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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १९८ )

अमरमूल

उपजो तबै पान परवाना । जाते हंस होय निर्वाना ॥ नरियर आहि धर्मको माथा । सो मैं दीन्ह तुम्हारे हाथा ॥ जीवके बदले नरियर दीन्हा । हंस छुड़ाय धर्म सो लीन्हा ॥ नारियर पान प्रसादकी जोरी । सार शब्द सो नरियर मोरी ॥ जिन नरियरको पाय प्रसादा । जन्म मरणका पाप नसादा ॥ जे जीव पायो पान प्रवाना । देह छोड़ सतलोक पयाना ॥ काल दगा तबही मिटजाई । सत्यलोक महाँ जाय समाई ॥ ऐसी भक्ति जीव जो करई । भक्ति बिना सो नहिं निस्तरई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास विन्ती अनुसारी । हे सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥ नरियर पान प्रसाद बतावा । ताकर भेद नाहिं हम पावा ॥ सोई भेद मोहे देहु बताई । जिह्ति मन संशय मिटजाई ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास तुम सुनो सुजाना । नरियर भेद पान परवाना ॥ धर्मदास जब सेवा लाई । तबकी कथा कहौं समुझाई ॥ जब तुम सुनो धर्मकी आदी । तब मिटि है जिवकी बकवादी ॥ सेवा बसहि पुरुष तब भयऊ । तीन लोग भवसागर दयऊ ॥ मानसरोवर बैठक दीन्हा । कामिनि देख बहुत सुख कीन्हा ॥ धर्मराज कामिन कहँ ग्रासा । तबही पुरुष आप परकाशा ॥ तीनलोक जिव करौं अहारा । तबही भरि है उद्र तुम्हारा ॥ तीनलोक महाँ जीव जो होई । धर्मराय कहँ आवैं सोई ॥ ताते नरियर बदला दीन्हा । जीव छुड़ाय कालसौ लीन्हा ॥ भक्ति प्रवान कहेउ समुझाई । बिना भक्ति नहिं काल पराई ॥ नरियर पान शब्द है नौका । भक्ति प्रवान कहेउ तहाँ चौका ॥

बोधसागर

( १९९ )

भक्ति प्रवान कहौ समुझाई । कवन भक्ति सों जीव मुक्ताई ॥ तुम प्रभु हौ हंसनके नायक । पुरुष पुरातन जीवहित लायक ॥ भक्ति अँग मोहे देव बताई । तिहिं गहि हंसा लोक सिधाई ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास सुन भक्ति विचारा । जासों उत्तर जाय भव पारा ॥ प्रथमहि पान प्रवाना पावै । साधनकी सेवा मन लावै ॥ सार शब्द घट रहे समोई । अक्षर भेद पावै जन कोई ॥ अमर वस्तु गुप्त हम राखा । ज्ञानी होय तेहि सों भाखा ॥ शब्द रूप निःअक्षर जानो । सो हंसा सत लोक पयानो ॥ इतना ज्ञान जाहि घट होई । अमर मूलको जाने सोई ॥

छन्द-ज्ञान पूरन होय जा घट पान नरिअर भक्ति हो । बिन ज्ञान नहिं भेद पावैं केते पद गुण शक्ति हो ॥ अमरमूल यह ग्रन्थ धर्मनि सुनियो चित्त लगायकै । जन्म २ को पाप नासै अमरलोक सिधायकै ॥

सोरठा-सुन धर्मदास सुजान, किहिं विधि साधु कहावई । कहैं कबीर बखान, अमरमूल जाने बिना ॥

इति श्रीअमरमूल ग्रन्थ प्रथम विश्राम

ज्ञान भक्ति वर्णन

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास कहैं सुनो गुसाई । जीवन मुक्ति सो मोहे बताई ॥ नाम अमोल तत्त्व अति भारी । दुविधा माहिं जीव संचारी ॥ यह संशय मोहे निसदिन व्यापे । हरहु बेग गुरु यह संतापे ॥

( २०० )

अमरमूल

तुम सतगुरु घर बैठे तारा । आवागमन मोरे निर्बारा ॥ मन अरु जीव भेद बतलाओ । अबजिनमोसन अन्तर लाओ ॥ समझो तबै जीव मुक्ताऊँ । वही डोर गहलोक पठाऊँ ॥

सद्गुरु वचन

पावन पचासी सकल पसारा । जीव पवनसों आहि निसारा ॥ ब्रह्म रूप सब माँहिँ समार्ई । सूक्ष्म रूप जीव दरसारई ॥ दसवां भाग राई कर जाना । आतम रूपी देह समाना ॥ अरु योगिनमें बरते भाऊ । मानस देहमें मुक्ति प्रभाऊ ॥ पांच तत्त्व दस इन्द्री संग । प्रकृति पचीस कहेउ प्रसंगा ॥ यह प्रमान मन करे बखाना । जीव ब्रह्मसों भये उत्पाना ॥ मन करता यह देह समाना । सूक्ष्म रूप नाहिँ पहिचाना ॥ अंक चीन्ह स्थिर होये सोई । ताकी आवागमन न होई ॥ ताकौ बरन भेद जब पावे । मुक्ति होय जग बहुरि न आवे ॥ चौरासी कब बन्धन छूटे । काल जंजाल ताहि नहिँ लूटे ॥ मुक्ति भेद कोइ बिरले जाना । काल फांस जग सब लपटाना ॥ अमर मूल है मुक्ति पसारा । ताकौ संतो करौ विचारा ॥ आतम ब्रह्म एक है भाई । परमातम मिल ब्रह्म कहाई ॥ ज्यों जलमधि सों लहरि उगाई । तिमि परमातम आतम आई ॥ जिमि किसान चिनगी संचारा । इमि जिव भयउ ब्रह्म विस्तारा ॥ जिमि कंचन आभूषण कीन्हा । ऐसे जीव ब्रह्म कहँ चीन्हा ॥ उमैं अंश दीपक इक फूटै । जीव ब्रह्म संग न छूटै ॥ जिमिरविज्योतिकिरणपरकाशा । ऐसे ब्रह्म कर मोहिँ जिवबासा ॥ यहि विधि ब्रह्म जीवहिँ गाई । समझे तबही एक होजाई ॥ शिव शक्ती एकहिँ मतकीन्हा । तारक भेदको बिरले चीन्हा ॥ जे जाना ते मुक्ति समाना । प्रेम भाव सद्गुरु पहिचाना ॥

बोधसागर

( २०१ )

सारखी-जिन जाना निज प्रेम कहैं, सोईं जन परवान । तासों कहिये सूरमा, कहैं कबीर बखान ॥ चौपाई

केवल ज्ञान पाय है सोईं । जिहि पर कृपा गुरुकी होई ॥ केवल ज्ञान प्रगट समझाऊँ । भिन्न २ कर तोहि लखाऊँ ॥ प्रथमहि सुनो ज्ञान कर भेदा । निर्माही होय हंस अछेदा ॥ सुर्तवंत अक्षर पहिचाना । और सकल जग मिथ्या जाना ॥ सुखदाई सबही कहैं भावै । बाल रूप होय अग्नि बुझावै ॥ समदृष्टी एकहि कर जानै । भला बुरा कछु मन नहिं आनै ॥ हृदय पुनीत शुद्ध मन होई । पाखण्ड भर्म डार सब खोई ॥ ब्रह्म वियोग सदा अनुरागी । दसहूँ दिशा झूठ तिन त्यागी ॥ झूठ सकल जग देखौ जानी । जैसे अहै बुदबुदा पानी ॥ अस मति जाकर होय सुहाई । केवल ज्ञान ताहि समुझाई ॥ माया बिना मोह नहिं आवै । नाम पदारथ निश्चय ध्यावै ॥ यह विधि केवल ज्ञान कहावै । जो सुमिरत सतलोक सिधावै ॥ केवल काम निःअक्षर आई । निःअक्षर मैं रहै समाई ॥ निःअक्षर तो करै नवेरा । कहैं कबीर सोईं जन मेरा ॥ अमर मूल मैं बरन सुनाई । जिहिते हंसा लोक सिधाई ॥ शब्द भेद जाने जो कोई । सार शब्द मैं रहै समोई ॥ शब्द ज्ञानका लख जिन पाया । समदृष्टि सब माहिं समाया ॥ जेतक जीव देह धर आए । शब्दहिं सों ते सकल उपाए ॥ शब्द अखण्डा और सब खंडा । सार शब्द गरजे ब्रह्मंडा ॥ निःअक्षर की परिचय पावै । सत् लोक महाँ जाय समावै ॥

धर्मदास उवाच-छन्द

बिन्ती करै कर जोर धर्मन, सुनहु सत गुरु सार हो । सत्तलोक है कौन शोभा, तहाँ कौन व्योहार हो ॥

( २०२ )

अमरमूल

कवन रूप जो पुरुष रहहीं, कवन सुख हँसा करै । कामिनी किहि रूप राजै, तहाँ सुख विस्तार हो ॥

सोरठा-सो मोहे प्रगट सुनाव, दया करौ निज दास कहैं । बार बार बलि जाँव, अब जिन मोहि छिपावहु ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

कहैं कबीर सुनहु धर्मदासू । सतलोक को कहों प्रकासू ॥ है सतलोकहि अम्बर काया । एक रूप सबही त्रय माया ॥ षोडश भान हंस की कांती । अमर चीर पहिरे बहु भांती ॥ शोभा पुरुष कही नहिं जाई । कोटिन रवि इक रोम लजाई ॥ अमर लोक अमर है काया । अमर पुरुष जहां आप रहाया ॥ अमर पुरुष का पावै भेदा । कहै कबीर सों हंस अछेदा ॥ सतलोक सत शब्द पसारा । सत् नाम है हंस अधारा ॥ अमृत फल के भोजन करहीं । युगन २ की क्षुभ्या हरहीं ॥ पीवत सुधा भर्म मिट जाई । जन्म २ की तृषा बुझाई ॥ कामिनी रूप वरन उजियारा । चार भान की ज्योति पसारी ॥ शोभा बहुतक प्राण पियारी । प्रेम भाव सब हंस निहारी ॥ अनहित वचन बोल नहिं बानी । प्रेम भाव अमृत रसरानी ॥ शोभा बहुत जहां मन भावन । हंस कामिनी रंग बढावन ॥ अमृत नाम हृदयमें लावे । प्रेम भाव पुरुषहि मन भावे ॥ आशा बस मन कोऊ नाहीं । भयो प्रकाश शब्दके माहीं ॥ बूझे संत ज्ञानी जो होई । सतगुरु शब्द हृदय समाई ॥ है निहशब्द शब्द सौ कहेऊ । ज्ञानी सोई जो वह पद लहेऊ ॥ धर्मदास मैं तोहि सुझावा । सार शब्दका भेद बतावा ॥ सार शब्द का पावै भेदा । कहैं कबीर सो हंस अछेदा ॥

बोधसागर

( २०३ )

सार शब्द निःअक्षर आहीं । गहै नाम तेहि संशय नहीं ॥ सार शब्द जो प्राणी पावै । सत्तलोक महि जाय समावै ॥

साखी—कहै कबीर विचार के, सुनहु साधु धर्मदास ।

अमरमूल निज शब्द है, ताकर अस परकास ॥

चौपाई

अमर मूल ग्रन्थ में सारा । बिना अमर नहिं हंस उबारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कर जोर निहोरा । स्वामी सुनिये बिनती मोरा ॥

कवन प्रसाद दरश हम पाया । कवन प्रसाद अमर भइ काया ॥

कवन प्रसाद साधु कहलायऊ । कवन प्रसाद हंस गति पायऊ ॥

कवन प्रसाद ज्ञान हम पाया । कवन प्रसाद अमर भइ काया ॥

कवन प्रसाद नाम हम पाया । कवन प्रसाद हम लोक सिधाया ॥

कवन प्रसाद सजन जन जानी । सो समुझाय कहो मोहि बानी ॥

सद्गुरु वचन

कहैं कबीर सुनौ धर्मदास । यह सब भेद कहों परकास ॥

पुरुष दयातैं दर्शन पावा । कोटि भक्ति सत नाम समाया ॥

जब कीन्ही सतगुरु ने दया । नाम जान अमर भई काया ॥

सेवा कीन्ही साधु कहाए । लोक जायके हंस कहाए ॥

हेत दीप सज्जन जन जाना । कहैं कबीर भेद निर्वाना ॥

साखी—एक नामकी शोभा, कहैं लग कहों बखान ।

निःअक्षर जो जानि है, सोई सन्त सुजान ॥

चौपाई

सत सहिदानि तोहि समझाई । अमर मूल महि देखौ आई ॥

कोटि जन्मको पातक होई । नाम प्रताप जाय सब खोई ॥

नामहि गहैं सूरमा जानी । बिना नाम कायर सो मानी ॥

( २०४ )

अमरमूल

नाम बिना सबही बिधि हीना । नाम बिना है ज्ञान बिहीना ॥ नाम बिना सो मूरख कहिये । नाम बिना सो पापी लहिये ॥ नाम जान सोई गुण आगर । नाम जान पहुँच सुख-सागर ॥

छंद

नाम अमी अमोल अबिचल अंक वीरा पावही । तज कागकि चाल मरालपथ गह अमरलोक सिधावही ॥ जिमि सदन दीपक बिना नहिं मिटत है अँधियार हो । तिमि नाम विन सुनु दास धर्मनि नहीं घट उजियार हो ।

मोरठा-नाम अमोल अपार, अमर मूल मैं वर्णैऊ ।

करहि कर्म जर छार, कहै कबीर बिचार कर ॥

इति श्रीअमरमूल नाम लोकमहिमा वर्णन ।

द्वितीय विश्राम

धर्मदास वचन-चौपाई

बिन्ती इक मैं करों गुसाईं । जिहि तें मन की संशय जाईं ॥

अमरमूल का कहौं विचारा । जाते हंस उत्तर है पारा ॥

कौन भक्त सों हंस कहावा । कौन विधीसों पंथ चलावा ॥

सो मर्यादि देहु बतलाई । तुम प्रभु ही हंसन सुखदाईं ॥

सद्गुरु वचन

कहै कबीर सुन धर्मनि नागर । यहविधिहंस पहुँच सुख सागर ॥

प्रथम करै सतगुरु की सेवा । जाते मिटै काल कर भेवा ॥

महा प्रसाद प्रेम सो पावै । सेवा कर निज गुरुहि मनावै ॥

घट में राखे प्रेम अनंदा । चौरासी के छूटे फंदा ॥

गुरु साहिब एकहि कर जाने । सो हंसा सतलोक पयाने ॥

साधन सों एकहि मति रहई । दुबिधा भाव न कबहुँ करई ॥

गुरु साधु सेवा जिन कीन्ह। ताकहँ मुक्ति निकट हम दीन्ह। ॥

बोधसागर

( २०५ )

सारखी-गुरु संतनको जान कै, हृदय करै परतीत । कहे कबीर सो हंस है, चलि है भव जल जीत ॥

चौपाई

सतगुरु तहां आरती करहीं । सब तज जहां जाय पगु धरहीं ॥ चरणाश्रुत साधन को लीजै । मुख पूजाकर अचवन कीजै ॥ गुरुकी दया निरवरत रहई । निंदा रूप न कबहूँ करई ॥ निःअक्षर सुमिरौ चितलाई । जासों आवागवन नसाई ॥ निःअक्षर को निरैवे भावा । देह छोड़ सतलोक सिधावा ॥ गुरुके वचन सोचकर माना । नाम बिना मिथ्या जगजाना ॥ और न देख और नहिं पेखै । निस दिन पल २ नाम विवेखै ॥

सारखी-छूट पसारा देख जग, करनी देय बताय । एक नाम कहैं जानके, ता महीं रहै समाय ॥

चौपाई

कर्म भर्म की छोड़हि आशा । एक नाम सों कर विश्वासा ॥ कुलकी लब्धा भर्म नसावै । ऐसी रहिनी साधु कहावै ॥ यह विधिसों तुम पंथ चलाओ । जन्म जन्म को पाप नसावो ॥ वंश तुम्हार लोक कहैं जाई । नाम बिना बूड़ी दुनियाई ॥ नाम जान सो वंश तुम्हारा । बिना नाम बूड़ा संसारा ॥ नाम पार नहिं वेदन पावा । नेति नेति कर सब गुहरावा ॥ आदि ब्रह्मको पार न पावे । पठ पठ पण्डित भर्म लगावे ॥ मुक्ति पंथ नहिं सुतै समावा । पठ गुन थकित पार नहिं पावा ॥ अंतकाल जम घेरै आई । तब विद्या कछु काम न आई ॥ विद्या पठ कीन्हा अभिमाना । अंतकाल होय नर्क निदाना ॥ वेद पुराण साख यह भाखा । नाम बिनाको जमसों राखा ॥ व्यास ब्रह्मकी अस्तुति कीन्हा । श्रीभागवत भाखनित लीन्हा ॥

( २०६ )

अमरमूल

काम रूपकर सबहि सुनावा । पंडित तासु मरम नहि पावा ॥ पुरन ब्रह्म नाहिं चित दीन्हा । काम रूप सबहीमहि लीन्हा ॥ बिन सदगुरु कोइ मरम न पावे । झूठ राह सबही लपटावे ॥ सतपुरुषको मरम न जाने । झूठहि धाय सांच कर माने ॥ झूठहि झूठ रहा लिपटाई । सतपुरुषको लखा न जाई ॥ अठारा पुराण ग्रन्थ बहु भाखा । तिनमहि सिरे भागवत राखा ॥ ब्रह्म महातम कहि समुझावैं । श्रीभागवत भक्त दृढावैं ॥ कृष्ण चरित्रसबकरहिबखाना । कृष्ण मरम काहू नहि जाना ॥ निर्गुन भक्ति नहीं चित दीन्हा । सर्गुण भक्ति सबहिगहिलीन्हा ॥ निर्गुन ब्रह्म मरम नहि जाना । शिव समाधिलगावहिं ध्याना ॥ विष्णु ध्यान कीन्हा मनमाहीं । अलख निरंजन देखैं छाहीं ॥ देखत छांहि मम्र मन भयञ्ज । निरंजन रूप विष्णु ह्वैगण्ड ॥ दैत्य देव कीन्हें उतपानी । कीन्हें दैत्य देवनकी हानी ॥ दैत्य मारिके देव छुडावा । ताते विष्णु सबन मन भावा ॥ गोपिन मिलकर रास पसारा । लीला एहि भक्त चित धारा ॥ ता लीला महि सृष्टि भुलानी । ब्रह्मादिक सबमुनि अरु ज्ञानी ॥ ज्ञान कथैं अरु जोति दृढावैं । जोति स्वरूप मर्म नहि पावैं ॥ जोति स्वरूप निरंजन राई । जिन यह सकल सृष्टि भर्माई ॥ सत पुरुष का मर्म न जाना । झूठ ज्ञान सबही लिपटाना ॥ सत्य पुरुष सतगुरु सों पावे । सत्य नाम महाँ जाय समावे ॥

साखी-कहे कबीर धर्मदाससों, अमर मूलनिज जान ।

अमर शब्द जा घट बसे, पावै पद निर्वान ॥

चौपाई

सत्य महाँ पावहु बासा । विना अमरनहिंकालविनाशा ॥ पठ पठ मूरख ज्ञान विगारे । ज्ञान गम्य नहिं कोइ विचारे ॥

बोधसागर

( २०७ )

ज्ञान गम्य जाके घट होई । शब्द खोज करि है जन सोई ॥ ज्ञान गम्य नहीं मूरख पावे । सतगुरु मिले तो भेद बतावे ॥ सब संसार दूण्ड फिर आवै । ज्ञान बिना सब मूल गँवावे ॥

साखी—संत मिले संशय नसे, नहीं तो पच पच मरना । नाव मिली केवटनहिं, किसी बिधि पार उतरना ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास कहै सुनहु गुसाई । ज्ञान शब्द मोहे समुझाई ॥ ज्ञान रूप सतपुरुष प्रकाश । सत्य लोक महँ कीन्हौ वासा ॥ किहिबिधि समझ परैयह बानी । कहिये सदगुरु नाम निशानी ॥

सदगुरु वचन

ज्ञान स्वरूप पुरुषकर आही । ज्ञानहि रूप कबीर लखाही ॥ ज्ञान प्रकाश दीप सम जानौ । बिना ज्ञान बस झूठ बखानौ ॥ बिना ज्ञान घटमें अधियारा । ज्ञानबिना नहीं होय उबारा ॥ ज्ञान बिना अक्षर नहीं पाई । ज्ञान रूप अक्षर है भाई ॥ ज्ञान रूप पुरुष कर जानौ । एही वचन सत्य कर मानौ ॥ ज्ञान रूप निःअक्षर कहिये । अक्षर भेद ज्ञान सो लहिये ॥ निःअक्षर हो ज्ञानहि जानौ । अक्षर निःअक्षर पहिचानौ ॥ ज्ञान शब्द पुरुष कर अंशा । ज्ञान जान जन सोह मम वंशा ॥ बिना ज्ञान नहीं वंश कहावे । ज्ञान होय तब शब्दहि पावे ॥ सोई वंश सत शब्द समाना । शब्दहि हेत कथै निज ज्ञाना ॥

साखी—कहे कबीर विचारकै, सुनियो हो धर्मदास ।

जो यह शब्दहि पाय है, करि है लोक निवास ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

बिनती करी धर्मनि कर जोरी । हे सम्रथ विनती यक मोरी ॥ जेहि तैं वंश शब्द कहँपावे । सत्य लोक कहँ सत्य सिधावे ॥ औ जीवन कहँ देहु दढाई । जाते जीव मुक्ति गति पाई ॥

( २०८ )

अमरमूल

अब मैं वंशका कहों विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥ आदि नाम आमोदिक शाखा । सोई शब्द वंश कहैं राखा ॥ साठ सभै बारह चौपाई । एही तत्त्व हंस घर जाई ॥ जब माली का भेदहि पावै । सत्य नाम में जाय समावै ॥ ऐसो भेद सुनौ धर्मदासू । जन्म जन्म की भेटत त्रासू ॥ सद्गुरु दया कर्म होय छीना । अमर होय नामहि लौ लीना ॥ संशय का मैं कहों ठिकाना । संशय काल घटमाहि समाना ॥ जबही पुरुष धर्म कहैं कीन्हा । तबही संशय उत्पन लीन्हा ॥ निः अक्षरकी परिचय पावै । संशय मिटे अमर घर जावै ॥ संशय को खंडित है ज्ञाना । ज्ञान हीन संशय लिपटाना ॥ संशय काल सबन कहैं खाई । निःसंशय हो नाम समाई ॥ संशय काल लखै नहि कोई । तातैं गण बिगोय बिगोई ॥ संशय नाम सुनौ धर्मदासू । एक नाम की राखहु आसू ॥ नाम छोड़ अन्तहि चित आनै । संशय तमहि पकर गहि तानै ॥ नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूढे सब हंसा ॥ सारखी-कहैं कबीर धर्मदाससों, संशय को विस्तार । एक नाम कहैं जानके, उतरहु भौ जल पार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी संशय उत्पानी । ज्ञान हीन सब जीवहि जानी ॥ विरला हंस होय अंकुरी । सो यह ज्ञान गहै निज मुरी ॥ ज्ञान लखे बिन मुक्ति न होई । तौ यह दुनियां जाय बिगोई ॥ नाम महातम भाख सुनावा । बिना नाम कोई पार न पावा ॥

सद्गुरु वचन

कहैं कबीर सुनौ धर्मदासू । यह निज भेद कहौ तुमपासू ॥ ज्ञान हीन प्रानी जो होई । ताकर भेद कहौ मैं सोई ॥

बोधसागर

( २०९ )

ता कहैं दीजै पान प्रवाना । निश्चय हंस होय निर्वाना ॥ और प्रतीत हीय मैं धरई । सो प्राणी भवसागर तरई ॥ पान पाय सत्यहि मुख भाखै । सदगुरु चरण हियेमें राखै ॥ सदगुरु केर निछावर करई । साधु चरण चितनिश्चय धरई ॥ तन मन धन संतन पर वारै । सतगुरु चरण हृदयमें धारै ॥ सुत नारी कर मोह न आवै । सबही त्याग चरण चित लावै ॥ चरण धोय चरणाभूत लीजै । सत्यलोक महाँ अमृत पीजै ॥

धर्मदास वचन

पुरुषरूप कर यह उपदेशा । नारी को अब कहौ सँदेशा ॥ नारी नाम सुक्ति किमि होई । ताके घट महाँ ज्ञान विगोई ॥

सदगुरु वचन

ताकर तोहि भेद समुझाऊँ । मनो कामना सकल मिटाऊँ ॥ नारी तरै सुनो धर्मदासू । कहैं कबीर नाम विश्वासू ॥ ज्ञान हीन नारी को रूपा । ताको मैं सब कहाँ स्वरूपा ॥ तन मन धन संतन पर वारै । संतनकी सेवा चित धारै ॥ साधन सौ जो अन्तर करई । धर्मरायके फंदा परई ॥ गुरुके चरण निछावर जाई । तन मन धन सब देय चढ़ाई ॥ गुरुकी सेवा निशिदिन करई । सो तिरिया भवसागर तरई ॥ ऐसी धरन धरै धर्मदासू । तबही मिटै कालकी फांसू ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारि । हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी ॥ यही वचन प्रभु मोहि सुनाऊ । मोरे मन इक भर्म समाऊ ॥ नारी रूप सकल हम जाना । पुरुष रूप एकहि पहिचाना ॥ नारी कहिये सब संसारा । आदि ब्रह्म है पुरुष अपारा ॥ आदि पुरुषहमतुमकहँ चीन्हा । दूसर पुरुष कहाँ अब कीन्हा ॥

नं. ७ कबीरसागर - ८

( २१० )

अमरमूल

जो तुम कही सोई हम जानी । नारी रूप सुर्त पहिचानी ॥ दूसर नारि कहाँ है कीन्हा । यही वचन हम संशय लीन्हा ॥ मैं नररूप आँहु मति हीना । यही भेद सुन भयउ मलीना ॥ तुम तौ दयावर्त गुरु स्वामी । क्षमिय चूक प्रभुअन्तरयामी ॥ नारी नाम मातु जो कहिये । इनहि भेद कैसे निर्वहिये ॥ नारी नाम बहिन जो आही । तासौँ कैसे अंक मिलाही ॥ नारी नाम पुत्री जो होई । तासौँ कैसे अंक सजोई ॥

साखी—यह सब भेद बतावहु, सुनहु हो बंदीछोर । यह संशय प्रभु मेटहु, चरण गहों प्रभु तोर ॥

सद्गुरु वचन—चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । यह संशय उपजी तुम पासू ॥ आदि पुरुष तब हते अकेला । शब्द स्वरूपी पंथ दुहेला ॥ तब साहिब ऐसा मत कीन्हा । सकल सृष्टिरचिबेचित दीन्हा ॥ मनसा घटते भिन्न निकारी । उत्पति भई तहाँ इक नारी ॥ सोई नारि सकल जग जाया । भग भोगे तैं पुरुष कहाया ॥ भग द्वारे होय बालक आया । यही भांति सब जग भर्माया ॥ मैं तो एक मतौ रच जबही । पुत्र, बंधु पिता भयो तबही ॥ मैं तो एक नारीकर जबही । पुत्रि, बहिन माता भई तबही ॥ भाई बहिन कीन्हा व्योहारा । धर्मराय को यह संसारा ॥ यह संशय महाँ मार लै जाई । मार जार सब दुनियां खाई ॥ आपहि पिता आपही पूता । आपहि देव आपही भूता ॥ आपहि नारि रूप औतरिया । आपहि सकल सृष्टि विस्तरिया ॥ आपहि कर्म धर्म उपजावन । आपहि रचै आप विनसावन ॥ तातैं भेदे बताऊँ तोही । ज्ञानी होय समझ कर लेही ॥ धर्मदास को संशय छूटा । जन्म जन्मके पातक टूटा ॥

बोधसागर

( २११ )

ज्ञानी सों कहिये उपदेशा । मूरख सों जिन कहौ संदेशा ॥ संशय कीन्ह सकल जग भंगा । काहु न चीन्हा संशय अंगा ॥

साखी-कहैं कबीर सो बाचि है, गुरु चरण चित दीन्ह ॥ अमर मूल निज शब्द है, हंसा चित गहि लीन्ह ॥

चौपाई

धर्मदास तुम करो विचारा । विना शब्द नहिं उत्तरौ पारा ॥ सार शब्द सों सब उपजावा । नारि पुरुष दोई निरमावा ॥ सूरज पुरुष चन्द्र है नारी । यह घटमें द्वै रूप सँवारी ॥ जैसे धातु कनककी एका । साँचा माही रूप अनेका ॥ पाप पुण्य रूपहि सों बांधी । कीन्ह धर्म यह अगम अगाधी ॥ पाप रू पुण्य भर्म है भाई । धर्म राय सब भर्म उपाई ॥ भर्म अमल तबही मिट जाई । सत्य नाम जब रहै समाई ॥ जब लग भर्म अमल है भाई । तब लग नाम बूझ नहिं जाई ॥ बूझ सीख गावै बहु भाँती । सुमरन भर्म करै दिनराती ॥ आप न चीन्हे मूढ़ गँवौरा । भर्मी भ्रम भूला संसारा ॥ धर्मदास तुम भर्महि छाड़ौ । निर्भय होय नाम चित माड़ौ ॥ जो तुम भर्म करो जो माहीं । तौ कस हंसन लोक कह जाहीं ॥ भर्म छोड़के भक्ति दढावहु । यह विधि हंसनलोक पठावहु ॥ तुम कहैं दीन्ह जक्तकी भारा । तुम्हरी मुहर चलै संसारा ॥ हाथ तुम्हार जीव सब तरहीं । भवसागर तैं हंस उबरहीं ॥ धर्मदास जग पारस देहू । जीव छुड़ाय काल सों लेहू ॥ पारस नाम कहेउ उपदेशा । मूरख सो जिन कहो संदेशा ॥

छन्द-ज्ञानी कहैं यह भेद धर्मनि देहु तुम समुझायकै ।

रहन गहन विवेक बानी कहहु सकल बुझायकै ॥

( २१२ )

अमरमूल

नाम पारस परस घट महाँ काग होय मराल हो । अमर लोकहिं बास कर तहाँ नाहिं काल कराल हो ॥ सोरठा-करलेहु आप समान, गुरुभृंगी यह जीव को । देखकर नाम निशान, रूप बरख पल्टायकै ॥ इति श्री अमरमूल ग्रंथ नाममहिमा वर्णन तृतीय विश्राम ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास उठ बिनती लाई । तुम पर ताप हंस मुक्ताई ॥ किहिंविधिपलटै जिवकी काया । सो समुझाय करौ मोहे दाया ॥ हो सतगुरु तुम अन्तर्यामी । पारस भेद कहो मोहे स्वामी ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

कहै कबीर सुन सन्त सुजाना । पारस भेद सुनाऊँ ज्ञाना ॥ ज्ञानी काहिं कहैं शब्द है सारा । यह पारस तैं हंस उबारा ॥ पारस पान बालक कहैं दीजे । तातैं हंस काल नहिं छीजे ॥ कामिनी कहैं पारस है सेवा । धर्मदास लखियो यह भेवा ॥ यही रहन तुम पंथ चलाओ । जीवन बोथ लोक पहुँचाओ ॥ तीनहु विधि यह कहै बुझाई । जो मानैं सो लोक सिधार्ई ॥ पुरुष होय शब्द नहिं जाना । निश्चय हुइहै नरक निदाना ॥ बालक हो वीरा नहिं पावै । कैसे कै वह लोक सिधावै ॥ कामिनि हो पारस नहिं लेही । गुरु सोई जो पारस देही ॥ कामिनि जो सो पारस लेही । कैसे मुक्ति होय पुनि तेही ॥ यासे गुरु जो अन्तर करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥ गुरु नहिं शिष कहैं ज्ञान बतावा । यद गुरुमें फिर धोख समावा ॥ शिष्य जो गुरुसों अन्तर राखा । शिष्यमहैं धोखा सत हम भाखा ॥ गुरु सोई जो शिष्य समुझावै । शिष्य सोई जो गुरु मन लावै ॥

बोधसागर

( २१३ )

गुरु कहैं पेट करै अधिकार्ई । निश्चय नरक जाय रे भाई ॥ तुम सों भेद कही निहंतता । निश्चय वचन सुनो मतिमंता ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिनवैं कर जोरी । स्वामी सुनिये विन्ती मोरी ॥ नारी नाम नरक की खानी । सो गुरुको किमि दीजे आनी ॥ सकल नरक नारी ढिग कहिये । सोई नरक गुरु कैसे चहिये ॥ गुरुतो ब्रह्म रूप हम जाना । नर्क भोगे सो कौने ज्ञाना ॥ गुरुकी महिमा अगम बताई । नीच वचन कैसे कहैं साई ॥ नीच सोई जो नीची कहै । नीच पंथ सों पार न लहै ॥ ऊँचा होय सो गुरु पद धारा । नीचा छोड़ ऊंच भव पारा ॥ नीचे कर्म काट गुरु दीन्हा । गुरुका वचन मान मैं लीन्हा ॥

दोहा—सो अब मोहि बतावहु, तुम गुरु अगम अपार ।

धर्मदास की बीनती, सुनियो हो करतार ॥

साखी—रहित ज्ञान तुम भाखिया, सत्य शब्द ठहराय ।

व्यभिचारी महाँ सत कहौं, कहौ गुरु समुझाय ॥

सतगुरु वचन चौपाई

कहैं कबीर सुनो धर्मदासू । अब यह भेद कहौं तुम पासू ॥ हम जानी तुम संशय छूटा । काल कठिन भव तुम कहैं लूटा ॥ काल केरि गति तुम नहि जाना । झूठी मायामें लिपटाना ॥ जब जाना निज ब्रह्म स्वरूपा । ता कहैं नाहि रं क अरु भूपा ॥ नाम अमल रस छाके अंका । ताको कहा नरककी शंका ॥ तुम कहैं जीव बुद्धि नहि छूटा । ताते जमरा फिर फिर लूटा ॥ धर्मरायकी गति नहि जानी । हर मंदिर उपजाऔ आनी ॥ यह बाजी महाँ जीव भुलाना । शिवहिसमाधिलगावहि ध्याना ॥ विष्णु रूप काहू नहि जाना । सुर मुनि नर बूढ़े अभिमाना ॥

( २१४ )

अमरमूल

यही वचनमें सब जग वंध्य। नाम बिना नहि छूटत फंध्य ॥ झूठी माया सब जग फंदा। फंद कटे बिन नहि निर्द्वन्दा ॥ अज्ञानी जिव पर है फांसा। नर्क स्वर्ग दोऊ कर आशा ॥ संशय काटनको हम आए। धर्मराय सब दुनियां खाए ॥ ज्ञान सँवाद तुम कहैसमुझाए। तुम कहै धर्मराय भर्माए ॥ वचन हमारे दोष लगाए। झूठी माया तुम लिपटाए ॥ शिष्य सोईं गुरु बचनहि माना। आप ज्ञान बूझे नहि ज्ञाना ॥ गुरु प्रतीति हृदये नहि आई। तातैं बूड़ी सब दुनियाई ॥ बूड़त जाह थाँह नहि पावा। तातैं जन्म जन्म भर्मावा ॥ तब सतगुरु भये अन्तरध्याना। धर्मदास मनमहँ पछताना ॥

धर्मदास वचन

दया करौ गुरु पूरन स्वामी। मैं नहि जाना अंतर जामी ॥ हों अज्ञान तुम मर्म न जाना। जान बूझ भूले अभिमाना ॥ क्षमि अपराध मोर प्रभुराया। मोरे चित जो अन्तर आया ॥ तुम गुरु सतगुरु ब्रह्म समाना। मैं शिव आहुँ महा अज्ञाना ॥ कुवचन वचन बोल जो भाखा। माता पिता हृदये नहि भाखा ॥ करुणामय गुरु अन्तर्यामी। करहु दया अब मोपर स्वामी ॥ जो नहि दर्शन पाऊँ आजू। तजौँ प्रान मैं तुम्हरे काजू ॥ हे साहिब तुम पथ जो दीन्हा। तातैं तुमहि बूझ हम लीन्हा ॥

साखी-धर्मदास बिनखत बदन, करुणा बहुविधि कीन्ह।

दर्शन बिन अति विकल है, जल बिन तलफत मीन ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

तबहि कबीर दया चित आई। धर्मदास तब दर्शन पाई ॥ दर्शन पाय भयो आनंदा। जैसे चकोर मिलत है चंदा ॥

बोधसागर

( २१६ )

गहि गुरुचरण बंदगी कीन्हा । चरण धोय चरणामृत लीन्हा ॥ बिन्ती कीन्ह चरण चितलाई । महा प्रसाद दीजिये साईं ॥ आमनिको अज्ञा तब दीन्हा । नाना व्यंजन तूर्तहि कीन्हा ॥ कंचन थार आरती चारी । सेवा बहुत हृदयमें धारी ॥ सुत नारी सब चरणन लागे । प्रेम प्रतीत भक्ति मन पागे ॥ चरणामृत सबही मिल लीन्हा । दिव्य ज्ञान सब कहैं कर दीन्हा ॥ साहिब चौका बैठे जाई । बहुत भौंति कर आसन लाई ॥ परस थार जब आमनि नारी । सुन्दर बदन प्राण अतिधारी ॥ मार मार प्रसाद लै खावहिं । प्रेमभाव साहिब मन भावहिं ॥ पाय प्रसाद पुनि अचवन लीन्हा । धर्मदास तब बिन्ती कीन्हा ॥ दया करहु अब मोपर स्वामी । बन्दी छोड़ु वर अनंतर जामी ॥ तब दीन्हऊँ प्रसाद गुसाईं । धर्मदास तब हवैं मन माईं ॥ जेतक साथ रहे घर नाहीं । वह सब आनंद भये मनमाहीं ॥ आमनि तबहीं पलंग बिछावा । सतगुरु तहां आन पौढावा ॥ धर्मदास तब पंख डुलावैं । आमनि चरण चापि सुख पावैं ॥ सकल साध हिल बंदगी कीन्हा । तन मन धन साहिब कहँ दीन्हा ॥ मेटी सकल जगतकी लाजा । ताते होय जीवको काजा ॥ धर्मनि तहां निछावर करहीं । बार बार बिन्ती अनुसरहीं ॥

साखी-यह तन लेव गुसाईं, जो होवे हम काज ।

तन मन धन कर निछावर, सुख संपति कुल लाज ॥

सदगुरुवचन-चौपाई

कर धर सिज्या पर बैठाया । अन्तर गति स्थिर ठहरावा ॥ जोई मुख सौं भीतर देखा । सबहि कसौटी कीन्ह परेखा ॥ साहिब तब ही दाय़ा कीन्हा । मस्तिक हाथ आमनिके दीन्हा ॥ जाहु न अपने घरके माहीं । सत्य तुम्हार देखे मन माहीं ॥

( २१६ )

अमरसूल

यह मन कर्म अकर्म करावे । देहके स्वारथ नाच नचावे ॥ तातें तुम मन थिर हम जाना । काल चरित्र छूटा अभिमाना ॥ हमरे देह काम नहीं होई । तुम अहंकार सकुल हम खोई ॥ धर्मदास तुम वंश उजागर । हंसन पहुँचावहु सुख-सागर ॥ निश्चय हुई है मुक्ति परवाना । सत्यलोक कहि देव पयाना ॥ वंश तुम्हार जहां लग होई । इनके हाथ मुक्ति सब होई ॥ वंश ब्यालिस अचल तुम्हारा । तिनके हाथ मुक्ति संसारा ॥ ब्यालिस मांहि त्रयोदश भाखा । अंश हमारहु हैं निज शाखा ॥ नाम जानते सबै उबारा । बिना नाम बूड़ा संसारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारी । हे साहिब मैं तुम बलिहारी ॥ हमरे वंश कहैं पारस देई । तुम्हरे दरश बहुर कब लेई ॥ यही अर्ज मेरो सुन लीजे । वंश हमारहु आपनो कीजे ॥ जिहंते मुक्ति होय सब केरा । सो मोहे स्वामी कहौ नवेरा ॥

सद्गुरु वचन

तुम्हरे वंश को कहौ उपदेशा । जाते होय हंसको भेषा ॥ जो कोई हंस होय जगमाहीं । उबरहिं वंशनकी वाहीं ॥ वंश तुम्हार जे बालक होई । तिनसौ पारस ले सब कोई ॥ जा कहैं नाहीं ब्यापै कामा । निशदिन रहे शब्दमें धामा ॥ रहित गहिनसौ स्थिर अंगा । मनसा वाचा सत्य प्रसंग्रा ॥ सत पास को जानैं भेदा । आतम परसै सूक्ष्ममें भेदा ॥ ऐसा सज्जत शब्द सनेहा । प्रकट कबीर तासुकी देहा ॥ तिनसौ पारस भेद न कीजे । वंश मोर जो शब्द पतीजे ॥ पारस मांहि भेद जो करई । कहैं कबीर सो किहि विधि तरई ॥ बालक बोध कै पंथ चलाओ । बिना पंथ सोला नहीं पाओ ॥

बोधसागर

( २१७ )

बालक तेरे वंशके हाथा । पंथ दीन्ह मैं तिनके हाथा ॥ मुक्ति जान कर राखै गोई । तेहि सम झोही और न कोई ॥ शब्द जान कर पन्थ चलावै । देश देश फिर सब समझावै ॥ तौन देश गैवनइ कराई । सुर्तन बन्त हंसन मुक्ताई ॥ पुरुष आज्ञा जो मोकहैं दीन्हा । मुक्ति भेदसों सब कहि दीन्हा ॥ सार शब्दका भेद जो पावा । यह सब ज्ञान तोहि समझावा ॥ बिना ना मिट है नहिं संशा । नाम जान सो हमरे वंशा ॥ नाम जान सो वंश करावै । नाम बिना सो मुक्ति न पावै ॥ वंश तुम्हार नाम जब पाई । भवसागरतें लोक सिधार्द ॥ नाम न जान करै अहंकारा । सो जिव परि है भवजलधारा ॥ नाम जान सो वंश हमारा । बिना नाम बूझा संसारा ॥ बिना नाम सबही अभिमानी । नाम प्रचय कोई कोई जानी ॥ नाम निहश्चर कहा बुझाई । अमरमूल महाँ देखो आई ॥ निह अक्षर को पावै भेदा । सोई हंसा होय अछेदा ॥

साखी-कहै कबीर विचारकै, निःअक्षरको भेद ।

निःअक्षर जो पावहीं, सोई हंस अछेद ॥

चौपाई

निह अक्षर तुम ज्ञान सुनाओ । जम्बू द्वीप हंस मुक्ताओ ॥ ऐसा धरम धरे जो कोई । निश्चय पार पाय है सोई ॥ तुम धर्मदास पन्थके राजा । तुम्हरे हाथ जीव को काजा ॥ यही मता हम तुम कहैं दीन्हा । दूसर कोइ न पावै चीन्हा ॥ अक्षर भेद बसै जिहि अंगा । निस बासर हम ताके संगा ॥ सत्य लोक महाँ वासा पाई । अमृत भोजन करै अघाई ॥

छन्द-यही महिमा जीव धरहै, बाम करै सतलोक हो ।

काल फन्दा काटकै लै, धरौ हँसन थोक हो ॥