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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

मायाका विष्णुको सर्व प्रथम बनाना

( ४२ )

अनुरागसागर

पुनि वहि मास लीन्ह धमराई । पुरुष प्रताप सु बाहर आई ॥ सो अछंगीहि असछल कीन्ह । गोइसि पुरुष प्रगटयम कीन्ह ॥ पुरुष भेद नहि सुनन बतावा । कालनिरञ्जन ध्यान करावा ॥ यह कस चरित कीन्ह अछंगी । ताजा पुरुष भइकाल किसंगी ॥

सद्गुरु वचन

धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ । अब तुहि प्रगटवरणिसमझाऊ ॥ होय पुत्री जेहि घर माहीं । अनेक जतन परितोषै ताहीं ॥ वन्न भक्ष सुख सेज निवासा । घरबाहर सब तिहि विश्वासा ॥ यज्ञ कराय देय पितु माता । बिदाकीन्हहितप्रीतिसों ताता ॥ गयी सुता जब स्वामी गेहा । रात्या तासु संग गुण नेहा ॥ माता पिता सबै बिसरावा । धर्मदास अस नारि स्वभावा ॥ ताते अद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥ ताते पुरुष प्रगटने लायी । कालरूप विष्णुहि दिखलायी ॥

धर्मदासवचन कबीर प्रति

हे साहब यह जान्यो भेदा । अब आगेका करहु उछेदा ॥

कबीर वचन धर्मदास प्रति

पुनि माता कहि विष्णु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निजबारा ॥ अहो विष्णु तुम लेहु अशीशा । सब देवनमें तुमहीं ईशा ॥ जो इच्छा तुम चितमें धरिहौं । सो तब तोर काज मैं करिहौं ॥

मायाका विष्णुको सर्वप्रधान बनाना

प्रथम पुत्रब्रह्म दुरि गयऊ । अकरमझूठिताहि प्रिय भयऊ ॥ देवन श्रेष्ठ तुमहि कहैं मातहि । तुम्हारी पूजा सब कोई ठानहि ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

कृपा वचन अस माते भाखा । सबते श्रेष्ठ विणुकह राखा ॥ माता गयी रुद्रके पास । देख रुद्र अति भये हुलासा ॥

अद्याका महेशको वरदान देना

अनुरागसागर

( ४३ )

अद्याका महेशकी बरदान देना

पुनि लहुरा कहैं पूछे माता । तुम शिव कहो हृदयकी वाता ॥ माँगहु जो तुम्हरे चित भावे । सो तोहि देख माता फुरमावे ॥ दोउ पुत्रन कहैं मात हदावा । माँग महेश जो मनभावा ॥

महेशवचन

जोरि पानि शिवकहबे लीन्हा । देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥ कबहिं न विनसे मेरी देही । हे माता मागों वर एही ॥ हे जननी यह कीजै दया । कबहु न विनशै मेरी काया ॥

अद्यावचन

कह अछंगी अस नहीं होई । दूसरा अमर भयो नहिंकोई ॥ करहु योग तप पवन सनेहा । रहै चार युग तुम्हरी देहा ॥ जौलौं पृथ्वी अकाश सनेही । कबहु न विनशै तुम्हरी देही ॥

धर्मदासवचन

धर्मदास विनती चित लाई । ज्ञानि मोहि कहो समुझाई ॥ यह तो सकल भेद हम पायी । अब ब्रह्माको कहो उथायी ॥ अद्या शाप ताहि कहैं दीन्हा । तेहि पीछे ब्रह्मा कस कीन्हा ॥

कबीर वचन

विष्णु महेश जबै वर पाये । भये आनन्द अतिहि हरषाये ॥ दोनो जने हरष मन कीन्हा । ब्रह्मा भयो मान मद हीना ॥ धर्मदास मैं सब कुछ जानों । भिन्न भिन्न कर प्रगट बखानों ॥

शाप पानेके कारण दुःखित हो ब्रह्मा विष्णुके पास जाकर

अपना दुःख कहना और विष्णुका उसे आश्वासन देना

ब्रह्मा मनमें भयो उदासा । तब चलि गयो विष्णुके पास ॥

ब्रह्मावचन विष्णुप्रति

जाय विष्णुसे बिन्ती ठाना । तुम हो बंधु देव परधाना ॥ तुम पर माता भई दयाला । शाप विवश तुम भये बिहाला ॥

( ४४ )

अनुरागसागर

निज करनी बल पायेहो भाई । किहि विधि दोष लगाऊँ माई ॥ अब अस जतन करोहो भ्राता । चले परिवारे वचन रहै माता ॥

विष्णुवचन

कहे विष्णु छोड़ो मन भंगा । मैं करिहौं सेवकाई संगा ॥ तुम जेठे हम लहुरे भाई । चित संशय सब देहु बहाई ॥ जो कोइ होवे भक्त हमारा । सो सेवै तुम्हारो परिवारा ॥

छन्द

जगमाहि एस दिढाई हौं फलपुन्य आशा जोयहो ॥ यज्ञ धर्म रु करे पूजा द्विज बिना नहिं होय हो ॥ जो करे सेवा द्विजनकी तेहि महापुण्य प्रभावहो ॥ सो जीवमोकहै अधिकप्यारेराखिहौं निज ठाँवहो ॥ ३१

कबीरवचन धर्मदासप्रति

सो ०-ब्रह्मा भये अनंद, जबहि विष्णु असमापेऊ ॥ मेटेउ चितकर दंड, सखा मोर सब सुखीभी ॥ ३२ ॥

कालप्रपंच

देखहु धर्मनि काल पसारा । इन ठग ठग्यो सकल संसारा ॥ आशा दै जीवन बिलपावै । जन्म जन्म पुनि ताहि सतावै ॥ बलि हरिचंद बेतु बइरोचन । कुंती सुत औरौ महिसोचन ॥ ये सब त्यागी दानि नरेशा । इन कहैं ले राखे केहि देशा ॥ जस गंजत इन सबकी कीन्ह। सो जग जानेकाल अधीना ॥ जानत है जग होय न शुद्धी । कालअमरबलसबकी हरबुद्धी ॥ मन तरंगमें जीव भुलाना । निजघर उलटिनचीन्ह अजाना ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनो गुसाई । तबकी कथा मोहि समुझाई ॥ तुम प्रसाद जमको छल चीन्हा । निश्चय तुम्हरे पदचित दीन्ह ॥

गायत्रीका अद्याको शाप देना

अनुरागसागर

( ४६ )

भव बूझत तुमसी गहि राखा । शब्द सुधारस मोसन भाखा ॥ अब वह कथा कहो समुझाई । शाप अंत किया कौन उपाई ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति गायत्रीके अक्षाको शाप देनेका वृत्तान्त

धर्मनि तुम सन कहो बखानी । भाषो ज्ञान अगमकी बानी ॥ मातु शाप गायत्री लीन्हा । उलटि शाप पुनिमातहिंदीन्हा हम जो पांच पुरुषकी जोई । पांचोंकी तुम माता होई ॥ बिना पुरुषकी तू जिनि है बारा । सो जानही सकल संसारा ॥ दुहुनु शाप फल पायो भाई । उगरह भयो देह धरि आई ॥

जगतकी रचनाका विशेष वृत्तान्त

यह सब द्रंद बाद है गयऊ । तब पुनि जगकी रचना भयऊ चौरासी लख योनिन भाऊ । चार खानि चारिहु निरमाऊ ॥

छन्द

प्रथम अंडजरच्यो जननी, चतुरमुखपिण्डजकियो ॥ विष्णु उष्मज रच्यो तबहीं, रुद्र स्थावर लियो ॥ लीन्ह रचि जेहि खानि चारों, जीव बंधनदीन्हहो ॥ होन लागी कृषीकारण, करण कर्ता चीन्हहो ॥ सो०—यहि विधि चारो खानि, चारहु दिशि विस्तार किया धर्मदास चित जान, वाणी चारि उचारको ॥३३॥

धर्मदास वचन कबीरप्रति

धर्मनि कहैं जोरि युग पानी । तुम सद्गुरु यह कहो बखानी ॥ चार खानिकी उत्पति भाऊ । भिन्न भिन्न मुहि वरणि सुनाऊ ॥ चौरासी लख योनिन धारा । कौन योनि केतिक विस्तारा ॥

चार खानकी गिनती । कबीरवचन धर्मदास प्रति

कह कबीर सुन धर्मनि बानी । योनि भावतोहि कही बखानी ॥ भिन्न भिन्न सब कहु समुझाऊं । तुमसे अन्त न कछु दुराऊं ॥ तुम जिन शंका मानहु भाई । वचन हमार गहो चितलाई ॥

चौरासी लाख योनिकी गिनती

( ४६ )

अनुरागसागर

चौरासी लाख योनिकी गिनती

नौ लख जलके जीव बखानी । चौदह लाख पक्षी परवानी ॥ किरम कोट सत्ताइस लाख । तीन लाख अस्थावर भाखा ॥ चतुर लक्ष मानुष परमाना । मानुष देह परम पद जाना ॥ और योनि परिचय नहीं पावे । कर्म बंध भव भटका खावे ॥

मनुष्य खानि सवते अधिक क्यों है ? धर्मदासवचन

धर्मदास नायो पद शीशा । यह समुझाय कहो जगदीशा ॥ सकल योनि जिव एकसमाना । किमिकारण नहीं इसमझाना ॥ सो चरित्र मुनि कहौ बुझाई । जाते चित संशय मिटिजाई ॥

सद्गुरुवचन

सुनु धर्मनि निज अंश अभूषण । तोहि बुझाय कहौ यह दूषण ॥ चार खानि जिव एकै आहीं । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥ सो अब तुमसों कहों बखानी । तत्त्व विशेष अहैं सुन ताहीं ॥ ऊष्मज दोय तत्त्व परमाना । अंडज तीन तत्त्व गुण जाना ॥ पिण्डज चार तत्त्व गुण कहिये । पांच तत्त्व मानुष तन लहिये ॥ तासों होय ज्ञान अधिकारी । नरकी देह भक्ति अनुसारी ॥

किन २ खानिमें कौन २ तत्त्व है । धर्मदासवचन कबीरप्रति

हे साहिब मुहि कहु समुझाई । कौन कौन तत्त्व इन सब पाई ॥ अंडज अरु पिंडजके संग । ऊष्मज और अस्थावर अंगा ॥ सो साहिब मोहि वरणि सुनाओ । करो दया जनि मोहि दुराओ ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति छन्द

सतगुरु कहैं सुन दास, धर्मनि तत्त्व खानिनिवेरनो ॥ जाहि खानि जो तत्त्व दीन्हौ, कहौ तुमसो टेरनो ॥

१ इस पदको कई प्रतियोंमें लिखा है ।

सकल जिवन जिव एक समाना । नर सब औरनको नहीं जाना

सब मनुष्योंका ज्ञान एक समान क्यों नहीं है ?

अवुरागसागर

( ४७ )

खनिअण्डज तीन तत्त्व हैं, आप वायु अरु तेजहो॥ अचल खानी एकतत्त्वहि, तत्त्वजलका थेंगहो३३॥ सो०-ऊष्मज तत हैं द्योय, वायु तेज समजानिये॥ पिंडज चारहिं सोयं,पृथ्वी तेहि अपवायुसम ॥३४॥ पिंडज नर परधान, पांच तत्त्वतेज संग है ॥ कहे कबीर परमान, धरमदास लेहुपरखिके ॥३५॥ पिंडज नरकी देह सँवारा । तामें पांच तत्त्व विस्तारा ॥ ताते ज्ञान होय अधिकाई । गहै नाम सत लोकहिं जाई॥

सब मनुष्योंका ज्ञान एक समान क्यों नहीं ? धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनु बन्दी छोरा । इक संशय मेटो प्रभु मेरा ॥ सब नर नारि तत्त्व सम आहीं। इक सम ज्ञान सबनको नाहीं॥ दया शील संतोष क्षमा गुनन । कोई शून्य कोइ होय सम्पूर्णन॥ कोई मनुष्य होय अपराधी । कोई शीलतलकोई कालउपाधी॥ कोई मारि तन करे अहारा । कोई जीव दया उर धारा ॥ कोई ज्ञान सुनत सुख माने । कोई काल गुणवाद बखाने ॥ नाना गुण किहि कारण होई । साहिब बरणि सुनावो सोई ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

धर्मदास परखो चित लाई । नरनारी गुण कहूँ बुझाई ॥ जानते नर है ज्ञानी अज्ञानी । सो सब तोहि कहों सहिदानी॥ नाहर सर्प औ स्वान सियारा । काग गिद्ध सूकर मंजारा ॥ और अनेकजो इन अचखानी । खाहि अखजअधमगुणजानी ॥ इन जो इतने जे जिव आवा । नरकी जोन जन्म जिन पावा॥ पीछे जो इन सुभावन छूटे । कर्म प्रधान महापुन छूटे ॥ ताते सब चले कागके लेखे । नरकी देह परगट तेहि देखे ॥

योनिप्रभाव मेटनेका उपाय

( ४८ )

अनुरागसागर

जिहि जो इतने जो नर आज । ताको तैसो आहि सुभाऊ ॥ अघकरमी घातक विष पूजा । जो इन प्रभाव होय नहि दूजा ॥

योनिप्रभाव मेटनेका

सतगुरु मिले तो ज्ञान लखावै । काग दशा तव सब बिसरावै ॥ मुरचा जो इन छूटे तब भाई । ज्ञान मसकला फिरे बनाई ॥ जब धोबी वस्तर कहैं धोवे । जससाबुन मिल उज्वल होवे ॥ थोर मैल कर वस्तर भाही । थोड़े परिश्रम मैल नसाई ॥ निपट मलिनजे वस्तर आही । ता कहैं अधिक अधिक श्रम चाही जैसे मैल वस्तर कर भाऊ । ऐसे जीवन करे सुभाऊ ॥ कोइ कोइ जो अंकुर होई । स्वरूप ज्ञान सो गहे विलोई ॥

धर्मदास वचन

यह तो स्वरूप जोनि करलेखा । खानि भाव अब कहूँ विशेषा ॥ चारि खानिको जिव है जोई । मनुष्य खानमहँ आवे सोई ॥ ताकर लच्छन मोहि बताओ । विलग विलग करि मुहिस मझाओ जेहि परखी सुहहिं महँ चेतू । कर अब साहब यहि बड़ हेतू ॥

चारि खानिके लक्षणोंकी पारख । कबीर वचन

धर्मदास परखहु चित लायी । चारि खानि गुण कहूँ समुझायी ॥ चारों खानि जीव भरमाया । तब ले नरकी देह धराया ॥ देह धरे छोड़े जस खाना । तैसे ता कहैं ज्ञान बखाना ॥ लच्छन औ अपलच्छन भेदा । सो सब तुमसौ कहौ निषेदा ॥

अण्डजखानसे मसुष्यदेहमें आये हुए जीवकी पारख

प्रथम कहौ अण्डजकी बानी । एकहि एक कहौ बिलछानी ॥ आलस निद्रा जा कहैं होई । काम क्रोध दारिद्री सोई ॥ चोरी चंचल अधिक सुहाई । तृष्णा माया अधिक बढ़ाई ॥ चोरी बुगुली निन्द्रा भावे । घर बनझाड़ी अगिन लगावे ॥ रोवे कूंदे मंगल गावे । भूत प्रेत सेवा मन भावे ॥

अण्डजखानिसे मनुष्यदेहमें आये हुए जीवकी पारख

अनुरागसागर

( ४९ )

देखत देत और पुनि काहू । मन मन झंखे बहु पछताहू ॥ वाद विवाद सबसों ठाने । ज्ञान ध्यान कछु मनहिं न आने ॥ गुरुसतगुरु चीन्हें नहिं भाई । वेद शास्त्र सब देइ उठाई ॥ आपन नीच ऊंच मन होई । हमसमसरि दूसर ना कोई ॥ मैले बस्तर नहीं नहाई । आंख कीन सुख लार बहाई ॥ पांसा जुवा चित्त मन आने । गुरुचरणननिशिदिननिहिजाने ॥ कुवरा मूड़ ताहिका होई । लंबा होय पाव पुनि सोई ॥

यहि भांतिलक्षणमें कहा, तुम सुनहु धर्मनि नागरू ॥ अंडज खानिन गोयराखा, कह्यो भेद उजागरू ॥ यह खानि वर्णन कहौ तौसों, कछु नाहि छिपायऊ ॥ सोसमुझावानीजीवथिरकै, धोखसकलमिटायऊ ३४

उष्मज खानिसे मनुष्य देहमें आये हुये जीवनकी पारख

सोरठा-टूजीखानि बताय, ताहि लक्ष तौसों कहो ॥ उष्मजते जिय आय, नर देही जिन पाइय ॥ ३६ ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । उषमज भेद कहौ परगासा ॥ जाइ शिकार जीव बहु मारे । बहुतसे आनन्द होयतेहि वारे ॥ मारि जीव जब घर कहैं आयी । बहुविधि रांध ताहि कहैं खाई ॥ निन्दे नाम ज्ञान कह भाई । गुरु कहैं मेठि करे अधिकाई ॥ निन्दे शब्द और गुरु देवा । निन्दे चौका नरियर भेवा ॥ बहुत बात बहुतेनरि आयी । कथे ज्ञान बहुते ससुझायी ॥ झूठे वचन सभामें कहई । टेढ़ी पाग छोर उरमहई ॥ दया धरम मनहीं नहिं आवे । करें पुन्य तेहि हांसी लावे ॥ माल तिलक अरु चन्दन करई । हाट बजार चिकन पटफिरई ॥

स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवकी पारख

( ५० )

अनुरागसागर

अन्तर पापी ऊपर दाय। सो जिव यमके हाथ विकाया॥ लंब दांत अरु वदन भयावन । पीरे नेत्र ऊँच अति पावन ॥

छन्द

कहे सतगुरु सुनहु धर्मनि, भेद भल तुम पाइया ॥ सतगुरु विना नहि भेद पावे, भली विधितो हिंदर साइया भैंटिया तुम मोहिको, कछु नाहिं तोहिं दुराइहौं ॥ जो बृझिहो तुम मोहिसो, सकल भेद बताइहौं ॥३५॥

स्थावर खानिसे मनुष्य शरीरमें आये हुए जीवनकी पारख

सो०-तीजी खानि सुभाव अचल खानि जेहि कहत नरदेही तिन पाव, ताकर लक्षण अब बताइहौं ॥३७॥ अचल खानिको कहो सँदेसा । देह धरे जस होवैं भेसा ॥ छनिक बुद्धि होवे जिव केरी । पलटत बुद्धि न लागे बेरी ॥ झाड़ा फेटा सिर पर पागा । राज द्वार सेवा भल लागा ॥ घोड़ा पर होवे असवारा । तीन खरग औ कमर कटारा ॥ इत उत चित सैन जो मरई । पर नारी करि सैन बुलवाई ॥ रससों बात कहैं मुख जानी । काम बान लागे उर आनी ॥ पर घर ताकइ चोरी जायी । पकर बांधि राजा पहँलायी ॥ हांसी करे सकल पुनि जगहूँ । लाज शर्म उपज नहिं तबहूँ ॥ छिन इक मन महाँ पूजा करई । छिन इक मन सेवा चित धरई ॥ छिन इक मन महाँ बिसरे देवा । छिन इक मन महाँ की जै सेवा ॥ छिन इक ज्ञानी पोथी बांचा । छिन इक माँहि सवन घर नाचा ॥ छिन इक मनमें सूर कहोई । छिन इकमें कादर हो सोई ॥ छिन इक मनमें साहु कहाई । छिन इक मनमें चारि लगाई ॥ छिन इक मनमें करे जु धर्मा । छिन इक मनमें करे अकर्मा ॥

पिंडज खानिसे मनुष्यशरीरमें आये हुए जीवकी पारख

अवुरागसागर

( ५१ )

भोजन करत साथ खजुआई । बाँह जाँघ पुनि मींजत भाई॥ भोजन करत सोय पुनि जाई । जो जगाय तिहि मारन धाई॥ आंख लाल होहि पुनि जाकी । कहैलंग भेद कहों मैं ताकी॥

छन्द

अचलखानीभेद धर्मनि, छिनक बुद्धि सो होयहो ॥ छिन माहिं करके मेट डारे, कहों तुमसों सोयहो॥ मिले सतगुरु सत्य जा कहैं, खान बुधिसबमेटही॥ गुरुचरणलीन अधीन होवै, लोकसोहैंसापैठही॥३६॥

पिंडज खानिसे मनुष्य गरीरमें आयै हुए जीवनकी पारख

सोरठा-सुनहु हो धरमदास, पिंडज लक्षणगुणकहो॥ कहों तुम्हारे पास चौथीखानिकी युक्तिसो ॥३७॥ पिंडज खानिके लच्छ सुनाऊँ । गुण अवगुणका भेद बताऊँ ॥ वैरागी उनमुनि मत धारी । करे धर्म पुनि वेद विचारी ॥ तीरथ औ पुनि योग समाधी । गुरुके चरणचित्तभलबाँधी ॥ वेद पुराण कथे बहु ज्ञाना । सभा बैठि बातें भल ठाना ॥ राजयोग कामिनी सुख माने । मनशंका कबहुँ नहिं आने ॥ धन संपति सुख बहुत सहायी । सेज सुपेद पलंग बिछायी ॥ उत्तम भोजन बहुत सुहायी । लौंग सुपारी बीसों खायी ॥ खरचे दाम पुन्य महाँ सोई । हिरदे सुधि ताकर पुनि होई॥ चच्छु तेज जाकर पुनि जानी । पराक्रम देही बल ठानी ॥ देखो स्वर्ग सदा तेहि हाथा । देखे प्रतिमा नावे माथा ॥

छन्द

बहुतलीन आधीन धर्मनि, ताहि जितकहैंजानिहो॥ सतगुरुचरणनिशिदिनगहे, मतशब्दनिश्चयमानिहो॥

मनुष्यशरीरसे मनुष्यदेहमें आनेवाले जीवकी पारख

( ५२ )

अनुरागसागर

एक एक बिलोय धर्मनि, कह्यो सत मैं तोहिसों ॥ चारखानी लक्ष भाषेउँ, सुनो आगे मोहिसों ॥३८॥

मनुष्य शरीरसे मनुष्यदेहमें आनेवाले जीवकी पारख

सोरठा-छूटे नरकी देह, जन्म धरे फिर आयके ॥ ताका कहौ सँदेह, धर्मदास सुनु कानदे ॥३९॥

धर्मदासवचन

हे स्वामी इक संशय आयी । सो पुनि मोहि कहो समझाई ॥ चौरासी योनिन भरमावे । तब मानुष की देही पावे ॥ यह विधि मोसन कह्यो बुझायी । अब कैसे यह संधि लखायी ॥ सो चरित्र गुरु मोहि लखाऊ । धर्मदास गहि ठके पाऊ ॥ मानुष जन्म धरे पुनि आयी । लक्षण तासु कहो समझायी ॥

कबीरवचन

धर्मदास तुम भलिविधि जानो । होय चरित सो भले बखानो ॥ आयु रहते भी मृत्यु होती है

आइ अछत जो नर मर जायी । जन्म धरे मानुषको आई ॥ जो पुनि मूरख ना पतियाई । दीपक बाती देख जराई ॥ बहुविधि तेल भरे पुनि ताही । लगै वायु तबै बुझ जाही ॥ अग्नि लायके ताहि लेसावे । यहिविधि जीवहु देह धरावे ॥ ताको लक्षण सुनहु सुजाना । तुमसों न गौय राखै ज्ञाना ॥ शूरा होवे नरके माहीं । भयउ डरताके निकट जाहीं ॥ माया मोह ममता नहि व्यापे । दुश्मन ताहि देखि डरकाँपे ॥ सत्य शब्द प्रतीति कर माने । निन्दा रूप न कबही जाने ॥ सतगुरु चरण सदा चितराखे । प्रेम प्रीतिसो दीनता भाखे ॥ ज्ञान अज्ञान होइ कहैं बूझे । सत्यनाम परिचय नित सूझे ॥ जो मानुष अस लक्षण होई । धर्मदास लिखि राखो सोई ॥

चौरासी धारा क्यों बनी ?

अनुरागसागर

( ५३ )

छन्द

जनमजनमको मैल छूटे, पुरुष शब्द जो पावई ॥ नाम भा सुमिरण गहे सो, जीव लोक सिधायई ॥ गुरुशब्द निश्चय दृढगहेसो, जीव अमियअमोलहो सतनामबल निज घर चले, करे हंसकलोलहो ॥२८॥ सोरठा-सत्यनामपरताप, काल न रोके जीवकहैं ॥ देखिवंशको छाप, काल रहै सिर नायके ॥ ४० ॥

चौरासी धार क्यों बनी ? धर्मदासवचन

चारि खानिके बूझेउ भाऊ । अब बूझों सो मोहि बताऊ ॥ चौरासी योनिनकी धारा । किह कारण यह कीन्ह पसारा ॥ नर कारण यह सृष्टि बनाई । कै कोह और जीव भुगताई ॥ है साहिब जनि मोहि दुराओ । कीजे कृपाबिलंबजनिलाओ ॥

मनुष्यके लिये चौरासी बनी है सदगुरुवचन

धर्मनि नर देही सुखदायी । नर देही गुरु ज्ञान समाई ॥ सो तनु पाय आप जहैं जावे । सतगुरुभक्ति विनादुख पावे ॥ नर तनु काज कीन्ह चौरासी । शब्द न गहे मूढ़मतिनाशी ॥ चौरासीकी चाल न छाड़े । सत्य नाम सो नेह न माड़े ॥ लै डारे चौरासी माहीं । परचै ज्ञान जहां कछु नाहीं ॥ पुनिपुनि दौड़ि कालमुखजाहीं । ताहूते जिव चेतत नाहीं ॥ बहुत भांतिते कहि समुझावा । जीवत विपति जान गुहरावा ॥ यह तनु पाय गये सतनामा । नामप्रताप लहे निजधामा ॥

छन्द

आदिनाम विदेह अस्थिर, परखि जो जियरा गहे ॥ पाय बीरा सार सुमिरण, गुरु कृपा मारग लहे ॥

जीवोंके लिये कालका फन्दा रचना

( ५४ )

अनुरागसागर

तजिकागचाल मराल पथगहि, नीरक्षीरनिवारिके ॥ ज्ञानदृष्टिसोअदृष्टि देखे, क्षरअक्षरसुविचारिके॥२९॥ सोरठा-निह अक्षर है सार, अक्षरतै लखि पावई ॥ धर्मनि करो विचार निह अक्षर निहतत्त्व है ॥४१॥

धर्मदासवचन

धर्मदास कहे शुभ दिन मोरा । हे प्रभु दरसन पायउँ तोरा ॥ मुहि किंकर पर दाया कीजै । दास जानि मोहि यह बरदीजै ॥ निशिदिन रहो चरण लौलीना । पल इक चित्त न होवे भीना ॥ तुव पदपंकज रुचिर सुहावन । पद पराग बहुपतितन पावन ॥ कृपासिंधु करुणामय स्वामी । दया कीन्ह मोहि अंतरयामी ॥ हे साहिब मैं तव बलिहारी । आगल कथा कहो निरवारी ॥ चारखानिरचि पुनिकसकीन्ह। सो सब मोहि बतावो चीन्ह। ॥

जीवोंके लिये कालका फन्दा रचना । कबीरवचन

सुनु धर्मनि यह है यमबाजी । जेहि नहिं चीन्हे पंडितकाजी ॥ जा यम ताहि गोसइयां भाखे । तजे सुधा नर विषकहैं चाखे ॥ चारिहु मिलियह रचना कीन्ह। कच्छा रंग सु जीवहि दीन्ह। ॥ पांच तत्त्व तीनों गुण जानो । चौदह यम ता संग पिछानो ॥ यहि विधि कीन्ही नरकीकाया । मरे खाय बहुरि उपजाया ॥ ओंकार है वेदको मूला । ओंकारमें सब जग भूला ॥ है ओंकार निरंजन जानों । पुरुष नाम सो गुप्त अमानो ॥ सहस्र अठासी ब्रह्मा जाया । भा विस्तर कालकी छाया ॥ ब्रह्माते जिव उपजे बारा । तिन पुनि कथे बहुत विस्तारा ॥ स्मृति शास्त्र पुराण बखाना । तामें सकल जीव उरझाना ॥ जीवनको ब्रह्मा भटकावा । अडखनिरंजन ध्यान ददावा ॥

अनुरागसागर

( ६६ )

वेद मते सब जिव भरमाने । सत्य पुरुषको मर्म न जाने॥ निरंकार कस कीन्ह तमासा । सो चरित्र ब्रह्मो धर्म दासा॥

छन्द

असुर हैं जीवन सतावे, देव ऋषि मुनि कारकं ॥ पुनि धरि औतार रक्षक, असुर करै संहारकं ॥ जीवको दिखलाय लीला, अपनी महिमा घनी ॥ यहिजानजीवनबांधिआशा, यही है रक्षक धनी४० सो०-रक्षककला दिखाय, अन्तकाल भक्षण करे ॥ पीछे जिव पछताय, जबहि कालके मुख परे ॥४२॥ अडसठ तीरथ ब्रह्मा थापा । अकरम करम पुण्य औ पापा ॥ बारहराशि नखत सत्ताइस । सात वार पंद्रह तिथि लाइस ॥ चारों युग तब बांधे तानी । घड़ी दंड स्वासा अनुमानी ॥ कार्तिक माघ पुन्य कहिदीन्हा । यमबाजी कोइ बिरले चीन्हा ॥ तीरथ धामकी बांधि महातम । तजेन भरम न चीन्हे आतम ॥ पाप पुण्यमहैं सबै फँदावा । यहि विधिजीव सबै उरझावा ॥ सत्य शब्द विनु बांचे नाही । सारशब्द बिन यममुख जाही ॥ त्रास जानि जिव पुण्य कमावे । किंचित फल तेहि छुधान जावे ॥ जबलग पुरुष डोर नहिं गहई । तब लग योनिन फिर२लहई ॥ अमित कला जम जीव लगावे । पुरुष भेद जीव नहिं पावे ॥ लाम लोभ जिव लागे धायी । आशा बंध काल धर खायी ॥ यम बाजी कोइ चीन न पावे । आशा दे यम जीव नचावे ॥ प्रथमैं सतयुगको व्यवहारा । जीवहि यम लै करै अहारा ॥ लच्छ जीव यम नितप्रति खाई । महाअपरबल काल कसाई ॥ तसशिलानिशिदिन तहैं जरई । तापर लै जीवन कहैं धरई ॥

तप्तशिलापर कष्ट पाकर जीवोंका गुहार करना और कबीर साहबका सत्यपुरुषकी आज्ञासे उन्हें छुड़ाना

( ५६ )

अनुरागसागर

जीवहि जारै कष्ट दिखावे । तब फिर लै चौरासी नावे ॥ ता पीछे योनिन भरमावे । यहि विधि नानाकष्ट दिखावे॥ बहुविधि जीवन कीन्ह पुकारा । काल देत है कष्ट अपारा ॥

तत्त शिलापर कष्ट पाकर जीवोंका गुह्यार करना और कबीर साहबका सतपुरुषकी आज्ञामें जाकर उन्हें छुड़ाना

यमकर कष्ट सह्यो नहिं जाई । हे गुरु ज्ञानी होहु सहाई ॥

छन्द

जबदेखिजीवनकोविकल अतिदया पुरुषजनाइया ॥ दयानिधि सत पुरुषसाहिब, तबै मोहि बुलाइया ॥ कहे मुहिं समुझाय बहुविधि, जीवजाय चितावहू ॥ तुम दरशदेतेहो जीव शीतल, जायतपनबुझायहू४१॥ सोरठा-आज्ञालीन्हामान, पुरुषसिखापनसीसधरि ॥ ताक्षण कीन्ह पयान, सीसनायसतपुरुष कहैं ॥४३॥ आये जहैं यम जीव सतावे । काल निरंजन जीव नचावे ॥ चटपट करे जीव तहैं भाई । ठाढ़े भये तहां पुनि जाई ॥ मोहि देख जिव कीन्ह पुकारा । हे साहिब मुहि लेहि उबारा ॥ तब हम सत्य शब्द गुहरावा । पुरुष शब्दते जीव जुड़ावा ॥

जीवोंका स्तुति करना

सकल जीव तब अस्तुति लाये । धन्य पुरुष भल तपन बुझाये॥ यमते छोर लेव तुम स्वामी । दया करो प्रभु अन्तर्यामी ॥

कबीरवचन जीवोंप्रति

तब मैं कहा जीव समुझाई । जोर करो तो वचन नसायी॥ जब तुम जाय धरौ जग देहा । तब तुम करिहो शब्द सनेहा॥ पुरुष नामसुमिरण सहिदाना । बीरा सार कहो परवाना ॥ देह धरी सत शब्द समाई । तब हंसासत लोकै जाई ॥

जहाँ आशा तहाँ वासा

अनुरागसागर

( ६७ )

जहां आशा तहां वासा

जहाँ आशा तहाँ वासा होई । मन वच करम सुमिर जो कोई ॥ देह धारि कीन्है जिहि आसा । अंत आय लीन्हैउ तहाँ वासा ॥ जब तुम देह धरो जग जाई । विसरचो पुरुषकाल धरिखाई ॥

जीवन वचन कबीर प्रति

कहे जीव सुनु पुरुष पुराना । देह धरी विसरचो यह ज्ञाना ॥ पुरुष जान सुमरेउ यमराई । वेद पुराण कहे ससुझाई ॥ वेद पुराण कहे पति एहा । निराकार ते कीजे नेहा ॥ सुर नर मुनि तैतीस करोरी । बांधे सबै निरंजन डोरी ॥ ताके मते कीन्ह मै आसा । अब मोहि चीन्ह परे यम फांसा ॥

कबीर वचन जीवोंप्रति

सुनो जीव यह छल मम केरा । यह यम फंदा कीन्ह घनेरा ॥

छन्द

काल कला अनेक कीन्हौं, जीव कारण ठाट हो ॥ तीर्थव्रत जग योग फन्दे, कोइ न पावत बाट हो ॥ आप तन धरि प्रगट हँके सिफत आपन कीन्हैऊ ॥ नानागुणनमन कर्म कीन्है, जीव बंधन दीन्हैऊ ॥ ४२ ॥ सोरठा-कालकराल प्रचण्ड, जीवपरे वश ताहिके ॥ जनम जनमभे दण्ड, सत्यनाम चीन्है विना ॥ ४४ ॥

१ यह छन्द कई ग्रंथोंमें कई प्रकारसे लिखा है दूसरे प्रकारसे जो दो सौ वर्षसे भी अधिकके लिखे पुराने ग्रंथ में इस प्रकार है—

छन्द-काल कन्या अनेक कीन्है जीव कारण जाल हो ।

वेद शास्त्र पुरान स्मृति ते रुधै काल कराल हो ।

देव धरि नर प्रगट हो फिरे, ताहि आशा कीन्हैऊ,

अमृत इत उत काल वसि, बहुपंथमें चित दीन्हैऊ ॥

कबीरवचन धर्मदासप्रति

गुरु महिमा

( ६८ )

अनुरागसागर

छन इक जीवन कहँ सुख दयऊ । जीव प्रबोध पुरुष पहुँ गयऊ ॥ छन इक जीवन कहँ सुख दीन्हा । जीवन कह्यो ज्ञानको चीन्हा ॥ जब तुम देह धरो जग जाई । तब हम शब्द कहब गोहराई ॥ जौ गहि हो सत नामकी डोरी । तब आनब हम जमसे छोरी ॥ जीव परमोधि पुरुष पहुँ गयऊ । जीवनको दुख वरनि सुनयऊ ॥ पुरुष दयाला दयानिधि स्वामी । जिनके मूल अमान अकामी ॥ कह्यो मोहिँ बहुविधि समुझाई । जीवन आनों शब्द चेताई ॥

धर्मदासवचन

धर्मदास अस विनती लायी । ज्ञानी मोहिँ कहो समझायी ॥ जो कछु पुरुष शब्द सुख भाखो । सो साहिब मोहि गोयन राखो ॥ कौन शब्दते जीव उबारा । सो साहिब सब कहो बिचारा ॥

सदगुरुवचन

पुरुष मोहि जैसे फुरमायी । सो सब तुमसों संधिलखायी ॥ केहेउ मोहि बहुविधिसमझायी । जीवहि आनो शब्द चितायी ॥ गुप्त वस्तु प्रभु मोकहँ दीन्हा । नाम विदेह मुक्तिकर चीन्हऽ ॥ दीन्ह पात परवाना हाथा । संधिछाप मोहि सौंप्यो नाथा ॥ बिनु रसनाते सो धुनि होई । गुरुगमते लखि पावे कोई ॥ पंच अमीय मुक्तिका मूला । जाते मिटे गर्भ अस्थूला ॥ यहि विधि नाम गहे जो हँसा । तारौ तासु इकोतर बँसा ॥ नाम डोरि गहि लोकहि जायी । धर्मराय तिहि देखि डरायी ॥ ज्ञानी करो शिष्य जेहि जाई । तिनका तोरो जल अँचवाई ॥ जिहि विधि दीन्ह तुमहि मैं पाना । तेहि विधि देहु शिष्य सहिदाना ॥

गुरुमहिमा

गुरुमुख शब्द सदा उर राखे । निशिदिन नाम सुधारस चाखे ॥ पियानेह जिमि कामिनि लागे । तिमिर गुरुरूप शिष्य अनुरागे

शुकदेवकी कथा

अनुरागसागर

( ६९ )

पल पल निरखे गुरुमुखकान्ती । शिष्यचकोरगुरुशशिशान्ती॥ पतिव्रता ज्यों पतिव्रत ठाने । द्वितीयपुरुष सपने नहिं जाने॥ पतिव्रता दोड कुलहिं उजागर । यह गुण गहे संतमति आगग॥ ज्यों पतिव्रता पिया मन लावे । गुरु आज्ञा असशिष्य जुगावे॥ गुरुते अधिक और कोइ नाही । धर्मदास परखहु हिय माहीं ॥ गुरुते अधिक कोइ नहिं दूजा । भर्म तजै करि सतगुरुपूजा ॥ तीर्थ धाम देवल अरु देवा । शीश अपि जो लावैं सेवा ॥ तो नहिं वचन कहैं हितकारी । भूले भरमें यह संसारी ॥

छन्द

गुरु भक्ति अटल अमानधर्मनि, यहि सरस दूजा नहीं ॥ जप योगतप व्रतदान पूजा, तृणसदृश यह जग कहीं॥ सतगुरुदया जिहिसन्तपरतिहि, हृदययहि विधि आवई॥ ममगिरापरखेहरषिकेहिय, तिमिरमोहनशावई॥४३॥ सोरठा-दीपकसतगुरुज्ञान, निरखेहु सन्तअंजोरतोहि पावे मुक्ति अमान, सतगुरु जेहि दाय़ा करे ॥५४॥

शुकदेवजीकी कथा

शुकदेव भये गरभ जोगेशर । उन समान नहिं थाप्यो दूसरा॥ तपके तेज गये हरि धामा । गुरु बिन नहीं लहे विथामा ॥ विष्णु कहे ऋषिकहैवा आये । गुरु विहीन तप तेज झुलाये ॥ गुरु विहीन नर मोहि न भावे । फिर २ जो इन संकट आवे ॥ जाहु पलटिगुरुकरहु सयाना । सब पैहौं यहवां अस्थाना ॥ सुनिमुनिशुकदेव वेगि सिधाये । गुरुविहीन तहैं रहन न पाये ॥ जनक विदेह कीन्ह गुरुजानी । हरषि मिले तब सारंगपानी ॥ नारद ब्रह्मा सुत बड़ ज्ञानी । यह सब कथा जगतमें जानी॥

कबीर साहब का सत्यलोकसे चलकर निरंजनसे वार्तालाप करके पृथ्वीपर आनेका वृत्तांत

( ६० )

अनुरागसागर

और देव ऋषि मुनिवर जेते । जिन गुरुलीन्ह उत्तर सो तेते॥ जो गुरु मिले तो पंथ बतावे । सार असार परख दिखलावे॥ गुरु सोई जो सत्य बतावे । और गुरु कोइ काम न आवे॥ सत्य पुरुषके कहे सँदेशा । जन्म जन्मका मिटै अँदेशा॥ पाप पुन्यकी आशा नाहीं । बैठे अक्षय वृक्ष की छाँही ॥ भुङ्गी मत होवे जिहि पासा । सोइ गुरुसत्य सुनो धर्मदासा॥

छन्द

जो रहित घर बतलावई, सो गुरु सांचा मानिये ॥ तीन तजि मिलि जाय चौथ, तासुवचनपरमानिये ॥ पांच तीन अधीन काया, न्यार शब्द विदेह हैं ॥ देह माँहि विदेह दरशै, गुरुमत निज ए कहौं ॥४५॥ सोरठा-ध्यान विदेह समा, देह धरेका फल यहै ॥ नहि आवै नहि जाय, मिलइ देह विदेह होइ ॥४६॥ अस गुरु करे बनाय, बहुरि न जग देही धरे ॥ नहि आवे नहि जाय, जिहि सतगुरुदाया करे ॥४७॥

धर्मदासवचन

हे प्रभु मोहि कृतार्थ कीन्ह। पूर्ण भाग्य दरश सुहि दीन्ह॥ तव गुण मोसन वरणि न जाई। मो अचेत कहै लीन्ह जगाई ॥ सुधा वचन तुम मोहि प्रिय लागे। सुनतहि वचन मोह मद भागे ॥ अब वह कथा कहो समुझायी। जिहि विधि जगमें प्रथमें आयी॥

कबीरसाहबका सत्पुरुषकी आज्ञा पाकर जीवोंको चितानेके लिये चलना, निरंजनसे भेंट होना और उससे बात चीत करके आगे बढ़ना

कबीरवचन

धर्मदास जो पूछ्यो मोही । युग युग कथा कहौं मैं तोही॥ जबही पुरुष आज्ञा कीन्ह। जीवनकाज पृथ्वी पग दीन्ह॥

योगजीत और धर्मरायका युद्ध

अनुरागसागर

( ६१ )

करि प्रणाम तबहीं पगु धारा । पहुँचे आय धर्म दरबारा ॥ प्रथमैं चलेउ जीवके काजा । पुरुष प्रताप शीशपर छाजा ॥ तेहि युग नाज अचिन्त कहाये । आज्ञा पुरुष जीव पहुँ आये ॥ आवत मिल्यो धर्म अन्याई । तिन पुनि हमसों रार बढ़ाई ॥ मो कहैं देखि धर्म ढिग आवा । महा क्रोध बोले अतुरावा ॥ योगजीत इहवाँ कस आवो । सो तुम हमसो वचन सुनावो ॥ कै तुम हमको मारन आओ । पुरुष वचन सो मोहि सुनायो ॥

योगजीत वचन

तासो कह्यो सुनो धर्मराई । जीव काज संसार सिधार्ई ॥ बहुरि कह्यो सुन सो अन्याई । तुम बहु कीन्ह कपट चतुराई ॥ जीवन कह तुम बहुत भुलावा । बार बार जीवन संतावा ॥ पुरुष भेद तुम गोपित राखा । आपन महिमा परगट भाखा ॥ तस शिलापर जीव जरावहु । जारि बारि निजस्वाद करावहु ॥ तुम अस कष्ट जीव कह दीन्हा । तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीन्हा ॥ जीव चिताय लोक लै जाऊं । काल कष्टसे जीव बचाऊं ॥ ताते हम संसारहि जायब । दे परवाना लोक पठायब ॥

धर्मराय वचन

यह सुनि काल भयंकर भयऊ । हम कहैं त्रास दिखावन लयऊ ॥ सत्तर युग हम सेवा कीन्ही । राज बढ़ाइ पुरुष मुहि दीन्ही ॥ फिर चौंसठ युग सेवा ठयऊ । अष्ट खंड पुरुष मुहि दयऊ ॥ तब तुम मारि निकारे मोही । योगजीत नहि छांड़ी तोही ॥ अब हम जान भली विधि पावा । मारों तोहि लेउँ अब दावा ॥

योगजीत वचन

तब हम कहा सुनो धर्मराया । हम तुम्हरे डर नाहि डराया ॥ हम कहैं तेज पुरुष बल आही । अरे काल तुव डर मोहि नाही ॥