कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बोधसागर
( २९ )
तीन लोक जिव काल सतावै । ब्रह्मा विष्णू पार न पावै ॥ सत् पुरुष तब मोहिं पठावा । जीव उबारन मैं जग आवा ॥ यहि कारण आयो संसारा । जगके जीव मैं करों उबारा ॥ जग जीवनको नाम लखावै । पकड़ हंस सतलोक पठावै ॥ हम हैं सतलोकके बासी । दास कहाय प्रगट भये कासी ॥ ना कोइ वर्ण नहीं कोइ भेशा । सत् पुरुषके थे हम देशा ॥ तहैंकी रचना अद्भुत भाई । सो मैंने तोहि पहिले सुनाइ ॥ और तोहि मैं कहूँ समझाई । धर्मदास सुन चित्त लगाई ॥ धरी देह भवसागर आये । धर्मदास तोहि नाम सुनाये ॥ कलियुगमें काशी चल आये । जब हमरे तुम दर्शन पाये ॥ तब हम नाम कबीर धराये । काल देख तब रह सुरझाये ॥ जो कोइ हमको चीन्हा भाई । जिनका काल धोक मिट जाई ॥ देह नहीं अरु दरसै देही । जग ना चीन्हे पुरुष विदेही ॥ नहीं बाप ना माता जाये । अब गतिहीसे हम चल आये ॥ हते विदेह देह धर आये । जग जीवोंके बन्द छुड़ाये ॥ नाम गहे तेहि लोक पठाये । बिना नाम जिव कालहि खाये ॥ गुप्त रहे नाहीं लख पावा । सो मैं जगमें आन चितावा ॥ चारों जुग भवसागर आये । आदि नाम जग ढेर सुनाये ॥ नाम सुने शरणागत आवें । तिनहीकी हम बंद छुडावें ॥ जीव प्रबोध लोक पहुँचावें । काल निरंजन देख डरावें ॥ चारों जगके चारों नामा । माया रहित रहै तिहि ठामा ॥ सतजुग सत् सुकृत कहलाये । त्रेता नाम सुनींद धराये ॥ द्वापरमें करुनामय कहाये । कलियुग नाम कबीर रखाये ॥ आदि नाम चारों जुग ढेरा । सज्जन जीव सुनतही दौरा ॥ जो जो जीव शरणमें आये । तिनको हमने नाम सुनाये ॥
( ३० )
ज्ञानबोध
आदि नाम जो नित गुन गावैं । कर विश्वास अमर पद पावैं ॥ जो कोइ सतगुरु नामको धावैं । तिनको साहब पार लगावैं ॥ पार हाय जो माया त्यागे । जन्म मरनको संशय भागे ॥ माया त्याग वैरागी होई । अजर अमरको पावैं सोई ॥
धर्मदास वचन
कह धर्मदाम सुनो प्रभु राई । भक्त भाव मोहि देव बताई ॥
कबीर वचन
भक्तोंकी यह कथा पसारा । धर्मदास सुनियो चित्त धारा ॥ जगमें भक्त भये अधिकारी । जोगी सन्यासी लट धारी ॥ शीव गोरख अरु बहु ब्रह्मचारी । मायाने सबको ठग डारी ॥ इनको ठग जब हमपर धाई । गुप्त नाम हम टेरे सुनाई ॥ लोट गइ माया बहुवारी । रहे जीत माया गइ हारी ॥ माया जल है कठिण अपारा । तासे गन सुनि बैठे हारा ॥ माया जाल परो मत भाई । धर्मदास जग कहो गुहराई ॥ भवसागर है भक्त बहुतेरा । जिनको तुमसे कहो निबेरा ॥ मौनी भये मुखहु नहिं बोलें । भेष बनाये घर घर डोलें ॥ अंगहि भस्म गले बिच माला । मठिया बैठ सुने मतवाला ॥ धून रमाय गुरिया सरकावे । गगन चढ़ाय के जग भरमावैं ॥ कान फाड़ शिर जटा बढ़ाये । माथे चन्दन तिलक लगाये ॥ वस्त्र रँगा जोगी बन आये । सतगुरु मिले न भेष बनाये ॥ बहुत करें जप तप रे भाई । आदि नाम कोई नहिं पाई ॥ पाहन सेवैं भक्त कहावैं । चन्दन तेल सिंदूर चढ़ावैं ॥ मानुष जन्म बड़े तप होई । नाम बिना झूठे तन खोई ॥ साधु युक्ति अस चाल बताऊँ । धर्मदास मैं तुम्हैं लखाऊँ ॥ काम क्रोध लोभ अहँकारा । सोई साधु जिन इतने मारा ॥ सूखा फीका करे अहारा । निशिदिन सुमरे नाम हमारा ॥
बोधसागर
( ३१ )
तत्त्व प्रकृति और बल माया । इन्हिं जीत तब साधु कहाया ॥ अन्त कपट सब देय बहाई । क्षमा गङ्गमें बैठ नहाई ॥ हार जीत और अभिमाना । इनसों रहित साधुको ज्ञाना ॥ बिहँसत बदन भजनको आगर । शीतल दया प्रेम सुखसागर ॥ सब षट् कर्म छोड़ अज्ञाना । धर ले केवल निर्गुन ध्याना ॥ धन्य धन्य जग साधु है सोई । जिन अपनी दुरमति सब खोई ॥ ऐसी रहन साधुकी भाई । जब हँसा निरभय पद पाई ॥ यह भक्तोंकी कथा सुनाई । निरभय पद कोइ बिरले पाई ॥ साधू लक्षण तुम्हें सुनाया । गन सुनि काहू भेद न पाया ॥ आदि नामको नित गुनगावो । सोवत जागत ना बिसरावो ॥ सत साहिब है सबसे न्यारा । ताहि जपे होवे भव पारा ॥ भक्त अनेक भये जग माहीं । जोग करै पै युक्ति न पाहीं ॥ जोगहि युक्तिनाम बिन नाहीं । झूठी माया आन लगाहीं ॥ नामहि गहै तेहि निहसंसा । नाम बिना बूझे सब हँसा ॥ नाम निरक्षर सुधि जब पावा । काल अपर्बल निकट न आवा ॥ माया त्याग भजो निज नामा । तब जिव जाय पुरुषके धामा ॥ सबसे कहो पुकार पुकारी । कोइ न माने नर अरु नारी ॥ सत्य पुरुषकी युक्ति न पाई । ऊदय धरे नहिं सत्य को भाई ॥ शिव गोरख सोइ पार न पावे । और जीवकी कौन चलावे ॥ कहें कबीर सुनो मम बानी । जोग युक्ति मैं कहों बखानी ॥ अब गेहीका सुनो विचारा । धर्मदास मैं कहों पुकारा ॥ गेही भक्त करे जो कोई । अब मैं तुमसे भाखों सोई ॥ गेही भक्ति सत्त गुरुकी करई । आदि नाम निज हृदसे धरई ॥ गुरु चरनसे ध्यान लगावै । अन्त कपट गुरुसे ना लागै ॥
( ३२ )
ज्ञानबोध
गुरु सेवामें फल सब आवै । गुरु विमुख नर पार न पावै ॥ गुरु वचन निश्चय कर मानै । पूरे गुरुकी सेवा ठानै ॥ विन विश्वास भक्ति परकाशा । प्रीति विना नहिं दुबिधा नाशा ॥ मीन मांस मद निकट न जाई । अंकुर भक्ष सो सदा कराई ॥ गुरुसे शिष्य करे चतुराई । सेवा हीन नर्कमें जाई ॥ परधन पाहन समझे भाई । झूठ वचन हृदये नहिं लाई ॥ पर तिरिया माता सम मानै । झूठ छोड़ सत्यहिको जाने ॥ जीवपै दया करै रे भाई । बुरे कर्म सब देय बिहाई ॥ हृदये दया प्रीति ना होई । सतगुरु सपने मिले न सोई ॥ नाम नेह गुरु सुतै लगावे । आदि नामको पल पल ध्यावे ॥ लेवै पान सुक्ति सहदानी । जाते काल न रोकै आनी ॥
सारखी-पुरुष नाम निशिदिन गहो, शब्द करो परतीत ।
अंक नाम निज पाइया, जाहो भवजल जीत ॥
सोरठा
भर्म तजे यम जाल, सत्तनाम लौ लावई ।
चले संतकी चाल, परमार्थ चित दे गहे ॥
चौपाई
गेही भक्त आरती आने । प्रति पूनोकी आरति ठाने ॥ अमावस आरती नहिं होई । ताहि भवन रह काल समोई ॥ पाख दिवस नहिं होवे साजू । प्रति पूनो कर आरति काजू ॥ पूनो पान लीन्ह धर्मदासा । पावे शिष्य होट सुखबासा ॥ छटे मास नहिं आरति भेवा । साल माह गुरु चौका सेवा ॥ नाम कबीर जपै लौलाई । तुम्हरा नाम कहे गुहराई ॥ ऐसी रहनि गेहि जो धरि है । गुरु प्रताप दोई निस्तरि है ॥
बोधसागर
( ३३ )
साखी-सो भव पार उतारि है, केवटसे कर प्रीत । जब सतगुरु केवट मिले, जैहै भव जल जीत ॥ सोरठा-काल जीव धर खाय, सत्तनाम जाने विना । बचि है एक उपाय, सत्त कबीर कह भव तरे ॥
चौपाई
सत्त कबीर गुरु धर्मदासा । जीव पठै है पुरुष के पास ॥ सत्त गुरु सत्त कबीरहि आहीं । गुप्त रहे जग चीन्हत नाहीं ॥ सतगुरु आप जगत पग धारे । दासा तन धर शब्द पुकारे ॥ काल निरंजन सब पर छाया । आदि नामका चिह्न भिटया ॥ धर अवतार असुर संहारा । जिव जाने यह धनी हमारा ॥ एही धोख नर्क सब जाहीं । जिव अचेत छल चीन्है नाहीं ॥ नर्क बास नहिं छूटै भाई । जो सतगुरु को चीन्है नाहीं ॥ ब्रह्मा विष्णु शिवसे नहिं देवा । जिन्ह बैकुण्ठवास नहिं देवा ॥ ऐसा काल अपरबल भाई । जिहिके छल जग चीन्है नाई ॥ जगमें जीव घात बहुतेरे । करे घात अरु पाप घनेरे ॥ दुष्ट अन्याई करजिवकी घाता । खेल शिकार माने मन माता ॥ जीव मार तन करत अहारा । जीव दया नहिं करत गँवारा ॥ जीवघाती खो बहुत दुख पावे । जन्मजन्म तिथिकाल सतावे ॥ काग देह धर विष्टा खाहीं । जन्म अनेक भ्रमे जगमाहीं ॥ जीव दया विन मुक्ति न पावैं । मीन मांस मद राक्षस खावैं ॥ धर्मदास यह जग बौराई । दुष्ट जीवकी कथा सुनाई ॥ जीव कष्ट मोहिं सहा न जाई । ज्ञान हीन नर जीव सताई ॥ यहि कारण हम जगमें आये । तीन लोक जम लूटत पाये ॥ पहले लूटे विष्णु सुरारी । फिर लूटे शंकर लटधारी ॥
( ३४ )
ज्ञानबोध
गनमुनि लूटे तपसी झारी । अरु लूटे सगले संसारी ॥ चन्द्र सूर्य तारागण सोई । कहै कबीर बचा नहिं कोई ॥ देखो यही काल की रीती । धर्म न परखो रीति अनीती ॥ ऐसा काल कठिन बरियारा । बचे सोह जो नाम पुकारा ॥ काल रीति मैं तोहिं सुनाई । धर्मदास जिव बोधा जाई ॥
साखी-कहे कबीर धर्मदास सों, तुम सुनियो चितलाय ।
काल भेद ना जानहीं मूरख रहै झुलाय ॥
सोरठा-तजो काल बरयार, जीव दया चितमें करो ।
उतरो भव जल पार, आदि नाम हृदय गहो ॥
सुनो संत मति धीर, कहो ज्ञान परखो हिये ।
काल अपरबल बीर, हृदये विवेकं दृढ ॥
चौपाई
आदि नाम है अजर शरीरा । तनमनसे गह सत्त कबीरा ॥
जोई गहे धर्मदास कबीरा । सो पावे सुख सागर तीरा ॥
काया बीर नाम है धीरू । सब घट रहे सभायक बीरू ॥
निजही शब्द कबीर है सारा । जाका है निज सकल पसारा ॥
एकै रूप शब्द पुर एका । एक भाव दुतिया नहिं देखा ॥
कैसे दुतिया कहिये सोई । दुतिया भर्म मिटै सब कोई ॥
एकहि हम तुम एक शरीरा । एक शब्द है मतिके धीरा ॥
दूसर भाव नहीं है आसा । सोई कबीर सोई धर्मदासा ॥
एक रूप एकै अनुहारी । एकहि पुरुष सकल विस्तारी ॥
आदि नाम मैं भाख सुनाओ । नाम गहे जब मुक्ती पाओ ॥
जो कोइ आदि नामको चीन्हा । तासो काल भयो बलहीना ॥
साखी-आदि नाम है मुक्तिका, जप जाने जो कोय ।
कोटि जाप संसारमें, तासे मुक्ति न होय ॥
बोधसागर
( ३५ )
सोरठा-बूझ लेहु हो हंस, आदि नाम निज सार है । अमर होय ते वंश, जिन जानो निज नामको ॥ और मन्त्र सब छार, आदि नाम निज मंत्र है । बूढ़ मरा संसार, कह कबीर निजनाम विन ॥
चौपाई
कहे कबीर सुनो धर्मदासु । चार गुरुकी कथा प्रकासु ॥ चार गुरु संसारहि कीन्हों । जिनके हा जिवमुक्ती दीन्हों ॥ वे हंसन को लोक पठाये । भवसागर जिव बहुरि न आये ॥ सार शब्द साहब का न्यारा । सोई शब्द कहैं गुरु उचारा ॥ सार शब्द काल नहिं पाईं । तीन देवकी कौन चलाई ॥ शब्द सङ्ग हंसा घर जाईं । काल अपरबल देख डराईं ॥ सार शब्द मैं तुमको दीन्हा । काल तुम्हारे रहे अधीना ॥ धर्मदास तुम मतिके धीरा । तुमको दीन्हा मुक्तिका वीरा ॥ तुमते जीव उतारि है पारा । सौंप दीन्ह तोहि जगको भारा ॥ सतजुग शिष्यसहतेजी कहाये । द्वापर चतुर्भुज नाम सुनाये ॥ त्रेता शिष्य बंकेजी भाई । कलियुगमें धर्मदास गुसाई ॥ चार गुरु भवसागर माहीं । धर्मदास वे जिव मुक्ताहीं ॥ यह मैं तुमसे कहां समझाईं । सब संशय तुम्हरे भिट जाईं ॥ वंस ब्यालिस तुम्हारे सारा । और सकल सब झूठ पसारा ॥ इनहीं सौंप देव जिव भारा । सब जीवनको करे उबारा ॥ धर्मदास तुम पुरुषके अंशा । अब हमको कछु नाहीं संशा ॥ होय पंथ भव सागर सारा । तुम्हरे वंश सब जीव उबारा ॥ ब्यालिस वंशराजलिख दीन्हों । अटल राज भवसागर कीन्हों ॥ धर्मदास मैं कहां बिचारी । यहि विधि निबहै सब संसारी ॥
साखी-नाम भेद जो जानहीं, सोई वंश हमार ।
नातर दुनिया बहुत है, बूढ़ मरा संसार ॥
( ३६ )
ज्ञानबोध
सोरठा-जैसे भव जल जीत, सार शब्द जो जानहीं । कठिन काल विपरीत, नातो जम ले जायगा ॥
धर्मदास वचन
चौपाई
धर्मदास तब विन्ती लाई । अब मैं पंथ करो गुन गाई ॥ अमरलोकके हो गुरु वासी । कारन कौन आये अविनाशी ॥ मृत्युलोक आये कैहि काजा । धर्मराय पापी बड़ राजा ॥
साहब कबीरका वचन
धर्मदाम तुम सुनियो भाई । जीवन काज पुरुष पठवाई ॥ सक्त पुरुष सतलोकके बासी । सकल हंसके लिये अविनाशी ॥ पुरुषदरश कोइ बहुरि न पावै । तीन लोकमें आन रहावै ॥ तीन लोक सब परले होई । अमरलोक सुखदायक सोई ॥ जीवकाज जगमें हम आये । धर्मरायसे जीव छुड़ाये ॥ आदि अनाम अमोल अपारा । अकह अगोचर सबसे न्यारा ॥ तहाँसे हम आये संसारा । पहुँचे काशी नगर मैझारा ॥ सत्त सत्त हम करें पुकारा । भवसागरके जीव उबारा ॥ नाम सुने जो मो लग धाये । जिनको हमने पार लगाये ॥ समझे सुने जो वाचा मेरी । काटूँ ताकी कर्मकी बेरी ॥ भगकी राह नहीं हम आये । जन्म मरन ना बहुरि समाये ॥ त्रिगुण पांच ताव हम नाही । इच्छारूप देह हम आहीं ॥ साखी-पांच तत्त्व गुन तीन नहीं, तामें सकल शरीर ।
सब कोइ हृदये चीन्हियो, सतगुरु पुरुष कबीर ॥
चौपाई
हम जमके शिर मर्दन द्वारा । जो कोइ गहे सो उतरे पारा ॥ जहाँ हम रहें काल तहाँ नाही । हंसन हम सुखदायक आहीं ॥
बोधसागर
( ३७ )
जो साहब सतलोक रहाई । तिनको सब कोई चीन्हौ भाई॥ नाम बिना दुखि तीनों देवा । जिनकी गन गंधर्व करें सेवा ॥ जगके देव सब काल अधीना । बचे सोई जो नामको चीन्हा ॥ हम बल एक शब्दका भाई । ताही बल हंसा सुत्काई ॥ जहाँ नाम काल गति नाही । बिना नाम है कालकी छाई ॥ ज्ञान हीन जाने नहीं भाई । जीव कै सँग मन काल रहाई ॥ जीव के संग कालको वासा । अज्ञानी जन गहे विश्वासा ॥ मनको कहो न कीजे कोई । मन जिवको भरमावे सोई ॥ कहे कबीर मन जात गँवारी । मनको कहो न करो नर नारी ॥ मनको कहो जो कर है भाई । भवसागरमें देय बहाई ॥ मन चंचल सो काल है भाई । मनको त्यागे निरमल हो जाई ॥ मनके रूप समानी माया । सब संसार व्याप्त यह छाया ॥ मन थिरकर परमात्म जाना । यहि विधितत्त्वलेय पहिचाना ॥ काल जाल ते तेही छूटे । काल विचारा ताहि न लूटे ॥ यही भेद धर्म सुन लीजे । शब्द माहि तुम बासा कीजे ॥ काल ज्ञान संसार बखाना । काल स्वरूप नहीं पहिचाना ॥ काल चरित्र तुमसे कहो भाई । यही भेद कोई नहीं पाई ॥ काया माया झूठी जानो । झूठा सकल पसारा मानो ॥ झूठो नाम साहबको नाही । बूझ लेव अपने हिय माहीं ॥ साखी-काल पाय जग ऊपजो, काल पाय सब धाय । कालपाय सब विनसही, काल काल कह खाय ॥ सोरठा-धर्मदास लेव जान, मुन्य सुरूपी मनहि है । वचन कबीर प्रमान, रूप रेख मनको नहीं ॥
चौपाई
परम पुरुष नाम गहो भाई । ताते हंसा लोक सिधाई ॥ आदि नाम है जिव रखवारा । उनको सब कोई करो पुकारा ॥
( ३८ )
ज्ञानबोध
अमर लोक साहबका न्यारा । जहाँ पुरुष का है दरबारा ॥ आदि पुरुष जहाँ आप अकेला । धर्मराय नहि मन के मेला ॥ अंधकार जहाँ कबहुँ न होई । सदा जोति अमरापुर सोई ॥ आदि पुरुष जहाँ काल न जाई । तीन देव की कौन चलाई ॥ आदि नाम जो ध्यान लगाई । तब हँसा सत लोकहि पाई ॥ ऐसा लोक साहबका भाई । जहाँ हँसा सुख सदा रहाई ॥ तादि लोकमें जो कोइ जावे । भवसागरमें बहुरि न आवे ॥ धर्म राय से तिन का टूटे । जन्म मरण को संशय छूटे ॥ बिरले जीव निःसंशय होई । दृढ़ परतीत नाम गहँ सोई ॥ अगम भेद मैं तुम्हें बताया । काल निरञ्जन गम्य न पाया ॥ जगके जीव प्रबोधो भाई । पुरुष शरण जब हँसा जाई ॥ जीवहि बोधो सब संसारा । पकड़ हँस फँको पैले पारा ॥ भवसागरसे जीव उबारो । जन्म मरण जिव संशय टारो ॥ जीव मुक्त मैं तुमको दीन्हा । पुरुष भक्ति है नामको चीन्हा ॥ सार युक्ति मैं तुमसे कहिया । कहन सुननको अब नहिं रहिया ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास विनवे कर जोरी । सतगुरु सुनिये विनती मोरी ॥ निरगुन नाम लखे नहिं कोई । सरगुनमें जग भरमें सोई ॥ अज्ञानी जिव कहा न माने । आदि नामको भेद न जाने ॥ यह सब भेद कहो प्रभुराई । कैसे जीव प्रबोधों जाई ॥
साहिव कबीर वचन-चौपाई
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । अब मैं भेद कहाँ तुम पासा ॥ सज्जन जन जो होवे भाई । तुम्हरे शरन दौरके आई ॥ तन मन तुमसे ध्यान लगाई । ताको नाम सुनइयो भाई ॥ जब देखहु तुम दृढ़ता ज्ञाना । तबही देव पान परवाना ॥
बोधसागर
( ३९ )
निरभय ज्ञान कहो जिवपासा । जो कोह होय तुम्हारा दासा ॥ मूरखके तुम पास न जइयो । बचन हमारो हियमें गहियो ॥ मूरख ज्ञान कहो मत भाई । नाहक ज्ञान गांठको जाई ॥ डुरमति मन जाही कर भाई । तासे राखो भेद छिपाई ॥ ज्ञानी जनको नाम सुनावो । परम पुरुषसों हृदय चिन्हाओ ॥ साखी-मूरखसे ना खोलिहौ कहैं कबीर विचार । ज्ञानीसे न डुरायहौ, सुनो सत् मतसार ॥
चौपाई
अलख नाम घट भीतर देखो । हृदये माहीं करो विवेको ॥ घट घट राम बसे हैं भाई । विना ज्ञान नहिं देत दिखाई ॥ अतुभव ज्ञान प्रगट जब होई । आतमराम चीन्ह है सोई ॥ आतमराम चीन्ह जब पावा । सकल पसारा मेट बहावा ॥ हिये नयनसे देखो भाई । जब तुमको वह राम दिखाई ॥ सब घट व्यापक सबसे न्यारा । सोई राम है जीव मँझारा ॥ अकह नाम कहा नहिं जाई । घट घट व्याप्त निरंतर आई ॥ आतमराम देख जिव पाई । आप आप सब ठांव समाई ॥ जहाँ देखा तहाँ आप समाना । ब्रह्म छोड़ दूसर नहिं आना ॥ यही मता हम तुमकह दीन्हा । दूसर कोउ न पावै चीन्हा ॥ ऐसा ज्ञान लखाओ भाई । जो नहिं मानकाल तिहिं खाई ॥
साखी-अजर पुरुष एकै रहै, अजर लोक अस्थान ।
कहे कबीर सर्वांग जो, ताहि पुरुषको जान ॥
सोरठा-सुनहु ज्ञानी धर्मदास, सोइ ज्ञान जप ऊपजै ।
एक नाम विश्वास, प्रगट ब्रह्म स्वरूप है ॥
चौपाई
आदि नाम जो राखे आसा । तापै परे न कालकी फाँसा ॥ आदि नाम निरअक्षर भाई । ताहि नाम ले लोकहि जाई ॥
( ४० )
ज्ञानबोध
सोहँ शब्द निरक्षर वासा । ताहि शब्द जपहै निज दासा ॥ आदि नाम निज सार है भाई । जमराजा तेहि निकट न आई ॥ तुम कहँ शब्द दीन्ह टकसारा । सो हंसन सो कहौ पुकारा ॥ सार शब्दका सुमरण करि है । सहज अमर लोक निस्तारि है ॥ सुमरन का बल ऐसा होई । कर्म काट सब पलमें खोई ॥ जाके कर्म काट सब डारा । दिव्य ज्ञान सहजै उजियारा ॥ जाकहँ दिव्य ज्ञान परकाशा । आपहिमें सब लोग निवासा ॥ लोक अलोक शब्द है भाई । जिन जाना तिन संशय जाई ॥ तत्व सार सुमरन है भाई । जातै कालकी तपन बुझाई ॥ सुमरनते सब कर्म विनाशा । सुमरनसों दिव्य ज्ञान प्रकाशा ॥ धर्मन सुमरन दयो लखाई । जासों हंस सबै मुक्ताई ॥
सारखी-कहे कबीर विचारके, सुमरन सार बखान ।
कहै भेद जो पावहीं, पहुँचे लोक ठिकान ॥
धर्मदास-वचन चौपाई
कहँ धर्मदास सुनों प्रभुराई । अब जिवको सन्देह मिटाई ॥ अलख अगोचर हो प्रभु मेरा । अब जीवन को करें उबेरा ॥ आदि ब्रह्म तुम अगम अपारा । जीव काज आये करतारा ॥ आदि नाम गुरु मोहिँ लखाये । जीवनके तुम बंद छुड़ाये ॥ अजर लोकमें जिव पहुँचाये । धन्य भाग हम दर्शन पाये ॥ अमर वस्तु सतगुरु मोहिँ दीन्ह। जीवनके सब दुखहर लीन्ह ॥ सतगुरु चरण गहँ हिय माहीं । भानु उदय पंकज बिगसाहीं ॥ सतगुरुने मोहिँ लीन्ह जगाई । आवागमन रहित घर पाई ॥ अब सन्देह रहा कछु नाहीं । शब्द तुम्हार बसो हियमाहीं ॥
सोरठा-दीन्हों मोहिँ लखाय, परमात्म आत्म सकल ।
अलख नाम समुझाय, अमर वस्तु गुरु दीन्हऊ ॥
बोधसागर
( ४१ )
साहब कबीर बचन-चौपाई
ज्ञान उपदेश कहा मैं भाई । ताते जीव हिय ज्ञान समाई ॥ यही ग्रंथ मैं नाम नियारा । सूक्ष्म रीति से कहो पुकारा ॥ आदि नाम जाने संसारा । करे भक्ति पहुँचे दरबारा ॥ पढ़े सन्त होवै मति धीरा । आदि नाम गहै अन्न शरीरा ॥ आदि नाम है सत् कबीरा । जो जन गहे छूटे भव पीरा ॥ आदि नाम पहिचाने भाई । तब हंसा निज घरही जाई ॥ ज्ञान उपदेश कहा गुरु पूरा । नाम गहे चेला कोई सूरा ॥ साधु सन्तसों बिनती मोरी । नाम भूले अक्षर लीजो जोरी ॥
इति श्रीग्रन्थज्ञानबोध समाप्त
भवतारणबोध (चतुर्दश तरंग)
सत्यपुरुषाय नमः
अथ श्रीबोधसागरे
चतुर्दशस्तरंगः
ग्रन्थ भवतारणबोध
★
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास बिनवै कर जोरी । सद्गुरु सुनिये विनती मोरी ॥ भवसागर कवनहिं विधि छूटे । यमबंधन कवनहिं विधि टूटे ॥ भव दरियाका वार न पारा । ता मई अँटके सब संसारा ॥ सो दरियाव कौन विधि थाहूँ । परम पुरुषको कैसे पाहूँ ॥ करों भक्तिके योग कमावों । देओं दानके तीर्थ नहावों ॥ करों यज्ञ के इन्द्री साधों । बाहर फिरों के मतको बांधों ॥ जो तुम कहो मैं करिहों । वचन तुम्हारे हृदये धरिहों ॥ भवसागर दुख मेटो मोरा । दूटै जन्म मरनको ठौरा ॥ संशय रहित करहु मोहिं स्वामी । तुम सब घटके अन्तर्यामी ॥
सद्गुरु वचन
सुन धर्मदास मैं सत्य बताऊँ । भवसागरका भरम मिटाऊँ ॥ संशय रहित सदा तुम होऊँ । तुम्हरी राह न रोकै कोऊ ॥ करो भक्ति औ बंधन काटो । जन्म मरणका संशय पाटो ॥ भाव भक्ति करिये चित लाई । सेवहु साधु तजि मान बढ़ाई ॥ सुन धर्मदास भक्तिपद ऊचा । इन सीढ़ी कोई नहिं पहुँचा ॥ योगी योगसाधना करई । भवसागरते नाहीं तरई ॥ दान देय सोई फल पावे । भवसागर भुक्तनको आवे ॥ तीर्थ नहाये जो कछु होहीं । सो सब भाषा सुनाऊँ तोहीं ॥
बोधसागर
( ४३ )
जन्म लेय उज्ज्वल तन पावे । सम्पति है जगमें पुनि आवे ॥ ऊंचे घरसे ले अवतारा । ब्राह्मण क्षत्रीको व्यवहारा ॥ इन्द्री साधन है यह नीका । विना भक्ति जानों सब फीका ॥ इन्द्री साधन है तप भारी । तामस तेज क्रोध हंकारी ॥ क्रोध किये गति सुक्ति न पावे । भक्ति महात्महाथ नहिं आवे ॥ बरत एक भक्तिका पूरा । और बरत कीजै सब दूरा ॥ और बरत सब यम की फांसी । भक्ति बरत मिलही अविनासी ॥ हर अवराधन की सुनु बाता । कहा भेद सुनिये तुम ज्ञाता ॥ हरि हर नाम सदा शिव केरा । तासों दूर होत भव फेरा ॥ बहुत प्रीतिसों शिवको ध्यावे । रिधि सिद्धि द्रव्य बहुत सुख पावे ॥ मन जिसके निश्चय कर धरहीं । गिरि कैलासमें वासा करहीं ॥ फिरके काल झपेटे बाहीं । डार देय भवसागर माहीं ॥ ताते संशय छूटे नाहीं । भवसागरमें जीव जो जाहीं ॥ शिवकी साधन है यह गती । निर्भय पद पावे नहिं रती ॥ जाके सुमिरे योगी यती । चौरासी भरमें उत्पती ॥ हरि हरकी यह कथा सुनाई । आगे और सुनाऊ भाई ॥
सारखी-शिवसाधनकी यह गती, शिव हैं भवके रूप ।
विन समझे ये जगत सब, परे महा भ्रम रूप ॥
नरक वासमें मनु परे, ऐसी शिवकी मौज ।
कहे कबीर विचारिके, मिटे न यमकी फौज ॥
चौपाई
हरि हरि नाम विष्णुका होई । विष्णु विष्णु भाषे सब कोई ॥ विष्णुहिं को कर्ता बतलावे । कहो जीव कैसे फल पावे ॥ सब घट माहीं विष्णु विराजे । खान पानमें विष्णुहि गाजे ॥ सकल भोग विष्णु जो लेही । भोग करे जग भरमें देही ॥
( ४४ )
भवतारणबोध
हरि हरि नाम विष्णुका भाषा । शुभ और अशुभ कर्म दोहराया ॥ इनमें करें कलोल सदाई । करें भोग जीवन भरमाई ॥ बहुत प्रीतिसो विष्णुहि ध्यावे । सो जिव विष्णुपुरीको जावे ॥ विष्णु पुरीमें निर्भय नाहीं । फिरके डार देय भूमाहीं ॥ हरि हरि नाम विष्णुका भाषा । हरिकी और सुनो अब साखा ॥ साखी-हरि नाम है विष्णुका, जिन कीन्हा सब जेर । चौरासी भरमे सदा, मिटै न भवका फेर ॥
चौपाई
सुनहु धर्मदास तुम हो साधू । इनको कबहुँ मत अवराधू ॥ हरि हर ब्रह्मा को है नाऊँ । रज गुण व्यापक है सब ठाऊँ ॥ जगत् कहै ब्रह्मा है करता । मर्म माहिँ सब बह बह मरता ॥ ब्राह्मण को पूजे ससारा । जीव होय नहि भवते न्यारा ॥ पढ़ पढ़ विद्या जग भर्मावे । भक्ति पदार्थ कैसे पावे ॥ पोथी पाठ पढ़ै दिनराती । ये केवल भ्रमके उत्पाती ॥ आप भरम ते निर्भय नाहीं । बहे जात हैं भ्रमके माहीं ॥ औरनको शिक्षा सब देही । ताते मिलै न परम सनेही ॥ पाप पुण्य का लेखा करही । विना भक्ति चौरासी परही ॥ यह ब्राह्मणकी यह करतूती । ब्राह्मण पूजे होय न सुक्ती ॥
साखी-त्रिगुण भक्ति है जगकी, निर्गुण लखै न कोय ।
सर्गुण निर्गुण दोह मिटै, भक्ति रहित घर होय ॥
इह त्रिगुणहि कि भक्तिमें, जिन भूलो धर्मदास ।
ऊपर निर्गुण जानिये, जहाँ योगीका बास ॥
चौपाई
धर्मदास सुनसन्त सुजाना । नर्गुण सों अब करो बखाना ॥ निर्गुण नाम निरंजन भाई । जिन सारी उत्पत्ति बनाई ॥
बोधसागर
( ३६ )
निर्गुण सों जु भया ओंकारा । तासों तीनों गुण विस्तारा ॥ निर्गुण सो मन भये प्रचण्डा । ताको बास सकल ब्रह्मण्डा ॥ ओङ्कार मन आप निरञ्जन । नाना विधिके कीये व्यञ्जन ॥ भौंति भौंतिके घाट सवारा । कहैलंग गिनों वार नहि पारा ॥ ताके अंश सकल अवतारा । राम कृष्ण तामैं सरदारा ॥ पूरण आप निरञ्जन होई । इनके फेर फार नहि कोई ॥ सर्गुण निर्गुणहुकी करे सेवा । भक्ति करे अरु पूजे देवा ॥ कर आचार विचार न जाने । सो मेरे मन कभी न माने ॥ मन बोधे मन माहि समावे । निज पदको कोई नहि पावे ॥ मन को बोध करे जो कोई । मन पहुँचावे पहुँचै सोई ॥ जाप निरञ्जन माहि समाई । आगे गम्य न काहू पाई ॥ ऐसे तीन लोक सब अटके । खरे सयाने ते सब भटके ॥ ऋषिसुनि गणगन्धर्व रु देवा । सब मिल करें निरञ्जन सेवा ॥ साधक सिद्ध साधु जो भयेऊ । इनके आगे कोई न गयेऊ ॥ बहुत प्रीति सो भक्ति विचारी । मिलन २ लीला अधिकारी ॥ जाय निरञ्जन सो हो भेटा । काल रूप धर करै समेटा ॥ वही निरञ्जन का विस्तारा । तामैं उरझो सब संसारा ॥ जिधर तिधर राखै बिलमाई । रचना अनन्त अपार बनाई ॥ धर्मदास तुम भक्ति सनेही । इन मैं मत अटकावे देही ॥ जन्म धरे छूटै नहि भाई । ताते आप कहो गुहराई ॥ भक्ति गुप्त जाने नहि कोई । तुर्त सनेही पावै सोई ॥ साखी-इन्ते भक्ती गुप्त है, सुन धर्मदास सुजान । भक्ति करो भरमो नहीं, सोई भक्ति प्रमाण ॥
धर्मदास-वचन चौपाई
हे स्वामी मैं हूँ अज्ञानी । गुप्त भक्ति मोहिं कहो बखानी ॥ तुम यह भक्ति कहाँ सों आनी । सोई बात मोहिं कहो बखानी ॥
( ४६ )
भवतारणबोध
तुम्हारी भक्ति कौन विधि पावे । कौन भांति की भक्ति कहावे ॥ भक्ति कहींजे कौन प्रकारा । ताको स्वामी कहो विचारा ॥ भक्ति २ सब जगत बखाने । भक्ति भेद कैसी विधि जाने ॥ सो निश्चय मोहिं कहो बखानी । केहि विधि छूटै भवकी बानी ॥ जाते सब संशय मिट जाई । तातें आप देहु समझाई ।
साखी-भव वाणीभ्रम दुख बढ़ै सुख कर सत गुरु देव ।
भक्ति करो निष्कपट होय, सदा तुम्हारी सेव ॥
कबीर-वचन चौपाई
कहैं कबीर सुनो मम बानी । भक्ति सार मैं कहौं बखानी ॥ आगे भक्त भये बहु भाई । करी भक्ति पै युक्ति न पाई ॥ आदि भक्ति शिव योगीं केरी । राखी गुप्त न जग में फेरी ॥ योग करे औ भक्ति कमावै । अधर एक नामै ध्वनि लावै ॥ सौ अक्षर है रंकारा । तासों उपजे सकल पसारा ॥ रहे अधर ब्रह्मांड के माहीं । शिव जानतको जानत नाही ॥ तासन मेरी भक्ति नियारी । जाको क्या जाने संसारी ॥ ताको योगेश्वर नहीं पावे । और जीवकी कौन चलावे ॥ शिवसों अधिक न कोऊ जाने । ऐसी भांति छान बिलछाने ॥ सोउ जीव आगे नहीं आवे । तीन लोक प्रभुता उठ जावे ॥ ठौर हमारो कैसे पावे । वहाँ गये बहुरिहु नहीं आवे ॥ धर्मदास कहु वर्णन अपना । ब्रह्म पुत्र सेवे तिहिं चरना ॥ सनक सनन्दन सनत्कुमारा । सनकादिकसे चारों अवतारा ॥ पांच वर्ष काया नित रहई । ब्रह्म लीन कोह पार न लरई ॥ केते ब्रह्म होय होय गयऊ । सनकादिकसे निश्चय भयऊ ॥ ध्यान जु करे निरञ्जन माहीं । निरञ्जनसों न्यारा कोउ नाही ॥ निरञ्जन अंश हंस अवतारा । सकल मृष्टि है ताहि मँझारा ॥
बोधसागर
( ३७ )
यहाँ ताहि कोई बिरला जाने । आगे कहो कौन विधि माने ॥ इनकी भक्ति करे नर सोई । हमरी भक्ति न जानत कोई ॥ भक्त अनेक भये जग माहीं । निर्भय घर को पावत नाहीं ॥ भक्ति करै तब भक्त कहावे । भगते रहित न कोई पावे ॥ भग भुगते फिर फिर भग आवे । भगते बचपन कोई पावे ॥ चौदह लोक बसै भगमाहीं । भगते न्यारा कोई नाहीं ॥ न्यारी युक्ति मैं तुमहिं दिखाई । तहाँ सुतं रहै साध कहाई ॥ भुगते भग औ भक्त कहावे । फिर फिर योनी संकट आवे ॥ मेरी भक्ति युक्ती जाना । ताका आवागमन नशाना ॥ भक्ति करै तब सुत्तिको होई । नहिं तो बाना जाय विगोई ॥ भक्ति भेद बहुतक है भाई । निर्मल भक्ति न काहूँ पाई ॥ तुम जो बूझो भक्ति प्रकारा । ताका भेद सुनो अब न्यारा ॥ भक्ति होय नहिं नाचे गाये । भक्ति होय नहिं घंट बजाये ॥ भक्ति होय नहिं मूरत पूजा । पाहन सेवे क्या तोहि सूझा ॥ विमल विमल गावें अरु रोवें । क्षण एक परम जन्म को खोवें ॥ ऐसा साहिब मानत नाहीं । ये सब काल रूप के छाहीं ॥ मन ही गावे मन ही रोवे । मन ही जागे मन ही सोवे ॥ जब लग भीतर लग्न न लागे । तब लग सुतं न कबहुँ जागे ॥ सत्य नाम की खबर न पाई । कां कर भक्ति करौं रे भाई ॥ ठौर ठिकाना जानत नाहीं । झूठे मग्न रहैं मन माहीं ॥ कहन सुनन कां भक्त कहावें । भक्ति भेद कितहुँ नहिं पावें ॥ लग्न प्रेम बिन भक्ति न होई । सङ्गति को पावे नहिं कोई ॥ अपने साहिबको नहिं जाना । बिन देखे किहि कियो बखाना ॥ ऐसे भूल परे संसारा । कैसे उतरे भव जल पारा ॥ सत्य भक्तिको नाहीं लागा । ऐसे हैं सब जीव अभागा ॥
( ४८ )
भवतारणबोध
धर्मदास तुम हो बुद्धिवन्ता । भक्ति करो पावो सतसन्ता ॥ एक पुरुष हैं अगम अपारा । सब घट व्यापक सबसों न्यारा ॥ ताको नहीं जाने संसारा । ताकी भक्ति महानिजसारा ॥ भक्ति करे जब उतरे पारा । सुर्त नृत्य कर सेवे सारा ॥ यह विधि भक्तिपदारथ पावे । मुक्ति होय भव बहुरि न आवे ॥ भवसागर ते उतरे पारा । फिरके जग नहीं ले अवतारा ॥ ऐसी भक्ति मुक्ति की दाता । जाकी गति नहीं लखै विधाता ॥ भक्तिही भक्ति भेद बहु भारी । यही भक्ति जगत ते न्यारी ॥ साखी-भक्तिपदारथ अगम फल, मुक्ति चार यहि बार । पावे पूरण पुरुष को, जग नहीं ले अवतार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कहै सुनो गुसाई । पूरण पुरुष बसे किहि ठाई ॥ केहि विधि सों सेवा कीजे । कैसे चरणकमल चितदीजे ॥ कौन भांति साधों सो भक्ती । सदगुरु मोहिं बताओ युक्ती ॥
सदगुरु वचन
पहिले प्रेम अङ्ग मैं आवे । साधु देख सन्मुख होय धावे ॥ चरण धोय चरणामृत लेवे । प्रीति सहित साधूको सेवे ॥ अन्तर छांड़ि करो सेवकाई । यहि विधि भवके दुःख मिटाई ॥ जोह साधु प्रेम गति जाने । ता साधूकी सेवा ठाने ॥ परम पुरुषकी भक्ति दृढावे । सुतैं नृप कर तहैं पहुँचावे ॥ तासों प्रीति करो चितलाई । छांड़ो दुर्मति औ चतुराई ॥ तबही परम पुरुषको पाये । भव तरके जग बहुरि न आवे ॥ भवतारन संशय नहीं तोही । दो क्षण होय तो लागे मोही ॥ कीतहु बातकी फिकर न करना । कही भक्त निश्चय कर तरना ॥