भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बोधसागर

(२७)

कलमा पढै न आवै बिहिस्त । हिरदे रहे पाप की दृष्टि ॥ हिन्दु मुसलमां खुदाके बन्दै । हमतो योगी (किसीका) नराखे छन्दै । देवी देहरा मसीद मिनार । हमरे तो एक नाम आधार ॥ टाकी ले कौन ऊपर चढै । पाव न दाबै हाथ न गढै ॥ तहाँ न अग्नि पवन का डर । ऐसा अलखपुरुष (जिन्दपीर) का घर चूना पत्थर बनाइया दादा आदम की करनी ॥ हमतो रहै अलेख पुरुष जिन्दा पीर की शरनी ॥ मक्खी जाय बंधनमें परी । छानत छानत ताही गिरी ॥ काजी मुलमा करे विचार । मक्खी किया बड़ा अहँकार ॥ मक्खी तो गाये भखे । मक्खी तो सूअर भखे ॥ मक्खी तो हलाल भखे । मक्खी तो मुर्दार भखे मक्खी जाय बिगारे खाना । तहाँ न चले बादशाह परवाना ॥ कोरा कलमा बहुतेरा बोले ॥ खैर मिहर का खीसा न खोले ॥ मिहर न बाँटे मुर्दार खोरा । खैर न बाँटे अल्लहका चोरा ॥ अरस परस बीच समाना । मोम दिल मोम दिल जाना ॥ सिदके सो परि पहिचाना । दर्दमन्द डुरवेश बखाना ॥ रहमत है मुरशिद पीरको । जहमत सूम महसूदको ॥ नेश्वयपरिचे निवाज गुजारे । श्रवणनेत्रको बर निहारै ॥ मुहम्मद मुहम्मद क्या करे । कुरान कलमा क्या पढै ॥ किधर किधर की राह बतावे । बिन गुरु पीर राह ना पावे ॥

साखी—हाजी गजी दोऊ गुरुचैला खोज । दश दर्वाजा ॥

अलख पुरुष कहै माथ नवाओ, इस विधि करै निमाजा ॥

सभै साचे काजी, सांचे सांचे मुलना वेद कुरान ॥

कहै कबीर आबसो सब आलम उपजाना ॥ हिन्दू कहिये की मुसल माना ॥ राम रहीम बसे एक थाना । मनको जाने सोई मोलाना ॥ दरको जाने सोई दरवेश । हमतो बाबा नेकबदी सो न्यारा ॥ दुनिया मति कोइ लावे दोष । हम तो कहि हैं अकेले दस्त ॥

(२८)

काफिरबोध

ताका साहेब मक्का वस्त । मकवन्तका साहेब अकिल मन्द ॥ अकिलमन्द अकिल सोजाना । मन सुरीद दोस्ती दाना ॥ सहर गदाई कौन यार । सिर खुरदनी कौन यार ॥ बन्दी खाने कौन यार । तख्त बादशाही कौन यार ॥ काया यार सिर खुदनी । दिल यार मार मांहीं ॥ जीव यार बन्दी खाने । मन यार तख्त बादशाही ॥ मनलाल दिललाललालपोतदा । रहमसा ही हमसाहपोतदार ॥

इति कबीर साहब का वचन उचार विचार

अथ खान मुहम्मद अली पादशाहका प्रबोध ।

कलिक कीमोक लिस रसमें की चसमें । खदयर संयम करदम । ओजूद राह चकित करदम ।

औवल-अक्के पीर है । मन सुरीद है । तन शहीद है असल गदाई है । तकबुर दुशमन है गुस्सा हराम है । नफस शैतान है । चोरी लानती है । जुवारी पलीदी है । अदब आदि है । आदब कम असल है । राह पीर है । बैराह बेपीर है । सांह- विहिश्त है झूठ दोजख है । मोमदिल पाक है । संगदि नापाक है । हिर्स हैवान है बेहिर्स बली है ॥

लाह लुई दरकत है । अचेत गुलाम है । असलजादेको सलाम है । कृतहीन जर्दरू है । दाना जोहरी है । असलकी दोस्ती है । दाना शायर है । बूझ महबूब है । बन्दगी कबूल है । अल्लाह नूर है । आलम हद है । साहिब बेहद है । यकीन मुसलमान है । शील रोजा है । शर्म सुन्नत है । ईमान मुसलमान है । बेईमान बेदीन है । दिल दलील है बाँग बलेल है । फकीरी सबूरी है नासबूरी मकारी है । दरोग दन्द है ।

इति समझौता

बोधसागर

( २९ )

अथ बन्द

प्रथमबोलिये मूल बन्द । दुजे बोलिये कमर बन्द । तीजे बोलिये लंगोट बन्द । पाँचवे बोलिये दानिश बन्द । छठे बोलिये शब्द बन्द । सातवाँ बोलिये सहस बन्द । आठवाँ बोलिये अहूठ हाथकी काया । जाका मर्म काहू विरले पाया ॥ मक्केहिर्से मदीने छाया । औवल पीर हिन्दू कौबल वीर सुसलमान कहाया ॥ सुसलमानकी काटी चोंचनी हिन्दू के छेदे कान । बोलता ब्रह्म नहीं हिन्दू नहीं सुसलमान । दादा आदम ने गाया । बडे बडे पीरन को फरमाया । खुदाने अली पादशाह को चिताया । हिम्मते बन्दा मददे खुदाया । दुआ फकीरा रहम अछाह । कदम दवैशाँ रह बलाय । दादा आदम मामा होआ । मक्के मदीने में चढा तावा । पहिली रोटी फकीर को रवा । ना देवे रोटी तो टूटे कठवता फूटे तवा । बैठी रहो मामा होवा । कुफ्र वले अपनी रावा । इतनी सवाल रतनहाजी ने कह्यो । कहै कवीर पीर को जानी । काफिर बोध सम्पूर्ण वानी ।

इति श्री काफिरबोध प्रथम मंजिल समाप्त

फिरिशतोंका ब्यान

१ औवल फिरिशता बसर है । जैसे खुदाकी मूरत मूरत नहीं है आदि अन्त नहीं है वैसे बरसकाभी कोई रूप रेख नहीं है । खुदाने सह फिरिशता सब । जीवधारीके संग लगा दिया है जो हरएकको बतलाता है कि, देख कर चलो ठोकर मत खाओ ॥

२ दूसरा फिरिशता समंअ ( कान ) है उसके द्वारा खुदा उपदेश करता है कि, मकरूह ( बुरा ) मरगूब ( भला ) आवाज और दोस्त दुश्मन की बातको सुनो और समझो ।

१ नेत्रेन्द्रो, कर्णन्द्रो ।

( ३० )

काफिरबोध

३ तीसरा फिरिश्ता शामा ( श्राणेन्द्रिय ) है । यह फिरिश्ता सुगन्धि दुर्गन्धि को बतलाता है ।

४ चौथा फिरिश्ता लमस ( स्पशेंन्द्रिय ) है जो बतलाता है कठिन और कोमल को ।

५ पाँचवा फिरिश्ता जायका ( रसेन्द्री ) है जो छः प्रकार के रसोंका ज्ञान बतलाता है ।

६ छठा फिरिश्ता हाथ है जो हाथ से करने योग्य कामों को सिखाता है ।

७ सातवाँ फिरिश्ता पाँव है जो चलने फिरने को बतलाता है ।

८ आठवाँ फिरिश्ता जवान ( जिह्वा ) है जो भला और बुरा वचन बोलने को सिखाता है ।

९ नवाँ फिरिश्ता आलातनासुल ( जननेन्द्रिय ) है जो मूत्र त्याग करने और संसारकी वृद्धि करने का मार्ग बतलाता है ।

१० दशवाँ फिरिश्ता मेकअद ( गुदेन्द्रिय ) है जो शरीर के मलों को बाहर निकालता है ।

११ ग्यारहवाँ फिरिश्ता दिल ( मन ) है जो इच्छा उत्पन्न करता है और राग द्वेष करता है । दिल वह नहीं है जिसको राक्षस मांसाहारी लोग कबाब बनाकर खाते हैं ।

१२ बारवाँ फिरिश्ता इद्राक ( चित ) है जो सर्व पदार्थोंका चिंतन करता है ।

१३ तेरहवाँ फिरिश्ता अहंकार है जो जीवन की रक्षा करता है ।

१४ चौदहवाँ फिरिश्ता अक्क ( ज्ञान ) है जिसे जिवरईल कहते हैं और जो सबके भेद को जानता है और सबको उप-युक्त मार्ग बतलाता है ।

बोधसागर

(३१)

१५ पन्द्रहवाँ फिरिश्ता शहवत ( रजोगुण ) है जिसको ब्रह्मा कहते हैं ।

१६ सोलहवाँ तभीज ( सतोगुण ) है जो सत्य असत्य का विचार बतलाता है इसीको विष्णु कहते हैं ।

१७ सतरहवाँ फिरिश्ता गजब ( तमोगुण ) है जो दुःखदाई पदार्थोंसे रक्षा करता है इसीको शिव कहते हैं ।

इसी प्रकार पांच तत्व और सर्व प्रकृतियाँ आदि संसारके सर्व वस्तु फिरिश्तो हैं और जिसप्रकार शरीर का राजा जीव है उसी प्रकार सब जड़ चैतन्य का स्वामी साहिब है जिसके शरणमें जानेसे अटल सुख प्राप्त होता है ।

इति काफिरबोध

इति श्रीबोधसागरान्तर्गत काफिरबोध नामकदशमस्तरंगः

नातध्य

काफिर बोध पुस्तक के प्रथम मंजिलकी एकही प्रति मेरे पास है । बहुत प्रयत्न करने पर भी उसकी दूसरी प्रति न मिल सकी इस कारण जैसी प्रति थी उसीके अनुसार ही रक्खा है । इस ग्रन्थ में फारसी और अरबी शब्दों का बहुत प्रयोग किया है किन्तु यह ग्रन्थ लिखा हुआ अशुद्ध हिन्दी अक्षरोंमें मिला है और दूसरी प्रति न रहने तथा छपने की शीघ्रता के कारण से कितने शब्द शुद्धरूप जान पड़नेके कारण जो त्रुटियाँ रह गयी हैं उनको दूर करने के लिये प्रयत्न कर रहा हूँ प्रयत्न सफल होने पर दूसरी आवृत्ति में ठीक कर दिया जायगा ।

इति

इति श्रीबोधसागरान्तर्गत ग्रन्थ मुहम्मदबोधः और काफिरबोधः समाप्त

प्रारंभिक पृष्ठ (सुलतानबोध)

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-सुलतानबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराजा श्रीकृष्णदासा,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

नं. ६ कबीरसागर - २

सर्वज्ञ साक्षात्पुरुषं विना अविनाशिकं सुखं विना

सर्वज्ञ साक्षात्पुरुषं विना अविनाशिकं सुखं विना

100

सत्यनाम

A black and white woodcut-style illustration of a bearded man, identified as Sri Kaveri Sahib, seated on a raised platform. He is wearing a turban and holding a mala. A lamp is visible to his left, and a decorative canopy is above him.

श्री कवीर साहिब

शिवः

शिवः प्रसन्नः

सुलतानबोध (एकादश तरंग)

सत्यपुरुषाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

एकादशस्तंभः

श्रीग्रन्थ सुलतानबोध

मंगलाचरण दोहा

अजर अमर सत नाम है, भंजि शोक तम पूंज ॥ तासु चरण मन रमि रहह, कमल मौर जिमि गुंज ॥

धर्मदास बचन-चौपाई

धर्मदास उठि विन्ती लाये । सतगुरु मोहि कहो ससुझाये ॥ कैसे करिये तजिय संसारा । ताको समरथ कहो विचारा ॥ आगे भये बलख के मीरा । माया सुख तजि भये फकीरा ॥ कही विधि तिन तजि पादशाई । सब वृत्तांत कहो समझाई ॥

सतगुरु बचन

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । बलख भेद कहूं तुम पास ॥ बलख शहर एक नगर अनूपा । तहैं सुलतान यकज्ञान सरूपा ॥ बादशाह शाहन सरदारू । प्रेम प्रीति मन माहिं विचारू ॥ इब्राहीम अद्दम जेहि माना । राज माहिं भक्ती जिन ठाना ॥ विरह उठी शाह मन माही । कारज अपना कीना चाही ॥ मनुषा जनम अमोलक पायी । ऐसे तन पाई खुदा मिलि जायी ॥ जो यहि अवसर अच्छह न पाया । क्षण महीं विनशि जायगी काया ॥ ऐसी फिकर उठी मन माई । तब षट दर्शन लिये बुलाई ॥

( ३८ )

मुलतानबोध

पण्डित साधु संन्यासी आये । जोगी जंगम यती बुलाये ॥ ज्ञानी ध्यानी सबके पीरा । काजी मुल्ला सेख फकीरा ॥ सब मिलि भेष जुड़े तहँ आयी । तिनसों वचन बूझा अर्थायी ॥ तबहि शाह सब टेर सुनायी । अल्लह रूप मुहि देहु दिखाई ॥ खुदा मिले कह कौन उपाई । कौन राम अरु कौन खुदाई ॥ एक खुदा यक और को होई । काहे भयो एक अस दोई ॥ दोऊ दीन मिलि कहो ससुझायी । दोमैं साँच कौन ठहराई ॥ दोउ कर जोड़ि सबन सो कहेऊ । बहुत अधीन आप तहँ भयऊ ॥ होय अधीन तब शीस नवायी । सबसे बूझे मन चित लायी ॥ सब मिलि कहाँ खुदाई सन्देशा । मेरे मनका मेटो अँदेशा ॥ साहब बसे कौन से देशा । सो मुहि बात कहो डुरवेशा ॥ दोऊ राह यह किनहि चलायी । किन वैकुण्ठ विहिस्त बनायी ॥ एती सब मिलि कहो दिवाना । नातो दूर करो कुफराना ॥ बिन देखे सबही दिल धरहीं । कान छिदाय अरु खतना करहीं ॥ हमरे दिलका मेटो अँदेशा । हम माने तुमरो उपदेशा ॥ हिन्दू सवे वैकुण्ठहि धावैं । सुसलमान विहस्त ठहरावैं ॥ इनमें कहाँ खुदा का बासा । बिन देखे कीनो विश्वासा ॥ किनहु खुदाका घर नहि पाया । झूठ झूठ सब ढ़ंद मचाया ॥ खुदाकी खबर न कोइ बताहीं । सबको जडो कोठरी माहीं ॥ दोऊ दीन यह किन भरमाया । खुदाकी खबर किनहु नहि पाया ॥

सारखी-दोऊ दीन समझावहू, मो मन बहुत अन्देश ॥ कौन खुदा दो दीन रचे, बसे कौन सो देश ॥ कोपे इब्राहीम तब, ये सब भरम भुलाहिं ॥ खुदा भेद कोउ ना कहे, डारो कोठरि माहिं ॥

बोधसागर

(३९)

चौपाई

चली जो बात दशो दिशि जायी । षट दर्शनको साधु रोकायी ॥ इतनी बात काशी सुनि पाई । तब उठि धाये आप गुसाई ॥ जिन्दा रूप गुसाई कीना । जाइ शाह को दर्शन दीना ॥ बैठे तस्ल आप सुलताना । जिन्दा दुआसलामा कीना ॥ दोआ सलाम हमरी नहि माना । माया के मद गर्व भुलाना ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान सुनो डुरवेशा । जिन्दा रूप कौन को भेशा ॥ कहाँ से आये कहाँ तुम जाओ । कौन काज हमरे घर आओ ॥ हम पूछें जो खुदाकी बानी । इल्म अल्लाहकी कहो निशानी ॥ कुदरत की कोइ आदि बतावै । सोई मुर्शिद पीर कहावै ॥ हमरे दिलमें विरह बहु आया । खुदा मिलन कोउ नाहि बताया ॥

जिन्दा वचन

जिन्दा कहे सुनो रे भाई । षट दर्शन तुम देहु बुड़ाई ॥ तब हम तुम सों ज्ञान करावै । संशय तुम्हारो सकल मिटावै ॥ षट दर्शन को छोड़ि तुम देओ । जो चाहो सो हमसो लेओ ॥ अब जनि शंका मानो भाई । जो पूछो सो देऊँ बताई ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान सुनो डुरवेशा । कैसे मिटे हमार अँदेशा ॥ ऐसी बात कहो अधिकार्ई । क्या तुम दुसरे आय खुदाई ॥

जिन्दा वचन

तब हम एक कला दिखलायी । भैंसा पास यक साख भरायी ॥ जब डुरवेश भैंसा लगि जायी । भैंसा से यक वचन सुनायी ॥ भैंसा कहै सांचे दुवैशा । मानो शाह इनको उपदेशा ॥ यहि दुवैश खुदा समजानो । इनसे कर्ता और न मानो ॥

(४०)

सुलतान बोध

सुनिके शाह अचम्भो भयऊ । भैंसा साख सो कैसे भरेऊ ॥ यह तो पीर औलिया आये । भैंसे पास इन साख दिवाये ॥ शाहके दिलपरतीति अस आयी । यह दुरवेश खुद आय रहायी ॥ षट दर्शन को बन्ध छुडाये । बन्दी छोर कहिकहि सब जाये ॥ सारखी-बन्दीछोर कहाइया, शहर बलख मंझार ॥

छूटे बन्ध सब भेषको, धन धन कहे संसार ॥

चौपाई

तब सुलतान अपने मन जाना । यह दुर्वैश अविगत ठाना ॥ भैंसा पास इन साख भराहीं । यह तो गति आदम की नाहीं ॥ एती कला जान जब पाये । फिरि जिन्दा से पूछन लाये ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान सुनो दुर्वैशा । जिन्दा रूप कौनको भेशा ॥ कहाँसे आये कहाँ तुम जाओ । इतनी सुनद कही समझाओ ॥ तुम मुशिंद पीर हमारा । हम अपने दिल कीन विचारा ॥ साखी-कहाँ से आये जिन्द जी, फेर कहाँ तुम जाव ॥

हिन्दु तुरक मैं कौन हो, मोहि कही समझाव ॥

जिन्दा वचन-चौपाई

कहे दुर्वैश सुनो रे भाई । जिन्दा रूप खुदाको आई ॥ अछाह आप सकल घटमाहीं । दोऊ दीन दोउ राह चलाहीं ॥ हम दौजख तजि विहिश्तको जाये । सौपन एक चीज तोहि आये ॥ तुम हो दीन दुनी सुलताना । राखो मियाँ सुई सहिदाना ॥ जब तुम आओगे विहिश्तके माहीं । तब हम सुई लेब तुम पाहीं ॥ यही काज तुम्हरे घर आये । मियाँ सुई धरों तुव ठाये ॥ दीन दुनी के बादशाह कहाओ । इतनी सनद हमारी लाओ ॥ सुई देव जब विहिश्त मंझारा । तब हम माने साँच तुम्हारा ॥ हँसकर शाह सुई कर लीना । सहस्र सुईका कौल तब दीना ॥

बोधसागर

( ४१ )

सुलतान वचन

जाओ विहिश्त मानो विश्वासा । सहस्र सुई लेना हम पास॥

सतगुरु वचन

इतनी गोष्ठि शाह सो कीना । तब तहाँ से पयाना दीना ॥ एक सुई उन हम सो लीना । सहस्र सुईका कौल तब दीना ॥ साखी-इतना कहि हम उठि चले, चानक शाह लगाय ।

नीमशाम के वक्त में, जुड़ी अदालत आय ॥

चौपाई

सब मिलि आय जुडे दरिखाना । बैठे आय तहाँ सुलताना ॥ शाह के हाथ सुई जब देखा । तब वजीर मन कीन विवेखा ॥ हाथ जोड़िके विनती लावा । कैसे सुई हाथ में आवा ॥

वजीर वचन

कैसे सुई हाथमें लीना । कारन कौन कहो हम चीना ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान सुनो दीवानाँ । बन्दा अल्लाह दिया सहिदाना॥ दुरवेश एक यहाँ चलि आया । जिन या सुई दीन हम पाया ॥ कहा दुरवेश विहिश्त तुम आव । तब या सुई लेब तेहि ठाँव ॥ ऐसे वचन कह्यो दुर्वेशा। सुई हम देन कही तेहि देशा ॥ एक सुई हम उनसे लीना । सहस्र सुईका कौल हम दीना ॥ इतना वचन कहे सुलताने । सुनत वचन विन्ती तिन ठाने॥

दीवान वचन

दीवान कहे सुनो हो साई । सुई विहिस्त कौन विधिजाई ॥ गाम परगना और ठकुराई । सबही धरा रहै यहि ठाई ॥ तात मातु सुत सुन्दर दारा । तन धन धाम सकल परिवारा॥

१ दीवान

( ४२ )

मुलतानबोध

अंत समय ये काम न आवैं । आपु चिन्हेतब जिव सुख पावैं॥ जहँ लगि जगमें दृष्टि दिखाहीं । सो सब विनशि जाय क्षणमाहीं॥ जतन करे बहुत सुख पावे । सो तन जले गडे मिटि जावे ॥ ऐसे कहि वजीर शिर नायौ । कैसे सुई संग ले जायौ ॥ समझि देखु अपने दिलमाहीं । सुई संग कौन विधि जाहीं ॥

मुलतान वचन

तब मुलतान वचन अस कहई । सुनो वजीर मता यक आहई॥ इतना लशकर संगलै जायब । हस्ती चार सो सुई भरायब ॥

वजीर वचन

हस्ती संग चले नहिं शाहा । खोजा करो तुम दिलके माहा॥ हस्ती घोडा माल खजाना । यह सब संग चले न निदाना ॥

मुलतान वचन

शाह तबै अस वचन सुनावे । बैठि सुखपालविहिश्तको जावे॥ लेवैं बाँस में सुई भरायी । यहि विधि सुई संग ममजायी॥

वजीर वचन

तब दिवान कर जोरि सुनावे । यह सुखपालकबर लगि जावे॥ आगे कस तुम करहु साई । सो मोहि वचन कहो समझाई॥

मुलतान वचन

आगे हम घोड चढ़ि जायब । लेइ जीन में सुई भरायब ॥ अहो दिवान एसेई करिहौ । ले दरवेश के आगे धरिहौ ॥

कबीर वचन

सुना दिवान तबै हसि दीना । दोइ कर जोरिके विन्ती कीना॥ दादा बाबा तुम्हरे रहैया । घोडे चढ़ि कोऊ ना गैया ॥ साखी-इतने में संग नहिं चले, मुनहु शाह चित लाय ॥ यह बज्रद दिन चार है, सो भी संग न जाय ॥

बोधसागर

(४३)

चौपाई

मनमें चकितशाह तब भयऊ । झूठी माया हम चित दयऊ ॥ सुई संग चले नहीं जाही । झूठी राज पाट सब शाही ॥ सहस्र सुईका का परसंगा । एके सुई चले नहीं संग ॥ अबतो खाना हम तब खावें । जब जिन्दाका दर्शन पावें ॥ इतना ज्ञान शाह घट आवा । जिन्दा दरशको सुरति लगावा ॥ इबराहीम ऐसि मति ठाना । राज माँहि भक्ती जिन जाना ॥ साखी-जिन्दा जिन्दा रट लगी, हिरदय रहा समय ॥ जो जिन्दा अबकी मिले, पूछू सब घर पाय ॥

चौपाई

ऐसी रटना शाह तब लावा । जिन्दा मिलन भयो उर भावा ॥ बहुत दिवस रट लागी ऐसी । आगे कहूँ भयी गति जैसी ॥ शाह कीन माँहि बिचारा । जिन्दा मिले सो कौन प्रकारा ॥ सब सिद्धन को लाउ बुलायी । उनसे पूछो मति अस भाई ॥ जोई सिद्ध अजमत बतलावें । उनसे खबर जिन्दाकी पावें ॥ जवे शाह ऐसी मति ठानी । लिये बुला सिद्ध सब ध्यानी ॥ साखी-सब सिद्धनको टेरिके, शाह किये सन्मान ॥ देउ करामत सिद्ध मोहिं, तब मेरो मन मान ॥

चौपाई

सन्मुख शाह सिद्ध सब आनी । तबही शाह कहे अस बानी ॥

सुलतान वचन

अधिक प्यारे तुमहौ अछः को । करामात दिखलाऔ अब हमको ॥ ना मैं तुम्हको बांधि झुलाऊँ । ना तो तुम्हको छुरी मराऊँ ॥

सिद्ध वचन

तब बोले सिद्ध चौरासी । हम हरि के आहिं उपासी ॥ निशि दिन रामा नाम गुण गावें । करामात ढिग हम नहीं जावें ॥ यह मुनि शाह बहुत रिसियाना । हुकम कीन सब बन्दी खाना ॥

(४४)

सुलतानबोध

सुलतान वचन

तुम काफिर अछ्हाह ते दूजा । भूत प्रेत चित लाये पूजा ॥ चक्की ढिग इनको बैठाओ । निशि दिन इनसे नाज दराओ ॥ जो नहीं करामात तोहि होई । क्यों कर सिद्ध कहाओ सोई ॥

सतगुरु वचन

बैठे सिद्ध सब चाक चलावें । चित विस्मय सब हरिगुणगावे ॥ त्रास देखि मुनि आयी दाय। ततछिन् शाहद्वार चलि आया ॥ सोटा मारा चक्की माहीं । घूमहु सतगुरु दाय। कराहीं ॥ बिदा सिद्ध भये हम भयगुती । देख्यो आय शाहके जपती ॥ कहा साह सों तिन्ह कर जोरी । चक्की सब आपहिं चलि दौरी ॥

सुलतान वचन

मुनि के शाह कैफदिल आयी । कौन शरूश यह चक्कि चलायी ॥ वेगहि दूँडि लाओ यहि वारा । चक्की चलायो सो अछ्हाह प्यारा ॥

सतगुरु वचन

दूंदत नगर थके दिल जबहीं । नहिं पाये व्याकुल चित तबहीं ॥ जबहि शाह घर लगन विचारा । तब हम जीवदया उर धारा ॥ तुरतहि जाय तहां पगु धारा । शाहके महलन चढे गोहारा ॥ महलपर देखत फिरो वहुँ खुठा । करो पुकार हेरानो ऊंटा ॥ मुनि के शाह कोधकरि धाये । कौन हमारे महलन पर आये ॥ कहो तुम कौन कहाँ से आवा । कौन काज महल पर धावा ॥ तब हम कहा ऊंट यक छूटा । दूंदत फिर्ह मैं अपनो ऊंटा ॥ बहुत अधीन ऊंट हम भायो । खोजत ऊंट महल पर आयो ॥ मुनिके शाह तबे हँसि दीन्हा । कैसे ऊंट महल पर चीन्हा ॥ जँगल माहिं तेहि खोजो जाओ । कैसे ऊंट महल पर आओ ॥ तब हम कहा सुनो तुम ज्ञाना । चढे तरक्त अछ्हाह किन जाना ॥ ऐसी बूझ करो मन माहीं । सत्य वचन धरो मन ठाहीं ॥

बोधसत्तार

(४५)

सारखी-तस्वत चढे किन पाइया, सुनो शाह सुलतान ॥

हरदम साहब याद करू, रचा जिन सकल जहान ॥

महल न आवे ऊंट हमारा । तस्वत ऊपर अछ्हाह निहारा ॥

अछ्हाह तस्वत पर कैसे पावे । जहाँ लगि घट महाँ गर्व रहावे ॥

जब तुम छोड़ो राज शरीरा । अछ्हाह लखो तुम अपने पीरा ॥

छोड़ो मान गुमान रे भाई । अछ्हाह रूप तबही मिलि जाई ॥

सुनत शाह सन्मुख जब आवा । तब जिन्दा से पूछन लावा ॥

सुलतान बचन

कौन रूप कौन नाम तुम्हारा । कहो अछ्हाह मिले कौन बिचारा ॥

जिन्दा बचन

सांचे दिलसे सुरति लगाओ । प्रेम प्रीति लौलीन रहाओ ॥

सुख संपति की करो न आशा । निशि दिन दीया प्रेम प्रकाशा ॥

मन अस्थिर करि सुरति लगाओ । तबहि दर्श अछ्हाह को पाओ ॥

कहे कबीर खोजे सो पावे । खोजत खोजत अलख लखावे ॥

सारखी-प्रेम प्रीति करि खोजिये, हियमें आवे ज्ञान ॥

अलख अछ्हाहकी खोजमें, जागत भये सुलतान ॥

जिन ढूढ़ा तिन पाइया, गहरे पानी पैठि ॥

जो बौरा ढूबन डरा, रहा किनारे बैठि ॥

चौपाई

जब कीन मन शाह अन्देशा । नहिं तहाँ ऊंट नहीं दुवैशा ॥

ऐसे बहुत दिन बीता भाई । काल कला घट आन समाई ॥

बहुरि एक दिन बलख मैझारा । शाहके महलनमें पगु धारा ॥

नौरोजा खेले सुलताना । गिलम बिछायबहुविधि जाना ॥

महलन माहीं पहुँचे जायी । देखत फिरे महल चौपायी ॥

इब्राहीम अधम सुलताना । हमको देखत बहु रिसियाना ॥

(४६)

मुलतान बोध

मुलतान वचन

कहे शाह तुम कौन है भाये । केहि कारण तुम महलन आये॥

जिन्दा वचन

हम परदेशी दूर दिशारा । देखत फिरहिं सराय बसोरों ॥

मुलतान वचन

शाह कहे यह महल हमारा । कहाँ सराय जो करइ बसारा ॥

जेहि महल हीरा जडा अपारा । तापर धुनी तुम कैसे बारा ॥

अब तुम जाओ शहर बजारा । तहाँ जाइ करो सराय बसारा ॥

जिन्दा वचन

कहे दुवैशा सुनो तुम शाहा । करि विचार परखो दिल माहा॥

महल तुमारा तुम कहैं पावा । करो खोज यह किन निर्मावा ॥

महल तुम्हारो होय न भाई । तुम भी सुसाफिर बसो सराई ॥

सुनो शाह तुम चतुर सयाना । सुरति निरति बूझो तुम ज्ञाना॥

बहुत बादशाह तुम आगे भयऊ । महल न संग काहुके गयऊ ॥

दादा बाबा तुम्हरा रहिया । महल काहुके संग न गैया ॥

जा तुम थापा महल हमारा । अन्त काल सब छुटे घर बारा ॥

यह जग सकल सराय बसेरा । इनमें नाहि कोउ केहि केरा ॥

जहाँ के ताहाँ छूटहिं धामा । यह सबही दिनचार सुकामा ॥

हरदम साहिबको पहिचानो । महल सराय एक करि जानो ॥

ज्ञान दृष्टि दिलमें जब आवै । राज छोड़ि साहिब गुण गावै ॥

साखी-ज्ञानें दृष्टि दिल आवई, सब तजि होय फकीर ॥

कहे कवीर मुलतानसे, ज्ञानके लागे तीर ॥


१ गुजारा, निबाहि ।

२ इस साखीके आगे एक प्रतियें नीचे लिखे पद हैं । किन्तु यहाँ इनका मेल न मिलनेसे नोटमें

लिखा है ।