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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १६८ )

बोधसागर

कवन पवनते जीव उत्पानी । सोई पवन तुम कहौ बखानी ॥ ताहि पवनको नाम बताऔ । कर्म काटि हंसा मुक्ताऔ ॥ कैसे सीप स्वातीको पावै । कारण कौन बांझ रहि जावै ॥ ये सब भेद दया करि कहेऊ । साहब मोहि अपना करि लयेऊ ॥

सदगुरु उवाच

धर्मदास सुनु पवनकी खानी । कूर्म मुखते पवन उत्पानी ॥ चारि अरति पवन उठि आया । ताको भेद कोई जन पाया ॥ शीश कूर्मका कहूँ बखानी । साधु सुजन कोई कोई जानी ॥ माया आठ पृथ्वीमें भीना । आठ दिशा भइ ताकर चीना ॥ माथा आठ आठ है माना । चारिदिशा चारि कौन परमाना ॥ माथा तीन छीनि ले गयऊ । माथा तीन पेटमें रहेऊ ॥ काकर चौदह भुवन बनाया । सोई रूप नर करे सुभावा ॥ अधर पवन सो जीव उत्पानी । चले उर्द्धसों अधर समानी ॥ ताहि वचनको पारस नामा । होय संयोग उठ जब कामा ॥ बाई और ते देहि जगाई । उमगे काम चले मनताई ॥ चले बिन्दु तीन मुख धाई । उरधहुते अधर जब आई ॥ ऋतुबसन्त जा दिन होई । स्वाती पवन पड़े पुनि सोई ॥ ऋतुबसन्त त्रियतन आवे । खुले कमल तब चाह जनावे ॥ शिव शक्ति सो मिलि है आई । स्वाती बुन्द शक्ति तब पाई ॥ तौन पवन बिन्दु गहि लेही । ताते बांझ होय नहिं तेही ॥ उत्पति पवन कही हम सोइ । स्वाती पवनले सम्पुट होई ॥

साखी—जाहि पवन पर चंदा रसे, ताहि न आसे काल । को यह भेद विचारि है, सोइ जौहरी लाल ॥

चौपाई

धर्मदास तोहि कहूँ बिचारा । सूझि पड़े सो भेदन्यारा ॥

संतोषबोध

( १६९ )

स्वाती पवन छुवन नहीं पावे । बिन्दु अकेला जो उठि धावे ॥ ताते शून्य होय पुनि जाई । कहूँ भेद चित्तराखु समाई ॥ पवन भेद हम तुमसो कहेऊ । नाम न्यारा इन्ते रहेऊ ॥

साखी-पवन भेद हम भाखेऊ, तामैं कालपसार ।

पचासी पवनके बाहिरे, अरज शब्द है सार ॥

धर्मदास उवाच-चौपाई

पवन भेद सतगुरु हम जाना । अब कछु कहिये नाम बखाना ॥ निःअक्षरका कहो प्रकाशा । है भीतर कि बाहर बासा ॥ कैसे हंसा लोक समाई । कौन बस्तु जो होय सहाई ॥ कैप्रमान बस्तु जो होई । साहेब मोहि कहो तुम सोई ॥

सद्गुरु उवाच

धर्मदास मैं भेद बताऊँ । संशय तेरो सबहि मिटाऊँ ॥ बावन अक्षर मय संसारा । निःअक्षरसो लोक पसारा ॥ सोइ नाम है अक्षर निवासा । कायाते बाहर प्रकाशा ॥ नाम भेद मैं तुमसे कहेऊ । धर्मदास तुम निजकर ठहेऊ ॥ तौन नाम मुनि हंसा पावे । कहै कबीर सो लोक सिधावे ॥

साखी-धरनि अकाशके बाहिरे; योजन आठ परमान ।

तहां क्षत्रतन राखेऊ हंसा करे विश्राम ॥

चौपाई

विन सतगुरु कोई भेद न पाई । धर्मदास मैं तोहि लखाई ॥ राई भर है वस्तु हमारी । अर्धराय स्थूल सवाँरी ॥ लहर लहर बादलमें होई । पुरुष मूल निज जानो सोई ॥ उनको सौप दीन शिर भारा । वै जीवनको करै उबारा ॥ भाषू शब्द प्रथमहैं राई । फूटि अकाश घोर होय जाई ॥ वाहिवक्त जो तजै शरीरा । आवै लोक अस कहै कबीरा ॥

( १७० )

बोधसागर

सत्तलोक अधर है धामा । तहवों पुरुष अजर है नामा ॥ तौन नामले हंस उड़ाना । पहुचै हंसलोक अस्थाना ॥ तहाँ गये जिवकाल न पावे । योनि संकट बहुरि न आवे ॥

सारखी--सबे भेद हम भाषेऊ, कहा शब्द टकसार । धर्मदास प्रतीति करि, सुमिरहु नाम हमार ॥

धर्मदास उवाच-चौपाई

कहेउ शब्द मोर मन माना । अब प्रभु कहिये सुरति ठिकाना ॥ कहो सुरतिकी उत्पति भयेऊ । कहो निरति दूसर निर्मयऊ ॥ कौन सरूप सुरतिको जानी । कैसे निरति दूसरी ठानी ॥ कैसेके घट आनि समानी । सो समरथ मोहि कहो बखानी ॥ सुरति निरति संगति किमि भयऊ । कैसे समझ हृदयमें लहेऊ ॥

सारखी-सुरति निरतिकी उत्पति, सब कहि भाषहु मोहि ॥ दोनों कैसे देखिये, पूछतहौं गुरु तोहि ॥

सदगुरु वचन चौपाई

धर्मदास मैं कहूं वखानी । भाखं सुरति निरति उत्पानी ॥ मूल नाभि ते शब्द उचारा । फूढीनाल भई दुइ धारा ॥ स्वाती पवन अधरते आई । सुरति निरति संगति मिलि धाई ॥ सुरति निरति यों उत्पति होई । ताको भेद लखे जन कोई ॥ सुरति निरतकी सुधि ना पाई । सो नर पशु पक्षी है भाई ॥ मूरख सो मोहरति है गयऊ । शब्द बांधि जिन सुरति ना गहेऊ ॥ तेहि शब्दका करो विचारा । सुरति निरतिले शब्द संभारा ॥

सारखी-अंकुर नाम वह शब्द है, कीना सकल पसार ॥ कहे कबीर धर्मदास सों गहो शब्द टकसार ॥

चौपाई

गहै शब्द सो लोक सिधाई । बिना शब्द पशु पक्षी भाई ॥

संतोषबोध

( १७१ )

बिना शब्द जैसे घट अंधियारा । धरि धरि काल करै अहारा ॥ शब्द सुरति निरति यक ठौरा । कहै पुरुष तहां मोहि निहोरा ॥ अगम तत्त्व गहि मथै शरीरा । निरति नाम भये सत्कबीरा ॥ निरति धरे शब्दकी आशा । सुरति नाम तुम गहु धर्मदासा ॥ सुरति निरतिसे बांधे नेहा । पावै नाम होय हंस विदेहा ॥ कथि ज्ञान भाषेउ टकसारा । धर्मदास तुम करो विचारा ॥ हम तुम कीना सकल पसारा । लोक न जाने मूठ गँवारा ॥ मथुरा बैठिके ज्ञान सुनाई । धर्मदाम गहे सतगुरु पाई ॥ पूरण ज्ञान तुम मोहि सुनावा । संसय सबही दूर बहाया ॥

साखी-गुरु समाना शिष्यमें, शिष्य लिया कर नेह । विलगाये विलगे नहीं, एक प्राण दुइ देह ॥

इति श्रीग्रन्थसंतोषबोध समाप्त


A black and white line drawing of a vase filled with flowers and leaves, centered on the page. The vase is cylindrical with vertical lines, and the flowers are clustered at the top with long, pointed leaves. The drawing is framed by a decorative border consisting of repeating scrollwork patterns along the edges of the page.

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, कर्णामय, कबीर, सुरतियोग संतान, धनी, धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया- वंश व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

पञ्चविंशतिस्तरंगः

अथ काया पांजी प्रारम्भ

धर्मदास उवाच-चौपाई

धर्मदास जब विनती कीना । कायापांजी पूँछ सो लीना ॥ धर्मदास पूछे चित लाई । कायापांजी कहो अर्थाई ॥ काया पांजी कहो विचारी । जहाँ होय तत्त्व करै पैठारी ॥ काया पांजीका करौ बखाना । जहवाँ सुरतिका सदा ठिकाना ॥ कायापांजी निजकर पाऊँ । सुरति शब्दमें जाय समाऊँ ॥

( १७४ )

बोधसागर

कायापांजी कर कहो विशेषा । मैं अपने घट कहूं विवेक्षा ॥ करि विवेक तहैं सुरति लगाऊँ । पांजी द्वार घाट मैं पाऊँ ॥ सुरति लगाय रहूँ मैं तहैंवां । सार शब्द मूल है जहैंवां ॥ करि विवेक तहां सुरति पठाऊँ । पांजां द्वार घाट मैं पाऊँ ॥ पावो घाट सुरतिके द्वारा । तो मैं सुरति करो पैठारा ॥ बिना घाट कहाँ जाऊँ भाई । बिन जाने कहैं रहूँ समाई ॥ बिन जाने जाऊँ केहि घाटा । कैसे पाऊँ शब्द के बाटा ॥ बिन जाने शब्दकरि घाटा । शब्द अगम अगम है बाटा ॥ शब्दके अंग अगम है भाई । बिन जाने सब गये नसाई ॥ पाऊँ द्वार शब्दका टीका । अवर सकल जग लागे फीका ॥ अगम शब्द कहो अर्थार्थ । बिन पाये शब्द गह्यो न जाई ॥ मूल शब्द जहैं होय उचारा । सो पाऊँ सुमेरु चढ़ि द्वारा ॥ भाषो द्वार सुमेरु बखानी । कहवांते सुमेरु पुनि जानी ॥ कहवांते अकाशका लेखा । सो मोहि साहेब कहो विवेक्षा ॥

साखी-धर्मदास बिनती करे, घाट घाट कहो समझाय ।

तहां मैं सुरति लगाइके, शब्दमें रहूँ समय ॥

सद्गुरु उवाच-चौपाई

धर्मदास मैं भेद बताऊँ । सुरति शब्दका द्वार चिन्हाऊँ ॥ चन्द्रलगनका कहूँ विचारा । तहवां सुरति करो बैठारा ॥ चन्द्रद्वार होय आवो जाई । यही घाट मैं रहो समाई ॥ दोउस्वर साधि करो यक घाटा । चन्द्रद्वार होय पावो बाटा ॥

धर्मदास उवाच

कौन घाट चन्द्र है भाई । कौन घाट सूर्य पै आई ॥

१ विवेक्षा-विवेक-विचार

कायापांजी

( १७५ )

सदगुरु उवाच

दहिने घाट चन्द्रका वासा । बाँवें सूर करै प्रकाशा ॥ यही दोउ स्वर साधो भाई । चन्द्रद्वार होय निकसो आई ॥ अगम पंथ दहिने स्वर करहु । सुरती संयोगनाल चित धरहु ॥ चन्द्रद्वार होय आओ जाइ । शब्द सुरतिमें रहो समाई ॥ स्वर दाहिने सुरति चढ़ाओ । तबही डोर शब्दकी पायो ॥ शब्द डोर दहिने दिशि जाई । धर्मदास तुम गहो बनाई ॥ पाओ डोर शब्दको भाई । अगम पंथ चढ़ि बैठो जाई ॥ गहो बनाइ कटै यम पासी । पहुँचो लोक मिटै चौरासी ॥ स्वर दाहिने होय करे पयाना । तब सोहं सुरतिहोय अगु आना ॥

सार्वी--कहैं कबीर धर्मदाससे, ऐसा साधो घाट । आगे भेद बताऊं, तहं देखो लिजवाट ॥

चौपाई

अहो धर्मदास मैं भेद बताऊं । शब्दहि सुरतिका द्वार चिह्नाऊं ॥ भाष्यो शब्द सुरतिका पासा । सो मैं तुमसे कहों प्रकाशा ॥ कहूँ तत्त्व तहैं करो जो बासा । मथो तत्त्व तुम धर्मदासा ॥ मथो तत्त्व सुरति सो भाई । पुनि आगेको देहु रंगाई ॥ तत्त्व मथो तुम अंश हमारा । तत्त्वसे उतरो भवजल पारा ॥

धर्मदास उवाच

कह्यो तत्त्व तुम मथो बनाई । ज्ञानी तुमहि कहो समझाई ॥ कहवा आहि तत्त्व को बासा । सो ज्ञानी मोहि कहो प्रकाशा ॥

सतगुरु बचन

दहिनस्वर साधि चढ़ो आकाशा । त्रिकुटी मध्य तत्त्वका वासा ॥ त्रिकुटीमध्य तत्त्व जो रहाई । तहाँ सुरति सो देखो जाई ॥ त्रिकुटी मध्य तत्त्वको थाना तेहि मथि आगे देहु पयाना ॥

( १७६ )

बोधसागर

सुरति डोरी चलै बरजहेरा । मथिके तत्त्व कपाट उघेरा ॥ तेहि आगे सुमेरु बखानी । बरनो द्वार स्वरूप खानी ॥ वाहि द्वार होय सुरति चढ़ाओ। आगे अगम भेद पुनि पाओ ॥ त्रिकुटी आगे सुमेरु ठेकाना । तापर जुब्बा अकाश विधाना ॥ आंगुलचारी अकाश परमानो । धर्मदास तुम निजकर जानो ॥

धर्मदास वचन

अब अकाशका भाखों राहा । हम अजानका जानों थाहा ॥

सद्गुरु वचन

अब अकाशका भाखूं लेखा । सुरतिकमल तहैं निजकर देखा ॥ बांये धर्मराय अस्थाना । दहिने सुरति द्वार ठिकाना ॥ सुरति कमल सुमेरुके आगे । बिहैगम डोर तहाँसे लागे ॥ सुरति कमलके रूप बखानो । एक चन्द्र आभा अनुमानो ॥ वाहि कमलमें झलकै चंदा । सुरति चढ़ाय तुम करो आनन्ददा ॥ तहवां डोर शब्दकी भाई । सुरति संयोग चढ़ि देखो जाई ॥ सुरति नाल है बड़ बरियारा । मध्य लिलाट धर्म रखवारा ॥ शब्द काहे न करहु विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥ दहिने सुरति कमल कहैं पावा । तेहि आगे पुनि ध्यान लगावा ॥ तेहिदिगसुरतिकमलको लेखा । सुरति तत्त्व नैन बिन देखा ॥ ताकर भेद मैं देऊँ बताई । सुइ परमाण द्वार निरमाई ॥ धर्मदास मैं कहूँ पुकारी । तिल परमाण तहैं खुलै केवारी ॥ तेहि केवार दोय है घाटा । चढ़े सुरति तब पावो बाटा ॥ सोहैं सुरतिले चढो संभारी । तिल परमाण खुलै केवारी ॥ नासिकानाल सुरति जो ध्यावे । खोली केवारी तब बाहर आवे ॥ पशुरी सुरति कमलको जानी । तासे सुरति करो पहिचानी ॥

साखी-सतगुरु भेद बतावई, तब पावे यह द्वार । कहैं कबीर धर्मदाससो, निश्चय वचन हमार ॥

कायापांजी

( १७७ )

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास चरनन चितलावा । अगमागम तुम मोहि बुलावा ॥ आगे गम्य मोहि देहु लखाई । अब मैं गहों सुरति बनाई ॥ यह तो ठीक चिन्हैउ मैं भाई । तुम परताप गम्य हम पाई ॥ अब आगेकर कहो बखाना । जहाँ मूलशब्दका पावों ध्याना ॥ जेहिते शब्दमें जाय समाई । तवन गम्य मोहि देहु लखाई ॥ भाषो मूल जाओ बलिहारी । मूलशब्द पुनि गहों सम्हारी ॥ सुरति कमल गम तुम भाखो । सुरति सम्हार अपने चितराखो ॥ सुरति कमल सुनब मैं साहेब । विहंगम डोरि गही चितलायब ॥ अब आगेका भाषो राहा । हम अजान का जानो थाहा ॥ तुम्हरे जनाय हम जानब भाई । तुम जानो सो करो बनाई ॥

साखी-समरत्थ आगे भाषो, मैकहू सुरति सम्हार । सकल पसारा मेटिके, उत्तह भवजल पार ॥ सतगुरु तब दया भई, पावों पद निर्वान । आगे गम्य बतावहु, सतगुरु वचन परमान ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

सुरति कमलके आगे भाखों । तुमसे गोप कछू नहीं राखों ॥ सुरति कमलहोय निकसो भाई । विहंगम डोरि गहो चितलाई ॥ विहंगम डोर दहिने दिशि जाई । तुमसों भेद कहौ समझाई ॥ सुरति कमलके कहों ठिकाना । आगे है योजन परमाना ॥ अक्षय वृक्ष तहाँ लागा भाई । दवना मरुआ बरनि न जाई ॥ बेलि चमेली बास सुबासा । बास सुबास किया प्रकाशा ॥

साखी-दवना मरुआ गुलाब है, गुलाब चमेली बास । तहवां अक्षय वृक्ष है, वरणों वास सुबास ॥

( १७८ )

बोधसागर

चौपाई

अक्षय वृक्षके बरणों अंगा । श्वेत स्वरूप तहां देखो रंगा ॥ श्वेत स्वरूप तहां देखो भाई । ऐसा भेद अगम अर्थार्ई ॥ ऐसा अलख लखे जो कोई । जरा मरण रहित सो होई ॥ विहंगम डोरि तहाँते आई । अकल कलामें जाइ समाई ॥ श्रवण ऊपरका कहां ठिकाना । झींगुर शब्द करै घमसाना ॥ दहिने स्वरपर ताकर ठाऊं । यही निजभेद मैं तुम्हें बताऊं ॥ अर्ध कमल उर्धमुख रहई । तहवां मूल शब्द उच्चरई ॥ धर्मदास तुम करहु संभारा । अकल कलामें शब्द उचारा ॥ ताकी सुरति धर्मनि तुम धरहूँ । होय धर्मनि यहि शब्दे गहहूँ ॥ तौन शब्द मैं दीन बताई । उहै डोरीले आगे जाई ॥ सबै दिशि लागी है ताही । यहि डोरी गहि मिलहूँ वाही ॥ बिहंगम डोरी शब्दमें लागी । झींगुर शब्द ऊबे धन जागी ॥ अकल कमल है श्वेत स्वरूपा । ताहि जोतिका कहां निरूपा ॥ अकल कमलका भाषों लेखा । छत्तीस पंखुरी ताहि हम देखा ॥ झलके मोति वरणि नहि जाई । चहुँ दिशि ज्योति चमके आई ॥ छत्तीस पंखुरीका विस्तारा । आप आप मुख राग उचारा ॥ तेहि भीतरका कहां हवाला । आभा उठि तहां चमके लाला ॥ होय उजियार दीपकके टेमा । पावो जाय सुरतिके प्रेमा ॥ आभा उठे सो वरणि न जाई । तुमकहं दीन अलख लखाई ॥ भीतर कमल होय उजियारा । तहां मूलशब्द करै झनकारा ॥ उमगै मोती लाल अरु हीरा । तहवां बैठे सत् कबीरा ॥ मोती झालर ऊपर छाजे । भीतर शब्द जो मूल विराजे ॥ अक्षय कमल जहँ तार ठिकाना । गुह्यकमल जहाँ होय निदाना ॥ तेहि आभा वरणि न जाई । साठ भानुकी ज्योति छपाई ॥

कायापांजी

( १७९ )

अस उजियार तेहि कमलमें होई। ताका मरम न जाने कोई ॥ अरिष्ट कमल है भेद निनारा। देखों जाई सकल उजियारा ॥ वोहि ठेकान सुरति करू ध्याना। तहां गुप्त होय जाय समाना ॥ एह समान जो बैठे जाई। हो धर्मनि तोहि देउ लखाई ॥ अकह कमल तहां प्रकाशा। ताहि सँहै निःअक्षरका वासा ॥ दुइ कमल मुखही मुख जोरा। तेहिमा शब्द करै घनचोरा ॥ गुप्त नाम गुञ्जार तहाँ देख्यो। मूलशब्दकी जड़ पेख्यो ॥ गुंजार अकह कमलमें आवे। मूलशब्द झंकार सुनावे ॥ मोतीवरण होय उजियाग। फूही छूटे अगरकी धारा ॥ छूटत अगर धार तहाँ भारी। सभै बिलोय मैं कहों विचारी ॥ सुरति संजोय तहाँ पिवै अघाई। जाते तप्त दूर होय भाई ॥ अकह कमलमें करो पैठारा। पीबो जाय अगरकी धारा ॥ झमकत अगर तहां निज मूला। उनसम तुल्य नहीं कोइ तूला ॥ यहि निज जपु अजपा जापा। पहुँचो लोक मिटै संतापा ॥ बरषे तहां अगरकी धारा। सुरतिनाल तहां करो अहारा ॥ जीवतही तहां रहो समाई। यह निज दीन्हों वस्तु लखाई ॥

साखी—कहै कबीर धर्मदाससे, यही वस्तु निजसार ।

यही वस्तु जो जानिये, उतरे भवजल पार ॥

इति श्रीग्रन्थ कायापांजी सम्पूर्ण

A decorative border with a repeating scrollwork pattern surrounds the central illustration. The illustration depicts a potted plant with dense foliage and several flowers, possibly tulips, in a dark, textured pot.

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरतियोग संतान, धनी, धर्मदास, चूशामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया- वंश व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

पद्मविंशतिस्तरंगः

अथ पद्म मुद्रा प्रारम्भ

सुक्ति वचन

सुक्ति कहें सुनो गुरुज्ञानी । आगम भेद तुम कहौ बखानी ॥ सकल सृष्टिकी उत्पति भाखौ । मोसों गाय कछु निज राखौ ॥ ब्रह्म जीव कैसे उत्पानी । सोई भेद गुरु कहो बखानी ॥ सुक्त भेद गुरु देहु बताई । जाते हंसा लोक सिधाई ॥

( १८२ )

बोधसागर

योगजीत वचन

योगजीत तब बोलैं बानी । सुकित सुनौ आदि सहिदानी ॥ जाके मर्म ना जाने कोई । तुमसों भाष कहां मैं सोई ॥ उतपतको सब भेद बताऊँ । अगम निगम सब तुम्हे लखाऊँ ॥

साखी-ज्ञान पंचसुद्रा कहों, मूलज्ञान को सार ।

ऋषि मुनि देवनको मता, ताते अगम अपार ॥

चौपाई

प्रथमहि सुद्रा खेचरी कहिये । सो स्थान गगनमो लहिये ॥ धूप बरण तहां लखो प्रकाशा । चेतन ब्रह्मको तामैं वाशा ॥ तत्त्वमाहे विचित्र है सोई । कामधेनु तहां कहिये जोई ॥ पुढुप प्रकाश तहां बिजुली देखा । झिलमिल जोत तारागण देखा ॥ रक्तवर्ण तहां सूर्य लखाई । प्रथम आकाशको भेद बताई ॥ साचरीसुद्रा नासिका अस्थाना । उतंग बिंदको है तहां ध्याना ॥ तहां नाकाश गगन है वासा । बिजुली रूपरेख प्रकाशा ॥ मणिगण रतन मुक्तामणि हीरा । सोहंग रूप पवन तहां धीरा ॥ नासा अग्र करै तहाँ मेला । पवन सिन्धुमें दीजे हेला ॥ तासों हंस लीन होय जाई । निःअक्षरसो जाय समाई ॥ चाचरी सुद्रा दियो बताई । ताको भेद कहौ समुझाई ॥ भोचरीको स्थान लखाऊँ । रकाश गगनको भेद बताऊँ ॥ मन बुद्ध चित तहाँ होत हुलासा । तहां योग कीजे प्रकाशा ॥ चित्चेतन तहाँ झिलमिल देखा । नील वरण पवनकी रेखा ॥ तहवां कोट सूर्यको तेजू । झीन महलमों सुखमन सेजू ॥ तहां गगनमो होत अनन्दा । तहां उदित है पूरण चन्दा ॥ तामो अलख ब्रह्मको कहिये । जासों भेद मुक्तको लहिये ॥ तेहिसों ध्यान लगावै कोई । अमी बुन्द तहां चाखै सोई ॥

पञ्चमुद्रा

( १८३ )

अगोचरीको अब कहो निवासा । तासों कीजे योग प्रकाशा ॥ सुर्तनदी तहां उठे तरङ्गा । झालर भेरी शंख मृदंगा ॥ किकिन चिचिन किगरी बैना । गरजनशान धुनधुन सुवसेना ॥ शून्य महलमों बैठे जाई । दशोंद्वार तब वन्द कराई ॥ यह विध ध्यान गगनमों करई । सत्तर बाजा तब सुनु परई ॥ अनहद नाद सुने जो प्राणी । उपजे महासुखके खानी ॥ सतगुरु कहै सांच सोई योगी । तहां मरण मगन रमावत भोगी ॥ अगोचरी मुद्रा कहा प्रकाशा । ताको योग युक्तकी आशा ॥ उनमुनि मुद्रा महद अकाशा । अलखपुर्ष तहां कीन्हों वासा ॥ ब्रह्मप्रकाश तहांअण्ड न पिण्डा । लोकालोक नहीं ब्रह्मण्डा ॥ ब्रण अब्रण जात नहीं पाती । नहींतहां दिवस नहीं तहांराती ॥ तामों सरवर गहिर गँभीरा । जाके आदि अन्त नहीं तीरा ॥ ज्ञानी योगी जप तहां लागा । भयोअनन्द सकलो भ्रम भागा ॥ तामो लीन रहै जो कोई । गुप्त मनोरथ पावै सोई ॥ योग जीत कहो भेद अपारा । बिरला साधू करे विचारा ॥ खेचरी चाचरी भोचरी जानी । अगोचरा उनमुनिकही बखानी ॥ उनमुनि लागी योगपर निद्रा । सुख समाजजहांपरम अनन्दा ॥ यह प्रकाश उनमुनिमों कहिये । कछुक भेद पुनि तामों लहिये ॥ पञ्च मुद्रा और पञ्च अकाशा । पंच ध्यान और पञ्च प्रकाशा ॥ पञ्च वर्ण और पञ्च हैं वेदा । पञ्च तत्त्वके पञ्च हैं भेदा ॥ पञ्च मन्दिर औ पञ्च हैं द्वारा । पञ्च रूप औ पञ्च अहारा ॥ पञ्च इन्द्री औ पञ्च हैं स्वादा । पञ्च विद्या औ पञ्च हैं नादा ॥ पञ्च हैं आसन पञ्च हैं योगी । पञ्च मंदिर औ पञ्च हैं भोगी ॥ पञ्च सत्त औ पञ्च हैं सीउ । पञ्च कर्म औ पञ्च हैं जीउ ॥ पञ्च पृथ्वी औ पञ्च हैं नीरा । पञ्च तेज औ पञ्च समीरा ॥

( १८४ )

बोधसागर

पञ्च लिंग औ पञ्च हैं पूजा । पञ्च एक पञ्च है दूजा ॥ पांचों आवें पांचों जाई । पांचों मरें पांचोंको खाई ॥ पांचों सुक्षिम औ पांच अस्थूला । पांच डार औ पांच हैं मूला ॥ पांच पाप औ पांच हैं पुत्रा । पांच बस्ती और पांच हैं सुत्रा ॥ पांच पांच पांचों सब भवा । पांच स्वामी और पांच हैं सेवा ॥ पंच गुरु और पंच हैं चेला । पांच भाव और पांच हैं मेला ॥ पञ्च मुद्राका कहों बिचारा । ताको योगी करे सम्हारा ॥ चार छोड़ पांचो करे बासा । ताते पांचका कहो प्रकाशा ॥ पांचों मुद्रा उनमुनि कहिये । तासों भेद सुत्तिको लहिये ॥ ब्रह्म प्रकाश तहाँ पूरन चन्दा । रैन दिवस नहि सहज अनन्दा ॥ दुतिया भाव तहाँ नहि काया । तहवां नहीं धूप और छाया ॥ हम तुम कर्म भ्रम नहि दोई । तहां सिलान ब्रह्म सो होई ॥ सहज शून्यको लखे जो भेवा । आप ही कर्ता आप ही देवा ॥ प्रथमही आपुपुर्ष विस्तारा । तहांते भयो ब्रह्म आकारा ॥ आकारते अहंकार उपजाई । ताते बहु विस्तार बनाई ॥ सोहं स्वासा पुर्ष उचारा । तहांते भौ अक्षर ओंकारा ॥ पांच ब्रह्मकी उत्पति भाषों । तुमसों गाय कछू नहीं राखों ॥ अकास ब्रह्मको भास बताऊँ । वायु ब्रह्मको तहवां लाऊँ ॥ पुन है तेज ब्रह्मकी बानी । जलकी बहुरि कहों उत्पानी ॥ फिर पृथ्वीको भास लखाऊँ । प्रथम ब्रह्मको भेद सुनाऊँ ॥ अविगत आदि ब्रह्मको भासा । ताको भेद कहों प्रकाशा ॥ प्रथमें नाम आकाश कहाई । दुतिये गगनाकाश बताई ॥ फिर रकाशको नाम सुनाऊँ । चौथे गगनसकाश लखाऊँ ॥ पांचे महद अकाशकी बानी । पञ्च अकाशमें कहों बखानी ॥ अब सुन कहों पञ्च अस्थाना । सकित तुमसों कहों बखाना ॥

पञ्चसुद्धा

( १८५ )

मुखके अग्र खेचरी बासा । ताको ध्यान जन करे अकाशा ॥ नासा अग्रत्रिकुटी अस्थाना । चाचरी सुद्धा तहाँ बखाना ॥ चक्षु अग्र भोचरी जाना । उर्ध्वअकाशको है तहाँ ध्याना ॥ श्रवन अग्र अगोचरी थाना । सहज शून्यको है तहाँ ध्याना ॥ तिलकपाट उनसुनी कहीजै । महाशून्य ध्यान तहाँ कीजै ॥ प्रथमहि खेचरीक सुद्धा कहिये । धूमवरण रंग तहाँ लहिये ॥ पीतवर्ण तहाँ देखे जाई । अकह रूप तहाँ रहो समाई ॥ औरौ वर्ण रक्त लख आई । कामधेनु तहाँ देखो गार्ई ॥ करुणवृक्षकी तहवों छाया । नहीं तहाँ काल नहीं तहाँ काया ॥ तहाँ समाध लगावे जाई । अमी बुंद तहाँ चाखे भाई ॥ ताकर पीवत अमर होइ जाई । सोई भेदमें वरण सुनाई ॥ द्वितिये चाचरि सुद्धा बखानी । नासा ध्यान तासको जानी ॥ तहाँ उत्तंग ब्रह्मको देखा । हंस रूप तहवों पुन पेखा ॥ मणिगण रतन विन्दको बासा । कर्तारूप पुरुष प्रकाशा ॥ जगमग ज्योति देखिये तहिया । बिन शशि सूर उजैरो जहिया ॥ चहुँदिश दामिनि दमके आई । चन्द्र सूर तामों छपजाई ॥ इतना रूप चाचरी जानी । ताको भेद कहीं प्रवानी ॥ त्रितिये भोचारी सुद्धा कहिये । अष्ट अंग पुन तामों लहिये ॥ मन बुध चित अहंकारन माया । ममता काम हर्षकी छाया ॥ तेज पुञ्ज तहाँ झिलमिल देखा । सूक्ष्म अस्थान तहाँ पुन पेखा ॥ चित चेतन्य तहाँ पुन दोई । तामों मिले परमपद सोई ॥ भोचरी सुद्धा कहि समझाई । ताको मर्म कोइ ज्ञानी पाई ॥ चौथे अगोचरी सुद्धा जाहीं । महाशब्द धुन उपजे ताहीं ॥ नाना ताल बैन मृदंगा । यंत्र ढोल सहनाई अंगा ॥ राबाब किंकिन झालरी बाजा । नभेरी चिंचिन शंखधुन गाजा ॥

( १८६ )

बोधसागर

मेघनाद गजनीं तहां कहिये । शंख शब्द धुन तामों लहिये ॥ बाजा सुने सूष्य तव होई । काम क्रोध मद सब गहि खोई ॥ लोभ मोह तज पावे सोई । प्रवर्त छोड़ निरवर्त जो होई तमो सतो रजो गुण विसरावै । आगे रूप दर्श तब पावै ॥ अगोचरीको अब कहेउ उपाई । योगी कर्म महा सच पाई ॥ पांचे मुद्रा उनमुनि जानी । ताकर भेद अब कहीं बखानी ॥ उनमुनि देश लखे जब जाई । अमर वस्तु तब भाषे आई ॥ ब्रह्म अखण्ड देखिये जाई । ब्रह्मरूप तब भाषे आई ॥ श्वेत पीत श्याम नहीं सोई । अरुण सजुजतें न्यारा होई ॥ रूप सरूप हृद वेहद नहीं । चारो बानि खानि नहीं ताहीं ॥ ब्रण अब्रण काया नहीं माया । युग बैदनकी तहाँ न छाया ॥ षटदर्शन पाखंड ना तहाँ । बावन अक्षर अकार न जहाँ ॥ नौ षट चार अष्टदश नहीं । पांचो तत्त्व धाम नहीं ताहीं ॥ मन बुध चित अहंकार नावासा । काल कर्मको नहीं प्रकाशा ॥ तहाँ ध्यानधर तारी लावै । सोई मूल परम पद पावै ॥ उनमुनि सिरवर बहुर चढ़जाई । जहाँकी गम्य देव नहीं पाई ॥ नहीं तहाँ काल नहीं तहँ काया । नहीं तहाँ प्रमत्ता मोहन माया ॥ चन्द्र सूर तारागण नहीं । दिवस रैन तहाँ धूप न छाहीं ॥ पिंड ब्रह्मांडको तहाँ न लेखा । केवल पारब्रह्म तहाँ देखा ॥ अलखरूप तहाँ अबिगत सोई । सबके परे ध्यान वह होई ॥ तासों ध्यान लगावे प्राणी । असी चारके छूटे खाणी ॥ अब वेदनको बास बताऊँ । ताको भेद अब वर्ण सुनाऊँ ॥ जिह्वा अग्र ऋग्वेदको वासा । नासा अग्र यजुर प्रकाशा ॥ श्रवण अग्र शाम सुति कहिये । चक्षु अग्र अथरवण लहिये ॥ शून्य अग्र सोहंग प्रकाशा । तहवों सुसमे वेद को बासा ॥

पञ्चमुद्रा

( १८७ )

वेदनके अस्थान बताई । अब इंद्रिनके स्वाद लखाई ॥ लिंग इंद्री कामिन सो नेही । जिह्वा षट् श्वाद तो लेही ॥ नासा गंध सुगंध अघाई । चक्षु इंद्री रूप लोभाई ॥ श्रवण स्वाद मधुर धुन बानी । ये पांचोंके स्वाद बखानी ॥ पृथी अस्थूल ऋग्वेदकी बानी । नीर अस्थूल जजुर पहिचानी ॥ वायु अस्थूल साम सुतिं कहिये । तेज अस्थूल अथरवण लहिये ॥ अनहद अस्थूल सोहंगकी बानी । सुसम देवताको पहिचानी ॥ खोजे ताहि मुक्त तब होई । सुसम वेद सम और न कोई ॥ वेद अस्थूल कहा समझाई । आसन योगी भेद बताई ॥ पृथ्वीरूप जहाँ आसन जाना । जीवरूप योगी पहिचाना ॥ पानीरूप जहाँ आसन कहिये । हंसरूप योगी तहाँ लहिये ॥ तेजरूप जहाँ आसन जानी । चेतनरूप योगी पहिचानी ॥ बांयेरूप है आसन जहिया । निराकार योगी है तहिया ॥ आकाश रूप आसन प्रवाना । निरंजन योगी जहाँ बखाना ॥ आवागम अब भेद बताई । तुमसो सुकृत नाहिं डुराई ॥ जीव पृथी मिल आवे जाई । मिल पृथी पुनि बहुरि सिधाई ॥ हंस रूप जल मिलके आवै । बहुर नीर मिल घरहि सिधावै ॥ चैतन तेज मिल आवै सोई । बहुर तेज मिल तहाँ सगोई ॥ निरालंब बाये मिलि आवै । बहुर बाये मिल गृहे समावै ॥ निरञ्जन मिल आकाशको आवै । बहुर गगन मिल उलट समावै ॥ आवागम मैं दीन बताई । जन पहुँचनको भेद लखाई ॥ प्रथम पृथीको जल उपजावै । सो जल बहुर पृथीको खादे ॥ जलकी उत्पत्त तेज सो होई । भक्षे तेज पुन जलको सोई ॥ तेजको बाये रूप उपजावै । उलट वाये पुन ताको खावै ॥ बाँये रूप अकाश उपजाई । फिर अकाश पुन ताको खाई ॥ आकाश शून्यते उत्पत्त जानौ । बहुरि शून्यमें जाय समानौ ॥