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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( २१८ )

अमरमूल

सुन्नन सिज्या बास लीन्हो, असन अमृत पावहीं । वस्त्र अम्मर पहिरकै तिन, जरा मरन नसावहीं ॥ सोरठा-षोडश भान प्रवान, धर्मनि शोभा हंसकी । पावो शब्द प्रवान, अञ्जलोक वासा कियो ॥ इति श्रीग्रंथ अमरमूल धर्मदास कसोटी, पारस भेद वर्णन- चतुर्थ विश्राम

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास तब विन्ती कीन्हौ । अबलगसाहिबहमनहिंचीन्हा ॥ जब तैं दाय़ा भई तुम्हारी । भयो प्रकाश हृदयमें भारी ॥ अमर लोकके हौ गुरु वासी । कारण वन आये अविनाशी ॥ मृतलोक आये किहि काजा । धर्मराय बड़ पापी राजा ॥

सद्गुरु वचन

धर्मनि सुनौ वचन चितलाई । जीवन काज पुरुष पठवाई ॥ सत्यलोक तैं जगमे आवा । धर्मराय मोहे देखन धावा ॥ धर्मराय तब पूछी बाता । कवन काज तुम आयेउ ताता ॥ मृतलोक में अब मैं जाऊँ । हंसन काज पुरुष पठवाऊँ ॥ धर्मराय तब बोलन लीन्हा । हमरे देश मुक्ति तुम दीन्हा ॥ मैं तो तीन लोक कर राजा । तुम कस करो जीव करकाजा ॥ यह तो लोक पुरुष मोहे दीन्हा । तुम कस मोहे छुड़ावन लीन्हा ॥ अजहुँ भली है जाहु गुसाई । जीव जीव जन्तु मारो सब ठाई ॥ अगम अपार निरंजन देवा । तुम नहिं जानत मोरा भेवा ॥ किहि विधि हंस उतारो पारा । कौन भेद लै करो पसारा ॥ तब हम कहा सुनो धर्मराजा । जानत नाहिं मर्म तुम काजा ॥ हम बल एक शब्द का भाई । तेही के बल हंस मुक्ताई ॥

बोधसागर

( २१९ )

जहां नाम तहां तुम नहीं कोई । विना नाम है तुम्हरी छोई ॥ यह विधि होय हंस परवाना । आवा गमन तासु नहीं जाना ॥

धर्मराय वचन

जेतिक नामे मुख सुन्न करिया । सो सब नाम हमारे धरिया ॥ जो कोई धर्म करही संसारा । सो सब मोर आहि व्यवहारा ॥ बहुत भाँति मैं फंदा कीन्हा । शंकर सहित बांध मैं लीन्हा ॥ कवन नाम हंसन मुक्ताओ । सो स्वामी मोहे भेद बताओ ॥

ज्ञानी वचन

नाम हमार पुरुषके केरा । वही नाम सों हंस उबेरा ॥ धर्मराय तुम ताहि न जाना । अपने अवगुण भये विगाना ॥ यही नाम आपन घट लेते । जीवन कष्ट नाहिं तुम देते ॥

धर्मराय वचन

परम पुरुष है मोरा नाऊँ । दूसर पुरुष कहाँ निर्माऊँ ॥ मोरे आगे कवन कहावा । सब कहँ मार जार भर्मावा ॥ तीन लोक महँ जीव पसारा । उन कहँ मार करौ संहारा ॥ ब्रह्मा पुत्र हमारो भयऊ । अंतकाल ताही दुख दयऊ ॥ शिवसमाधि कीन्हा अहँकारा । प्रलय काल करौ जर छारा ॥ विष्णु बड़े सबही में अंशा । तिनकहँ मार करौ निरवंशा ॥ अपने अंश यही गति दैहौँ । सृष्टि संहार प्रलयकर लैहौँ ॥ तुम तो आए हंस उबारन । कवन भाँति करिहौ जगतारन ॥

ज्ञानी वचन

धर्मराय कहँ तब ससुझाई । तुम जीवनके दुष्ट कहाई ॥ जब तुमकीन्ह चोरको काजा । तानैं पुरुष मोहिं उपराजा ॥ नाम एक मोहे दीन्ह अमोला । वोही नाम जिव बन्दी खोला ॥ ठाकुर नाम तुम्हारा होई । तीन लोक ठकुराह समोई ॥

( २२० )

अमरमूल

पुरुष नाम तुम दीन्ह बिसारी । आपहि पुरुष रूप विस्तारी ॥ योग सन्तायन हमरौ नाऊ । तोहि कारण मोहे निर्माऊ ॥ तुम निज धर्म करौ अहंकारा । आदि ब्रह्म अहे रखवारा ॥

धर्मराय वचन

धर्मराय तब उत्तर दीन्हा । हम कहैं दया पुरुष ने कीन्हा ॥ तुमही दया करहु मोहि पाहीं । जिहिते मोर रहै जग छाहीं ॥ तुम जेठे हम लहुरे भाई । हम ऊपर तुम काहि पठाई ॥ पुरुष समानहिं तुम कहैं जाना । अपने मन तुम दूसर ठाना ॥ कहौ उपदेश सोह उपदेशा । जातें ऊजर होय न देशा ॥ पुरुष वचन हम शिरपर मानी । आज्ञा भंग करों नहिं ज्ञानी ॥

ज्ञानी वचन

योग सन्तायन बोलन दीन्हा । यह उपदेश पुरुष तोहि दीन्हा ॥ जा जिव पान प्रवाना पावै । ताके निकट काल नहिं जावै ॥ जो कोइ जीव होइ है ज्ञानी । ताकी तुम कीजौ महिमानी ॥ सार शब्द जो बालक पावै । तासो प्रेम बहुत तुम लावै ॥ यह उपदेश हमारौ लीजे । पुरुषके वचन मान शिर लीजे ॥ जो इतना नहिं करौ कबूला । तौ तुम सहहु दुःख बहु शूला ॥ पान प्रवाना शब्द न होई । जस जानो तस करिहौ सोई ॥ इतना धर्मराय जब जाना । जो तुम कहा सोई परवाना ॥ बिन्ती एक हमारी लीजे । नाम सन्देश मोहि कहि दीजे ॥

साखी-मैं उपदेश जो पावहुँ, सो सब कहहुँ तुम्हार ।

तुमहि पुरुषके अगुवा, हंस छुड़ावनहार ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

तब साहिब जो कहिबे लीन्हा । तुम नहि पावहु नामको चीन्हा ॥ जब तुम सत्यलोक महाँ रहिये । चौसठ युगलग सेवा करिया ॥

बोधसागर

( २२९ )

तबै पुरुष आज्ञा तेहि दीन्हा । सत्रह खण्ड राज्य तब दीन्हा ॥ तब तुम मान सरोवर जाई । कन्या देख बहुत सुख पाई ॥ पुरुष तोहि तब मार निकारा । तब हम भएऊ हंस रखवारा ॥ शब्द वार तब पुरुष सम्हारी । तुम्हरे टारे टरत न टारी ॥ मूल शब्दका का पावै भेदा । सोई हंसा होय अच्छेदा ॥ सोई भेद तुम नाहिंन पावा । कितनौ सेवा कर गुहरावा ॥ तुम कुबुद्धि औगुण बड़ कीन्हा । पुरुष आय पेल जो दीन्हा ॥ तबतै तुम्हरो भित्र पसारा । राज पसारेउ यह संसारा ॥ हम कहैं दया हंस की आई । दीन्ह पयान लोक तैं भाई ॥ बचन हमार मान सिर लीजै । शब्द खोजि अब नाहि करीजे ॥ जब तुम पाहौ शब्द ठिकाना । लोक तुम्हार न रहे निदाना ॥ सबै जीव सत लोकहि जाई । तुम्हरी नहीं रहै ठकुराई ॥ येही मन्त्र हमारो धरहू । शब्द खोज अब नाहीं करहू ॥ साखी-महा प्रलय जब होय है, देखि हो लोक हमार । तब हम तुम कहैं मिलिहिंगे, शब्द दोह टकसार ॥

चौपाई

सत्रह खण्ड तबहि मिटि जाई । रहै पुरुष तब शब्द समाई ॥ धर्मराय तुम पुरुष के अंशा । मिलहै शब्द मिटे सब संसा ॥ इतना वचन धर्म सौ कीन्हा । पीछे जगही प्याना कीन्हा ॥ ता पाछे संसारहि आये । पेडरमों बहु जीव छुड़ाये ॥ चार सिद्ध पर्वत पर पाये । तिनसों ज्ञान भेद समुझाये ॥ चारौ सिद्ध काल सों बाचा । दिव्य ज्ञान हृदय मंह साचा ॥ ता पीछे तुम्हरे ढिग आए । धर्मदास तुम दर्शन पाए ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिन्ती अनुसारि । है सतगुरु तुम्हरी बलिहारी ॥ अगम ज्ञान तुममोहिं लखावा । हृदय कमल तुम मोर छुड़ावा ॥

( २२२ )

अमरमूल

धन्य भाग्य सतगुरु पगुधारा । अब भयोजीवन सुफल हमारा ॥ एक वचन मोहि कहौ बुझाई । जिह्तिं जीव की संशय जाई ॥ काल कठिन सो काहु न जाना । सो मोसौं कहिये परवाना ॥ जीवत काल चिन्ह जब पावै । तब तुम्हरे सतलोक सिधौवै ॥ जीवत काल चीन्ह नहि जाई । तो कैसे सत लोक सिधाई ॥ तुम तो ज्ञान बहुत उपदेशा । बिन देखे सब लगै अन्देशा ॥ दया करो अपनो जन जानी । काल चिह्न याऊ पहिचानी ॥ बिन चीन्है नहिं होय उबारा । भवसागर बांकी है धारा ॥ काल कठिन है जगकौ फंदा । किहिं विधिजीवहोयनिरद्वन्दा ॥ निरद्वन्दी मोहे करो गुसाई । तौ मैं पंथ चलाऊं जाई ॥

सद्गुरु वचन

साहिब तब कहिबे चितधारा । धर्मदास सुन काल पसारा ॥ काल अमल संशय है भाई । प्रथम काल तुम चीन्हौ आई ॥ जेतक कर्म करै संसारा । सो सब आहि काल व्यौहरा ॥ काल रुयाल जानत नहिं कोई । कर विपरीत सबन कहैं सोई ॥ दस औतार काल ने छलिया । काल अपर्बल सबकहैं दलिया ॥ मीन स्वरूप काल औतारा । कूर्म स्वरूप महा जो धारा ॥ बारह रूप औतार जो कीन्हा । नरसिंह रूप औतारजोलीन्हा ॥ वामन होके बलि कहैं छलऊ । परशुराम होय क्षत्री दलऊ ॥ राम रूप होय रावन मारा । कृष्ण रूप होयकंस पछारा ॥ बौध रूप जगन्नाथ औतारा । लीला बहुत भांति सम्हारा ॥ दस औतार कालके धरिया । म्लेच्छ मारसतयुगसोकरिया ॥ इतनी देह धरी युगमाहीं । काल अमल व्यापै तिनपाहीं ॥ काल मर्म काहू नहिं जाना । सबकहैं पकर कीन्हे पिसवाना ॥ काल पुरुष काहू नहिं चीन्हा । काल पाय सबहिन गहि लीन्हा ॥

बोधसागर

( २२३ )

काल पायकर जागहि योगी । कालकष्ट सुन फिरहिं वियोगी॥ काल पायकर पाप जो करहीं । काल पाय सब पुण्यहि धरहीं॥ काल पायकर सत गुरु भयऊ । काल पाय त्रेता है गयऊ ॥ द्वापर काल पायकर आवा । कलियुग काल पाय निरमावा॥ कालहि पाय चला सब जाई । काल पाय संसार समाई ॥ काल पाय कर भक्ति करावै । काल पायकर लोकहि आवै॥ काल भेद मैं कहा विचारी । धर्मदास तुम ज्ञान सङ्घारी ॥ काल कालको मर्म न जाना । सत्य पुरुष तैं भय उत्पाना॥ अलख निरञ्जन नाम कहावा । पुरुष प्रसंग रूप बनि आवा॥ पुरुष प्रगट जब रूप बतावा । सत्य लोक जब नाम धरावा ॥ तबही पुरुष गुप्त होय गयऊ । काल रूप यह मनकर भयऊ॥

साखी-काल काल सब कोई कहैं, काल न कीन्ह विचार । मन थिर होवै शब्द महैं, काल रहे झकमार ॥

चौपाई

ना कहैं आवै ना कहैं जाई । शब्दहि माहीं सहज समाई ॥ जा देखहैं तैसा है सोई । गुप्त प्रगट वे रहै समोई ॥ गुप्त ये प्रगट एक कर भयेऊ । दुतिय भावकर ज्ञान नश्येऊ॥ दुतिया दुर्मत दासी होई । ज्ञान विचार कहां रहो सोई ॥ तीन कालसों जो रहै थीरा । सोई पुरुष कायाको बीरा ॥ सोई वीर शब्द निज मूला । मंत्र ध्यान सोई स्थूला ॥ वही शब्द तैं काल डराई । नातर करि हैं कोट उपराई ॥

साखी-दुनिया चेरी काल की, मूरख बूझे नाहिं । जाकी दुनिया मिट गई, ते आतमब्रह्म समाहिं ॥

चौपाई

जैसा है तस कहा न जाई । ज्ञान विना बूझे नहिं भाई ॥ आय ज्ञान तव परगट भयऊ । दुतिया भाव सबै मिट गयऊ॥

( २२४ )

अमरमूल

दीपक ज्ञान भयो उजियारा । कालतिमिरमिटगा अँधियारा ॥ भय आनन्द गुरु जब पाये । ऊँच नीच सब दूर बहाये ॥ ऊँच नीच सब समकर जाना । ऊँच नीच सब झूठ बखाना ॥ ऊँच नीच सब झूठहि लावै । जब आतम परमातम पावै ॥ झूठा लोग न बूझै कोई । सब संसार झूठ है सोई ॥ समता ज्ञान प्रकाश कराई । और ज्ञान सब झूठ हैं भाई ॥ झूठ सांच संसार समाना । सत्य शब्द नाही पहिचाना ॥ झूठ सांच दोई मिट गयऊ । ज्ञानप्रकाश जाहि घट भयऊ ॥ धर्मदास तुम बूझहु ज्ञाना । काल कर्म सुनहु अब काना ॥ सतगुरु दया जाहि पर होई । अमरमूल कहैं जाने सोई ॥

साखी-अमर मूल कहैं जानई, काल दगा मिट जाय ।

काल परख कर बूझ है, सब नहिं काल समाय ॥

चौपाई

काल तिहकालका भेद सुनाऊँ । धर्मदास मैं तोहि लखाऊँ ॥ निह अक्षरका भेद निज पावै । निह अक्षर माहिं जाय समावै ॥ जो नहिं जान निहअक्षर भेदा । ता महाँ काल करत है छेदा ॥ निह अक्षर विन काल न जीतै । यज्ञ दान केता कर बीतै ॥ योग यज्ञ तप काल पसारा । यज्ञ दान सब काल व्योहरा ॥ काल गती संसार है भाई । बिरला जन कोई लख पाई ॥

साखी-संशय काल शरीर महिं, विषय काल है दूर ।

ताहि लखत कोई संतजन, जार करै सब धूर ॥

चौपाई

जीव बुद्धिसों नाहिन चीन्हा । काल न चीन्हत मतिके हीना ॥ कबहुँ सुख कबहुँ दुख होई । काल जाल जानत नहिं कोई ॥ मानस कह मनमाहिं बिचारी । निरालंब होय प्रभुहिं पुकारी ॥

बोधसागर

( २२६ )

कबहुँ कहै प्रभुने सब कीन्ह। कबहुँ कहत सब मोर अधीना॥ स्वारथ रूप सदा चित लावै । परमारथ कबहुँ नहि भावै ॥

साखी-कहै कवीर धर्मदास सों, तुम सुनियो चितलाय । काल भेद नहि जानहीं, मूरख रहे खुलाय ॥

चौपाई

जो देखा सो काल पसारा । जो बिनसे सो काल अहारा ॥ धर्मदास तुमचित थिर करहू । मनकी डगमग तब परिहरहू ॥ भूत भविष्य वर्तमान जो कहिये । यहि बिधि तीनकाल निर्वहिये ॥ भूत सबै है कालकी काया । भविष्य होय सोइ जीव कहाया ॥ वर्तमान परमात्म जानो । यहि विधितीनकाल पहिचानो ॥ जोई भूत सोई वर्तमाना । सोई भविष्यत भर्मकर जाना ॥ भूत भविष्यत और वर्तमाना । मनथिर भए सबै पहिचाना ॥ शब्द मांहि हंसा निरबहई । मन बिच कर्म नामको गहई ॥ मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥ मन थिर कर परमात्म जाना । यह विधि तत्त्व लेहुपहिचाना ॥ काल जाल तैं तेही लूटै । काल बिचारै ताहि न लूटै ॥ यही भेद धर्मन सुन लीजै । शब्द मांहि बासा तुम कीजै ॥ काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥

साखी-इतना भेद सुन लीजिये, काल को ज्ञान बखान । काल पाय कर होत है, हम सों फिर फिर ज्ञान ॥

धर्मदास वचन चौपाई

धर्मदास तब पांयन परई । सतगुरु सों बिन्ती अनुसरई ॥ जो तुम कही सोई परवाना । काल पाय कर फिर २ ज्ञाना ॥ तुम प्रसाद मुक्ति फल पावा । यह भवसागर बहुर न आवा ॥ हम सों ज्ञान कहा फिर होही । सोई बात कहो निज मोही ॥

( २२६ )

अमरमूल

सद्गुरु वचन

तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । तुम नहिं पाओ ज्ञानको चीन्हा ॥ हम तौ सत्यलोकके वासी । तहैं नहिं काल बसै अविनाशी ॥ मैं जो कहा मृतलोकव्यवहारा । काल पाय सब होत औतारा ॥ काल पाय बिनसै संसारा । काले सब बिनास जग डारा ॥ काल कर्म काहू नहिं जाना । जीव जन्तु सब काल समाना ॥ कालहि पाय सृष्टि निर्माई । काल पाय फिर माहिं समाई ॥ साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय वर्त्ताय । काल पाय सब विनसही, काल काल कहैं खाय ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

यह सुन धर्मदास हर्षाने । सद्गुरु रूप हिये पहिचाने ॥ तुम साहिब मोहे कीन्ह निहाला । आपन जान कीन्ह प्रतिपाला ॥ बिन्ती एक करत संकाई । हे सतगुरु मोहे भाख सुनाई ॥ कालहिकी गति कहि समुझावा । अचरज बात मोर मन आवा ॥ प्रथम पुरुषकी प्रथमहि काला । मोहि बतावहु भेद रसाला ॥

सद्गुरु वचन

तब सतगुरु कहिबे अनुसारा । धर्मदास सुन शब्द हमारा ॥ प्रथम हते जब शून्य स्वभाऊ । धर्मदास सुन शब्द निर्माऊ ॥ शब्दते पुरुष शब्द निर्मावा । यही भेद बिरले जन पावा ॥ जाकौ कहिये शून्य स्वभाऊ । काल शून्य एकै समुझाऊ ॥ काल भेद कोई नहिं जाना । धर्मदास तुम सुनियो ज्ञाना ॥ शून्यहि माहि शब्द उच्चार। धर्मरायको भयो पसारा ॥ प्रथमहि जिन्द रूप इकभयऊ । सत्तर युग सोवत चल गयऊ ॥ तब साहिब मोहे आज्ञा दीन्हा । जिन्द जीवकहैं तुम नहिं चीन्हा ॥ जिन्द जीव कहैं आन बुलाई । सत्तर युग उन सोय सिराई ॥

बोधसागर

( २२७ )

तब हम जाय शब्द अस बोला । सोवत जिन्द नाहिं चित डोला ॥ का सोवत तोहि पुरुष बुलाई । नाहिं जागहि तिहि नींद सुहाई ॥ तब हम तेहि जगावन लागे । जिन्द जाग परम अनुरागे ॥ जगे न नीन्द भर्म बहु आवा । तब हम एक शब्द उपजावा ॥ काल शब्द कहैं टेर पुकारा । सुनकर जिन्द भयो संचारा ॥ काल शब्द सुनजिन्द डराना । तबही आया चरण लिपटाना ॥ काल नाम सुन ऐसा भाई । काल नाम सुन भक्ति कराई ॥ धर्मदास सुन कालको भेदा । काल बिना नाहिं करै निषेदा ॥ काल नयन भर देख न कोई । कालहि पढ़ पढ़ गये बिगोई ॥ वेद शास्त्र सुन पंडित कहाई । काल पुरुष सब जीव भर्माई ॥ साधू मिलकर भक्ति कमाई । जातैं काल फांस नाहिं आई ॥ काल शब्द ना होतौ भाई । ता काहे को भक्ति कराई ॥ कालके डर तपसी तप साधा । इन्द्री पांच काल डर बांधा ॥ कालहिके डर योग जो करई । कालहि डरतैं दान जो भरई ॥ कालहि डर भावै सत जाना । कालहि डर छोड़ै अभिमाना ॥ सत्यहि वचन काल डरकहहीं । कालहि डरसे झूठ परिहरहीं ॥ ऐसा डर है कालहि केरा । धर्मदास तुम करहु न बेरा ॥

सारखी-ऐसा डर है कालका, सुनहु हो धर्मदास ।

एक नाम कहैं जानकै, निडर रहो सुखवास ॥

चौपाई

कालहि डर दुनियां सब बूड़ी । काहु न देखी कालकी मूड़ी ॥ तुम धर्मदास निडर हो रहहु । नाहिन काल झूठ परिहरहु ॥

छन्द-यह भांति पंथ चलाव जगमें हंस लोक पठाइबौ ।

ज्ञान गम्य लखायकै फिर शब्दसार लखाइबौ ॥

हृदय जेहि पर होय गुरुकी रहत गहन समावही ।

काल कष्ट निवारकै सोई पुरुषलोक सिधावही ॥

( २२८ )

अमरमूल

सोरठा-आप सरीखा जान, ता कई शब्द लखाइयो ।

धर्मदास लेव मान, यही सिखावन पुरुषको ॥

इति श्रीग्रन्थ अमरमूल धर्मराय बाद कालको वर्णन ।

पंचम विश्राम

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास आनंद समाना । विगसेउ कमल उदेजनुभाना॥ बहुत भांतिसों विन्ती कीन्हा । मन वच कर्म चरणचित दीन्हा॥ पदरज लीन्हौ तृषा मिटाई । छूछी सीप स्वाती जिमि पाई॥ रंकहि निधी मिलगई जैसे । अहिमणि मिलै मगन भय ऐसे॥ चरणामृत वह विधिसों लीन्हा । गुरु चरणनको मैं आधीना ॥ अब प्रतीति मोर मन आई । निश्चय वचन मान तुव साँई ॥ अबही जाय लोक मैं देखा । ज्ञान गम्यसों पायउ लेखा ॥ भक्ति मुक्ति दोनों हम जाना । दया तुम्हार परी पहिचाना ॥ जेपर दया तुम्हारी होई । ऐसे पदको पहुँचे सोई ॥ हम जानकै मान उपदेशा । विन सतगुरु नहिं मिटत अँदेशा॥ तुम सतगुरु और सब शिष्या । यही ज्ञान परगट हम देख्या ॥ सतगुरु आप और सब वंशा । सत्य पुरुषको तुम निज अंशा ॥ तुम्हरे बचन लोक पहिचाना । तुम्हरी दया परी अब जाना ॥ यह मन बूझ शब्द है लोका । ज्ञान भयो मिट गये सब शोका॥ लोक अलोक एक कर जाना । तुम्हरे बचन सत्य हम जाना ॥ अब मोरे जिव परचय आई । बिन जाने जाने बूझी दुनियाई॥ नहि बूझौ नाहीं उतराना । यहि पाया हम केवल ज्ञाना ॥ एक बचन मैं बूझा साँई । विन्ती करौं चरण चित लाई ॥

बोधसागर

( २२९ )

तुम सतगुरु मोहिदिय उपदेशा । मैं हंसनसों कहौ सँदेशा ॥ यह तौ बात कही नहि जाई । जब पावे तब ज्ञान समाई ॥ जब तुम दया करी हियमाही । तबहीं पाऊ नामकी छाहीं ॥ कहिये बचन मोर मन भावै । जातैं हंसा लोक सिधायै ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । सब कहैं देह शब्दका चीन्हा ॥ जो नहि पाव शब्द सहदानी । तो कस करहु लोकपहचानी ॥ सब कहैं ज्ञान गम्य कर देहु । शब्द लखाय आपनकर लेहु ॥ प्रथमहि देहु पान परवाना । ता पीछे फिर ज्ञान लखाना ॥ समय जान सब कहौ बिचारी । यही भांति सब जिव निर्वारी ॥ साधुनकी सेवा चित लावै । सो जिव भवसागर नहि आवै ॥ गुरुकी दया मान सिरलीन्हा । भाव सहित पूजातिन कीन्हा ॥ इतनौ भेद एक नहि जानी । सो कैसे पुन शिष्य बखानी ॥ ज्ञानवन्त कहैं यह उपदेशा । मूरखसों जिन करहु संदेशा ॥ सार शब्द जाके घट होई । तिहि हंसा सम और न कोई ॥ धर्मदास तुम कहैं नहि भारा । सबके तारन है करतारा ॥ यह उपदेश कहहु बहु भांती । माने सोई हंस की जाती ॥ जो नहि मानै कहा तुम्हारा । सो चल जैहै यम के द्वारा ॥ यमके हाथ परै सो आई । बहता जाय थाह नहि पाई ॥

साखी-कहै कबीर धर्मदाससों, दीजो पान प्रवान । यही हंस जो पावहीं, पहुँचे पद निर्वान ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी । अब चौकाको कहौ बिचारी ॥ कवन शब्दसो आरति साजी । कवन शब्द सतगुरुकी पाँजी ॥

( २३० )

अमरमूल

कवन शब्दसों नरियर मोरा । कवन शब्दसों तिनका तोरा ॥ कवन शब्दसों चौका करई । कवन शब्दसों दीपक बरई ॥ कवनै शब्द पान लिख दीन्हा । कवन शब्द प्रसाद जो लीन्हा ॥ कवन शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कवन शब्दसों छत्र तनावा ॥ कवन शब्द पनवारौ साजा । धोती कवनै शब्द विराजा ॥ कवन शब्दसों चंदन दीजे । कवन शब्दसों पुहुप चढ़ीजे ॥ दल प्रसाद किहिं शब्द बनाई । यही भेद गुरु कहु ससुझाई ॥

सद्गुरु वचन

यहे भेद अब तोहिं बताऊँ । चौका साज सकलसमझाऊँ ॥ प्रथमहि तौ चौका अनुसारा । सोई शब्द मैं कहौं पसारा ॥ सेत सिंहसन चौका चारी । कंचन थार आरती वारी ॥ तहाँ धनी जीव बैठे आई । लिखनी लिख बहुभाँति बनाई ॥ धर्मदास उठ बिन्ती कीन्हा । चन्द्र सूर्य दोइ साखी दीन्हा ॥ शब्द माहिं बहु भाँति समावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥ अमर शब्द उच्चार कराया । अमर प्रवान अमरभइ काया ॥ अमर प्रवान अमर कर जाना । अमर शब्द बिरले पहिचाना ॥ अमर शब्दका पावै भेदा । कहैं कबीर प्रवान अच्छेदा ॥ एक बीज धरती कहैं दीन्हा । पान सुपारी नरियर कीन्हा ॥ सो प्रसाद संतन कहैं आई । सत्त सुकृत के लोक सिधाई ॥ तीन लोक सों भिन्न पसारा । बाहर भीतर शब्द पसारा ॥ दूजी दुर्मत चित सों मेटो । एकहि चीन्ह कबीरहि भेटो ॥ यहि शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥ सवा शेर मिष्टान्न मँगावहु । सत्य पुरुष कहैं आनचढ़ावहु ॥ सत्य सुकृत कहैं आन चढ़ाई । दीन भाव कर बिन्ती लाई ॥

बोधसागर

( २३१ )

धर्मदास वचन

अर्ज एक अब सुनो हमारी । तुम गुरु लीन्हा जीव उबारी॥ शोध देख हम सकल शरीरू । पीरा मेटौ बाप कबीरू ॥ केते लाख चूक जो परई । किहि कारण नरिअर अनुसरई॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम सुनो ये बाणी । ताकर भेद कहौं परवानी ॥ सवा लाख चूक जो परई । तिहि कारण नरिअर अनुसरई॥ बहुत भांति सों तत्व लगावै । मृत्युलोकमें बहुरि न आवै ॥

सुमिरन नरिअर तिलकको

मृत्यु लोक यम को स्थाना । खैंच कबीर ने मारा बाना ॥ बान मार जत यश लीन्हा । तिलक काढ़ धर्मन कहै दीन्हा॥

साखी-पाक नारिअर मोरके, हंस उतारो पार ।

कंचन कपूर मिलगए, साहिब जीवको करौ उधार॥

खिरचा अचवन लेके, यकटक सुमरौ ध्यान ।

कहै कबीर धर्मदाससों, सोहे शब्द प्रधान ॥

सम्पूर्ण

चौपाई

तबही दीपक आन प्रकाशा । मनो सत्य लोक कियो बासा॥

अन्न शब्द का पावै भेदा । कहे कबीर तब जोत अछेदा॥

तबहि पानका लिखनी नीका । अन्न शब्दका पावे टीका ॥

सत्यका अंक तहाँ लिख दीन्हा । मंत्र उचार एक तब कीन्हा ॥

सुख सागर मोरौ स्थाना । तहँवा सेत चढ़ाये पाना ॥

सेत पानका अम्बर काया । सीपमाँहिं जिम स्वाति समाया॥

भर्मत पवन बिहरत संसारा । निर्मल पवन हंस रखवारा ॥

तबहि तिनका बेग तुरावा । जन्म जन्मके पाप बहावा ॥

( २३२ )

अमरमूल

सुम्रन तिनका तुरावेका

असन वसन मन कल्पना, देखो सर्वहि भूत । कहे कबीर सतगुरु मिले, मिथ्याके मुख थूक ॥

सम्पूर्ण

चौपाई

तबै प्रवाना दीजौ जानी । सुक्ति होय हंसा पहिचानी ॥ दहिने छोड़ धर्म स्थाना । बांये दुर्गदानी को थाना ॥ आगे चित्र गुपित्र कौ भारा । नाम सुनायकै हंस उबारा ॥ टूटे घाट अठासी कोरी । हंसा उतरै नामकी डोरी ॥

सारखी-कितरे वृक्ष कितरै पक्षी, कहाँ विलमेऊ आय ।

कहैं कबीर जो गुरु मिले, हंस देहि पहुँचाय ॥

चौपाई

दे परवाना हंस बचावा । ज्ञान परम पद घटहि समावा ॥ घट की परिचय कोई पाया । जाते जीत चले यमराया ॥ तब स्नान का शब्द सुनावा । विना शब्द पानी नहि पावा ॥ विना शब्द जो पीवे पानी । मानहु मदिरा रुधिर समानी ॥

सुम्रन जल पीवनेका

आगम सरोवर विमल जल, हंसा पिये अघाय ।

काया कंचन मन मगन, कर्म भर्म मिटजाय ॥

सुम्रन स्नानका

सत्य सुकृत के नीर मँगावा । धनीके बालक स्नान करावा ॥

कर स्नान पुनि शीश नवावा । साहिबके चरणन चित लावा ॥

कहैं कबीर सुनौ धर्मदासा । आदि अंत इक ज्योति निवासा ॥

सारखी-आदि अंत इक ज्योति है, अमरनाम स्थीर ।

चौदह भुवन नव खण्डमें, एकहि सत्य कबीर ॥

सम्पूर्ण

बाधसागर

( २२२ )

सुव्रन प्रसाद मालूम करनेका

निर्भय पदका चौका दीन्हा । शील संतोष ले मज्जन कीन्हा॥ प्रेम प्रतीत परम उजियारा । सत्य सुकृत है जेवनहारा ॥ सत्य सुकृत की फिरी दुहाई । जल भयो पाकसंतन सुखदाई॥ सब संतन मिल कियो प्रसादा । जेवै कर्तार जिववै धर्मदासा ॥ सब संतन प्रसाद जब कीन्हा । मुक्ति अभयपद कहैं तब चीन्हा॥

साखी-कहे कबीर धर्मदाससों, आरतिको परमान ।

ये विधि सेवक जो करै, पावै पद निर्वान ॥

धर्मराज वचन चौपाई

धर्मदास विनती कर जोरी । स्वामी सुनिये विनती मोरी ॥ कवन वस्तु आरति मँहै धरई । कवन शब्द लै सेवा करई ॥ सो सब मोहिं कहौ समुझाई । आरति विधि मैं करौ बनाई ॥

सद्गुरु वचन

प्रथमहि मंदिर सेत सम्हारा । सुतं निर्त भक्त चित धारा ॥ कञ्चन केर थार बनवाओ । तामे मोती आन धराओ ॥ मुक्ता तो अन बेघे होई । ऐसी विधि प्रकार है सोई ॥ झारी एक कञ्चनकी होई । ता मँहै दाल प्रसाद करसोई ॥ नरियर इकसत एक प्रवाना । सवा तीन मन लै मिष्ठाना ॥ पाटम्बर धोती तहैं चहिये । दीपमालिका बहुतक लहिये ॥ नई वेद तहैं आन धराई । कञ्चन और कपूर मगाई ॥ जरी केर तहां छत्र तनावा । पान सहस्र द्वादश बनवावा ॥ लौंग सुपारी लायची लीजै । मेवा अष्ट भांति धर दीजै ॥ ता पीछे प्रसाद सहिदानी । सुखपूजा साधन कर जानी ॥ आरति फल तबही जिव पावै । सवा सेर महाकंद मँगावै ॥ सोना केर कलस धरवाई । तहां प्रवाना लिखे बनाई ॥

( २३४ )

अमरमूल

परमाना बालक कहैं दीजै । हंस रूप ता कहैं कर लीजै ॥ ऐसी आरती धरे धर्मदासू । सोई पावै लोक निवासू ॥ मनमें बहु आनन्द बड़ाई । आरत फल सोई पुन पाई ॥ अपने स्वार्थ आरती करई । भवसागर तैं कैसे तरई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिनती अनुसार । तुम सतगुरु मोरे करतारा ॥ ऐसी विधि आरति नहिं करई । सो जिव किम भवसागर तरई ॥ कलि में जीव दरिद्री होई । द्रव्य विना किमि भक्तिसँजोई ॥ जिहि विधि होय हंस मुक्ताऊ । सो मोहे स्वामी भेद बताऊ ॥

सदगुरु वचन

तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । यही मती हम तुम कहैं दीन्हा ॥ एतिक विधि जापै नहिं होई । सहज भाव आरति करै सोई ॥ सवा सेर मिश्रान्न मँगावै । नरियर इक तहैं आन चढ़ावै ॥ सवा सौ पान कहैं परवाना । लौंग लायची एही बँधाना ॥ धोती एक आन तहैं धरई । सतगुरु केर निछावर करई ॥ साधन सों वह प्रेम बढ़ावै । सत्य रूप होय ज्ञान सुनावै ॥ ज्ञान गम्य कर शब्द बुझावै । सन्तन सों बहु प्रेम बढ़ावै ॥ पांचों पद ताही महाँ लावै । साधन की सेवा मन लावै ॥ ऐसी बिधि सों आरति करै । सो प्राणी भवसागर तरे ॥

धर्मदास वचन

जो इतना नहिं करै कडिहारा । ताको मोसो कहौ विचारा ॥ हे साहिब मोहे कहौ पुकारी । बन्दी छोड़ जाउँ बलिहारी ॥

सदगुरु वचन

जो इतना नाहीं बन आवै । सो कडिहार पार किमि पावै ॥ बारह आरति जो नहिं करै । दो आरति सेवाचित धरै ॥

बोधसागर

( २३५ )

फागुन और भादों परवाना । दो आरति नहीं छोड़ सुजाना ॥ साधन को परवाना देई । वर्ष रोज के कर्म नसाई ॥

साखी-पान प्रवाना पावही, सतगुरु महिमा दान । तबही हंसा सत्य है, और झूठ सब ज्ञान ॥

चौपाई

धर्मदास में तुमहिं सुनाऊं । आरति भेद ज्ञान समझाऊ ॥ अक्षर सार आरती सोई । बिन अक्षर सब गए बिगोई ॥ अक्षर भेद जान परसंगा । ताके काल रहै नहीं संगा ॥ आरति बहुत भांति सो करई । अक्षर भेद हिये नहीं धरई ॥

साखी-अक्षर भेद जाने नहीं, बातें कहै बनाय । ताको कहौ न मानिये, आपन जीव नशाय ॥

चौपाई

आरति भक्ति औ अक्षर सारा । और सकल सब झूठ पसारा ॥ जा कहैं अक्षर परिचय होई । आरति फल पावत है सोई ॥ मूल शब्द घट मांहि विराजै । शून्य शिखर अक्षर धुन साजै ॥ ताकी महिमा तुलै न कोई । ऐसा साधू विरला होई ॥ सो कडिहार जो अक्षर जाना । और गुरु सब झूठ बखाना ॥ गुरु सोई जो अक्षर जाना । बिन अक्षर मूरखसम जाना ॥ कडिहार वही जीवन कहैं तारै । अक्षर बिन जिव नरकहि डारै ॥ जो गुरु दगा शिष्य कहैं देता । नरक परै गुरु शिष्य समेता ॥ अक्षर बिन गुरु आरति करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥ इतना भेद न जानत प्रानी । पेटके कारण ज्ञान बखानी ॥ जैसे ठनिया करै ठगिहारी । जैसे जानहु सो कडिहारी ॥ अक्षर की परिचय नहीं पावे । आपहि आप जो गुरु कहावे ॥

( २३६ )

अमरमूल

छन्द-कडिहार सोई सांच है, जिन शब्द सों परिचय करी । सूरत नित ससेट कै सोई, नाम निह अक्षर धरी ॥ रहन शूरे ज्ञान पूरे, पंथ परमारथ लहौ । दुष्ट मित्र समान यकचित, दुतिया भाव न चित गहौ ॥ सोरठा-सद्गुरु सिन्धु कबीर, उन पटतर अब को लहै । सुनियो धर्मनि धीर, सरिता सब कडिहार हैं ॥ इति श्रीग्रंथ अमरमूल चौका बंधन वर्णन

षष्ठ विश्राम

धर्मदास वचन-चौपाई

यह सुन धर्मदास हर्षाना । जिमिपंकज विकसे लखि भाना ॥ हे सद्गुरु मोपर दया कीन्हा । जन्म स्वार्थ अब मैंने चीन्हा ॥ धर्मदास कहै कर जोरी । स्वामी सुनिये बिन्ती मोरी ॥ यक संशय मोरे घट मांही । कौनउ विधि सों छूटत नाहीं ॥ मृतलोक में पाखंड धर्मा । कैसे जीव होय निह भर्मा ॥ तुम सतगुरु निजज्ञान सुनाया । शिष्य पाखण्ड तजे नहिं माया ॥ सो मोहे सतगुरु भेद बताओ । तासो जीव होय मुक्ताओ ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम सुनो विचारी । पाखण्डी गति सब निवारी ॥ सत्य शब्द घट माहिं समावै । ता लग सब पाखंड कहावै ॥ तुम जानतहौ शब्द प्रवाना । विना ज्ञान नहिं शब्द समाना ॥ पाखण्ड जिव मुक्ति न होई । कितो उपाय करे पुनि सोई ॥ पाखण्ड जाके हृदये होई । सोई हंसा कर मुक्ति कर बिगोई ॥ जप तप ज्ञान बहुत कर जाना । नेम धर्म बहुतक लिपटाना ॥ इतना कष्ट कीन्ह अधिकाई । तौ पाखण्ड भेट नहिं जाई ॥

बोधसागर

( २३७ )

ज्ञान शब्द घट मांहि समाना । सो पावेगा पद निर्वाना ॥ माथे तिलक गले जयमाला । हिय पाखंड न मिले गुपाला ॥

साखी—कहैं कबीर विचारके, सुनियो हो धर्मदास । सत्य शब्द जिहिं घट बसे, तहैं पाखंड विनास ॥

चौपाई

धर्मदास तुम सत्त कै जानहु । पाखण्ड भर्म हृदयमत आनहु ॥ जाको मन पाखंड सों राता । सोई नरक कहैं निश्चय जाता ॥ पाखंड हिये भक्ति ना होई । सत्य वचन मानो घट सोई ॥ दान देय औ पूजा करई । पाखंड धर्म जीव नहिं तरई ॥ योग यज्ञ तीरथ फिर आवे । पाखंडी जिव ठौर न पावै ॥ धर्मदास निश्चय सुन लीजे । सत्य शब्द में वासा कीजे ॥

साखी—धर्मदास सुन लीजिये, सत्य शब्द उपदेश । बिना सत्य पहुँचे नहीं, सत्य लोक निज देश ॥

चौपाई

सत्य शब्द सतपुरुषहि जानौ । नाम बिना सब झूठ बखानौ ॥ नाम छोड़ नहिं औरहि जानौ । निर्गुण सर्गुण एकहि मानौ ॥ निर्गुण सर्गुणतैं नाम नियारा । जो चीन्हें सो हंस हमारा ॥ जहैं देखे तहैं शब्द स्वरूपा । बोलन हारको अचरण रूपा ॥ अचरज बात कहन की नाही । बिन सतगुरु नहिं पावै थाहीं ॥

साखी—निह अक्षर निज पावही, मिटि है सकल अँदेश । निह अक्षर जाने बिना, घटही में परदेश ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास बिनती अनुसार । अर्ज एक सुनिये करतारा ॥ सकल भेद गुरु मोहि बतावा । बिना ज्ञान भेद नहिं पावा ॥