भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

१२

प्रस्तावना ।

बड़ा भारी आन्दोलन मच गया, साधारण कवीरपंथी तो ग्रन्थोंको पाकर आनन्द मग्न होने लगे और स्वार्थी जो ग्रन्थोंको सेवक सतियोंको दिखाना भी पाप सम्भ्रान्त थे, बड़े घबराये, मुझपर उनको इतना क्रोध हुआ कि, मुझे पहले तो अदालत तक घसीटा और वहाँ जब कुछ वश नहीं चला तब, पंथी उग्रनाम साहबको सम्झना बुझाकर, मुझे ग्रन्थोंके छपानेसे रोकनेके हेतु, दामाखेड़ा बुलवा लिया, और देखा वे के लिये प्रेस भी लिया गया और प्रथम मेरे देख रेखमें रखा गया । जब मैंने ग्रन्थों के छपानेकी बात चलाई तब बड़े बड़े प्रपंचों द्वारा ग्रन्थ छपायी की बात तो क्या प्रेससेही सम्बन्ध छोड़ना पड़ा। यद्यपि प्रेसमें ग्रन्थ छपानेकेही लोभसे मैंने अपनी गांठके भी बहुत रुपये प्रेसमें लगादिया था तथापि महान अन्त्यायसे सब गबन कर लिया गया । बदलेमें दीवान हंस दास द्वारा मेरी झूठी निन्दा और बदनामी का खूब प्रचार किया गया । दीवान हंस दासकी कारवाई पूर्वके संत महंतोंमें तो चली नहीं, क्योंकि, उन्हें दामाखेड़ेवालोंका सब हाल मालूम था किन्तु, गुजरातके कतिपय, लोगोंने उनकी बातोंको सत्यमानकर द्वेषका बीज अपने अन्तः करणोंमें बोलिया जिसका अंश आजतकभी दृष्टिगोचर होता है ! अस्तु यह भी एक कालकी वाजीही थी नहीं तो साठ वासठ हजारकी लागतका प्रेस पंथी दयानाथ साहब द्वारा, कुछ मूर्खोंके कहनेसे, नौ सौमें एक विधर्मीको क्यों दे दिया जाता ?

अस्तु काल भगवानकी कृपासे ग्रंथ और वाणी वचनके प्रकाशनमें सद विघ्न होता चला आता है और सद्गुरु दयालकी दयासे मैं यथा शक्ति प्रयत्नमें लगाही हूँ । कई वर्षोंके अथक परिश्रमसे, इस वर्ष कवीरपंथी शब्दावलीका यह ग्रन्थ छपने पाया है । कवीरमन्थूरमें भी हाथ लग गया है किन्तु, काल निरंजनकी दृष्टि उसकी ओर भी पड़ी है, अनेक विघ्न आकर उपस्थित हैं देखें क्या परिणाम होता है ?

यद्यपि मेरे पास इस समय चालीस हजारसे भी ऐसी वाणीका संग्रह है जिसमें “कहें कबीर” की छाप लगी है । इच्छा तो ऐसी होती है कि सबही छपकर प्रकाशित हो जाय किन्तु, सद्गुरुने मुझे केवल ग्रन्थ और वाणियोंके संग्रहकी योग्यता दी है जिनके पास साधन है, वह इस ओर ध्यान नहीं देते, मेरे पास साधन नहीं है तबभी बड़ी बड़ी महत्वाकांक्षा लिये बैठे हैं । यद्यपि इच्छानुसार कार्य्य नहीं होता तथापि लगे रहनेसे कुछ न कुछ तो होताही है । जिन कबीरपंथियोंके पास धन है उन्हें इसका संस्कारही नहीं, नहीं तो उन्हें यदि धनही जमा करना है तो उपस्थित धनकी वृद्धिका, यह ग्रन्थोंका प्रकाशन कितना अच्छा मार्ग है । कुछ ग्रन्थोंको छपाकरही लोगोंने लाखों रुपये कमाये हैं यदि कोई कबीरपंथी इसी

ग्रस्तावना ।

(१३)

कामको करता तो ये रुपये उसीके घर तो जाते । किन्तु काल भगवानके जाल, संसारी मान पान राग भोगसे उन्हें फुरसत ही कब है कि, इस ओर ध्यान देने । काल निरञ्जनने कबीर साहबसे कहाही था कि, ।

बिनतौ एक करौं तुहि ताता । दिठ करि मानो हमरी बाता ॥ कहा तुम्हार जीव नहिं भनि हैं । हमरी ओर होय बादबखनिहैं ॥ दिठ बन्धन में रचा बनाई । जामें जीव रहै उरझाई ॥ जो ज्ञानी जैहो संसार । जीव न माने बचन तुम्हारा ॥ पंथ एक तुम आप चलाऊ । जीवन लै सतलोक पठाऊ ॥ द्वादश पंथ करौं मैं साजा । नाम तुम्हारा ले करौं अवाजा ॥ द्वादश जन्म संसार पठैहों । नाम तुम्हार ले पंथ चलैहों ॥ यहि बिधि जीवनको भरमाऊँ । पुरुष नाम जीवन समझाऊँ ॥ द्वादश पंथ जीव जो ऐहैं । सो हमरे मुख आन समैहैं ॥

मुझे तो, ऐसे नाममात्रके कबीरपंथी, जो काल और मायामें फँस कर, केवल सांसारिक स्वार्थके लिये मर रहे हैं, उनसे वे लोग अच्छे जान पड़ते हैं जो कबीर पंथी न कहलाने पर भी चाहे व्यापारिक लाभ की ही कामना से क्यों न हो कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन करके, कबीर धर्मका प्रचार कर रहे हैं। मैं तो विशेष रूपसे श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके मालिकोंको हृदयसे धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने दर्जनों ग्रन्थ प्रकाशित कर, तीस वर्षोंसे लाखों प्रति कबीरपन्थियों तक पहुँचाया है ।

इस ग्रन्थके छापनेके लिये यद्यपि मुझे तीन वर्षतक प्रतीक्षापूर्वक बम्बई सेवन करना पड़ा है, तथापि ज्यों त्यों करके इतना भी छप गया है । आशा तो थी कि, कबीरमन्शूर, कबीरभानुप्रकाश, कबीरकौमुदी, तालीम कबीर कलियुग आदि सहित, संग्रहित चालीसहजार शब्दोंको छपवा देता और श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके स्वामी खुशीसे छापते जिससे उनको व्यापारिक लाभ था किन्तु वर्तमान काल और वस्तु स्थितिको देखते हुए कुछ कहा नहीं जा सकता ।

कुछ भी हो मैंने आरम्भसेही अपना जीवन इसी कार्यके लिये अर्पण कर दिया है तब “जब तक जीना तबतक सीना” वाली कहावतके अनुसार, प्रयत्नसे न रुकूँगा और एक जगह नहीं दूसरी नहीं तीसरी जहाँ होगा जमीन आस्मान एक करके ग्रन्थोंको, जहांतक हो सकेगा, छपवा करही छोड़ूँगा क्योंकि इस समय

(१४)

प्रस्तावना ।

सद्गुरुकी कृपासे कबीरपंथी ग्रंथ छपानेको बडे २ प्रेसवाले तय्यार हैं किन्तु मेरी इच्छा है कि, जबतक श्रीवेंकटेश्वर प्रेसमें मेरे ग्रंथ छपचुके तबतक दूसरेको न दूँ और अंत तक यही कार्य करते हुए संसार लीलाको समाप्त करनेका दृढ़ निश्चय कर लिया है। इसी उद्देश्यसे “कबीरधर्मदर्शनग्रन्थमाला” छपवानेका आयोजन किया है। यह ग्रन्थ उसी ग्रन्थमालाका दूसरा भाग—समझना चाहिये। प्रथम भागमें नौ मणिक और इसमें शेष मणिका रखा है। जिसमें सुमेरस्थानी मूलरमैनी जानना चाहिये, जो पृष्ठ ४८७ से ५०२ तक है। आगे आगे जैसे और और ग्रन्थ छपते जाएँगे सूचना बाहर पडती जायगी।

अब मैं उन महानुभावोंको हृदयसे धन्यवाद देता हूँ जिनसे मुझे मेरे इस काममें विशेष सहायता ग्रन्थोंद्वारा मिली है।

  1. (१) सद्गुरु श्री. १०८ सत्यलोकवासी महन्त श्री शम्भुदासजी साहबके संशोधित और टिप्पणीवाले शब्द आदि वर्तमान महन्त श्री. लक्ष्मण-दासजी द्वारा प्राप्त हुए हैं, इतनेही नहीं आपने सद्गुरुसाहबके कुल ग्रन्थोंके छपवानेका अधिकार भी मुझे देकर सर्व साधारण तथा मेरा बहुत उपकार किया है इसलिये आपको कोटिशः धन्यवाद है।
  2. (२) श्री १०८ महंत श्री तुरंतदासजी साहबने हस्तलिखित ग्रन्थोंद्वारा सहायताकी है इसलिये आप भी विशेष धन्यवादके पात्र है।
  3. (३) श्री १०८ महंत श्री सुखलालदासजी साहब खारी बावली-दिल्ली।
  4. (४) श्रीयुत महंत मंगलदासजी साहब मु० हैदर कुली दिल्ली।
  5. (५) श्री महंत गुरुसरनदासजी गोंदौरा जि० फतेहपुर।
  6. (६) श्री महंत अमर दासजी साहब जोधपुर।
  7. (७) श्रीयुत राम रूपदासजी साहब रोसडा।
  8. (८) श्रीयुत परमहंस मित्तुदासजी साहब रोसडा।
  9. (९) श्री महंत चंचलदासजी साहब मौजी।
  10. (१०) श्रीमहंत सुन्दरदासजी साहब मुदारघाट।
  11. (११) श्रीयुत पण्डित वसंत दासजी साहब विथान गढी।

प्रस्तावना

१५

(१२) श्रीमहन्त विशुनदासजी साहब नलाबाजार अजमेर । इत्यादि अनेक संत महंतोंने मेरे इस कार्यमें ग्रन्थ और वाणी आदि भेजकर सहायताकी है, सबको अत्यन्त नम्रता पूर्वक बन्दगी सहित धन्यवाद ।

इस संग्रहमें क्या क्या संग्रहित है उसका संक्षेपमें तो सूचीपत्रसे पता लग जायगा और विस्तार ग्रन्थ देखनेसे पता लगेगा । ग्रन्थ बहुत बढ़ जानेसे बड़ा सूची-पत्र नहीं छप सका तथापि इतना तो यहाँ आवश्यक कहना होगा कि, इस ग्रंथ में लगभग सात हजारसे भी अधिक वाणियोंका संग्रह है ।

इस ग्रन्थका नाम कबीरपंथीशब्दावली इसलिये रखा है कि, इसमें कबीर साहबके अतिरिक्त धर्मदासजीसे लेकर अनेक कबीरपंथी महात्माओंकी वाणी भी आयी है.

इस ग्रन्थमें कई चित्रभी दिये गये हैं ।

(१) चित्र सद्गुरु कबीरके जिन्दा वेषका है इसी रूपसे आपने धर्मदासजीको चेताय़ा था, क्योंकि, आप मिथ्या सांसारिक जालसे जीवोंको छुड़ाकर निरपेक्ष सत्यमार्गका उपदेश देनेको प्रकट हुए थे। यह चित्र उस समयका है जिस समय आप मगहरकी लीला करके गुप्त हो उसी शरीरसे, बांधोगढमें प्रगट होकर, धर्मदासजी और बघेलवंशके, उस समयके वर्तमान. राजा महाराजा रामसिंहको उपदेश देकर क्रुतार्थ किया था । उसी समय राजारामने आपका यह चित्र उतरवाया था जो अद्यापि उस रीवाँ के तोशाखानामें उपस्थित है । यद्यपि उस चित्रमें कफनी, नाना रंगोंके छोटे छोटे कपड़ोंके टुकड़ोंकी बनी हुई है, किन्तु फोटोमें नाना रंग न आकर काला रंग आगया है इसलिये यहाँ भी काला देख पडता है ।

(२) दूसरा चित्र कबीरपंथी वचनवंशी विन्दवंशके बारहवें आचार्य श्री १०८ पंथी उपनामसाहबका है ।

(३) तीसरा चित्र श्री १०८ पंथीदयानाम साहबका है । जिनसे, ग्रन्थोंकी भविष्यत वाणीके अनुसार वचन वंशी विन्द वंशकी समाप्ति होगयी है ।

(१६)

प्रस्तावना ।

(४) कोदरमालके कबीरपंथी महासभाका है, जो पंथी दयानाम साहबके सत्यलोक वास होनेके पश्चात, सम्बत १९८४ वि० के चैत मासमें हुई थी, उन्हींमेंके कुछ उपस्थित संतमहंतोंकी मण्डलीका फोटो लिया गया था ।

(५) श्री १०८ कबीरसाहबके अधिकारी वचन वंशके नादवंशीय प्रथम आचार्य श्रीमहंत श्रीकाशीदासजी साहबका वह चित्र है जो भागलपुर के सेवकोंने उतरवाया था.

अब मैं इस प्रस्तावनाको यहाँही समाप्त करते हुए सर्व संतमहंत तथा सत्य मार्गियोंसे प्रार्थना करता हूँ कि, इस ग्रन्थकी यह पहली आवृत्ति है और भिन्न स्थानोंसे शब्दादिकोंका संग्रह किया गया है, इससे कई शब्द दुबारा आगये हैं। कई शब्द तो आरंभ एक प्रकारसे होनेपरभी मध्यमें फेरफार होनेसे दुबारा दिये गये हैं; तथा कितनी अशुद्धियाँ भी रहगयी हैं सो सब क्षमा करके आप इसे ग्रहण करेंगे और जिन जिन सुधारोंकी आवश्यकता हो उसकी सूचना इस परमार्थी अनुचरको देंगे तो, धन्यवाद पूर्वक दूसरी आवृत्तिमें आपके नाम सहित सुधारा कर दिया जायगा हाँ—गतवर्ष इसकी, भिन्न २ ग्रन्थोंसे, कापी लिखनेमें—मुंगेर जिलेके मौजे बिहट टोले मकशशपुर निवासी कबीरपंथी सेवक भूमिहार ब्राह्मण बाबू रामखेलावनसिंहने कई महीनोंतक मेरा साथ दिया था, इसलिये वह भी मुझ सहित सर्व पाठकोंके धन्यवाद और दयाभावके पात्र हैं।

कबीर आश्रम पो० खरसिया जि० विलासपुर सी. पी.

हाल

श्रीवेंकटेश्वर धर्मादा बिल्डिंग “खेतवाडी, बम्बई नं० ४”

सर्व संतों और जिज्ञासुओंका परमार्थी अनुचर

कबीरआचार्य आत्मनिष्ठ श्री. युगलानन्द विहारी.

सत्यनाथ

जिन्दा बेषमें सत्यकवीर

A black and white portrait of an elderly man with a long, full white beard and mustache. He is wearing a dark, high-collared garment and a tall, pointed traditional cap (pheta) with vertical ridges. He has a calm expression and is looking directly at the camera. The background is a plain, light color.

॥ यिरीषादवीर नाथ यिरीषादवीर नाथ । यिरीषादवीर नाथ । यिरीषादवीर नाथ ॥

सत्ययुग सत्पुङ्गव सतनाथा । जेता सुनीध जात कर धात्ता ॥

इसी बेषमें सद्गुरुने धर्मदासजीको चेताया था ।

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सत्यनाम ।

कवीरपंथी शब्दावलीकी साधारण अनुक्रमणिका ।

नंबरविषयपृष्ठ
मुख्यपत्र वंशावली... १
भूमिका... २
प्रस्तावना... ५
अनुक्रमणिका... १७
ध्यान देकर पढ़ो—कवीरपंथी ग्रन्थोंको
सूचीसहित... २२
मंगलाचरण... २५
शब्दावलीकी उत्थानिका... २५
१ शब्दावली... ३७
२ ग्रन्थारम्भः... ३७
१ मंगलाचरण... ३७
२ इससे लाभ क्या... ३७
३ सद्गुरुका स्वरूप शब्दकी
महिमा... ३७
४ शब्द क्या बतलाता है ?... ३७
५ इसलिये (वंशव्याख्या) परन्तु,
किन्तु ।... ३८
कवीर पंथी शब्दावली
प्रथम खण्ड प्रारम्भः ।
संज्ञा मुमिरन प्रारम्भः... ४०
१ संज्ञा गौरी... ४०
२ आरती... ४३
३ संज्ञा साखी... ४३
४ विज्ञान स्तोत्र... ४९
५ दयासागर स्तुति... ५१
(जीवके उद्धारक मार्ग)... ५२
६ चैतावनी... ५३
(सत्यकाशब्द)... ५३
७ ज्ञान गुदरी... ५५
८ रत्ना स्तुति... ५७
९ अष्टक (साहब गुरुज्ञानी)... ५८
१० स्तुति (गुरु दुषित नुभ विन्)... ५९
११ विनय (दरस दीजे गुरु परम-
(स्नेही)... ५९
१२ स्तोत्र (विदेह सूर्य)... ६०
१३ स्तोत्र (जयजय कबीर)... ६१
नंबरविषयपृष्ठ
१४नाभाजी कृत छप्पय... ६२
छप्पय भक्तमालका... ६३
१५सूचना (विचार जनक विदेहि
नानका)... ६४
१६स्तोत्र अष्टक (* मंगलरूप
अनूप पूरन)... ६४
और कवित्त अजर अखण्ड रूप... ६६
१७साखी (बारोंतन शनधन सब)... ६७
संज्ञापाठ बुरहानपुरी... ६७
* गुरु शतक सारनाम
... ६८
छन्द (नुभ होहु जाहु बयाल)... ६८
शब्द अष्टपदी स्तोत्र)
... ६९
(प्रभुजी विन् कोन छुडावे)... ६९
छन्द (साहब स्वतः प्रकाश
पारख)... ७१
अर्जनाभा अष्टक (हो सबक
अज्ञान)... ७२
अष्टक (मुखसाहब मुखरूप)... ७२
अष्टक (* मंगलरूप अनूपम
पूरन)... ७३
घनाक्षरी (अजर अखंडरूप)... ७५
आरती (आरति हो गुरु
आरति हो)... ७५
१०प्राथना स्तुति दोहा... ७६
११गुरुस्तुति छन्द... ७६
द्वितीय खण्ड प्रारम्भ ।
स्तोत्र दर्शन ।
सन्ध्या बन्दन स्तुति... ७७
कबीर मान् विद्योग सबध्या... ७८
विनय पत्रिका... ८१
ध्वनि इमन (समय ८ बजे
रात्रि)... ८५
बेधताल त्योरा (स० १० बजे
रात)... ८६

( १८ )

शब्दावली—

नंबरविषयपृष्ठ
गौड मिश्रित देश... ८७
सोरठ (समय १२ बजे रात)... ८९
बिहाग (समय २ बजे रात)... ९०
कालिंगडा (समय ४ बजे रात)... ९०
१०प्रभातो (समय प्रातःकाल)... ९१
११सैरबो (समय सुव्योदय)... ९८
१२रागिनी आसावरी (समय १० बजे दिन)... १००
१३ध्वनि पिलू (समय ३-३।। बजे दिन)... १०४
१४प्रातः संध्या साखी... १०५
१५प्रभातो स्तुति... १०७
१६कबीर भानु उदय सर्वया... १०८
१७सत्य कबीर का सत्य और मनराजाके झूठका युद्ध.... १०९
१८मध्याह्न संध्या साखी... ११२
१९मध्याह्न दिनकी स्तुति... ११४
२०माध्याह्न सर्वया... ११६
२१छोटी एकोत्तर नित्य पाठकी... १२०
२२गुरु शतकसार नाम स्तोत्र *... १२१
२३स्तोत्र (कबीर कृपालं)... १२२
२४संस्कृत स्तोत्र ३-
पृष्ठ १२६ तक... १२२
२५स्तोत्र (भो कबीर हरन पौर)... १२७
२६कबीर चालीसा... १२७
२७अर्जौ नामा (कतरहौ पुकार)... १३१
२८अर्जौ नामा (सतगुरु मिहरबान)... १३३
२९विनय अष्टपदी प्रभुजी तुम बिन (* पृष्ठ ४१)... १३७
३०दशाष्टक स्तोत्र (नमामि सर्वं सन्त)... १३७
३१स्तोत्र दशक (नमस्कार बारबार)... १४०
नंबरविषयपृष्ठ
३२स्तोत्र (जय जयदीनदयाल कृपालहितं)... १४१
३३,, (जय जय भवतारन अन्न-निवारन)... १४२
३४अष्टक (भो कबीर हरन पौर)... १४३
३५स्तोत्र संस्कृत छन्द शिखरनी... १४३
३६नाराध छन्द स्तोत्र (नमामि सर्वं लायकम्)... १४४
३७स्तोत्र (कृपालं चित्त नंदनम्)... १४५
३८स्तोत्र छन्द तोटक (परमं सदयं भवतापहरं)... १४५
३९संस्कृत स्तोत्र अष्टक... १४६
४०कबीरसा ब्राह्म्यस्तोत्र... १४७
४१गुरु स्तुति संस्कृत... १४९
४२स्तोत्र सर्वया कवित्त... १५०
४३कबीर पंचाशिका... १५१
४४गुरुस्तोत्र (कबीरमहिमा)... १५६
४५कबीरनाम महात्म्य (कबीर-कोत्तरशत भाषा कवित्त)... १६०
४६विनय रत्नावली प्रारम्भः (स्वामी श्रीपरमानन्दजी विरचित)... १८५
४७अर्जौनामा (महंत बीज-कवासजीका)... १८९
४८स्फुट विनयके छन्द कवित्त इत्यादि... १९२
४९विनयशब्दावली (श्री पूर्ण साहब छत) १९४ से २०७
५०आराधना गद्यमय स्वाधी-श्रीयुगलानंदविहारी २०७ से २११
५१गुरु सहस्र नाम संस्कृत२१२ से २१७
५२नाम लीला२१८ से २२०
५३धर्मदासजी विरचित किन्ती २२० से २२९

अनुक्रमणिका ।

(१९)

नंबरविषयपृष्ठ
५४स्तोत्र फुटकर उर्दू हिन्दी-
गजल शेर कवित्त साखी
आदि कवीश्वरोंके वचन ...२२९
५५सद्गुरुको महिमा साखियाँ २५९ से २७६
५६गजल कम्वाली प्रार्थना ...२७६
५७गुरु स्तुति संस्कृत ...२७७
५८दूसरे खण्ड की समाप्ति ...२७७
तीसरा खण्ड ।
अध्यात्म साधन (चौका
विधान) ...
गुरु पूजा प्रकरण (संगला-
चरण) 1: ...२७८
उछाह मंगल (पधरावनीके
शब्द) ...२७८
छत्तीसगढ़ी चौका विधानके
पद X ...२८१
व्यंजनभोगका शब्द ...२८१
शब्द ध्वन ...२८२
,, गारी ...२८२
,, अचवन ...२८३
,, विजना ...२८३
,, भोगकी आरती ...२८४
चौकाकी रमैनी ...२८४
चौकाके पद ...२८६
१०पद डोरी ...२८९
११चौपड ...२९१
१२चौकाकी आरती और मंगल
बन जा दिन ...२९२
१३नारियलका शब्द (मोरहु
नरियर मोरहु हो) ...२९३
१४भोगका शब्द (सत पुरुषको
भोग लागे) ...२९३
१५तिनका का शब्द (जमुनियाको
डार) ...२९४
नंबरविषयपृष्ठ
१६शब्द कंठीका (पाया निज-
नाथ गलेको हुरबा) ...२९४
१७शब्द नामका (गुरु पंड्या
लागो नाथ लखावदीजे
हो) ...२९४
१८शब्द दोहल प्रारम्भ,
दोहल ...२९५
१९आरती दर्शन जिसमें २५
आरती हैं ...३०७
आवश्यक कितापि (चौका विधानके
दूसरे भागके विषयमें इसमें
रोसडा स्थानका संक्षिप्त
वर्णन है 1) ...३१५
अध्यात्म साधन गुरु पूजा प्रकरण
दूसरा भाग “आनंदी चौका”३२१
पूर्व बिहारादि प्रदेशोंमें प्रच-
लित चौकाविधान प्रारम्भ X ...३२१
रमैनी ८ ...३२१
शब्द नारियर (वनजारिन) ...३२४
आरती चौकाकी ...३२५
शब्द भोग (सतपुरुष भोग
लागे) ...३२६
शब्द तिनका ...३२७
शब्द नाम लखावन ...३२७
शब्द कंठी ...३२८
शब्द उपदेश (घन सतगुरु जिन
दियो उपदेश) ...३२८
शब्द अजी (समुन्नति गहो मोरि
वाहीं) ...३२९
१०पान परवानाका शब्द ...३३०

X इस हेंडिगमें पृष्ठ २८१ पर “चौका विधान के पद” के बदले “चौकी विधानकी पद” छप गया है सो पाठक सुधार लेंगे ।

(२०)

शब्दावली—

नंबरविषयपृष्ठ
चलावा चौका प्रारम्भः ।
मंगल (सतगुरु हंस उवारन जगमे आइया) . . .३३०
दीहल प्रारम्भः (१) . . .३३१
शब्द नारियर . . .३३५
डोरी पदप्रारम्भः (चलावा चौका का) . . .३३६
शब्द व्यंजन भोग (३२६ *) . . .३४०
अचवन (*सेवक लिये प्रेमजल झारो ३२८) . . .३४१
शब्द धुन (*३२६) . . .३४२
गारी प्रारम्भ (३२७) . . .३४३
१०लम्बेब चौका(मे गाने योग्य नाना प्रकारके राग रागनियोंके शब्द पढ़ादि) . . .३५०
११चौका आरती महात्म्य . . .३८२
१२कबोरपंथके धार्मिक सामान्य ११ नियम . . .३९६
तीसरे खण्डके विषयमें सूचना . . .३९७
१३मूल रमनी अर्थात् शब्द कुंजी . . .३९८
१४आदि वाणीका शब्द . . .४१०
१५कडिहार भेदका शब्द . . .४११

चौथा खण्ड प्रारम्भः ।

१६सत्य कबोरकी आगमवाणी . . .४१२
१७राम परखकी रमनी . . .४१३
१८निरख प्रबोधकी रमनी १ . . .४१४
१९शब्द पारखकी रमनी (सिगी शब्द) . . .४१६
२०सर्वांग बत्तीसी रमनी . . .४१८
२१रमनी सोलह तिथिकी . . .४२२
२२रमनी अक्षरखण्डकी . . .४२३
२३रमनी प्रेम अछरकी . . .४२४
२४रहनी गहनी . . .४२५
२५यम जाल . . .४२५
२६सांचा कडिहार . . .४२५
२७सत्य नाम . . .४२६
नंबरविषयपृष्ठ
२८रहनी पहचान . . .४२७
२९अष्टाङ्गयोगकी रमनी . . .४२७
अविगत योग . . .४२७
कर्म योग . . .४२८
सत्कर्म योग . . .४२८
सांख्य योग . . .४२८
ज्ञान योग १ . . .४२९
विचार योग २ . . .४२९
विवेक योग ३ . . .४३०
शीलयोग ४ . . .४३०
संतोष योग ५ . . .४३०
१०निर्वे' योग ६ . . .४३१
११सहज योग ७ . . .४३२
१२शून्य योग ८ . . .४३२
१३अष्टाङ्ग योगका सार . . .४३३
ज्ञान परीक्षा . . .४३३
विचार परीक्षा . . .४३३
विवेक परीक्षा . . .४३३
शील परीक्षा . . .४३४
संतोष परीक्षा . . .४३४
निर्वे' परीक्षा . . .४३४
सहज परीक्षा . . .४३५
शून्य परीक्षा . . .४३५
३०करीमकी हिकमत . . .४३६
३१काया मजिद . . .४३६
३२रमनी मन (१) . . .४३६
मनराजा (२) . . .४३७
३३रमनी कथता वकता (१) . . .४३७
बोलना (२) . . .४३८
३४रमनी सात गुहकी . . .४३८
३५निर्बान देसकी . . .४३८
३६गुहकी (१) . . .४३९
विरह वार्ताकी . . .४३९
गुरुटंककी (२) . . .४४०
गुरु महिमाकी (३) . . .४४०
३७जुलाहाकी . . .४४१
३८स्वरूप महिमाकी . . .४४१

अनुक्रमणिका ।

( २१ )

नंबरविषयपृष्ठ
३९कालजीतकी४४२
४०रमैनी निर्बान पदकी४४२
४१स्वरूप पहिचानकी४४३
४२रमैनी निर्बान एकतारकी४४३
४३ज्ञान विरहकी४४४
४४घट दर्शनकी४४४
४५योग योगकी४४५
४६आदि रमैनी४४५
४७एक ओंकारकी४४६
गुरु महिमा (४)४४६
४८रमैनी गृही रहनीकी४४७
४९रमैनी बेरागी (साधु) रहनी की
रमैनी बेरागी गुरुशिष्य अधिकारी४४८
४४९
५०रमैनी बेरागी कर्मखण्डकी४४९ से ४५४
५१पंच देह निर्णय
निरख पत्रोद्यकी रमैनी २४५४ से ४६०
निरख प्रबोध (३)४५९
५२बीजककी रमैनी ८४
निरख प्राबोधकी रमैनी ४-१० तक४६१
४८९ से ४९५
५३ज्ञान चौतीसा (केता कह कबीर १)
ज्ञान चौतीसा (काया कुंजकरमकी
बारो २)४९६ से ५००
ज्ञान चौतीसा चौतीसा बीजककी५००
५०९
५४विप्रमतीसी (बीजककी)५१२
५५कहुरा (बीजकका)५१३
५६चाँचर५१९
५७बेलि५२१
५८विरहुली५२२
५९हिंडोला५२३
नंबरविषयपृष्ठ
गुरु महिमाकी रमैनी १८ (६)
५२४ से ५३५
गुरु उपदेश महिला (७) ... ५३५
(३२)शब्दावली-अनुक्रमणिका समाप्त .
शिष्यकी अधीनता (८) ... ५३७
गुरुसेवा महात्म्य (९) ... ५३७
गुरु भावना (१०) ... ५३७
गुरु चरणोदक महात्म्य (११) ५३८
६०ज्ञानदीपककी रमैनी ५३९ से ६३५
६१तत्त्व दर्शन साखियाँ (पंचीकरण)
६४० से ६५०

खण्ड पाँचवा प्रारम्भ ।

६२१ वसंत प्रारम्भ (७०) ६५१ से ६७७
२ होरी प्रारम्भ: (४९) ६७८ से ७००
३ फाल प्रारम्भ: (४) ... ७००
४ धमार प्रारम्भ: (२७) ७०२ से ७१४
६३चाँचर ... ७१४
६४कहुरा प्रारम्भ: (३६) ७१५ से ७२८
६५गौरी प्रारम्भ: (५०) ७२८ से ७४३
६६राग कल्याण (१५) ७४४ से ७४८
६७राग कान्हुरा (२५) ७४९ से ७५६
६८राग काफो (१६) ७५६ से ७६१
६९मंगल (१०) ७६१ से ७६५
७०तीसा मंत्र (३०) ७६५ से ७६९

छठा खण्ड प्रारम्भ: ।

७१शब्द प्रारम्भ: (३८८) पृ. ७७० से ८९८
७२शब्द बीजक ११५ ८९८ से ९३२
७३भेदवाणी ... ९३३
७४गजल कल्याली ... ९३७
७५सुवाबतीसी (सम्याभगवतीदास
विरचित) ... ९३९
७६शब्दार्थ चिन्तामणि कोष ... ९४४

इति श्रीकबीरपंथी शब्दावलीकी संक्षिप्त अनुक्रमणिका समाप्त शुभम् ।

सत्यनाम ।

ध्यान देकर पढो ।

कबीर पंथियो !

उठो ! जागो ! और चेतो यह समय तुम्हारे पंथके लिये बड़ा कठिन आया हुआ है । इस समय तुम्हारे पंथकी दशा डावांडोल हो रही है । तुम्हारे वचन वंश गद्दीके विन्द वंशकी समाप्ति होगयी है । नाद वंशकी गद्दी स्थापित होने पर भी, धर्म ग्रन्थोंको भली प्रकार नहीं जाननेके कारण, सेवक सती, साधु संत, महंत और गुसाई सब कल्पनाकी हवाई जहाजमें उड़ते फिरते हैं । किसीको भी स्थिरता नहीं मिलती है । सेवकोंमें जो माननीय हैं वह अपनीही चलाना चाहते हैं, भेष उनकी दृष्टिमें निर्मल्य जैसे दीख पड़ती है; भेषों में कुसम्प होनेके कारणसे उनका बल दबसा गया है । अपने सत्य सिद्धान्तको दृढ़तासे पकड़कर चलानेके बदले, नाना मति और भिन्न २ विचारके कारण, मनमतके जालमें फँस गये हैं जिसके मन में जो आता है उसी को वह सिद्धान्त समझकर, सत्यगुरुमत का अनादर कर रहा है । यह सब क्यों हो रहा है ? केवल सद्गुरु कबीरकी वाणियों और कबीरपंथके ग्रन्थोंपर ध्यान नहीं देनेसे । अब अपना समय व्यर्थ पक्षपातमें पड़कर नष्ट मत करो—क्योंकि, सद्गुरु कबीरका वचन है ।

“पछापछीके कारने, सब जग गया भुलान ।

निर्पच्छ होइके हरिभजे, सोई संत सुजान ॥”

इसलिये मिथ्या पक्षपातको छोड़कर सत्य गुरु कबीरके शब्दोंके आश्रय अपना कल्याण दूँढो—क्योंकि.

“गुरु सीढीते ऊतरे, शब्द विहूना होय ।

ताको काल घसीटिहै, राखि सकै नहिं कोय ॥”

इसी, लिये आगम संदेशमें, सद्गुरु कबीरने कहा है—

“शब्दहिं गहे सो पंथ चलावे ।

विना शब्द नहिं मारग पावे ॥”

देखो इस समय कबीरपंथी मात्र कबीर की वाणी वचन और शब्दोंको छोड़कर अपना पंथ खो बैठे हैं—क्योंकि, —जब आगम वाणीमें कहा है —

“तेरहैं पीढी ज्ञान रजधानी, चूरासरन औतारा हो ।

उनके अंग छाया नहिं होई, देह विदेह अपारा हो ॥

उनके आगे जोग मत चलिहैं, राजनीति उठजाई हो ॥

पांचस्वादकी इच्छा नाहीं, सो मति सब उन आई हो”

२३

देखो इस वाणीमें स्पष्ट लिखा है—तेरहें पीढीके समाप्त होनेपर—ज्ञानका दौरा आयेगा और चूरासनका औतार होगा—उस चूरासनके अंगमें छाया नहीं होगी क्योंकि, उसकी देह विदेह होगी ।

आगम संदेशमें “चूरासन” का भाव यों दर्शाया है—“परगटे वचन चूरासन अंसू । शब्दरूप सब जगत प्रसंसू ॥ शब्दे पुरुष शब्दे गुरुराई । विना शब्द नहिं जिव मुक्ताई ॥ जाते जीव मुक्त हो भाई । मुक्तात्मन सोइ नाम कहाई ॥”

इस समय शब्दकी ओर ध्यान न देने वाले और अपने अपने मनपरही चलने वाले, प्रायः सेवक सती संत महंतों की मानता होरही है कि, चूरासन कोई देह धारी पुरुष प्रकट होकर पंथ चलायेगा । इसी कल्पना और संशयमें डोला खाते हुए अधिकांश लोग कबीर पंथसे वेपंथ जाकर, कालके फन्देमें पड़कर, अपना किया कराया सब नष्ट कर रहे हैं । उन्हें इतनी समझ नहीं है कि, वचन चूरासन कोई देहधारी पुरुष नहीं है । वह तो कबीर, सद्गुरु कबीरका ज्ञान विचार और वाणी-है । ऊपरके वचनमें स्पष्ट कहा है—“शब्दरूप सब जगत प्रसंसू” प्रत्यक्ष देखो—कबीरकी वाणीका संसार भरमें कितना आदर है और तो और संसारभर को काफिर कहने वाले मुसलमान भी कबीरके साखी शब्द और वाणी वचन को मुश्दिद बरहक्क (सद्गुरु) की वाणी कहकर मानते और आदर देते हैं । आर्थ्य समाजियों को ही ले लो, उन्हें, स्वामीदयानन्दकी उटपटांग अर्थहीन लिखी बातों को भुलाकर, कबीर की वाणी और सिद्धान्तको झखमारके आदर देना पड़ता है वर्तमान के आर्थ्य समाजियोंके ग्रन्थोंमें तुम्हें प्रायः कबीरकी वाणीके प्रमाण मिलेंगे—

कितने ऐसे कबीरपंथी हैं जो फिरसे पिछले राज्यकी स्थापना करना चाहते हैं । उनको इतनी स्पष्ट बात भी नहीं समझ पड़ती है कि, जब स्वतः कबीर मुख वचन है कि, तेरहों पीढीके पश्चात् उसीके अमलमें, राजनीति उठजायगी और ज्ञान राजधानी चलेगी, तब भी वे राज्य स्थापना करनेके लिये—वर्तमान राज्य शासनका आश्रय लेकर अपना मन माना करना चाहते हैं । इसका परिणाम यही है कि, कबीर वचनके अनुसार स्थापना तो ज्ञानकी ही होगी और उस ज्ञानको प्रगट करनेवाले कबीरके वे शब्द जो मनको चुरा करके सत्यपंथमें लगावेंगे

२४

उसी चूराभनका प्रकाश अब विशेष होगा। किन्तु काल निरञ्जनके वहकावटमें पड़े मिथ्या मान गुमानको लिये, वे भूले हुए जीव, भ्रमके आश्रय. सन्तमहंत भेष और कबीर धर्मदासके विरुद्ध, अपना राज्य स्थापित करनेमें लगे हैं और राज-कचहरियोंमें मारे मारे फिरते हैं। उनको न तो अपनी समझ है, न किसी जानकार का वचन सुनना चाहते हैं कि, यह सब कालकी बाजी है, इससे सत्य धर्मका कोई सरोकार नहीं है। कबीर प्रत्यक्ष रूपसे कहते हैं—

“राजद्वार जावे नहि कबहीं। कैसो कष्ट आवे पुनि जबहीं ॥ महिमा वंश तबै मिटजाई। राजद्वारे द्रव्य लुटाई ॥ होवे वैर नगरमेंभारी। कलिजुग राज करे सुख छारी ॥ कलिजुग होय मलेच्छ सो राजा। जो बिगरे तो होय अकाजा ॥”

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण, कबीर कॉसिल और उसके संचालकोंका परस्पर का झगडा है।

कहांतक कहाजाय मनमतका पार नहीं है। इस मनमतके वश पडकर लोभ वश कितने साधु संत महंत नामधारी जीव भी, उसी घसीटनमें पडकर अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ नष्ट कर रहे हैं।

इसी लिये हे प्यारे सत्य धर्मके खोजी कबीरपंथियो! मिथ्या अभिमान और मनमतको त्यागकर, कबीर धर्मदासके ग्रन्थ और वाणीका विचार करके, वर्तमानके उलझनोंको सुलझाओ और अपना अमूल्य जीवन सफल करो—

श्री वेंकटेश्वर और लक्ष्मीवेंकटेश्वर प्रेसने आपहीके पंथकी रक्षाके लिये कबीरपंथी ग्रन्थोंका प्रकाशन किया है।

मंगला वरण ।

यस्योपदेशमाराध्य नरो मोक्षमवाप्नुयात् ।

तं कवीरमहं वन्दे मनोवाक्कायकर्मभिः ।

सत्सुकृत आदि अदली अजर अचिन्त पुरुष

मुनीन्द्र करुणामय कवीर सुरतयोग

संतायन धनी धर्मदासकी दया

सर्व संत महंतोंकी दया—

अथ शब्दावलीकी उत्थानिका—

सद्गुरु कवीरने संसारी जीवोंके चितानेके लिये अनंत शब्दोंका प्रकाश करके, भवसागरसे पार करनेका प्रशस्त मार्ग तय्यार कर दिया है। तथापि बलि-हारी है, कालभगवानकी कि, अपना राज्य बना रखनेके लिये सत्यमें भी असत्यकी मिलौनी कर कुछ का कुछ कर दिखाता है ।

जहां सद्गुरुका वचन है कि—

पच्छा पच्छी कारने, सब जग गया भुलान ।

निर्पछ होइके हरिभजे, सोई सन्त सुजान ॥

वहां सद्गुरुका नाम रखकर कालने सत्यशब्दमें इतनी मिलौनी करदी है कि, संसारी जीवोंको निर्पक्ष वाणीकी पहचान ही नहीं होती, उलटा वे कालकी वाणीको ही सिद्धान्त वाणी समझकर उन्हींमें भूलकर साम्प्रदायिक गर्तमें गिर पड़े हैं और जबतक सद्गुरुके बताये संकेतके अनुसार सत्यशब्दको जाननेका प्रयत्न नहीं किया जायगा तबतक वे भवसागरमें गोता खातेही रहेंगे ।

सद्गुरु कालवाणीसे सत्यवाणीको अलग करनेकी कैसी सरल युक्ति बता रहे हैं ।

अनबनि वानी चार प्रकार । काल सन्धि झाई औ सार ॥

अब इनकी पहचान बतलाते हैं —

कालशब्द ।

अक्षर पूजा सेवा जाप । और महात्म जेतें थाप ॥

यही कहावत अक्षर काल । जाय गडी उर होयके भाल ॥

(२६)

[ शब्दावली—

सन्धिशब्द ।

ओहं सोहं आतमाराम । भाया मंत्रादिक सब काम ॥ यहि सब अक्षर संधिक कहै । जेहिमा निशिवासर जिव रहे ॥

झाईशब्द ।

निर्गुण अलख अकह निरवान । मन बुधि इन्द्रीय जाय न जान ॥ विधिनिशोध जहैं बनत न दोय । कह कबीरपद झाई सोय ॥

— इनमेंसे —

भरमिक संधि झाई औ काल । सारशब्द काटे भ्रमजाल ॥

— इस लिये —

परे जीब तेहि जमकी धार । जौलौं पावे शब्द न सार ॥

— इसहेतु —

जीब दुसह दुख देखि दयाल । तब प्रेरी प्रभु परख रिसाल ॥

शब्दकुंजी.

विशेष जाननेके लिये इसी ग्रन्थमें छपे हुए शब्द कुंजी (अथवाभूलरमैनी जिसको बहुधा लोग सताइस रमैनी भी कहते हैं—) को गुरुमुख द्वारा विचारना चाहिये । क्योंकि.

बंद उर्दधि बिनु गुरु लखे, लागत लौन सखान ।

बाबर गुरुमुख द्वार ह्वै, अमृत सूं अधिकान ॥

आजकल छापा होने और ग्रन्थोंके सहजमें मिलनेके कारण और स्कूलोंकी बाहुल्यतासे, लोग अक्षर पढ़ना सीखकर ग्रन्थोंको आपही आप पढ़कर, बिना समझे बूझे ही स्वतः गुरु बन बैठें हैं । इसीलिये जहां देखिये वहां नास्तिकताका प्रचार होकर प्रायः सब पंथ और सम्प्रदायवाले, भवसागरमें उबड़ुब कर रहे हैं ।

यथार्थ भावको समझे विनाही, मिथ्या पक्ष धारण कर लोग मनमती बन गये हैं; उनको इतनी समझ ही नहीं है कि, पक्षपातके सिवाय भवसागर दूसरा है ही नहीं ।

पक्षहि भवकर जानिये, दूसर भव है नाहि ।

जन्म भरण सुख दुख सुभाव, तिन्हें अभावहि काहि ॥

कबीरके नाम, उनके नामसे वाणीका प्रचार भारतके कोने कोने पाया जाता है । यह नहीं कि, बहुत दिन बीतने अथवा वर्तमान कालके रेल डाक और प्रेसके सुभीता के कारण इसका प्रचार हो गया हो, बरन कबीरकी वाणीका प्रभाव ही ऐसा है कबीरका उपदेशही ऐसा सार्वजनिक और निर्पक्ष था कि, उनके वर्तमान रहते ही,

उत्थानिका]

(२७)

साखी और शब्दोंका इतना प्रचार हो गया था कि, मारवाड और गुजरात आदि देशोंमें, उसी समय पद और वाणियों तथा साखियोंका संग्रह कर लोगोंने ग्रन्थरूप में बना लिया था.

थोडे दिन हुए हैं ऐसाही एक ग्रन्थ, रायबहादुर बाबू श्याम सुन्दर दासजीने नागरी प्रचारिणी सभाकी ओरसे छपाकर प्रकाशित कराया है—जिसका नाम कवीर ग्रन्थावली रखा है—बाबू साहबकी सम्मतिसे वह ग्रन्थ कवीर साहबके मगहरमें गुप्त होनेकी लीलाके पश्चात् केवल पचास वर्षकाही है. यद्यपि बाबू साहबकी दृष्टिमें उस समय कवीर साहबका अवसान हो गया था तथापि कवीर-पंथी और अन्यलेखकोंके प्रमाण से—कवीर साहबने मगहरमें अन्तिम लीला करके भी शरीर नहीं छोड़ा था. यों तो जब आप अपनेको शब्दरूपही कहते हैं तब आपके शरीर छोड़नेकी बात ही क्या है.

क्योंकि,

पांच तत्त्वसे है नहीं, स्वासा नाहि शरीर ।

अस अहार करता नहीं, ताका नाम कबीर ॥

तथापि अपने हिन्दू मुसलमान शिष्योंकी परीक्षा करनेके लिये, आपने मगहर में लीला दिखाई थी और शिष्योंको जो उपदेश देना चाहा सो दे चुकनेपर तत्कालही आप उसी शरीरसे मथुरामें प्रकट हुए और वहांसे अमर कंटक आदि स्थानोंमें अपना अमर चिह्न छोड़ते हुए चांधोगढ़ पहुँचे और धर्मदासजीको उपदेश दे जगन्नाथकी ओर चले गये ।

इससे यह सिद्ध होता है कि, बाबू साहबने जो ग्रन्थ छपवाया है वह जिस सम्बतका लिखा हुआ है उस समयमें कबीर साहब उसी काशीवाले शरीरसेही वर्तमान थे और कवीर साहबके इतने निकट समय या वर्तमानमें ही ग्रन्थ लिखे जानेके कारण, बाबू साहब कवीर साहबकी वाणीकी भाषाको भी वैसी ही समझते हैं जैसी उस ग्रन्थमें लिखी है और इसी दृष्टिसे आपने उसे वैसीही छपवाया है ।

किन्तु यह किसीसे छिपी नहीं है कि, कवीर साहब अपना केंद्र काशी ही बनाकर वहांही प्रकट हुए और वहांकीही प्रचलित हिन्दी भाषामें आपने वाणीका भी प्रकाश किया था. तथापि मारवाड देशमें जाकर वाणी मारवाडी मिश्रित क्यों हो गयी ? इसका कारण यह हो सकता है :-

(१) कबीर साहबका उपदेश इतना सर्व प्रिय था कि, आपके वर्तमान रहतेही देश देशान्तरोंके लोग, उपदेश और वाणी सुनकर लिख लेते और बड़े प्रेम से रखते थे और अपने स्वाभाविक उच्चारणके अनुसार उसे गाते और बोलते

(२८)

[शब्दावली—

भी थे जिससे उसी उसी देशके उच्चारणके अनुसार लिखनेमें वाणीका रूपभी वैसाही बनता गया। जैसे आजकल भी गुजरात या महाराष्ट्र प्रान्तमें हिन्दी भाषा या हिन्दी भाषाकी कविताकी दशा है। और गुजराती या मराठीभाषावाले अपने स्वाभाविक उच्चारणके कारण विशेष नामोंको भी अपने उच्चारणके अनुसारही लिखते और बोलते हैं। दृष्टान्तके लिये संयुक्त प्रान्तके “मेरठको लिजिये आजकल प्रसिद्ध मेरठ कैंसके कारण वर्तमानपत्रोंमें मेरठका नाम बारम्बार आता है इतना प्रसिद्ध नामहोनेपर भी गुजराती पत्रवाले मेरठको “भीरत” ही लिखते हैं।

इसी प्रकारसे यदि कवीरसाहबकी वाणी उस समय मारवाड आदि देशोंमें जाकर मारवाडी आदि उच्चारणोंवाली होगयी हो तो कौन आश्चर्यकी बात है।

मैंने मारवाड, पञ्जाब, सिन्ध, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, बंगाल, आसाम, भूटान, नेपाल और बिहार आदि प्रान्तोंके भ्रमण कालमें देखा है, हिन्दीमें और शुद्ध हिन्दीभाषामें छपे हुए ग्रन्थोंको जिस जिस प्रान्तके लोग पढ़ते हैं, उस प्रान्तके टोन (स्वर) का प्रभाव उन ग्रन्थ और वाणियों पर ऐसा पड़ता है कि, सुननेवालोंको वह उसी देशकी भाषामें लिखा जान पड़ता है।

गत वर्ष जब मैं वंशधरकी गद्दीके सर्वमेष समस्त आचार्य श्री १०८ पं श्रीकाशी दास साहबजीके साथ तिरहुतके कतिपय स्थानोंमें भ्रमणको गया था, तब वहाँके भावुक सेवक सती और साधुओंके, प्रेम मग्न भजनकीरतन को देखकर अत्यन्त प्रसन्नता और प्रभावका अनुभव करता था। किन्तु शुद्ध हिन्दी भाषामें छपे हुए शब्दोंको भी जब वे गाने लगते थे तब, उनका उच्चारण ठीक तिरहुतिया भाषाके समान सुन पड़ता था, इतनेही नहीं शब्दोंके क्रियापद आदिको भी वे अपने प्रांतिक रूपमें बदलकर बोलते थे कारण मात्र यही है कि, वे थोड़े पढ़े लिखे लोग अपने स्वभाव और आदत तथा प्रेमके वश होकर शुद्ध अशुद्धिका विचार किये बिनाही प्रेममें मग्न होकर भजनमें लीन होते और लिखते भी हैं।

इसी प्रकार मारवाड और पंजाबवाले पानीको पाणी आदि उच्चारणके अभ्यासके कारण शब्दोंको अपने प्रांतिक टोनमें बदल लेते हैं। गुजराती और काठियावाड वालों का कहनाही क्या, जिस समय वे तम्बूरा और मजीरेकी गगन भेदी झंकारमें मस्त होते हैं—“कहत कवीरा सुनोभाई साधो” के गानमें ऐसे

उत्थानिका । ]

(२९)

लीन होजाते हैं कि, जो कुछ वह गाते हैं चाहे वह किसी भाषाका हो सब उन्हें काठियावाडी या गुजरातीही जान पडती है ।

इसी प्रकार दक्षिणी मराठी भाषाभाषी जिस समय “कबीरांचे दोहरे” और पदे” की हांक लगाते हैं, उस समय कबीर उन्हें खास मराठी भाषाभाषीही जान पडते हैं, और कबीरके शब्दोंका उच्चारण ठीक मराठी जैसा जान पडता है, इसी प्रकार महाराष्ट्रके पढे लिखे लोग भी जब कभी अपने ग्रन्थ या भाषण आदिमें कबीरकी साखी आदि कोट करते हैं वहाँ उसमें इतना मराठीपन आजाता है कि, फिर उसे हिन्दीभाषाभाषी कबीरकी वाणी कहनेसे हिचकते हैं इत्यादि । ( २ ) यदि उपर्युक्त विवेचनके विरुद्ध कोई ऐसा समझता हो कि, कबीर जिस जिस देशमें गये, उस उस देशकी भाषामें ही, उन्होंने वहाँके लोगोंको उपदेश दिया, तो यह बात भी उनका महत्त्वही प्रकट करती है—

किन्तु मेरा निश्चय है कि, कबीरसाहबने जो कुछ कहा है वह सब उससमय की प्रचलित हिन्दीमेंही कहा है

इसी विचारको लेकर मैंने भारतके अनेक प्रान्तोंमें घूमकर सहस्रों कबीर-पंथी ग्रन्थोंका संग्रह किया है—जिसमें एकही नामके ग्रन्थकी भिन्न भिन्न प्रान्तोंमें लिखी अनेक प्रतियाँ मिली हैं। अब जब मैं उनका मिलान करने बैठता हूँ तब वाणी एक होनेपरभी लिखावट और उच्चारणमें बहुत अन्तर जान पडता है और जिस समय उस उस प्रान्तके लोग अपने अपने प्रान्तके लिखे ग्रन्थोंको पढ़ते हैं, उस समय सुननेसे औरही भाव अन्तःकरणमें उदय होता है ।

इस प्रकारके कई दृष्टान्त इस ग्रन्थके बीच बीचमें या अन्तमें लिखकर पाठकोंका मनोरंजन करूंगा,

लिखते लिखते मैं कहींका कहीं चला गया—इसलिये अब प्रकृत विषय पर आता हूँ ।

शब्दावली ।

यों तो—कबीरकी शब्दावली—कबीर साहबना भजन, कबीरांचे पदे और दोहरे आदि नामसे सैकड़ों पुस्तकें लाखोंकी संख्यामें हरसाल छपती और छोटे २ जंगली देहातों बाजारों और बड़े २ शहरोंतक बिकती रहती हैं और हिन्दू मुसलमान ईसाई इत्यादि सभी धर्मके लोगोंकी जवानपर कबीरकी साखी मसले वर्तमानही रहते हैं, किन्तु “शब्दावली” के नामसे बड़ी पुस्तक एकही छपी है—जिसकी दो आवृत्ति आजतक हो चुकी है ।

उस शब्दावलीमें केवल कबीर साहबही नहीं वरन बहुतसे लोगोंकी वाणीका