भारतकोश
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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( ४० )

ज्ञानसागर

राम लक्ष्मण औ सिय साथा । वन मारग लीन्है धनु हाथा ॥ बहु दिन रहै ऋषिनके ठाई । समाचार लंकापति पाई ॥ लीन संग मारीच बलवंता । हरे सिया मन हो हर्षता ॥ मारीच ही कीन्ह मृग वेषा । नहि छल बूझे राम नरेशा ॥ मृग को देख नृपत तब भूला । लोभ मोह को वन जो फूला ॥ प्रगटचो सांझ अन्ध भो भाना । बिगरचो मोह जो ज्ञान छिपाना ॥ राम लखन गए मृगहि शिकारा । सीतहि रावन रथ बैठारा ॥ आगे मारग रोक जटाऊ । मार गयो तिहि रावण राऊ ॥ मारीचहि राम कीन्ह जब घाता । बूझ परी नारदकी बाता ॥ सिय हर रावन मार लुटेवा । जाकी जगत करत है सेवा ॥ दूँढहु लक्ष्मण वन गुहराई । मोह भयो जब सिया न पाई ॥ मारीचहि मार राम पछिताना । जबहि जटाउ कही सहिदाना ॥ हनुमान मिल पंथ मँझारा । रावन मारचो राम भुवारा ॥ सुन स्वामी तू त्रिभुवन नाथा । कृपा करो तुम मोरे साथा ॥ हनुमान जब कीश अनुसार । कुशल प्रभाव पूछ तिहि बारा ॥ बालि सुग्रीव दोइ जन भाई । बालि लीन्ह वध बंधु छुड़ाई ॥ जो प्रभु कीजे कपि पर दाय। मारो बालि सुनो रघुराया ॥

साखी-रामचन्द्र अस बोले, कीने बालि कुकर्म ॥

मारौं ताहि पल भीतरै, जान कहौं अस मर्म ॥

चौपाई

आए रघुपति जहँ गए राजा । बालि मार सुग्रीव निवाजा ॥ मार बालि कहँ एकहि तीरा । बूझे सन्त गही नहि पीरा ॥ यह तो भेद जानि है सोई । सतगुरु दया जाहि पर होई ॥ तब हनुमान लंक कियो गवना । पहुँचै जाय जहाँ रह रवना ॥ पहुँचे जाय भेट भइ सीया । देत्य देख वह कीतुक कीया ॥

ज्ञानसागर

( ४१ )

मारहिं कपि कहैं कौतुक जानी । तब हनुमान आप बल ठानी ॥ जारि नगर तब कीन्हों छारा । नगर लोग सब कहैं विकारा ॥ साखी-आय कहौं रघुपति सौं, समाचार हनु वीर ॥ सिंधु बांधि हरि उत्तरे, दैत्य वधन रनधीर ॥

चौपाई

आए कीन्ह दैत्य संग्रामा । मारे दैत्य बहुत तब रामा ॥ कुंभकरण निद्रा सौं जागा । रघुवर सौं युद्ध करे अचुरागा ॥ कहै विभीषण सुन नृप रावन । आए राम जो असुर सतावन ॥ सिया संग लै जाहु तुरंता । क्षमा अपराध गहु पग हर्षता ॥ मारी लात विभीषण भाई । कोधित मिलो राम कहैं आई ॥ समाधान नृपति बड कीन्हौं । लंका बकसि ताहिं कौ दीन्हौं ॥ कुंभकरण गहि समर अपारा । ताको हरि बहु बल सौं मारा ॥ इंद्र जीत तब लाग गुहारी । कर अश्वमेध तपस्या भारी ॥ तिन कपि रोके कपिदल जुथ्या । विभीषण भेद कहो अज जुथ्या ॥ जौलौं पूर्ण जह ना होई । मारहु राम वध करे सोई ॥ भयो प्रभात राम जब देखा । लक्ष्मण लाग्यो बान विशेषा ॥ साखी-मार सो महाबली, मेघनाद जिहि नाम ॥ सुनत क्रोध रावन कियो, कठिन कीन्ह संग्राम ॥

चौपाई

दैत्य महाबल शक्ति संधाना । जूझे लक्ष्मण भया निदाना ॥ तुम हनुमान लै आवहु मूरी । उत्तर दिशा देश बड़ दूरी ॥ दौनागिर पर्वत कर नाऊ । संजीवन सहित ताहि लै आऊ ॥ संजीवन बास तैं लक्ष्मण जागा । हर्ष भये तब कपिकर भागा ॥ तब रघुवीर घेर गढ लंका । दैत्यनके जी उपजी शंका ॥ तब रावन गहि समर अपारी । बंधुहि व्याकुल है सब झारी ॥

( ४२ )

ज्ञानसागर

रामचन्द्र रावन कहै मारा । वार अनेक सीस झुइ पारा ॥ मारचो हृदय ताक कै जबही । रावन काल वश्य भयो तबही ॥ सीता समाधान हरि कीन्हा । ताको रूप न काहू चीन्हा ॥ सिया लीन्ह रघुवीर बुलाई । राज विभीषण दीन्ह सुहाई ॥ लै सीतहि अवधपुर आना । भरतहि कीन्ह बहुत सनमाना ॥ सीता सती रही अवधाना । गर्भ वास लौकृश उत्पाना ॥

साखी-राज करै रघुवंश मणि, तब अस कीन्ह प्रमान ॥

थाप्यो कोट अयोध्यहि, सुनौ मंत्र हनुमान ॥

चौपाई

जबहि राम लंका से आये । अयोध्या कोट उठावन लाये ॥ लक्ष्मण भाइ संग तब लीन्हा । सुदिन जानकै तब निव दीन्हा ॥ उठत कोट सो भय अस शोरा । है कछु द्रव्य नीच अस बोला ॥ सुन अस वचन राम रघुराई । खनहु खनहु अस आज्ञा पाई ॥ चहुँ दिश खने जो बाजु कुदारा । तपसी एक देख तहँवारा ॥ लुहिडा माथे दै तप करई । जोग अरंभ सदा चित धरई ॥ भौह बार मुख रहे छिपाने । बैठे महि के तले सयाने ॥ देखा ऋषिहि बहुत भय माना । शाप न देई बहुत सकाना ॥ छाँड़ि समाधि निरखि जब हेरा । राम दंडवत किये चहुँ फेरा ॥

साखी-बोले वचन ऋषी तब, कोहो सो कहु मोहि ॥

रूप भाव बहु आगर, देखों नृप सम तोहि ॥

रामचंद्र वचन-चौपाई

दशरथ तनय राम मोहि नाऊ । रहौं समीप अवधपुर गाऊ ॥ ऋषि कहो भयो राम अवतारा । पूछौ यह कह करब भुवारा ॥ हे ऋषि राज मैं कीर्ति बनाऊँ । जातैं रहे यहि जग में नाऊँ ॥ कह ऋषिराज जीवन है थोरा । छाँडो कोट कहा सुन मोरा ॥

ज्ञानसागर

( ४३ )

राम कह्यो ऋषि सो निज मर्मा । केते दिवस किया तपधर्मा ॥ लोमश ऋषि मोर है नाऊ । अपने जन्म को कह्यो प्रभाऊ ॥ आठ पहर रात दिन होई । अहो रात कहैं सब कोई ॥ दोई पाख कर प्रहर प्रमाना । सो एकदिवस पित्रन को जाना ॥ वर्ष दिवस जब उनको होई । एक दिवस देवन को सोई ॥ बारह वर्ष दिवस जब जाना । चौदह सहस्र इक मनु जो वखाना ॥ सप्त मनु जबही जाइ विगोई । तब इक इन्द्र काल सब होई ॥ सप्त इन्द्र जब होवै नाशा । इक ब्रह्मा को होई विनाशा ॥

साखी-सप्त ब्रह्मा जब विनशहीं, तब एक विष्णु को नाश ॥

सप्त विष्णु जब वीतहीं, तब इक रुद्र विनाश ॥

सोरा रुद्र गति जब हो जाई । तब इक रोम मम परे खसाई ॥

तातैं लोमस नाम है मोरा । करा समाध जीतवै है थोरा ॥

सुन रघुवीर अचंभित भयऊ । ऋषिको वचन प्रतीत न लयऊ ॥

राम चरित्र ऋषी तब जाना । क्या सोंचौ रघुवीर सुजाना ॥

देव अंगुष्ठ भैंटहु जो मोही । तैसे अंगुष्ठ दैऊ मैं तोही ॥

यहै कमंडल मोरे साथा । काढ़ौ गिन जो आवहि हाथा ॥

क्रोधित हाथ डार भगवाना । गिनि उनचास कोट परवाना ॥

परचो पाय रघुवीर न जाना । लोमश वचन सत् कर माना ॥

एतिक सुदरी गिनी विशेषा । कमंडलको कहैं कहिये लेखा ॥

इतने राम रावन होय गएऊ । सुनि रघुवीर अचंभौ भएऊ ॥

साखी-जान्यो जन्महि अल्प जब, चले स्वर्ग अस्थान ॥

निराकार निरञ्जन, तासु मर्म नहि जान ॥

चौपाई

त्याग्यो राजपाट बन्धु चारी । गये स्वर्ग नृप सैन सिधारी ॥

आप इच्छा जन्म पुन लीन्हा । कृष्ण चरित्र आगे पुन कीन्हा ॥

नं. १ कबीरसागर-

कृष्णचरित्रवर्णन

( ४४ )

ज्ञानसागर

जाहि राम को जपत संसारा । ताको तो ऐसो व्यवहारा ॥ बाजी दिखाय जीव सब राखा । मारे अन्त करै अस लाखा ॥ काह करै जिव बस परेऊ । तातैं सत्त शब्द चित धरेऊ ॥ जमराजा है अति बरबंडा । मारे ब्रह्मा विष्णु नौ खंडा ॥ काल फांस कैसे मुक्तावै । जब लग सत्तनाम नहि पावै ॥

साखी-नाम अदल जो पावै, कहै कबीर विचार ॥

होय अटल जो निश्चय, जमराजा रहे हार बार ॥

चोपाई

सुन धर्म मैं तोहि सुनाऊं । कृष्ण चरित्र को भाव बताऊं ॥

कृष्णचरित्र

राम रूप त्रेता अवतारा । गयो वियोग सकल संसारा ॥ करै भेख बहुत विधि कैसा । लेखा मूल ब्याज है जैसा ॥ एक नार रघुपति दुख पाया । सोरा सहस्र गोपि निरमाया ॥ प्रथमहि गोपिन को निरमाया । पीछे कृष्ण देव है आया ॥ देवकी कहैं जन्म लियौ जाई । दीन्ह सबै गोकुल पहुँचाई ॥ नंद के गेह आन तिन राखा । है मम पुत्र जसोधा भाखा ॥ करै नंद जसोधा महरी । पल भर कृष्ण राख न बहरी ॥ गोपी सबै विलास बनावैं । रात दिवस हरिके गुण गावैं ॥ नृप दशरथ वसुदेव अवतारा । कौशिल्यासुमित्रा देवकी वारा ॥ नारद ऋषि कंसहि कह भेऊ । यह निज जन्म न जानै केऊ ॥ उपजो तुव वैरी भगवाना । नंद गेह गोकुल अस्थाना ॥ सुन नृप कीन्ह जो बहुत उपाई । मारहु ताहि कहै अस राई ॥ कागासुर इक दैत्य अपारा । बलपौरुरज जिहिकै अधिकारा ॥ ताको कंस वचन अस भाखी । राम कृष्ण कर फोरहु आंखी ॥ चलयो दैत्य आयो हरि पाहीं । सखा संग जहैं बाल कन्हाहीं ॥ जान्यो कृष्ण दुष्ट यह आही । चपट कै मारचो है हरि ताही ॥

ज्ञानसागर

( ४५ )

सारखी-मारौ दैत्य महा बली, दैत्य राज भयमान ॥

भगनी तासु जो पूतना, ता कईं दीन्हों पान ॥

चौपाई

चली पूतना कर छल भेषा । गरल लगाइ पयोधर रेखा ॥

लेके पयोधर कृष्ण लगाई । तारी तवै सबै विष खाई ॥

एक बार ग्वालन संग गएऊ । जान बकासुर छैकै लएऊ ॥

मारचो कृष्ण ताहि पल माहीं । नहीं दैत्य जीते कोइ जाहीं ॥

इन्द्र पूजा नहिं दीन्ह गुवारा । वर्षे इन्द्र अखंडित धारा ॥

डारचो इन्द्र वर्षा दिन साता । हरि गिर लीन्हो ऊपरहाथा ॥

सारखी-सात दिवस जब वर्षेऊ, जान्यो इन्द्र भुवार ॥

क्षमा अपराध अब कीजिये, देव विनय अनुसार ॥

चौपाई

एक बार कालिन्दी तीरा । बछड़े लै गए जादौ बीरा ॥

लागी प्यास पियावहिं पानी । पीवत ही भइ सब की हानी ॥

देखत कृष्ण अचंभौ भयऊ । उरग गरल साँवल तन भयऊ ॥

पुन धँस गये तहं यदुराई । नाथ्यो नाग वारि मई जाई ॥

सारखी-यह चरित्र माधव कियो, जानत नाहिन कोय ॥

बूझेगे कोइ बिरले, सतगुरु मिलिया सोय ॥

चौपाई

केसी नाम बंधु बड़ बीरा । तिन पुनकीन्हा असुर शरीरा ॥

तब निकंद कीन्है जो ठाना । छलके मारचो तेहि भगवाना ॥

सुकल केश कईं बेग पठावहु । राम कृष्ण कौं बेग लै आवहु ॥

चल अकूर आये हरि पाहीं । कृष्ण चरित्र बूझे पल माहीं ॥

सोरा सहस्र अबला सों नेहा । बूझ न परै जीव दोइ देहा ॥

सारखी-बहु क्रीडा हरि कीन्हौ, जानत नाहिं न कोय ॥

अजिया पुत्रहि पालिये, आप स्वारथी होय ॥

( ४६ )

ज्ञानसागर

चौपाई

मारत तासु बार नहीं लावा । ऐसा देखो हरी स्वभावा ॥ रावन कुंभकरन जा मारा । ताको जन्य शिशुपाल अवतारा ॥ चलत कृष्ण गोपिन किए शोगा । संग भले तब जादों लोगा ॥ मारन कौं हरि मता जो ठाना । मथुरासे हरि कीन्ह पयाना ॥ मुष्ट चार और दोह खँडावा । सब असुरनहि कंस गुहरावा ॥ रंग भूमि नृप कंस बनावा । काल रंग भूमी ही आवा ॥ चल भए कृष्ण जहां कहैं तबही । कुबरीको सन्मान कियो जबही ॥ पूर्व जन्म तिन सेवा कीन्हा । भक्ति हेतु ताको रति दीन्हा ॥

साखी-कुबरीको सन्मान कर, चल भयो राज द्वार ॥

हस्ती कौं बल महाबल, तिनको पहिले मार ॥

चौपाई

मारत तासु वीर जो धाये । मुष्ट चार अरु दोह खँडाये ॥ मुये नृप पुन तब खस परेऊ । कालिन्दी तट आन जराएऊ ॥ उग्रसेन कीन्हों सन्माना । गये हरि मात पिता अस्थाना ॥ पूर्व जन्म सेवा तिन कीन्हा । भक्ति हेतु मैं दर्शन दीन्हा ॥ जरासन्ध नृप लाग गुहारी । सत्रह बार तिन कीन्हों मारी ॥ तैंतिस शोहणि दल तिन जीता । जमन केर सम्हर पर बीता ॥ नृप मुचकुंदहि तब पुनि मारा । ताकौ हरि पुनि बैर विचारा ॥

साखी-यह चरित्र कहु कैसौ, जमन को आनि मराव ॥

जीव कौ बदला जीव है, अदल अंश कर न्याव ॥

चौपाई

कंस मार हरि गोकुल गएऊ । गोपिन समाधान हरि किएऊ ॥ सब मिलि कीन्हों मंगलचारा । तब हरि ऐसौ वचन उचारा ॥ दुरवासा ऋषि तप बड़ कीन्हा । इच्छा भोजन माँगहि लीन्हा ॥

ज्ञानसागर

( ४७ )

जाय सबै ले जमुनहि पारा । ले चलि भोजन भर भर थारा॥ जमुना बहु विधि आप गुसाई । तब हरि ऐसा वचन सुनाई ॥ कही जाइ कालिन्दी तीरा । कृष्ण छुवा नहि मोर शरीरा ॥ होई है थाह जाइ हो पारा । चल भो गोपी लाग न बारा ॥

साखी-कृष्ण सन्देशा कहिके, सबै भई तब पार ॥

जाइ कराइन भोजन, तब विन्ती अनुसार ॥

चौपाई

तब गोपिन अस बचन सुनावा । हे प्रभु पार जाहिं किहिं भावा॥ कालिन्दी से कहि सब मांदा । ऋषि नहि खाइब मोर प्रसादा ॥ कहत सन्देशा सब भई पारा । अचरज भयो मनमाहिं विचारा ॥ ठगई लगा तीनों पुर माहीं । कृष्ण कहाये अचरज नाही ॥ चौथे लोक बसे परधाना । ताहिखबर कहु विरलन जाना ॥ तपके तेज कहा बड़ भएऊ । तीन लोक जो अचरज ठएऊ ॥ एकवार शिशुपाल भुवारा । कृष्ण से कीन्ह जो समर अपारा ॥ मारचो तबै दैत्य बल बीरा । निकसे प्राण जो छांडि शरीरा ॥ सब के देखत कृष्ण जो खावा । तेहु न बूझे काल स्वभावा ॥ सब के देखत आस जो कीन्हा । तासों कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥

साखी-काल सबन को आस्थो, वचन कह्यो समुझाय ॥

कहैं कबीर मैं का करो, देख नहीं पतिआय ॥

चौपाई

बूझो संतो काल की हानी । हरि को भाव भले मैं जानी ॥ कृष्ण के भयो जो प्रदुमनबारा । ताकुल अनिरुधलीन्ह अवतारा ॥ सुन प्रवीन बानासुर राऊ । शिव सेवही महाबल पाऊ ॥ ता नृप कै दुहिता एक भयऊ । ऊखा नाम तासु सो ठयऊ ॥ रूप आगर किमि करें बखाना । ताहि देख कर काम लजाना ॥ उन्मद यौवन भयो पुन जबही । काम बान सर लागेउ तबही ॥

( ४८ )

ज्ञानसागर

साखी-तासु दूत गण द्वारिका, अनिरुध अंश भुवार ॥ दोऊ उपजो मर्म अब, जस हंसनकी ज्वार ॥

चौपाई

दिवस आठ दस बीते जबही । अनिरुध कुँवर प्रगट भयो तबही ॥ बानासुर ने कोध दल साजा । अगणित बाज सम्हर कौ बाजा ॥ युद्ध करै दैत्य तहाँ जाई । अनिरुध सब कहँ मार हटाई ॥ छै प्रकार जीतो उन जबही । सातई बार भर्म भयो तबही ॥ दैत्य मार गहि समर अपारा । बाँध चपल कै कृष्ण कुँवारा ॥ कोई कहै मारो विषको मूला । शत्रु राखकै नृपकस भूला ॥ मंत्री कहई सुना भुवारा । शिव की आज्ञा मैं यह मारा ॥ नारद ऋषि तबही सुधि पाई । कृष्णहि बात जनावहु जाई ॥ चल भयो कृष्ण जो कोध अपारा । दैत्य जहाँ तहाँवा पशु धारा ॥

साखी-गरुड़ चढ़े तब कृष्ण सो, पुरही पहुँचे आय ॥ जाही नग्र अग्नि दियो, दैत्य राज तिहि ठाँयै ॥

चौपाई

आय दैत्य करै संग्रामा । हरि भेटें तेहि यम उन ग्रामा ॥ मारो हलधर अग्नित वीरा । बानासुर देख परे तेहि भीरा ॥ मोरा कृष्ण मता सुन आजू । अटल दियो महि शंकर राजू ॥ बहु विधि युद्ध दैत्य तब कीन्हा । कृष्ण चपल तेहि बाँध हिलीन्हा ॥ बाँध्यो नृप शंकर सुधि पाई । कोधित आई तब कृष्ण लराई ॥ दोनों वीर महा बल धारी । लागी होन परस्पर मारी ॥ दोनों मंत्र पुनि दीन अडाई । तारी मार मार पुन धाई ॥ दोह जुरे पुन मछ समाना । कौतुक आई निरंजन जाना ॥ दोउके समर पावक उठि जबही । आदि भवानी चलभइ तबही ॥ दोनों सुत कहँ जब बिलगावा । बादल पवनके जैसे स्वभावा ॥

ज्ञानसागर

( ४९ )

साखी-दोई सुत तब बरजी, आदि भवानी आय ॥ बर ऊषा अनिरुद्धको, शंकर दीन्ह मिलाय ॥

चोपाई

चले कृष्ण और सुत भामिनि । तासु अंग चमके जिमि दामिनि ॥ कृष्ण द्वारिका पहुँचे जाई । सो वृत्तान्त कहौं समुझाई ॥ जोपै हर हरिको व्रत धरई । प्रभु सेवक कहु काहे लरई ॥ प्रभु सेवक कहु कैसे लड़ाई । सो गति मोहि कहौ समुझाई ॥ हरि हर युद्ध सबै कोइ जाना । सहस्रनाम किमि करब बखाना ॥ यमराजा जु ठगौरी लायी । ज्ञान देख कर चेतो भायी ॥ बूझौ सब मिलि पाखंड धरमा । मैं जानौं भल कालही मरमा ॥ अदेख देख सब कहि समुझाई । ताको विरला जन पति आई ॥

साखी-शङ्कर कियो युद्ध हरिसों, तब कहु कैसो दास ॥ पंडित जन सब थापहीं, सहस्र नाम विश्वास ॥

चोपाई

चारौं वेद को मूल बताऊँ । सहस्र नाम को सार बुझाऊँ ॥ काशीमें विश्वास जनावई । विश्वनाथके मंदिर धावई ॥ विश्वनाथको भेद बतावहु । सार ग्रन्थ मोही समझावहु ॥ सबै ग्रन्थ करि आगिल कीन्हा । भक्ति तत्त्व सबै मिलि चीन्हा ॥ सब पर सहस्र नाम परवाना । जहाँ लग शास्त्र रु वेद पुराना ॥ तेहि जाने जेते सब कोई । बूझौ मरम जु विरला कोई ॥ बूझौ पंडित भेद बताई । प्रभु सेवक कहु कैसे लराई ॥ यह सब बन्ध बहुत मैं भाखी । ते यमराजा सब ठग राखी ॥ ज्यों नारी पिय को व्रत तजई । दूजे जु प्रेम प्रीति सों भजई ॥ तैसो देखो यह संसारा । नाम बिना किमि उतरे पारा ॥

साखी-भूल परी सब दुनियाँ, पाखंडके व्यवहार ॥ मूल छाँड़ि डारे गहै, कैसे उतरे पार ॥

( ५० )

ज्ञानसागर

चौपाई

तब हरि कीन्हे चरित अपारा । सो अब भाखौँ अगिलव्यवहारा ॥ पांडव पांच सेवा बहु करई । तिन सों कृष्ण हेतु बहु धरई ॥ मारन तासु को मतौ बिचारा । पांडव कौरव नृप दोह मारा ॥ दोनोंमें छल कियो भगवाना । ताको मर्म काहु नहि जाना ॥ बंधु विरोध वैर उपजाई । प्रतिदिन समर करें तहँ आई ॥ राजा दुपद स्वयम्बर ठाना । तहँ पारथ राहु संधाना ॥ दुयोंधन अस कीन्ह उपाई । कन्या मारि लेव पाँचों भाई ॥ कृष्ण ताहि छल मत उपजावा । तातें ताहि पांच पति भावा ॥ तेहि मारन हरि मतौ बिचारा । गीता कह अध्याय अठारा ॥ कौरव आई जो करहि लड़ाई । ताहि कृष्ण छलसे भरवाई ॥ मारचो करण गंगसुत द्रोना । सबको मारि कियो दल सूना ॥ मारचो दुयोंधन जो राई । अठारह शोहणी मार गिराई ॥

साखी-पाँचों पांडव बचि रहे, औ जूझे सब झार ॥

धरमराय अस कीन्हा, कृष्ण परी हंकार ॥

चौपाई

चल भये कृष्ण स्वर्ग अस्थाना । शून्यआदि जहँ शशिनहिंभाना ॥ पुर वैकुंठ ते आगे गयेऊ । तहाँ जाइके स्तुति कियेऊ ॥ अलख निरंजन अंतर््यामी । सब ते न्यारे हो तुम स्वामी ॥ सबमें व्याप्त निरंजन राया । पाँचो तत्त्व शून्य उपजाया ॥ तुमही ब्रह्मा विष्णु महेशा । आदि अंत तुम देव गणेशा ॥ अहो कृपालु कृपानिधि स्वामी । करहु दया तुम अंतर्यामी ॥ ततक्षण भई अकाशतें वाणी । अहो कृष्ण सबको उत्तपानी ॥ अब जो कहैं करो सो जानी । सोई वचन लेव सिर मानी ॥ तुम भेजा महि भार उतारहु । असुरनको विध्वंसके मारहु ॥

ज्ञानसागर

( ५१ )

साखी-मारहु जादव वंश कहैं, मानो वचन रसाल । गोपी जाय संहारो, तेहि पाछे तुव काल

कृष्ण वचन-चोपार्द

कृष्ण कहै सुनु पुरुष पुराना । काल अभै कहाँ मोर ठिकाना॥

निरंजन वचन

तैं मम अंश मोहिमें वासा । काल रूप संसार निवासा ॥ पातक जीव जो रहै महाबल । मारहुतिनिहीतुम अतिबल छल॥ उपजत विनसत क्षीन भइ देहा । कलियुग आवै क्षीण सनेहा ॥ क्षीण शरीर अवधि भइ थोरा । पूजी अवधि आई कै तोरा ॥ जस कछु कहो कियासो चढ़िहौ । जाकौ दिया राज महिकरिहौ॥ छाड़ो महि मंडलको भाऊ । जगन्नाथ में कष्ट बनाऊ ॥ तजो कृष्ण अब वेग शरीरू । आये अन्न अब दास कबीरू ॥

कृष्ण वचन

साखी-सुन कियो कृष्ण अचंभो, कैसो दास कबीर ॥ सो मोहि स्वामी कहब सब, तब मैं तजों शरोर ॥

निरंजन वचन-चोपार्द

कली अनेक राज है मोरा । कलियुग नरहिअवधि है थोरा ॥ पांडव नंदन यज्ञ जो ठानहि । ऋषिगण सबहीनिवतजुआवहि॥ यज्ञ पूर्ण नहिं ताकर होई । नाम प्रभाव कहै नहिं कोई ॥ कलि उत्पन्न मनुष्य शरीरू । जा कहैं सुनियो दास कबीरू॥ तिनके शिष्य सुपच जो होई । पूरण यज्ञकर ततक्षण सोई ॥ या सहिदानी तोहि बताऊँ । तोहि सेती महि मंडल छाऊँ ॥ बालिही राम रूप तुम मारा । ताकर होई व्याध औतारा ॥ ताकर बैर देहुँ तुम जाई । फेर जीव कछु संशय नाई ॥ सुनिकै कृष्ण चले सिरनाई । नगर द्वारिका पहुँचे आई ॥

पाण्डव यज्ञ तथा सुपच सुदर्शन कथा-वर्णन

( ५२ )

ज्ञानसागर

पांडव निवते यज्ञ पठाये । चलिये स्वामी बेग बुलाये ॥ मारन बंधु या किया लागा । तातें यज्ञ रची है रागा ॥ चल भये कृष्ण बार नहिलाये । पुर पांडव के आश्रम आये ॥ आवत समाधान नृप कीन्हा । छत्र तानि सिंहासन दीन्हा ॥ आवत कृष्णसभा सिर नावा । भोजन को तब आज्ञा पावा ॥ साखी-बैठे गन्धरव देव गण, ऋषि मुनिवर सब झार ॥ सब मिलि कीन्हा भोजन, इच्छा के अनुसार ॥

चौपाई

भोजन भये घंट नहिं बाजा । राय युधिष्ठिर को भयी लाजा ॥ अहो कृष्ण का करौं उपाई । सोमोहि स्वामी कहिये समुझाई ॥ जबहि कृष्ण अस भाव बताया । सुनहू मंत्र युधिष्ठिर राया ॥ खोजहु भक्त जो निर्गुण गावयी । सतगुण महिमा सदा बतावयी ॥ आनब ताहि यज्ञ निवताई । दीन भाव कर ताहि लिवाई ॥ कृष्ण वचन सुनि युधिष्ठिर राया । भगत बुलावन दूत पठाया ॥ सुनिके दूत चले चहुँ देशा । नहिं कोइ भक्तन भेटे वेशा ॥ चले भीम तब लागि न वारा । चहुँ दिश फिर काशी पगुधारा ॥ बैठे सुपच ताहि सों कहई । निर्गुन भक्त यहाँ कोइ रहई ॥ कहै सुपच निर्गुन को जानों । सतगुरु महिमा सदा बखानों ॥

साखी-कहै भीम सुन हरिजन, कृपा करौं मम संग ॥ चलो जहाँ हरि बैठे, स्वामी बाल गुविन्द ॥

चौपाई

कहै सुपच प्रभु कैसे कहऊ । कालहि जान कृष्ण परिहरऊ ॥ सुनतहि भीम कोप तब कीन्हा । यामैं कहा भक्त वर चीन्हा ॥ यहि मारो तो राख रिसाई । कह्यो मंत्र राजा पर जाई ॥ तीन लोक के जे प्रभुराई । तिनको भाखै काल कसाई ॥

ज्ञानसागर

( ५३ )

कृष्णहि कहै काल की फांसी । कीन्हही आय भक्त की हांसी ॥ मारचो नहि पर तुव भय माना । यह सुनकर विहिसे भगवाना ॥

सारखी-जाव युधिष्ठिर वेग दै, तुम आनो गहि पांय ॥

आज्ञा मानि चले तब, आये युधिष्ठिर राय ॥

चोपाई

अहो संत तजिये अपराधा । अधम उधारन सुनियत साधा ॥

चलो स्वामी मेरे गृह आजू । कृपा करौ मम होवै कालू ॥

कहैं सुपच सुन पांडव राज । तोर का काज होय वहि ठाऊ ॥

तुम्हरे गये होय मम काजा । परमारथ तुम को बड़ साजा ॥

चल परमारथ कारण संता । सभा माहिं बैठे हरषंता ॥

आवत स्वपच कृष्ण जब जाना । होय काज पूरण सनमाना ॥

राय युधिष्ठिर पखारे पांऊ । भोजन सादर आन जिवाऊं ॥

भोजन करके सुपच भयो ठाढा । बाज्यो घंट शब्द भयो गाढा ॥

बाज्यो घंट यज्ञ भयो पूरा । कौतुक देखि ऋषीगण भूला ॥

पूरण यज्ञ विष्णु जब जाना । तबही कीन्ह द्वारिका पयाना ॥

सारखी-बूझो रे नर परानी, क्या सुपचे अधिकार ॥

गण गन्धर्व सुनि देव ऋषि, सब मिलि कीन्ह अहार ॥

चोपाई

सब के खाये घंट नहि बाजा । धर्म की देह युधिष्ठिर राजा ॥

सो सब रहे पूर्ण यज्ञ नाहीं । नामहि महिमा जानत नाहीं ॥

सुपच जान भल नाम प्रभाऊ । ताते पूरण यज्ञ कराऊ ॥

कृष्ण शक्ति में सुनि ऋषि झूला । जान बूझिकै पंडित भूला ॥

बूझौ सन्तो नाम हमारा । नाम विना किमि उत्तरौ पारा ॥

कृष्ण पारथ ही वेग बुलावा । तेहि पुनि निज मतौ सुनावा ॥

गोपी लैकै जाऊं मैं जहँवा । पुर वैकुंठ सुमेर है तहँवा ॥

कृष्णका स्वर्गारोहण और जगन्नाथकी स्थापना

( ५४ )

ज्ञानसागर

मथुरा तैं तुम वेग लै आवहु । जाहु तुरन्त गहर जनिलावहु ॥ चल भयो पार्थ हाथ धनु तीरा । गोपी लैन कोटिन यदुबीरा ॥ आपस में जो करे लड़ाई । इक मारे एक मरजाई ॥ छप्पन कोटि जो सबै सिरानो । सो नट षट कृष्णहि के जानो ॥ अष्ट कन्या लखी चित्रसारी । तिनकहैं कृष्णजो यहि विधि मारी ॥

साखी-मारिन सब जेती हती, कृष्ण काल बरि यान ॥ तब अपने मन में गुनौ, करो उदधि अस्थान ॥

चौपाई

वधिक देव घात संधाना । बालि बैरको भाव जो जाना ॥ जम सब प्रान घेर लै गयेऊ । मारचो कृष्ण मूर्च्छित भयेऊ ॥ निरंकार निरंजन राऊ । आपहि मारिजो ताहि नसाऊ ॥ बालि का बैर व्याधा जबलीन्हा । यह तो भेद न काहू चीन्हा ॥ तीन लोक के कृष्ण भुवारा । रहै न बैर जीव व्यवहारा ॥ जो जीव आप स्वारथहि मारा । सो जीव अपनौ किमि निस्तारा ॥ तबहि कृष्ण अस मता विचारा । तत्त्व मता अस रूप संहारा ॥ जादव रूप कृष्ण सब मारे । पारथ बान रहे सब हारे ॥ गोपी रही जो प्राणहि प्यारी । तिनको कृष्ण येहि बिधि मारी ॥ आये कृष्ण पहुँ अर्जुन बीरा । लाज न छाड़ै अत्र शरीरा ॥

साखी-कहैं कृष्ण सुन अर्जुन, छाड़ो यहि संसार ॥

हम तो जात हैं स्वर्ग को, इत परंपंच अपार ॥

गये पारथ जहँ चारौं भाई । चलौ वही जहँ यादो राई ॥ कहै सन्देश सुनौ हो राऊ । यहवाँ मोर दर्श नहि पाऊ ॥ मृत मंडल नहि मेटव मोही । छाड़ौ महि बोलों अस तोही ॥ छाड़ौ राज पाट सब भाई । पुत्र राज देख सब जाई ॥

निकलंक अवतारकी वार्ता

ज्ञानसागर

( ५५ )

चारेउ पांडव काल बड़ा भयेऊ । रायशुधिष्ठिर सदेह तब गयेऊ ॥ ता कहैं बड़ शासन जो कीन्हा । नाम विना देखो अस चीन्हा ॥ देखत कृष्ण अपन तन त्यागा । चिता तासु की रचन जो लागा ॥ चन्दन काष्ठ तासु तन जारा । चल भयो काष्ठ समुद्र मझारा ॥ इंद्र देवन हरि सपना दयेऊ । तिन पुनि काष्ठ आन धरि लयेऊ ॥ सुंधायो द्वार काहु नहि जाना । ठक २ उठै दिन रात प्रवीना ॥ शिशुपाल भुजा चार रहो जाही । मारचो कृष्ण जो भक्ष्यो ताही ॥

साखी-सबै अंग सम्पूर्ण हैं, जगन्नाथ को भाव ॥

शिशुपाल की भुजा उखारी, ताको वैर दिवाव ॥

चौपाई

दोह भुजा काष्ठ जेहि उरेहा । वैर न छूटे सो गहि देहा ॥ जो काइ जीव जोर कर मारा । तासु जन्म किमिहो निस्तारा ॥ राम कृष्ण तैं को बड़ आही । वैर घात तासों न रहाही ॥ कृषी करै किसान जस भाऊ । ऐसी दसों जनम निर्माऊ ॥ दसों जनम ऐसे ही बीते । तासों कहै कि सुक्ति करीते ॥ बूझो नहि चरित्र भगवाना । तीन जुग गये काल नियराना ॥ है बड़ ठाकुर ज्योति स्वरूपा । तिन सब रच्यो मही औ भूपा ॥ आप स्वार्थी तिनहु मारे । ज्यों नकटी विश्वासहि वारे ॥

साखी-जिस सिरदार मही को, करै चरित्र भुवार ॥

जहैं तहैं शील पटावै, मछ बली तब धार ॥

चौपाई

कलियुग अन्त मलेच्छ व्यवहारा । तब हरि निष्कलंक अवतारा ॥ मारहि मलेच्छ सबै पुर कैसे । पावक मध्य तृण है जैसे ॥ पावक रूपनि कलंक अवतारा । तृण समान मलेच्छ संहारा ॥ बहुर कलंकी ज्योति समाई । कौतुक करै निरंजन राई ॥ ऐसे दसों जन्म निर्माये । निरंकार पुनि ताहि सताये ॥

उत्पत्ति परलयका लेखा

( ५६ )

ज्ञानसागर

धर्मदास वचन

धर्मदास कहैं सुनौं गुसाई । दसों जन्म कहि मोहि सुनाई ॥ कलप अनेक निरंजन राजा । आगे कैसा करि है साजा ॥ सो सब स्वामी मोहि जनाओ । उत्पति प्रलय भाव बताओ ॥ उत्पति प्रलय सुनौं तुम पाही । कहौ सबै जो संशय जाही ॥

साहिब कबीर वचन

चारौं युग हैं रहट स्वभाऊ । सो अब तोहि कहौं समुझाऊँ ॥ चारौं युग अंत जब होई । वषैं अग्नि निरंजन सोई ॥ पृथ्वी जार करै सब पानी । रहै स्वर्ग सो कहौ निशानी ॥ रहै जो देव तैंतीस करोरी । रहै जब तपसी तपकी जोरी ॥ चन्द्र सूर्य तारागण झारी । जबही देह तजै सुख चारी ॥ विष्णु बीतही दस अवतारा । नहिं शिव बीत योग जो धारा ॥ यहि विधि बहत रचौकड़ी जाई । सेवा फल पावै अन्याई ॥ उत्पति करै पुन प्रथम स्वभाऊ । ऐसे भवसागर निर्माऊ ॥

छंद-महा प्रलय जब किया निरंजन अग्नि सेवत ना रहो । लोमस ऋषितबहोय अंतहि शशि भानु पानी सब गयो ॥ तीन गुन पांच तत्त्व बीते दस चार सुत आकाश हो । महा देवी आदि कन्या ताही करै वह गरास हो ॥ सोरठा-सब भक्षे निरंजन राय, आदि अंत ना कछु रहै । शिव कन्यानाम विहाय, सब जी राखै आपमें ॥

चौपाई

सतगुरु दया जाहि पर होई । नाम प्रताप बाचे जन सोई ॥ निज घर हंसा करहि पयाना । और सकल जीवतहां समाना ॥ जाई रहैं जहां धर्महि द्वीपा । प्रथम करी जो लोक समीपा ॥ उत्पति कारण सेवा करहीं । पुनियहि भांति सृष्टि अनुसरहीं ॥

कृत्ययुगमें कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना

ज्ञानसागर

( ५७ )

भक्त अभक्त सबै पुनि खाई । सबको भक्षै निरंजन राई ॥ सो पुनि महिमा वेद बखाने । वेद पढे पर भेद ना जाने ॥

छंद-जेहि को भरोसा सोई चुरावै कहो तब कैसी वने । सेवा करै जेहि पुरुषकी सो भक्षण प्रति दिन करै ॥ जानी कै बूझै नहिं केतो कहो समुझाय हो । आदि अंत सबै यसै अस निरंजन राय हो ॥

सोरठा-काल सबनको खाय, हरि हर ब्रह्मासे सबै । वाचै कौन उपाय, एक नाम जाने बिना ॥

धर्मदासवचन-जीपाई

धर्मदास टेके गहि पाऊ । हे स्वामी मोहि भेद बताऊ ॥ कैसे आयो यहि संसारा । सो कहिये मोसों ध्यवहारा ॥

साहब कवीर वचन

सत्य युगमें कवीर साहबका पृथ्वी पर प्रगट होना

सुन धर्मनि मै तोहि बताउं । लोक छोड़ि मै इहँवां आउं ॥ सतयुग सत सुकृत मम नाउं । सोई सबै तोहि समझाउं ॥ हंस उवारन आयेउ जबही । मथुरा नगरहि पहुँचे तबही ॥ गुरुमठमांझ जो आसन कीन्ह। रक्षा अंत मोहि काहु न चीन्ह। ॥ कहौं भक्ति बहु भाति हटाई । बिन अंकूर न जीव जगाई ॥ बिबसी नाम रहै इक नांरी । ज्ञानवंत औ वरण कुँमारी ॥ तासों कहो भक्ति परमाना । बिबसी सुनै अचंभौ माना ॥

बिबसी वचन

साखी-अचरज कही तुम स्वामी, लोक वर्ण उजियार ॥ पहिले लोक दिखाओ, पीछे हो इतबार ॥

१ रानी-ऐसा भी पाठ है । २-बिश्वास

त्रेतामें कबीर साहबका पृथ्वीपर आना

( ५८ )

ज्ञानसागर

चोपाई

तब हम मता अस कीन्हा । ताके शीश हाथ जो दीन्हा ॥ परसत शीश ताकर भय भागा । शून्य मंदिरमें सुहरा जागा ॥ देखत सुरति निरति सौ लोका । बिबसीका मेटचो सब धोखा ॥ हे स्वामी अब कीजे दाय। यमके घरसे जीव मुक्ताया ॥ बार अनेक विनय तिन कीन्हा । तब हम नाम लखाई दीन्हा ॥ भक्ति भावसों करै अनंदा । ज्यों चकोर पाये निशि चन्दा ॥ ताके गृह निंदक सब रहई । बिबसी देखत ही पर हरई ॥ साखी-जाके पाछे हंस जो उबरे, तिनहिको जो बताव ॥ हंस ग्यारह आयऊ, गुरुसे कीन्ह भिट्ठाब ॥

चोपाई

तिन कह सत् शब्द जो दीन्हा । परम पुरुषके दर्शन कीन्हा ॥ तब उठि गयो पुरुषके ठाऊँ । सतयुग सत सुकृत मम नाऊँ ॥ आवत जात लखे नहिं कोई । आज्ञा पुरुषकी जापर होई ॥

त्रेतायुगमें कबीर साहबका प्राकट्य

चोपाई

त्रेतायुग आयो पुनि जबही । युग अनुमान चलो मैं तबही ॥ नाम मुनींद्र धरो निःशंका । प्रथम जाय देखेउ गढ़लंका ॥ द्वारपाल सों कहि समुझाई । राजाको ले आव बुलाई ॥ सुन प्रतिहार कह अस वानी । रावन मरम सिद्ध नहिं जानी ॥ महा गर्व कछु गिने न आनो । शिवके बल कछु शंक न मानो ॥ मारहि मोहि कहाँ जो जाई । गर्व प्रहारी है रावन राई ॥

मुनींद्रववन

जाहु तुरत कहा सुन मोरा । बार बंक नहिं होवहिं तोरा ॥ प्रतीहार जब बात सुनाई । सिद्ध एक है ठाढ़ गुसाई ॥ सुनिनुपक्रोध अनल समकीन्हा । प्रतीहार तुम मति अति हीना ॥ भिक्षुक एक जो मोहि बुलावै । शिव सुत मार दरशनहिं पावै ॥

ज्ञानसागर

( ५१ )

साखी-कहा रूप तेहि ऋषीकर, मोहि कहो समझाय ॥ जो मांगे सो देव वहि, लेइ बहुर घर जाय ॥

चौपाई

हे प्रभु आहि सेत जो भाऊ । सेत अंग जैसे शशि गऊ ॥ माला तिलक बदन है सेता । कहै नृपति कोई आहि अजेता ॥ मन्दोदरि कहै सुनो हो राजा । ऐसा रूप और नहि छाजा ॥ सेत रूप महिमा मैं जानौं । निश्चय है कोई पुरुष पुरानो ॥ जार्ई तुरन्त गहौ तुम पाऊ । होऊ अकल सुन रावन राऊ ॥ दस सिर बचन सुनत पर जरेऊ । जगत हुताशन जनु वृत्त परेऊ ॥ चलि भयो असुर अनिल समचीन्हा । बहुत वेग मनमें अस कीन्हा ॥ सत्तरवार खड़ सो चलावा । तब हम ओट तृणकी लावा ॥

साखी-तृण ओट जेहि कारणे, गर्व परिहरौ राव ॥ तृण जवही ना टूटयो, राजहि शोक जनाव ॥

चौपाई

कह मन्दोदरि गहि मम पाऊ । गर्व न छाड़ रावन राऊ ॥ शिवकी सेव करै मन मानी । अटल राज दीन्हा तिन ठानी ॥ तब चलत हम कही अस बाणी । मृदु नृपति तुम मर्म न जानी ॥ सुनु रावण जो लंक मझारा । सब कहैं रामचन्द्र जो मारा ॥ काहू मुक्ति गम्य नहि पाई । ताते मैं कछु कहां बुझाई ॥ तो कहैं भक्षहि काल अन्याई । काचा मास स्वान जिमि खाई ॥ काल भक्ष जिव सबहि निदाना । अधिक तोर कछु मरदै माना ॥ अगिला जन्म तोर होइ जवही । भक्षी कृष्ण देख पुन तबही ॥ उनसे करिहौ बहु अभिमाना । ताकर तोहि कहा परवाना ॥ तृण नहि टूटो बल तुम बूझा । आगै कहा तोह बल सूझा ॥ वालि नाम इक कपि जो होई । रख छह मास तोहि कहैं गोई ॥ तिनकी कांख रहिहौ छै मासा । ऐसा कहैं पग कौन्ह प्रकाशा ॥