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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( २६ )

बोधसागर

बहुरि अनन्तानंदके, कृष्णदासजी शिष्य । बहुरि कीलजी तासुके, लगता गद्दी दिरुय ॥ कीलते पुनि पंद्रह गनो, लगता जयपुर माहि । हरिप्रसादलों लेखिये, चौदह पीढी ताहि ॥ उन्नीस सौ तेरह सँवत लों, लेखा कीजै तास । ईश्वर जत्तसे भिन्न है, द्वैत धर्म परकाश ॥

इति

अथ त्रिदण्डीको वर्णन-चौपाई

श्री सम्प्रदाके जो संन्यासी । गृह तजिके जब होहि उदासी ॥ दण्ड हाथमें धारे सोई । सो यक ढाककी लकरी होई ॥ तीन शाख तिहि लकुटी माहीं । नाम त्रिदण्डी तासु कहाहीं ॥ जो कोई सो दण्ड गहाये । नाम त्रिदण्डी तासु कहाये ॥ वस्त्र श्वेतके सिंगरफ रंगा । भगवों आदिक धारे अङ्गन ॥

इति त्रिदण्ड

अथ रामानन्दजीकी कथा-चौपाई

रामानन्द विप्र औतारा । मथुरा नग्रमें सो तन धारा ॥ धन विद्याते पूरन रहेऊ । सब लुटाय संन्यासी भयऊ ॥ यक औसर गुरु रामानन्दा । विचरत मिले राघवानन्दा ॥ ताहि राघवानन्द बताई । काल तुम्हारा पहुँचा आई ॥ मृत्यु सुनत रामानन्द डरेऊ । राघवानन्दसे बिनती करेऊ ॥ मैं विद्यामें जन्म गँमायौ । भजन विहीन मृत्यु नियरायौ ॥ मोपर दया करो गोसाई । काल फन्दते लेहु छोड़ाई ॥ राघवानन्द कृपा तब कीने । ताहि आपनी दीक्षा दीने ॥ ऐसी युक्ति बहुरि सो करेऊ । तासु प्राण ब्रह्मांडमें धरेऊ ॥ मृत्यु काल बीता जब सारा । तब ब्रह्मांडसे प्राण उतारा ॥

आगमनिगमबोध

( २७ )

अधिक कृपा गुरु तापर कीनो । रामानन्दको यह वर दीनो ॥ आयू साठे सात सौ वर्षा । बकसिदीन गुरुको हिय हर्षा ॥ गुरु सेवा चिरकाल बिताये । पुनि रामानन्द काशी आये ॥ रामानुज की सम्प्रदा माही । अधिक अचार देखिये ताही ॥ कछुक खेदको कारण पाई । रामानन्द अचार भुलाई ॥ आचारिनमें जब पग दीने । पगसे तब तिहि बाहर कीने ॥ दोहा-बहुरि राघवानन्दजी; रामानन्दसे भाष ।

अब न्यारी निज सम्प्रदा, कीजै मन अभिलाष ॥ चौपाई

रामानन्द सम्प्रदा न्यारी । तादिनसे मैं अलग अचारी ॥ रामानन्दको घना पसारा । धर्म आपनो जग विस्तारा ॥ रामानंदके शिष्य घनरे । सिद्ध प्रसिद्ध भे जक्त बडेरे ॥ अनंता अरु सत्य कबीरा । सुरसरा सुखानन्द मतिधीरा ॥ भावानन्द पीपा रविदासा । धनाआदि गुनगन परकाशा ॥ केते सिद्ध साधु गुनधारी । रामानंद पसारा भारी ॥ बावन द्वारा जाको भाषा । रामानन्दको बहु शिष साषा ॥

इति

अथ श्रीसम्प्रदायको धामक्षेत्र वर्णन-वार्ता

अयोध्या धर्मशाला चित्रकूट सुखविलास गोदावरी प्रदक्षि- णाक्षेत्र धनुषतीर्थ रामनाथ धाम अच्युतगोत्र शुक्लवर्ण सीता इष्ट जानकी मन्त्र राम उपासना मंत्र राघवानंदमहाप्रसाद अनन्त शाखा सामीप्य मुक्ति श्रीनंदर लक्ष्मी आचार्य विश्वामित्र ऋषि योगवाशिष्ठ मुनि हनुमान देवता हनुमान मन्त्र राम गायत्री ऋग्वेद हरिनाम अहार विष्वसेन पार्षद रामानुज वैष्णव ।

इति

( २८ )

बोधसागर

अथ शिवसंप्रदाय वर्णन—चौपाई

विष्णुकांचि दक्षिणके माहीं । विदर्भाजको मन्दिर ताहीं ॥ तहँवा परमानन्द सुनीशा । भजन ध्यान धारे जगदीशा ॥ तापर शिवजी कीनी दाया । हरि उपासना भेद बताया ॥ शिवजी मुख्य अचारज पाका । ताते चली सम्प्रदा शाका ॥ विष्णु श्याम सम्प्रदामें येही । अधिक प्रसिद्ध भयो मतिजेही ॥ भई प्रसिद्ध ताहिके नामा । विष्णु श्याम आचारय यामा ॥ धर्म तासु अद्वैतक होई । ईश्वर जक्त भेद नहिं कोई ॥ जबहि बल्लभा चारय भयऊ । कछु उपासना भिन्न सो कियऊ ॥ गोकुल ग्रामहि सो पग दीने । वृन्दाबनमें बासा कीने ॥ यह सम्प्रदा चाल यह धरही । बालकृष्ण की सेवा करही ॥ भिन्न भिन्न गद्दी तहां अहई । नारि पुरुष हरिसेवा गहई ॥ नन्द यशोदा आपको जानी । पुत्र सो प्रियहरि सेवा ठानी ॥

इति

अथ विष्णु श्यामजीकी कथा और गुरुपीठीवर्णन—चौपाई

विष्णु श्यामद्विजकुलऔतारा । दक्षिण देशमाह पगु धारा ॥ गुरु पीठी ताकी इमि कहिये । शिवके परमानन्दको लहिये ॥ ताके पुनि आनन्द सुनीशा । पुनि प्रकाशसुनि श्रीकृष्णदीशा ॥ नारायणसुनि जैसुनि श्रीसुनि । इमि उनचास पीठी बीती गुनि ॥ उनचासवीं पीठी जब आई । विष्णु श्याम तबहीं प्रकटाई ॥ ताके शिष्य लक्ष्मण भट भैऊ । तासु बल्लभाचारय कहेऊ ॥ ताके विठ्ठलनाथ प्रसंशा । ऐसे प्रकटे पन्द्रह वंशा ॥ पन्द्रहवीं पीठी जब आई । मनसा राम तबै प्रकटाई ॥ विष्णुश्यामसे ये पन्द्रह भो । सम्भवत उन्नीससौ तेरहलो ॥

इति

आयमनिगमबोध

( २९ )

अथ शिवसम्प्रदायको धामक्षेत्र वर्णन-वार्ता

विष्णुकांची धर्मशालामार्कडेयक्षेत्र इन्द्रधनु सुख विलास पुरुषो- तम धाम लक्ष्मी इष्ट जगन्नाथ उपासी तुलसी मंत्र त्रिपुरारि शाखा वामदेव आचार्य सायुज्य मुक्ती नेत्रद्वारा हरिनाम अहार यजुर्वेद अच्युत गोत्र शुक्ल वर्ण बट कृष्ण परिक्रमा जलबिंदु ऋषि नारद देवता विष्णुश्याम वैष्णव ।

इति

अथ ब्रह्मसंप्रदायवर्णन चौपाई

कह अब तृतीय सम्प्रदा सोई । ब्रह्मा आदि अचारय होई ॥ आदि काल नारायण देवा । ब्रह्मासे भाषे यह सेवा ॥ यहि सम्प्रदा आचार्य सयाना । भये माधवानंद प्रधाना ॥ मै सम्प्रदा विदित तिहि नाऊ । माधवाचार्य गहे भल भाऊ ॥ कांचि पुरीके पश्चिम दक्षिण । द्विज कुलमें औतार गहे तिन ॥ द्वैताद्वैत धर्म निज केरे । ईश्वर निज मायाको प्रेरे ॥ तब यहि जगकी रचना होई । ईश्वर भिन्न मिला पुनि सोई ॥ गुरु पीठी अब कहो बखानी । आदि अचारय सारंगपानी ॥ द्वितियेब्रह्मा तृतिये नारद । चौथे व्यास जो बुद्धि विशारद ॥ सुबुधा चार्य नरहरा चारय । सप्तम कहै माधवा चारय ॥ माधवाचारजते लेख उचारा । पूर्नानन्द लो वंश अठारा ॥

इति

अथ ब्रह्मसंप्रदायके धामक्षेत्र वर्णन-वार्ता

अवंतिका पुरी धर्मशाला बद्रिकाश्रम धामा नैमिषारण्य सुख- विलास अङ्गपात्रक्षेत्र सावित्री इष्ट ब्रह्मोपासी विष्णु हंस मंत्र हंस देवता सालोक मुक्ति मोक्ष द्वारा स्त्री कालाचार्य अद्वैत शाखा

( ३० )

बोधसगार

अच्युत गोत्र शुक्ल वर्ण हरिनाम अहार परमहंस ऋषि नारायण पार्षद अथर्वण वेद माधवाचार्य वैष्णव ।

इति

अथ सनकादिक संप्रदायवर्णन—चौपाई

चौथी संप्रदाय सनकादिक । निंबादित आचार्यमरयादिक ॥ अरुण ऋषीधर द्विजकुल टेरा । निकट गोदावरि नय मुंगेरा ॥ धर्म वशिष्ठ द्वैत सो धारा । अहि कुंडलनहिं अहितेन्यारा ॥ जग ईश्वर नहिं भिन्न रहाई । सदाकाल दोहुकी यकताई ॥ गुरु पीठी यहि भांति बतायन । प्रथम हंस औतार नरायन ॥ पुनि सनकादिक नारद कहिये । चौथे निम्बादित को लहिये ॥ निम्बादितसे लेखा ठनिये । पैतिसपिदिरिब्यासलोगनिये ॥ भये प्रतापवान हरिब्यासा । ताते भल यह धर्म प्रकाशा ॥ जो हरि ब्यासके शाखा भैऊ । नाम तासु हरिब्यासी कहेऊ ॥ सो भूराम हरि ब्यासके अंशा । ताहूको गुन अधिक प्रसंशा ॥ पुनि हरिब्यास ते लेख लगाई । संवत उन्नीस सो तेरह ताई ॥ बारह पीठी गई सिराई । माखनदास देह तब पाई ॥

इति

अथ सनकादिक संप्रदायके धाम क्षेत्र वार्ता

मथुरा धर्मशाला क्षेत्र गोमती वृन्दावन सुखविलास गोर्वधन परिक्रमा द्वारावती धाम रुक्मिणी इष्टगोपालउपासी वंशगोपाल मंत्र गोपाल गायत्री हंस शाखा सारूप्य मुक्ति नासिका द्वारा सनकादिक आचार्य नारद मुनि दुर्वासा ऋषि गरुडदेवता साम वेद श्रीभद्र महाप्रसाद अच्युत गोत्र शुक्लवर्ण हरिनाम अहार निंबादित वैष्णव ॥

आगमनिगमबोध

( ३१ )

अथ चारों भाईका धामक्षेत्र वर्णन-वार्ता

माता वरुणावती पिता अगस्त्य गुरु धर्मऋषि स्वर्ग नगरी अच्युत शुक्ल वर्ण अनंत शाखा सामवेद ॥ निष्काम भिक्षा धाम रंगनाथ सुखविलास कोटपाट हरिनाम आहार परम बदिकाश्रम क्षेत्र मठ वैकुण्ठलक्ष्मीदेवी नारायण ॥ देवता पूजा अक्षय बटकी श्रीरंग सम्प्रदाय ऊख खाडा शून्य स्थान सुमेर परिक्रमा बीजमंत्र ॥

इति

अथ चारों संप्रदायके तिलक स्वरूप-चौपाई

श्री संप्रदायके जो आचारी । चरणचिह्न प्रभु तिलक सँवारी ॥ दोय लकीर ऊर्ध्व गत हेरे । श्री अरु नारिबीच तिहि केरे ॥ हेठ तिलक हरिको सिंहासन । जोरी बनावै निछुलीलारन ॥ मध्यमें लाल वरन श्री करही । दीपशिखाजिहिविधिलखिपरही एता पीता वरन श्री होई । रामानन्द संप्रदा सोई ॥ द्वितिये विष्णुश्यामविधि जोहे । दोय लकीर लीलारमें सोहे ॥ हेठ सो सिंहासन शून्य है बीचे । जाति बरनते चित नहिं खींचे ॥ साधू होहि विरक्त न होहि । कह मरयाद पालना होहि ॥ तृतिये माधो संप्रदा कहिये । दोय लकीर ऊर्ध्वगत लहिये ॥ हेठ सिंहासन ताहि बनाई । चरणचिह्न प्रभु माथ सोहाई ॥ चौथे निम्बादित्य जो साजे । दोय लकीर लीलार विराजे ॥ हेठ सिंहासन बन्दु विचाला । ऊर्ध्व पुंड्र अरु वैष्णव चाला ॥

इति

अथ वैष्णवके द्वादश तिलक वर्णन

दोहा-ऊर्ध्वपुंड्र मस्तक प्रथम, ब्रह्मश्रुपुनि जोय ।

१ तिलकोंका चित्र देखो 'कबीर मानु प्रकाश' में ।

( ३२ )

बोधसागर

तृतीय नेत्र दोउ कंठपुनि, उर नाभी फिर होय ॥ उर दोहु दिश भुज दोय पुनि, तथा पूष्ट परमान । बरन बइणवके यही, द्वादश तिलक बखान ॥

इति द्वादश तिलक

अथ वैष्णवके दशचिन्ह वर्णन

दोहा-भद्र भेषतशोचकर पुनि, तुलसी गल माथ । रामकृष्णको मंत्र गह, गोपी मृतिका साथ ॥ शिखा सूत्र करमण्डलो, धौत वस्त्र गुरुवाक । चिह्न वैष्णवके दशो, चार संप्रदा साक ॥

इति

अथ बावनद्वारेके नाम

दोहा-प्रथम अनंता जी कहे, साहिब सत्य कबीर । पुनि सुरेश्वरानंदजी, सुखानन्द मति धीर ॥ अनभय नन्द सुरारजी, अग्रदासजी काल । दीपाजी रवि दासजी, नामदेव हृदशील ॥ खोजी जंग दिवाकर, वीरम त्यागी जान । परशराम नाभा टिला, भोला नैन बखान ॥ पूरन बैराटी कहे, बहुरि घमण्डी देव । ज्ञानिकुबा हरि बंशजी, राधावा वस्त्रभ येव ॥ गोकुल विटुल करम चँद, जोगानंदी जोय । धरनीदास मल्लकजी, असख देवनी होय ॥ माधौ कानी रामरावल, आत्माराम प्रकाश । लाल तरंगी देव भंडंग, भगवान तुलसीदास ॥ हठी नरायण राम रँगी, चतुरा नागा होय । नित्यानन्दी राम कबीर, श्यामानन्दी सोय ॥

आगमनिगम बोध

( ३३ )

हनुमान दास कमालजी, चेतन स्वामी नाम । दास चतुर्भुज राम जपु, मन पुनि कह दुंदराम ॥

इति बावनद्वार

अथ सात अखाडनके नाम

दोहा-टाटंबी निरालंबी कह, संतोषी विरुध्यात । निर्वानी दीगम्बरी, पोकी निरमोहि सात ॥

इति सात अखाडन

अथ तेरह परमभागवतके नाम-चौपाई

नारद पुंडरीक प्रहलादा । ग्यास वशिष्ठ पराशर वादा ॥ भीषम रुक्मांगद विभीषनौ । अर्जुन अम्बरीष शुक् सेनौ ॥

इति

अथ रामानन्दजी और सत्यकवीरकी कथा-चौपाई

सत्यकवीर मनुष तन लीने । जोलहाके घर बासा कीने ॥ अगम ज्ञान कथ साधुन पाही । सुनि आश्चर्य करे मनमाही ॥ निजु निजु मनमें करे बिचारा । बालक नहीं सिद्ध औतारा ॥

सत्यकवीर वचन शब्द

साखी-तब हम साध सिद्धते, कथे गुष्ठि घन ज्ञान । सिद्ध साध मिलिमोकह, पूछै गुरुको नाम ॥

चौपाई

गुरु नहिं नाम कहौ क्यों ओही । तब वे दोष देहि सब मोही ॥ साकठ होई कथ्यो बहु ज्ञाना । गुरुविन मुक्ति नहोय निदाना ॥ तब अपने मन कीन बिचारा । तब गुरु उठो द्वंद संसारा ॥ हम गुरुमुक्ति हटावन आये । गुरुमारग जिवलोक पठाये ॥ गुरु धारनको मनहिं बिचारा । रामानंदसे वचन उचारा ॥ रामानन्द गुरु दिशा दीजै । गुरुपूजा कछु हमसे लीजै ॥

( ३४ )

बोधसागर

तब रामानन्द बचन सुनाई । शूद्रके कान न लागौ भाई ॥ रामानन्द न दिक्षा दीने । तब कबीर अस उद्यम कीने ॥ वीच पंथमें पौढे जाई । जिहि मारग रामानन्द आई ॥ पिछला पहर राति जब आवै । रामानन्द असनानको जावै ॥ चले जात मारगमें जबहीं । लगा खराऊँ ठोकर तबहीं ॥ तब पुकारिके रोवन लागे । रामानंद खड़े भे आगे ॥ बालक देखि दया उर आई । रामानंद कहे समुझाई ॥ मतिरोवो मति करो पुकारा । राम नाम किन कहु मेरे बारा ॥ तब कबीर सो शिक्षा पाई । गुरु शिष्यको भाव बनाई ॥ रामराम धुनि रटनि लगाया । रामानंदसे बचन सुनाया ॥

सत्यकबीर बचन

गुरुजी समुझि गहो मोरे बाहीं । औरनसो चेला हम नाहीं ॥ जो बालक घुनघुनवा खेले सो बालक हम नाही । चौदह सो चौरासी चेले तिनमध्ये हम नाहीं ॥ हम तो लेते सत्तको सौदा पाखंड पूजवै हम नाहीं । बांह गहो तो गहिके पकरो फेर छूटि ना जाहीं ॥ हाड चाम मेरे नहिं कोई जुलहा जाति हमनाहीं । तुमरी नावमें केवट नाहीं लहरि उठै बिकरारा ॥ गुरु समेत शिष्य जब बूड़े कौन उतारो पारा । जौं तुमरे कछु उद्यम नाही भीख मांगि किन खाहू ॥ मूरि सजीवन जानत नाहीं भूलि न बांधो काहू । सूखे काठमें ज्यों घुन लागे लोहे लागी काई ॥ बिन पगतीत गुरु जो कीजै तो काल घसीटे जाई ॥ कहे कबीर सुनौ रामानंद यह सिखलेव हमारी । निरखि परखिके चेला कीजै तागुरुकी बलिहारी ॥

आगमनिगमबोध

( ३५ )

चौपाई

रामानन्द गये असनाना । तब कबीर गृह कियौ पयाना ॥ भोरहि कण्ठी तिलक लगाये । नग्रलोग सब देखन आये ॥ पूछे किमि यह भेष बनाये । तब कबीर यह उत्तर सुनाये ॥ रामानन्दको गुरु हम धारा । ताते ऐसे भेष सँवारा ॥ रामानन्द खबर जब पाई । तब कबीरको टेरि बोलाई ॥ रामानन्द गुरु परदा धारा । सत्य कबीर से बचन उचारा ॥ रे जोलहा ते कहसि न मोही । कब मैं दीक्षा दीनों तोही ॥ गुरुजी राम कृष्ण तुम मेरे । रैन पन्थ प्रकटै कयों तोरे ॥ तुम तब रामनाम मोहि दीना । मैं निज जन्मसुफलकरिलीना ॥ कहै गुरु यह बालक रहेऊ । ठोकर लगा राम तिहि कहेऊ ॥ गुरुजी हंमही रहै सो बाला । राम राम सुनि भयेनिहाला ॥ कह गुरु तू वैश्य कि शूद्रा । वह तो इता बाल बुधि भोरा ॥ तिहि छिनबालरूप दिखलाओ । तब गुरु रामानंद पतियायो ॥ पै जोलहा ब्रह्मवादि कराही । अन्तर ओट सोदियौ बहाई ॥ कहै साधु गुरुसे समुझाई । कबीरहिजुलहानकहिये गुसाई ॥ अनंतानंद कहै परचाये । कबीर सो ब्रह्मरूपधरि आये ॥ दीजै दरशन इनको स्वामी । ये आहि ब्रह्मसोअन्तर्यामी ॥ तबहु न दर्शन दीन गुसाई । तब हम सन्मुख ठाढभे जाई ॥

साखी-गुफामाह गोपहुँचहौं, पूछे को तुम आहु ।

मैं कबीर सेवक अहौं, अजहुँ नहिं पतियाहु ॥

चौपाई

रामानंद कहाव गुरु मेरा । सत् कबीर मैं सेवक तोरा ॥ गुरु सोई जो शिष्य चितावै । शिष्य सोई गुरुसेवा लावै ॥ कहौ गुरु गुरुज्ञान विचारी । को है पुरुष कौन है नारी ॥

( ३६ )

बोधसागर

कौन पुरुषको सुमिरो नामा । कहौ कहाँ अबिचलनिजुधामा ॥ कहौ ध्यान कीजै किहि केरा । तन छूटे कह होय बसेरा ॥ रामानंद कहै सुनु पूता । गुरुसुख ज्ञान रहो संयुक्ता ॥ आपै पुरुष आप है नारी । कहो ज्ञान चित्तराख संभारी ॥ सुमिरहु दशरथ सुत श्रीरामा । अवधपुरी अविचलनिजधामा ॥ श्याम स्वरूप ध्यानमन धारो । तन छूटे बैकुण्ठ सिधारो ॥ कहै कबीर सुनो गुरुदेवा । यह समुझाय कहो मोहिभेवा ॥ रामचन्द्र त्रेतामें भयऊ । काहुहुखाय काहु सुख दयऊ ॥ लोभमोह जुत वन वन डोला । तत्त्वप्रकृत संगतितिहि बोला ॥ जौन बाटते रघुपति आये । सूत कौशल्याको कहलाये ॥ जब त्रेता तब राम भुवारा । कौन पुरुषको सकलपसारा ॥

सारखी-अहो गुरु समुझाइये, कोहै सिरजन हार ।

रामचन्द्र गुरु बंदेउ, कौन नाम आधार ॥

चौपाई.

कहत निगम अस करे विचारा । पूर्व अवर्न जन्मसो न्यारा ॥ तात मात बंधु सो नहिं ताही । ना वह आवै ना वह जाही ॥ श्याम श्वेत नहिं कहिये ताही । इन्द्रासन बैकुण्ठ न जाही ॥ तीन लोक सब परलय होई । निजु धाम कहो कहाँ है सोई ॥ स्वर्ग लोक तुम राखी आशा । फिरि फिरि होय गर्भमें वासा ॥

सारखी-स्वर्गनरक न्यारा, सो मोहि देहु चिह्नाय ।

कहवाते जीव आयेऊ, कहोगुरु समुझाय ॥

चौपाई

सुनहु कबीर कहो सो गहहु । करिये योग अमर है रहहु ॥ आसन साधहु बांधहु मूला । अष्टकमलदल निरखहु फूला ॥

आगमनियमबोध

( ३७ )

चन्द सूर गहि कीजै मेला । मन पौना शुभ निधर खेला ॥ चढ़ि अकाश अमृत रसपीवो । तब कबीर तुम युग युग जीवो ॥

साखी-स्वर्ग नरकते न्यारा, ज्योतिपुरुष निर्वाण ।

तहवाँसे जीव आइया, कहो गुरु सहिदान ॥

चौपाई

कहै कबीर सुनो हो स्वामी । तुम हो उत्तगुरु अन्तरजामी ॥ योगके किये अमर जो होई । तौ पुनि योगी मरे न कोई ॥ का भो साथे आसन मूला । जौं नहिं मेटे संशय झूला ॥ का भो अष्टकमलके पेखे । जौं नहिं आप रूप निजु देखे ॥ का भो चन्द सूरके मेला । जौं नहिं शब्दसुरति गहि खेला ॥ का भो सुष्मनि जाय समाये । जौं नाहीं अक्षर लखि पाये ॥ क्याअकाश चढ़ि अमृत पीये । जौं नहिं नाम अभी चित दीये ॥ ज्योति स्वरूपी पुरुष बतायहु । ज्योति काल तीनों पुरुषायहु ॥ यहिजिव नाहिं ज्योतिसे आवा । परम ज्योतिसे अंश उपावा ॥ जो जिव ज्योति पुरुषते होई । नौ काहे जिव जाय विगोई ॥ ज्योति निरंजन काल अन्याई । सिद्धि तपी सब धीरधरिखाई ॥

साखी-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सुर नर मुनि सब झार ।

ज्योति निरंजन सब कहे, खायो बारंबार ॥

चौपाई

जाहि कहत हो पुरुष निर्वाण । वही आहि तौ काल देवाना ॥

साखी-योग यज्ञ जपतीरथ, यह सब यमके जाल ।

कहै कबीर सतनामबिन, कबहु न छोड़ै काल ॥

पाँच तीन जहवां नहिं, नहीं प्रकृत प्रवेश ।

रविशशिपानीपौननहिं, तहँको कहो सँदेश ॥

( ३८ )

बोधसागर

चौपाई

कहै गुरु तुम शिष्य भये मोरे । यह सब बुद्धिको दीनेहु तेरे ॥ कहै कबीर सब तुम परतापा । हमरे तुमहि माया अरु बापा ॥ तब गुरु हमपर भये दयाला । निजकरदियौ सुमिरिनी माला ॥ कहै गुरु सुन साधु कबीरा । तुम तो सेवक हो मतिधीरा ॥ सर्वांनंद विप्र यक आये । तिन पुनि गुरुते गोष्ठि कराये ॥ ताहि जीत गुरु शिष्य करावा । तब गुरु हम कह तिलककरावा ॥ सब पर श्रेष्ठ हमें गुरु कीना । हम पुनि सबते रहै अधीना ॥

साखी-गुरुके सब शिष्य मोहिको, बोलैं गुरुसमान ।

हम गुरु साधु अधीन हैं, भाषै निर्भय ज्ञान ॥

शब्द

लख कोई विरलापद निर्बान । बिन रसना सूर धरै ध्यान ॥ तामें दरसे पुरुष पुरान । कर्म छोड़ि सब भर्म नसान ॥ डुरमति छोड़ि कमल धरु ध्यान । तीन लोकमें काल समान ॥ चौथे लोकमें नाम निसान । रामानन्द गुरु करै बखान ॥ दास कबीरको निरमल ज्ञान ।

इति

मेरो नाम कबीरा हो जगत गुरु जाहिरा । तीन लोकमें मागा मेरा त्रिकुटी है अस्थान ॥ पानीपौन समेरसमाना इस विधि रच्यौ जहाना । गगन मन्दिरमें वासा मेरा मंजनि है अस्थाना ॥ ब्रह्मबीज हमहीसे आया हमरै सकल जहाना । अनहद लहर गगन गढ उपजै बाजै सोहं तारा ॥ गुप्त भेद वाहीसे कहिये जो निज होय हमारा । भवबंधनसे लेहु छोड़ाई निरमल करो शरीरा ॥

आगमनिगमबोध

( ३९ )

सुर नर सुनि कोई भेद न पावै पावै संतगंभीरा ॥ वेद कदापि पार नहिं पावै ऐसे मतिके धीरा । कहै कबीर सुनो रामानन्द दोनों दीनके पीरा ॥

चौपाई

रामानन्द कबीर कहानी । जक्तमाह बहु विधि विहरानी ॥ कछु मैं सूक्ष्म लिख्यौ बनाई । कीरति जासु जक्तमें छाई ॥ सत् कबीरको चरित अनेका । सो कछु इहां लिखौ नहिं एका ॥ केते परचा गुरुहि देखाई । तब ताके हिय निश्चय आई ॥ मैं घनघोर गुष्ठि गुरु पाही । अगम ज्ञान सुनि बोले ताही ॥

रामानंद वचन

दोहा-मैं जाना तुम जोलहा, मोहि पडा बड घोष । मूल दिशा मोहि देव कबीर, जीवत आवै संतोष ॥ करता तुम हो साधू हो, सत्य कबीर है देव । तनमन तुमको अपिहों, करह दीक्षा मोहि देव ॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

सारखी-काल करन्ते आज कर, आज करंते अब । औसर बीता जात है; व्यौहार करोगे कब ॥ काल करंते काल है, मोहि भरोसा नाहिं । यह तनं काचा कुम्भ है, विनशि जाय छनमाहिं ॥ घडी पलकको सुधि नहीं, करो कालको साज । काल अचानक मारि है, ज्यों तीतरको बाज ॥

चौपाई

योगी गोरख नाथ प्रतापी । तासुतेज पृथ्वी पर व्यापी ॥ काशी नग्रमें सो पग परही । रामानन्दसे चर्चा करही ॥ चरचामैं गोरख जय पावै । कंठी तोरे तिलक छुडावै ॥

( ४० )

बोधसागर

सत्य कबीर शिष्य जब भयऊ । यह वृत्तांत तब सो सुनि लयऊ ॥ गोरखनाथके डरके मारे । बैरागी नहीं वेष सँवारे ॥ तब कबीर आज्ञा अनुसार । वैष्णव सकल स्वरूप सँवारा ॥ सो सुधि गोरखनाथ जो पायौ । काशीनथ शीघ्र चलि आयौ ॥ रामानन्दको खबरि पठाई । चर्चा करो मेरे सँग आई ॥ रामानन्दकी पहिली पौरी । सत्य कबीर बैठे तिहि ठौरी ॥ कह कबीर सुन गोरखनाथा । चर्चा करो हमारे साथा ॥ प्रथम करो चर्चा सँग मेरे । पीछे मेरे गुरुको टेरे ॥ बालक रूप कबीर निहारी । तब गोरख ताहि बचन उचारी ॥

सत्यकबीर वचन--शब्द

कबके भये वैरागी कबीरजी कबके भये वैरागी । नाथजी हम जवसे भये वैरागी मेरी आदि अन्त सुधिलागी ॥ धुधूकार आदिको मेला नहीं गुरु नहीं चेला । जबका तो हम योग उपासा तबका फिरों अकेला ॥ धरती नहीं जदकी टोपी दीना ब्रह्मा नहीं जदका टीका । शिवशंकरसो योगी नहीं जदका झोली शिवका ॥ द्रापरकी हम करी फावडी त्रेताको हम दंडा । सतयुग मेरी फिरी दुहाई कलियुग फिरौ नौखण्डा ॥ गुरुके वचन साधुकी संगत अजर अमर घर पाया । कहैं कबीर सुनोहो गोरख जब हम तत्त्व लखाया ॥ जो बूझे सो बावरा क्या उमर हमारी । असंख्य युग परलय गई तबके ब्रह्मचारी ॥ कोटि निरंजन हो गये परलोक सिधारी । हम तो सदा महबूब हैं सोहं ब्रह्मचारी ॥ दश कोटि ब्रह्मा भये नौ कोटि कन्हैया ।

आगमनिगमबोध

( ४१ )

सात कोटि शंभू भये मोरी एक पलैया ॥ कोटिन नारद होगये महम्मदसे चारी । देवतनकी गिनती नहीं है क्या सृष्टि विचारी ॥ नहीं बूढ़ा नहीं बालक नहीं भाट भिखारी । कहै कबीर सुन गोरख यह उमर हमारी ॥ अविध्व अविगतसे चलि आये कोई भेद सरम नहीं पाया । ना मेरो जन्म न गर्भवसेरा बालक है देखलाया ॥ काशीनथ जङ्गल विचडेरा तहाँ जोलाहे पाया । माता पिता मोरे कछु नाहीं न मेरो गृहदासी ॥ जुलाहाको सुत आनिकहाया जगत करत है हाँसी । धड नहीं मेरे गगन कछु नाहीं सूझै अगम अपारा ॥ सत्य स्वरूपी नाम साहेबको सौहै नाम हमारा । अधरद्दीप नहीं गगन गुफामें तहँनिजु वस्तु हमारा ॥ ज्योतिषरूपी अलख निरञ्जन सो जपै नाम हमारा । हाड चाम लोहू नहीं मोरे हौ सतनाम उपासी ॥ तारन तरन अभै पददाता कहै कबीर अविनाशी ।

गोरखवचन

कौन छुरा कौन पानी गुरु मूँडै कौन बानी ॥

सत्यकबीर वचन

शब्द छुरा निरञ्जन पानी गुरु मूँडै निरबानबानी ।

गोरखवचन

कौन दर कौन दरवेश कौन गुरुने मूँडै केश ॥

कौन पुरुको सुमिरी नांव मांगो भिक्षा भांडो गांव ॥

सत्यकबीर वचन

मन दर पौन दरवेश गुरु गोविंदने मूँडै केश ॥

अलख पुरुषको सुमिरो नांव मांगो भिक्षा तारो गांव ॥

( ४२ )

बोधसागर

गोरख वचन—चौपाई

कौन तुमारी उत्पत्ति कीनी । किसने तुमको माला दीनी ॥ कौन गुरु दीनो उपदेश । उतारो माला करो आदेश ॥

कबीर वचन

आदि पुरुषने उत्पत्ति कीनी । सिरजन हारने माला दीनी ॥ गुरु गोविंद दीनो उपदेश । न उतारों माला नाकरों आदेश ॥

गोरख वचन

क्या लै उठो क्या लै बैठो रहो कौनकी छाया । कौन माह निरञ्जन पेखे कैसे त्यागी माया ॥

कबीर वचन

एकले उठ एकले बैठे रहै एककी छाया ॥ एकै माह निरञ्जन पेखा सहजे त्यागी माया ॥

गोरख वचन

कौन तुमारी डिब्बी बोलिये कौन तुमारा चावल ॥ कौनसो तुममें सिद्ध बोलिये कौनसो तुमरो रावल ॥

कबीर वचन

काया हमारी डिब्बी बोलिये कर्म हमारे चावल ॥ एक हमसे सिद्ध बोलिये और सकल है रावल ॥

गोरख वचन

कौन तुमारी गुदरी बोलिये कौन तुमारा धागा ॥ कौन तुमारी टोपी बोलिये काहेते मन लगा ॥

कबीर वचन

काया हमारी गुदरी बोलिये पौन हमारा धागा ॥ गगन हमारी टोपी बोलिये अलख पुरु मन लगा ॥

आगमनिगमबोध

( ४३ )

गोरखवचन

कौन तुमारी तिलक बोलिये कौन तुमारा छापा ॥ कौन तुमारी जाति बोलिये कहा तुमारी आसा ॥

कबीरवचन

तत्त्व हमारी तिलक बोलिये राम नाम है छापा ॥ वैष्णव हमारी जाति बोलिये शब्द मंडलमें आसा ॥

गोरखवचन

शब्द कहाँसे आया कहो शब्दको विचार ॥ नहीं तो तिलक माला धरो उतार ॥

कबीरवचन

शब्दै धरती शब्दै अकाश । शब्दै पांच तत्त्वके बास ॥ कहैं कबीर हम शब्द सनेही । शब्द न बिनसै बिनसै देही ॥

गोरखवचन

अंडान मंडान चार खुरो द्वै कान ॥ जान तो जान नातो झोली माला उरे आन ॥

कबीरवचन

अण्डान धरती मंडान आकाश चारों खूट चारोंखूरी चंद्रसूर्यद्वै कान ना जानो मात्रा तो गुरु रामानंदकी आन ॥ शेर्ली सिंगी और खटपटी । फिर बोलो तोरों कनपटी ॥

गोरखवचन

आसन बांधो बासन बांधो अरु बांधो नौद्वारा ॥ तोहि बांधों तेरे गुरुको बांधों निकसे कौने द्वारा ॥

कबीरवचन

आसन मुक्ता वासन मुक्ता मुक्ता है नौ द्वारा ॥ मैं मुक्ता मेरो गुरुभी मुक्ता निकसै दशमें द्वारा ॥

( ४४ )

बोधसागर

चौपाई

गोरखनाथ कबीर समाजा । विविध ज्ञान विज्ञान विराजा ॥ चर्चा पर्चा बहुविधि ठानो । विदित जत्तमें लोगन जानो ॥ इहांसो कथा लिखो नहिं कोई । अन्त बाद जिहि औसर होई ॥ गोरख नर्म भये तिहि बारा । विनयसहित निजबचनउचारा ॥

गोरखबचन

नवो नाथ चौरासी सिद्ध, इनको अनहद ज्ञान । अविचल घर कबीरको, यह गति विरलाजान ॥ झोरी झण्डा कूबरी, शेली टोपी साथ । दाय़ा भई कबीर की, चढ़ाई गोरखनाथ ॥

धर्मदास बचन

दोहा-बाजा बाजा रहितका, परा नगरमें शोर । सतगुरु खसम कबीर है, नजर न आवै और ॥

नानकशाह बचन

शब्द-वाह वाह कबीर गुरु पूरा है । पूरे गुरुनकी मैं बलि जैहौं जाको सकल जहूरा है ॥ अधर दुलैच परै है गुरुनके शिव ब्रह्मा जह शूला है ॥ श्वेत ध्वजा फहरात गुरुनके बाजत अनहद तूरा है ॥ पूर्ण कबीर सकल घट दरशै हरदम हाल जहूरा है ॥ नाम कबीर जपै बडभागी नानक चरणको धूरा है ॥

सत्य कबीरबचन नानकशाहप्रति

शब्द-वाह वाह लडके जीतारहु । मंड़येकी रोटी बथुयेकी भाजी ठंडा पानी पीतारहु ॥ प्रेमकि मुई सुरतिको धागा ज्ञानगूदरी सीतारहु ॥

आगमनिगमबोध

( ४५ )

यहि लडकेकी बड बड अँखियां नितप्रति दरशन करतारहु ॥ कहैं कबीर सुनो भाई लडके रामरसिक रस पीतारहु ॥

मल्लुकदास वचन

शब्द-जपो रे भाई साहिब नाम कबीर ॥

एक समय गुरुवंशी बजाई कार्लिंदीके तीर ।

सुरनरसुनि सब चकित भये हैं अरु यमुनाजीको नीर ॥

काशी तजि गुरु मगहर आये दोऊदीनके पीर ।

कोइ गाड़ै कोइ अभ्रजलावै नेक न धरते धीर ॥

चार दागते सतगुरु न्यारा अजर अमरो शरीर ।

जगन्नाथको मंदिर थापे हटि गये सायर नीर ॥

आसा रोपि ससुद्ध हटाये ऐसे गुरु गँभीर ।

दास मल्लुक श्लोक कहत हैं खोजहु खसम कबीर ॥

दाबूराम वचन

साखी-अधर चाल कबीरकी, मोसे कही न जाय ।

दाढ़ कूदै मिरग ज्यों, पर धरनि पर आय ॥

हिन्दूको सतगुरु सही, सुसलमानको पीर ।

दाढ़ दोनों दीनमें, अदली नाम कबीर ॥

हिन्दू अपनी हृद चले, सुसलमान हृद माह ।

दाढ़ चाल कबीरकी, दोऊ दीनमें नाह ॥

दाढ़ बैठे जहाजपर, जो दरियाके तीर ।

जलकी जेती माछरी, रटै कबीर कबीर ॥

नाभाञ्च वचन

दोहा-वानी अरबो खरबो, ग्रन्था कोटि हजार ।

करता पुरुष कबीर, रहै नामे विचार ॥

नं. १० बोधसागर - ८