भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १० )

भोपालबोध

यह तो माया जाल है, कठिन बीर झतवाल ॥ जीव शब्द न मानई, यक दिन खेहे काल ॥ मोह नदी विकराल है, कोई न उतारे पार ॥ सतगुरु केवट साथ ले, हंस होय यम न्यार ॥

चौपाई

कोटि जुहार होत नित तोहीं । कैसे कै लौ लावहु मोहीं ॥ कैसे छोड़ो राज गुमाना । किमि छोड़ो पाखण्ड अभिमाना ॥ कैसे छाड़हु राज बड़ाई । कैसे छाड़हु सुख चतुराई ॥ बैठि सभा बोलहु हँसि बाता । कुँवर पचास संग निशि राता ॥ बैठि महल महाँ खेलहु सारी । कामिनि के संग सदा बहारी ॥ छुटे न नाति कुटुम्ब की आशा । छुटे न कश्चन भोग विलासा ॥ सारखी-यह सुख कैसे छोड़िहो, हम तो कथे निरास ॥ सैन चैन जब छोड़हु, चलहु पुरुषके पास ॥

राजा भोपाल वचन

कहै राय सुनिये गुरुदेवा । मोकहाँ राखु चरन की सेवा ॥ मस्तक मोर दीजिये हाथा । दम अघ करमी होयँ सनाथा ॥ छोड़ो सहस बीस मैं हाथी । अब मैं चलौं तुम्हारे साथी ॥ अब हम दौलत छोड़ैं तुर्गंगा । छोड़ों सकल कामिनी संगा ॥ देह गर्व औ राज गुमाना । छोड़ैँ सकल भक्ति मनमाना ॥ जब तुम अमृत वचन पुकारा । तेहि क्षण छूटा सकल विकारा ॥ छन्द-दया निधान करूणा विलोकहु महादारुण दुःख दहै ॥ मैं अधम जीव अघोर अकरमी पतित पावन पद गहै ॥ तुम ज्ञान घन विज्ञान आगर धर्म कंटक मर्दन ॥ तुव नाम अमोल समरथ करहु दया निर्धन ॥

राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना

बोधसागर

( ११ )

सोरठा-अविरल भक्ति तुम्हार, पूरे भागते पाइये । विनवों बारम्बार, पुरुष दरश करवावहू ॥

ज्ञानी वचन-चौपाई

नाम पदार्थ देउँ मैं तोहीं । तैं राजा चीन्हा दृढ मोहीं ॥ पुरुष नाम एक यज्ञ कराओं । जेहि नाम ते हंस बचाओं ॥ जरी केर एक चन्दोवा तानो । कञ्चन केर सिंहासन आनो ॥ दिवालगिरी लागे जरकेरा । मोतिन झालर लागु घनेरा ॥ मोतिन लै भर थार धराऊँ । तापर आरति जोति लसाऊँ ॥ कंचन कलसा पाँचो वाती । झारीजल हीर लै पाती ॥ पूंगी फल औ स्वेत मिठाई । चन्दन पान धरो तहैं लाई ॥ कदलीफल उत्तम तहैं जानो । मेवा अष्ट युक्त प्रमानो ॥ कदलीपत्र कपूर सुगन्धा । आमपत्र लै चहु दिशि बन्धा ॥ सात हाथ वस्तर ले स्वेता । पुष्प गुलाब कहौ मरु केता ॥ नौ रतन लै थार धरायी । मनि मानिकके मध्य रहायी ॥ यह सब विधि जब दीनबतायी । राजा सबही लीन सजारी ॥ चौका बैठे सतगुरु जबहीं । रानी गाय चरण गहे तबहीं ॥ सवा लाख दीपक तहैं बारी । बहु आनन्द शब्द विस्तारी ॥ सब मिलि हाथ नारियल लीन्हा । आगे धरा दण्डवत कीन्हा ॥ राजा तृण धरे मुख माँहीं । भये अधीन बांधि कर आहीं ॥

राजा भोपाल वचन

तुम दीननके आहु दयाला । कृपा कीन्ह मोहि प्रतिपाला ॥ अब जनि मोसन करहु दुराई । अपने कर लीजै सुकताई ॥ यहि संसार नाहिं मम काजा । दारुण महा काल है राजा ॥ अब तुम आपन लोकदिखाओ । महा पुरुष के दर्श कराओ ॥

राजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना

( १२ )

शोपालबोध

सत्गुरु वचन

नौ नारी मिलि विन्ती करई । कुवर पचास ठाढ़ तहँ रहई ॥ बेटी एक सुरजकी जोती । ताहि लिलार पुहे जनु मोती ॥ साहब चरण धरा तिन आई । अब हम चरणछोड़ि नहिं जायी ॥ कीन्ह आरती नरयर मोरा । सकल जीवके तिनुका तोरा ॥ सुकृत अंश बुलाये ज्ञानी । पुरुष दरश कर राजा आनी ॥ लै अमरावहु लोक द्वारा । पल महाँ लाय ठाढ़ बैठारा ॥ दिना चार लगी राख्यो काया । वेगी जाय पुरुष पहाँ आया ॥ लिखिलिखिपान सबन कहँदीना । सकलो जीव वन्दन कीना ॥ जेते जीव परवाना पावा । तेते हंसा लोक सिधावा ॥ काया छोड़ि हंस चले आगे । सत्य सुकृत के चरनन लागे ॥ लागी डोर पुरुषके पास । तवै दूत यक कियो तमाशा ॥ सुकृत संग हंस सब जेते । आये दूत कला धरि तेते ॥ छाप तिलक तब विरचि बनायी । मारगमाँहि ठाढ़ भय आयी ॥ आओ हंस पुरुषके पास । नातो होवै ठाट विनाशा ॥ बोले दूत हंस कहँ जायी । हम गुरुज्ञानी तोंहि सहायी ॥ हमरे संग चलो हो राजा । हमरे शरण काल उठि भाजा ॥ हंस रूप तुम धरि बटपारा । हम नहिं फन्दा परै तुम्हारा ॥ सुकृत कहै हंस चलि आज । हमरे संग काल नहिं पाऊ ॥ बाएँ अंग कालका धारा । दहिने पाँजी अहै हमारा ॥ ताहि द्वार होय सुरति लगाओ । बेगि दरश पुरुषके पाओ ॥ सुकृत सागर पहुँचे जायी । अहो हंस तुम लेहु नहायी ॥ सकल हंस मिलि पैठि नहावा । निरखै द्रौप द्रौपका भावा ॥

बोधसागर

( १३ )

देखहिं लोक लोककी रचना । तब टेके सुकृतके चरना ॥ बैठे लोकमहँ हंस निहारा । जहँवाँ पुरुष आप विस्तारा ॥ सकल हंस तहँ बैठे पांती । सोरह रवि हंसनकी कांती ॥ पुहुप सेज सब हंस विराजा । तहँवाँ बुझाय नहिं रंक औ राजा ॥ कंचन भूमि देख अति शोभा । बरनौ कहा हंस तहँ लोभा ॥ राजा कीन्ह दण्डवत जबहीं । रानी पुत्र कीन्ह पुनि तवहीं ॥ अब नहिं भवमहँ जाऊ लिवायी । अति आनन्द बहुत सुखपायी ॥

सुकृत बचन

सुकृत उत्तर कहै समझायी । चलू राय गहिर जनि लायी ॥ जो तुम गहर लगावहु राजा । विनशे ठाट तब होय अकाजा ॥ तब पछतैहो राय भुपाला । ततक्षण बेगि चलो यहि हाला ॥

राजा भोपाल बचन

विनशे ठाट होय जरि छारा । अब नहिं छोड़ब चरण तुम्हारा ॥ ऐसा लोक छोड़ि नहिं जायब । बार बार तुहि माथ नवायब ॥ छन्द-राजा करै बहु बीन्ती तुम दीन बन्धु दयाल हौ ॥ हंसन नायक परम लायक काटिया फन्दा काल हौ ॥ चरण शरण आधीन समरथ शरण राखो आपनो ॥ दास जानि बन्ध छोरो काल तेहि नहिं पावनो ॥

सोरठा-अब हम शरण तुम्हार, दास जानि दाया करो ॥ आयो पुरुष दरबार, आपन कै प्रतिपालिये ॥

बचन-चौपाई

एती विन्ती राजा ठानी । ज्ञानी देश जलन्धर जानी ॥ भवसागर सो ज्ञानी आये । पुरुष दरश कीन्हा तब जाये ॥ दिना चार ऐसेहि चलि गयऊ । राजा खबरि कोई नहिं दयऊ ॥

( १४ )

भोपालबोध

तबै पौरिया रावपहँ जायी । महल देखि कोइ नाहिँ रहायी ॥ कहँवा राजा कहँवा रानी । कहँवा पुत्र कुवँर रजधानी ॥ कहँवा बेटी है चन्द्रावति । ताकर रूप बरनो कौनी गति ॥ कहँवा रानी कामसुंगगा । परिमल अंग बसत जेहि संगगा ॥ रोवत गयउ पौरिया द्वारा । जाय सबन सों कीन्ह पुकारा ॥ जाति कुटुम्ब सब देखन आये । जिन राजा ते बहु सुख पाये ॥

साखी-देखत अमिहत राजाकी, भयी अचम्भो बात ॥

रोवत कुटुम्ब दीवान मिलि, किन यह कीन निपात ॥

नगर लोग व्याकुल भये, घरघर रोवन लाग ॥

की यहि राजा मारिया, सबहिन केर अभाग ॥

चौपाई

कहै पौरिया सुनो दिवाना । तुम हम बूझो हम सब जाना ॥ जिन्दा एक नगरमें आया । तासों राजा कौन ऊँकाया ॥ कह्यो राय मैं बहुत चिताई । तुरतहिँ जिन्दा कहँ मरवायी ॥ राजा बात नहीं पतियावा । वच सुनि राजा मोहि रिसावा ॥ राजा कहै मुक्तिकरदाता । अस नहिँ जाने करै निपाता ॥ मोर कहा माना नहिँ भाई । जस कीन्हा तस फल नित पाई ॥

साखी-वचन पौरिया सुनतही, विकल भये सब कोय ॥

आज गरासे राय कहँ, काल आसै लोय ॥

चौपाई

नगर लोग तब कीन्ह विचारा । सब मिलि भागौ करौ सम्हारा ॥

भूलि अन्य शब्द नहिँ चीन्हा । मारन काल तिहुँ पुर दीन्हा ॥

साखी-सुकृत अंश न पाइया, अन्धा गये भुलाय ॥

धन्य राम भोपाल है, गहे शब्द चित लाय ॥

मंत्रि आदिका राजाको महलमें न देखकर पश्चात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना

बोधसागर

( १५ )

छन्द-गये राजा लोक कहैं तजिया सब मान गुमान हो ॥ इमि हंस धर्मनि जो मिले तुम देहु ताको पान हो ॥ कहै कबीर जो शब्द मानै सकल तजि नामे गहै ॥ अपवर्ग निश्चय ताहि कहैं नहि पला पकडत काल है ॥ सोरठा-जो हंसा इमि होय, शब्द सार तासों कहो ॥ काग चाल तिन खोय, हंस चाल गहि लोक लो ॥

इति श्रीप्रबंधभोपालबोध समाप्त

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससम्वादे भोपालबोधवर्णनो नाम चतुर्थस्तरंगः


इति

श्रीबोधसागरान्तर्गत ग्रन्थभोपालबोध

समाप्त

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीगुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-जगजीवनबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदासः,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्गः, बम्बई-४०० ००४

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सर्वज्ञः सर्वशक्तिः

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

श्रीगणेशाय नमः

A faint, stylized illustration of Lord Ganesha seated on a lotus. He is depicted with four arms, holding a small object in his hands. Above him is a traditional umbrella (chhatra). The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a very faded print.

श्रीगणेशाय नमः

धर्मदास साहबका गर्भविषय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर

सत्यकबीराय नमः

सत्यं शुद्धं गुणातीतं कंजपर्णसमुद्भवम् । सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञं सद्गुरुं प्रणतोऽभ्यहम् ॥

अथ श्रीबोधसागरे

पंचमस्तत्रंगः

ग्रन्थ जगजीवन बोध

( गर्भ चिंतावनी )

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास कह सुनहु स्वामी । कहो गरभकी अन्तर्यामी ॥ कैसे जीव गरभ में आवे । कैसे जीव जठर दुख पावे ॥ कैसे जीव परवशै भयऊ । कैसे इन्द्री देह बनयऊ ॥ कैसे जीव अपने पद परसे । कैसे जीव समरथ पद परसे ॥ कैसे जीव कौल बँधावे । कैसे साहब दर्शन पावे ॥ सो सब भेद कहो गुरु ज्ञानी । घट भीतरका भेद बखानी ॥

सतगुरु-वचन

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । तुम घट भली बुद्धि परकासा ॥ प्रथमें सत्य नाम गुण गाऊँ । घट भीतर का भेद बताऊँ ॥ सबही जीव गर्भ में जावैं । कौल बान्ध कै बाहर धावैं ॥ चूके कौल गरभ का भाई । बारम्बार गरभ में जाई ॥ नौ नाथ सिद्धि चौरासी भारी । उनहुँ देह गरभमें धारी ॥

गर्भोत्पत्ति वर्णन

( २२ )

जगजीवनबोध

नौ अवतार विष्णु जो लीन्हा । उनहूँ गरभ वसेरा कीन्हा ॥ तेतिस कोटी देव कहाये । गरभ वास महाँ देह बनाये ॥ जोगी जंगम औ तप धारी । गर्भवास में देह सवारी ॥ गर्भ वास तब छूटे भाई । जब समरथ गुरु बाहँ गहाई ॥

गर्भोत्पत्ति वर्णन

नारि पुरुष बांधे संयोगा । कामबाण लगि देहसुख भोगा ॥ सप्त धातुका अंग बनाया । जिह्वा दांत सुख कान उपाया ॥ हाथ पावैं रु शीस निर्माया । सुन्दर रूप बनी बहु काया ॥ नख शिख काहू नर बहु कीन्हा । दशही द्वार युक्ति करि लीन्हा ॥ दश द्वार नौ नाडि बनायी । ऐसे सबतर बन्ध लगायी ॥ दीन्हा ठेक बहतर भारी । नाडी बन्धन बहुत अपारी ॥ नाद विन्दुसों काथ निरमायी । तामैं प्रकृती आन समायी ॥ हृद कारिगर हुन्नर कीन्हा । जैसे दूधमें जामन दीन्हा ॥ तीनसों साठ चार बन्ध लायी । सोलह खाईं तहां बनायी ॥ सोलह खाईं चौदह दर्वाजा । अठहूँ हाथ गढ़ खूब विराजा ॥ छाजे महल अधिकही छाजा । तामैं जीव जो आनि विराजा ॥ अजब महल बहु खूब बनाया । छठे महल हंस चितवन लाया ॥ छठे मांस में सुरती आयी । दुख सुखकी तब पारख पायी ॥ छै मासको भयो जब प्रानी । दुख सुखकी मति सबै पहिचानी ॥ ओंघे सुख झूले लटकंता । मैल बहुत तहाँ कीच रहता ॥ जठर अग्नि तहाँ बहुत सतावै । संकट गर्भ तहाँ अन्त न आवै ॥ बहुत सांकीरी पिंजार पोई । तडफटै बहुत निकसे नहिं जोई ॥ सुखसों बोल निकसि नहिं आवै । करुना करि मन में पछितावै ॥ अरुझे श्वास रोवै मन माहीं । कौन करमगति लागी आहीं ॥ करुणा करि मन में पछितावै । ज्यों करीब कंठ करद बैठावै ॥

जगजीवनका गर्भके कष्टसे व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कौल करना

बोधसागर

( २३ )

ता दुःखकी गति कासु कहीजै । करम उनमानतहैं दुःख सहीजै॥ यदि आलोच करै मनमाही । संगी मित्र कोइ दीखत नाही ॥ पिछला जनम जब सूझा भाई । तब जिव दिलमा चिता आई ॥ स्त्री मित्र कुटुम्ब परिवारा । सुत नाती औ सैन पियारा ॥ संगी सुजन बन्धु औ भाई । गरभ कि चीन्ह परी नहिं ताई ॥ महा दुःख सो गरभ में पावे । बहुत वैराग हियामें आवे ॥ सूझी सकल बाहरकी बाती । जो जिव पिछली होती जाती ॥ जब जिव गरभमें ज्ञान विचारा । अब मैं सुमरूं सिरजन हारा ॥ सोच मोह जिव कछू न कीजै । अब सदगुरु का शरणा लीजै ॥ जिव अपने दिल माहि विचारे । तब समरथ को कीन पुकारे ॥ सुनु धर्मदास यक कथा सुनाऊँ । यक राजाको जस बने बनाऊँ ॥ राय जगजीवन ताहिकर नामा । जब वह पहुँच्यो एही ठामा ॥ करन विन्ती लागु अधीरू । सतगुरु कहैं तब कीन्ही टेरू ॥

जगजीवन वचन

साहिब संकट दूर निवारो । मैं निज खानाजाद तुम्हारो ॥ दिल मैं करूणा करै अतिभारी । अब मोहि साहब लेहु उबारी ॥ करै अस्तुति बहुते सुधिलावै । तुम वितु खाविन्द कौन छुडावै ॥ अब दुःख दूर निवारो स्वामी । कौल कहूँ प्रभु अन्तरयामी ॥ बाहर निकारो आदि सनेही । बहु दुःख पावै मेरी देही ॥ मैं जन प्रभुको दास कहाऊँ । आन देव के निकट न जाऊँ ॥ सतगुरुका होय रहों चेरा । दम दम नाम उचारूँ तेरा ॥ नित उठि गुरु चरणामृत लेऊँ । तन मन धने निछावर देऊँ ॥ जो मैं तन सों कहूँ कमाई । अर्थमाल मैं गुरुहि चढाई ॥ कुबुद्धि सीख काहु नहिं मानूं । हराम माल जहर करिजानूं ॥ कुलकी त्यागूं मान बढाई । निर्मल ज्ञान एक संत सगाई ॥

( २४ )

जगजीवनबोध

रात दिवस ऐसे लव लाऊँ । करत फुरत भक्ति गुरु कराऊँ ॥ दुःख सुख परे सो तनसे सहूँ । भक्ति दृढ़े गुरु चरणै रहूँ ॥ परत्रिया ताकूँ नहिं कोई । जननी बहन करि देखूँ सोई ॥ दुष्ट बैन कबहुँ नहिं खोलूँ । शीतल बैन सदा सुख बोलूँ ॥ स्वास उस्वासमों रटना लाऊँ । आन उपाय एको नहिं चाऊँ ॥ तन मन धन निछावर देखूँ । सतगुरु का चरणामृत लेऊँ ॥ सतगुरु कहैं सोई अब करिहौँ । आज्ञा लोप पाओं नहिं धरिहौँ ॥ और सकल बैरी कर जानूँ । सद्गुरु कहैं मित्र कर मानूँ ॥ ज्ञान बतावै सोई गुरुदाता । तन मन धन अरपूँ उन ताता ॥ तन मन धन मैं उनको देखूँ । नित उठि गुरुचरणामृत लेऊँ ॥ यहि गर्भवासमें कौल बधाऊँ । बाहर निकारो धुर निबाऊँ ॥ जो मैं छूटूँ गरभ सबेही । तन मन अरपूँ औ गुरु देही ॥ एक नाम सांचा कर मानूँ । और सबै मिथ्या कर जानूँ ॥ कहा अस्तुति करें गुसाई । बहुत दुःख पावत हूँ या ठाई ॥ यहां कोई मित्र नहिं भाई । मातु पिता नहिं लोग लुगाई ॥ देवी देवका कछु न चालै । गुरु विन कौन करै प्रतिपालै ॥ अब तो खबर परी यहि ठाहीं । और कोईका चालै नाहीं ॥ पिछली बात मैं हृदय जानी । कोई काहूँका नहीं रे प्राणी ॥ अपने साथ चलेगा सोई । जो कछु सुकृत करे सो होई ॥ मद माया में जीव भरमाया । सो तो कोई काम न आया ॥ बहुत विचार किया मैं सोई । अन्तकाल अपनो नहिं कोई ॥ ऐसी करुणा करै विचारा । दया करो दुःख भंजन हारा ॥

साहिब वचन

तब साहिब यों कहै पुकारा । कहि समझाया तोहि बारम्बारा ॥ अनेक बार गरभमें आया । तैं रतीकर्म भरम नहिं पाया ॥

साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकर गर्भसे मुक्त करना

बोधसागर

( २५ )

कई बेर तैं कौल बँधावा । कई बार तैं गर्भ में आवा ॥ गर्भ में ज्ञान उपजा है तोही । संकटमें सुमिरे सब कोही ॥ बाहर निकसि नहिं उपजे ज्ञाना । अंधकार अहंकार समाना ॥ बार अनेक भुलाना भाई । नहिं सतगुरु की दीक्षा पाई ॥ गरभ त्रास तब छूटै भाई । जब सतगुरु कहैं बाँह समार्ई ॥

जगजीवन वचन

बोलत वचन कहो गुरु देवा । जीवकी अवधि बताओ भेवा ॥ दीन दयाल दया गुरु कीजै । बूडत जीव आपन करि लीजै ॥ दयावंत गुरु दीन दयाला । मुक्तिरूप जीवन प्रतिपाला ॥ मोको अभय दान गुरु दीजै । अन्दर ज्ञान उजालो कीजै ॥

सतगुरु वचन

गरभ बासमें कौल बन्धावा । सो कैसे तैं न बाहर निर्वावा ॥ बडु संकट तोहि उपजे ज्ञाना । बाहर निकसत सब विसराना ॥ जोई जीव कौल निर्वाहै । सोई नहिं गरभवास मईं आहै ॥

जगजीवन वचन

अब नाहीं भूलें गुरु देवा । तन मन लाय कहूं गुरु सेवा ॥ मोकैं बाहिर काढो स्वामी । कौल न चूकैं अन्तर्यामी ॥

सतगुरु वचन

कौल बोल सब चौकस कीना । तबहीं गर्भ सों बाहर लीना ॥ नौवे मास जो बाहर आया । लोग कुटुम्ब सबही सुख पाया ॥ सबही हरष करें मन माई । पुत्र हेतु सब करें बधाई ॥ बाजा बाजे करै उछावा । गीत नाद आधिके चितआवा ॥ सबै सजन मिलि गूड़ बँटावा । रैन समय तिय मंगल गावा ॥ नगरलोक सब करें बधाई । घर घर साजे देह लुगाई ॥ घर राजाके जनम सो पढ़या । कौल किया सो सब विसरैया ॥ पीसुन मिले सबहिं धुतारा । सबहीं ज्ञान भुलावन हारा ॥

पिशुन कर्म वर्णन

( २६ )

जगजीवन बोध

ताका नाम सुनो रे भाई । महा जालके फन्द फँदाई ॥ झूठे झूठ मिले संसारा । नरक कुण्ड में नाखन हारा ॥

पिसुन कर्म वर्णन

प्रथम माता

माता मनमें करै बखाना । यह भल उग्यो आजुको भाना ॥ बालक जन्मा मोरे कोखा । जन्म भरे की भागी धोखा ॥

नाइन

नाइन एक बधार्ई लायी । तीन तो एकै बात जनायी ॥ मेरा कहा करो तुम कामा । नाक छेदि कहो नाथू नामा ॥ नाल औवल पीसो गाढो । दिहली को तब बालक काढो ॥ यह तो बात मैं गुप्त सुनायी । सुवा जिवाका तो सुहि दायी ॥

पिता

पिताके मनमें ऐसी आवैं । उमगे हरष हिय नाहि समावैं ॥ बाटे पान मिठाइ बहुत । धन्य भाग्य मोर जनम्यो पूता ॥

काका

काका कहै मैं उतरूं पारा । बालक खेले घरके द्वारा ॥ कर्म जोर मोरें बड कीन्हा । क्षेत्रपाल मोहि बालक दीन्हा ॥

दादा

दादा सुनिकै दौरे आये । पोता देख बहुत सुख पाये ॥ दासी हाथे कुवैर मैगाया । हेतु प्रीति से कण्ठ लगाया ॥

दादी

दादीके मन हर्ष अपारा । लेत बलाई बारंबारा ॥ मैं करी बहुत सतियनकी सेवा । भये प्रसन्न मोर कुलदेवा ॥

नानी

नानी आवत वेगि उठाया । सुख चुम्बा है कण्ठ लगाया ॥ लून ले शिर ऊपर वारा । द्रव्य माल पुनि बहुत उतारा ॥

बोधसागर

( २७ )

नाना

अब नाना मुख देखन आया । दौहित्रा देखि अधिक मुख पाया ॥ उमँगे हरष हिये न अमायी । कंचन चूरा दिया बधायी ॥

भुआ

बहुत करै हरष भुआ बाई । दिन दिन अधिकी करै बधाई ॥ मुख चुम्बा दै कंठ लगावे । हिये हर्ष उमँग नहिं मावे ॥

मौसी

मौसी मन बहु हर्ष उठावै । धन्य बहिन को कोख तरावै ॥ मुख चूमे अरु कण्ठ लगावै । अतिशय उमँग हिये नहिं मावै ॥

अडोसी पडोसी

बुढिया एक जो बोले आयी । तिन यक बात कही समझायी ॥ बालक तैल लौन सों लीजै । लौना नाम कहे धरि दीजै ॥

दूसरी पडोसिन

दूजी कहै सुनो रे बाई । बालक डारो छीतर माई ॥ सांचो टोना यही कहावों । इनको छीतर कहि बतलावो ॥

तीसरी पडोसिन

तिया तीसरी बोले सयानी । मैं जान्यों सो काडु न जानी ॥ कोदरा बरोबर तौल के लीजै । याकर नाग कोदरसिंह कीजै ॥

चौथी पडोसिन

चमरिन गोद यहीको डारो । मोल लेइ पुनि ताहि उजारो ॥ चमरूसिंह नाम यहि केरा । बालक याते जिवै घनेरा ॥

पांचवी पडोसिन

याको धूर गुनौरे डारो । दूत पराछित या विधि मारो ॥ घूरन सिंहै अरु गेनौ नामा । दीजे ताहि सुधरे सब कामा ॥

( २८ )

जगजीवनबोध

छठी पडोसिन

यह सब बात बताओ माई । चूल्हे डारो चुल्हन कहाई ॥ जेती नारि आर्यों तेहि बारा । सबहिन आपन मता उचारा ॥ कोह काहू कोह काहु बतावैं । स्यानप आपन सबहि जतावैं ॥

ओझा और स्याने

बुढवै एक जो सीस धुनावैं । वाके शिर पर भैरों आवैं ॥ सो कह हमको बैल बधाओ । भैरोंसिघ कही बतलाओ ॥ देवी पूजक एक तब आया । देवीसिंह तब नाम बताया ॥ गाजी मुर्गी कोह चढ़ावैं । गाजीदीन तब नाम बतावैं ॥ यहि विधि अनेकनहू आये । आपन आपन उक्ति सुनाये ॥

पुरोहित

घरको पुरोहित ऐसी कही । मनको मनोरथ पूरण सही ॥ यह तो बडा सपूत कहावै । इनके तुलै कोह नहीं आवै ॥ पुरोहित कह यजमान है मेरा । कुल देवी भैरोंका चेरा ॥

चारण और भाट

चारण भाट जपै महामाई । भोजक भाट तहां चलि आई ॥ सबही मिलि दीनी आशीशा । महामाइ सुत कीन्ह बरखीशा ॥

मुसलमान फकीर

दवैश एक कहै समुझाई । नाम फकीरा कहो रे भाई ॥ बांधि गांठ गले में दीजे । सब पीरों का चारण लीजे ॥

योगी

जोगी एक तहां चलि आया । मेरी भभूत का परचा पाया ॥ कहा हमारा सुनिकै लीजे । याका नाम सदाशिव दीजे ॥

दिगम्बर

यन्त्र मन्त्र जतीकरि लाये । करि तावीज गले पहराये ॥ व्रत्र वटु सूअरदांत मंगायी । एक सुपारी माहि मढायी ॥

पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भका कौल भूल जाना और संसारी बंधनोंमें मगन होना

बाधसागर

( २१ )

भोजपत्रमें यंत्र मढाया । सात भांतिका रेशम लाया ॥ गूगल बारि धूप लै कीन्हा । सो पहिराय गलेमें दीन्हा ॥

पण्डित लोग

ब्राह्मण सबही नगरके आये । पत्रा पोथी साथहिं लाये ॥ पीपल केरे पान मँगाया । लगन साधिके नाम सुनाया ॥ जगजीवन नाम जनमका सही । याका मरण होय ना कबही ॥ द्रव्य माल दक्षिणा दीना । जनमपत्रिका लिखाय जो लीना ॥ बहु विधि सो संस्कार कराया । मोह फाँसमें पकरि दवाया ॥ गर्भ कौल तो सब विसराना । अमर रहनका जतन बहुठाना ॥ एक सो बात गुप्त ना होई । स्याना लोग कहैं सब कोई ॥ फन्द अनेकन में फन्दई । कौल किया सब गया भुलाई ॥ झूठे झूठ मिलै सब कोई । इन्ते काज एको नहिं होई ॥ पिछली कौल सबै विसरानी । महा जालमें बँधे प्राणी ॥ यह सब झूठे पाखण्ड साजू । इनसँ सरे न एको काजू ॥ साखी-कहैं कबीर सब चेतहूँ, आगे काल कराल ।

आल जँजाल तम छाडिके, पिछले लोक सँभाल ॥

चोपाई

जौन कौल गर्भ में कीया । मूरख विसारि-सब दीया ॥ फिर भी कठिन हो गया भाई । तुम करिहौ कौन उपाई ॥ इतने सब मिलि करहिं बधाई । तामें तेरा कौन सहाई ॥ तुम अबकी चेतौ जो नाहीं । मानुष जनम भाग बड पाही ॥ साखी-ये तेरे मित्र नहीं, सब वैरी करि जान ।

उबरा चाहो कालते, गुरुहि मित्र कर मान ॥

चोपाई

एक जीव बेरी बहुताई । यूथ युत्थ बाटन सब लाई ॥ कोई जीवको का तकसीरा । सबको जडिया मोह जँजीरा ॥