भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

सुमिरनबोध

( २७ )

भरमित पवन फिरे संसारा । निर्मल पवन ताहि असवारा ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदास । दुम नरियर स्नान प्रकाश ॥

स्मरण कलश धरनेका

दो पैसा औ एक सुपारी । अलश धरो उत्तम विस्तारी ॥ सवासेर लै तण्डुल धरौ । धर्मराय देख थरहरौ ॥ पांचो बाती देव लेसाई । तब गादी पर बैठो आई ॥ हृदय चरण वंशके धरो । सत्य कबीरकहिधोकपरिहरौ ॥

कलश सही करनेका

पांचतत्त्वघटभीतरपांचहिनाम । तासों होय जीवको काम ॥ सो लेखा तियवार कहैं कबीर सुनो धर्मदास । धर्मरायसो हंस उबार । जोति अजरलोककी अञ्जलोक देह पहुँचाय ॥ कहैं कबीर सुनो कडिहार । सारशब्द गहो टकसार ॥

स्मरण फूल चढावनेका

सुकृत वारिसों फूल मँगाये । सहजकी झारी आनि भराये ॥ सत्य पुरुषको आनि चढाये । धर्मदास उठ बिनती लाये ॥ हीरा मानिक लागे मोती । सत्य पुरुषकी निर्मल जोती ॥

स्मरण गादी बिछावनेका

चौका धरो मिठाई आनी । नरियर पान कपूर प्रवानी ॥ पुरुष बैठ सिंहासन आई । हंसहि नाही भार रहाई ॥ मान सरोवर कदली केरा । मेवा अण्ट लाय यह वेरा ॥ लौंगलाइची सत्यलोककेछोही । भौमे आनि मिठाई होई ॥ कहैं कबीर सुनो धर्मदास । सिंहासन बैठे मम दास ॥

स्मरण फूल माला बाँधनेका

मन माली तन फूल मँगाये । अभी अंक लै शब्द सुनाये ॥ मनकरवारी तन कह पोष । काया कञ्चन भई निर्दोष ॥ कहैं कबीर निज सुमिरो मोही । मारों यमै उबारो तोही ॥

( २८ )

बोधसागर

स्मरण आरती धरनेका

सत्य जीव आरती है नाम । सतगुरु शब्द सुनो परवान ॥ वोही नाममें बैठके लेहु धनीको पान । अंश वंश गुरु कीजिये ॥ देह धरो नहि आन । धीर गुरुको चीन्हके रहो सत्य मनलाय ॥ देखो खसम कबीर को हंसलोकको जाय

स्मरण चौका हाथ देनेका

करधर चौका विनती कीन्हा । तुम्हरे कहे भार हम लीन्हा ॥ अहो साहेब मोहे नहि भार । यह चौका विस्तार तुम्हार ॥ तुम जागो ओ शब्द तुम्हारा । समरथ मोहि उतारो पारा ॥

धर्मदास विनती करें, तुम हो सत्य कबीर ।

शिरके भार उतारहूँ, गहिके लावौ तीर ॥

इति श्रीस्मरण गुरुवाई भेदादि चौकाविस्तार विधि सम्पूर्ण

अथ लिख्यते स्मरण अभेद

प्रथम समरथके मुखसो सहज अंश उत्पन्न भये ताकोबीज । बुन्द दियो तामें सर्व रचना आई औ सात करी भई ॥

करीके नाम

प्रथम पोहप करी, दूसरे मूल करी, तीसरे अम्बुकरी, चौथे सुघर करी, पांचे सुखसागर करी, छटये पंकज करी, सातेमंजुलकरी । दूसरे समरथके नेत्र सो इच्छा सुर्तउत्पन्नभई ॥ ताकोजावनबुन्द दियो तासों पांच अंड भये ॥ तीसरे-समरथकेश्रवणसोमूलसुर्त उत्पन्न भई ताको अमी बुन्द दियो तासो पांच अंड पोषे तासो पांच ब्रह्म उत्पन्न भये तिनको आज्ञा दिये एक एक ब्रह्म एक एक अण्डमों आये चौथे समरकी नासिकासे सोहंग सुर्त उत्पन्न भये तासो पांच अण्ड फूटे तासों आठ अण्डभये ॥

सुमिरनबोध

( २९ )

अंशनके नाम

प्रथम अचित्य, दूसरे जोहेंग, तीसरे अकह, चौथे सुकृत, पांचे हिरण्यमय, छठे अक्षर, साते योगमाया, आठे निरंजन, अचिन्तको चिन्ता नहीं, तेज अण्डके मालक, प्रवान, पालंग १२ वंश ॥१॥ प्रथम माया, दूसरे कूर्म तिसरे अदल अष्ट, चौथे निरञ्जन, पांचे नभ, छठे समीर, साते तेज, आठे नीर, नवे पृथ्वी ॥ ९ ॥ दूसरे जो अङ्ग हंस, तिनको बैठक धीरज अण्ड दिये अण्डको प्रवान पालंग पचीस ॥ २५ ॥ और वंश सोरह ॥१६॥

वंशनके नाम

प्रथम अजरमुनि, दूसरे अगममुनि, तीसरे हंसमुनि, चौथे चन्द्र मुनि, पांचे आपमुनि, छठये पुरुषमुनि, सातें अलंजित मुनि आठे कलंक मुनि, नवें शीतलमुनि, दशयें श्री मुनि, ग्यारहे कण्ठमुनि बारहें कनक मुनि, तेरहे बेहंग मुनि, चौदहे गंगमुनि, पन्द्रहहे सोम मुनि, सोरहे जलरंग ॥ १६ ॥

तीसरे अकहअंश

तिनको बैठक छिमा अण्डभो दिया, अण्डको प्रवान व्यालिस ॥ ४२ ॥ वंश सताईस ॥ २७ ॥

वंशके नाम

प्रथम प्रेम, दूजे हुलास, तिसरे आनन्द चौथे विशाष, पांच हेत छठे प्रीति, साते निरख, आठे विवेक, नवें सुमत, दशें क्षमा, ग्यारहें धीरज, बारहें आलहाद, तेरहें शील, चौदहें संतोष, पन्द्रहहें सुमन, सोरहें बुद्धि सत्रहें भाव, अठारहें भक्ती, उन्नीसवें दया, बीसे ज्ञान, एकइसे किया, बाईसे विचार, तेइसे कृपानि, चौबिसे संतोष पचीसे भेद, छबीसे इच्छा, सताइसे भय, तिनको राज्य क्षमा अण्ड पुरुषके हजूरी ॥

( ३० )

बांधसागर

चौथे सुकृत अंश

तिनके बैठक सत अण्डमोदिये, अण्डको प्रमान पालंग बहत्तर ॥ ७२ ॥ तिनके वंश बयालिस ॥ ४२ ॥

वंशनके नाम

प्रथम काय सर्वांग रहाई, सर्वांग कायाते बीज बुन्द निरमाई बीजबुन्दते अविगति काया। अविगत कायाकेदशोंभेदले। कायाके रूपसुर्त निर्माया। रूप सुर्तके सतगुरु सोहंके गुंग पुरुष कहाये गुंग पुरुषके अचित पुरुष कहाये। अर्चित पुरुषके ज्ञानी अंश ज्ञानी अंशके सुजनजन अंश। सुजनजन अंशके चूरा मणी नाम। चूरामणी नामके सुदर्शन नाम। दूसरे कुरुपति नाम। तीसरे प्रमोद। नाम। चौथे कवल नाम। पांचे अमोल नाम। छठे सुर्त सनेही नाम। साते हक्कनाम। आठे याक नाम। नवें प्रकट नाम। दशें धीरज नाम। ग्यारहें उग्रनाम। बारहें दया नाम। तेरहे गत्र नाम। चौदहें प्रकाश नाम। पंद्रहें अदित नाम। सोरहें मुकुन्द मुनि। सत्रहें अधरनाम। अठारहें उर्द्धनाम। उनीसें ज्ञानी नाम। ... बाइसें अजरनाम। तेइसे रस नाम। चौविसे गंग मुनि। पचीसे पारस नाम छबीस जाग्रत नाम। सताइसे भुंगमुनि। अठाइसे अखै नाम। उनतीसे कंठ मुनि। तीसें संतोषदास। एकतीसे चात्रकमुनि। बत्तीसे अजरनाम तेतीसवें दुर्गमुनि। चौतीसवें आदि नाम पैतीसवें महा मुनि। छतीसवें निज नाम। सैतीसवें साहब दास। अडतीसवें उर्द्धदास उनतालीसवें करु। चालीसवें दीर्घमुनि। एकतालीशवें महामुनि।

साखी-वंश व्यालीसके आगम, चूरामणि सँतायन।

वचन हमारा प्रकटे, निःअक्षर निज नाम ॥

तिनको राज सत अण्डमें, चौकी लोक पांजी ॥

सुमिरनबोध

( ३१ )

पांचे हिरण्यमय अंश

तिनको बैठक सुमत अण्डमों दिया अंडको प्रवान पालंग ॥६४॥ वंश सात ॥ ७ ॥

वंशानके नाम

प्रथम वंशपारन, दूसरे स्वांतसनेही, तीसरे भृंगसनेही, चौथे ॥ लरसिध, पांचेदीपकजोत, छठे जलभाव, सातें मलयगिरि ॥७॥ तिनको राजसुमत अंडमें पुरुषके हजूरी ॥

चार गुरुके नाम-लोकके और भवसागरके

प्रथमनाम लोकमें जो हंस कहिये औरभवसागरमेंगुरु चतु- भुंज गोसाईं तिनके वंश सोरह ॥ १६ ॥ दक्षिण दिशा सामवेद पुक्षद्वीप दरभंगा शहर तथा प्रकट भये ॥ तिनकोमूलज्ञानबानी ता बानीले पंथ चलायो, ब्राह्मणकुलप्रकट भये ॥११॥ दूसरे नाम लोकमें अकह अंश कहिये ॥ २७ ॥ पूर्वदिशा यजुर्वेदकुशद्वीप करनाटक शहर तहाँ प्रकट भये । तिनको टकसारज्ञानतावाणीले पंथ चलायो ॥ २ ॥ कायस्थकुल शुद्ध, तीसरेनामलोकमें सुकृत अंश कहिये और भवसागरमें गुरुधर्मदास गोसाईंकहिये तिनके वंश व्यालिस ॥ २४ ॥ उत्तरदिशा ऋग्वेद जम्बूद्वीपभरतखण्ड बांधो शहर तथा प्रकट भये, तिनके कोट ज्ञान बानी ताबानी लै पंथ चलाये ॥ ३ ॥ चौथे नाम लोकमेंहिरण्यमयअंशकहिये । और भवसागरमें गुरुसहेतेजी गोसाईं कहिये तिनके वंश सात ॥ ७ ॥ पश्चिम दिशा अथर्वण वेद सिलमिल द्वीप मानिकपुर शहर तहाँ प्रकट भये । तिनको बीजक ज्ञान बानी ता बानीले पंथ चलाये क्षत्रियकुल ॥ ४ ॥

दश सोहंगकेनाम

प्रथम पुरुष सोहं दूसरे सहज सोहंग तीसरे इच्छा सोहंग ॥

( ३२ )

बोधसागर

चौथे मूल सोहंग पाचे वोहं सोहंग छटे अर्चितसोहंगसाते अक्षर सोहंग, आठे निरंजन माया सोहंग, नवें ब्रह्म विष्णु महादेव सोहंग ॥ १० ॥

नौ सुतंके नाम

प्रथम सहज सुतं, दूसरे इच्छा सुतं, तीसरे मूल सुतं, चौथे सोहं सुतं, पांचवें अर्चित सुतं, छठे अक्षरसुतं साते निरंजन सुतं, आठे सुकृत सुतं, नवें नौतम सुतं ॥ ९ ॥

दश प्राणके नाम

प्रथम अपान, दूसरे समान, तीसरे प्राण, चौथे उदान, पांचे व्यान, छठे नाग, सातें कूर्म, आठे किलकिला, नवें देवदत्त, दशमें धनञ्जय ॥ १० ॥

आठ कर्मके नाम

प्रथम ज्ञानर्वनी, दूसरे रसनार्वनी, तीसरे वेदवर्नी, चौथे ध्यान- वनी पांचे अंतराय, छठे गोट, सातें प्रमान, आठे आव ॥ ८ ॥

तीन कर्मके नाम

प्रथम संचित, दूसरे क्रियमाण, तीसरे प्रारब्ध ॥ ३ ॥

दो कर्मके नाम

प्रथम विधि, दूसरे निषेध ॥ २ ॥

चार ज्ञानके नाम

ब्रह्मज्ञान अंचितको, अनुभवज्ञान अक्षरको त्वचाज्ञाननिरञ्ज- नको, छुद्गज्ञान माया त्रिदेवाको ॥ ४ ॥

चार ज्ञानीके नाम

प्रथम पिशाच ज्ञानी, दूसरे पंडित ज्ञानी, तीसरे उन्मत्तज्ञानी, चौथे जडज्ञानी ॥ ४ ॥

सुमिरनबोध

( ३३ )

चार ध्यानके नाम

प्रथम पंडीसीतध्यान, दूसरे रूप सत्य ध्यान, तीसरे पद सत ध्यान, चौथे रूपातीत ध्यान ॥ ४ ॥

चार पदार्थके नाम

प्रथम अर्थ, दूसरे धर्म तीसरे काम, चौथे मोक्ष ॥ ४ ॥

तीन पदके नाम

प्रथम तत्त्वपद, दूसरे तत्त्वपद, तीसरे असिपद ब्रह्म ॥ ३ ॥

तीन तापके नाम

प्रथम अध्यात्म, दूसरे अधिदेव, तीसरे अधिभूत ॥ ३ ॥

तीन जीवके नाम

प्रथम मोक्षी । दूसरे विषय, तीसरे पामर ॥

पांच खानके नाम

प्रथम मनुष्यखान । दूसरे पिण्डजखान । तीसरे अण्ड खान । चौथे उषमज खान । पांचे अस्थावर खान ॥

पांच वाणीके नाम

प्रथम सिंगिनी वाणी । दूसरे बिगिनि वाणी । तीसरे किंगिनि वाणी । चौथे इंगिनि वाणी । पांचे रिंगिनि वाणी ॥

पांच तत्त्वके नाम

प्रथम आकाश । दूसरे वायु । तीसरे तेज । चौथे जल । पांचे पृथ्वी ॥

तिनको विभाग

मानुष खानमें सिंगिनिवाणी आकाश, वायु, तेज, नीर । पृथ्वी ये चार तत्त्व पिंडज खानमें वर्तते हैं । तीसरे अण्डज खानमें किंगिनि वाणी, वायु, तेज, जल ये तीन तत्त्व अंडज खानमें

( ३४ )

बोधसागर

वर्तते हैं। चौथे उषमज खानमें इंगिनि वाणी, वायु, तेज, ये दो तत्त्व उषमज खानमें वर्तते हैं। पांचे अस्थावर खानमें किंगिनि वाणी जल एक तत्त्व वर्तते हैं ॥

जो इनको प्रवानजात

प्रथम चार लाख खान मानुषको। दूसरे पिंडज नौलाख जात । तीसरे अण्डज चौदह लाख जात । चौथे श्वेदज उषमज सताइस लाख जात पांचे अस्थावर तीस लाख जात ॥

अथ पुरुषसत्रथसो अंश भये तिनको नाम

प्रथम पुरुषके त्रिकुटी सो अंकुर । पुरुष नेत्र सो इच्छा । पुरुषको नासिका सोहं पुरुषके मुखसो । अर्चित तेज अंड पालंग बारह अचिन्त अंश प्रेम सुर्त । धीरज अण्डज पालंग पचीस जोहंग अंश सोहं सुर्त । छिमा अण्ड पालंग ब्यालीस अकह अंश मूल सुर्त । सत् अंगुपालंग बहत्तर सुकृत अंश इच्छा सुर्त । सुमत अण्ड पालंग चौसठ, हिरण्मय अन्त अंकुर सुर्त ॥

इति श्री सुभिरपांजी आदि षट्कर्म विधि, चौकाविधि गुरुवाई

भेदादि विस्तार विधि सम्पूर्ण

सत्यमुक्त, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्रनाम, दयानामकी दया, वंश व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे सुमिरनबोध प्रारंभः

षट्त्रिंशस्तरङ्गः

तृतीय बोध

अथ गुरुमहिमा शतक प्रारंभः

गुरु संतन की आज्ञा पाई । गुरु महिमा अमृतरस गाई ॥ गुरु मिले तो अगम बतावे । यमकी आँच ताहि नहि आवे ॥ जेता नाम रूप जग माहीं । सबहींमें सत गुरुकी छाहीं ॥ सतगुरु सकल कलमके साखी । सकल भुवन गुरुतन्मय राखी ॥

( ३६ )

बोधसागर

सतगुरु अजर अमर अविनाशी । सतगुरु परमज्योतिपरकाशी ॥ गुरु गोविन्द दोउएकस्वरूपा । नाम रूप गुण भेद अचूपा ॥ गुरु अविचल पद पूर्णधामा । गुरु स्वामीगुरु जग विश्रामा ॥ सतगुरु जनम मरनते न्यारा । सतगुरु सबका सिर्जन हारा ॥ नर्गुण गुरु रूपसे न्यारा । छाड़ रह्यो सबही संसारा ॥ है सतगुरु सत पुरखै आपे । जासो प्रकट ब्रह्म भयो जापे ॥

साखी-गुरु ईश्वर गुरु परब्रह्म, सतगुरु सबका देव ।

गुरु बिन पार न आवई, ताते शरणो लेव ॥

गुरुकी शरणा लीजै भाई । जात जीव नरक नहिं जाई ॥ गुरुकी शरण साधू जाने । गुरुकी शरण मूढ पहिचानै ॥ गुरु सरणा सबहिनसे भारी । ससुझि गयो सोई नर नारी ॥ गुरु शरणा सो विघ्न विनाशे । डुरमति भाजे पातक नाशे ॥ गुरु शरणा चौरासी छूटे । आवगमनकी डोरी टूटे ॥ गुरु शरणा यमदण्ड न लागे । ममता मरै भक्तिमें पागे ॥ गुरु शरणासे प्रेम प्रकाशे । पारख पाद मिटै यम आसै ॥ गुरु शरणा परमात्म दर्शे । त्रय गुण छोड़ि सतपद परशे ॥ गुरु मुख होय परम पद पावै । चौरासीमें बहुरि न आवै ॥ सत्य कबीर बतायो भेवा । धर्मदास करु गुरुकी सेवा ॥

साखी-गुरुकी सेवा जो करै, हृदया ध्यान लगाय ।

काल जाल सो छूटिके, सत्य धामको जाय ॥

गुरुपद सेवे विरला कोई । जापर कृपा साहबकी होई ॥ गुरु सेवा जो करै सुभाग । माया मोह सकलभ्रम भागा ॥ नौ नाथ चौरासी सिद्धा । गुरु चरणों सेवे बहु विद्धा ॥ गुरुके सेवे कटे दुख पापा । जनम जनमको मिटे सन्तापा ॥ गुरुकी सेवा सदा चित दीजै । जीवन जन्म सुफलकरलीजै ॥

सुमिरनबोध

( ३७ )

चौविस रूप हरि आपुहि धरिया । गुरु सेवा करि सबही विरिया ॥ शिव विरंचि गुरु सेवा कीन्हा । नारद दीक्षा ध्रुवको दीन्हा ॥ सकल मुनि गुरु सेवा चाही । गुरु सेवा करि पँथ अवगाही ॥ गुरुसेवे सो चतुर सयाना । गुरुपट तर कोइ और न आना ॥ गुरुकी सेवा मुक्ति निज पावे । बहुरि न हँसा भवजल आवे ॥

साखी-गुरुकी सेवा कीजिये, तजि मनका अभिमान ।

गुरु विनु दोसर को नहीं, धर्मनि सतगुरु जान ॥

योग दान जप तीर्थ नहाना । गुरु सेवा विनु निष्फलजाना ॥ गुरु सेवा विनु बहु पछतावे । फिरि फिरि यमके द्वारे जावे ॥ गुरुसेवा विनु कौन जो तारे । भव सागरसे बाहर डारे ॥ गुरुसेवा विनु जड का करि है । काकी नाव बैठिकर तरि है ॥ गुरुसेवा विनु कछु न सरि है । महाअन्ध कूपै महाँ परि है ॥ गुरुसेवा विनु घट अँधियारा । कैसे प्रकटे ज्ञान उजियारा ॥ गुरुसेवा विनु सदा जो धावे । गुरु विनु सांच राह नहिं पावे ॥ गुरु सेवा विनु कान फुंकावे । भवैरि भवैरि भवजलमें आवे ॥ गुरुसेवा विनु द्रन्द अँधेरा । गुरु सेवा विनु कालको चेरा ॥ गुरुसेवा विनु प्रेम विहूना । दिन दिन मोह होयअम दूना ॥

साखी-गुरुसेवा विनु ना छुटे, भवजलको सन्ताप ।

गुरुसेवा करि गुरु मुख, काटे सबही पाप ॥

गुरुमुख होई परम पद पावे । चौरासीमें बहुरि न आवे ॥ गुरुकी नाव चढे जो प्रानी । खेद उतारे सतगुरु ज्ञानी ॥ गुरुके चरण सदा चितलाना । क्यों भूले तू चतुर सुजाना ॥ गुरु भगता गुरु आतम सोई । वाहीके मन रहो समोई ॥ गुरुमुख ज्ञान ले चेते सोई । भवमें जनम बहुरि न होई ॥ गुरुमुख प्राणी सदाई जीवै । अमर होई ज्ञान रस पीवै ॥

( ३८ )

बोधसागर

गुरुसीढी चढि ऊपर जाई । सुख सागरमें रहे समाई ॥ गौरी शंकर और गणेशा । उनहू लीना गुरु उपदेशा ॥ गुरुमुख सदाअटल अविनाशी । सुर नर मुनिसबध्यानधरासी ॥ गुरुमुख सब भक्त औ दासा । गुरुमहिमा उन्हीसे प्रकाशा ॥

साखी-गुरुमुख को सबही मिलै, चार पदार्थ सार ।

निगुरा को तो कुछ नहीं, वहे सो नरकहि धार ॥

गुरु विनु मुक्ति ना पावै भाई । नर्क ऊर्द्ध सुख वासा पाई ॥ गुरु विनु काहु न पाया ज्ञाना । गुरु विनु रहीयमलोकसिधाना ॥ गुरु विनु पढे जो वेद पुराना । ताको नाहि मिलै सतज्ञाना ॥ गुरु विनु जो सो पशू कहावै । मातृ व बुधि दुर्लभ होय जावै ॥ गुरु विनु दान पुण्य जो करई । होय निष्फल सब मतसोकहई ॥ गुरु विनु भ्रम ना छूटे भाई । कोटि उपाय करे चतुराई ॥ गुरु विनु होम यज्ञ जो करई । जाय पुण्य पाप सो भरई ॥ भवसागर है अगम आगहा । गुरु विनु कैसे पावै थाहा ॥ गुरु विनु बूझे सकल अचारी । तैतीस कोटि देव सब धारी ॥ गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम अनेक नरकके बासी ॥

साखी-गुरु आज्ञा ग्रहणकरि, छोडे मनसुखताकाल ।

गुरु कृपा तब पावई, क्षणमें होय निहाल ॥

गुरुकी कृपा कटै यम फांसी । विलम्ब न होय मिलै अविनाशी ॥ गुरु कृपा शुक्रदेवहि पड़या । चढि विमान वैकुण्ठहि गइया ॥ गुरुकी कृपा जब नारद पयऊ । मेटि चौरासी सुखी सो भयऊ ॥ गुरुकी कृपा रामपर सोहै । जीवन मुक्ति पाई जग मोहै ॥ गुरु कृपा बामदेवहि दइया । गर्भ माहिं गुरुज्ञानहि पड़या ॥ गुरु कृपा ध्रुव जो दरसा । अटल अमान परमपदपरसा ॥ गुरु कृपा ते भये उजासी । सनक सनन्दन नारद व्यासी ॥

सुमिरनबोध

( ३९ )

गुरु कृपा ते जनक विदेही । सो गुरु माहि परमपद लेही ॥ गुरु कृपा ते जन प्रहलादा । दैत्य होइ भक्ति तिन साधा ॥ गुरु कृपा जो कोई पावै । सकलो दुरमति दूर बहावै ॥

साखी-गुरु कृपा ऐसी अहै, सुनो साधु चित देइ । ताते गुरु सुमिरण कहू, रहे कालको लेइ ॥

गुरु गुरु जाप करो मन मेरा । काल दूत नहि आवै नेरा ॥ गुरुको ध्यान धरों नर नारी । सहजे सहज तरो संसारी ॥ गुरु गुरु सुमिरो मनसे प्यारो । गुरु गुरु कहो कोटि अवतारो ॥ गुरु गुरु जाप काज सबसारे । दुर्मति कपट दूर करि तारे ॥ गुरु गुरु जाप करो मन धीरा । गुरुके नाम मिटै सब पीरा ॥ गुरु गुरु मंत्र हृदय धरीजै । तन मन धन सब अर्पण कीजै ॥ गुरुको सुमिरन निशदिन कीजै । जीवन जन्म सफल करि लीजै ॥ एक नाम गुरु देत दिखाई । सो निजनाम कलपि नहि जाई ॥ गुरु सुमिरण निज नाम विचारे । आप तरे औरनको तारे ॥ सतगुरु शब्द नाम निरधारा । भव सागरसे उतरे पारा ॥

साखी-गुरुको सुमिरण कीजिये, निशदिन ध्यान लगाय ।

गुरु लक्षण अब कहत हो, सुनहु धीर चित लाय ॥

राग द्वेष दोनों से न्यारे । ऐसा गुरु शिष्यको तारे ॥ आशा तृष्णा कुबुद्धि जलाई । तन मन वचन सबन सुखदाई ॥ निरालम्ब भ्रम रहित उदासी । निर्विकार जानो निर्वासी ॥ निरमोही निरबंध निशंका । सावधान निरवान निबंका ॥ सार याही और सरवज्ञी । संतोषी ज्ञानी सतसंगी ॥ अयाचक जन निर अभिमानी । पक्षरहित अस्थिर शुद्धवानी ॥ निस्तरंग बाही परंपंचा । निष्कर्म निरलिप्त अबंचा ॥ बोल अडोल भाखे सो सांची । कोई बात कहै नहि कांची ॥

( ४० )

बोधसागर

जेहि विधि कारज जिवका होई । निर्णय वाक्य उचारे सोई ॥ झाई सन्धि कालका फेरा । पारख लाई करे निबेरा ॥

सार्वी-जाति बड़ाई आश्रमहि, मानबड़ाई खोय ।

जो सतगुरु के पल लगे, सांच शिष्य है सोय ॥

गुरु आगे राखे माथ । करै बिनय दुख मेटो नाथ ॥ अहौ अधीन तुम्हारे दासा । देहू अपने चरनन बासा ॥ यह तन मैं तोहि भेट चढायो । अपनी इच्छा कुछ न रखायो ॥ जो चाहो सो तुम अब करो । या भांडको जेहि विधि भरो ॥ भावै धूप छांहमें डारो । भावै बोरो भावै तारो ॥ गुण पौरुष कछु ओ नहिं मेरो । सब विधि शरण गही गुरु तेरो ॥ मैं अब बैठा नाव तुम्हारी । आशा नदी सो करिये पारी ॥ अपना कीजै गहिये बाहीं । धरिये शिरपर हाथ गोसाई ॥ बहु विधि बिनती गुरुसे करई । मान मोह हृदय नहिं धरई ॥ देखि बिनयगुरु होहि अनन्दा । तब पावै सिख परमानन्दा ॥

सार्वी-गुरुके आगे जायके, ऐसी बोले बोल ।

कूर कपट राखे नहीं, अरज करै मन खोल ॥

देखि प्रसन्नता गुरुकी भाई । गुरुते कहिये शीश नवाई ॥ ऋद्धि सिद्धि फलमैं कछु नहिं चाहूँ । जगत कामनाको नहिं लाहूँ ॥ चौरासी मैं बहु दुख पायो । ताते शरण तुम्हरी आयो ॥ मुक्त होनेको मनमें आवे । अवागमन सो जीव डरावे ॥ सत्य भक्ति की चाह हमारे । ताते पकन्यो चरण तिहारे ॥ सत्य ज्ञानते हृदया भीजै । यही दान दाता मोहि दीजै ॥ मैंहूँ दास सो लेहु उबारी । हौ मच्छी तुम मिष्ट सुपारी ॥ हौ पतंग मैं तुम हौ डोरा । मैं तो फिरूँ तुम्हारे जोरा ॥ होहु दयाल दया अब कीजे । बूडत भव में बाहँ गहीजे ॥

सुमिरनबोध

( ४१ )

काल संधि झाँईके जाला । पडिकेहुःखित भयो विहाला ॥

साखी-दया होय गुरु देवकी, छुटे अविद्याभान ।

मिथ्या माया सब मिटे, पावे अविचल ज्ञान॥

सारशब्द गुरुते पावे । जाते जीव काज बनि आवे ॥

पूछ गुरुसे सब अरथाई । सारशब्दको निर्णय भाई ॥

जाते होय जीवको काजा । पाछे सोई होय निव्याजा ॥

त्रिविधि शब्दको पारख बूझे । सत्य पदारथ तबहीं सूझे ॥

सार शब्दको अङ्ग विचारे । मानुष लक्ष भले निरुआरे ॥

पशुवत धर्मको रूप लखावे । करि निरुआर सबगुरु बतावे ॥

हंस स्वरूपहु लीजे जानी । सबहि बतावे सतगुरु ज्ञानी ॥

साँच झूठका निर्णय करे । सत्य होय सो हिरदै धरे ॥

पक्का सौदा गुरुसे लेवे । देखि अधीन गुरु सब देवे ॥

गुरु सो देव सब कछु भाई । क्षणमें भेटे काल कलाई ॥

साखी-काल जालसे छूटिकै, मोक्ष मिलनकी चाह ।

सत्य मिलनकी युक्ति सब, गुरु बतावे राह ॥

गुरुसे पूछे ब्रह्मस्वरूपा । गुरुसे पूछे प्रकृति अनूपा ॥

गुरुसे पूछे सूक्ष्म तत्ता । गुरुसे पूछे त्रिगुण सत्ता ॥

गुरुसे पूछे महाकारण देही । गुरुसे पूछे तुरिया लेही ॥

गुरुसे पूछे पाच तनमात्रा । गुरुसे पूछे पंचकी यात्रा ॥

गुरुसे पूछे सूक्ष्म कारण । गुरुसे पूछे स्थूल सवारन ॥

गुरुसे पूछे ज्ञान अरु कर्मा । दशों इन्द्री सहित स्वधर्मा ॥

गुरुसे पूछे त्रिकुटी भाई । चौदह यम सब देइ बनाई ॥

गुरुसे पूछे चतुर्दश स्थाना । चौदह देव तबे मनमाना ॥

चौदह पूछि करे प्रवेशा । तबही पावे ब्यालिस वेशा ॥

पंचकोश सो गुरु से जाने । आतम ज्ञान तबही मनमाने ॥

( ४२ )

बोधसागर

साखी-पंचकोशमत प्रकट जग, वेद कहे सत सोइ । परख बुद्धि निज दृष्टि बल, गुरु कृपा करे जब होइ ॥ द्वैताद्वैत का करे विचारा । शुद्धाद्वैतका करे उपचारा ॥ विशिष्टाद्वैत भली बिधि जाने । पूछत पूछत सबै मन मानै ॥ कर्मोपासना करै विचारा । ज्ञान विज्ञानका पावे सारा ॥ अर्थ धर्म मोक्ष रू कामा । सबका पूछे असली धामा ॥ नवधा भक्तिको रूप पिछाने । योगक्रियाको भली बिधि जाने ॥ राजयोग हठयोग स्वरूपा । सबही आसन सिद्धि अनूपा ॥ ब्रह्म जीव अरु प्रकृतिका भेदा । द्वैतज्ञानका करे अच्छेदा ॥ नाना मत जग आहि जो भाई । सबका भेद जो गुरुसे पाई ॥ आस्तिकनास्तिक मन अनुहारा । सबही फंदा करे विचारा ॥ पूछि गुरुसे सबही सुधारै । गुरुके पारख काल फन्द टारै ॥

साखी-संसाररी पारख बिना, कैसे पावे ठौर । विध युक्ति अनमिल सबै, भोग वहीँ औरके और ॥ कालजालकी विकट है चाला । जीव विकल तेहिमध्ये विहाला ॥ पारख यथारथ प्रभु प्रकाशू । कठिन महात्म काल विनाशू ॥ काल चक्र चक्की कठिनाई । पारख पाये जात बिलाई ॥ पारख बल बहियाँ भौजेही । सबहीविधि चीन्ह पडाखलतेही ॥ गुरु प्रसाद पारख हठ पाये । विकट कला यम जालछुडाये ॥ एक एक पारखे जेहि फाँसा । सो संक्षेप करे प्रकाशा ॥ जाते जीव बचे यमफाँसा । शरणागत हठ परख विलासा ॥ भक्तिभाव प्रेमहि अधिकाई । परख लहत बल काल नशाई ॥ कालकला नहि पावे ताको । भक्ति भाव गुरु पारख जाको ॥ परम पारखी जीवन मुकता । नहि पावे तेही कालक उकता ॥ साखी-बिनु शरणागति परख गुरु, नहि जीवन निस्तार । सरवोपरि गुरु परख हैं, लहै तो होय उबार ॥

सुभिरनबोध

( ४३ )

गुरु से दीक्षा लीजे भाई । सदा गुरुकी कीजे सेवकाई ॥ दीक्षा लेई जले जो आडा । सात जनम सो सिरजे पाडा ॥ सतगुरुकी जो आज्ञा लोपे । ता ऊपर यम राजा कोपे ॥ सतगुरु की जो अदब न राखे । ताको दोजख शास्तर भाखे ॥ सतगुरु की न लाये विश्वास । ताको काल करत है आसा ॥ गुरुसेती गूमान जानावै । जनम जनम सो यमपुरजावै ॥ गुरुसङ्ग आडी टेढी बोलै । स्थान होइ सो घरघर डोलै ॥ गुरुसङ्ग ज्ञान गर्व दिखावे । कोटि जनम क्रूर को पावै ॥ गुरुसे बाद करे नरनारी । कोटि जनम सो नरक मँझारी ॥ गुरुको शब्द मेटि पग धरई । यम किंकर के फन्दे परई ॥

साखी- गुरुसीढीते उत्तरे, शब्द विद्वान होय ।

ताको काल घसीटि है, राखी सकै नहिं कोय ॥

सतगुरु की मरयाद न धरई । लख चौरासी कुण्डमें परई ॥ गुरुको शब्द न सुने अज्ञानी । भवसागर डूबे अभिमानी ॥ गुरुको देखि धरत अभिमाना । ब्यास बचन पड नरकनिधाना ॥ गुरुको ज्ञान मेटि मत थापी । तीन लोकमें बडो ते पापी ॥ गुरुको मेटि बखानत आपा । धरती भार मरत तेहि पापा ॥ गुरुसे सो ऊंचा चढि बैठे । सात कुण्ड नरकमें पैठे ॥ गुरुसे उलटा बचन सुनावै । सात जनम कोढी को पावै ॥ गुरुको उलट सुनावे बैना । सात जनम अन्धा होय सो नैना ॥ गुरुको छोड देव जो पूजे । बादुर होय दिवस नहिं सूझे ॥ गुरु को छोड अनत जो जावे । उलूक होय सो जन्म गँवावे ॥

साखी- शिवपूजामें बैठिके, गुरुसे करि अभिमान ।

काकभुशुण्ड शिवशापते, पडचो चौरासीखान ॥

गुरुनिन्दा जाके मुख उपजे । कोटि जनम गद्दा हो निपजे ॥

( ४४ )

बोधसागर

गुरु निन्दा जाके सुख होई । ताको सुख ना देखो कोई ॥ अपने सुख गुरु निन्दा करई । शूकर भान जनम सो धरई ॥ गुरु की निन्दा सुने जो काना । सो तो पावे नरक निधाना ॥ गुरु निन्दा सुने जो श्रवण सुनयी । अपने हाथ प्राख निज हनयी ॥ गुरु निन्दक नारायण होई । वाको सुख ना देखौ कोई ॥ गुरु निन्दक धरती पग चम्पे । ताके भार धरनि अति कम्पे ॥ गुरु निंदक अवनी पर सोवे । धरती धरत शेष अति रोवे ॥ गुरु निंदक जब ही सुख बोले । धरती गगन मेरु ग्रह डोले ॥ गुरु निन्दक जो बचन सुनावे । ज्ञानी कान मूँदिके जावे ॥

साखी-गुरु निन्दा छाडो सुजन, गुरु स्तुति मन धारि ।

गुरुको राखो शीश पर, सब विधि करे गुहारि ॥

सतगुरु मिले परम सुखदाई । जनम जनम का दुःख नशाई ॥ सतगुरु मिले तो अगम बतावे । यमकी आँच ताहिनिहिं आवे ॥ सुख सम्पति अपनो नहिं प्राणी । समझि देखु तुमनिश्चय जानी ॥ तीरथ वरत और सब पूजा । गुरु बिनु होवे सबही लूँजा ॥ धारा दोई भल जग माहीं । गृह वैराग बिन औरन आहीं ॥ दोऊ गुरुकी कृपासे पावे । गुरु बिनु भेदसोकौन बतावे ॥ करि त्याग सब गुरुको दीजे । पारख पाइ सदा सुख लीजे ॥ गिरही रही भगति अनुसारै । तन मन धनअर्पण करि डारे ॥ दशवां अंश गुरु को दीजै । जीवन जन्म सुफल करलीजै ॥ सतगुरुके सब आगे धरिये । शीश नाइ गुरुदंडवत करिये ॥

साखी-गुरु सो भेद जो लीजिये, शीश दीजिये दान ।

बहुतक भोढ़ पचिमुये, राखि जीव अभिमान ॥

गुरुसे रहे सदा मन जोरी । जैसे नटुवा चढ़त है डोरी ॥ पारख तार चढी भयनिहिं पावे । छेडे पारख चूर होइ जावे ॥

सुमिरनबोध

( ४५ )

लोपे नहीं सतगुरुका बाचा । सो सतगुरुका सेवक सांचा ॥ सोइ शिष पावै पारख घाटा । सोइ पावे सत्य सो बाटा ॥ निर्माही सतगुरु की रीती । सांचा सेवक लावै प्रीती ॥ मिलि पारखसबभयमिटिजावै । गुरुमुख शब्द सदालौ लावै ॥ देखि दुसह दुख जीवन केरी । दया करी पारख प्रभु प्रेरी ॥ निज पद जानि दया सोकरई । बन्धन जीव छुटावन लहई ॥ केतिक पारख प्रभुके पाये । जरा मरण यम जाल मिटाये ॥ जिन्ह जिवलहे पारखप्रभु केरा । महाराज यम जीव निवेरा ॥ सारखी-गुरु महिमा पूरण भई, सतगुरु किरपा कीन ।

संतनकी वाणी बहुत, यामें संग्रह लीन ॥

पाठफल वर्णन

गुरुमहिमा सबते अधिकाई । शिव शिवाप्रति यही दृढाई ॥ ब्यास वचन औ वेदे गाया । गुरुसे अधिक नहीं रघुराया ॥ सत्यगुरु कबीरहु परखाये । धर्मदास गुरु महिमा गाये ॥ रामहरस जू पूरण दासा । सबही गुरु महिमा परकाशा ॥ जेते भये जग बुद्धिमति धारी । सब गुरुमहिमा कीन उचारी ॥ सबका सार यामधि पढ़े । अब याकी महिमा सुन लइये ॥ तीनों संध्या जो यहि पढ़यी । छोड़ि कुमारग सतपथ लहयी ॥ सांची श्रद्धा मनमें लाई । बूझि बूझिके पाठ कराई ॥ बिन बूझे सो धुन्द अँधेरा । परि अभिमानखायजग फेरा ॥ गुरुके लक्षण भलिविधि यांचे । यम फन्दाते तबही बांचे ॥

सारखी-बूझ विवेक सह जो पढ़े, गुरुमहिमा यक बार ।

कबीर दीनदयाल तेही, तुरत उतारे पार ॥

योग यज्ञ अरु जप तप अहई । पढ़ि गुरुमहिमा सबफल लहई ॥ विष्णु सहस्र अरु भगवद्गीता । भागवत आदिक आठपुनीता ॥

( ४६ )

बोधसागर

एकबार गुरु महिमा पठयी । सोफल सबही क्षणमें लहयी ॥ काशी क्षेत्र बहुबिधि दाने । गया प्रयाग पुष्कर असनाने ॥ सो फल सबही यामधि पावे । श्रद्धासहित जो पाठ करावे ॥ निर्मल होय पाठ जो करई । सो नर सहजे भवनिधि तरई ॥ वेद पुराण अरु शास्त्र विलोई । जाह्निकस्योगुरुमहिमासोई ॥ गुरु महिमा सारको सारी । गिरिजाप्रति भाष्योत्रिपुरारी ॥ गुरु महिमा गुरुगमसे गाया । चढि सत पारख नादबजाया ॥ सत्तकबीर जब दाय़ा कीनी । गुरुमहिमा तब वर्णन कीनी ॥ साखी-गुरुमहिमा गुरु गम अहै, जाने सन्त सुजान ।

पढे विचारे मन करे, पावै मोक्ष निदान ॥

गुरुमहिमा शतक यहि नामा । पाठ किये पूरे सब कामा ॥ सो चौपाई यामहि आही । बीस दोहरा साख सदाई ॥ दो चौपाई दुइ सो साखी । फल वर्णन महाँ पुनि राखी ॥ पांच चौपाई यक सो दोहा । संख्या तिथि वर्णनमहाँ जोहा ॥ या विधि पूर्ण भयोयहग्रन्था । जाते जिव पावे सत पंथा ॥ याको पाठ करे जो कोई । उभय आनन्दफल पावे सोई ॥ गुरुसंतन पाऊँतिन शिर नाऊँ । मातु पिताके बलिबलि जाऊँ ॥ सत्य कबीर सत्य गुरु राई । जिनकी कृपा परख पद पाई ॥ धर्मदास गुरु जग आये । करि उपदेश जगजीवचिताये ॥ राम रहस पूरण गुरु राई । सबको वन्दो शीश नवाई ॥

साखी-नभ रस निधि चन्द्र कह, पौष पूर्णिमा जान ।

बिक्रम सम्बत जानिये, रविवासर दिन मान ॥

इति श्रीगुरुमहिमा शतक समाप्त