कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( ४७ )
चौपाई
यक दिन शाह जु चले शिकारा । चुनि चुनि साथ लीन्ह असवारा छोडे बाज पक्षी गहि आने । देखत शाह बहुत सुख माने ॥ बहुविधि मारग करत कलोल्ला । जहँ तहँ फिरे शिकारिन टोला ॥ बहुत समय बीति जब गयऊ । एक शिकार हाथ नहिं अयऊ ॥
चौपाई
ज्ञानदृष्टि जब दिलमें आही । छोडो राज पाट बादशाही ॥ होय फकीर जंगलमें बासा । छोड़ी राज तख्तकी आसा ॥ शाह जो बैठे जंगलमें जाई । नगरकी सब परजा चलि आई ॥ काजी पण्डित मोख मुलाना । महंत महाबत गुलामनकराना ॥ सेठ सेनापति परजा आई । सबही धरे शाह की पाई ॥
प्रजा वचन
ऐसी बात न करहु गुसाई । सबही राज छण्ड होय जाई ॥ ओ तुम तजो तख्त औ राजू । सब परजा का होय अकाजू ॥
मुलतान वचन
नाहीं तख्त निकट हम जाबें । नहिं अपने शिर भार चढ़ाबें ॥ यह बादशाही हमसे नहिं होवे । कौन तख्त चढ़ि दोजख जोवे ॥ हम छोडा तख्त बादशाही । फिरि संराय महँ हम नहिं जाहीं ॥ बिना भक्तिमुक्ति किन पायी । राज करे सो दोजख जायी ॥ हमको जाय मिले यक साई । बहिं साहब मुझको फरसाई ॥ मैं अपराधी उनाहिं न चीन्हा । बिछ छाँडि उन हमको दीन्हा ॥ अबतो करें मैं कौन उपाई । साइ मुझको कस मिलि है आई ॥
परजा वचन
अब तुम चलो महलके माहीं । हम सब संग तुम होहु गुसाहीं ॥ तुमको छाँडि एको नहीं जहँ । सब मिलि संग पयाना देहँ ॥ सबि मिलि लाये महल मेंशारा । शाहके मनमें शोब अपारा ॥ कैसे के जिन्दा मैं पाऊं । कैसेके मैं जिब मुक्तताऊं ॥ मुठे झूठ मिल सब संसारा । दोजख कुंडमें नाखन हारा ॥ साखी-बेर बेर हमको मिले, नाम जिन्दा सो आहि ॥ अमरापन यक मुलतान है, किसविधि मिलेंगे आहि ॥
( ४८ )
सुलतानबोध
तबै शाह बहुत रिसियाना । खोजु शिकार हुकम फरमाना ॥ तबै शिकारी दुहुँ दिशि धावैं । पावैं न शिकार मनहि पछतावैं ॥ यहि विचलीला अस भइ भाई । सुनु धर्मनि तुम चित लगाई ॥ हरिन एक जो कनक रंग देखा । हीरा रतन मणि जडे विशेषा ॥ देखि सरूप शाह ललचाई । यहि मिरगा कहैं घेरो भाई ॥ आज्ञा पाइ चले असवारा । घरयो हिरण सेन मझारा ॥ कहे शाह जो मिरगा जाई । तुमसे मिरगा लेहौं भाई ॥ सेना सब से तब कहे पुकारी । मिरगा भागि शाह तर गयऊ ॥ शाह सब से तब कहे पुकारी । मिरगा मारि लाऊँ यहि बारी ॥ मिरगा संग सुलतान अकेला । नहिं कोइ सेना नहिं कोइ चेला ॥ छिन में मिरगा देखि लुपाना । तेहि पीछे धावहि सुलताना ॥ लागी प्यास शाह को भांरी । महा भयानक बनही मझारी ॥ वट का वृक्ष तहाँ यक देखा । शीतल छाया बहुत विशेषा ॥ मिला फकीर एक तहैं वासा । कुत्ता दोग्य रहै उन पास ॥ शीतल कलशा पानिहि भरिया । जापर ठिलिया मठका धरिया ॥ खोजत नीर शाह चलि आये । दुआ सलाम करि वचन सुनाये ॥
सुलतान वचन
कहे सुलतान प्यास सुहि भारी । जात जान तुम लेहु उबारी ॥
दुर्वेश वचन
हम फकीर दुर्वेश कहावैं । सुरति होय तो भरो पियावैं ॥ पियो शाह जल लियो निवासा । जिन्दे कीना अजब तमाशा ॥
१ दूर से आहू उते आया नजर । पहुँचा उसपर शाह घोडा मारकर ॥ होके वह अपने सवारों से जुड़ा । पीछे दो फरसंग तक उसके गया ॥ जाते जाते हो गया आहू खड़ा । वाफ़िहतत आबिन अब्रम से कहा ॥ तुम्हको इस खातिर नहीं पंदा किया । वहसियों पर ता करे जोरोजका ॥ है गरज ईजाद से तेरे कुछ और । कर जरा तू विलम अपने आप गौर ॥ बात यह कहकर वह गायब होगया । नक्शा उसका शाह के विलपर हुआ ॥
बोधसागर
( ४९ )
साखी-गाकर कठी अगिनसे, मिश्री घूतहि मिलाय ॥ न्यामत धरी रिकाबमें, कुत्तासे कहे खाय ॥
बोपाई
कुत्ता न्यामत खाय न भाई । मार डुरवेश कुत्ता के ताई ॥ ऐसो चरित कीन दुर्वेश । तब शाहके मनमें भयो अंदेशा ॥
मुलतान बचन
कहे शाह तुम सुनो दिवाना । यह पशुजीव न्यामत कहजाना ॥
जिदा बचन
कहे फकीर सुनो बेनादाना । जैसा दिया तैसाही खाना ॥ जौसि करे करतूत कमाई । तैसि देह धरि भुगते भाई ॥ यामें फेर फार नहि होई । जो बोवे लुनिहे वह सोई ॥
मुलतान बचन
दोयकर जोरिके विन्ती कीन्हा । साहब तुमरी गति हम चीन्हा ॥ वानी अगम क.हो समझाई । आगे कौन हते यह साई ॥
दुर्वेश बचन
तब दुर्वेश कहे समझायी । सुनो शाह तुम मन चितलायी ॥ बलख शहर यक नगर रहाई । तहँके हैं यह दोनों राई ॥ इब्राहीम अहै यक राजा । एक बाप अरु दूजो आज्ञा ॥ राज पाय कछु भक्ति न कीना । ताते जन्म श्वान को लीना ॥
१ यहां जो शाह इब्राहीम अदम साहबके बाप दादेको बलखका बादशाह लिखा है यह बात इतिहास और विचार द्वारा एकदम निर्मूल ठहरता है, क्यों, कि बलखके बाद शाह इब्राहीमके बाप दादे नहीं थे बरन इसके उल्टा उनके पिता एक महान संत थे जो परम विरागमान और एकांतवास करने वाले थे । शाह इब्राहीमको उत्पत्तिको कथा बहुतही रोचक और आश्चर्य दायक है । यहां स्थानाभावसे नहीं वे सकता गुरुको कृपा होगी तो कबीर साहबके जीवन चरित्रके सहित मुलतान चरित्र भी बहुत स्वरूपमें लिखेंगे । यहां दोनों कुलों को बलख के बादशाह और शाह इब्राहीम अदमको बाप दादा बतलाना बहुत ही भूल है इस हेतुसे जाना जाता है कि, इस पुस्तकमें भी उत्तरोत्तर मिलावट होती गयी है और मिलावट करनेवाले भी साधारण
( ५० )
सुलतानबोध
सुलतान वचन
तब सुलतान कहे सुनु साईं । एक बात और कहो समझाई॥ दोय खूँटे दोय श्वान बंधाये । तीजा खूँटा क्यों खालि रहाये॥
दुर्वेग वचन
कहे दुर्वेग सुनो रे भाई । याकी गतिहि कहुँ समझाई ॥ इब्राहीम नाम जेहि होई । बलख शहर का राजा सोई ॥ राज माहि बहुत सुख करिहैं । भाव भक्ति नाही मन धरिहैं ॥ विना बन्दगी जिन छूटे देहीं । वे पुनि जनम श्वान को लेहीं॥ इसमें जड़ूँ आनि के ताही । तब ये तीनों रहें एक ठाहीं ॥ इतनी सुन दुर्वेगहि बाता । शाह के मन में लागी घाता॥
सुलतान वचन
मुनि सुलतान अचम्भा भयऊ । तब दुर्वेग हि पूछन लयऊ ॥ श्वान योनि कस छूटे साईं । ताका भेद कहो समझाई ॥
दुर्वेग वचन
कहे दुर्वेग भक्ति जो करई । सो नर श्वान देह ना धरई ॥ करे बन्दगी साहिब केरी । दया मिहिर की दशा जा होरी॥ प्रेम प्रीति परमारथ नीका । माया मोह जाने सब फीका ॥ सब सुख नामहि से लौलावे । सो जिव श्वान जनम नहि पावे॥
सुलतान वचन
शाह कहे जो लेह बचाई । सो दुर्वेग साँच है भाई ॥ सो दुर्वेग खुदा का बन्दा । श्वान योनि का काटे फन्द ॥
विचारके जान पठते हैं । ऐसी ऐसी मिलाव और मूलके कारण कबीरपंथी साहित्यकी निन्दा होती है। किन्तु बुद्धिमानों को विचार पूर्वकही उसे ग्रहण त्याग करना चाहिये।
बोधसागर
( ५१ )
मन में शाह तब ऐसा जाना । यह दुर्वैश है खुदा समाना ॥ बार बार मोहि आनि चितार्ह । सोह दुर्वैश आप है साँई ॥ तब अपने दिल कीन्ह विचारा । इनसे कारज होय हमारा ॥ जो यह कहे सोई चित दीजे । इनका वचन मान शिर लीजे ॥ इतना शाह मन करत अन्देशा । नहीं वहाँ कुत्ता नहीं दुर्वैशा ॥ तबहि शाह मन कीन विचारा । निश्चय है यह सिर्जन हारा ॥ सार्वी-कहे शाह अबकी मिले, पुरवे मनकी आस ॥ कदमें शिरे छुआवहुँ, पलक न छाडूँ पास ॥
चौपाई
बन ते शाह नगर में जाई । मन जिन्दा में रहा समाई ॥
जिन्दा वचन
गुप्त रूप तब शब्द उचारा । इब्राहिम सुनु वचन हमारा ॥ नाहक जिव तुम मारि उडाई । तैसा हाल तुम्हारा भाई ॥ जाहि समय इजराइल ऐहैं । महा भयंकर रूप दिखाहैं ॥ हनिहैं सुगदर धरिहैं चोटी । उठै अगिन तब बोटी बोटी ॥ ताहि समय पुनि करिहो रोरा । काम न आवे सेन करोरा ॥ मारत पंछी दरद न आई । एक दिन ऐसा तुम पर भाई ॥ बैन सुनत सुरछित मन माहीं । गुप्त भये पछताने ताहीं ॥ कहे शाह खोजो तेहि जायी । जिन ऐसी सुहि बात सुनायी ॥ खोजि थके पुनि सुहि नहीं पाये । सुरछित शाह भवन चलि आये ॥ तबहि शाह मन ज्ञान समाना । जिन्दा वचन साँच कर माना ॥ राज पाट सुख सम्पति देहा । यह सब दीखत स्वप्न सनेहा ॥ ज्ञान दृष्टि दिलमें जब आही । छोडेउ तरस्त तबे बादशाही ॥
१ मुसलमानों धर्मके विस्वासके अनुसार इजराइल एक फिरीस्ता है जो सब प्राणियोंके आत्माको शरीरसे अलग करता है तब मृत्यु होती है ।
( ५२ )
सुलतानबोध
होय फकीर जंगल कियो बासा । राज काज की छाडी आसा ॥ सबही लोग नगर के आये । आइ शाह के लागे पाये ॥ काजी वजीर औ शेखमुलाना । महन्त महावत नफर गुलामा ॥ लागे सबही शाह के पाईं । सबहि मिलि के विन्ता लाईं ॥ ऐसी बात न कीजे साईं । तुम विन यह परजा दुःख पाईं ॥ जो तुम तरुत न बैठो राजा । सब परजा को होत अकाजा ॥ राजा से परजा सुख पावे । जहाँ तहाँ आनन्द रहावे ॥
सुलतान वचन
कहे सुलतान सुनो रे भाईं । हमतो तरुत के निकट न जाईं ॥ ना हम पावैं तरुत पर लावैं । ना अपने शिर भार चढावैं ॥ अब हम तरुत न बैठे आईं । बैठे तरुत सो नरकहिं जाईं ॥ अब हम राज तजी बादशाही । यम की मार सही नहिं जाही ॥ भक्ति विना जिव मुक्ति न पावे । राज करे सो नरकहिं जावे ॥ हमको आज मिले यक साईं । सो साहिब ऐसी फरमाईं ॥ मैं अपराधी उन्हे न चान्हा । अधविचछोडिसोमोकोदीन्हा ॥ अब हम करिहैं कौन उपाईं । वह अवसर मुझको कब आईं ॥
प्रजा वचन
प्रजा कहे सुनो हो साईं । अब तुम चलो महल के माईं ॥ जो तुम राज छाडि बन जैहो । तो सब संगं तुम्हारे ऐहों ॥ सार्वी-यहां रहन को छोडि के, तुम सँग करिहैं प्यान ॥ ऐसे वचन प्रजा कहि, लाये गृह सुलतान ॥
चौपाई
जब आये शाह महल मैझारा । उठी बिरह मन माहिं अपारा ॥ अबमैं किस विधिजिन्दा पाऊँ । उन विनु होय न मोर बचाऊँ ॥ यह सब लोक अहै संसारा । नरक कुंड में डारनहारा ॥
बोधसागर
( ५३ )
ऐसी करूणा भयि दिल माहीं । जिन्दा महल मिले केहिं ठाहीं॥ भयी शाह मन विरह अपारा । जिन्दा जिन्दा करइ पुकारा ॥ साखी-उन मनमें सुझको मिले, नाम न दिया बताय ॥ ईब्राहीम सुलतानको, भयो मिलनको भाय ॥
चौपाई
सुछित शाह मन चलि आवा । मनमें जिन्दा आनि बसावा ॥ थोडे दिन विरहा अधिकार्ई । फिरतो धरम जाल फैलाई ॥ माहिं पुनि राज तहैं सुख पाये । माया मोह देखि ललचाये ॥ गया ज्ञान सुखे में लपटाना । काल शाह घट आनि समाना ॥ उरझे शाह स्वाद सुख रंगा । देखि रंग मन बहुत उमंगा ॥ पुनि कछु दिवस जो ऐसे बीता । बिसरे शाह अछ्हाहकी चिन्ता ॥ ऐसी चाल देखि हम राही । राज न छोडे लोभ मनमाही ॥ तब हम रूप जो कीन खवासा । जेहि ते तरुत की छाडे आशा ॥ जैसा जिव तैसा तन धारा । कोइ विधि जिय उतारूँ पारा ॥ चतुर सहेली रूप अपारा । शोभा अंग अंग अधिकारा ॥ होय खवास बागमें जायी । फूल लाय रचि सेज विछायी ॥ बहु विधि फूलन सेज विछावें । जहां शाह पौढन निज जावें ॥ ऐसहि करत बहुत दिन गयऊ । तब हम एक अचम्भा कियऊ ॥ एक दिवस चित ऐसी आयी । ताहि सेज हम पौढे जायी ॥ रूप खवासिन तहैं हम कीन्हा । घडी एक पौढी सुख लीन्हा ॥ आये महल सेज ढिग शाहा । पौढि सहेली करे सुखलाहा ॥ इब्राहीम देखत रिसियाना । मनमाहीं बहुते खिसिआना ॥ हमरी सेज आई पौढाना । हमरी त्रास तनिक नहिं माना ॥ हांक मारि तिहि टेरि जगायी । देखत शाह मन क्रोध समाई ॥ शाह कहे क्यों पौढी नारी । बढचो क्रोध तब ताजन मारी ॥
( ५४ )
सुलतानबोध
❁ छन्द—हुकुम कीन शाह तन छीन लाव ताजन मारिये ॥ ताहि पीछे शीश उतारो पकडि भुजा फटकारिये ॥ मारन लागेउ शाह तेही खन हम कौतुक कीन्हे ॥ हँसी सहेली रोवे नहीं त्रास अतिशय तेहि दीन्हे ॥ सोरठा-बूझे तेहि सुलतान, मैं मारी तैं क्यों हँसी ॥ कहो साँची सहि दान, कहो सत ना कुम्हलाय मुख ॥
चौपाई
बहुत क्रोध करि मारा जबही । बहुते हँसी सहेली तबही ॥ हँसत सुलतान अचम्भा कीना । निकट बुलाय पूछि तब लीना ॥ निकट बुलाय आप सुलताना । वस्त्रशयो चूक करचो जिवदाना ॥
सुलतान वचन
यह तुम मोहि कहो समझायी । मारत तोहि हँसी क्यों आयी ॥ सच सच बात कहो निःशंका । तुमतो जनि मानो हमारी शंका ॥
सहेलीवचन—चौपाई
तबहि सहेली करे बखाना । सुनो शाह तुम चतुर सुजाना ॥ एक घड़ी सुख हम जो लीना । ता कारण इतना दुःख दीना ॥
- इस छन्द और उसके नीचेके सोरठाका पुरानी प्रतियोंमें गन्ध भी नहीं है । वरन् आगेसे जो चौपाई चली है उसका ऊपरकी चौपाईके साथ सम्बन्ध है । यह छन्द और सोरठा किसी महात्माने बैरागके जोशमें आकर लिखमारा है किन्तु कविताकी कंसी मिट्टी खराबकी है उसकी बात पाठक छन्द और सोरठासे समझ जायेंगे । देखिये सोरठाके प्रथम दोनों चरण तेरह २ मात्रासे पूर्ण हैं और तीसरे चरणमें भी १३ मात्रा हैं और चौथेमें पन्द्रह । कहीं तक कहें इसी प्रकारसे उत्तरोत्तर मट्टाचार्योंने ग्रन्थोंके विगाडनेमें ऐसा भाग लिया है कि ; जिससे कबीरपन्थकी साहित्य मूर्तप्राय होरही है । मुझे सब ग्रन्थोंके शोधनेमें कंसी २ कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं मैं हो जानता हूँ तिसपर भी मुझे कहीं तक सफलता हुई है पाठक स्वयम् समझ सकते हैं । वर्तमानमें यद्यपि कुछ कुछ विद्याकी ओर मुकाव कबीर पंथियोंकी हो रही है तथापि असीतक दो चारी को छोड़कर कोई भी ऐसा कबीरपन्थी नहीं है जो अपना कलंक और अपना विचार कबीर साहब कबीर पन्थी साहित्यके वे मत्थे न थोपता हो ।
बोधसागर
( ५५ )
सदा सर्वदा जो सुख करई । तापर मार कितो सो परई ॥ कहा कहै मोहि रही न जायी । ता कारण मोहि हौंसी आयी ॥ उमर भरे सुख कीना ऐसा । ताका हाल होयगा कैसा ॥ या कारण हँसी हम शाहा । कीजे जो तुम्हारे दिल चाहा ॥ राज करइ बहुतै सुख पावे । तन छूटे चौगसी जावे ॥ चौराशीमें है कष्ट अपारा । बिना नाम नहिं होय उबारा ॥ आखिर खाक होय तन तेरा । वचन मानि ले यह अब मेरा ॥ कहा तरुत शज्या सुख पाओ । राह खुदा में चित लगाओ ॥ देह मिलेगी खाक तुम्हारी । चतुर सहेली कहे विचारी ॥ सांची राह गहो तुम शाहा । जन्म पाय कछु लागो लाहा ॥ सतगुरु मिले तो भेद बतावै । जाने जीव मुक्ति घर पावै ॥ तहां जाय जिव करे अनन्दा । जनम जनम का मिटे सब फन्दा ॥ सारखी * सद्रू भेद जो पावई, होय मुक्ति घर बास ॥ जन्म मरन फन्दा मिटे, तब सुख पावै दास ॥
चोपाई
वचन सुन्यो जब शाह सुजाना । तब कछु दिल में उपज्यो ज्ञाना ॥ तेरा वचन सही सुनु नारी । सब सुख छोंड़ि अछाह चित धारी ॥ शाह विचार कीन मन तबहीं । निकसि जाउँ जंगल बिच अबहीं ॥ कहे सहेली सुनु सुलताना । दिलमें धरो अछाह को ध्याना ॥ जंगल बडा जेरी जिन देही । हवा हिसै तजु निज मति एही ॥ नेकी करो बदी तुम छोंडो । दया मिहर दिल अपने माडो ॥ परमारथ पर सब कछु वारो । पाक जात अछाह चित धारो ॥ सुनत वचन लागा चित घाऊ । शाह वचन सुनि लागे पाऊ ॥ कहे सहेली ज्ञान अपारा । जो दिल धरो तो उतरो पारा ॥
- यह साखी भी पुरानी प्रतिषेधोंमें नहीं है ।
( ५६ )
मुसलमानबोध
❁ सुनि कर शाह अचम्भा भयऊ । ऐसो वचन कबही नहिं कहेऊ ॥ भयो ज्ञान शाह सुनि वानी । काल कला फिर आनि समानी ॥ अरुझे शाह स्वाद सुख पायी । भयो मगन मन अति ललचायी ॥ साखी-सखी सहेली सँग लिये, करत रंग अरु राग ॥ बिसरे ज्ञान विचार सब, मोह बान उर लाग ॥
चौपाई
यक दिन शाह सेजहीं सोया । तोशक झूल विछौना जोया ॥ देह उण्ण छेह अवसर ताही । नींद न आवे बहुत सिसाही ॥ कोई सखि पंखा पवन डुरावे । कोह चन्दन घसि अङ्क लगावे ॥ तबहू नींद न आवे शाहा । बहु व्याकुल अतितन भइ दाहा ॥ एक चरित्र तहाँ हम कीना । साखी रूप धरि दर्शन दीना ॥ सुबुधि सखी जोरे दोह पाना । सुनिये एक अरज सुलताना ॥ कहूँ वचन परमारथ जानो । सुनत कोध दिल जो नहिं आनो ॥ यह तन पाय बहुत सुख कीना । कबहू धनी नहीं दिल दीना ॥ जिन साहिब यह देह बनावा । तख्त सेज सुख राज करावा ॥ कोठा कोट अमीरी भारी । गज औ तुरंग हरष संग नारी ॥ ऐसा साहिब क्यों विसराये । राग रंग चित अति हरषाये ॥ जब वह साहिब कोप कराई । तेहि समय को होय सहाई ॥ साखी-साहिब गीझे जेहि समय, देह विहिश्त को वास ॥ मालिक मेटे पलक में, करइ राज सुख नाश ॥
चौपाई
आखिर देह मिलेगी खाका । साहिब नेह करि होऊ पाका ॥ वचन सुनत चित गहबर भयऊ । आँसू बहुत चक्षु ते गयऊ ॥
१ इस चौपाईसे लेकर आगे जिस चौपाईके अन्तमें इसी प्रकारका फूल दिया है वहाँ तक पुरानी प्रतिबोधि नहीं है ।
बोधसागर
( ५७ )
तबहि शाह दिल अपने जाना । नारी मैं अस होय न ज्ञाना ॥ यह तो मुशिद मालिक मेरा । धरचो रूप इन नारी केरा ॥ तबहि शाह दिलमाहि बिचारा । हम कारण इन यह तन धारा ॥ जो यह कहे मानि शिर लीजे । जाते कारज अपना कीजे ॥ अब मैं वचन मानि शिर लेऊँ । चरण कमल में मस्तक देऊँ ॥ हम पुनि गुप्त भये तेहि थाना । देखत शाह बहुत अकुलाना ॥ कहे शाह कही अस बाता । घाव अचानक किये मुहि जाता ॥ कछु दिन शाह विरहमें रहेऊ । बहुरि शाह दिल मोह सो गहेऊ ॥ तब दिन एक श्वान यक आवा । जाके शीस माहि बड घावा ॥ कीन माथ देह भरि जाही । कल बल करि व्याकुल तन ताही ॥ श्वान विकल डोले चहुँ ओरा । आयो शाह ढिग तबही दोरा ॥ सखी सहेली मारन धायी । शाह श्वान कहँ लीन बुलायी ॥ कहे श्वान सुनु शाह सुजाना । हमहुँ रहे बडे सुलताना ॥ सुख सम्पति पुनि तिरियारंगा । जीव सतावे बहुत अस अंगा ॥ सोना रूप कटक गज बाजा । अंत समय कोइ आवे न काजा ॥ साखी-मातु पिता सुत बाँधव, औरौ दुलहिन नारि । अंत समय सब बिछुरई, यह शोभा दिन चारि ॥
चोपाई
प्यासे जल नागे पट दीजै । भूके नाज मिहर दिल कीजै ॥ जैसी परी आप कहँ जानो । तैसी सकल जीव पहिचानो ॥ हवा हिस तन साधो भाई । साधो पीर मिटै दुचितार्ई ॥ इतना कही श्वान उठि धाया । सखी सहेली मोह लगाया ॥ पुनि हम कहा गैब की बानी । सुनहि शाह सह सखी सयानी ॥
आकाश बानी
यह नर नरकहि फेर बनाया । तुम तो बहुत नरक मन लाया ॥ सखी सहेली काम न आवे । जबही धरि यम आनि सतावे ॥
( ५८ )
मुलतान बोध
तात मात सुत नारि खजाना । काम न आवे सब बिलगाना ॥ झूँठे करे खुशामद तेरा । बांधे यम तब देख घमेरा ॥ उठि अकुलाय शाह चित लागा । देखे नहीं उपजे अनुरागा ॥ दया मिहर घट आन समाना । छोड़े जीव घात अभिमाना ॥ पीर शाह के घटहि समायी । भूखे नंगे सब दीन बुलायी ॥ मनमाँ कहे करो सो पीरा । जिन दिन्ह मोही चेत शरीरा ॥ प्रेमविरह निशिदिन चित लागा । अहक नाम सुमिरन अनुरागा ॥ जेहि दिवस छूटे मम जामा । झूठा सुख नहि आवे कामा ॥ यक दिन शाह किये अशवारी । बलख शहर देखा निरुवारी ॥ कहवाँ देखों पीर सुजाना । जिन सुहि कहा भेद निर्वाना ॥ डेरा सहित सखी रंग सेना । चले बेगि चित नाहिं न चैना ॥ बैठे एक ऊँट तजि प्राना । पहुँचे आप तहाँ सुलताना ॥ देखि ऊँट दिल भये उदासा । रोवे बहुत विकल धरि स्वासा ॥ ऐसी गति यक दिवस हमारी । अपने मन में यही विचारी ॥ माया मोह अहे जंजाला । दिना चार का झूठा ख्याला ॥ इब्राहीम कब्बो गोहराई । जाहु सबें अपने घर भाई ॥ ❁ छंद-गजसे उत्तरी ठाढे भये सब दिये भूषण डारिहो ॥ चोला पहिर शिर ताज दे तब चले निर्धार हो ॥ सेना सकल विलखित वदन सब कगहीं शोर सहेलियाँ ॥ मम खबर लय को सखी शिर कूटि मरहिं सहेलियाँ ॥ सोरठा-घेरि राह सब लोग, कोइ न छोड़हिं शाहको ॥ ऐसे सबको सोग, पुत्र मरे जिमि विकल जग ॥
- पुरानी प्रतियोंमें समस्त ग्रन्थभरमें छन्दका गन्ध भी नहीं है किन्तु नयी प्रतियोंमें ये बेतुकी छन्द कई मिलते हैं। इसी प्रकारसे कई सोरठे और बोहे (साखी) को भी पाया है। पुरानी प्रतियोंमें तो वह ही ही नहीं हैं किन्तु नई प्रतियोंमें एकदम बेतुक हैं।
बोधसागर
( ५९ )
छन्द-कहे शाहको समझ दिल हमरी खबर को लेइगा ॥ सब माहि दाता सबनको सो सबन भक्षण देइगा ॥ मां के रहे शिकंम में तहाँ को खबर जग लेत है ॥ जल थल है घट सकल पूरण जो जहाँ तहाँ देत है ॥ सोरठां-साझ कहे भोरे एक हन, सुनत दिन बीति गये ॥ शाह दिये नहिं चैन, पिछले पहर उठि चले ॥
चौपाई
निकलत शाह कोइ नहिं जाना । उठि चल्यो जंगल कहैं सुलताना ॥ नंगे पावैं पनही नहिं लीना । ऐसे शाह धनी दिल दीना ॥ स्वाद सलाह तजी सुख मेहा । राजपाट जान्यो सब खेहा ॥ साखी-सोलहसे सहेलियाँ, तुरी अठारह लख ॥ साईं तेरे कारणे, छोडा शहरबलख ॥
चौपाई
सकल छोड़ि के भये फकीरा । लागे विरह बान गंभीरा ॥ पिव कारण तज्यो सब आशा । जगत नेह तजि भये उदासा ॥ शाह निपट बहुतहि सुकुमारा । तिन सुख तजि गह्यो दुःखपारा ॥ क्षुधा लगे कोइ जांचे नाही । गहि संतोष रहे मन माहीं ॥ छन्द-पाँव छाले पड़ि गये चलि पंथ पग थहरावई ॥ कोइ संग आगे पाछे नाही धूप लगे कुम्हलावई ॥ अन्न बिना दिन तीन बीते हरष शोक नहिं चित गहे ॥ शाह निशि दिन अति विरागी नाम अबिचल पद चहे ॥
१ पेट । २ वर्तमानके अथवा इसके पोंडे दिन प्रथमके परम भक्त महात्माओंके विहृत्ताके नमूनेके लिये यह सोरठा जंसाका तंसा रखा हो ।
२ पुरानी प्रतियोंमें इसी साखीसे पुस्तककी समाप्ति होती है किन्तु इसके प्रथम बहुत कुछ विषय है तो इस पुस्तकमें आगे आवेगा इस नोटमें इस विषयमें विशेष नहीं लिखा जा सकता अन्यके अन्तमें “प्रथ विवेचन” नामक हेडिंगके नीचे लिखा जायगा ।
( ६० )
मुक्ताननबोध
सोरठा-तब साहब कछु दीन, रूखा सूखा टूकडा ॥ शीस नायके लीन, खरी कसौटी नामकी ॥
चौपाई
कछु भायो कछु औरहि दीना । मनमें नाहि गुनावन कीना ॥ जो मुख पांचो अमृत पावत । सो मुख सूखा टुकडा खावत ॥ आसन वासन अभूषण नाना । सो सब तजे भूरि मनमाना ॥ जेहि लागीं तिन ऐसी कीन्हा । कहे कबीर प्रेम मन चीन्हा ॥ प्रेम गली अति सांकरि भाई । राई दशावां भाग रहाई ॥ मनअहिरावत किस विधि जावे । विरले सत कोइ मारग पावे ॥ साखी-प्रेम बन्ध अति दुर्लभ, सब कोइ सके न जाय ॥ चढना मोम तुरंग पर, चलना पावक माय ॥ छन्द-मिही सुई को नाको जिमि तिमि इशक मारग ठानिया ॥ ताही ते कोउ झीनि होइ के प्रेम अगम गम जानिया ॥ जिन करि फना मरो आपको सो लहैं सुखको धामहो ॥ कहैं कबीर आप जहाँ तहाँ नहिं मिलत अराम हो ॥ सोरठा-मन महाँ शाह उदास, कबहुँक दरश मैं पाइहौ ॥ पुरवहिं मोरी आस, प्रगट रूप जब देखिहौ ॥ जबहि शाह घट विरह समायी । दोय कर जोरिके बिन्ती लायी ॥ दीन दयाल दया अब कीजे । अपना दर्शन मोको दीजे ॥ शंख्द स्वरूप रहिरूप छिपाओ । प्रकटरूप मुहिदरश दिखाओ ॥ जब हम लगन शाह घट चीन्हा । तब हम रूप प्रकट तहैं कीन्हा ॥
१ पुरानी प्रतियोंमें यह चौपाई इस प्रकार है :
नारि रूप तुम लेउ छिपाई । पुरब रूप धरि बरसा दिखाई ॥
और इसका सम्बन्ध उस कथासे है जहाँ सहैनी बादशाहके सेजपर सोगयी है और उसे मार पडा है ।
पर जब सबीने बादशाहको समझाया है तब बादशाह अपने मनमें विचारने लगा है कि ।
बोधसागर
( ६१ )
धन्यो स्वरूप अंग उजियारा । जगमग ज्योति तेज चमकारा ॥ उठत सुगन्ध अंग बहुताई । परिमल वास महेके सब ठाई ॥ बहुत कान्ति दीसे उजियारा । देखि शाह भये हर्ष अपारा ॥ तबही शाह चरण लपटाये । दोइ कर जोरिके विन्ती लाये ॥ धन्य भाग मुहि दर्शन दीना । पतित जीव पावन करि लीना ॥ लगे शाह सतगुरु के चरना । अब मुहि राखो साहब शरना ॥ धन्य धन्य तुम आपु गुसाई । आपन भेद कहो समझाई ॥ कहैं तुम रहौ कहांते आये । वह सब गम्य कहो समझाये ॥ साहिब अपना नाम बताओ । अपना जानि जीव मुक्ताओ ॥ अबतो यह कला जानि हम पायी । साहिब हमको दरश दिखाई ॥ तुम विनु दया करे को ऐसा । जनम मरनका मेटे संसा ॥ अब मुहि मुर्शिद भेद बताओ । तुम साहिब हम बन्दा आओ ॥
कबीर वचन
कहे कबीर सुनो चित लाये । अमर लोकते हम चलि आये ॥ नाम कबीर हमारा होई । हंस उबारन आये सोई ॥
चौपाई
कहे सहेली ज्ञान अपारा । जो विल धारो तो उत्तरो पारा ॥ तबैं शाह विल अपने जाना । नारीमें अस होय न जाना ॥ यह तो है खुद साहिब मेरा । घरा रूप इन ब्वासिन केरा ॥ तबैं शाह विल माहि विचारा । हम कारन इतना तन धारा ॥ जो यह कहे मानि सो लीजै । जाते काज आपनो कीजै ॥ जो में वचन मानि शिर लेऊँ । चरण कमलमें मस्तक देऊँ ॥ जबैं शाह घट प्रेम समायी । दौय कर जोरि उन विन्ती लायी ॥ धन्य भाग मुहि दर्शन दीना । पतित जीव पावन करि लीना ॥ शाह लगे सतगुरुके चरना । अब मुहि साहिब राखो शरणा ॥ दीन दयाल दया अब कीजे । अपना दर्शन भोकहैं दीजे ॥ नारि रूप तुम लेहु छिपायी । पुरुष रूप धरि शररा दिखायी ॥ इसके आगे जो पुरानो प्रतियों में आयी है सो यहाँ भी वही बात आयी है ।
( ६२ )
मुलतानबोध
जो जिव माने शब्द हमारा । सो जिव उतरे भौजल पारा ॥ तबही शाह भये आधीना । शिर लेह चरण कमल में दीना ॥ चरण परवारि चरणाभृत लीन्हा । प्रेम भाव सतगुरु कहँ चीन्हा ॥
मुलतान वचन
अब कीजे मम साहिब काजा । जाते नहिं छेडे यम राजा ॥ सोई नाम सुहि देहु बतायी । जाते जीव अमर घर पायी ॥
कबीर वचन
कहें कवीर मुक्ति तब पावे । सुरति निरति ले शब्द समावे ॥ उन्मुखनि ध्यान रहो लौ लाई । अजपा जपो सदा दिल भाई ॥ निशि दिन मनुवा अस्थिर राखो । नाम अमीरस रसना चाखो ॥ नाम प्रताप मुक्ति जिव पावे । जनम मरणको दुःख मिटावे ॥ गहौ नाम सत्य लोक सिधावो । तहाँ जाय बहुते सुख पावो ॥ वहि घर हँसा करई आनन्दा । काटे कर्म कालको फन्दा ॥ बहुविधि शोभा रूप अनूपा । षोडश रवि सो हँसको रूपा ॥ किया चहो तुम अपनो काजो ❁ । यम तृण तोरि आरती साजो ॥ सहज चौका करि दीनो पाना । यमका बन्धन हृदय उठाना ॥ अमर अंक जो परवाना पावे । काल कला तजि लोक सिधावे ॥ प्रथम पान परवाना लेई । पीछे सार शब्द तेहि देई ॥ तब सतगुरुने अलख लखाया । करि परतीत परम पद पाया ॥ ऐसी रहनी गहे जो कोई । सत गुरु पद पावे नर सोई ॥ तन मन धनका मोह बिसारे । सो हँसा सत्य लोक सिधारे ॥ सोरठा-शाह किये तन खाक, अपने पिव के कारने ॥ खाक मिली भये पाक, आदमते भये औलिया ॥
• इस आधो चौपाई तक तो पुरानी प्रतिके अनुसार है । इसके प्रथम जो गडबड है वह वहीं टिप्पणियों द्वारा दिखलायी चुका है । अब यहोसे जो गडबड है तो नवीन प्रति की संक्ति पूरी हो जानेपर ऐसी फूटके बिगड़के साथ उसे भी देईगा ।
बोधसागर
(६३)
सुनो धर्मदास सुजान, शाह भये जीवन सुक्त ॥ पद पाये निर्वान, शब्द परखि करनी किये ॥
चौपाई
धरमदास चित अति हर्षाये । प्रभुलीला तुव वरणि न जाये ॥ शाह काज धारे प्रभु रूपा । सखी नाम धर कला अनूपा ॥ अमितकला जीवन सुख दाता । भव बूडत राखे शठ व्राता ॥ अधम उधारण नाम तुम्हारा । बहुत जीव कीने भव पारा ॥ महा नेह तुव चरण लगावा । यश रहो और परम पद पावा ॥ साखी-सत्य कबीर समरथ धनी, दोऊ दीन के ईश ॥
सुयश सुन्यो सुलतान को, धर्मनि नायो शीश ॥
नवीन प्रतियोंमें पुस्तक यहाँ आकर समाप्त होती है किन्तु पुरानी प्रतियोंमें ७३२-२८ पृष्ठके पंक्ति की आधी चौपाई “किया चहो तुम आपनो काजो” के आगे की बाणी उपर्युक्त नवीन प्रतिसे एकदम विरुद्ध नीचे लिखे अनुसार है ।
और नवीन प्रतिसे पुरानी प्रतिके अंतके एक समान न मिलनेका कारण उसे पृष्ठकी टिप्पणीमें दे दिया है । और विशेष वृत्तान्त पुस्तककी समाप्तिमें देंगे ।
चौपाई
किया चाहो तुम आपना काजू । तुम्हारौ राज छोड़िदो आजू ॥ सतगुरु नाम गहो विश्वासा । जाते मिटत कालको त्रासा ॥ यहि सुनि शाह तरुत तब छाडा । प्रकटे ज्ञान हिया गुण बाडा ॥ तब सतगुरुने अलख लखाया । करी प्रतीति परम पद पाया ॥ सांखी-सोलह सै सहेलियाँ, तुरी अठारह लख ।
साई केरे कारणे, छोडा शहरबलख ॥
इति
यह साखी एक स्थान में और दो भाग्यो है ।
( ६४ )
मुलतानबोध
ग्रन्थ विवेचन
इस ग्रन्थकी कई प्रतियाँ मेरे पास उपस्थित हैं जिनमेंसे कोई पुरानी सौ वर्षसे अधिक की लिखी हुई भी हैं किन्तु पुरानी प्रति की अपेक्षा उत्तरोत्तर २ जैसे ३ नवीन पुस्तक लिखी गयी है सबमें कुछ वृद्धि और प्रसंगका उलट फेर और छन्दोभंग का समावेश होता गया है नवीन प्रतियोंके अन्तमें कई पुस्तकोंमें किसी किसी महात्माओंने अपना नाम लिखकर अपने को पुस्तकका कर्ता सिद्ध करना चाहा है । चाहा तो सब कुछ है किन्तु लिखते लिखते दोहा और सोरठा भी शुद्ध नहीं लिख सके हैं । सबसे जो पुरानी प्रति मेरे पास मौजूद है वह नवीन सब प्रतियोंसे अधिक शुद्ध और छोटी है और उसका आरम्भ भी “बलख शहर एक अनूपा” से होता है ठीक उसके उल्टा नवीन प्रतियोंका आरम्भ “धर्मदास उठि विन्ती लाई” से होता है । इसी प्रकारसे पुरानी प्रतियोंकी अपेक्षा नवीन प्रतियों के मध्य मध्यमें अधिक कथाएँ इतनी मिलाई गयी हैं कि, पुस्तक डेवटी हो गयी है । इतनीही नहीं है कि विषय बढ़ाया गया है किन्तु साथ ही साथ थोड़े २ वचन किसीमें एक दोहा किसीमें एक छन्द ( जो सब अशुद्ध हैं ) बढ़ाकर बढ़ाने वाले महाशय ग्रन्थके कर्ता बन गये हैं यद्यपि मैंने इस पुस्तक को सब प्रतियोंके अनुसार ठीक कर दिया है तथापि जहाँ २ विषयों को उलट फेर अथवा घटाव बढ़ाव हुआ है वहाँ टिप्पणी देदी है । इस ग्रन्थकी पुरानी प्रतिमें कबीर पंथकी अन्य ग्रंथों के समान किसी कर्ताका नाम तो है नहीं किन्तु नवीन प्रतियोंमें कई कर्ताओंका नाम, इससे किसी एक कर्ताका नाम निश्चय करनेमें अशक्ति होकर मैंने किसीका नाम
बोधसागर
( ६५ )
नहीं दिया है और यथार्थ में हैही यही बात कि कबीरपंथ की जैसी और पुस्तकोंमें कर्ताका नाम नहीं है किन्तु वह कबीरपंथी पुस्तक कहलाती है और कबीर साहब तथा धर्मदास साहबके सम्बादमें लिखी गयी हैं ॥
इस पुस्तकके अतिरिक्त और भी निर्भयज्ञान आदि अनेक पुस्तकोंमें सुलतान इब्राहीम अह्मके विषयमें बहुत कुछ बात आयी है जिनमें परस्पर बहुतही भेद हैं और कितने विषय ऐसे हैं जो एकमें हैं और दूसरेमें नहीं हैं । इस कारण शाह इब्राहीम अह्म साहेबका वृत्तान्त गद्यमें संक्षेप लिख देता हूँ क्योंकि विस्तारसे लिखनेके लिये एक स्वतंत्र पुस्तक लिखनेका विचार है ।
सुलतान शाह इब्राहीम अह्म साहिबका
संक्षेप चरित्र
उत्पत्ति
इस सुलतान इब्राहीम शाहके पिताका नाम अह्म शाह था । आप संसार त्यागी फकीर थे । अपनी फकीरी और तपस्यामें पूरे थे । वस्तीसे सदा अलग रहते थे । प्रारब्धसे जो कन्द, मूल, फल अथवा नाज मिल जाता था उसी पर अपना समय बिताते थे किन्तु कभी एक स्थानमें जमकर नहीं रहते थे । कभी उनने घर नहीं बांधा । कहा भी है कि,
साखी-बहता पानी निर्मला, बन्धा गन्दा होय ।
साधू जन रमते भले, दाग न लागे कोय ॥
कुछ समय तक तो ऐसेही निःसंग फिरते रहे । फिरते फिरते एक बार बलख शहरमें पहुँचे । ठहरनेके लिये तो शहरसे दूर उन्होंने जंगलमें निश्चय किया किन्तु नित्य शहरमें फिरनेके
नं. ६ कबीरसागर - ३
( ६६ )
मुलतानबोध
लिये जाया करते । एक दिन संयोगसे बलखके बादशाहकी लड़की को देख लिया । अब तो ज्ञान ध्यान सब वैरागभूल गया । उस शाहजादी पर उनका मन ऐसा आसक्त हुआ कि, उसीके विरहमें दिन रात फिरने लगे । अन्तमें उसके मिलनेका कोई उपाय न देखकर स्वयम् उन्होंने बादशाहके पास जाकर अपने विवाहके लिये प्रार्थना की । उनकी प्रार्थना को सुनकर बादशाह तो सन्न हो गया । वह शोचने लगा कि, ऐसे फकीर भीख मांगतेको कन्या देकर उसे दुखसागरमें डुबाना है । बादशाहने ऐसा मनही मन विचार तो किया किन्तु आस्तिक होनेके कारणसे दुर्बैशकी बढ़-दुआ ( शाप ) से डरकर कुछ बोल नहीं सका और उसने दूसरे दिन फिर उन्हें आनेको कहा । उनके चले जानेपर बादशाह और वजीरने परस्पर विचार करके अह्मशाहको टाल देनेका उपाय निश्चय किया और जब नियत समय पर अह्मशाह बादशाहके पास पहुँचे तब वजीरने उनसे कहा कि, शाहजादीने अपने विवाहके लिये यह प्रतिज्ञा की है कि, नमूनेके अनुसार जो कोई दूसरा मोती ले आवेगा उसीके साथ वह ब्याह करेगी । अह्मशाहने वजीरको बहुत कुछ समझाया बुझाया गिडगिढाये रोये कल्पे किन्तु वजीरने एक भी न मानी । अन्तमें वजीरसे शपथ पूर्वक वचन लेकर वह मोतीकी खोज करनेको निकले और दो वर्षतक देश २ नगर २ ग्राम २ भटकते फिर अन्तमें यह सुनकर कि मोती खारे समुद्रमें उत्पन्न होता है खारे समुद्रके किनारे पहुँचे वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने खप्परसे पानी भरकर रेतमें फेंकना आरम्भ किया, इस प्रकारसे पानी फेंकते फेंकते जब उन्हें चालीस दिन बीतगये तब परम दयालु सत्यपुरुषकी आज्ञासे सद्गुरु उनके निकट समुद्रतटपर पहुँचे । वहाँ पहुँचकर सद्गुरुने अह्मशाहसे पूछा कि,