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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

स्वसमवेदबोध

( १२७ )

महाराज दाया चित दीजै । भूपति भौन गौन अब कीजै ॥ करुणामय स्वामी कह ताहीं । हम नहिं भूपतिके गृह जाहीं ॥ राज काज है मान बड़ाई । हमैं साय ना नृप घर जाई ॥ पुनि वृषली रानी ढिग आवो । साधु न आवै मोर बोलावो ॥ यह सुनि इंद्रमती उठि धाई । करुणामयके पद शिर नाई ॥ मोपर दाया कीजै नाथा । मो गृह चलिये करो सनाथा ॥ रानीकी लखि प्रीति अपारा । करुणामय तिहि भौन सिधारा ॥ ताके भौन जबहि पग दीनो । चरण धोय चरनोदक लीनो ॥ रानी चरनामृत करि पाना । बहुतभांति कीने सनमाना ॥ कीन सेव भल हिय हर्षाई । पीछे ज्ञान मुननको आई ॥ सुनि गुरुज्ञान प्रीति अति बाढ़ी । चरनन लागि प्रेममें गाढ़ी ॥ नाथ मोहि गुरुदीक्षा दीजै । अपनी शरन माहिं अबलीजै ॥ रानीको गुरुदीक्षा दीना । राजा चंद्रविजय नहिं लीना ॥ रानीको निज लोक पठाया । सो सतगुरुसे विनय सुनाया ॥ हे प्रभु नृपको करो उबारा । यद्यपि वह नहिं शिष्य तुमारा ॥ भावभक्ति रानीके काजा । सतगुरु कृपा तरो सो राजा ॥ यहिबिधिजिनजिनगृहगुरुज्ञाना । सो सब सत्यलोक कर थाना ॥ हंसनको सतलोक ले जाई । तहाँ आप कछु काल वितार्ई ॥

इति द्वापर युग

अथ कलियुगमें करुणामय स्वामीको पृथ्वीमें आगमन कथा

और सत्य कबीर और सेयद अहमद कबीर शेख कबीर

नामधारण और जग जीव तारण--चौपाई

द्वापर जगको अंत जो पाया । पुरुष बचन तब टेरि सुनाया ॥ ज्ञानी बेगि जाहु मर्त्य लोक । नाश करो जीवनको शोका ॥ सत्य पुरुषको करो प्रणामा । तब ज्ञानी पहुँचे नर धामा ॥

( १२८ )

बोधसागर

प्रथमहि मृत्युलोक जब आये । कलियुग नाम कबीर कहाये ॥ हिंदू मुसलमान गुरुपीरा । मिश्रित नाम कहाव कबीरा ॥ प्रथमहि प्रकट भये चलि काशी । तहाँ आपनो ज्ञान प्रकाशी ॥ नग्रमें जबहिं धरे निज पाई । श्वपच सुदर्शन तहाँ रहाई ॥ ताने सतगुरुको पहिचाना । चरनन लागि गह्यो दृढ़ ज्ञाना ॥ जब सतगुरुकी दीक्षा पाई । करे भक्ति सो मन चित लाई ॥ श्वपच करे भक्ती मन लाई । मात पिता देखै हर्षाई ॥ भक्ति पुत्र लखि हरषित होई । सतगुरु दीक्षा लियो न दोई ॥ ताही काल कृष्ण औतारा । अरु कौरौ पांडव तन धारा ॥ सत्य कबीर कृष्णसंवादा । ज्ञानगुष्टि तहैं बहु कथि बादा ॥ कृष्णहि बहु विधि ज्ञान दृढाई । क्षर अक्षरके पार लखाई ॥ सत्य कबीर ज्ञान गंभीरा । कथे सकल सुर नर मुनितीरा ॥ ताही समय युधिष्ठिर राजा । ताने कीन यज्ञको साजा ॥ वंधु मारि अपकीरति कीना । ताते यज्ञ रचन चित दीना ॥ कृष्णकेरि जब आज्ञा पाई । तब पांडौ सब साज मँगाई ॥ यज्ञ कि सामित्री गहि सारी । जहैं तहैंते सब साधु हँकारी ॥ पांडौ प्रति बोले यदुपाला । पूरन यज्ञ जान तिहि काला ॥ घंट अकास बजत सुनि आवो । यज्ञको तब पूरन फल पावो ॥ जुरे तहाँ कोटिन ऋषि राजा । साधू ब्राह्मण सहित समाजा ॥ भोजन विविध प्रकार बनाई । परम प्रीतिसे सबहि जेवाई ॥ भोजन कीन सकल ऋषिराई । बजा न घंट भूप भ्रम आई ॥ पांडौ तबहि कृष्णपहैं गयऊ । मन संशय करि पूछत भयऊ ॥ करिके कृपा कहो यदुराजा । कारन कौन घंट नहि बाजा ॥ सो अस कारण तासु बताई । साधू नहि कोइ भोजन पाई ॥ चक्रत है तब पांडौ कहेऊ । कोटिन साधू भोजन लहेऊ ॥

स्वसमवेदबोध

( १२९ )

अब कहँ साधु पाइये नाथा । तब तिनते बोले यदुनाथा ॥ श्वपच सुदर्शनको ले आवो । आदर मान समेत जँवावो ॥ सोई साधु और नहिं कोई । पूरन यज्ञ जाहिते होई ॥ कृष्णकी जब अस आज्ञा पाई । तब पांडौ ताके ढिग जाई ॥ श्वपच सुदर्शनको ले आई । विनय प्रीतिसे ताहि जँवाई ॥ भूप भौन भोजन कर जबही । बजा अकाशमें घंटा तबही ॥ काल कलुक जब गयौ सिराई । तब देहांत श्वपचको आई ॥ तन तजके तब सो चलि जाई । सतगुरु तिहि निजलोक पठाई ॥ ताही समय कृष्ण तज देही । बोधरूप धारचो तब येही ॥ नाम जो इन्द्रदौन तेहि काला । देश उड़ैसेको महिपाला ॥ तन तजि कृष्ण तहां चलि जाई । इन्द्रदौन कहँ स्वप्न देखाई ॥ स्वप्नमें अस हरि ताहि बताई । मेरो मंदिर देहु उठाई ॥ भूपतिसे जब ऐसे कहेऊ । सो मंदिरकी रचना गहेऊ ॥ रामचंद्र गहि निज दल भीरा । गये जबहि वारिधिके तीरा ॥ बांध्यौ सेत बंध बरियाई । तेहि कारन सागर दुख पाई ॥ जो बलवान अबल दुख देई । बदला अवशि भरैंगे तेई ॥ नीति निरंजनकी यह जाना । स्वसमवेदमें प्रथम बखाना ॥ बदला पूर्व लेन तिहि बारा । छोभित सिन्धु उठा खरधारा ॥ जब रचि मंदिर लाग उठावा । क्रोधवंत सागर तब धावा ॥ छनमें धाय सकल सो बोरे । जगन्नाथको मंदिर तोरे ॥ हारा नृप करि जतन उपाई । हरि मंदिर तहाँ उठै न पाई ॥

सत्यकबीर बचन-चौपाई

मंदिरकी यह दशा बिचारी । बर पूरब मनमाहँ सँभारी ॥ तब हम चले उड़ैसे माहीं । इन्द्रदौन भूपतिके पाहीं ॥ मन्दिर षट परकार बनाई । उदधि नीर तेहि लीन बुडाई ॥ पीछे उदधि तीर हम जाई । जायके चौरा तहाँ बनाई ॥

बो० सा० ९/

( १३० )

बोधसागर

इन्द्रदौनकहँ वचन सुनावो । अहो राव तुम काम लगावो ॥ मण्डप शंक न राखो राजा । इहवों हम आये यहि काजा ॥ जाहु बेगि जनि लावहु बारा । निश्चय मानो वचन हमारा ॥ राजा मण्डप काम लगाई । मण्डप देखि उदधि तब धाई ॥ सागर लहरि उठै बिकरारा । आवै लहरि क्रोध चित धारा ॥ उदधि उमङ्ग क्रोध अति आई । लहरि आनि चौरा नियराई ॥ दरस हमार उदधि तब पाई । अतिभय मान रहा ठहराई ॥

समुद्र वचन

छन्द-रूप धान्यो विप्रको तब उदधि हमपै आइया । चरन गहिके माथ नायो मरम हम नहि पाइया ॥ जगन्नाथके भोर स्वामी ताने हम इत आइया । अपराध मेरो क्षमा कीजै मरम अब हमपाइया ॥ सोरठा-तुम प्रभु दीन दयाल, रघुपति ओल दिवाइये । वचन करो प्रतिपाल, कर जोरे बिनती करो ॥

चौपाई

कीनो गौन लंक रघुवीरा । उदधि बांधि उतरे रन धीरा ॥ जो कोइ करे जोर बरियाई । अलखरूप तिहि ओल दिवाई ॥ मोपर दया करो तुम स्वामी । लेव ओल उर अंतर्धामी ॥

कबीर वचन--चौपाई

ओल तुमार उदधि हम चीन्हा । बोरे नम्र द्वारिका दीना ॥

उदधि वचन

यह सुनि उदधि धरचो तब पाई । चरन टेकि तब चल हरषाई ॥ उदधि लहरि उमँगौ तब धाई । बोरचो नम्र द्वारिका जाई ॥ मंदिर काम पूर तब भयऊ । हरिको थापन तहवों कियऊ ॥

कृष्ण वचन--चौपाई

तब पंडन हरि स्वप्न जनायो । सत्य कबीर मोहिं पै आयो ॥

स्वसमवेदबोध

( १३१ )

आसन सागर तीर बनाईं । दरस कबीर उदधि उठि जाईं॥ यहि विधि मंदिर मोर थपाईं । कलि युगमें एक धाम बसाईं ॥

पंडा वचन--चौपाई

पंडा उदधि तीर तब जाईं । करि असनान मंडपहि जाईं ॥ पंडा मन अस पाखण्ड लाईं । प्रथमहि दरस मलेच्छ देखाईं॥ हरिको दरसन हम नहि पाईं । पहिले हम चौरा गनि आईं ॥ तब हम कौतुक एक बनाईं । पूजन मंडप पंडा जाईं ॥ तहवाँ एक चरित्र रहाईं । लखि पंडा चक्रुत है जाईं ॥ जहँ लगि सूरत मंदिर माहीं । भये कबीर रूप धरि ताहीं ॥ हरि मूरति कहैं पंडा देखा । भये कबीर रूप धरि भेखा ॥ अछत पुष्प लै विप्र भुलाईं । नहिं ठाकुरको पूजन पाईं ॥ देखि चरित्र विप्र शिर नावा । हम स्वामी तुम मर्म न पावा ॥ तुमकहैं देखि हीन मन लाईं । ताते मोहि चरित्र देखाईं ॥ छमा अपराध करो प्रभु मोरे । विनती करौं दोउ कर जोरे ॥

छन्द-बचन एक मैं कह्यौं ताते विप्र सुन तैं कान दे ।

पूज ठाकुर दीन आयसु दुबिधा मनकी छाड़ दे ॥

आंति भोजन करे जो जिव आगहीनो तासुको ।

करे भोजन छूति राखे शीश उलटै जासुको ॥

चौपाई

पंडौ मनमें मान्यौ हीना । ताते यह चरित्र गुरु कीना ॥ जगन्नाथकी छूति उठाईं । बर्न विवेक न तहाँ रहाईं ॥ सबहि जाति हरि भोग लगावैं । यकठे बैठके भोजन पावैं ॥ कछु नहिं छूति रही तिहि ठामा । सर्वजाति यकमय हरिधामा ॥ आचारिनि बहु कीन विचारा । जगन्नाथ है चलै अचारा ॥ तिनको तहैं आचार न चाले । सत्य कबीर वचन को टाले ॥

( १३२ )

बोधसागर

इमि गुरु हरि मंदिर थपवाई । पूरब कथा बहुरि अब आई ॥ श्वपच सुदर्शन तन तजि गयऊ । लोकजाय गुरु बिनती कियऊ ॥ हे सतगुरु अस दाया कीजै । मेरे मातु पिता गति दीजै ॥ श्वपचके मातु पिता जो रहेऊ । पूर्वदेह गुरु ज्ञान न कहेऊ ॥ ताते बहुरि देह सो धारी । द्विजकुलमें प्रकटे नर नारी ॥ पुत्रकि भक्ति प्रतापते सोई । श्वपच देह तजिके द्विज होई ॥ कुलपति नाम पिताको रहेऊ । श्रिया नाम माताको कहेऊ ॥ चन्दवार तेहि नयको नाँऊ । नारी पुरुष बसैं तेहि ठाँऊ ॥ जब दोनों द्विज कुल तन पाई । नरहरि लछमना नाम धराई ॥ जगन्नाथ के योग पग धारे । सत्य कबीर चले चँदवारे ॥ दोऊ जीव तारनके काजा । चँदवार गुरु आनि विराजा ॥

सत्यकबीर वचन-चौपाई

जगन्नाथसे जब पग धारे । तबहि आनि पहुँचे चँदवारे ॥ बालक रूप धरयो तिहि ठामा । कीनेहु तालमाहि विश्रामा ॥ कमल पत्र पर आसन लाई । आठ पहर हम तहाँ रहाई ॥ नरहरि नारि लछमना जोई । तालके ऊपर पहुँची सोई ॥ पुत्र हेत सों आस लगाई । करि असनान विनय रविराई ॥ अञ्जल ले विनवै कर जोरी । सुन्दर पुत्रहेत चित दौरी ॥ ततछन हम अंचल पर आवा । हमकहँ देखि नारि हरषावा ॥ बालरूप है भेटयो ओही । विप्र नारि यह ले गई मोही ॥ बहुत धौस तिहि संग रहाऊ । नारि पुरुष मिलि सेवा लाऊ ॥ जब हम उठै पलँग झटकोरा । सुवरन मिलै तिन्हें यक तोरा ॥ तिनके हृदय न शब्द समार्ई । बालक जानि प्रतीत न आई ॥ ताहि देह नहि चीन्हो मोही । भयो गुप्त तबही तन ओही ॥ नरतिय जब दोनों तन त्यागे । जन्म लीन जोलहा है जागे ॥

स्वतमवेदबोध

( १३३ )

नीरू नीमा जोलह जोलाही । काशी नग्र बसै दोड ताही ॥ ताही नग्र कवीर तलाई । कमल पुष्प तामें रह छाई ॥ बालक रूप तहाँ हम लीने । कमल पुष्प पर आसन कीने ॥ तहैं बारह बालक पौढाऊ । करे कुटूहल बाल सुभाऊ ॥ तिहि औसरमें नीरू जोलाहा । नारि गौन सँग ल्यावै ताहा ॥ तृषावंत जब मै सो नारी । तालपै जल अँचवन पग धारी ॥ नीमा दृष्टि बाल पर परेऊ । देखत दृश मोद मन भरेऊ ॥ जिमिरविदृश पद्म विकशाना । धाय धरचो धन रंक समाना ॥ तब सो बालक लियौ उठाई । ले बालक नीरूपहैं आई ॥ क्रोधवन्त जोलहा तब भैऊ । नीमासे तब ऐसे कहेऊ ॥ काको बालक तैं लै आई । नग्रमें मेरी होय हँसाई ॥ नग्रके लोग हँसैगे मोही । गौनहि तिय बालक सँग जोही ॥ जोलहा रोष कीन तिहि वारी । बेगि देहु तुम बालक हारी ॥ हर्ष गुना बनि नारी लाई । तब हम तासे बचन सुनाई ॥

बाल वचन

छन्द-सुनहु बचन हमार नीमा तोहि कहीं समुझायके । पिछली प्रीतिके कारने तोहि दृस दीनो आयके ॥ आपने गृह लै चलो मोहि चीन्हिके जौँ गुरु करो । देहुँ नाम दृढाय तुमको फंद यमके नहि परो ॥ सोरठा-सुनत बचन अस नारि, नीरू त्रास न राखेऊ । ले गई नग्र मझार, काशी नगर पहुँचेऊ ॥

चौपाई

लै बालक जब घरको गैऊ । नग्र लोग सब देखत भैऊ ॥ नग्र नारि नर हाँसी लाई । नारि गौन सँग बालक ल्याई ॥ जोलहा सुनि सुनि लाजित होई । बाल वृतांत कहै सब सोई ॥

( १३४ )

बोधसागर

यह बालक तलावमें पाईं । नीमा देखि ताहि लै आई ॥ कमलपुष्प शिशु सेज बनाई । हरषित नारि सो लियौ उठाई ॥ जोलहा यद्यपि कथा प्रकासी । तऊ लोग सब करते हाँसी ॥ बहुत घौस तिहि भौन रहाऊ । जोलहा जाने बालक भाऊ ॥ बालक रूप तासु ग्रह रहते । खानपान तहँ नहिं कछु गहते ॥ बिन भोजन तन छवि सरसाई । दिन दिन देहकी दीरघताई ॥ जोलहा पुनि पंडितन बोलाये । बालक नाम धरनको आये ॥ पंडित करन जो लगे बिचारा । तब शिशु निजमुख बचन उचारा ॥ नाम कबीर हमारा अहई । और नाम जनि पंडित कहई ॥ यह सुनिके सब चकृत भैऊ । शिशु निजनाम आपते कहेऊ ॥ कोइ कहै यह दानौ देवा । कोई कहै यह अलख अभेवा ॥ कोई ईश्वर अंश बतावा । कोइ कह आप देह धरि आवा ॥ पंडित निज निज भौन सिधारा । बिन भोजन बीते बहु बारा ॥ जोलहा तब मनमें दुख पाईं । भोजन करो कबीर गोसाईं ॥ जोलहजोलाही दुखित निहारी । तब हम तिनते बचन उचारी ॥ कोरी यक बछिया ले आवो । कोरा भांडा एक मँगावो ॥ ततछन सो जोलहा चलि जाई । गऊ कि बछिया कोरी ल्याई ॥ कोरा भांडा एक गहाई । भांडा बछिया शीघ्रही आई ॥ दोऊ कबीरके सम्मुख आना । बछिया दिशाहछि निज ताना ॥ बछिया हेठ सो भांडा धरेऊ । ताके थनहि दूधते भरेऊ ॥ दूध हमारे आगे धरही । यहिबिधि खानपान नित करही ॥ तबसे जोलहा डरै बहुत । हमरे घर है अचरज पूता ॥ केते दिन यहि विधि चलिगैऊ । संग बालकन खेलत भैऊ ॥ कथै बालकन प्रति विज्ञाना । सो जड़वत नहिं कछु पहिचाना ॥ तब साधुन सँग गोछि कराही । अगम ज्ञान कथ तिनके पाही ॥

स्वसमवेदबोध

( १३५ )

सुनि साधुन मन अचरज होई । यह तो सिद्ध पुरुष है कोई ॥ सब जोलहा मिलके एक बारा । नीरू ते अस बचन उचारा ॥ बालककी सुन्नत करवावो । तिहि कारन सब साज मँगावो ॥ ताहि काल अस कथा कहाई । नाई सुन्नतको बोलवाई ॥ तब नाई कबीर ढिग आया । ले अस्तुरा निकट नियराया ॥ पांच इंद्री ताको दिखलावो । काटि लेहु जो तोहि मनभावो ॥ यह लखि भभरिके नाई भागा । सुन्नत नहीं कीन डर लागा ॥ पुनि जोलहन अस कौतुककीना । तब बोलाय काजीको लीना ॥ एक गाय तिहि काल मँगाई । काजी ताको जबह कराई ॥ जिहि औसर अस कौतुक ठाना । सत्यकबीर मरम सब जाना ॥ खेलत रहे बालकन माहीं । तेहि छन धायके पहुँचे ताहीं ॥ गऊ घात जब देखत भैऊ । दया धारि काजीते कहेऊ ॥ बहुबिधि काजीको समुझाई । महापाप जिव घात बताई ॥ काजी लज्जित है शिर नायौ । बिनती करै न उत्तर आयौ ॥ तबहि कबीर गऊ ढिग जाई । मरी गाय तिहि काल जिवाई ॥ तब जोलहा गृह तजे कबीरा । अब नहिं रहौं तुमारे तीरा ॥ विकल भये तब नीमा नीरू । नग्र चहुँ दिश बालक हेरू ॥ दूँदत सुत न लहौ नर नारी । रुदन बिलाप करै दोउ भारी ॥ विकल विलोकि दया उर आई । तब कबीर तेहि दियो देखाई ॥ नीरू नीमा बिनती करही । प्रभु हमरे गृह पुनि पग धरही ॥ तब हम तिनते बचन उचारी । ऐसो पाप कीन तुम भारी ॥ तब जोलहा बोलै शिर नाई । नहिं यह पाप मेरी समताई ॥ मिल जोलहन कीनी बरियाई । ताकी खबर न मैं कहु पाई ॥ तापर कृपा बढुरिकै कीना । पुनि ताके गृहमें पग दीना ॥ बाल चरित्र है विविधि विधाना । सो संकेत न होय बखाना ॥

( १३६ )

बोधसागर

चरचा जग अनेक परचारा । कछुकसोलिखौं होय विस्तारा॥ रामानंद गुरु जिमि गहेऊ । वेद मते प्रथमै सो कहेऊ ॥ केते ध्योस जोलहा गृह बासा । अजौं न ता हिय ज्ञान प्रकासा॥ बार बार तेहि नाम हटाई । तिनको नहिं प्रतीत गुरु आई॥ बालक जानि न गुरुपद गहेऊ । ताते परमधाम नहिं लहेऊ ॥ जोलहाकी जब आयु पुराई । मथुरा नग्र देह घर जाई ॥ सकल कथा मैं कीन प्रकाशा । जिमिगुरुकर जोलहा गृहवासा॥ श्वपचके मातु पिता जो रहेऊ । श्रीपाकुलपति नाम सोकहेऊ॥ बहुरि लछमना नरहर सोई । नीमा नीरू सोई होई ॥ तिन दुहुँके तारणके काजा । जोलहा गुरुगृह आनि विराजा॥ गर्भवास कबहुँ नहिं आवै । निज इच्छा नर तन दरसावै ॥ हिंदू मुसलमान नहिं सोई । बाल बृद्ध अरु युवा न होई ॥ दाय़ा करै देह नर धरही । जीव अनंत कोटि ले तरही ॥ जरा मरण कबहुँ नहिं ताही । सदा समान एकरस आही ॥ सो वृतांत अब करो बखाना । जिमि कबीर काशी कथ ज्ञाना॥ षट् दरसन झगरनको आवै । अगम ज्ञान सबको समुझावै ॥ सत्यपथको कीन प्रचारा । हिंसा कर्म निंद निरधारा ॥ तीरथ व्रत अरु मूरति पूजा । जीव हने ईश्वर कथ दूजा ॥ जीवघात करिहै जो कोई । वासा तासु नरकमें होई ॥ पाहन को पूजै पाखंडी । गल काटै जो सम्मुख चंडी ॥ बकरा मुरगा जबह जो करही । विस्मिच्छह कहि धर्म उचरही॥ सो सब पापकर्म बतलाये । हिंदू तुर्क सुनत दुख पाये ॥ वैरभाव दोनों कुल धरहीं । सत्यकबीर टेक नहिं टरहीं ॥ मिलि विप्रन अस युक्ति बनाई । किमि कबीरकी हुरमत जाई ॥ ऐसी गोष्ठि सबन मिलि ठाना । करि प्रपंच अस कीन बहाना॥

स्वसमवेदबोध

( १३७ )

जहाँ तहाँ बहु विप्र सिधारा । सत्यकबीर केर भंडारा ॥ निवता दियो चहुँ दिश जाई । साधुनकी जमाति चलिआई ॥ भीर भई साधुनकी भारी । गृह तजि सत्यकबीर सिधारी ॥ आयके विष्णु भये भंडारी । साधुनको आदर कर भारी ॥ पोषन भरना विष्णुको कर्मा । आयके गहि लीनों निजधर्मा ॥ सत्य कबीर कर्मते न्यारा । मायाको सब खेल पसारा ॥ माया सदा जासुकी दासी । सकै कौन करि ताकी हाँसी ॥ सब साधुनको हरि सनमाने । विप्र सकल देखत खिसियाने ॥ मर्म न कोई लरुयो तिहि बारा । धन्य कबीर धन्य भंडारा ॥ दोहा-काशी कुटी कबीरपर, भई साधुनकी भीर । जो कलु किया सो हरि किया, होय कबीर कबीर ॥

चोपाई

आदर भोजन दछिना पाई । धन्य धन्य कहि साधु सिधाई ॥ काजी पंडित करें विचारा । जाय कबीर कौन विधि मारा ॥ काशीमें तेहि काल बताई । शाह सिकन्दर पहुँचा आई ॥

इति

ग्रंथनिरंभयज्ञान-सत्यकबीर वचन

साखी-कलिमहँ काशी प्रकटचौ, सुनो सन्त धर्मदास । सत्य पंथ परचारैऊ, निंदक भये उदास ॥ शाह शिकंदरके तन, भयो ज्वाल उत्पान । दुखग्याकुल अति विकलतन, काशी पहुँचा आन ॥

चोपाई

पूछै शाह ऐसा कोइ भाई । जाते मेरो कष्ट दुराई ॥ साखी-काजी पंडित मिलिके, कहा शाहसे जाय । है कबीर दरवेश यक, ताको लेहु बुलाय ॥

( १३८ )

बोधसागर

चौपाई

कहैं शाह तेहि तुरत ले आवो । साइत एक विलंब न लावो ॥ सारखी-आये धायके लोग बहु, आतुर बोले वैन । चलो कबीरा शाहपै, हम आये तोहि लैन ॥

चौपाई

गये शाहके सन्मुख जबही । ज्वाला देह दूर भइ तबही ॥ उठिके शाह भयो तब ठाढा । मोहिते अधिक प्रेम तब बाढा ॥ सारखी-शाह न छोडे हमकहँ, बढचो प्रेम मनमाहिँ । शेखतकी तेहि पीर थे, सो सुरझे मनमाहिँ ॥

चौपाई

कहैं तकी सुन शाह सिकंदर । हमते कियो तफाउत अंतर ॥ जोलहाते तुम कीनेहु यारी । हमते अन्तर कियो विगारी ॥ कह सिकंदर तुम हमरे पीरा । वह द्रदमंद द्रवेश फकीरा ॥ कहैं मारफत राहकी बाते । राखा जान जो मेरा जाते ॥ ऐसे शाह कह्यो समुझाई । तबहुँ न शेखतकी शरमाई ॥ काशीके पंडित अरू काजी । शेखतकी मिली परपैच साजी ॥ कह काजी सुनु शाहके पीरा । कैसेहु मारा जाय कबीरा ॥ यह जोलहा जौँ मारा जाई । तौ हम सबकी टरै बलाई ॥ कहैं तकी सुन पंडित काजी । क्या कबीर जोलहा है पाजी ॥ चाहो तो आतशमें जारो । चाहो टूक टूक करि डारो ॥ चाहो जलके बीच डुबाओ । चाहो देगमें आँच दिलावो ॥ चाहो हाथीसे चिरवाओ । चाहो खाक त्वचा भरवावो ॥ चाहो तो देवालमें साटो । चाहो बोटी बोटी काटो ॥ चाहो मोहडे तोप उडावो । चाहो कूपमें जितत दबावो ॥ सारखी-मेरा नाम शेख तकी, मैं सिकंदरको पीर । देखो कैसे बाचिहैं, कैसा फकर कबीर ॥

स्वसमवेदबोध

( १३९ )

काजी पंडित सब हरषाना ।जिमि पंकज विकसे लखि भाना॥ कह काजी तुमते सब होई । तुम ऐसा दूजा नहीं कोई ॥ इस जोलहेने कुपुत्र मचाया । दोनों दीनकी अदल मिटाया ॥

साखी-तीरथ व्रत एकादशी, रोजा और नमाज । ये सब कछु न मानई, कहै एक शिरताज ॥ खसी वो सुरगी गायनी, पीर निमित्त हम देह । सबको कहै कसाइ है, ऐसा काफिर येह ॥

चौपाई

काशीके लोग हमैं नहीं मानें । जोलहाकी सब सिफत बखानें ॥

साखी-भाग हमारे शेखजी, तुम इहँ पहुँचे आय । जौं यह जोलहा मारहुँ, सबको कंटक जाय ॥ कहै तकी सुन काजी, हमते बाढी रार । जीअत कबहुँ छोड़ो, न अब यहि डारो मार ॥ शेखतकी परंपंच करि, गये शाहके पाहँ । हमें देख तहँ बैठे, अधिक जरे मनमाहँ ॥ कहै तकी चित रोष धरि, सुनो सिकन्दर बात । कहा हमारा मानहुँ, तब होवै कुशलात ॥

सोरठा-यहि जोलहै तू मार, नहीं तो देगा बददुआ । तुमको करें खुवार, जान माल सब गलैगा ॥

साखी-कहै सिकन्दर पीर सुन, मोहि तुमारि पनाह । जो चाहो सो करो यहि, तुमें कोई रोकै नाह ॥

चौपाई

कहो कबीरके मारन ताँई । इहवाँ मेरी कछु न बसाई ॥ पीर फकीर जात अल्लाहा । मेरो जोर न पहुँचे ताहा ॥

( १४० )

बोधसागर

साखी—जौँ वह होतो रैअत, तौ हम करते जोर । वह अलमस्त फकीर है, तहाँ न फावै मोर ॥ तुमहु कही समुझायके, पीर फकीर अल्लाह । अब तुम कहते मारने, यह न होय हमपाह ॥

चौपाई

अहो पीरजी तुम वह एका । अपने मनमें करो विवेका ॥ उन तुमरो कछु नाहिं बिगारा । काहे तुमने कुफुर पसारा ॥ बुजरूग सब नेकी फरमावै । जोर जुलुम कछु नाहीं भावै ॥

साखी—कहा हमारा मानिये, छोड़ि दीजिये रार । कुलह सुलह दे बैठिये, अल्लह ओर निहार ॥ कहै तकी सुलतान सुन, तुमे नहीं कछु दोष । जो मैं कहों सो मानिये, कर मेरो संतोष ॥ कहै सिकंदर पीर सुन, मेरो शिर बरु लेहु । फकिर कबीर न मारिये, यह मांगे मोहि देहु ॥

चौपाई

सुनतहि तकी कोध परजारा । शिरते ताज जमीन दे मारा ॥ निपटहि बिकल देखि तिहि भाई । तब हम शाहसे कहा बुझाई ॥ कहै कबीर सुनो सुलताना । करो पीरको बचन प्रमाना ॥ कहै सिकंदर सुनो हो पीरा । मन मानै सो करो कबीरा ॥

साखी—डारहु मारि कबीरको, हम नहिं मानै उन । ताका कबहु न भला हो, करे फकरको खून ॥

चौपाई

शेखतकी तब उठे रिसाई । है कोई बांध कबीरहि भाई ॥ साखी—शेखतकी आपै उठै, काजी पंडित झार । बाँध बाँध सब कोई कहै, कोई न करे गोहार ॥

स्वसमवेदबोध

( १४१ )

बाहँ बांधि पग बांधिके, बोर गंगजल नीर । निःसंशय निश्चित सो, निरभय सदा कबीर ॥ गंगाजलपर आसन, वंद परे खहराय । जन कबीर सतनाम बल, निरभय मंगल गाय ॥ शाह सिकंदर देखही, अरु ठाढे सब लोग । धनि कबीर सब कोइ कहै, शेखतकी भा सोग ॥

चौपाई

शेखतकी तब मीजै हाथा । सुखे सुख नहिं आवै वाता ॥ शेखतकी तब कहै बनाई । अबकी कसनी बढ़ौ न भाई ॥ अबकी बार कबीरहि पावो । देगि मूढ़िके आच दिलावो ॥ देग आंचते बचै कबीरा । तो जानौ अल्लाहको नूरा ॥ कहै कबीर नाम परकासा । तासो गयौ सिकंदरके पास ॥ शाह सिकंदर उठिभे ठाढे । अधिको प्रेम तासु उर बाढे ॥ शेखतकी कह क्रोधित बैना । धुनै शीस राते भये नैना ॥ सुन कबीर कह तकी मयाना । तुम कीनो चेटक हम जाना ॥

सारखी-अबहि तोहि कीमा करे, देग मूढ़ि देव आँच । देव आँचदे बाँचिहो, तो कबीर तुम साँच ॥ कहै कबीर सुन शेखतकि, करो जो तुम मनभाव । हम जैसेको तैसा, देग आँच दिलवाव ॥

चौपाई

तुम नाटक चेटक मन लावा । हमरे चेटक नाम प्रभावा ॥ शेखतकी तुम आप हो जैसे । हमको तुम मति जानो तैसो ॥

सारखी-कीमा करने कारने, शेख घालो तरवार । खांडा गहि शिर ना कटै, शेखतकी गे हार ॥ कहै तकी इहि जोलहा, बाँध्यौ खांडा मोर ।

( १४२ )

बोधसागर

ताते देही ना कटै, लगै अत्र हो भोर ॥ देग मुसल्लम मूँदेहूँ, मोहड़ा मूँद रिसाय ॥ आप आँच दिलवावई, ठाढ़ कतहुँ नहिं जाय ॥

चौपाई

देख लोग सब बहुत तमासा । हम पुनि गये सिकन्दर पास ॥ साखी-शाह सिकन्दर पीरपै, खबरि पठाई साँच । है कबीर पास हमारे, काहि दिलावो आँच ॥

चौपाई

सो सुनि तकी देग मुख खोला । सुन्न देखि वाको मन डोला ॥ आतुर तकी शाहपै आये । हमैं देखि पुनि शीश डोलाये ॥ बहुरि तकी लज्जित है कहई । जोलहापै कल्लु चेटक अहई ॥ साखी-देग अत्र जल बांचेऊ, नहिं व्यापै तन पीर । बहुरि अग्नि जरि बाचिहौ, तो तुम साँच कबीर ॥

चौपाई

विहँसि कबीर कहै सुन शेखा । करो जो आवैं तुमरे लेखा ॥ शेखतकी बहु काठ मँगाया । अति विस्तार अँबार लगाया ॥ साखी-ताहि बीच मोहि मूँदके, दीन्हेसि अग्नि लगाय । अग्नी धाय बुतानी, जन कबीर गुन गाय ॥

चौपाई

कहै तकी यह बाँध्यौ आगी । याको चेटक सब पर लागी ॥ तब जानो तुम साँच फकीरा । धरती गाड़े बचे कबीरा ॥ कहैं कबीर सत नाम प्रतापा । कतहुँ नहिं व्यापै तनतापा ॥ साखी-तुम मति चूको शेखजी, करो जो तुव मन होय । कहैं कबीर मोहि डर नहीं, निर्भय नाम समोय ॥

चौपाई

शेखतकी पुनि कूप खुदाये । गर पग बाँधि ताहिमें नाये ॥

स्वसमवेदबोध

( १४३ )

साखी-ईटा पाथरते भरे, दीनो रूप सुँदाय । कहै तकी अबकी मरे, ऐसो करे खुदाय ॥

चौपाई

शेखतकी अल्लाह मनावै । अबकी बार न जीअत आवै ॥ हम पुनि गये शाहके पास । तबहि सिकन्दर वचन प्रकासा ॥

साखी-कहै सिकन्दर पीर सुन, किसको गाड़ो रूप । सो कबीर इहँ बैठ हैं, अदभुत ख्याल अनूप ॥

चौपाई

शेखतकी व्याकुल है बोले । नैन नासिका मस्तक डोले ॥ साखी-यहि जोलहाके पासमें, तारो गुटका आहि । ताते गाड़े नहीं मड़े, जरे न काटा जाय ॥ अब गहि कर पग बांधिके, हाथी देव हुलाय । हाथी धरि धरि चीरि है, तब कछु नाहि बसाय ॥ खूनी पील मँगायकै, दीन्हेसि मद्य पिलाय । कर पग बँधि हाथी हुले, हाथी चला पराय ॥ केतनो करै महाउत, गज सम्मुख नहीं आव । कहै तकी अब तोपके, मोहड़े राखि उड़ाव ॥ गोला दारू भरि दिहसि, राखे मोहड़े तोप । कहै कबीर सतनाम बल, निर्भय रहौ निशोक ॥ चले सिकन्दर निज घरे, हमकहँ लीने साथ । शेखतकी झूँसी रहे, शाह इलाहाबाद ॥

चौपाई

काशीके ब्रह्मन अरु काजी । मुरछि रहे सब हिरफत बाजी ॥ साखी-एक घौस गंगा तटे, बैठ सिकन्दर शाह । शेखतकी हमहू तहाँ, मुरदा यक बहा जाय ॥

नं. ९ कबीरसागर - ६

( १८४ )

बोधसागर

चौपाई

कहै तकी सुन फकर कबीरा । मुरदा फेर जिलावहु धीरा ॥

साखी-कहै कबीर गरीब हम, तुम बादशाहके पीर ।

मुरदा तुमहि जिलावहु, सतगुरु कहै कबीर ॥

चौपाई

शेखतकी चितवै चित लाई । अल्लह मुरदा देहु जिलाई ॥

साखी-अल्लह पीर मनाइया, शेखतकी बहु बार ।

मुरदा जिंदा न हुवा, बहिगो रेत मझार ॥

चौपाई

शेखतकी कह सुनो कबीरा । मुरदा तुमहि जिलावहु फीरा ॥

साखी-उठि मुरदाहि हम चितवा, दूरते नरे आय ।

कुदरत निर्भय नामके, मुरदा फेर जिलाय ॥

मुरदेको अस बोलेऊ, उठ कुदरत कम्माल ।

कर कुबड़ी धर टेकिऊ, सजि जिव भया सो बाल ॥

चौपाई

सुत कमाल कहि उत्तर दीना । उठि कमाल तब अस्तुति कीना ॥

गुरु सत्त जो कही कमाला । गुरु कबीर मोहि कीन निहाला ॥

साखी-कहै कमाल पुकारिके, गुरु हैं सत्य कबीर ।

मुरदेसे जिंदा किया, गन्दी गली शरीर ॥

शेखतकी मन मूछिके, कह धनि धन्य कबीर ।

तुम अल्लाह खुदाय हो, तुम मेरे गुरु पीर ॥

कहै कबीर सुन शेखजी, तुम औलियाकि जात ।

रोजा निमाज कर बंदगी, बैठो नबी जमात ॥

जो अल्लह फरमाया, सो नहिं करता कोय ।

हलाल हराम चीन्है नहीं, कैसे मुसलिम होय ॥

स्वसमवेदबोध

( १४५ )

सारखी-जबतक दर्द पराई, दिलमें आवै नाहिं । कोटि बंदगी खता है, परै सो दोजखमाहिं ॥ जैसा दिल है आपना, तैसा सबका जान । दर्दमन्द अल्लह मिलै, कहै कबीर प्रमान ॥ शाह सिकंदर तकी मिलि, ठाढ़ भये करजोर । बकसो चूक कबीर तुम, जो कछु औगुन मोर ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनो शाह प्यारे । तुम हमार कछु नाहिं बिगारे ॥ तुमरे पीर जो कसनी लीना । खरा खोट हम सबही चीन्हा ॥ हम नाहिं देहि बददुवा काहू । जो मम अरि हम सेवत वाहू ॥ हमरे मित्र दुष्ट कोइ नाहीं । सब हमरेमें हम सबमाहीं ॥ हम काहूको कहा सरापै । करै सो तैसो फल ले आपै ॥

सारखी-जैसो बीज कोइ बोइहै, तस फल चाखै आप । कह कबीर सत कहत हौं, मोहिं पुण्य नाहिं पाप ॥ कहर कुफुर दिल दोजखी, मोम दिलमें हर फकीर । निरभय नामसो समरथ, सतगुरु कहैं कबीर ॥

चौपाई

ऐसे कहि काशी चलि आये । धर्मदास तोहि सैन बुझाये ॥

सत्यकबीर वचन--चौपाई

रोग सोग बहु दुःख हटाये । केते परचाको देखलाये ॥ मृतकको दीनो जिव दाना । सो कछु इहां न करौं बखाना ॥ सोइ प्रसंग बढ़ुरि अब गार्ई । कलिमें जिमि प्रभु पंथ चलाई ॥ सत्य कबीरके शिष्य सुजाना । चार गुरु जो कीन प्रमाना ॥ तिनमें धर्मदास बड़ अंशा । वंश बयालिस जासु प्रशंसा ॥

बो० सा० १/

( १४६ )

बोधसागर

धर्मदास धरनीमें आये । करि प्रपंच तिहि काल भ्रमाये ॥ धर्मदास सुकृत औतारा । भूलयौ पुरुष नाम निज सारा ॥ प्रतिमा पूजामें लपटाई । परमपुरुषकी सुधि विसराई ॥ तीरथ व्रत आचार अपारा । क्रम उपाह्लाको व्योहारा ॥

पुरुष वचन--चौपाई

पुरुष अवाज उठी तिहि बारा । ज्ञानी बेगि जाहु संसारा ॥ सुकृत भवसागर चलि जाई । काल जालते गये झुलाई ॥ तिनकहैं जाय चेतावहु ज्ञानी । जाते वंश चले रजधानी ॥ वंश बयालिस अंश हमारा । सुकृत गेह लेहै अवतारा ॥ ज्ञानी बेगि जाहु तुम अंसा । धर्मदास उर मेटहु शंसा ॥

ज्ञानी वचन--चौपाई

चले ज्ञानी तब शीस नवाई । धर्मदास हम तुम लगि आई ॥ पुरुष अवाज कहा तुम पासा । चीन्हो शब्द गहो विश्वासा ॥

धर्मदास वचन--चौपाई

धनि सतगुरु तुम मोहिं चेतावा । काल जालते मोहि बचावा ॥ मैं किंकर तुव दासके दासा । लीन उबारि काटि यम फांसा ॥ मेरे चित अति हर्ष समाना । तुव गुण मोहिं न जात बखाना ॥ भागी जीव शब्द तुम माने । पूरण भागते तुव वर ठाने ॥ मैं अघकर्मों कुटिल कठोरा । रहचो अचेत भर्म चित भोरा ॥ मोहि आय तुम लीन जगाई । धन्य भाग तुव दरशन पाई ॥ कहिये मोहि जीवके मूला । रविके उदय कमल मन फूला ॥ भवसागर कौनी विधि छूटे । यमबंधन कौनी विधि टूटे ॥ करौं भक्ति कै योग कमावौं । देउँ दान कै तीर्थ नहावौं ॥ करौं यज्ञ कै इंद्री साथौं । बाहर फिरौं कि मनको बांधौं ॥ करौं अचार कि साधन साथौं । बर्त करौं कै हरि अवराधौं ॥