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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( २२६ )

अमरमूल

सद्गुरु वचन

तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । तुम नहिं पाओ ज्ञानको चीन्हा ॥ हम तौ सत्यलोकके वासी । तहैं नहिं काल बसै अविनाशी ॥ मैं जो कहा मृतलोकव्यवहारा । काल पाय सब होत औतारा ॥ काल पाय बिनसै संसारा । काले सब बिनास जग डारा ॥ काल कर्म काहू नहिं जाना । जीव जन्तु सब काल समाना ॥ कालहि पाय सृष्टि निर्माई । काल पाय फिर माहिं समाई ॥ साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय वर्त्ताय । काल पाय सब विनसही, काल काल कहैं खाय ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

यह सुन धर्मदास हर्षाने । सद्गुरु रूप हिये पहिचाने ॥ तुम साहिब मोहे कीन्ह निहाला । आपन जान कीन्ह प्रतिपाला ॥ बिन्ती एक करत संकाई । हे सतगुरु मोहे भाख सुनाई ॥ कालहिकी गति कहि समुझावा । अचरज बात मोर मन आवा ॥ प्रथम पुरुषकी प्रथमहि काला । मोहि बतावहु भेद रसाला ॥

सद्गुरु वचन

तब सतगुरु कहिबे अनुसारा । धर्मदास सुन शब्द हमारा ॥ प्रथम हते जब शून्य स्वभाऊ । धर्मदास सुन शब्द निर्माऊ ॥ शब्दते पुरुष शब्द निर्मावा । यही भेद बिरले जन पावा ॥ जाकौ कहिये शून्य स्वभाऊ । काल शून्य एकै समुझाऊ ॥ काल भेद कोई नहिं जाना । धर्मदास तुम सुनियो ज्ञाना ॥ शून्यहि माहि शब्द उच्चार। धर्मरायको भयो पसारा ॥ प्रथमहि जिन्द रूप इकभयऊ । सत्तर युग सोवत चल गयऊ ॥ तब साहिब मोहे आज्ञा दीन्हा । जिन्द जीवकहैं तुम नहिं चीन्हा ॥ जिन्द जीव कहैं आन बुलाई । सत्तर युग उन सोय सिराई ॥

बोधसागर

( २२७ )

तब हम जाय शब्द अस बोला । सोवत जिन्द नाहिं चित डोला ॥ का सोवत तोहि पुरुष बुलाई । नाहिं जागहि तिहि नींद सुहाई ॥ तब हम तेहि जगावन लागे । जिन्द जाग परम अनुरागे ॥ जगे न नीन्द भर्म बहु आवा । तब हम एक शब्द उपजावा ॥ काल शब्द कहैं टेर पुकारा । सुनकर जिन्द भयो संचारा ॥ काल शब्द सुनजिन्द डराना । तबही आया चरण लिपटाना ॥ काल नाम सुन ऐसा भाई । काल नाम सुन भक्ति कराई ॥ धर्मदास सुन कालको भेदा । काल बिना नाहिं करै निषेदा ॥ काल नयन भर देख न कोई । कालहि पढ़ पढ़ गये बिगोई ॥ वेद शास्त्र सुन पंडित कहाई । काल पुरुष सब जीव भर्माई ॥ साधू मिलकर भक्ति कमाई । जातैं काल फांस नाहिं आई ॥ काल शब्द ना होतौ भाई । ता काहे को भक्ति कराई ॥ कालके डर तपसी तप साधा । इन्द्री पांच काल डर बांधा ॥ कालहिके डर योग जो करई । कालहि डरतैं दान जो भरई ॥ कालहि डर भावै सत जाना । कालहि डर छोड़ै अभिमाना ॥ सत्यहि वचन काल डरकहहीं । कालहि डरसे झूठ परिहरहीं ॥ ऐसा डर है कालहि केरा । धर्मदास तुम करहु न बेरा ॥

सारखी-ऐसा डर है कालका, सुनहु हो धर्मदास ।

एक नाम कहैं जानकै, निडर रहो सुखवास ॥

चौपाई

कालहि डर दुनियां सब बूड़ी । काहु न देखी कालकी मूड़ी ॥ तुम धर्मदास निडर हो रहहु । नाहिन काल झूठ परिहरहु ॥

छन्द-यह भांति पंथ चलाव जगमें हंस लोक पठाइबौ ।

ज्ञान गम्य लखायकै फिर शब्दसार लखाइबौ ॥

हृदय जेहि पर होय गुरुकी रहत गहन समावही ।

काल कष्ट निवारकै सोई पुरुषलोक सिधावही ॥

( २२८ )

अमरमूल

सोरठा-आप सरीखा जान, ता कई शब्द लखाइयो ।

धर्मदास लेव मान, यही सिखावन पुरुषको ॥

इति श्रीग्रन्थ अमरमूल धर्मराय बाद कालको वर्णन ।

पंचम विश्राम

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास आनंद समाना । विगसेउ कमल उदेजनुभाना॥ बहुत भांतिसों विन्ती कीन्हा । मन वच कर्म चरणचित दीन्हा॥ पदरज लीन्हौ तृषा मिटाई । छूछी सीप स्वाती जिमि पाई॥ रंकहि निधी मिलगई जैसे । अहिमणि मिलै मगन भय ऐसे॥ चरणामृत वह विधिसों लीन्हा । गुरु चरणनको मैं आधीना ॥ अब प्रतीति मोर मन आई । निश्चय वचन मान तुव साँई ॥ अबही जाय लोक मैं देखा । ज्ञान गम्यसों पायउ लेखा ॥ भक्ति मुक्ति दोनों हम जाना । दया तुम्हार परी पहिचाना ॥ जेपर दया तुम्हारी होई । ऐसे पदको पहुँचे सोई ॥ हम जानकै मान उपदेशा । विन सतगुरु नहिं मिटत अँदेशा॥ तुम सतगुरु और सब शिष्या । यही ज्ञान परगट हम देख्या ॥ सतगुरु आप और सब वंशा । सत्य पुरुषको तुम निज अंशा ॥ तुम्हरे बचन लोक पहिचाना । तुम्हरी दया परी अब जाना ॥ यह मन बूझ शब्द है लोका । ज्ञान भयो मिट गये सब शोका॥ लोक अलोक एक कर जाना । तुम्हरे बचन सत्य हम जाना ॥ अब मोरे जिव परचय आई । बिन जाने जाने बूझी दुनियाई॥ नहि बूझौ नाहीं उतराना । यहि पाया हम केवल ज्ञाना ॥ एक बचन मैं बूझा साँई । विन्ती करौं चरण चित लाई ॥

बोधसागर

( २२९ )

तुम सतगुरु मोहिदिय उपदेशा । मैं हंसनसों कहौ सँदेशा ॥ यह तौ बात कही नहि जाई । जब पावे तब ज्ञान समाई ॥ जब तुम दया करी हियमाही । तबहीं पाऊ नामकी छाहीं ॥ कहिये बचन मोर मन भावै । जातैं हंसा लोक सिधायै ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । सब कहैं देह शब्दका चीन्हा ॥ जो नहि पाव शब्द सहदानी । तो कस करहु लोकपहचानी ॥ सब कहैं ज्ञान गम्य कर देहु । शब्द लखाय आपनकर लेहु ॥ प्रथमहि देहु पान परवाना । ता पीछे फिर ज्ञान लखाना ॥ समय जान सब कहौ बिचारी । यही भांति सब जिव निर्वारी ॥ साधुनकी सेवा चित लावै । सो जिव भवसागर नहि आवै ॥ गुरुकी दया मान सिरलीन्हा । भाव सहित पूजातिन कीन्हा ॥ इतनौ भेद एक नहि जानी । सो कैसे पुन शिष्य बखानी ॥ ज्ञानवन्त कहैं यह उपदेशा । मूरखसों जिन करहु संदेशा ॥ सार शब्द जाके घट होई । तिहि हंसा सम और न कोई ॥ धर्मदास तुम कहैं नहि भारा । सबके तारन है करतारा ॥ यह उपदेश कहहु बहु भांती । माने सोई हंस की जाती ॥ जो नहि मानै कहा तुम्हारा । सो चल जैहै यम के द्वारा ॥ यमके हाथ परै सो आई । बहता जाय थाह नहि पाई ॥

साखी-कहै कबीर धर्मदाससों, दीजो पान प्रवान । यही हंस जो पावहीं, पहुँचे पद निर्वान ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी । अब चौकाको कहौ बिचारी ॥ कवन शब्दसो आरति साजी । कवन शब्द सतगुरुकी पाँजी ॥

( २३० )

अमरमूल

कवन शब्दसों नरियर मोरा । कवन शब्दसों तिनका तोरा ॥ कवन शब्दसों चौका करई । कवन शब्दसों दीपक बरई ॥ कवनै शब्द पान लिख दीन्हा । कवन शब्द प्रसाद जो लीन्हा ॥ कवन शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कवन शब्दसों छत्र तनावा ॥ कवन शब्द पनवारौ साजा । धोती कवनै शब्द विराजा ॥ कवन शब्दसों चंदन दीजे । कवन शब्दसों पुहुप चढ़ीजे ॥ दल प्रसाद किहिं शब्द बनाई । यही भेद गुरु कहु ससुझाई ॥

सद्गुरु वचन

यहे भेद अब तोहिं बताऊँ । चौका साज सकलसमझाऊँ ॥ प्रथमहि तौ चौका अनुसारा । सोई शब्द मैं कहौं पसारा ॥ सेत सिंहसन चौका चारी । कंचन थार आरती वारी ॥ तहाँ धनी जीव बैठे आई । लिखनी लिख बहुभाँति बनाई ॥ धर्मदास उठ बिन्ती कीन्हा । चन्द्र सूर्य दोइ साखी दीन्हा ॥ शब्द माहिं बहु भाँति समावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥ अमर शब्द उच्चार कराया । अमर प्रवान अमरभइ काया ॥ अमर प्रवान अमर कर जाना । अमर शब्द बिरले पहिचाना ॥ अमर शब्दका पावै भेदा । कहैं कबीर प्रवान अच्छेदा ॥ एक बीज धरती कहैं दीन्हा । पान सुपारी नरियर कीन्हा ॥ सो प्रसाद संतन कहैं आई । सत्त सुकृत के लोक सिधाई ॥ तीन लोक सों भिन्न पसारा । बाहर भीतर शब्द पसारा ॥ दूजी दुर्मत चित सों मेटो । एकहि चीन्ह कबीरहि भेटो ॥ यहि शब्द मिष्टान्न चढ़ावा । कदली पत्र जो आन धरावा ॥ सवा शेर मिष्टान्न मँगावहु । सत्य पुरुष कहैं आनचढ़ावहु ॥ सत्य सुकृत कहैं आन चढ़ाई । दीन भाव कर बिन्ती लाई ॥

बोधसागर

( २३१ )

धर्मदास वचन

अर्ज एक अब सुनो हमारी । तुम गुरु लीन्हा जीव उबारी॥ शोध देख हम सकल शरीरू । पीरा मेटौ बाप कबीरू ॥ केते लाख चूक जो परई । किहि कारण नरिअर अनुसरई॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम सुनो ये बाणी । ताकर भेद कहौं परवानी ॥ सवा लाख चूक जो परई । तिहि कारण नरिअर अनुसरई॥ बहुत भांति सों तत्व लगावै । मृत्युलोकमें बहुरि न आवै ॥

सुमिरन नरिअर तिलकको

मृत्यु लोक यम को स्थाना । खैंच कबीर ने मारा बाना ॥ बान मार जत यश लीन्हा । तिलक काढ़ धर्मन कहै दीन्हा॥

साखी-पाक नारिअर मोरके, हंस उतारो पार ।

कंचन कपूर मिलगए, साहिब जीवको करौ उधार॥

खिरचा अचवन लेके, यकटक सुमरौ ध्यान ।

कहै कबीर धर्मदाससों, सोहे शब्द प्रधान ॥

सम्पूर्ण

चौपाई

तबही दीपक आन प्रकाशा । मनो सत्य लोक कियो बासा॥

अन्न शब्द का पावै भेदा । कहे कबीर तब जोत अछेदा॥

तबहि पानका लिखनी नीका । अन्न शब्दका पावे टीका ॥

सत्यका अंक तहाँ लिख दीन्हा । मंत्र उचार एक तब कीन्हा ॥

सुख सागर मोरौ स्थाना । तहँवा सेत चढ़ाये पाना ॥

सेत पानका अम्बर काया । सीपमाँहिं जिम स्वाति समाया॥

भर्मत पवन बिहरत संसारा । निर्मल पवन हंस रखवारा ॥

तबहि तिनका बेग तुरावा । जन्म जन्मके पाप बहावा ॥

( २३२ )

अमरमूल

सुम्रन तिनका तुरावेका

असन वसन मन कल्पना, देखो सर्वहि भूत । कहे कबीर सतगुरु मिले, मिथ्याके मुख थूक ॥

सम्पूर्ण

चौपाई

तबै प्रवाना दीजौ जानी । सुक्ति होय हंसा पहिचानी ॥ दहिने छोड़ धर्म स्थाना । बांये दुर्गदानी को थाना ॥ आगे चित्र गुपित्र कौ भारा । नाम सुनायकै हंस उबारा ॥ टूटे घाट अठासी कोरी । हंसा उतरै नामकी डोरी ॥

सारखी-कितरे वृक्ष कितरै पक्षी, कहाँ विलमेऊ आय ।

कहैं कबीर जो गुरु मिले, हंस देहि पहुँचाय ॥

चौपाई

दे परवाना हंस बचावा । ज्ञान परम पद घटहि समावा ॥ घट की परिचय कोई पाया । जाते जीत चले यमराया ॥ तब स्नान का शब्द सुनावा । विना शब्द पानी नहि पावा ॥ विना शब्द जो पीवे पानी । मानहु मदिरा रुधिर समानी ॥

सुम्रन जल पीवनेका

आगम सरोवर विमल जल, हंसा पिये अघाय ।

काया कंचन मन मगन, कर्म भर्म मिटजाय ॥

सुम्रन स्नानका

सत्य सुकृत के नीर मँगावा । धनीके बालक स्नान करावा ॥

कर स्नान पुनि शीश नवावा । साहिबके चरणन चित लावा ॥

कहैं कबीर सुनौ धर्मदासा । आदि अंत इक ज्योति निवासा ॥

सारखी-आदि अंत इक ज्योति है, अमरनाम स्थीर ।

चौदह भुवन नव खण्डमें, एकहि सत्य कबीर ॥

सम्पूर्ण

बाधसागर

( २२२ )

सुव्रन प्रसाद मालूम करनेका

निर्भय पदका चौका दीन्हा । शील संतोष ले मज्जन कीन्हा॥ प्रेम प्रतीत परम उजियारा । सत्य सुकृत है जेवनहारा ॥ सत्य सुकृत की फिरी दुहाई । जल भयो पाकसंतन सुखदाई॥ सब संतन मिल कियो प्रसादा । जेवै कर्तार जिववै धर्मदासा ॥ सब संतन प्रसाद जब कीन्हा । मुक्ति अभयपद कहैं तब चीन्हा॥

साखी-कहे कबीर धर्मदाससों, आरतिको परमान ।

ये विधि सेवक जो करै, पावै पद निर्वान ॥

धर्मराज वचन चौपाई

धर्मदास विनती कर जोरी । स्वामी सुनिये विनती मोरी ॥ कवन वस्तु आरति मँहै धरई । कवन शब्द लै सेवा करई ॥ सो सब मोहिं कहौ समुझाई । आरति विधि मैं करौ बनाई ॥

सद्गुरु वचन

प्रथमहि मंदिर सेत सम्हारा । सुतं निर्त भक्त चित धारा ॥ कञ्चन केर थार बनवाओ । तामे मोती आन धराओ ॥ मुक्ता तो अन बेघे होई । ऐसी विधि प्रकार है सोई ॥ झारी एक कञ्चनकी होई । ता मँहै दाल प्रसाद करसोई ॥ नरियर इकसत एक प्रवाना । सवा तीन मन लै मिष्ठाना ॥ पाटम्बर धोती तहैं चहिये । दीपमालिका बहुतक लहिये ॥ नई वेद तहैं आन धराई । कञ्चन और कपूर मगाई ॥ जरी केर तहां छत्र तनावा । पान सहस्र द्वादश बनवावा ॥ लौंग सुपारी लायची लीजै । मेवा अष्ट भांति धर दीजै ॥ ता पीछे प्रसाद सहिदानी । सुखपूजा साधन कर जानी ॥ आरति फल तबही जिव पावै । सवा सेर महाकंद मँगावै ॥ सोना केर कलस धरवाई । तहां प्रवाना लिखे बनाई ॥

( २३४ )

अमरमूल

परमाना बालक कहैं दीजै । हंस रूप ता कहैं कर लीजै ॥ ऐसी आरती धरे धर्मदासू । सोई पावै लोक निवासू ॥ मनमें बहु आनन्द बड़ाई । आरत फल सोई पुन पाई ॥ अपने स्वार्थ आरती करई । भवसागर तैं कैसे तरई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास बिनती अनुसार । तुम सतगुरु मोरे करतारा ॥ ऐसी विधि आरति नहिं करई । सो जिव किम भवसागर तरई ॥ कलि में जीव दरिद्री होई । द्रव्य विना किमि भक्तिसँजोई ॥ जिहि विधि होय हंस मुक्ताऊ । सो मोहे स्वामी भेद बताऊ ॥

सदगुरु वचन

तब साहिब अस कहिबे लीन्हा । यही मती हम तुम कहैं दीन्हा ॥ एतिक विधि जापै नहिं होई । सहज भाव आरति करै सोई ॥ सवा सेर मिश्रान्न मँगावै । नरियर इक तहैं आन चढ़ावै ॥ सवा सौ पान कहैं परवाना । लौंग लायची एही बँधाना ॥ धोती एक आन तहैं धरई । सतगुरु केर निछावर करई ॥ साधन सों वह प्रेम बढ़ावै । सत्य रूप होय ज्ञान सुनावै ॥ ज्ञान गम्य कर शब्द बुझावै । सन्तन सों बहु प्रेम बढ़ावै ॥ पांचों पद ताही महाँ लावै । साधन की सेवा मन लावै ॥ ऐसी बिधि सों आरति करै । सो प्राणी भवसागर तरे ॥

धर्मदास वचन

जो इतना नहिं करै कडिहारा । ताको मोसो कहौ विचारा ॥ हे साहिब मोहे कहौ पुकारी । बन्दी छोड़ जाउँ बलिहारी ॥

सदगुरु वचन

जो इतना नाहीं बन आवै । सो कडिहार पार किमि पावै ॥ बारह आरति जो नहिं करै । दो आरति सेवाचित धरै ॥

बोधसागर

( २३५ )

फागुन और भादों परवाना । दो आरति नहीं छोड़ सुजाना ॥ साधन को परवाना देई । वर्ष रोज के कर्म नसाई ॥

साखी-पान प्रवाना पावही, सतगुरु महिमा दान । तबही हंसा सत्य है, और झूठ सब ज्ञान ॥

चौपाई

धर्मदास में तुमहिं सुनाऊं । आरति भेद ज्ञान समझाऊ ॥ अक्षर सार आरती सोई । बिन अक्षर सब गए बिगोई ॥ अक्षर भेद जान परसंगा । ताके काल रहै नहीं संगा ॥ आरति बहुत भांति सो करई । अक्षर भेद हिये नहीं धरई ॥

साखी-अक्षर भेद जाने नहीं, बातें कहै बनाय । ताको कहौ न मानिये, आपन जीव नशाय ॥

चौपाई

आरति भक्ति औ अक्षर सारा । और सकल सब झूठ पसारा ॥ जा कहैं अक्षर परिचय होई । आरति फल पावत है सोई ॥ मूल शब्द घट मांहि विराजै । शून्य शिखर अक्षर धुन साजै ॥ ताकी महिमा तुलै न कोई । ऐसा साधू विरला होई ॥ सो कडिहार जो अक्षर जाना । और गुरु सब झूठ बखाना ॥ गुरु सोई जो अक्षर जाना । बिन अक्षर मूरखसम जाना ॥ कडिहार वही जीवन कहैं तारै । अक्षर बिन जिव नरकहि डारै ॥ जो गुरु दगा शिष्य कहैं देता । नरक परै गुरु शिष्य समेता ॥ अक्षर बिन गुरु आरति करई । धर्मराय के फन्दा परई ॥ इतना भेद न जानत प्रानी । पेटके कारण ज्ञान बखानी ॥ जैसे ठनिया करै ठगिहारी । जैसे जानहु सो कडिहारी ॥ अक्षर की परिचय नहीं पावे । आपहि आप जो गुरु कहावे ॥

( २३६ )

अमरमूल

छन्द-कडिहार सोई सांच है, जिन शब्द सों परिचय करी । सूरत नित ससेट कै सोई, नाम निह अक्षर धरी ॥ रहन शूरे ज्ञान पूरे, पंथ परमारथ लहौ । दुष्ट मित्र समान यकचित, दुतिया भाव न चित गहौ ॥ सोरठा-सद्गुरु सिन्धु कबीर, उन पटतर अब को लहै । सुनियो धर्मनि धीर, सरिता सब कडिहार हैं ॥ इति श्रीग्रंथ अमरमूल चौका बंधन वर्णन

षष्ठ विश्राम

धर्मदास वचन-चौपाई

यह सुन धर्मदास हर्षाना । जिमिपंकज विकसे लखि भाना ॥ हे सद्गुरु मोपर दया कीन्हा । जन्म स्वार्थ अब मैंने चीन्हा ॥ धर्मदास कहै कर जोरी । स्वामी सुनिये बिन्ती मोरी ॥ यक संशय मोरे घट मांही । कौनउ विधि सों छूटत नाहीं ॥ मृतलोक में पाखंड धर्मा । कैसे जीव होय निह भर्मा ॥ तुम सतगुरु निजज्ञान सुनाया । शिष्य पाखण्ड तजे नहिं माया ॥ सो मोहे सतगुरु भेद बताओ । तासो जीव होय मुक्ताओ ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास तुम सुनो विचारी । पाखण्डी गति सब निवारी ॥ सत्य शब्द घट माहिं समावै । ता लग सब पाखंड कहावै ॥ तुम जानतहौ शब्द प्रवाना । विना ज्ञान नहिं शब्द समाना ॥ पाखण्ड जिव मुक्ति न होई । कितो उपाय करे पुनि सोई ॥ पाखण्ड जाके हृदये होई । सोई हंसा कर मुक्ति कर बिगोई ॥ जप तप ज्ञान बहुत कर जाना । नेम धर्म बहुतक लिपटाना ॥ इतना कष्ट कीन्ह अधिकाई । तौ पाखण्ड भेट नहिं जाई ॥

बोधसागर

( २३७ )

ज्ञान शब्द घट मांहि समाना । सो पावेगा पद निर्वाना ॥ माथे तिलक गले जयमाला । हिय पाखंड न मिले गुपाला ॥

साखी—कहैं कबीर विचारके, सुनियो हो धर्मदास । सत्य शब्द जिहिं घट बसे, तहैं पाखंड विनास ॥

चौपाई

धर्मदास तुम सत्त कै जानहु । पाखण्ड भर्म हृदयमत आनहु ॥ जाको मन पाखंड सों राता । सोई नरक कहैं निश्चय जाता ॥ पाखंड हिये भक्ति ना होई । सत्य वचन मानो घट सोई ॥ दान देय औ पूजा करई । पाखंड धर्म जीव नहिं तरई ॥ योग यज्ञ तीरथ फिर आवे । पाखंडी जिव ठौर न पावै ॥ धर्मदास निश्चय सुन लीजे । सत्य शब्द में वासा कीजे ॥

साखी—धर्मदास सुन लीजिये, सत्य शब्द उपदेश । बिना सत्य पहुँचे नहीं, सत्य लोक निज देश ॥

चौपाई

सत्य शब्द सतपुरुषहि जानौ । नाम बिना सब झूठ बखानौ ॥ नाम छोड़ नहिं औरहि जानौ । निर्गुण सर्गुण एकहि मानौ ॥ निर्गुण सर्गुणतैं नाम नियारा । जो चीन्हें सो हंस हमारा ॥ जहैं देखे तहैं शब्द स्वरूपा । बोलन हारको अचरण रूपा ॥ अचरज बात कहन की नाही । बिन सतगुरु नहिं पावै थाहीं ॥

साखी—निह अक्षर निज पावही, मिटि है सकल अँदेश । निह अक्षर जाने बिना, घटही में परदेश ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास बिनती अनुसार । अर्ज एक सुनिये करतारा ॥ सकल भेद गुरु मोहि बतावा । बिना ज्ञान भेद नहिं पावा ॥

( २३८ )

अमरमूल

ज्ञान रूप कहे सों कहिये । ज्ञान भेद कैसे के लहिये ॥ बिन सतगुरु को भेद बतावे । किहिविधि मनकी संशय जावे ॥

सद्गुरु वचन

ज्ञान शब्द सत गुरुसों पावे । बिन सतगुरु को भेद बतावे ॥ ज्ञान नाम है बीज स्वरूपा । विना ज्ञान सो यह को रूपा ॥ ज्ञान बीज प्रथम अनुसारा । ज्ञान बीजतैं सकल पसारा ॥ ज्ञान बीज सों द्रीप निर्माया । अभी अंकूर ज्ञान उपजाया ॥ प्रथमहि तहां पुरुष को मूला । जिहि तैं भये सकल स्थूला ॥ सोलह सुत जबभय उतपानी । ज्ञान बीज तैं सबकी खानी ॥ तुम सहज धर्मबल जोरा । धर्मराय को माथा तोरा ॥ सुतनाम ज्ञानी अनुसारा । धर्मलोक तैं दीन्ह निकारा ॥ विषम सरोवर आन विराजा । अति अहँकार महाबल गाजा ॥ भाँति भाँतिके बाजन बाजा । रंग छत्तीसों होत अवाजा ॥ पाँच तत्त्व गुण तीन बनाया । तातैं सकल सृष्टि निर्माया ॥ जात पाँच यहि तैं उतपानी । ब्राह्मण क्षत्री शूद्र बखानी ॥ ब्रह्मासों जब जाति पसारा । चार वर्ण कीन्है निरधारा ॥ मुखसों ब्राह्मण कीन्ह उचारा । भुज सों क्षत्री कीन्ह पसारा ॥ जंघसों वैश्य करी उतपानी । पाँव सो शूद्र कीन्ह सहिदानी ॥ चार वर्ण को सकल पसारा । वर्तमान वतैं संसारा ॥ ब्राह्मण धर्म ब्रह्मको जाना । तातैं ब्राह्मण वेद बखाना ॥ ब्राह्मण जानौ शूद्र समाना । बिन जाने बूढ़े अभिमाना ॥ गायत्री जप हैं दिनराती । समुझत नहीं ज्ञानकी पाँती ॥ गायत्री जप कर अभिमाना । हमसम और कोइ नहीं आना ॥ संध्या तर्पण औ षट कर्मा । वेद विचार साध शुचि धर्मा ॥ मुमति विचारकै ज्ञान बखाने । धर्म विधान कथा बहु आने ॥

बांधसागर

( २३९ )

पिण्डा पार तर्पण करि दीन्हा । आपन मन अहंकार बड़ कीन्हा ॥ पित्र भक्ति कीन्ही ज्योनारा । मन मैं कीन्ह बहुत अहंकारा ॥ हम तो पित्र भक्ति लवलार्ई । हम सम भक्त और नहिं भाई ॥ हम सम नाहिं कोइ कुलीना । पित्र भक्ति बहुतक लवलीना ॥ जेवहि ब्राह्मण पुण्य बड़ होई । कुटुम समान और नहिं कोई ॥ वेद शास्त्र पढ़ ज्ञान जो जाना । भाषा ज्ञान सुने नहिं काना ॥ साधु संत जो द्वारे आई । तिनकहैं देखै बहुत रिसआई ॥ इन तो नष्ट कर्म बढ कीन्हा । मूढ़ मुड़ायकै टोपी दीन्हा ॥ जाति पांतिकी लज्जा त्यागी । निस दिन फिरहिं ब्रह्म अनुरागी ॥ ताते इन्हि न मानत कोई । पेटके कारण जाति बिगोई ॥ जाति समान न और बिचारा । जाते ब्राह्मण जाति सम्हारा ॥ यह सब मत ब्राह्मणने कीन्हा । जातैं सृष्टि कर्ममें दीन्हा ॥ जिन प्रभु रचा सकल संसारा । तिनहिं बिसार बूड अहंकारा ॥ प्रभुहि छोड़ अन्त चित बासी । जन्म अनेक फिरहिं चौरासी ॥ ब्राह्मण प्रभुकी भक्ति न जानी । ब्रह्मरूप नाहिन पहिचानी ॥ मुनिवर स्मृति पढकै राता । ज्ञान हीन मिथ्या मद माता ॥ ब्राह्मण तो ऐसहि चलि गएऊ । ब्रह्म धर्म काहू नहिं गहेऊ ॥

साखी-ब्रह्म भेद जानैं नहीं, बहुत करै अभिमान । ताते ब्राह्मण बूड़हीं, कहैं कबीर बखान ॥

चौपाई

क्षत्री धर्म सुनौ व्यवहारा । गौ ब्राह्मण त्रियको रखवारा ॥ गाय मार दैत्यन सब खाई । क्षत्री धर्म सबै नस जाई ॥ ब्राह्मण से भरवावत पानी । क्षत्री धर्म कहाँ रहु जानी ॥ आनकी त्रिया आन घर जाई । द्रव्य आन को आन लुटाई ॥ न्यायहु पै ठाढा नहिं होई । क्षत्री धर्म सहज ही खोई ॥

( २४० )

अमरमूल

धर्म न चल न गुरुकहँ मानै । अपने मन महाँ ज्ञान बखानै ॥ जो गुरु मिलै तौ ज्ञान लखावै । बहुरि न योनि संकट आवै ॥ एक नाम को करै नवेरा । चारों वर्ण तासु के चेरा ॥ एक धर्म कहँ बिनवै प्रानी । चार वर्ण साधन कहँ जानी ॥ साधुन की सेवा नहिं करई । बहु अभिमान हिये में धरई ॥

सारखी-भक्त रूप चीन्हत नहीं, चाल चले कहु आन । क्षत्री गण अभिमानमें कहैं कबीर निदान ॥

चौपाई

तातैं परसराम औतारा । उन क्षत्रिनको कीन्ह सँहारा ॥ बारन बूढ़न के भए काला । क्षत्री मार विप्र प्रतिपाला ॥ मूर्ख लोग सब करै बखाना । सत्यभक्ति परचित नहिं आना ॥ कोटिन हत्या क्षत्री करई । तिनकी लोग बढ़ाई धरई ॥ क्षत्री धर्म को होय निवाहा । तौ नहिं छोड़ै कालको चाहा ॥ धर्मराय तिन करै सँहारा । जारे वार करै जर छारा ॥ क्षत्री सोइ क्षमा जिहिं आवै । परजा दुखी आप दुख पावै ॥ वैश्य धर्म अब वेद बखानै । विष्णु जान मन और न कानै ॥ भूखा देख दया चित धरई । वैश्य धर्म व्यवहारहिं करई ॥ तीरथ व्रत करै विधि नाना । प्रभुकी भक्ति नहीं चित आना ॥ जेनी जीव करे प्रतिपाला । जैननामगत आहिं रिशाला ॥ पानी छान पिये दिन राती । नहिं ज्योनार करै निशिपांती ॥ हरिप्रतीत मन माहिन आनै । सूखे काठ सों मन चितठानै ॥ भक्ति रूप न्यारो धर्मदासू । जासों मिटै कालकी फांसू ॥ जीव श्वास ना धर्म चलावै । नाटक चेटक ज्ञान बतावै ॥ लिंग पूजावै घर घर जाई । कामिनि सों बहु प्रेम बढ़ाई ॥ कामिनी काम न चितसों छूटे । यहि विधि घर यम निशिदिन लूटे ॥

बाधसागर

( २४१ )

जप तप माया कीन्ह खुआरा । ऐसे जीव अटक यमद्वारा ॥ पारसनाथ पूजा मन लाई । बहुत भाँति सों पूजहि जाई ॥ पारसनाथ परम गुरु ज्ञानी । ताकी नहिं पावैं सहदानी ॥ ताके कर्म काट सब जाई । सतगुरु चरण रहै लवलार्ई ॥ जब सतगुरु की दाया होई । अक्षर भेद पाय नहिं सोई ॥ ब्राह्मण क्षत्री वैश्य बखाना । अक्षर भेद नहीं पहिचाना ॥

साखी—अक्षर भेद जानैं नहीं, करे बहुत अभिमान । वैश्य सबै वे नष्ट हैं, सत्य वचन परमान ॥

चौपाई

चार वर्णमें शूद्र अधीना । सेवा कर सबसों लवलीना ॥ इतनी भक्ति सतगुरु की पाई । चार वर्णमहैं सो अधिकाई ॥ ब्राह्मणकी सेवा अनुसारे । काम कोध औ लोभ निवारै ॥ क्षत्री सों बहु करै मितार्ई । नित नये प्रेमसहित अधिकाई ॥ वैश्य धर्मही विधि कर पूजे । सत्य धर्म दाया चित कीजे ॥ ऐसे शूद्रहि ब्रह्म बखाना । ब्रह्मलोक में सेवा माना ॥ कलियुग शूद्र धर्म अधिकारा । तीन धर्म को भयो सँहारा ॥ धन्य शूद्र जो सेवा करई । गुरुके चरण हृदय महैं धरई ॥

साखी—यह तौ करनी शूद्रकी, सुनियो हो धर्मदास । सतगुरुके चरण जो सेवई, सत्य लोक महैं वास ॥

चौपाई

धर्मदास तुम शूद्र औतारा । जाते सतगुरु भक्ति चित धारा ॥ तुम्हरे पीछे ब्राह्मण तरि हैं । तुम्हरे पीछे क्षत्रि उबरि हैं ॥ चारों वर्ण मुक्ति घर जैहैं । जो तुम्हरो चरणोदक लैहैं ॥ कबहैं न जल आवैं तेई । मुक्ति पदार्थ पावैं जेई ॥

नं. ७ कबीरसागर - ९

( २४२ )

अमरसूल

साखी—जो प्राणी जन्मत भये, शूद्र सकल संसार । कह कबीर जब बाचि हैं, करिहैं ब्रह्म विचार ॥

चौपाई

यह तुम सुनहु वर्णनका लेखा । मुक्ति भेद करहु विवेका ॥ तुम्हरे शिष्य शब्द जो पावैं । बिना शब्द नहिं शिष्य कहावैं ॥ शब्द भेद जो पावैं अंगा । ताको काल नहीं परसंगा ॥ बिन अक्षर सबकहैं दुख होई । येही विधि सब जाय बिगोई ॥ और सकल यमको द्वारा । तिनको धर्मराय जो मारा ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास विन्ती कर जोरी । स्वामी सुनियो विनती मोरी ॥ तुम्ही दयाल हो अन्तर्यामी । करहु कृपा अब मोपर स्वामी ॥ तुम्हरे वचन मुक्ति हम पाई । हमरे वंश कस मुक्ति न आई ॥

सद्गुरु वचन

तब कबीर जो कहिबे लीन्हा । अब मैं कहौं वंशकर चीन्हा ॥ जिहि विधि मुक्ति होय रे भाई । सब अब तुम्हैं कहौं ससुझाई ॥ प्रथमहि विधि वंश ज्ञान मन लावै । सहज समाधि परम पद पावै ॥ निमोही हो जगसों रहई । मोह प्रीति मन हर्ष न करई ॥ जो मानै तौ अति भल जाना । नहिं मानै तौ समता ज्ञाना ॥ जो कोइ नाम कबीरहि लेही । तिनसो कछु न अन्तर देही ॥ आपा छोड़ नाम लव लावै । देह छोड़ सतलोक सिधावै ॥ जो मनमें करि है अहँकारा । निश्चय बूझै सब परिवारा ॥ सत्य भक्ति सत्यही मन लावै । आप तरे जीवन मुक्तावै ॥ जो कोई माया आन चढ़ाई । साधुन कहैं सब देय खवाई ॥ सत्य वचन सबही सों भाषै । सत्यनाम मनमें अभिलाषै ॥ कबहुँ न क्रोध कर मनमांही । जो बोले सो नामकी छांही ॥

बोधसागर

( २४३ )

ज्ञान विचारै शब्द सुनावै । सब जीवन कहैं लोक पठावै ॥ तुम्हरे वंश जो आगे होई । तिनके गर्व बहुत मन सोई ॥ गर्वके किये भक्ति नहिं होई । बिना भक्ति सब जाँय विगोई ॥ सात पिढ़ी लग गर्व गुमाना । आठै पिढ़ी भक्ति परवाना ॥ पावै सार शब्द परवाना । तब पुनि पावै लोक ठिकाना ॥ सात बाल जो तुम्हरे होई । तब लग रहै अभिमान समोई ॥ शब्द पेल कै करहिं धिगाई । पंथहिं मेट अपंथ चलाई ॥ आठे वंश तबै औतारा । तिनसों होय पन्थ उजियारा ॥ वे गुरु आय करै संसारा । तीन लोकमहैं बास पसारा ॥ स्वर्ग माहि नामी जिहि आही । धर्मराय तिनकी सुधि पाहीं ॥ तब अपना वह दूत पठाहीं । बहुतक छल करहै तिनपाहीं ॥ सार शब्द सों निकट न जाई । भागे दूत रहै पछताई ॥ वंश तुम्हार केर यह लेखा । बिना नाम नहिं होय विवेका ॥ जा कहैं अमर नाम मिलगयऊ । सो प्राणी निहसंशय भयऊ ॥ अमरशब्द जो घट परकाशा । तहैंवा है हमरौ निज वासा ॥

छन्द—जो अमरनाम न पाय है, सो अध है पछताय । जन्म जन्मत कष्ट बहुतक, जरा मरन समाय हो ॥ हंस वंशन हंस पंगत, कही सब दरसायके । यह रहन रहै सो लोक पहुँचै, कहै कबीर समझायके ॥

सोरठा—दीन्ह जकत को राज, धर्मन तुम्हरे वंश कहैं । करेहि जीव को काज, सत्यनाम समझायके ॥

इति श्रीग्रंथ अमरमूल चारवर्णवर्णन वंशमहिमावर्णन

( २४४ )

अमरमूल

सप्तमविश्राम

धर्मदास बचन चौपाई

धर्मदास कहे कर जोरी । स्वामी सुनये विन्ती मोरी ॥ जो तुम कही सोई परवाना । गुरुके वचन सत्य हम जाना ॥ हम जानी पुरुष रु गुरु माहीं । तुमहिं पुरुष कुछ अंतर नाही ॥ हमरे दिल यह पारख आई । तुम्हरी दया हंस मुक्ताई ॥ हमरे बालक तुम्हरे पाछे । तुम्हरी दया नाम मिल आछे ॥

सद्गुरु वचन

तब साहिब अस कहि समुझाई । वंश तुम्हार मुक्ति घर जाई ॥ जो कोइ बालक होय तुम्हारा । तिनसों भक्ति होय उजियारा ॥ पंथ माहिं जे बालक आवैं । ते तुम वंशन माथ नवावैं ॥ तिनसों भक्ति मर्यादा होई । सार शब्द चलि है निज सोई ॥ नाँद केरि बालक जो होई । तिनको मुक्ति नाम सो सोई ॥ नाँदके बालक शब्दहि जाना । भवसागर तज लोक पयाना ॥ विन्दके बाल रहैं अरुझाई । मान गुमान और प्रभुताई ॥ सत्य शब्द जिहि बालक जानी । सोई पावैं लोक सहिदानी ॥ जेहो बाल प्रवाना पावा । तिन कहैं जानहु वंश स्वभावा ॥

साखी-हमरे बालक नामके, और सकल सब झूठ ।

सत्य शब्द कहैं जानही, काल गहे नहिं खूंट ॥

चौपाई

धर्मदास सुन शब्द पसारा । बिना शब्द नहिं उतरहि पारा ॥ बिना शब्द तुम मुक्ति न पाओ । केतो ज्ञान गम्य फैलाओ ॥ वंश हमार शब्द निज जाना । बिना शब्द नहि वंशहि माना ॥ धर्मदास निर्मोह हिय गेहू । वंशकी चिन्ता छांड़ तुम देहू ॥ तुम तो भयऊ शब्द समाना । यही बचन तुम चित नहिं आना ॥

बोधसागर

( २४६ )

तुमहि कही अस बस्तु गुसाईं । मैं बूझों यह संशय जाईं ॥ तुम्हरी दया आज जो पाऊं । तौ सब बालक लोक पठाऊं ॥

सद्गुरु वचन

तब साहिब अस कहि समुझाईं । बिना नाम नहीं लोक पठाईं ॥ नाँद बिन्दकै बालक दोईं । बिना नाम कोई मुक्ति न होईं ॥ के तौ पढ़ै गुणै औ गावै । बिना नाम भव भटका खावै ॥ हमरे माया मोह न होईं । सब संसार सत्य कर सोईं ॥ धर्मदास तुम बड़े हो ज्ञानी । यह संशय कस मन मँहै आनी ॥ गुरु को भार सबन कर होईं । तुम मनमें पछताव न कोई ॥ तारन तरन सत्य हम सोईं । बिन सतगुरु बूझा सब कोई ॥ सतगुरु तौ सब सृष्टि उबारा । तुम बालक अब कौन है भारा ॥ तुम जिन चिन्तामन मँहै करहूँ । सद्गुरु नाम हृदय मँहै धरहूँ ॥ एक काल आवे जब भाईं । सबै सृष्टि यह लोक सिधाईं ॥ जहाँ लग जीव जन्तु सब कहिये । तहाँ लग सब सद्गुरु मँहै लहिये ॥ सबै भार सद्गुरुके काँधे । पार लगावहि यम नहीं बाँधे ॥ यमका अमल छूट जब जाईं । सद्गुरु शरण जीव जब आईं ॥

साखी—कहे कबीर बिचारकै, सुनियो हो धर्मदास ।

अमरमूल जो जान है, ताको सब परकाश ॥

धर्मदास वचन—चौपाई

धर्मदास बिनवै कर जोरी । स्वामी सुनिये बिनती मोरी ॥ तुम्हरे कहे जगत तर जाईं । कौन मतासों लोक सिधाईं ॥ ज्ञान दिव्य जो घट नहीं होईं । सोइ कवन बिधि लोकसमोईं ॥ तब मैं जानो ज्ञान तुम्हारा । सकल सृष्टिको होय उबारा ॥