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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २६ )

बोधसागर

चारिउ खानि होय गुञ्जारा । स्वासा चलै अखंडित धारा ॥ देहदशा जस पुरुष सवारा । तैसी देह रची करतारा ॥ पांच तत्त्व तीनों गुण साजा । आठ काठ पिंजरा उपराजा ॥

( अष्टधातु पिंजरा उपराजा ) ॥

पिंजरामें सुगना एक रहई । वाकी गति मञ्जारी लहई ॥ (यामध्य सुवना एक रहई । दावपरे मैजारी गहई ) ॥ सुगना पढ़ै दिवस औ राती । रक्षक पिंजरा ऊपर सँघाती ॥ रक्षक भक्षक सङ्ग रहावै । सदा पढ़ावै घात लगावै ॥

) एक घातक एक सुआ पढ़ावै ॥

जस सुअना पिंजरा महाँ गहई । ऐसो देह प्राण दुख सहई ॥ नख सिख रचाकाल फुलवारी । फूली वास कुबास सवारी ॥ कनक कामिनी काल बनाई । चारि खानि महाँ रहा समाई ॥ कामिनि काम सँवारे जानी । चारिउ बखानि रहा विकशानी ॥ चारि खानि महाँ श्याम अमाना । काल कुटिल तेहि माहि समाना ॥ काल कलाकी खानि बनाई । शिव शक्ती महाँ रहा समाई ॥ (दया क्षमाकी खानि बनाई । नर नारि महाँ रहा समाई ) ॥ सुरनर मुनि सबही कह डहकै । चारिखानि सबके घट महकै ॥ चारिखानिकी सब उत्पानी । जेतिक तीन कोक सहिदानी ॥ तीन लोक श्वासा विस्तारा । स्वासाते भा सकल पसारा ॥ श्वासा संग काल अवतारा । विष अमृत दोनों संचारा ॥ श्वासा संगम काल औकाली । श्वास संग भये वनमाली ॥ प्रकृति पचीस सङ्ग जञाली । पञ्च पांचदश माल तमाली ॥ चन्द्र सूर श्वासा संग पूरा । इंगला पिंगला सुष्मनि जोरा ॥

दोहा-श्वासा संग श्वासा, तेहिसे उपजा बरि आर ।

चन्द्रसूर्य हैं श्वासामध्ये, सकल विधिविस्तार ॥

श्वसगुञ्जार

( २७ )

शिव शक्ति सुखधाम है, जो चितज्ञानसमाय । सुखसागर अभिराम है, कालत्रासठरिजाय ॥

चौपाई

चन्द्र सूर जीवन सहिदानी । शक्ति शिवकी उपजे खानी ॥ (संयोग जड़ चित विदानी ) ॥

एक संग विष लहरी समानी । एक संग बसे अमृतकी खानी ॥ एक संग मन बसे अपारा । एक संग अमी जीव रखवारा ॥ एक संग काम क्रोध दुखभारी । लोभ मोह पाण्ड विकारी ॥ अहंकार लालच औ ममता । घिन्न औछतिलाज प्रतिहता ॥ एते एक वीरके साथी । माया मद जस मैगर हाथी ॥ एक संग शीतल शीलसुभेपी । इक संग छेमा सुबुधि विशेषी ॥ एक संग भक्ति रहे हितकारी । ज्ञान विवेक संतोष सुधारी ॥ दया दीनता निर्भय रमता । धीरज मतीसहज सुधि समता ॥ दुई घर दुवो राव कर वासा । इक घर राहु केतु प्रकाशा ॥ राहु अमावस सूर्यहि आसे । आसे केतु पूरणीमा चंद्रहीफाँसे ॥ दोउ करे यहि भांति बसेरा । खन बाहर खन भीतर डेरा ॥

( दोउ करे एक नगर बसेरा ) ॥

एकहि रथ दोऊ असवारा । बाहर भीतर मध्य दुवारा ॥ पांचों अविचल तुरे तुषवारा । ता ऊपर है जीव असवारा ॥ एक तुरे पियरे पट नेहा । एक नील रंग है देहा ॥ कुबेत एक लाल बहु रंगी । एस सजुज हरियारे अंगी ॥ एक श्याम सुशकी रंग भारी । पांचों एकते एक अधिकारी ॥ एक श्याम बदन रूपचारी । आप आप पांचों अधिकारी ॥ पांचों बसे एकही संग। एकही रथ मन जीव सुसंगा ॥ एक तब ले पांचों वासा । दाना घास पानीकी आसा ॥

( २८ )

बोधसागर

पांचों पांच घाट जल पीवै । दाना घास खाए सुख जीवै ॥ पांचों तुरै पहली पल धावै । छिनबाँधहि छिनछोरि कुदावै ॥ छिनबाहिर छिनभीतर आवहि । पांचों पांच ढुंड फिरि धावहि ॥ सुसरवर पार सो तवे ले आवै । सकल पराश तवे ले आवै ॥ इहि प्रकार जाही ओर आवहि । कोइ नियरे कोई दूर सिधावहि ॥ सुरंग तुरै जोजन भरि जावै । सुसकि योजन डेढ सिधावै ॥ हरियर दुह योजन पर जावै । योजन तीन पति पहुँचावै ॥ हंसा चारि योजन जो जावै । फिरिके दंडवत बेलै आवै ॥ (श्याम रंग आवै नाहिं जाई) ॥

यहि विधि पांचों आवै जाहीं । अपनि अपनि मंजिलके माहीं ॥ पांच तुरै रथ एक सुधारा । ताऊपर मन जीव असवारा ॥ जीव पराहै मनके हाथा । नाच नचावै राखै साथा ॥ पांचों तुरै होय असवारा । घेरे काल कलीके द्वारा ॥ यहि धोखा गहि जीव झुलाना । सत्य शब्दको भाव न जाना ॥ सत्य लोकके तुरै तुखारा । ताऊ पर सतगुरु असवारा ॥ हाहाकार करै चहुँ भाती । करै शिकार दिवस औ राती ॥ रथ ऊपर चढ़ि तुरो कुदावै । मारि जनावर ले घर आवै ॥ मारै बाण जान पर तानी । नख शिर वेधे धाव न जानी ॥ ताहि जानवरके शिर नाही । रुधिर मांस देह नहिं ताही ॥ देखत देहदृष्टि नहिं आवै । बिन देखे असमाने धावै ॥ ( बिन देखे असमानहि धावे । ता धोकेमें जिव डहकावे ) ॥ ऐसा देखो जनावर जोरा । बन औ नगर करै घनघोरा ॥ ऐसो विषम जनावर भारी । मारि पारधी लीन्ह संभारी ॥ मारि जनावर नगर बसावै । वाहि ओल देहे बिलमावै ॥ एक नगर दुह रहे नरेशा । भित्र २ दोनों कर देशा ॥

शवासुञ्जार

( २९ )

ताहि नगर दुइ महल बनाये । दुइ दरवानी तहाँ रह्याये ॥ महा विकार दोऊ दरवानी । दोऊ रायकी सेवा ठानी ॥ करै उत्तपन्न दोऊ रजधानी । धर्म धीर औ आदि भवानी ॥ जो कछु उत्पति शहरमें होई । सो सब बांटे लेहि नृप दोई ॥ बांटे खजाना धरै दुराई । लेखा खरच उठावहि राई ॥ लेखा जानि खरच उठाई । लेखा खरच उठावै आई ॥ एक हवेली दस दरवाजा । अहुठ हाथ गढभीतर राजा ॥ राजा प्रजा सबैहि रहवै । इकछत राज चले नहि पावै ॥ दोउ राहुके शहर बताऊँ । बाहर भीतर प्रकट दिखाऊँ ॥ एक घर बसे मोह नृप भारी । ताकी साज विषय अधिकारी ॥ दूसरे घर विवेक बलधारी । ताकी सात सबै हितकारी ॥ इकघर राजा एकघर रानी । विधि संयोग मिलावै आनी ॥ एकघर सूर एक घर चन्दा । एक तेज विष अमृत मन्दा ॥ इकघर शक्ती इकघर शीवा । इकघर मन एकघर जीवा ॥ इकघर पाप एकघर पुन्या । इकघर सांच एकघर शुन्या ॥ इकघर भक्षक बसे अपारा । इकघर रक्षक है रखवारा ॥ इक राजा कर रक्षक नाऊ । रक्षा करै सदा सब ठाऊ ॥ एक राजाकर भक्षक नाऊ । भक्षै सबै न छाड़ि काऊ ॥ दूनों नृपति एकपुर माहीं । एक रथ चढ़ै एक सङ्ग ताही ॥ प्रथमहि भक्षक होइ असवारा । तहाँ जाय जहाँ है करतारा ॥ विषम सरोवर पहुँचे जाई । पैठि विषम जल माहि नहाई ॥ करि असनान तीर्थ परसै । झाई झलकि ज्योति तहाँ दरसै ॥ दुइ प्रतिमाको दर्शन पावै । आदि निरंजन ज्योतिदिखावै ॥ काली कालरूप विस्तारा । नाना रंग तरङ्ग अपारा ॥ देखि रूप मन हर्ष समावै । ज्यों पतङ्ग दीपक कहँ धावै ॥

नं. १० बोधसागर - ४

( ३० )

बोधसागर

देखत बहुत सुहावन ज्योती । नाना रङ्ग लागे बहु मोती ॥ जब परसै तब तेज अपारा । लागे आंच महा विष झारा ॥ सो विष लै भक्षक घर आवै । आनि जीव कहैं घोरि पियावै ॥ विषपिलाय जिव घात लगावै । रथते उत्तरि आपु घर आवै ॥ जब विष चढ़े आप बिसरावै । तब रथ चढ़िके रक्षक धावै ॥ रक्षक दूरि देश कहैं धावै । विषम सरोवर पार सिधावै ॥ विषम सरोवर तजि है पारा । जाइ जहाँ सतनाम पियारा ॥ अमर चोलना देखे जाई । चरण स्वरूप महाँ रहे समाई ॥ परसे सुरति नामकै पाया । मिटे जहर भइ निर्मलकाया ॥ दया तूरे चढ़ि उत्तरे पारा । परसे अमी तत्त्व विस्तारा ॥ अमी तत्त्व तूरे जब परसे । अग्र ज्योति अखंडित दुरसै ॥ वरषै अमृत अग्रही धारा । पिवे जीव विष होय निनारा ॥ सुख सागरमें सुधारस पीवै । लै अमृत फिरि घरहि सिधावै ॥ घरमें आइ रहा ठहराई । अग्र अमी धर राख छिपाई ॥ घरी आध घर माहि जुडावै । भक्षक जहर बहुरि लै आवै ॥ फेरि जहर जीवहि पहुँचावै । जीव सुख होइ अमी गँवावै ॥ जब भक्षक विष जीव पिआवै । फिर रक्षक अमृतकह धावै ॥ एहि विधि रक्षक भक्षक धावहि । एक विष एक अमृत लावहि ॥ विषम सरोवर भक्षक जाई । रक्षक सुख सागर पहुँचाई ॥ इहिविधि दोऊ करै रजधानी । इक दारुण इक शीतल बानी ॥ जादिनघर विधिने दुइकीन्हा । तादिन सोंपि खजाना दीन्हा ॥ दोइ नृपतिके दोइ स्वरूपा । राखै दाम चन्द सूर भूपा ॥ इकघर सूर्य एक घर चन्दा । इक दुख दारुण एक अनन्दा ॥ सकल समाज दोऊके हाथा । अविधि समानखजानासाथा ॥ भयर मता दोऊ घर भारी । श्वासा सार सुधारि सुधारी ॥

श्वसगुञ्जार

( ३१ )

बाँटिके दाम दोउ घर दीन्हों । अमृतविष विश्वासकर कीन्हों॥ रचि खानी बहु रंग अपारा । देह माहिं बहु देह सुधारा ॥ (रची देह बहु रंग अपारा । विष अमृत बहु रंग अपारा) ॥ अग्र देह एक देह मैझारा । बाहर भीतर मध्य दुआरा ॥ (अष्ट देह यदि देह मैझारा । बाहर भीतर मध्य अखारा) ॥ चारि विमल हैं चारि तरंगा । चारि सुरंग एक बहु रंगा ॥ (चारि विमल हैं फटिक तरंगा । चारि सुरंग श्याम बहुरंगा) ॥ दुइ उज्वल हैं बाहर वासा । दुइ उज्वल जलमध्य प्रकाशा॥ (दुइ उज्वल दल मध्य प्रकाशा । श्याम सुरंग अधर दुइवासा) ॥ श्वासा सुरंग अधर दुइवासा । जरद नील घर माहिं निवासा ॥ बाहर दुइ सफेद बहुरंगा । रूप अनन्त सत शक्ती संगा ॥ पार बसै सत्त्व सुकृतको डेरा । मध्यमें विषम सरोवर घेरा ॥ निस्तत्त्वकमलसुकृतसंयवासा । विषम सरोवर काल निवासा ॥ पुहुपदीप साहेबको वासा । सुखसागर ज्ञानी रहि वासा ॥ ताके और काल उच्छवासा । मान सरोवर काम निवासा ॥ ताके और कालकी आसा । विषम सरोवर काम निवासा ॥ सबके डरे निरंजन वासा । धरम दास तुम लखो तमाशा ॥ धर्मराह सुख पौन उड़ाई । विषकी लहरि ध्वजा फहराई ॥ ज्ञानीके सुख ज्ञान प्रकाशा । अमरसार सुधा रहि वासा ॥ गुप्त झांझरी पुरुष बनाई । अक्षे अमान ध्वजा फहराई ॥ प्रकट झांझरी काल प्रकाशा । तेजपूज विविधि रहिवासा ॥ जो रचना बाहरकी भाषा । सो रचना भीतर रचि राखा ॥ जो भीतर सो बाहर दरशै । तत्त्वहि तत्त्व तत्त्वतहँ दरशै ॥ तत्त्वकि रथचढ़ि बाहर आई । अमीकी रथ तहाँ परशै धाई ॥ क्षण बाहेर क्षण भीतर आवै । सतगुरुमिलै औ सहज बुझावै ॥ ( निरखि परखि जब हेरे जाई । )

( ३२ )

बोधसागर

चारि तीर्थमहँ प्रतिमा भारी । सत्यसुकृत तहाँ पुरुष औ नारी ॥ स्वासा संयम राह सुधारी । देवल चारि देव हैं चारी ॥ घट भीतर घट राह अपारा । चाँद सूर्य ताके रखवारा ॥ उत्तर चँद तीरथ कहँ धावै । परसि तीर्थ अमृत लै आवै ॥ एकजीव दुइ अंग समाना । जन्द्र सूर्यके हाथ विकाना ॥ दक्षिण स्वर तीरथको धावै । तीरथ परसि जहर लै आवै ॥ शुक्लपक्ष जब पूनो जब आवै । तबही जीव चन्द्र घर आवै ॥ जलरैंग तत्व चँद असवारा । सो परसै घाइअमृत रसधारा ॥ जीव चन्द्रके साथेहि धावै । योजन चारि पार पहुँचावै ॥ करि असनान पुरुष पग परसै । निर्मल ज्योति अखंडितदरसै ॥ जब फिरि चन्द्र सरोवर आवै । बहुरि जीवसँगहि फिरि धावै ॥ आवत जात बार नहिँ लावै । पल पल जीव दरसतहाँ पावै ॥ कृष्णपक्ष अमावस जब आवै । तब फिरि जिव सूर्यघर आवै ॥ सूर्य तेजपर होइ असवारा । बरसै अग्नि अखण्डित धारा ॥ जाय निकसि योजन परवाना । विषय सरोवर करै अस्नाना ॥ परसै देव निरंजन पाई । लागे झार जीव कुँभिलाई ॥ जीव सूर्य फिरि कमल समावै । पल बाहर पल भीतर आवै ॥ सूर्यसंग विष पीवै अघाई । मूर्च्छित होय चन्द्रघर जाई ॥ जाय अमावस परिवा आवै । चढि रथ ऊपर चन्द्र सिधावै ॥ वायु तत्वपर होय सवारा । चले चंद दुइ योजन पारा ॥ विषम सरोवर पार सिधावै । मान सरोवर पारस पावै ॥ नागिनि एक सरोवर माहीं । पीय अमृत विषछांडे ताहीं ॥ सो विष खाय चन्द्रघर आवै । अमृतकी कछु खबर न पावै ॥ पल पल करै तीर्थ अस्नाना । भीतर बाहर एक समाना ॥ अमृत रहै भुजंगिनि पासा । भीतर बाहर एक प्रकासा ॥

श्वसगुआर

( ३३ )

साइ विष लेय तीर्थको आवै । चंद्र कमल पर जाय समावै ॥ एहिविधि चंद्रपक्ष चलि जाई । पाछै जीव सूर्य घर जाई ॥ पूनिमा बीते परिवा आवै । तब रथ चढिके सूर्य सिधवै ॥ सुरंग तुरै पर होय असवारा । योजन तीनि जाय चढिपारा ॥ सुखसागरमें पैठि नहाई । परसै योग सँताय न पाई ॥ अमृत मानसरोवर माहां । कामिनि दूरि धरै बोले ताहां ॥ सो अमान सुखसागर माहां । सूर्यके संग पीवे जिव ताहां ॥ पिये अमी जिव सूर्यके संग । मिटै तपत होय शीतलअंगा ॥ पल भीतर पल बाहर आवै । पीवै अमी रस तेज समावै ॥ जबही सूर्य अमीरस पावै । चंद्रहि पकरि आपुघर लावै ॥ जब चंदा आवै रवि द्वारा । होइ संक्रमण तेज अपारा ॥ तेज किरण पूरण जब होई । दरशाहि काल तपै रवि सोई ॥ तपै तेज बारहको धावै । सुखसागरमें पड़ि नहावै ॥ सुखसागरमें कर अस्नाना । उदितकमलहोइ द्वादश भाना ॥ सूर्यपर चंद होय जब जोरा । तब घर काल करै घनचोरा ॥ चन्द्र सूर्य कह राहु जो फाँसे । पल चन्दा पल सूर्यहि आसे ॥ इहि विधि देह डुइनको बाजी । पूनम धरिहि अमावससाजी ॥ चन्द्र सूर्य लै जाय अकाशा । सुखमुनिके घरदोजकर फाँसा ॥ मुसकि तुरौपर होइ असवारा । घरे शशि सूर्य अकाशके द्वारा ॥ जंबूद्वीप काल अस्थाना । सहज शून्य कह करै पयाना ॥ सहज शून्यमहैं पहुँचे जाई । सहज रहावै संग लगाई ॥ योजन डेठ सहजकर बासा । तहवाँ करै काल रहवासा ॥ सहज कालसों अंतर नाही । जीवहि छलै सहजकी बाही ॥ पलमें जंबूद्वीपहि आवै । पलमहैं सहज शून्यकहैं धावै ॥ एहिविधि चंद्र सूर्य दोह कांसै । काल सहज होय जीव गरासै ॥

( ३४ )

बोधसागर

चंद्र सूर्य दोउ अमृत पावै । काल सहज संग बाण लगावै ॥ बाण लगाय श्रुधा लेइ छीनी । जहर देइ चिव बुद्धि मलीनी ॥ जीवहि सदा कालकी आसा । तजि अमृत विष करही आसा ॥ कालहि राहु केतु होइ आवै । कालहि चंद्रहि सूर्य सतावै ॥ कालहि अमृत जीवसों लेही । कालहि जल थल बाजी देही ॥ कालहि प्रहण असत है जाई । देह विष अमृत लेइ छुडाई ॥ कालहि आगे पाछे धावै । कालहि रचै काल बिगडावै ॥ कालहि चारि खानि रचि राखा । कालहि सब घट बोलै भाखा ॥ घट २ काल करै रखवारी । एक देह दुइ अंग सँवारी ॥ एकअंग चंद एक अंग सूर । श्वासा पारस हाल हजूर ॥ इकइस हजार छःसै श्वासा । इतने एक घरी परकाशा ॥ निशिवासर बीते युग चारी । देओं अंग श्वासा संचारी ॥ दश हजार आठसै भारी । श्वासा चंद्र रनेह सुधारी ॥ जेतिक श्वासा चंद्र सनेहा । तेतिक चलै सूर्य सँग नेहा ॥ दशहजार तीनसै घाटी । चले चन्द्र अरु सूर्यकी बाटी ॥ दुइ हजार दुइसै अधिकारा । ताको भेद एक विस्तारा ॥ मध्यद्वार सहजके जाई । ता सुन्नह मों रहै ठहराई ॥ बारईस हजार चारिसै ऊने । जाप जपे जिव आप विहूने ॥ एकजीव तीनों घर संगा । राहु केतु शशि सूर्य अनंगा ॥ जाप जपै और तीर्थ नहाई । परसै देवल देय सहाई ॥ जब जिव सत्य सुकृत पगपरशे । तब निज ज्योति अखंडितदरशे ॥ जब जीव आदि निरञ्जन दरशे । हीरामें ज्योति तत्वजसपरशे ॥ तासु भेद मैं कहां बनाई । असिले गगनरु श्रुधा छुडाई ॥ जब परिवा पूनमकी साथी । तब चंद्रहि ले आवहि बाँधी ॥ राहुकाल होइ जाय समाई । अमृत छोड़ि पीवै दुखदाई ॥

श्वासगुआर

( ३५ )

चन्द्रके सुगममें जीवहि आसे । ग्रहण लगाय शून्यमहँ फांसे ॥ राहु काल जिव चन्द्र समाई । विष तजि मृत होइ छुड़ाई ॥ इहि विधि राहु चन्द्र कह घेरे । गहन गरासि ज्ञान कह फेरे ॥ अमृत छोड़ि विष सङ्ग लगावै । ज्ञान गर्मी उपजे नहिं पावै ॥ इहि विधि सूर्यहि केतु गरासे । अमृत हरि विष तेज तरासे ॥ इहि विधि दोउ सतावै काला । ता सँग जीवहि करै बिहाला ॥ जब चन्दा कह राहु गरासै । करमकाल ब्याल होय फासै ॥ उग्र होत है थास विवेखै । शशि और सूर्य दोऊ घर देखै ॥ छांडि केतु आप घर आवै । अपने घरमहँ सूर्य समावै ॥ सुरंग तुरेपर बाहर जाई । सुखसागर महँ पैठि नहाई ॥ योग सन्ताइनके पग परशै । निर्मलज्योति अखण्डितदर्शै ॥ अमृत पीवे तेज बल पावै । पल पल पीवे बहुरिघर आवै ॥ आपुहि मह विष अछप छिपावै । बहु विधि अमी सुधारस पावै ॥ पल भीतर पल बाहर जाई । जीवका मूल परसि सुखहाई ॥ पुनि जो चले सूर्यकी श्वासा । पूरण तत्व तेज परकासा ॥ कबहुँ सूर्य चन्द्र घर जाई । चन्द्रहि लाभ सूर्य पछिताई ॥ ज्यों लगि रहै चन्द्रघर सूर। तब लगि अमी अमान हजुरा ॥ इहि विधि तत्व छानि जब आवै । विद्वत्पुरुष हो अधिक पढ़ावै ॥ चन्द्र सनेह जीव तब पावै । पावे जानि भव बहुरि न आवै ॥ शशि और सूर्यग्रहण जब होई । तब देखै तन भेद बिलोई ॥ ग्रहण आसि छांडि जब कूरा । तब घर आवै शशि और सूर। ॥ अपने अपने घर जब आवै । तब नहिं कोई तत्व गवावै ॥ एकके घर एक जब आवै । कोई जीते कोई तत्व गवावै ॥ ग्रहण आस होत जब जाने । तो शशि घरही सुरलै आने ॥ शशि घर आवै शशि घरजाई । अग्रवास बासै लौलाई ॥

( ३६ )

बोधसागर

पुडुपबास तिल राखै छाई । तबके बासना बाहर जाई ॥ पुडुपके भीतर बास रहाई । सोई बास बाहर महकाई ॥ बाहरते भीतर लै आवै । ताके भीतर आनि समावै ॥ ताते वासन बाहर जाई । तिलके भीतर है ठहराई ॥ तिलते वासन बाहर आवै । बाहरते जो भीतर समावै ॥ भीतर वेधि एक जब होई । बास तेलमो रहै समोई ॥ समय-तौ लगि वास बहुत विधि, ज्यों लगि परैना तेल । तेल लाज छाड़िके डारै, दुइ मिलि होय फुलेल ॥

चौपाई

बास तेल मई रहे समाई । तेल काड़ि नहिं बाहर जाई ॥ तेलके संग बास महकाई । बासके संग तेल रहु छाई ॥ समय-लहा बास जहाँ तेल रहु जहाँ तेल तहाँ बास । एकै संग दूनों बसौ, महकै वास सुवास ॥

चौपाई

इहि विधि रहै दोऊ इक ठाऊँ । एकै बासना एक सुभाऊ ॥ बाहर कहि जब अंग लगावै । दुहे प्रतिमाको रूप दिखावै ॥ सुरति फूल मन तिलकी खानी । नाम बास जीव तेल बसानी ॥ बाहर फूल भीतर फुलवारी । रवि शशि करै दोय रखवारी ॥ तिल फूले विखियाकी खानी । दिनफूले निशि गिरतनजानी ॥ ऐसो फूल कुत्रिम उपराजा । तत्त्व तैल सबमध्य विराजा ॥ सोई तत्त्व मो अन्न सनेहा । तत्त्वहि तत्त्व मिलै तिल देहा ॥ तिल औ फूल एक सम कियऊ । तेहि पाछै पुनि प्राण बसियऊ ॥ दुख दीयते निकसेउ तेल । फुल देह तजि भयऊ फुलेला ॥ यहि विधि गुरु शिष्य जो होई । मुक्ति पंथ पावै पुनि सोई ॥ धर्मदास यह अद्भुत बानी । कही विचारि सुकृत सहिदानी ॥

शवासुआर

( ३७ )

उत्पत्तिकी गति सब हम पाईं । परलैकी गति कहौ बुझाईं ॥ रक्षक भक्षक एकहि सङ्ग । कहौ विचारि दोऊको अङ्ग ॥ जब साहब शिवशक्ति बनाईं । सो तो गम्य सबै हम पाईं ॥ सो शिवशक्तिकालरचिराखा । दोनों अङ्गधरि प्रकटी भाखा ॥ कामरूप विष वाण बनाया । कला अनन्तधरि प्रकटी काया ॥ घर घर शिवशक्तीसुत नारी । विरह वियोगसोगसुख भारी ॥ नाना रूप रंग उपराजा । उपजनविनसनसुखदुखसाजा ॥ कुल व्यवहार सकुचऔं लाजा । नात गौत रस लीला साजा ॥ चारि खानि बानिधरि गाजा । चारि बर्ण औ शर्म उपराजा ॥ लाज वरन कूरी कुल काजू । योग्य यज्ञ व्रत दान समाजू ॥ संपत्ति बिपत्ति रंक औ राजा । अन्न वस्त्र माया उपराजा ॥ सब ऊपर मन आप विराजा । मनबसि होय सैर सब काजा ॥ मन इन्द्री मई भोग संयोगा । मनै स्वाद औ स्वाद वियोगा ॥ मनहरता मन करता सोगा । मने रोग औ दुखसुख भोगा ॥ मनते कोई और न दूजा । मनसाहब मन सेवक पूजा ॥ मन देवल मन प्रतिमा साजा । मनपूजा मन तीर्थ विराजा ॥ मन शिवभक्ती विरह अपारा । रुधिरबिन्दु मनसिरजनहारा ॥ मनै जियावन मरने हारा । मनहिअशुभशुभ कर्मव्योहारा ॥ कर्मा कर्म मनहिते होई । भोग करै भुगतावै सोई ॥ मन भर्मित मन चेतन हारा । चारि खानि मनखेल पसारा ॥ मनशीतल मन तेज अपारा । मनश्वासा मन बोलनि हारा ॥ समय-चन्द्र सूर्य संग मन वसे, शुभ अशुभ मन आहि । श्वासा श्वासा मन बसे, कहि बरण गुण ताहि ॥

चौपाई

खानि खानिमनहोयअसवारा । फैलि रहा मन अगम अपारा ॥

( ३८ )

बोधसागर

चारि खानि मन रहा समाई । चारि चक्र चढ़ि बोले आई ॥ रोम रोम मन रहा समाई । आपहि मारे आपहि खाई ॥ आपहि भिक्षुक आपहि दाता । आपहि ईश्वर आपु विधाता ॥ आपहि चोर आप रखवारा । आपहि रचे आप संहारा ॥ आपहि सीखै आप बिसरावै । आपहि मेटे आप बनावै ॥ आपहि अन्य आपडिठिहारा । आपहिज्योतिआपउजियारा ॥ आपहितिमिर आप अँधियारा । आपहि मासपक्ष व्यवहारा ॥ आप निरक्षर अक्षर होई । गुप्त प्रकट होय बोले सोई ॥ नानारङ्ग ज्योति दिखलावै । आदि अन्त मनमनहिसमावै ॥ मनही नाद शून्य महाँ बोले । मनही ज्योति शून्यमहाँ डोले ॥ मनही कह सब ध्यान लगावै । मनको अन्त न कोई पावै ॥ मनही शास्त्र वेद है चारी । तीनलोक मन कथा पसारी ॥ निर्गुण सगुण मनहीकी वाजी । कवी पुराण कोकमन साजी ॥ ब्रह्मज्ञान कथि मनहि सुनावै । आपु छिपाय दूसर दिखलावै ॥

समय-आदिअन्तमन कर्ता, चारि खानि मनबास ।

बन्द छोरि करी मोपै, कहू मन्त्र प्रकाश ॥

चौपाई

सुनहुँ संदेश हंसपति आगर । पुरुष पुराण हंसपति सागर ॥ सुरति पुरुष हंसनके नायक । ज्ञान अतृप्त सुनी चितलायक ॥ कहो अग्र आग्रकी खानी । कहो ज्ञान विज्ञान बखानी ॥ चार खानिके श्वासा जेती । कहो बिचारि चले दम तेती ॥ अचल खानिप्रथमहि विस्तारा । तेहि पाछे पिंडज अनुसारा ॥ तिसरे अण्डज खानि सचारा । चौथे ऊषमज रचा अपारा ॥ चारि खानिको रचना भारी । चारि खानि संगहि अनुसारि ॥ प्रथम खानि सतसुकृत कीन्हा । रचना रचे निरञ्जन लीन्हा ॥

श्वासगुप्कार

( ३९ )

प्रथम अक्षय वृक्ष प्रभु कीन्हां । अक्षय बट है ताकर छीन्हां ॥ आदि अन्त पिंडज अनुसारा । जाते जग शिवशक्ति सुधारा ॥ तिसरे अंडज अर्ध निवासा । जाते जग पंछी परकासा ॥ चौथी खानि अमीरज कौन्हा । तेहि संयम उषमजकर चीन्हा ॥ चारि खानिकी चारिज बानी । श्वासा नेह देह सहिदानी ॥ चारि खानि मह एकै श्वासा । कहुँ खंडित कहुँ पूर प्रकाशा ॥ अचल खानिकी श्वासा भारी । चालि तीस पांच अधिकारी ॥ गिनती सौ हजार औ लाखा । श्वासा अचल खानि महराखा ॥ चारि पहर चारिज जग भारी । तीनी पहर श्वासा अधिकारी ॥ एक पहर वह उनमुनि रहै । ताते काल न आतुर गहै ॥ तीन तत्त्वकी रचना भारी । अचल खानकी देह सुधारी ॥ धरती तत्त्व भास अस्थूला । जल औ तेज ताहि कर मूला ॥ बाँए आकाश नहिं रहिवासा । तातेजड अचल खानि परगासा ॥ तत्त्व बिहून देह अनुसार । ताते जड नहिं वचन उचारा ॥ गहन ग्रास होत नहिं ताही । ताते बहु विधि बाढत जाही ॥ जाको गहन गारसे काला । सौ नहिं बाढे बेलि बेहाला ॥ अचलखानि बहुभांति सँवारी । नाना रंग रूप अधिकारी ॥ कतहुँ छोट कतहुँ बड भारी । कतहुँ साय सरवन सुधारी ॥ एक सुक्षम है एक अस्थूला । एक अमृत एक विषकर मूला ॥ एक खात पलमह मरि जाई । एक खातकछु अवधि बढाई ॥ इक खट्टा इक कडुवा होई । एक मधुररस खावे सोई ॥ एक विसौइध विषके रूपा । नामशब्द गुण भेद अन्त्रपा ॥ पांच सदा औ पांचौ रोगा । पांचौ औषध पांचौ भोगा ॥ पांच वास और पांच कुबासा । पांच पचीस रंग परकासा ॥ पांच पानि पांचौ रहि बासा । पांच शुभ और पांचविश्वासा ॥

( ४० )

बोधसागर

पांच पांच सकल पसारा । पांच रंग श्वासा अनुसारा ॥ तीनि तत्त्व अस्थूल निवासा । तीनि मध्य दुई बाहर वासा ॥ पांच तत्त्व सब इनके पास । जहाँलिंगआपलखनि परकासा ॥ पांच तत्त्व तीन गुण साजा । नारि एक तामध्य विराजा ॥ अचल खानिमह कीन्हे वासा । तामध्ये श्वासा रहि वासा ॥ चन्द्र सूर्य बिन श्वासाहीनी । ताते खानि जड भई मसीनी ॥ अचल खानि ताते जड होई । सूर्य चन्द्र नहि मध्य समोई ॥ नारी एक श्वासा संग ताहां । जहाँलै अचलखानिजगमाहां ॥ नारिसुषुमण अचल घटबासा । ताहि संग श्वासा रहि वासा ॥ ता घट दोई नारी नहीं होई । ताते चन्द्र सूर्य नहि दोई ॥ इंगला पिंगला नाहिन बासा । ताते रवि शशि नाहि निवासा ॥ चन्द्र सूर्य घटके रखवारा । एहि डोले एहि बोलन हारा ॥ चन्द्र सूर्य बिन जागे नाहीं । ताते अचल खानि जगमाहीं ॥ दुई दिन कोई मास गलिजाई । कोई छ मास कोई वर्ष रहाई ॥ कोई दश वर्ष माह जग राते । कोई तीस चालिस तन बासे ॥ कोइ पचास साठि रहि वासा । कोइ सत्तरी कोई असी नेवासा ॥ वर्ष इकावन कोई तन राखा । कोइ सौ हजार कोइ लाखा ॥ कोइ कोटि कोइ अरब निवासा । कोइ पेड चारों युग बासा ॥ इहिविधि अचलखानिकरभावा । औषधि व्याधिरोग उपजावा ॥ एक सजीवन जड़ी अनूपा । एक जडी विश्व तेज सरूपा ॥

समय-कोई शीतल कोइ तेज है, कोइ पारसकी खानि ।

फूल विना फल ऊपजै, सब फलफूल समानि ॥

चौपाई

इहिविधि अचलखानिउपजावा । तेहि पाछे अंडज निरमावा ॥

अंडज खानि सजीवक कीन्हा । चन्द्र सूर्य सङ्ग जीवन दीन्हा ॥

शवासुञ्जार्

( ४१ )

नख शिख खचोप उपराजा । श्वासा सहज अर्थ धुनिगाजा ॥ दुह सूर्य एक सहज घर शुन्या । तिहिं घर कर्म पापनहिं पुन्या ॥ दुई घर इंगला पिंगलाभारी । चांद सूर्य संग जीव संचारी ॥ ताकी श्वासा शक्ति सुधारी । अमृत प्रसन्नसहज सुख भारी ॥ पाँच तत्त्व रथ साजी थारा । तापर चंद्र सूर्य असवारा ॥ ताके संग जीव उठि धावै । मन तरंग रूप उपजावै ॥ सुरंग तुरै पर होय असवारा । सूर्य स्नेह जाए चढ़ि पारा ॥ विषम सरोवर पहुँचे जाई । विष धारामें पैठि नहाई ॥ करि असनान ध्यान लौ लावै । धर्मराय कह माथ नवावै ॥ परसै राय निरंजन देवा । पल मल करै ज्योतिकर सेवा ॥ चरण परसि भरमत घर आवै । रविजीवहि विष आनि पिवावै ॥ रवि रथ रहै चन्द्र उठि धावै । तुरै लीला सरवर पहुँचावै ॥ जीवसहित शशि पहुँच्यो जाई । मान सरोवर पढ़ि नहाई ॥ करि असनान देवपग परशै । कामिनि देह कमलमहँ दरशै ॥ लेके वास चन्द्र घर आवै । घर आवत यम ग्रहण लगावै ॥ पल पल कमल कमल महनावै । अंडज खानि दर्श नहिं पावै ॥ परसै चरण सरोवर दोई । आवत जात न लागे कोई ॥ श्वासा नेह देह व्यवहारा । एक लाख औ सात हजार ॥ एतिक श्वासा अंडज खानी । करै कुलाहल बोले बानी ॥ तत्त्व चले जोजन एक दोई । झाझरि पाटन बसे बिलोई ॥ खाज अखाज विचारै नाहीं । भर्मत फिरै सदा भव माहीं ॥ पल धरती पल फिरै अकासा । जल थल महिँहफिरै उदासा ॥ कायाके बहु रूप सवारी । नानारंग वरन विष धारी ॥ चञ्चल कुटिल कला मनधरहीं । नाना बानि शब्द उच्चरहीं ॥ करै कल्पना जगमँह भारी । नाचै गावै करै खुमारी ॥

( ४२ )

बोधसागर

उड़ि अकाश तरुवर फलखाहीं । पानी उत्तरि पीवै जगमाहीं ॥ जो चन्दा घर चन्दा आवै । तो चन्दा सत्यलोक सिधावै ॥ मान सरोवर पैठि नहावै । विष तजि अमृत घर ले आवै ॥ पुष्प द्रौप होय फिरि घर आवै । पुष्प द्रौपमहँ जाय समावै ॥ एहि विधि चन्द्रग्रहणको देखे । चन्द्र अंशकी श्वास बिवेखे ॥ आयु अंश श्वासा महँ पावै । तो चन्दा नहि मूल गमावै ॥ अंश जो आयु घरहिफिरिआवै । पूरी तत्व सदा सुखपावै ॥ उग्रह होते सुरघर आवै । तादिन चंदा मूल गमावै ॥ एहि विधि सूर सतावे काला । ग्रहण गरासि करे जंजाला ॥ उग्रह होते श्वास विवेखे । शशि औ सुर दोऊ घर देखे ॥ जहाँ पीवै पानी सब आवै । तहाँ दूतलै फंदा लावै ॥ एक तरुवर बनलासा लावहि । एकजल पीत चुगत सँतावहि ॥ एक पींजरा महँ जीव आवहि । रामनाम कह सदा पढावहि ॥ एक अमृत मुक्ताफल खाही । एकजलाहारफलआनिअघाही ॥ एक जीव मारिकै करै अहारा । एक जीव जीवहि कर चारा ॥ एक जोने बल बजाये अधीना । एकउज्वलजल ज्योतिमलीना ॥ जीव एकमत बहुत अपारा । एकउज्वलजलज्योतिअपारा ॥ श्वासा तेजी ज्ञानगा देहा । काम कलाते बहुत सनेहा ॥ अंडज देह महाबल भारी । वचन बिचारि करै सब झारी ॥ शुभ औ अशुभ दुही हैं ताहीं । एक मधुर एक तेज सुहाहीं ॥ एक सुहावन वचन सुनावहि । एक अपावन सुनतन भावहि ॥ तीनलोक भरि रहा समार्ई । ज्ञान गुमान करे सेवकाई ॥ त्रिविध ज्ञान लीए तन डौले । ऋतुऋतु बिरहका लिपै बोले ॥ तेजहीन नाना दशा कीन्हार् । ताकर भेद न काहू चीन्हार् ॥

श्वासयुञ्जार

( ४३ )

समय-एक अधीन एक दारुण, एकलै एके खाय । वह बानी जगमों कहहि, सुनौ भेद चितलाय ॥

चौपाई

अण्डज कला अनन्त सुधारा । तेहि पीछै पिण्डज अनुसार ॥ कला अपार तत्व बहुरङ्ग । सिरजी पिण्डज भ्रमके सङ्ग ॥ पांचतत्व निश वासर सङ्ग । जाकर पहर ताहिके रङ्ग ॥ पाँचो पाँच तत्वके साथी । गाय भैंस घोडा और हाथी ॥ खर्च कंटनी छेरी खारी । चुहि चाही मंजारी पारी ॥ सो नहीं सुवरी कीनरी भाली । माली नौसी गही कङ्काली ॥ कहाँ लगी बरनौ बहुभाँती । मढ़ही ते नरकी उतपाती ॥ पांच तत्व सबहीके संग । श्वासाके सँग चले तुरंगा ॥ पाँचौं तत्व पाँच पुरजाहीं । प्रीत पाँच हैं छत्रके माहीं ॥ पाँच कुच पाँच मोकामा । पाँच सरोवर पाँचहि धामा ॥ पाँचै देवल पाँचै देवा । पाँचै करहि पाँच कर सेवा ॥ पाँचों मह सम पाँच उदासी । पाँचों पाँच शून्य अविनाशी ॥ पाँचों आवही पाँचौं जाहीं । पाँचौं पाँच महँ पाँच समाई ॥ पाँच शून्य पाँच अस्थूला । पाँचै पाँच पाँचकर मूला ॥ पाँचहि होयघर एकजो आवै । पाँच पाँच तबही समुझावै ॥ पाँचौं सात राइ होइ धावै । तिनहींके घर मंगल गावै ॥ पाँच तीन जब सात समावै । पंद्रह मेटि एक घर आवै ॥ पाँचहि तीन सात एक धारा । पाँचों नाद बजावन हारा ॥ पाँचौका है खेल अपारा । पाँचों करही एक विस्तारा ॥ पाँचौं दशके माँहि समाई । पाँचौं आवहि पाँचौं जाई ॥ भौर गुफा पाँचोंकर याना । बाजै ताल मृदंग बँधाना ॥ जब पाँचौं दशके घर जाई । तब दश पाँचहि आनि समाई ॥

( ४४ )

बोधसागर

जब दश पाँच गुफामहँ आवहि । मधुरी तान अर्धधुनिगावहि ॥ कोई घंटा कोह ताल बजावहि । कोई शंखनाद कोई झालरिलावहि ॥ कोई किंकिनिचिचिनिकिन्नरिवीना । कोई भेरिभृदंग औढोलसहीना ॥ कोई तारी कोई बेन बजावहि । रहसि रहसि नानागुणगावहि ॥ सारंग जल तरंग धुनिधारी । तबलाचहुँ ओरनरसिगाडफारी ॥ इहिविधि भोरगुफा धुनि गाजै । नानारंग मधुर धुनि बाजै ॥ बाजे बाजन होइ धुनि गाजा । बिछुली चमके मोहै राजा ॥ दश औ पाँच पचीस समावै । तब घरनी घरियार बजावै ॥ पांच पचीस दश दशहि समावै । गुफाके ऊपर सुरली बजावै ॥ बाजै सुरली कला अनन्ता । जागै कमला सो मैं मन्ता ॥ निर्झर झरे गुफाके द्वारा । रवि शशिपांचतत्त्वउजियारा ॥ श्वासा सार सहज घर वासा । रविशशि पांचतत्त्व परकाशा ॥ और गुफामहँ बाजन बाजै । रवि शशि श्वासासंयमगाजै ॥

समय-नाना बाजन बाजहीं, नानारंग अपार ।

मन औ जिव इक संगहीं, अविनाशीके द्वार ॥

चौपाई

मन नाचै पल लै औ गावै । आप नाचिके जिवहि नचावै ॥ जीव नचै अविनाशी आगे । मन जिव रहे सदा संगलागे ॥ आनंदधाम होत दिनराती । दीसे ज्योति दीवा बिखुबाती ॥ सुरली बाजै निर्झर झरे । नाडी सुषम मन्दिर भरे ॥ निर्भय सदा न जाति अजाती । निर्वश सदा न पूजा पाती ॥ स्वर्ग नर्क औ नदी है ताहाँ । ज्योति उजागर निर्गुण नाहाँ ॥ सरगुण निरगुण एके माहा । दीखै ज्योति निरंजन ताहा ॥ सात तीन पाँचों जब एका । दुइ घर वास एक घर ठेका ॥ उतरि गुफासे जब घर आवै । आपु आपु कहचहुँ दिश धावै ॥

श्वासगुप्कार

( ४५ )

पल घर आवै पल घर जाई । पांचतत्त्व संग सदा सहाई ॥ पांच तत्त्व श्वासा असवारा । फिरहिं शहरवार औ पारा ॥ जहाँ बाहर है शहर देवाला । तहाँ पांचो तुरै फिरै चौफाला ॥ ता ऊपर आतम चढ़ि धावै । पल बाहर पल भीतर आवै ॥ पांच तुरै श्वासा चढ़ि धावै । सरवर पांच परसि घर आवै ॥ सरवर पांच पांच तहाँ घाटा । गली एक पर्वत डुइ बाटा ॥ पांचौ तत्त्व चलै एक साथ । रविशशि श्वासा नाथ अनाथा ॥ पांचौ तत्त्व घर बाहर जाई । ता संग कमल हरी उमगाई ॥ जादिन पांच तत्त्व नहिं आवै । एक तत्त्व निश वासर धावै ॥ ता दिन पांच तत्त्व गुणपावै । लखै तुरै जो बाहर धावै ॥ बाहर चाल चलत गहि लेई । श्वास सुभाव बंद तहाँ देई ॥ एक तत्त्व निश वासर धावै । दुसरी तत्त्व संग नहिं लावै ॥ पांचौ तत्त्व चीन्हि जब पावै । जो बाहर चलै तासु गुणु पावै ॥ पांचौ तत्त्व जीव संग आवै । पल बाहर पल भीतर धावै ॥ ताकर पावै पांचों मोकामा । लेइ तत्त्व पांचोंके धामा ॥ पांचों पांच सरोवर जाहीं । अमी अमान विरह रसखाहीं ॥ दुई पुहुप सुख सागर परशै । अमी अंक सत्य सुकृतै दरशै ॥ तहाँ अमीरस पीवत अधाना । रवि शशि संग जीव निर्वाना ॥ उत्पति पारस तहवाँ पावै । ले पारस फिरि घरहि सिधावै ॥ द्वेमन विष एक मनहै अमाना । परसै आदि अन्त शहिदाना ॥ कालि काल जोति उजियारा । तहाँ एक नागिनवसे अपारा ॥ सो नागिन घर भीतर बासा । बाहर भीतर एक निवासा ॥ नख शिख बेधि रहा विष पूरा । श्वासा संयम शशि और सूरा ॥ पांचै तत्त्व रहो घट पाँचा । पांचहि साथ जीवकर साँचा ॥ रवि शशि श्वासा संग बसावै । उत्पति प्रलय गहन लगावै ॥