पिंगला सुषुमनि नारी । चले लगन सो लेहु विचारी ॥
पाँच तत्त्व हैं उनके पास । वह सब आगम कहैं तमासा ॥
स्याना हंस होय जो भाई । तिनको अगम देहुं बताई ॥
छः मासका भेद बताऊँ । अगम लहो सो कहि समझाऊँ ॥
दोग्य संक्रान्तिका भेद बतायी । एक मकर दूजा करक कहायी ॥
मकर संक्रान्ति सूरज सो देखा । तत्त्व पृथ्वी स्वर सूर विशेषा ॥
जो सूर घर सूरज आवे । छः मास काया सुख पावे ॥
सूरज पेलि चन्द्र जो आवे । छः मासमें जीव चलावे ॥

सद्गुरुका राजाको अपना प्रतिनिधि बनाकर गमन करना

बोधसागर

( ४९ )

पल पल राय नवावै माथा । मोको कैसे छुडाओ साथा ॥
गुरु विन कैसे रहौं अकेला । दिग दिग होये जीव न चेला ॥

सतगुरु वचन

सतगुरु कहै सुनो मोर भाई । हम संगे रहो लै जाउँ लिवाई॥
सदा रहौ हंसन के पास। हमको रहै हंसनकी आसा ॥
देह सो दर्शन तुम्हे दिये राई । विदेही होय संग रहूँ सहाई ॥
विदेही दरश जब हंस पावे । देखि दरश होय अधिक उछावे॥
सतगुरु चलन खबर सब पावा । धीरे धीरे सब हंसा आवा ॥
आये हंसा विन्ती करहीं । हे साहब हम धीर कस धरहीं ॥
जो तुम जाओ सतगुरु साहब । हमहु संग सब तुम्हरे आयव ॥
तुम विनु गुरु कैसे रहि जावै । जल विनु मच्छी ज्यों तडपावै॥
हम पाये आनंद दरश तुम्हारे । मोको न छोडो स्वामि हमारे ॥

सतगुरु वचन

काहे को हठ करत हौ भाई । सबही हंस सुनो चित लाई ॥
देह धरी अब करो सुख वासा । सदा रखो निज नामकी आसा॥
घर में रहि कुल धर्म निवाहो । जो सब साँचि भक्ति तुम चाहो॥

सबहंस वचन

माता पिता त्रिया नहिं चहिये । सुत नारीसे नहिं नेह लगैये ॥
सतगुरु तुमही हौ यक साँचा । झूठ और सकल जग काचा ॥
विना दर्श सो दुख हम पावै । नित चरणामृत कहँसे लावै ॥
तुम विनु देह छुटि सो जावै । कहँ गुरुवचन बहुरि सो पावै ॥
विना दरश सब जगकी माया । सबहि छुटे नहिं चहिये काया॥

सतगुरु वचन

सतगुरु कहै सुनो रे भाई । सबही रहो नाम लौ लायी ॥
सदा रहूँ मैं उनके पास। धरे ध्यान जो साँचकी आसा॥

राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना और अधिकारी हंसोंका साथ जाना

( ५० )

जगजीवनबोध

सुनो हंस गहो पद सांची । ध्यान विदेह में रहि हो रांची॥
इतना कहि सतगुरु बतलावा । सबको विदेह ध्यान समझावा॥
ध्यान पाइ आनन्द सबै भयञ्ज । सतगुरुदरश प्रत्यक्षहि पयञ्ज ॥
फिर सतगुरु राजहि समझावा । सब हंसन को करहु चितावा ॥
पुनि हंसनसे अस प्रभु भाख्यो । हमरे ठौर राय तुहि राख्यो ॥
हम सम रायको सबही जानो । हमसन राय को अन्त न मानो॥
तब सदगुरु तहाँ ते पगुधारा । सब हंसन दुख भयो अपारा ॥
चलत गुरु सब सीस नवाया । करि मिलाप गुरु कण्ठ लगाया॥
तुम सों राजा कहू चितायी । रहो सदा शब्द लवलायी ॥
चले गुरु समरथ जेही वारा । रोवै हंस बहैं जल धारा ॥
जैसे रंकहि रतन हिराना । जैसे भुजंग मणी विसराना ॥
मानि सतगुरु आज्ञा लीना । विदेह ध्यान गुरु दर्शन दीना ॥
ध्यान पाइ गुरु करें सब भक्ती । काल नाल सब छूटी युक्ती ॥
केते दिवस ऐसे चलि गयञ्ज । तबही राजा आगम पयञ्ज ॥
सब हंसनको वेगि बुलायी । राजा कहै शब्द बतलायी ॥

राजा वचन

जेहि कारण हम भक्ति कराई । सो दिन अब पहुँचा है आई ॥
ताल पखावज वेगि लै आओ । शब्द चलावा मंगल गाओ ॥
बाजा बाजे बहुत वधायी । सबै त्रिया मिलि मंगल गायी ॥
सब ही लोक खबर यह पायी । राय जगजीवन लोक सिधायी ॥
पाटन नगर में बहुत उछावा । घर घर तिरिया करे बधावा ॥
बैठे राजा आसन धारी । जुरे हंस जहाँ बहुत अपारी ॥
ले परवाना बन्दगी कीना । सबही हंस परिकरमा दीना ॥
रानी पांच कुँवर दौय जाना । ❁ दासी चार हजुरी साना ॥

• इसके विरुद्ध दूसरों पुस्तकोंमें इस प्रकार लिखा है

जब राजा एक शब्द उचारा । कौन कौन चले हमारे लारा ॥-