भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

( ११ )

उसको उन्होंने आकर सीधा करके शेष पानी को गिरने से बचाया । किन्तु ऊपरोक्त सत्तर पदों जिनको मुहम्मद साहबने अकेलेही पार किया था उनमें से एक २ की दूरी इतनी थी कि, पाँचसौ वर्ष तक वेग पूर्वक चलने से पूरा होता था ऐसे सत्तर पदों को मुहम्मद साहब ने पार किया । और इधर लौट कर आने पर क्षण मात्रा से अधिक समय नहीं लगा । मुसलमानी धर्मते इसी वृत्तान्त को मुहम्मद साहबका मेआराज होना कहते हैं । इसी विषयमें मुसलमानी धर्मके बडे २ पण्डितोंमें बहुत मतभेद है । कोई तो कहता है कि, मुहम्मद साहबने स्वप्न देखा था, कोई कहता है केवल संकरूप से वहाँ पहुँचे थे, कोई कहता है केवल प्रथम भूमिका (बैतुलअकसा) तक गये थे, कोई कहता है कि, अन्तरहृष्टिसे मुहम्मदसाहेब वहाँ पहुँचे, कोई कहता है केवल जिबराईलको देखा खुदाको नहीं देखा, कोई कहता है पाँच-भौतिक शरीर सहितही मुहम्मद साहेब आसमानपर गये और इसी प्रत्यक्षकी हृष्टिसे खुदाको देखा । विस्तार भयसे अधिक मतभेदका लिखना छोड़कर यथार्थ आशयकी ओर झुकता हूँ ।

पैगम्बरी मिलनेके बारहवें वर्षके पश्चात् मुहम्मदसाहबको मेआराज हुआ था उसका आशय है कि, जब मुमुक्षु श्रवण मनन निदिध्यासन द्वारा बारह महावाक्यका विचार कर लेता है तब यह मोक्ष का अधिकारी होता है । और ५२ वर्षसे आशय है ५२ अक्षरसे सो जब यह ५२ अक्षर के वृत्त से बाहर होता है अर्थात् शब्द जालसे निकलता है तब इसको सच्चे सद्गुरु की शरणकी प्राप्ति होती है । जहाँ शुद्ध बुद्धि रूप जिबराईल जो शुद्ध सतोषुण से प्राप्त होती है और शुद्ध संतोष रूप में कार्दल जो रजोगुण की शुद्धता से मिलता है इसके साथ

( २० )

मुहम्मदबोध

होता है । और तमोगुण की शुद्धता से उत्पन्न हुए शौर्य ( धीरता ) रूप बुराकपर सवार होकर गुरुकी शिक्षा द्वारा यह ज्ञान की भूमिकाओंको पूर्ण करता हुआ यथार्थ पद को प्राप्त होता है । और यथार्थ पदको प्राप्त होकर जीवन मुक्त अवस्था से अन्य जीवों को उपदेश देकर काल जालसे छुडाता है ।

इस मुहम्मद बोध ग्रन्थ के यथार्थ आशय को पारखी आत्मविद गुरु अधिकार प्रति अनेक रूपकों में समझाते हैं और इसको आध्यात्मिकही अर्थ से ग्रहण करने के लिये दश मुकामी रेखताका भी प्रमाण है । सो यहाँ दशमुकामी रेखता लिख देता हूँ ।

दशमुकामी रेखता

चला जब लोकको शाक सब त्यागिया हंसको रूप सतगुरु बनायी । भृगु ज्यों कीटको पलटि भृङ्गै किया आप समरङ्ग दै ले उड़ायी । छोडि नासूत मलकूतको पहुंचिया विष्णुकी ठाकुरी दीख जायी । इन्द्र कुबेर जहाँ रंभको नृत्य है देव तेतीस कोटि रहायी ॥ १ ॥ छोडि वैकुंठको हंस आगे चला शून्यमें ज्योति जगमग गायी । ज्योति परकाशमें निरखि निस्तत्त्वको आप निर्भय हुआ भय मिटायी । अलख निर्गुण जेहि वेद स्तुति करै तिनहूँ देव को हैं पिताई । भगवान तिनके परे श्वेत मूरति धरे भागको आन तिनको रहायी ॥ २ ॥ चार मुकाम पर खंड सोरह कहै अंडको छोर ह्यां ते रहायी । अंडके परे स्थान अचित को निरखिया हंस जब उहाँ जायी । सहस औ द्वादशै रुह है सङ्गमें करत कछोल अनहद बजायी तासुके बदनकी कौन महिमा कहौं भासती देह अति नूर छायी ॥ ३ ॥ महल कंचन बने मणिक तामें जडे बैठ तहै कलश अखंड छोजै । अचितके

बाधसागर

( २१ )

परे स्थान सोहंका हंस छत्तीस तहँवा विराजै । नूरका महल और नूरकी भूमि है तहाँ आनन्द सो द्रन्द्व भाजै । करत कल्लोल बहु भाँतिसे संग यक हंस सोहंगके समाजै ॥ ४ ॥ हंस जब जात षट् चक्रको वेधिके सातमुखकाममें नजर फेरा । सोहंगके परे सुरति इच्छा कहीं सहसवामन जहँ हंस हेरा । रूपकी राशिते रूप उनको बना नहीं उपमा इन्दु जौनिवेरा । सुरतिसे भेटिकै शब्दको टेकि चढ़ि देखि मुखकाम अंकूर केरा ॥ ५ ॥ शून्यके बीचमें विमल वैकुण्ठ जहाँ सहज अस्थान है गैव केरा । नवो मुखकाम यह हंस जब पहुँचिया पलक विलंब ह्राँ कियो डेरा । तहाँसे डोरि मकरतार ज्यों लागिया ताहि चढ़ि हंस गो दै दरेरा ॥ भये आनन्दसे फंद सब छोडिया पहुँचिया जहाँ सत्य- लोक मेरा ॥ ६ ॥ हंसिनी हंस सब गाय बजायकै साजिकै कलश वहि लेन आये । युगन युग बीछुरे मिले तुम आहकै प्रेम करि अङ्गसो अँग लाये । पुरुषने दर्श जब दीन्हिया हंसको तपनी बहु जनमकी तब नशाये । पलटिकै रूप जब एकसे कीन्हिया मनहुँ तब भानु षोडश उगाये ॥ ७ ॥ पुहुपके द्वीप पीयूष भोजन करै शब्दकी देह जब हंस पायी पुहुपके सेहरा हंस औ हंसिनी सच्चिदानन्द शिर छत्रछायी । दिपैं बहु दामिनी दमक बहु भाँति की जहाँ घन शब्दको घमंड लायी । लगे जहाँ वरषने गरज घन घोरिकै उठत तहँ शब्द धुनि अति सोहायी ॥ ८ ॥ सुन सोह हंस तहँ यूथके यूथ है एकही नूर यक रङ्ग रागै । करत विहार मन भामिनी मुक्तिमें कर्म औ भर्म सब दूरि भागै । रङ्ग और भूप कोइ परखि आवै नहीं करत कल्लोल बहु भाँति पागे । काम औ क्रोध मद लोभ अभिमान सब छोड़ि पाखण्ड सत शब्द लागे ॥ ९ ॥ पुरुषके वदनकी कौन महिमा कहौँ

( २२ )

मुहम्मदबोध

जगत्में ऊपमाय कछु नाहिं पायी । चन्द्र औ सूर गण ज्योति लगै नहीं एकही नक्ख परकाश भाई । पान परवान जिन बंशका पाइया पहुँचिया पुरुषके लोक जायी । कहैं कब्बीर यहि भांति सो पाइहौ सत्य की राह सो प्रकट गायी ॥ १० ॥

देह नासूत स्वरे मलकूत और जीव जवरूतको रुह बखानै ॥ अरबी में लाहूत कहै जेहि निराकार मानिके मंजिल ठानै ॥ आगे हाहूत लाहूत है बाहूत खुद खाविन्द जाहूत जानै ॥ सोई श्री राम पन्नाइ सबै जग नाहि पन्नाह यह अता गानै ॥

इस प्रकारसे सत्यके खोजियोंको तो ऐसे ग्रन्थोंका आध्या- त्मिक अर्थही ग्रहण करने योग्य है । और स्थूल अर्थ तो स्थूल बुद्धिवाले पक्षपातियोंके लिये ही छोड देना उचित है ।

इति

==

काफिरबोध (दशम तरंग)

बोधसागर

( २३ )

पृष्ठ ( ६८२ ) की टिप्पणीमें सूचित किये हुए बड़ा मुकामोंका वर्णन

प्रथम नासूत का वर्णन

नासूत मुकाम सुमेह पर्वतके उत्तर ओर पृथ्वीसे छतीस सहल योजन ऊँचा है और यहाँपर दयाअंश रहता है और यह मायाका स्थान है—महामाया इस जगह अपने तेज सहित निवास करती है। और जब कबीर साहब और मुहम्मद साहब उस स्थानपर पहुँचे तब वहाँ हजरत दाऊदको बैठे तथा ज़बूर नामक पुस्तकको पढ़ते पाया। वहाँ पहुँचकर कबीर साहबने अस्तलामअलैक कहा—तब हजरत दाऊद अलैकमस्तलाम कहकर उठ खड़े हुए—और उनके हाथोंको चूमकर बड़ी आबमगत किया—तब कबीर साहब मुहम्मद साहबको उस स्थानकी विशेषता और गुणोंको बतलाकर आगे चले।

दूसरे मलकूत का वृत्तान्त

दूसरा स्थान मलकूत है—और यह स्थान नासूत से चौबीस सहल योजन ऊँचाई पर है—और पृथ्वीसे साठ सहल योजन की ऊँचाईपर है। और इस स्थानको दूसरे शब्दोंमें बँकुण्ड कहते हैं, और यह बँकुण्ड विष्णुका स्थान है—और इसी स्थानपर पाप पुण्यका लेखा लगता है—और इस विष्णुकी सभामें ब्रह्मा विष्णु शिव इन्द्रादिक समस्त देवतागण उपस्थित रहते हैं—इस विष्णुहीका नाम धर्मराय है—और आपको आज्ञासे नरक तथा बँकुण्ड और योनिका फिरना आदि सब कुछ होता है—और इसी स्थानसे विष्णु महाराजका परि-क्षण समस्त पृथ्वी और आकाशादिमें हुआ करता है। चित्रगुप्तजी विष्णु के मंत्री सबके पाप पुण्यका लेखा तथा हिसाब रखते हैं। जब कबीर साहब मुहम्मद साहबको अपने साथ लेकर इस मलकूत पर पहुँचे—तो वहाँ मूसाको बैठे तीरते पढ़ता पाया—कबीर साहबने वहाँ पहुँचकरभी सलाम अलैक किया—मूसा सलाम का उत्तर देकर उठे, और उनका हाथ चूमकर बड़ी आबमगतकी तब कबीर साहबने मुहम्मद साहबको इस स्थान के समस्त गुण बतला तथा वहाँके वृत्तान्तसे विन करारकर आगे चले।

तीसरे जबरुतका वृत्तान्त

तीसरा जबरुत है—इस जबरुत स्थानको कबीर साहबने साँसरी दीप कहा है—और यह निर्गुण ब्रह्म अलख निरंजनका स्थान है जो तीनों लोकका कर्ता धर्ता है और यह स्थान बँकुण्डसे अठारह करोड़ योजन ऊपर को ऊँचा है—यह बड़ा सुन्दर स्थान है—यहाँपर चार करोड़ ज्योतिका प्रकाश है—और इस सभामें चारों फिरिस्ते उपस्थित रहते हैं—अर्थात् जिबरा ईल-इस-रापिल इज़राईल—और मेकाईल। इन्हीं चारोंको ब्रह्मा विष्णु शिव गौर यम इत्यादिके नामसे पुकारते हैं। समस्त आज्ञाएँ इसी स्थानसे प्रचलित हुआ करती हैं—और चारों फिरिस्ते इन्हींके आज्ञाकारी हैं। वेब तथा पुस्तकें सबके प्रचार कर्ता यहाँ हैं और आपही के आज्ञाकारी तथा अधीन सब हैं। आद्या तथा निरञ्जन इसी राजधानीमें बैठकर तीनों लोकका राज्य करते हैं जब कबीर साहब रसूल अल्लाहको साथ लेकर पहुँचे तो देखा कि हजरत ईसा वहाँ बैठे हुए इञ्जील पढ़ रहे हैं। वहाँ पहुँचकर कबीर साहबने आसलामअलैक कहा और हजरत ईसा सलामका उत्तर देकर उठ खड़े हुए और उनके हाथको चूम लिया—तब कबीर साहब मुहम्मद साहबको उन स्थानोंके गुणका विवरण बतलाकर आगे चले।

( २४ )

मुहम्मदबोध

चौथे लाहूतका वृत्तान्त

चौथा लाहूत है जबलूत और लाहूतके बीचमें ग्यारह पालंगका अन्तर है, और एक पालंग आठ करोड़ योजनाका है । यह लाहूत स्थान अक्षरका है यहाँ अक्षर और योगमाया रहते हैं वह बड़ा सुन्दर स्थान है । जब कबीर साहब और मोहम्मद साहब इस स्थानपर पहुँचे तब कबीर साहबने मोहम्मद साहबसे कहा कि हे मुहम्मद ! देखो यह तुम्हारा स्थान है—और यहाँही वह अक्षर पुरुष जिसको तुम बेचून बेधेरा खुदा कहते हो रहता है और उस स्थानके गुण दिखलाकर आगेको चले ।

पाँचवे हाहूतका वृत्तान्त

पाँचवाँ हाहूत है—यह हाहूत स्थान एक असंख्य योजना शून्यके ऊपर है—अर्थात् लाहूत और हाहूतके बीचमें एक असंख्य योजना शून्य और अंधकार है—यह हाहूत स्थान अचिन्त पुरुषका है—यहाँ अचिन्त पुरुष सपत्नीक रहता है—और यह स्थान बड़ा ही मनोहर है—अचिन्तके सामने तीन सौ अप्सराएँ नृत्य करती रहती हैं—और यह निःशंक तथा निर्द्वंद्व रहता है कबीर साहब इस स्थान और अचिन्त पुरुषका सब विवरण मुहम्मद से कह करके आगेको चले ।

छठवाँ बाहूतका वृत्तान्त

यह बाहूत छठा स्थान है । और बाहूत और हाहूतके बीचमें तीन असंख्य योजना शून्य और अंधेरा है और हाहूतसे बाहूत तीन असंख्य योजनाको उंचाईपर है—यह अत्यन्त मनोहर स्थान है इस स्थानमें सोहँ पुरुष रहता है—और सोहँ पुरुषको अधीगिनीका नाम ओहँ है—यह सोहँ पुरुष अपनी शक्ति ओहँ सहित सिंहासनपर अधिकृत है—और उस स्थानमें सदैव सोहँका शब्द सुनाई दिया करता है । जब कबीर साहब मुहम्मदको लेकर इस स्थानपर पहुँचे तो वहाँके समस्त गुणोंका विवरण उन्होंने उनसे किया और फिर आगे चले ।

सातवें साहूतका वृत्तान्त

यह साहूत बाहूतसे पाँच असंख्य योजना ऊँचा है, और बाहूत और साहूतके बीचमें पाँच असंख्य योजना शून्य और अत्यन्त अंधकार है । यह इच्छाका स्थान है । इस स्थान की सुन्दरतम तथा यहाँकी सुखसामग्रीका भी विशेष विवरण है कबीर साहब मुहम्मद साहबको दिखलाकर आगे चले ।

आठवें राहूतका वृत्तान्त

राहूत साहूतके ऊपर चार असंख्य योजना ऊँचा है । साहूत तथा राहूतके बीचमें चार असंख्य योजना शून्य और अत्यन्त अंधकार है और इस राहूत स्थानमें अंकुर पुरुष अपनी शक्ति सहित रहता है—यह अत्यन्त सुन्दर तथा मनोहर स्थान है । जब कबीर साहब मुहम्मद साहबको लेकर इस स्थानमें पहुँचे तो उसके सब गुण दिखलाकर आगे चले ।

बोधसागर

( २५ )

नवमं जाह्नतका वृत्तान्त

यह जाह्नतके ऊपर दो असंख्य योजना ऊँचा है। और बीचमें मूग्य तथा अंधकार है—इस स्थानमें सहज पुरुष रहता है—और सत्यपुरुषका सबसे बड़ा पुत्र यही कहलाता है। यह नवीं स्थान सबसे सुन्दर और आनन्द पूर्ण कहलाता है। कबीर साहबने मुहम्मद साहबको वह स्थान दिखलाय और इसका विवरण करके फिर आगेको चले।

दशमं जाह्नतका वृत्तान्त

जाह्नत और जाह्नतके बीचमें दश असंख्य लाख योजनाका अन्तर है अर्थात् स्थान जाह्नत जाह्नतके ऊपर दश असंख्य लाख योजना ऊँचा है और यही स्थान सत्यपुरुषका है इसकी सुन्दरताका विवरण किया नहीं जा सकता है इसी स्थानसे कबीर साहब सत्यपुरुषको आशा लेकर पृथ्वीपर आया करते हैं और इसी स्थानके रसूल पाक है और इसी सत्य पुरुषके सत्यलोकमें जब हंस पहुंचते हैं तब कालपुरुष उनको नमस्कार करता है और उन हंसका आवागमन फिर कभी नहीं होता। वे हंस सत्यपुरुषको स्तुति किया करते हैं और वे सत्यपुरुषके स्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं : सत्यलोकके आधीन अठासी सहस्र हीय है और सब हीयोंमें सत्यपुरुष हंस आनन्द करते हैं उनके भोजन तथा चरित्राविका विवरण नहीं हो सकता है।

सत्यकबीराय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

व्यासस्तरंगः

श्री ग्रन्थ काफिर बोध

मंगलाचरण-सोरठा

बन्दौ श्री सत्य कबीर, कुफर नशावन जगत गुरु ॥

पावों सत मति धरि, दूटे कुफर जंगल सब ॥

ग्रान्धारम्भः

कौन सो काफिर कौन मुदारि । दोऊ शब्दका करो विचार ॥ गुस्सा काफिर मंनी मुदारि । दोऊ शब्दका यही विचार ॥ हम नहिं काफिर हम हैं फकीर । जाइ बैठे सरवरके तीर ॥ चोरी नारी दरोग सो डरें । राह सो लेखा सबका करें ॥ नंगे पायन पृथ्वी फिरे । हाट न लूटे बाट न पैं ॥ हमतो(बाबा)किसीका कछुन बिगारै । दर्द मन्ददिल दया सबारै ॥ दुनिया लोक सो उलटी करै । सत्यनाम सदा उच्चरै ॥ सिक्का देखि न कहिये फकीर । फकीर न कूटे पुरानी लकीर ॥ काफिर सो कुफराना करै । अलह खुदाय सो नाहीं डरै ॥ करै न बन्दगी फिरे दिवाना । गरभ बांधि फिरे गैवाना ॥ बोल कुबोल सेवै विसरावै । खून खराफातको दूरि बहावै ॥ दिल में चोर कमर में कत्ती । लोगन के घर भाजे रत्ती ॥ अलह के नामे बाँटे खाना । सो कहिये सांचे मुसलमाना ॥ मुसलमान मुसावे आप । सिदक सबूरी कलमा पाक ॥ खडी ना छेडे पडी न खाय । सो मुसलमान विहिश्तको जाय ॥

१ कोष । २ अभिमान । ३ व्यभिचार । ४ जारी ।

बोधसागर

(२७)

कलमा पढै न आवै बिहिस्त । हिरदे रहे पाप की दृष्टि ॥ हिन्दु मुसलमां खुदाके बन्दै । हमतो योगी (किसीका) नराखे छन्दै । देवी देहरा मसीद मिनार । हमरे तो एक नाम आधार ॥ टाकी ले कौन ऊपर चढै । पाव न दाबै हाथ न गढै ॥ तहाँ न अग्नि पवन का डर । ऐसा अलखपुरुष (जिन्दपीर) का घर चूना पत्थर बनाइया दादा आदम की करनी ॥ हमतो रहै अलेख पुरुष जिन्दा पीर की शरनी ॥ मक्खी जाय बंधनमें परी । छानत छानत ताही गिरी ॥ काजी मुलमा करे विचार । मक्खी किया बड़ा अहँकार ॥ मक्खी तो गाये भखे । मक्खी तो सूअर भखे ॥ मक्खी तो हलाल भखे । मक्खी तो मुर्दार भखे मक्खी जाय बिगारे खाना । तहाँ न चले बादशाह परवाना ॥ कोरा कलमा बहुतेरा बोले ॥ खैर मिहर का खीसा न खोले ॥ मिहर न बाँटे मुर्दार खोरा । खैर न बाँटे अल्लहका चोरा ॥ अरस परस बीच समाना । मोम दिल मोम दिल जाना ॥ सिदके सो परि पहिचाना । दर्दमन्द डुरवेश बखाना ॥ रहमत है मुरशिद पीरको । जहमत सूम महसूदको ॥ नेश्वयपरिचे निवाज गुजारे । श्रवणनेत्रको बर निहारै ॥ मुहम्मद मुहम्मद क्या करे । कुरान कलमा क्या पढै ॥ किधर किधर की राह बतावे । बिन गुरु पीर राह ना पावे ॥

साखी—हाजी गजी दोऊ गुरुचैला खोज । दश दर्वाजा ॥

अलख पुरुष कहै माथ नवाओ, इस विधि करै निमाजा ॥

सभै साचे काजी, सांचे सांचे मुलना वेद कुरान ॥

कहै कबीर आबसो सब आलम उपजाना ॥ हिन्दू कहिये की मुसल माना ॥ राम रहीम बसे एक थाना । मनको जाने सोई मोलाना ॥ दरको जाने सोई दरवेश । हमतो बाबा नेकबदी सो न्यारा ॥ दुनिया मति कोइ लावे दोष । हम तो कहि हैं अकेले दस्त ॥

(२८)

काफिरबोध

ताका साहेब मक्का वस्त । मकवन्तका साहेब अकिल मन्द ॥ अकिलमन्द अकिल सोजाना । मन सुरीद दोस्ती दाना ॥ सहर गदाई कौन यार । सिर खुरदनी कौन यार ॥ बन्दी खाने कौन यार । तख्त बादशाही कौन यार ॥ काया यार सिर खुदनी । दिल यार मार मांहीं ॥ जीव यार बन्दी खाने । मन यार तख्त बादशाही ॥ मनलाल दिललाललालपोतदा । रहमसा ही हमसाहपोतदार ॥

इति कबीर साहब का वचन उचार विचार

अथ खान मुहम्मद अली पादशाहका प्रबोध ।

कलिक कीमोक लिस रसमें की चसमें । खदयर संयम करदम । ओजूद राह चकित करदम ।

औवल-अक्के पीर है । मन सुरीद है । तन शहीद है असल गदाई है । तकबुर दुशमन है गुस्सा हराम है । नफस शैतान है । चोरी लानती है । जुवारी पलीदी है । अदब आदि है । आदब कम असल है । राह पीर है । बैराह बेपीर है । सांह- विहिश्त है झूठ दोजख है । मोमदिल पाक है । संगदि नापाक है । हिर्स हैवान है बेहिर्स बली है ॥

लाह लुई दरकत है । अचेत गुलाम है । असलजादेको सलाम है । कृतहीन जर्दरू है । दाना जोहरी है । असलकी दोस्ती है । दाना शायर है । बूझ महबूब है । बन्दगी कबूल है । अल्लाह नूर है । आलम हद है । साहिब बेहद है । यकीन मुसलमान है । शील रोजा है । शर्म सुन्नत है । ईमान मुसलमान है । बेईमान बेदीन है । दिल दलील है बाँग बलेल है । फकीरी सबूरी है नासबूरी मकारी है । दरोग दन्द है ।

इति समझौता

बोधसागर

( २९ )

अथ बन्द

प्रथमबोलिये मूल बन्द । दुजे बोलिये कमर बन्द । तीजे बोलिये लंगोट बन्द । पाँचवे बोलिये दानिश बन्द । छठे बोलिये शब्द बन्द । सातवाँ बोलिये सहस बन्द । आठवाँ बोलिये अहूठ हाथकी काया । जाका मर्म काहू विरले पाया ॥ मक्केहिर्से मदीने छाया । औवल पीर हिन्दू कौबल वीर सुसलमान कहाया ॥ सुसलमानकी काटी चोंचनी हिन्दू के छेदे कान । बोलता ब्रह्म नहीं हिन्दू नहीं सुसलमान । दादा आदम ने गाया । बडे बडे पीरन को फरमाया । खुदाने अली पादशाह को चिताया । हिम्मते बन्दा मददे खुदाया । दुआ फकीरा रहम अछाह । कदम दवैशाँ रह बलाय । दादा आदम मामा होआ । मक्के मदीने में चढा तावा । पहिली रोटी फकीर को रवा । ना देवे रोटी तो टूटे कठवता फूटे तवा । बैठी रहो मामा होवा । कुफ्र वले अपनी रावा । इतनी सवाल रतनहाजी ने कह्यो । कहै कवीर पीर को जानी । काफिर बोध सम्पूर्ण वानी ।

इति श्री काफिरबोध प्रथम मंजिल समाप्त

फिरिशतोंका ब्यान

१ औवल फिरिशता बसर है । जैसे खुदाकी मूरत मूरत नहीं है आदि अन्त नहीं है वैसे बरसकाभी कोई रूप रेख नहीं है । खुदाने सह फिरिशता सब । जीवधारीके संग लगा दिया है जो हरएकको बतलाता है कि, देख कर चलो ठोकर मत खाओ ॥

२ दूसरा फिरिशता समंअ ( कान ) है उसके द्वारा खुदा उपदेश करता है कि, मकरूह ( बुरा ) मरगूब ( भला ) आवाज और दोस्त दुश्मन की बातको सुनो और समझो ।

१ नेत्रेन्द्रो, कर्णन्द्रो ।

( ३० )

काफिरबोध

३ तीसरा फिरिश्ता शामा ( श्राणेन्द्रिय ) है । यह फिरिश्ता सुगन्धि दुर्गन्धि को बतलाता है ।

४ चौथा फिरिश्ता लमस ( स्पशेंन्द्रिय ) है जो बतलाता है कठिन और कोमल को ।

५ पाँचवा फिरिश्ता जायका ( रसेन्द्री ) है जो छः प्रकार के रसोंका ज्ञान बतलाता है ।

६ छठा फिरिश्ता हाथ है जो हाथ से करने योग्य कामों को सिखाता है ।

७ सातवाँ फिरिश्ता पाँव है जो चलने फिरने को बतलाता है ।

८ आठवाँ फिरिश्ता जवान ( जिह्वा ) है जो भला और बुरा वचन बोलने को सिखाता है ।

९ नवाँ फिरिश्ता आलातनासुल ( जननेन्द्रिय ) है जो मूत्र त्याग करने और संसारकी वृद्धि करने का मार्ग बतलाता है ।

१० दशवाँ फिरिश्ता मेकअद ( गुदेन्द्रिय ) है जो शरीर के मलों को बाहर निकालता है ।

११ ग्यारहवाँ फिरिश्ता दिल ( मन ) है जो इच्छा उत्पन्न करता है और राग द्वेष करता है । दिल वह नहीं है जिसको राक्षस मांसाहारी लोग कबाब बनाकर खाते हैं ।

१२ बारवाँ फिरिश्ता इद्राक ( चित ) है जो सर्व पदार्थोंका चिंतन करता है ।

१३ तेरहवाँ फिरिश्ता अहंकार है जो जीवन की रक्षा करता है ।

१४ चौदहवाँ फिरिश्ता अक्क ( ज्ञान ) है जिसे जिवरईल कहते हैं और जो सबके भेद को जानता है और सबको उप-युक्त मार्ग बतलाता है ।

बोधसागर

(३१)

१५ पन्द्रहवाँ फिरिश्ता शहवत ( रजोगुण ) है जिसको ब्रह्मा कहते हैं ।

१६ सोलहवाँ तभीज ( सतोगुण ) है जो सत्य असत्य का विचार बतलाता है इसीको विष्णु कहते हैं ।

१७ सतरहवाँ फिरिश्ता गजब ( तमोगुण ) है जो दुःखदाई पदार्थोंसे रक्षा करता है इसीको शिव कहते हैं ।

इसी प्रकार पांच तत्व और सर्व प्रकृतियाँ आदि संसारके सर्व वस्तु फिरिश्तो हैं और जिसप्रकार शरीर का राजा जीव है उसी प्रकार सब जड़ चैतन्य का स्वामी साहिब है जिसके शरणमें जानेसे अटल सुख प्राप्त होता है ।

इति काफिरबोध

इति श्रीबोधसागरान्तर्गत काफिरबोध नामकदशमस्तरंगः

नातध्य

काफिर बोध पुस्तक के प्रथम मंजिलकी एकही प्रति मेरे पास है । बहुत प्रयत्न करने पर भी उसकी दूसरी प्रति न मिल सकी इस कारण जैसी प्रति थी उसीके अनुसार ही रक्खा है । इस ग्रन्थ में फारसी और अरबी शब्दों का बहुत प्रयोग किया है किन्तु यह ग्रन्थ लिखा हुआ अशुद्ध हिन्दी अक्षरोंमें मिला है और दूसरी प्रति न रहने तथा छपने की शीघ्रता के कारण से कितने शब्द शुद्धरूप जान पड़नेके कारण जो त्रुटियाँ रह गयी हैं उनको दूर करने के लिये प्रयत्न कर रहा हूँ प्रयत्न सफल होने पर दूसरी आवृत्ति में ठीक कर दिया जायगा ।

इति

इति श्रीबोधसागरान्तर्गत ग्रन्थ मुहम्मदबोधः और काफिरबोधः समाप्त

प्रारंभिक पृष्ठ (सुलतानबोध)

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-सुलतानबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराजा श्रीकृष्णदासा,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

नं. ६ कबीरसागर - २

सर्वज्ञ साक्षात्पुरुषं विना अविनाशिकं सुखं विना

सर्वज्ञ साक्षात्पुरुषं विना अविनाशिकं सुखं विना

100

सत्यनाम

A black and white woodcut-style illustration of a bearded man, identified as Sri Kaveri Sahib, seated on a raised platform. He is wearing a turban and holding a mala. A lamp is visible to his left, and a decorative canopy is above him.

श्री कवीर साहिब

शिवः

शिवः प्रसन्नः

सुलतानबोध (एकादश तरंग)

सत्यपुरुषाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

एकादशस्तंभः

श्रीग्रन्थ सुलतानबोध

मंगलाचरण दोहा

अजर अमर सत नाम है, भंजि शोक तम पूंज ॥ तासु चरण मन रमि रहह, कमल मौर जिमि गुंज ॥

धर्मदास बचन-चौपाई

धर्मदास उठि विन्ती लाये । सतगुरु मोहि कहो ससुझाये ॥ कैसे करिये तजिय संसारा । ताको समरथ कहो विचारा ॥ आगे भये बलख के मीरा । माया सुख तजि भये फकीरा ॥ कही विधि तिन तजि पादशाई । सब वृत्तांत कहो समझाई ॥

सतगुरु बचन

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । बलख भेद कहूं तुम पास ॥ बलख शहर एक नगर अनूपा । तहैं सुलतान यकज्ञान सरूपा ॥ बादशाह शाहन सरदारू । प्रेम प्रीति मन माहिं विचारू ॥ इब्राहीम अद्दम जेहि माना । राज माहिं भक्ती जिन ठाना ॥ विरह उठी शाह मन माही । कारज अपना कीना चाही ॥ मनुषा जनम अमोलक पायी । ऐसे तन पाई खुदा मिलि जायी ॥ जो यहि अवसर अच्छह न पाया । क्षण महीं विनशि जायगी काया ॥ ऐसी फिकर उठी मन माई । तब षट दर्शन लिये बुलाई ॥

( ३८ )

मुलतानबोध

पण्डित साधु संन्यासी आये । जोगी जंगम यती बुलाये ॥ ज्ञानी ध्यानी सबके पीरा । काजी मुल्ला सेख फकीरा ॥ सब मिलि भेष जुड़े तहँ आयी । तिनसों वचन बूझा अर्थायी ॥ तबहि शाह सब टेर सुनायी । अल्लह रूप मुहि देहु दिखाई ॥ खुदा मिले कह कौन उपाई । कौन राम अरु कौन खुदाई ॥ एक खुदा यक और को होई । काहे भयो एक अस दोई ॥ दोऊ दीन मिलि कहो ससुझायी । दोमैं साँच कौन ठहराई ॥ दोउ कर जोड़ि सबन सो कहेऊ । बहुत अधीन आप तहँ भयऊ ॥ होय अधीन तब शीस नवायी । सबसे बूझे मन चित लायी ॥ सब मिलि कहाँ खुदाई सन्देशा । मेरे मनका मेटो अँदेशा ॥ साहब बसे कौन से देशा । सो मुहि बात कहो डुरवेशा ॥ दोऊ राह यह किनहि चलायी । किन वैकुण्ठ विहिस्त बनायी ॥ एती सब मिलि कहो दिवाना । नातो दूर करो कुफराना ॥ बिन देखे सबही दिल धरहीं । कान छिदाय अरु खतना करहीं ॥ हमरे दिलका मेटो अँदेशा । हम माने तुमरो उपदेशा ॥ हिन्दू सवे वैकुण्ठहि धावैं । सुसलमान विहस्त ठहरावैं ॥ इनमें कहाँ खुदा का बासा । बिन देखे कीनो विश्वासा ॥ किनहु खुदाका घर नहि पाया । झूठ झूठ सब ढ़ंद मचाया ॥ खुदाकी खबर न कोइ बताहीं । सबको जडो कोठरी माहीं ॥ दोऊ दीन यह किन भरमाया । खुदाकी खबर किनहु नहि पाया ॥

सारखी-दोऊ दीन समझावहू, मो मन बहुत अन्देश ॥ कौन खुदा दो दीन रचे, बसे कौन सो देश ॥ कोपे इब्राहीम तब, ये सब भरम भुलाहिं ॥ खुदा भेद कोउ ना कहे, डारो कोठरि माहिं ॥