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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

शकध्वजोत्सव वर्णन

३८२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ शकध्वजोत्सव वर्णन और्व ने कहा-इससे अनन्तर हे राजेन्द्र! अतएव आप शक्रोत्थान ध्वजोत्सव का श्रवण कीजिए जिसको सम्पादित करके राजा किसी समय में भी पराभव की प्राप्ति नहीं किया करता है । हरिस्थ परिवार के दिन श्रवण से युक्त द्वादशी तिथि में राजा को इन्द्रदेव का समाराधन करना चाहिए । इसको भली भाँति करने से सब प्रकार के विघ्नों की उपशान्ति हुआ करती है । राज परिवार नाम वाला जिसका वासु नाम दूसरा है, नृप इसे करे । यह पिछले समय में अतुल यज्ञ प्रवृत्त हुआ था । नभ मास में, वर्षा ऋतु में, द्वादशी तिथि में, शुक्ल पक्ष में, पुरोहित बहुत प्रकार के वाद्यों और तूर्यों से समन्वित हो । सबसे प्रथम इन्द्र के केतु के लिए वृक्ष को आमन्त्रित करके उसको वर्धित करना चाहिए । सम्वत्सर और वार्धकि मंगल कौतुक किया हुआ हो । उद्यान में, देवता के आगार में, श्मशान में और मार्ग के मध्य में जो भी तरुवर समुत्पन्न हों उनका वायस ध्वज में वर्जन कर देना चाहिए । जो बहुत वल्लियों से संयुत हो, शुष्क हो, बहुत से काँटों से समन्वित हो, कुब्ज अर्थात् टेढ़ा हो वृक्षादनीय युक्त हो तथा लताओं से छन्न तरु हो उसका परित्याग कर देना चाहिए । जो वृक्ष पक्षियों के निवास से समाकीर्ण हो अर्थात् जिस पर बहुत से पक्षियों के घोंसले हों, जो बहुत कोटरों से समन्वित हो, जो वायु और अग्नि से विध्वस्त हो गया हो ऐसे तरु को यत्नपूर्वक वर्जन कर देवे । जिन वृक्षों का नाम नारी वाला हो, जो अत्यन्त छोटा हो, जो बहुत ही कृश हों । ऐसे इन सभी वृक्षों का धीर पुरुष इन्द्र के पूजन में सदा ही वर्णन कर दे । अर्जन, अश्वकर्ण, प्रिय कोषरु, औदुम्बर, ये पाँच वृक्ष केतु के लिए उत्तम बताए गए हैं, और अन्य देवदारु आदि तथा शाल आदि वृक्ष जो भी प्रशस्त हैं उनका परिग्रहण करना चाहिए और जो अप्रशस्त हैं उनका कभी भी ग्रहण न करे । वृक्ष को पकड़ करके रात्रि में स्पर्श करके इस निम्न कथित मंत्र का पाठ करना चाहिए, जो प्राणी वृक्षों पर है उनके लिए कल्याण हो और आपको

नमस्कार है । राजा आपका वरण करता है । हे नृपोत्तम! कल्याण हो । देवराज इन्द्र की ध्वजा के लिए इस पूजा का परिग्रहण करिए । इसके अनन्तर दूसरे दिन में उसका छेदन करके फिर आठ अंगुल मूल का ग्रहण करे तथा आगे की ओर से चार अंगुल को छेदन करके उसे जल प्रक्षिप्त कर देवे । फिर पुर के द्वार पर ले जाकर वहाँ पर केतु का निर्माण करके भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि में केतुका वेदी प्रवेश करना चाहिए । बाईस हाथ के मान वाला केतु अधम कहा जाता है । बत्तीस हाथ के मान वाला उससे ज्येष्ठ होता है । बयालीस हाथ के मान वाला भी होता है । इससे भी अधिक बावन हाथ के मान वाला उत्तम कहा गया है । हे नृप श्रेष्ठ! इन्द्र की पाँच कुमारियाँ करनी चाहिए । वे सब शालमयी हों और दूसरी शक्र मातृकाऐं होनी चाहिए । केतु के सेतुपाद के प्रमाण वाला तथा मन्त्री के दो हाथ करे । इस रीति से कुमारियों की रचना करके और मातृका तथा केतु को करके एकादशी तिथि में शुक्ल पक्ष में उस यष्टि की अधिवासित न करे । फिर यष्टि का अधिवास करे तो जो 'गन्ध द्वारा' आदि मन्त्रों के द्वारा किया जाना चाहिए । भगवान् अच्युत का अर्चन करके पीछे शुक्रदेव का पूजन करना चाहिए । इन्द्रदेव की प्रतिमा का निर्माण के स्वर्ण द्वारा अथवा काष्ठ के द्वारा करना चाहिए । अन्य किसी उत्तम धातु के द्वारा निर्माण करावे अथवा सबके अभाव में मृत्तिका से परिपूर्ण करे । उस प्रतिमा को मण्डल के मध्य में स्थापित करके विशेष रूप से अर्चन करे । इसके अनन्तर किसी परम शुभ मुहुर्त में राजा केतु को उत्थापित करे । हे पुरन्दर! आप हाथ में वज्र धारण किए हुए हैं । आप असुरों के हनन करने वाले हैं, आपके बहुत नेत्र हैं । समस्त लोकों के कल्याण करने वज्र के लिए यह पूजा ग्रहण कीजिए । हे अमरों के स्वामिन्! आप सबके धारण करने वाले हैं और सभी देवगणों के द्वारा अभिष्टुत हैं आप यहाँ पर आगमन कीजिए, यहाँ पदार्पण करिए । आप श्रवण के आद्यपाद से समुत्थित हुए हैं, आप इस पूजा का ग्रहण कीजिए । हे

३८४ ६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ राजन् ! आपकी सेवा में नमस्कार समर्पित हैं । इस रीति से उत्तम तन्त्रों में वर्णित दहन और पावन के आदि के द्वारा इस मन्त्र से और तन्त्र से तथा अनेक नैवेद्यों के निवेदनों से, अपूपों से, पायस से, पान, गुड़ और अनेक तरह के भक्ष्यों से, भोज्यों से श्री की विशेष वृद्धि के लिए पूजा करनी चाहिए । घट दिक्पालों को और ग्रहों का अर्चन करे । अनुक्रम से साध्य आदि समस्त देवों का और सब मातृकाओं का पूजन करना चाहिए । इसके अनन्तर किसी शुभ मुहूर्त में वर्धकि से समन्वित ज्ञानी यज्ञवेदी के पश्चिम में केतूत्थापन की भूमि में विप्रों और पुरोहितों के साथ राजा गमन करे । सुमंगल पाँच रज्जुओ से सुबुद्ध मन्त्र से श्लिष्टा मातृकाओं के सहित, कुमारियों से संयुक्त और दिक्पालों के पादकों युत, वृहन्, अतिकान्त सुपूरित अनेक द्रव्यों से यथावर्ण और यथादेश में वस्त्र से वेष्टित किए हुए हैं । योजिंतों से युक्त उसको जो किंकिणी के जलों से तथा बड़े घण्टाओं से और चामरों से भूषित तथा रत्नों की माला से अलंकृत अद्भुत माल्यों और अम्बरों से तथा चारों तोरणों से राजकीयों के द्वारा धीरे-धीरे महाकेतु को उत्थाथित करे । मण्डल में पूजित उस महाकेतु को उठाकर इन्द्रदेव का चिन्तन करते हुए उस प्रतिमा को केतु के मूल में ले जावे । वहाँ पर पूर्व की ही भाँति उसका यजन करे तथा शची माताल, उसके पुत्र जयन्त और ऐरावत का भी अर्चन करना चाहिए । ग्रहों, दिक्पालों, सर्पों, गणदेवों अश्वों, वलियों के द्वारा और पायस आदि से पूजन करना चाहिए । अर्चन किए हुए देवों को निरन्तर होम का समाचरण करे । होम के अन्त में बलि देवे जो महात्मा वासव के लिए देनी चाहिए । हे नरोत्तम! तिल, घृत, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, इनके द्वारा अपने-अपने मन्त्रों से देवों का हवन करना चाहिए । इसके उपरान्त होम के अन्त में ब्राह्मणों को भोजन करावे । इस रीति से सात रात्रि पर्यन्त दिन-दिन में नित्य भली भाँति अर्चन करना चाहिए । देवों और वेदांग शास्त्रों के पारगामी विद्वान ब्राह्मणों के सहित राजा सर्वत्र इन्द्र की पूजा

६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ ३८५ में कीर्तित किया गया है । 'त्रातारम्', यह मन्त्र इन्द्र का परम प्रिय है । इस प्रकार करके दिवा के भाग में शक्र का उत्थापन करे । श्रवण नक्षत्र से युक्त द्वादशी तिथि में राजा को स्वयं भरणी के अन्तिम चरण में रात्रि में शक्र का विसर्जन करना चाहिए । हे नृप शार्दूल! इस कारण से नृप शक्र का विसर्जन का यह मन्त्र कहा गया । सुर-असुर गणों के साथ पुरन्दर क्रतु इस उपहार को ग्रहण कर, हे महेन्द्रध्वज! गमन कीजिए । सूतक के उत्पन्न होने पर भौम अथवा शनिवार में, भूकम्प आदि उत्पात के हो जाने पर वासव को विसर्जन नहीं करना चाहिए । उत्पात होने पर तथा उपप्लव के दर्शन होने पर सात रात्रि को व्यतीत करके तथा शनिवार और भौमवार को छोड़कर अन्य नक्षत्र में भी विसर्जन कर देना चाहिए । सूतक के सम्प्राप्त हो जाने पर सूतक के अन्त में जिस किसी भी दिन में विसर्जन कर दे । राजा के द्वारा उसी भाँति क्रतु की रक्षा करनी चाहिए जिससे हे नृप शार्दूल! क्रतु पर शकुन पतन न करें । जब तक उसका विसर्जन न हो । जिस प्रकार से आदि से उत्थापन हो धीरे-धीरे पातन करना चाहिए । क्रतु के भग्न होने पर मृत्यु की प्राप्ति होती है । हे नृप! अलंकारों के सहित विसर्जन किए हुए शक्रकेतु को रात्रि में अगाध जल में निम्न वर्णित मन्त्र के द्वारा प्रक्षिप्त कर दे । हे महाभाग केतु! आप विघ्नों के विनाश करने वाले हैं । समस्त लोकों के भव के लिए आप जब तक सम्वत्सर हो जल में स्थित रहें । समस्त लोकों के आगे सूर्य की ध्वनि के साथ उत्पादन करे और एकान्त में केतु का विसर्जन करना चाहिए । यही पूजन में विशेषता है । इस रीति से महात्मा वासव की जो पूजा किया करता है वह बहुत समय तक पृथ्वी का उपयोग करके अन्त में वासव (इन्द्र) के लोक की प्राप्ति किया करता है । उसके राज्य में कभी दुर्भिक्ष नहीं हुआ करता है और कहीं पर भी व्याधियाँ तथा आधियाँ नहीं होती हैं तथा मनुष्यों की अकाल में कभी मृत्यु भी नहीं हुआ करती है । पार्थिव! उसके समान अन्य कोई भी इन्द्रदेव का

३८६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ प्रिय नहीं होता है । उसकी पूजा सब की पूजा है । भगवान् केशव आदि वहाँ पर ही सब विराजमान रहा करते हैं । समस्त कलुषों का अपहरण करने वाला व्याधि और दुर्भिक्ष का नाशक, सकल भवों का विशेष, सब प्रकार के सौभाग्य का सम्पादन करने वाला, शक्रकेतु का सुरपति के गृह की वाणियों से वाचनप्रिय शरत्काल में अनेकोपचारों के द्वारा श्री वृद्धि के लिए पूजन करना चाहिए ।

राजा के पालनीय नियम

और्व ने कहा-हे नृप! ज्येष्ठ मास के दशहरा में भगवान् विष्णु की इष्टि के विषय में अब आप श्रवण जिस विधि से नृप को सदा भगवान् विष्णु इष्टि करनी चाहिए । प्रतिवर्ष राजा को भगवान् हरि की सुवर्ण की प्रतिमा का निर्माण करना चाहिए अथवा किसी अन्य उत्तम धातु के द्वारा बनवाये या काष्ठ की अथवा शिलामयी प्रतिमा की रचना करानी चाहिए । शिल्पों के द्वारा उसका निर्माण करावे और मानोन्मानो से उसकी विधि के साथ प्रतिष्ठा करनी चाहिए । उसकी संस्थापना किसी देवालय में करावे या स्वयं द्वारा निर्मित देवालय में करे । पूर्व में वर्णित विधि से वासुदेव के बीच से सभी उपचारों के द्वारा भक्ति के द्वारा वासुदेव भगवान् का अभ्यर्चन करे । पूजा के अन्त में संस्कार किए हुए अग्नि में जो कि कुण्ड के मध्य में स्थित होवे फिर द्विज घृत से हरि भगवान् की प्रिय एक सहस्र आहुतियों से हवन करे । द्विज भली भाँति वासुदेव का पूजन करके फिर होम करे । नृप की अनुमति से उस प्रतिमा को मण्डल में ले जावे । प्रतिमा के दोनों कपोलों का दाहिने हाथ से स्पर्श करना चाहिए । उस प्रतिमा में हरिदेव की प्राण प्रतिष्ठा करे । हे नृप श्रेष्ठ! प्राणों की प्रतिष्ठा के करने पर भगवान विष्णु के प्राण नियत रूप से उस प्रतिमा में आ जाया करते हैं । प्राणों के समागत हो जाने पर इस प्रतिमा में नियत रूप से देवत्व हो जाया करता है । प्राणों की प्रतिष्ठा न करने पर प्रतिमाओं में जैसा पहले भाव होता है वैसे ही स्वर्ण आदि भाव

बना रहता है और उनमें विष्णु का भाव नहीं होता है । हे पार्थिव! अन्य देवों की भी प्रतिमाओं में भी प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए तभी उसमें देवत्व की सिद्धि हुआ करती हैं। प्राण स्थान के बिना सदा सुवर्ण-सुवर्ण ही रहता है, शिला-शिला है और काष्ठ केवल काष्ठ ही रहा करता है । सभी अपने ही स्वरूप में रहते हैं । वासुदेव के बीज से, 'मद्विष्णोः' इत्यादि से तथा अंग, अंगी मन्त्रों के द्वारा भगवान हरि की प्रतिष्ठा का समाचरण करना चाहिए । उसी भाँति मन्त्रों का ज्ञान रखने वाला हृदय में निरन्तर अंगुष्ठ को देखकर इन मन्त्रों के द्वारा प्रतिष्ठा करके हृदय में भी समाचरण करे । इसके लिए प्राण प्रतिष्ठा हों, इनके लिए प्राण क्षरण करें, यह देवत्व की संख्या के लिए स्वाहा, यह यजु का उच्चारण करें, वैदिक अंग मन्त्रों से और मन्त्रों से और इनके द्वारा सर्वत्र प्रतिमाओं में प्राणों की प्रतिष्ठा का समाचरण करना चाहिए । मन्त्रों के ज्ञान रखने वाले पुरुष की प्रतिमा के पूजन में आत्मा में भी करना चाहिए । पूजा के भाग की विशुद्धि के लिए प्रथम प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए । इसमें प्राण प्रतिष्ठा का प्रतिमा के पूजन के बिना किसी भी बुध पुरुष को नहीं करना चाहिए । नृपश्रेष्ठ दशमी में इस भगवान विष्णु की इष्टि को करके उसके पूर्ण हो जाने पर ही फिर उस प्रतिमा को स्थापित करे । इस प्रकार से राजा दशहरा में हरि भगवान् की इष्टि को करके सभी मनोरथों की प्राप्ति कर लिया करता है और वह विघ्नों से भी रहित होता है । श्री पञ्चमी में भी देवी का कुन्द के पुष्पों के द्वारा उस समय में प्रकृष्ट रूप से पूजन करना चाहिए । गजराज पर संस्थित वासव का उत्तम उपहारों के द्वारा अर्चन करे । यहाँ पर पूजन में भी वासव का पहले कहे हुए लक्ष्मी के महातन्त्र का ग्रहण करना चाहिए और क्रम के अनुसार मण्डल आदि का भी ग्रहण करे । इस प्रकार से पूजन के करने पर और श्री पञ्चमी में विशेष रूप से किए जाने पर नृप श्री से समन्वित होता है और कभी भी श्री की हानि को नहीं प्राप्त किया करता है । हे पार्थिव! यह समाचार

३८८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ विशेष मैंने आपके सामने वर्णित कर दिया है और निषेध में विशेषों का श्रवण कीजिए जिससे श्री के द्वारा इष्ट किया जाता है । भगवान् विष्णु का भली-भाँति पूजन न करके तथा दान न देकर राजा को कभी भी भोजन नहीं करना चाहिए । पुरोहितों के द्वारा नित्य अग्निहोत्र का हवन करना चाहिए । अग्निहोत्र न करके भोजन करने वाला नरक की प्राप्ति किया करता है । रत्नदीप से रहित अरक्षित गृह में राजा को स्त्री के साथ शयन नहीं करना चाहिए और कभी वहाँ बैठना भी नहीं चाहिए । अन्न खाकर श्रीफल का अशन न करके तथा नृप धात्री फल को भी न खावें । माष, आसन और मृत्तिका ये सब बुद्धि का क्षय करने वाले होते हैं । नृपों में उत्तम को प्रतिदिन बुद्धि के जो हेतु हों उन्हीं का भक्षण करना चाहिए । राजा को यान पर विहीनआसन प्रारोहण नहीं करना चाहिए । जो आसनों से हीन हो ऐसे यान पर, अश्व और हाथी पर भी आरोहण नृप न करे । किसी भी समय में राजा एक अकेला निर्जन वन में विचरण न करे । राजा को चाहिए किसी भी समय भोजन में मद के कारण पदार्थ का अशन न करे । अष्टमी तिथि में कभी भी माँस और मैथुन का सेवन न करे । दशश्राद्ध, गया श्राद्ध, तिलों से तर्पण, वह राजा न करे जिसका पिता जीवित हो । ऐसा करके पाप को प्राप्त किया करता है । राजा को राज्य पर क्षेत्रज्ञ तनयों का अभिषेक नहीं करना चाहिए जबकि और सुपुत्र हो तो उसके होते हुए पितृगणों की शुद्धि के लिए और सुपुत्र का ही अभिषेक करे । औरस, क्षेत्रज, दत्तक, कृत्रिम, गूढ़ोत्पन्न अपविद्ध ये पुत्र भाग के योग्य हुआ करते हैं । कानीन् (कन्या से उत्पन्न), सहोढ़, क्रीत (धन देकर खरीदा हुआ), पौनर्भव, स्वयंदत्त और दास, ये छः पुत्र पाँसुल होते हैं । पूर्व पूर्वों के अभाव में दूसरों का अभिषेक करे । जो पौनर्भव स्वयंदत्त और दास हो उसका कभी भी राज्य में योजन नहीं करे । दत्तक आदि पुत्र भी जो निज गोत्र के द्वारा संस्कार किए गए हों वे अन्य के वीर्य से समुत्पन्न हुए पुत्रता को प्राप्त हुआ करते हैं । पिता के गोत्र से राजा का जो पुत्र

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३८९ संस्कार किया हुआ है वह चूड़ाकर्म संस्कार निजगोत्र से संस्थित होंवे वे दत्तक आदि पुत्र होते हैं अन्यथा दास कहा जाया करता है । हे नृप! पाँचवे वर्ष से ऊपर दत्तक आदि पुत्रों को ग्रहण करके प्रथम पाँच वर्षीय पुत्रेष्टि का समाचरण करना चाहिए । पौनर्भव पुत्र को जैसे ही समुत्पन्न हो उसे समानीत करे । मनुष्य को चाहिए कि जातकर्म आदि समस्त संस्कारों को करे । पौनर्भवष्टोम के करने पर पौनर्भव कहा गया है । पिता का एकोद्दिष्ट श्राद्ध नहीं करना चाहिए । जो मूल्य के द्वारा वनिता खरीदी गयी हैं वह वनिता दासी कही जायी करती है, उसमें जो भी पुत्र समुत्पन्न होता है वह पुत्र दास कहा गया है । वह राजा के राज्य का भागीदारी हुआ करता है किन्तु विप्रों के श्राद्ध करने वाला नहीं होता है । राजा उसका नियोजन करके उससे तामिस्र नामक नरक में जाया करता है । राजा को चाहिए कि वह काण्याव्यं अर्थात् विशेष अंग वाला अथवा अंगहीन, पुत्र रहित, अनभिज्ञ, अजितेन्द्रिय, बहुत छोटे कद वाला, रोगी को कभी अपना पुरोहित न बनावे । राजा को चाहिए कि वह कभी कृपण के धन को ग्रहण न करे । द्विजों को बहुत अधिक धन भी नहीं देवे । राजा कभी कामुक और उन्मत्त हाथी पर आरोहण न करे । उस कामुक पर समारोहण करके इस लोक और परलोक में विषाद को प्राप्त किया करता है । सम्पूर्ण धन के द्वारा राजा को अपनी आयु की वृद्धि के लिए यत्न करना चाहिए । किसी भी क्रूर वार के दिन अष्टमी और षष्टी तिथि में उत्तम नृप को अञ्जन, अभ्यञ्जन और ताम्बूल का भी भोजन नहीं करना चाहिए । चन्द्रमा और सूर्य का ग्रहण अतीव सूक्ष्म होवे या पूर्ण हो तो राजा को रक्तसूर्य का स्वयं अवलोकन नहीं करना चाहिए । जो उत्पात उत्पन्न होता है चाहे वह दिव्य हो, भूमिगत हो या आकाशगत हो यत्नपूर्वक उसे राजा को नहीं देखना चाहिए और यदि देख भी लेवे तो तीन दिन भोजन नहीं करे । राजा सर्वदा मंगल रत्न को धारण करे और दूर्वा के सहित ही पहने । राजा कभी भी वस्त्र से न ढके हुए शरीर को विप्रों

३९० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ के लिए न दिखावे । पानी में अपने मुख को न देखे, पर्वों में माँस न खावे । खर, उष्ट्र, वासी और गुव्विणी पर आरोहण न करे । इस प्रकार से नये शास्त्र से संयुत राजा चतुरंग को वर्धित करता हुआ अपने आप की निरन्तर रक्षा करके सदा वीर्य का वर्द्धन करे । जो भक्ष्य बीज के क्षय करने वाला होवे उसकी, भोज्य को, पानक, क्षार, शाक आदि, बहुत खट्टे और बहुत तिक्त, (चरपरा) का वर्जन कर देना चाहिए । कांसे के पात्र में और चाँदी के पात्र में स्थित तथा नदी का जल मूत्र की वृद्धि करने वाला है तथा वीर्य के क्षय करने वाला है इसको वर्जित कर देवे । ताम्र, लोहा, सुवर्ण, शीशा के पात्र में स्थित तथा फल और चर्म में स्थित जल वीर्य की वृद्धि करने वाला होता है ऐसे ही जल का यत्नपूर्वक सेवन करना चाहिए । सम्पूर्ण मूल कृत्यों में और सदाचारों में स्थित रहने वाला इस लोक में अनेक भागों का उपभोग करके परम इन्द्र के स्थान को प्राप्त किया करता है । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-मुनियों में परम श्रेष्ठ और्व ने इस रीति से राजा सगर को शासित किया था और उन्होंने सब शास्त्रों को गुह्यकों को और सदाचारों को बहुत बार महात्मा सगर राजा को कह कर सुना दिया । राजनीति, सत्पुरुषों की नीति और जो भी कुछ शास्त्रों में सम्भव है संहिताओं में पुराणों में और जो आगमों के समुदाय में हैं राजा सगर ने सभी कुछ धीमान् और्व के मुख से श्रवण किया था । हे द्विजश्रेष्ठ! उनका कुछ उद्धृत करके कहा था । राजनीति, सदाचार, वेदों और वेदों के अंगशास्त्रों से संगत विष्णु का रहस्य है । हे द्विज श्रेष्ठों उसका वीक्षण कर लें । अन्य स्थल में जो नहीं कहा है अथवा संशय के सहित का है, हे द्विजो! उनमें आप लोगों के लिए सम्पूर्ण संशयों का छेदन करने वाला कालिका पुराण है । जो विप्र इसका निरन्तर अभ्यास किया करता है वह वेदों के पठन का फल प्राप्त किया करता है । सदाचार वर्णन ऋषियों ने कहा-संक्षेप से सदाचार और राजनीतियों में विशेष जो और्व ने राजा से जिस तरह से कहा था वह आपके वचन से श्रवण

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३९१ किया है । फिर सबसे बाहुल्य विष्णुधर्मोत्तर तन्त्र में सदाचार देखना चाहिए वह आपके ही प्रसाद से देखने के योग्य हैं । फिर जो हमको संशय है जो पहले आपके ही द्वारा नहीं कहा गया है । हे विप्रेन्द्र ! उस छेदन कीजिए । हम आपसे पूछते हैं । हमारे हृदय में बहुत ही अधिक कौतूहल है । वेदों और लोक में भी यह सुना जाता है कि जो पुत्र रहित है उसकी गति नहीं होती हैं । प्राचीन समय में वेताल और भैरव तप के लिए पर्वत पर गए थे । पूर्व में वे दोनों ही दाराओं के ग्रहण करने वाले थे । उन दोनों के पुत्र नहीं सुने गए हैं । हे द्विजोत्तम! वे ही उत्पन्न नहीं हुए थे अथवा अनेक उत्पन्न हुए थे । उनका उत्तम स्थान में भली भाँति से श्रवण करने की इच्छा करता हूँ । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-हे द्विज सत्तमो! बिना पुत्र वाले की गति नहीं होती है यह निश्चित ही है । अपने पुत्रों के द्वारा अथवा भाई के पुत्रों द्वारा पुत्रों वाले स्वर्ग में गए हैं । हे विप्रों! के द्वारा अथवा भाई के पुत्रों द्वारा पुत्रों वाले स्वर्ग में गए हैं । हे विप्रों! वे दोनों उत्पन्न सन्तानों वाले वे धीर बेताल भैरव थे । अब मैं उन दोनों के वंशों को बताऊँगा । हे महर्षि गणों! आप श्रवण कीजिए । जिस समय में बेताल और भैरव दोनों भली-भाँति सिद्धि प्राप्त करके कैलाश के प्रति हर्षित होते हुए बोध करने वाला यह तथ्य वचन कहा था । नन्दी ने कहा-आप दोनों पुत्र सहित भगवान् शंकर के आत्मज हैं । पुत्र के जन्म लेने में यत्न कीजिए । समुत्पन्न पुत्र वाले की सर्वत्र सुलभ गति हुआ करती है । जो पुत्र से हीन पुरुष होता है वह पुन्नाम वाले नरक को देखा करता है । उसका मोचन करने के लिए तपों द्वारा तथा धर्म के द्वारा भी समर्थ नहीं हुआ करता है । केवल पुत्र के जन्म होने ही से उस नरक के छुटकारा होता है । उस कारण से आप दोनों ही देवयोनियों में पुत्र का उत्पादन करिए । आप दोनों की अमर्त्य हैं । इस कारण से जैसे-तैसे भी सुरयोनियों में पुत्रों का उत्पादन करके आप दोनों ही शिवा और शिव के प्रिय होंगे और अविलम्ब ही उनके भवन को प्राप्त होंगे ।

३९२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- नन्दी के वचन का श्रवण करके वे दोनों ही प्रसन्न मन वाले हो गए थे । इसके अनन्तर निरन्तर अपने हृदय में नन्दी के वचन को स्थिर करके वे दोनों ही इधर-उधर गमन करते हुए अपने पुत्रों के समुत्पन्न के लिए चेष्टा करने लगे थे । एक समय में इस भैरव ने हिमवान् पर्वत के प्रस्थ में परम सुन्दरी और श्रेष्ठ उर्वशी अप्सरा को देखा था । इसके उपरान्त परम कामुक होकर इसने उर्वशी से सुरतोत्सव की याचना की थी । वेश्या के भाव से परम प्रसन्न होती हुई उसने यथेच्छा कहा था । इसके अनन्तर भैरव ने उसके साथ सुरतोत्सव की क्रीड़ा की थी और वह प्रसन्न हुई उर्वशी में भैरव के तेज से सूर्य वाला सूर्य के समान प्रभा वाले सद्योजात पुत्र ने जन्म ग्रहण किया । उस पुत्र का परित्याग करके उर्वशी अपने स्थान को चली गयी थी । भैरव ने बहुत ही आनन्द से युक्त हो उस पुत्र का संस्कार कर गणधियों सहित करके उसका नाम उसने सुवेश रखा था । इसके अनन्तर उचित अवस्था के प्राप्त करने वाले और इन्द्र तथा सूर्य के तुल्य कान्ति से संयुत उस सुवेश का विद्याधरों के अधिपत्य में अभिषेक कर दिया था । उसने विद्याधरों के अध्यक्ष की अत्यन्त सुन्दरी पुत्री के साथ विवाह कर लिया था जो कि गन्धर्वों का राजा और धृतराष्ट्र नाम वाला था । उसमें परम सुन्दर रूरू नाम वाले पुत्र ने जन्म ग्रहण किया था । रुरु के पुत्र बाहु ने मैनाकी में जन्म लिया था । बाहु के चार पुत्र उत्पन्न हुए थे जिनके नाम तपन, अंगद, ईश्वर और कुमुद थे । कुमुद सबसे छोटा था । कुमुद का पुत्र परम सुन्दर पार्वती में उत्पन्न हुआ था जो महान् बलवान् देवसेन नाम वाला था । वह परम मनोहर देवसेन पृथिवी पर अवतीर्ण हुआ था । कोमल अंगों वाली अप्सरा यौवनाश्रव की केशिनी नाम वाली पुत्री का जो बहुत ही कोमल अंगों वाली अप्सरा के समान थी अपनी भार्या बनाने के लिए वरण किया था । यौवनाश्रव मान्धाता ने भी इन्द्र के वचन से अपनी पुत्री केशनी की इच्छा से ही देवसेन के लिए प्रदान कर दिया था । देवसेन ने केशिनी के साथ विवाह करके उसी को साथ में लेकर उसने शम्भु की पुरी

ൡ श्रीकालिका पुराण ൡ ३९३ वाराणसी में भगवान् शिव की आराधना की । भगवान् शिव परम प्रसन्न हो गए थे और अभीष्ट वरदान उसे दे दिया था । उसने भी भगवान् शम्भु से अपने अभीष्ट तीन वरदान प्राप्त किए थे । जब तक भगवान् भास्कर रहें तभी तक मेरी सन्तति स्थित रहेगी, इसी नगरी में मेरे ही वंश की राजता रहे । मेरे वंश पर आप नित्य ही परम प्रसन्न रहेंगे । इन वरों को प्राप्त करके महान् देवसेन ने ही भगवान् शंकर की प्रसन्नता से उस पुरी का चिरकाल तक उपभोग किया । देवसेन ने केशिनी के उदर से पुत्रों को जन्म ग्रहण कराया । अब आप लोग उन सातों के नामों का श्रवण कीजिए जो कि कीर्तित किए जा रहे हैं । सुमना, वसुदान, ऋतुधृक्, यवन, कृती, नील, विवेक, ये सात पुत्र थे जो समस्त शास्त्रों के विशारद थे । इसके अनन्तर समय पर देवसेन भी भार्या के सहित अपने पुत्रों पर राज्य का भार डालकर विद्याधर क्षय को चला गया था । इसके उपरान्त उसके पुत्र समुत्पन्न हुए थे । ये सभी शास्त्रों के अर्थ के पारगामी विद्वान् थे । उनके नाम सुमति, विरूप और सत्य थे । सुमति की कन्या और सत्य का पुत्र डिण्डिम हुआ था । विरूप का गाधि हुआ और गाधि का सुतमित्र नामक हुआ था । उसका राजा कल्प से विजय हुआ था जिसने सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत कर बहुत तेज वाले राजाओं का शक्र की अनुमति से सौ योजन का खण्डन किया था । जिसको सत्यसाची अर्जुन ने जो पाण्डु का प्रतापी पुत्र था, दग्ध कर दिया था। ऋषियों ने कहा-उसने भी योजन वाले खाण्डव वन को विजय किस तरह से किया था । इसको हम श्रवण करना चाहते हैं । हे तप के ही धन वाले! इसका आप वर्णन कीजिए । महर्षि मार्कण्डेय ने कहा-चन्द्रवंश से एक महान् बल और पराक्रम वाला, देखने में सुन्दर नाम वाला चारु रूप से संयुक्त और प्रताप वाला राजा हुआ था । उसने हिमवान् पर्वत के समीप में ही महान् वन को भंग करके सिंहों और व्याघ्रों को निकाल कर और कहीं पर तपस्वियों को भी हराकर साण्डवी नाम वाली परम शोभन नगरी का निर्माण किया था । वह तीस

३९४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ योजन विस्तार वाली थी और सौ योजन आयत की थी । उसकी चहार दीवारी उच्च थी और अट्टाल एवं अम्बुद तोरणों वाली थी । निम्न और अतीव दीर्घ परिघाओं ( खाई से समावृत थी ) । उसमें अनेक मनुष्य रहते थे और वह शत्रु वीरों से घृष्यमाण नहीं थी । उसमें बड़े-बड़े उपवन थे तथा बहुत सी अप्सराओं से समाकीर्ण थी । उसमें बहुत से आरामगाह ( उद्यान ) थे तथा उत्तम श्रेणी के मनुष्य निवास किया करते थे । जहाँ पर निरन्तर मनुष्य उत्सवों से समन्वित रहा करते थे जो दिवलों में स्थित देवगणों के साथ स्पर्धा किया करते थे । वहाँ के मनुष्य आनन्द से युक्त आद्य और भोगों से संयुत थे । उस सुदर्शन नाम वाले राजा ने भूमि का खनन और विदारण किया था । उसने गंगादेवी खाण्डवी का वहन कराया था । उसके द्वारा खोदे हुए मार्गों से खाण्डवी के मध्य को संप्लावित करके वक्रा और अनुवक्रा होकर सीता नदी की ओर वह जाया करती है । उसने समस्त युद्धों को जीतकर और बहुत-सा धन का आहरण किया था । उसने खाण्डवी को मध्य में अनेक प्रकार के रत्नों के द्वारा वश में कर लिया था । उस सुदर्शन नृप ने अन्यों के नगरों से मनुष्यों को वहाँ लाकर खाण्डवीं में हठ से भी निवासी बना दिया था । उस कृती ने देव, दानव और गन्धवों को युद्ध से जीत जीतकर देववृक्ष, देवरत्न, देवी और औषधियों को उस भूपाल सुदर्शन ने खाण्डवी में रोपित किया था । भगवान् विष्णु ने उस नृप सुदर्शन का उपचार किया था और प्रायःदेवों का तथा मनुष्यों का जयशाली वाराणसी के स्वामी विजय को कुत साचिव्य को युद्ध के लिए उसके बैर में योजित किया था । महान् बल और पराक्रम वाले विजय ने विवर की प्राप्ति करके नृप सुदर्शन का अबस्कन्द किया था । उस सुदर्शन ने विजय के अबस्कन्द को सहन किया था और चतुरंगिणी सेना से शीघ्र ही युद्ध सम्मुख हुआ था । फिर महात्मा विजय के साथ महान् युद्ध हुआ था । सुदर्शन का सेनानी जिसका नाम रुमणवान था जो बहुत अधिक वीर्यवान था । वह सोने के रथ पर सवार होकर विजय के सम्मुख हुआ

था। उद्यत आयुधों वाला होकर इसने उसकी सप्त अक्षौहिणी सेना को चारों ओर से घेर कर जितनी भी शत्रु की सेना थी उसको आक्रान्त कर दिया था। विजय का जो सेनानी था उसका नाम संजय था और वह रिपुओं का जीतने वाला था। नागों की सेना के द्वारा उसने सैनिकों के सहित रुमणवान् को ग्रहण किया। उन दोनों वीर सेनानियों का बहुत भारी युद्ध हुआ था। इसके अनन्तर रुमणवान् ने शूरों की ही भाँति बड़ी भारी गर्जना करते हुए ही बीस वाणों के द्वारा उसके धनुष को छिन्न कर दिया था। कृत हस्त की तरह क्षुरप्र के द्वारा उसके धनुष को छिन्न कर दिया था। उस सञ्जय ने भी उसी समय में धनुष लेकर तीन वाणों के द्वारा प्रहार किया था। वाणों से वेधन किया था और भाले से उसी क्षण में धनुष को काट दिया। आठ सौ हाथियों और तीन सहस्र अश्वों को सञ्जय ने अपने चारों ओर सुदारुण वाणों की वर्षा से शीघ्र ही मार गिराया था। इसके अनन्तर दूसरी ओर से धनुष ग्रहण करके बहुत ही अधिक कुपित हो गया था और भाले के द्वारा इसके सारथी का शिर शरीर से काटकर अलग गिरा दिया था। इसके अश्वों का चार वाणों के द्वारा विहनन कर दिया था। चतुर ने पाँच वाणों से सञ्जय को बेध दिया था। उसी क्षण में सञ्जय ने गदा लेकर अत्यन्त वेग से रथ से उतरकर रुमणवान् पर धावा बोल दिया था। उस आक्रमण करने वाले सञ्जय को द्रुतहस्त्वत् रुमणवान ने शरीरों की वर्षा के द्वारा संच्छादित करके सञ्जय को वारित कर दिया था। इसने गदा के फिराने से सिंह जैसे महान् गज हटा दिया करता है उसी भाँति शरों की वर्षा करने वाले रुमणवान् को हटाकर उसके समीप से प्राप्त हो गया था। सञ्जय ने उसके पास पहुँचकर उस बड़ी भारी गदा को अविद्ध करके अपने एक ही प्रहार के द्वारा रथ के सहित उसको व्यायोधित कर दिया था। गदा से हत होकर वह महान् वीर पृथ्वी में गिरा गया था। जैसे वन के मध्य में स्थित शाल का प्रफुल्ल वृक्ष वज्र से हत होकर गिर जाया करता है। राजा सुदर्शन ने

३९६ ६०८२ श्रीकालिका पुराण ६०८२ रुमणवान को गिरा हुआ देखकर वह धूम के सहित पावक की ही भाँति शोक और कोप से समाविष्ट हो गया था । अत्यधिक क्रोध से युक्त होकर समाकुल देह वाला भी वह ज्वलित हो गया था । वेगवान् अश्वों से युक्त और व्याघ्र के चर्म से युत सुवर्ण के चित्रिक अंगों वाले, सिंह की ध्वजा से भूषित रथ पर आरूढ़ होकर आमुक्त धनुष ग्रहण कर बारम्बार विस्फारित करते हुए वेगवान् राजा ने सैनिकों के सहित सञ्जय को द्रवित किया था । इसके अनन्तर अपने पैने अस्त्रों के द्वारा सेना के आगे बहुत ही अधिक सम्पूर्ण सेना का सिंह हिरनों को जैसे निहत करता है ठीक उसी भाँति हनन कर दिया था । बहुत ओज वाले वीरों की अग्रगामिनी एक अक्षौहिणी सेना का हनन कर दिया था । जैसे सूर्य अन्धकारों का नष्ट कर दिया करता है उसी भाँति दो कोस तक न्यहनन किया था । राजा एक अक्षौहिणी सेना का हनन करके सञ्जय के समीप प्राप्त हो गया था । राजा ने आठ वाणों से वेधन किया था और एक बाण के द्वारा ध्वजा को छिन्न कर दिया था । इसके उपरान्त सञ्जय ने भी बीस वाणों से सुदर्शन के हृदय में वेधन किया था । कृतहस्त की भाँति एक बाण से ललाट में वेध किया था । क्षुरप्र के द्वारा प्रताप वाले राजा ने राजा के दण्ड को छिन्न कर दिया था । सञ्जय ने फिर वाणों से सारथी का वेधन उसी समय कर दिया था । फिर राजा सुदर्शन ने अपना धनुष लेकर अत्यधिक शरों की तीव्र वर्षा से संजम को निमग्न-सा कर दिया था । उन दोनों में विस्मय उत्पन्न करने वाला महान् युद्ध हुआ था । फिर राजा सुर्दशन ने अपने भाले के द्वारा इसके दृढ़ धनुष को काट गिराया था । उसने अपने पैने बाणों के द्वारा इसके सारथी का हनन कर दिया था । उस सञ्जय ने जो शत्रु के वीरों का हनन करने वाला था स्वयं ही अपने वाहनों को संयमित करके अन्य धनुष का आदान करके सुदर्शन को घेर का दश वाणों से वेधन किया था और इसके सुदृढ़ धनुष को छेदन कर दिया था । सुदर्शन ने अन्य धनुष का ग्रहण करके सञ्जय के चारवाहों को यमपुरी

३९८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ को लेकर विजय ने शत्रु की ओर उसका प्रक्षेपण किया था और वह शक्ति सुदर्शन के हृदय में प्रवेश कर गयी थी । वह विह्वल होकर नीचे की ओर मुख वाला रथ के ही समीप में बैठ गया था । उस नृप सुदर्शन के मोह को प्राप्त हो जाने पर उसके आगे की ओर तथा पार्श्व में ही वहाँ पर जो सैनिक स्थित थे, हे द्विजोत्तमो ! राजा ने एक ही क्षण भर में उन सबको मार गिराया था । दश हजार रथों को, और उतने ही हाथियों को, बड़े वेग वाले अश्वों की बीस हजार संख्या और दो लाख पदातियों को क्षण भर में मार गिराया था । इसके उपरान्त होश में आकर तथा सुदृढ़ धनुष लेकर सुदर्शन ने विजय के ऊपर शरों की वर्षा की थी । उसके सज्य कार्मुक को भाले के द्वारा उसी क्षण में छिन्न कर दिया था और सारथी का शिर काया से दूर कर दिया था और इसके चार अश्वों को मृत्यु के मुँह में भेज दिया था । इसके अनन्तर बिना रथ वाले राजा को दश कंकपत्रों के द्वारा विद्ध कर दिया था । सुदर्शन ने हृदय में वेधन कर फिर गर्जना की थी । वह कटे हुए धनुष वाले और बिना रथ वाले होकर वेग से युक्त ने गदा का आदान किया था । विजय की इच्छा वाले विजय ने सुदर्शन पर धावा किया था । सुदर्शन ने ऊपर से पतन करने वाले महान् वीर पर बाणों की वर्षा की थी जैसे वर्षा ऋतु में बादल पर्वत पर वर्षा किया करता है । विजय ने उन बाणों को अपने शरों से प्रच्छादित करके गदा से उसी क्षण में रथ पर समारूढ़ हुए उसके समीप में समाधान किया था । उस महान् वीर्य वाले के पास पहुँचकर सुदर्शन के शिर में प्रहार करके उसको भूमि पर गिरा दिया था । जिस प्रकार से वज्र के द्वारा विदीर्ण किया गया पर्वत का ऊँचा शिखर गिरा करता है । उस वीर के गिर जाने पर उसकी सेना के सैनिक उस युद्ध स्थल से डर से भयभीत होते हुए दिशा-विदिशाओं में भाग गए थे । उसकी सेना के सैनिकों के नष्ट हो जाने पर विजय ने खाण्डवी नाम वाली नगरी में प्रवेश किया था । उसने नगरी में प्रवेश करके वहाँ पर एकत्रित पर्वतों की ही

ൠൠ श्रीकालिका पुराण ൠൠ ३९९ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ राशिभूत सुवर्णों की तथा रत्नों के ढेरों को बहुत तादाद में देखा था । वहाँ पर खिले हुए कमलों वाले सरोवरों को देखा था । जो हंसों के नाद से सभी ओर से युक्त थे । पर्वतों के ही समान सुवर्ण और रत्नों के ढेरों को देखा था, घूमते हुए भौरों से विभूषित और पुष्पित देव वृक्षों को देखा था जो प्रस्फुट और सुन्दर गन्ध से युक्त प्रत्येक घर में व्यवस्थित थे । शत्रुओं का हनन करने वाली विजय से राजा के नेत्र प्रफुल्लित हो गए थे । उसने उस नगरी को भूमि पर समागत अमरावती ही माना था । उस परम सुन्दर नगरी को देखते हुए राजा के पास सुरेश्वर ने आकर परम तीक्ष्ण वाणी से उसको सान्त्वना देते हुए विजय से कहा था । इन्द्रदेव ने कहा- हे राजन्! यह महावन देवगणों से समावृत था । यह गन्धर्व, यक्ष और मुनियों से समावृत और परम मनोहर था । राजा सुदर्शन ने देव आदि सबको यहाँ से उत्सारित करके मेरे अप्रिय कार्य करने में रत होता हुआ उसने इन वन का भंग करके गुह्य तपोधन को उत्साहित करके राजा ने हठ से खाण्डवी नगरी की रचना की थी । हे नरोत्तम! आप पुनः इसको उत्तम वन बना दीजिए । वहाँ पर मैं तक्षक के साथ एकान्त में विहार करूँगा । यह आपके प्रसाद से मुनिगणों के तपश्चर्या करने का अनुपम स्थान होगा । हे पार्थिव! यह यक्षों का और किन्नरों का भी उत्तम स्थान हो जायगा । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-उस समय इन्द्रदेव के इस वचन को विजय ने श्रवण करके इन्द्रदेव के गौरव से उस खाण्डवी नगरी को विस्तृत वन ही बना दिया था । समस्त प्रजाजन अपनी इच्छा के अनुसार यथास्थान गमन कर जायें । जिन लोगों की पुनः मेरे राज्य में गमन करने की इच्छा होवे वे वाराणसी में गमन कर जावें जो कि मेरे द्वारा ही प्रतिपादित पुरी है । इसके उपरान्त मनुष्यों ने उसके वचन का श्रवण किया और कुछ लोग अपने ही स्थान को गमन कर गए । और कुछ लोग विजय नृप के द्वारा अभिपालिता वाराणसी में चले गए । इसके अनन्तर धनों की तथा रत्नों की तथा राशियों को अलग-अलग और

४०० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ मणियों, कनकों और पुरुषों की राशियों को विजन ने अंक साधनों के द्वारा वाराणसी नगरी की ही ओर वारित करा दिया था । विजय ने तुरन्त ही तीस योजन विस्तीर्ण एवं सौ योजन आयत उस पुरी को वन बना दिया था । उस वन में इन्द्रदेव की सम्मत्ति से अपने गणों के साथ तक्षक ने निवास किया था । वहाँ पर तक्षक बहुत समय तक रहा था और फिर वह निर्धन बन गया था । वहाँ पर गन्धर्वों के साथ देवगण और अप्सराओं के समुदाय आनन्द की क्रीड़ा किया करते हैं । वे सब युद्धों में विजय प्रदान करने वाले विजय की चर्चा किया करते हैं । अट्ठाईसवाँ युग के प्राप्त होने पर द्वापर के शेष में वह्नि ने विष्णु से ब्राह्मण के रूप से भिक्षा की याचना की थी । पाण्डु के सुत द्वारा भिक्षा देने की स्वीकृति दे दी गई थी । वह्नि ने अपने स्वरूप में स्थित होकर विष्णु से यह वचन कहा था, हे पाण्डु पुत्र! मैं अग्नि हूँ, यज्ञ भागों के अभिभाजन से मैं व्याधित हो रहा हूँ । अब आप ही मेरी व्याधि का विनाश कीजिए । खाण्डव नाम वाला विपिन है जो पक्षी-मृग और राक्षसों से समन्वित है । हे श्वेत वाहन! यदि आप मुझको भोजन कराने में समर्थ है तभी मेरी यह व्याधि शीघ्र ही नष्ट हो जायगी । पहले समय में विजय नाम वाले नृप ने खाण्डवी नाम की उस पुरी को भंग करके इसको वन बना दिया था । इसी कारण से यह खाण्डव वन है । हे श्वेत वाहन! वह देवों के द्वारा विहित वन मेरे ही लिए था । इन्द्रदेव के विरोध से मैं स्वयं इसका भोग करने का उत्साह नहीं करता हूँ । हे महाभाग! इसी कारण से आप परित्राण करिए और उस वन में नियोजन कीजिए । जिस रीति से मैं सम्पूर्ण का भोग करने के लिए आपके प्रसाद से मैं समर्थ हो सकता हूँ । महान् बलवान् सव्यसाची ने उसके इस वचन का श्रवण करके उस सम्पूर्ण वन को जो कि प्राणियों से समन्वित था, दग्ध कर दिया था । यह देवकी के आत्मज भगवान् वासुदेव के द्वारा पालित है । अग्नि के हित करने से रति रखने वाले ने उस खाण्डव वन को जला दिया था । परम प्रसन्न होकर वह्नि ने इसी कारण से महात्मा अर्जुन को

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४०१ गाण्डीव धनुष जो देवों द्वारा निर्मित और वारुण था, प्रदान किया था और अक्षय, दिव्य औषधियाँ दी थीं और सुरूप से संयुत चार अश्व, हनुमानजी से अधिष्ठित वानर ध्वजा वाला महान् रथ, खंड, वीक्षण त्रिशिख अग्नि से सव्यसाची (अर्जुन) को दिए थे । तथा विष्णु के प्रसाद से वह्नि रोग से रहित हो गया था । फाल्गुन (अर्जुन) ने उन बाणों से, उस धनुष से, खंड से, केतु से उन अश्वों वाले रथ से शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी । इस प्रकार से भैरव के वंशों में विजय नृप जो महाआकृति वाला था उसने खाण्डव को विपिन कर दिया था । विजय राजा के महान् बल वाले तेरह पुत्र हुए थे । उनके नाम द्युतिमान, सौम्यदर्शी, भूरि, प्रद्युम्न, ऋतु-पुण्य, विरुपाक्ष, विक्रान्त, धनञ्जय, प्रहर्ष, प्रबल, केतु और उपरिधर थे । इन सबका राजा वीर हुआ था जो शेषोपरिचर था जिसने वाराणसी नगरी में पहले एक लाख यज्ञ किए थे । एक लाख यज्ञों के करने वाला कोई भी नहीं हुआ था और न भविष्य में भी होगा । इसके पुत्र, पौत्र, प्रपौत्रों से ही यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है । भूमण्डल में ऐसा कौन-सा मनुष्य है जो बहुत लम्बे समय में भी उनकी गिनती कर सकता हो । अर्थात् ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं है । क्रम से भैरव के वंश से यह तीनों लोक व्याप्त हो रहे हैं । हे विप्रों! यह मैंने आपके समक्ष में भैरव की सन्तति का वर्णन कर दिया है । जो एकाग्र मन से उत्तम चरित्र का श्रवण करता है उसके वंश का विच्छेद कभी भी नहीं हुआ करता है और न होगा ही । श्री भगवान ने कहा-हे भैरव मैं अब सोलह उपचारों का वर्णन करता हूँ । उनका आप श्रवण कीजिए । जिनसे देवी भली भाँति से सन्तुष्ट हुआ करती है और अन्यदेव भी परम प्रसन्न होते हैं । सबसे प्रथम आसन देना चाहिए । यह आसन या कौश हो । उसे खण्डल के उत्तर की ओर ही सृजन करना चाहिए । जिस समय में यह पद्य में दिया जाता है उसे मण्डल के उत्तर में ही देवे । अर्घ्य, पाद्य, आचमन, स्थानीय, नेत्ररञ्जन, मधुपर्क, गन्ध और पुष्प निवेदित करे । और

४०२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ प्रतिमाओं में देने के लिए जो भी योग्य हो वह तनु में देना चाहिए । पौष्य जो होता है वह पुष्यों के समुदाय से रचित हुआ करता है और कुश तथा सूत्र आदि से संयुक्त होता है । हे भैरव ? यह देवी का, मेरा और समुद्भूत आसन मसृण और शुभ हुआ करता है । आसन के प्रकार और भेद आसन ऐसा होना चाहिए जो बहुत ऊँचा न हो, न बहुत विस्तृत होना चाहिए । ऐसे ही आसन को निवियोजित करे । अन्य लकड़ी से बनाया हुआ भी उत्तम देवे । वह आसन दारु (काष्ठ) के सार रहित तथा काँटों से युक्त एवं क्षीर से संयुक्त, चैत्य शमशान से समुत्पन्न और विभीतक को छोड़कर ही काष्ठ का आसन बनाना चाहिए । वस्त्र के आसन के लिए वल्कल (वृक्ष की छाल), कोषज और शाण अर्थात्, ये ही तीन आसन माने गए हैं । रोमज अर्थात् रोमों से बनाया हुआ कम्बल, ये चार होते हैं । अपने इष्टदेव की मूर्ति के लिए इसके द्वारा विरचित आसन ही देना चाहिए । सिंह, व्याघ्र, तीक्षण, छाग, महिष, गज, तुरंग, कृष्णास्मर, ये मृगों के नौ भेद हैं । इनके चर्मों के द्वारा आसन बनाया जाया करता है जो सभी देवों के लिए हुआ करता है । चर्म के आसन में तुरंग के चर्म का आसन श्रेष्ठ होता है तथा काष्ठ के आसनों में चन्दन का श्रेष्ठ माना गया है । सभी देवों का संयुत आत्म वाले ऋषियों का योगपीठ के सदृश आसन तथा स्थान कहा जाता है । देवों के लिए आसन के समर्पण से परम सौभाग्य और मुक्ति की प्राप्ति की जाया करती है । मृग नौ प्रकार के माने गए हैं । अर्थात् निम्नांकित इनके नौ भेद होते हैं, शम्बर, रोहित, राम, न्यंक, अंकु, शशा, रूरू, राण और हिरण, ये नौ भेद हैं । हे भैरव! हरिण भी यहाँ पर पाँच भेदों वाला समझना चाहिए । ऋष्य, शृंग, रूरू, पृषत, तथा मृग, ये बलि के प्रदान करने में तथा चर्म दान में कीर्त्तित किए गए हैं । धातु के आसनों में केवल लौह को छोड़कर काँसा, सीमा, शिलामय, मणिमय, ये रत्नमय माने गये हैं । देवताओं के लिए आसन मुक्ति