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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

३१८ ] [ कल्कि पुराण इत्यारूपायासु शिबिकामारुह्य परिवारिता । मखीभिश्चारुवेशाभिर्भूत्वा स्वान्त पुराद्बहिः । प्रययौ त्वरित द्रष्टु भैष्मी यदुपति यथा ।१३। जना पुमांस पथि ये पुरस्थाः प्रदु वु. स्त्रीत्व- भयाद्दिगन्तरम् । शृङ्गाटके वा विपणि स्थिता ये निजाङ्गगास्थापितपुण्यकार्या, ।१४। निवारिता ता शिबिकां वहन्त्यः नार्योऽतिमत्ता वलवत्तराश्च । पद्मा शुकोक्त्या तदुपर्युपस्था जगाम ताभि. परिवारिताभि ।१५। इस प्रकार परस्पर सम्वाद होने पर पद्मा अत्यन्त हर्षित हुई वह उसके मुख के समक्ष मुख, नेत्र के समक्ष नेत्र करके उसे आनन्द पूर्वक देखने लगी ।१०। उसकी आठ नायिका सखियाँ है - विमला, मालिनी, लोला, कमला, कामकन्दला, विलासिनी, चारुमती और कुमुदा । उन सखियो सहित जल-क्रीडा के लिए तत्पर होकर पद्मा उनसे बोली कि यह सखियां मेरे साथ सरोवर क तट पर चले ।११-१२। यह कह कर पद्मा पालकी पर आरूढ होकर सखियो सहित अन्त पुर से चल पडी । कृष्ण के दर्शनार्थ जाती हुई रुक्मणी के समान ही कल्कि भगवान् के दर्शन के लिए पद्मा ने भी शीघ्रता पूर्वक प्रस्थान किया ।१३। पद्मा जिस मार्ग से जा रही थी, उस माग मे स्थित पुरुष उसे देखते ही कही स्त्री न बन जाय इस आशका से इधर-उधर भाग गये । उन भागने वालो को पत्नियां उनके निरापद रहने के लिए पुण्य कर्मों का अनुष्ठान करने लगी ।१४। इस प्रकार मार्ग को पुरुषो से रहित देख कर शक्ति- मती स्त्रियां पालकी को स्वच्छन्दता से वहन करने लगी - शुक के कथना- नुसार पालकी पर चढी हुई पद्मा को घेर कर उसकी सखियां भी साथ चल रही थी ।१५। सरोजल सारसलुसनादितप्रफुल्लपद्मोद्भवरेणुवासितम् । चेरुर्विगाह्याशु सुधाकरालसा. कुमुद्वतीनांमुदयाशोभन्तः ।१६।

प्रथम अध्याय-१ [ ३१६ तासा मुखामोदमदान्धभृङ्गा विहाय पद्मानि मुखारविन्दे। लग्नाः सुगन्धाधिकमाकलय्य निवारिताश्चापि न तत्यजुस्ते ।१७। हासोपहासैः सरसप्रकाशैर्वाद्यैश्च नृत्यैश्च जले विहारै । करग्रहैंस्ता जलयोधनात्ततश्चिकर्ष ताभिर्वनिताभिरुच्चे १८। सा कामातप्ता मनसा शुकोक्ति विविच्य पद्मा सखिभिः समेता । जलात्समुत्थाय महाहंभूषा जगाम निर्दिष्टकदम्बषण्डम् ।१६। सुखे शयानं मणिवेदिकागतं कल्कि पुरस्तादतिसू- र्य्यवर्चसम् । महामणिव्रातविभूषणाचित शुकेन सार्द्धं तमुदैक्षतेशम् २०। फिर सारस, हंस आदि के मधुर निनाद और पद्म-रेणु से सुगंधित सरोवर के जल में स्नान करके वह चन्द्रवदनी स्त्रियां कुमुदनी युक्त चन्द्रमा की आशा मे विचरण करने लगी । उनके देह की कमल- गंध से मत्त हुए भ्रमर उनके मुखो पर गुजारने लगे । स्त्रियो द्वारा उडाये जाने पर भी वे भ्रमर उन पद्मगन्धाओ के मुखो से हटते ही नही थे ।१६-१७। रसमय हास-परिहास, वाद्य, नृत्य तथा परस्पर हाथ पकडे हुए विविध प्रकार का जलविहार करती हुई पद्मा ने सखियो के मन को और सखियो ने पद्मा के मन को हर लिया ।१८। फिर सकाम भाव वाली पद्मा शुक के वचनो का स्मरण करके सखियो सहित जल से बाहर निकली और वस्त्राभूषणो से विभूषित होकर उस बताये हुए महान् कदम्ब के वृक्ष के नीचे गई ।१६। वहाँ उसने मणिमय चबू- तरे पर महामणियो से विभूषित, सूर्य के तेज से भी अधिक तेजोमय कल्किजी को शुक के सहित सुखपूर्वक शयन करते देखा ।२०। तमालनील कमलापति प्रभु पीताम्बर चारुसरोजलोचनम् । आजानुबाहुं पृथूपीनवक्षस श्रीवत्ससत्कौस्तुभकान्तिराजितम्

३२० ] [ कल्कि पुराण तदद्भुतरूपमवेक्ष्य पद्मा सस्तम्भिताविस्मृतसत्क्रियार्था सुप्तं तु सबोधयितुं प्रवृत्तं निवारयामाविशङ्कितात्मा ।२२ कदाचिदेषोऽतिबलोऽतिरुपी मद्दर्शनात्स्त्रीत्वमुपैति साक्षात् । तदात्र किं मे भविता भवस्य वरेण शापप्रति- मेन लोके ।२३। चराचरात्मा जगतामधीश प्रबोधितस्तद्धृदयं विविच्य । ददर्श पद्मा प्रियरूपशोभा यथा रमा श्रामधुसूदनाग्रे ।२४। सवीक्ष्य मायामिव मोहिनी तां जगाद कामाकुलितः स कल्किः । सखीभिरीशां समुपागतां तां कटाक्षविक्षेपवि- नामितास्यम् ।२५। उसने देखा कि तमाल जैसे नीलवर्ण वाले, पीताम्बरधारी, कमल जैसे नेत्र वाले, लम्बी भुजाओ, विशाल वक्ष और श्रीवत्स से चिन्हित हृदय वाले, कौस्तुभ मणि की कान्ति से प्रकाशित भगवान् कल्कि विराजमान है ।२१। उस अद्भुत रूप को देखकर पद्मा ऐसी स्तम्भित हुई कि उनका सत्कार भी करना भूल गई और उसने शंका के कारण उन्हे जगाना उचित नहीं समझा ।२२। उसने सोचा कि कहीं यह महा- बली अत्यन्त रूपवान् पुरुष मुझे देखकर स्त्री न बन जाय ? यदि ऐसा हो गया तो शिवजी का वरदान यहाँ भी अभिशाप हो जायगा ।२३। फिर पद्मा के आन्तरिक अभिप्राय को जान कर चराचर के एव विश्वेश्वर कल्कि भगवान जाग पडे । उन्होंने देखा कि लक्ष्मीजी के समान महान् रूपवती पद्मा सामने खडी है ।२४। सखियों के सहित आई हुई, अपलक देखता हुई पद्मा को देखकर उस मोह को उत्पन्न करने वाली पद्मा से कल्किजी सकाम-भाव पूर्वक बोले ।२५। इहैहि सुस्वागतमस्तु भाग्यात्समागमस्ते कुशलाय मे स्यात् । त्वदाननेन्दुः किल कामपूरस्तापापनोदाय सुखाय कान्ते! २६।

द्वितीय अध्याय- १ [ ३२१ लोलाक्षि ! लावण्य-रसामृत ते कामहिदष्टस्य विधातुरस्य । तनोतु शान्तिसुकृतेन कृत्या सुदुर्लभां जीवनमाश्रितस्य २७॥ बाहूतवैतौ कुरुता मनोज्ञौ हृदि स्थितं काममुदन्तवासम् । चार्वार्यतौ चारुनरवांङ्कुशेन द्विप यथा सादिविदीर्णकुम्भम् २८ पादाम्बुज तेऽङ्गुलिपत्रचित्रित वर मरालक्वराणनूपुरा- वृतम् । कायाहिदष्टस्य ममास्तु शान्तये हृदि स्थितं प- द्मघनेसुशोभने ॥२६॥ श्रुत्वैतद्वचनामृत कलिकुलध्वसस्य कल्केरलं दृष्ट्वा सत्पुरुषत्वमस्य मुदिता पद्मा सखीभिर्वृता । कान्ता क्लान्तमनाः कृताञ्जलिपुटा प्रोवाचतत्सदरं धीर धीरपुरस्कृतं निजपतिं नत्वा नमतकन्धरा ।३०। हे कान्ते ! तुम मेरे पास आओ, तुम्हारे मिलने से मेरा मंगल हुआ है । तुम्हारे चन्द्रमुख की देखकर मेरा सताप मिट गया ।२६। हे चवलाक्षि ! मुझ संसार के रचने वाले को इस समय वासना रूपी सर्प ने दंशित किया है । तुम्हारे लावण्य-रस रूपी अमृत के पान से उसकी शान्ति संभव है । यह शान्ति सुकृत्यो से भी दुर्लभ और जीवन के लिए आश्रय स्वरूप होगी ।२७। जैसे महावत अपने अंकुश से गजराज का कुम्भ भेदन करता है, ठीक वैसे ही तुम्हारी यह सुरम्य भुजाएँ नख रूप अंकुश के द्वारा मेरे हृदयस्थ कामरूप हाथी के कुम्भ का भेदन करें ।२८। मेरे हृदयोदधि के स्वच्छ नीर मे स्थित अंगुलि रूपी कमल-पत्र द्वारा चित्रित हंस जैसा शब्द करने वाले एव नूपुरो से सुशोभित मंजु घोष करने वाले पादाम्बुज के द्वारा काम-जनित विष का शमन हो ।२६। कलिकुल विध्वंसक कल्किजी के वचनामृत सुनकर और उन्हे सत्पुरुषत्व से युक्त जान कर पद्मा अत्यन्त हर्षित हुई । फिर वह क्लान्त मन हुई पद्मा सखियो सहित मस्तक झुकाकर अपने पति कल्कि भगवान् से मद स्वर में कहने लगी ।३०।

द्वितीयांश— तृतीय अध्याय मा पद्मात हीर मत्वा प्रेमगद्गदभाषिणी । तुष्टाव व्रीडिता देवी करुणावरुणालयम् ॥१॥ प्रसीद जगता नाथ ! धर्मंन् ! रमापते ! । विदितोऽसि विशुद्धात्मन् ! वशगा त्राहि मा प्रभो ! ॥२। धन्याह कृतपुण्याह तपोदानजपव्रतैः । त्वा प्रतोष्य दुराराध्यं लब्ध तव पदाम्बुजम् ॥३॥ आज्ञा कुरु पदाम्भोज तव सस्पृश्य शोभनम् । भवनं यामि राजानमाख्यातु स्वागत तव ।४। इति पद्मा रूपसद्मा गत्वा स्वपितर नृपम् । वाचागमनम कल्केर्विष्णोरशस्य दौत्यकैः ॥५॥ सूतजी बोले—प्रेम से गद्गद् होकर भाषण करने वाली पद्मा ने कल्किजी को भगवान् विष्णु के रूप मे जान कर उनकी स्तुति की ।१। हे जगदीश्वर ! हे धर्मवर्मन् ! हे लक्ष्मीपते ! मैं आपको जान गई हूँ । अब आप मुझ शरणागता की रक्षा कीजिए ।२। मैं धन्य हो गई प्रभो ! जो अपने पुण्यकर्मों अर्थात् तप, दान, जप और व्रतादि के सहित आपकी आराधना करके आपके दुष्प्राप्य चरण कमलो को प्राप्त कर सकी ।३। अब आप मुझे आज्ञा दे कि मैं आपके पदाम्बुजो का स्पर्श करके अपने घर जाऊँ और महाराज से आपके आगमन की बात सूचित करूँ ॥४॥ यह कह कर श्रेष्ठ रूप वाली पद्मा ने अपने पिता राजा ३२२

द्वितीय अध्याय-२ [ ६२३ बृहद्रथ के पास जाकर भगवान् कल्कि के आगमन का वृत्तान्त निवेदन किया ॥५॥ सखीमुखेन पद्मायाः पाणिग्रहणकाम्यया । हरेरागमनश्रुत्वा सहर्षोऽभूद्बृहद्रथः ।६। पुरोधसा ब्राह्मणैश्च पात्रै सुमङ्गलै । वाद्यताण्डवगीतैश्च पूजायोजनपाणिभिः ।७। जगामानयितु कल्कि साद्धं निजजनैः प्रभु । मण्डयित्वा कारूमती पताकास्वर्णतोरणैः ।८। ततो जलाशयाभ्यास गत्वा विष्णुयश सुतम् । मणिवेदिकयासीन भुवनैकगतिं पतिम् ।६। घनाघनोपरि यथा शोभन्ते रुचीराणयहो । विद्युदिन्द्रायुधादीनि तथैव भूषणान्युत ॥१०॥ राजा बृहद्रथ ने पद्मा की सखी के मुख से पद्मा के पाणिग्रहण की कामना से भगवान् का आगमन सुन कर हर्ष व्यक्त किया ।६। फिर उसने पुरोहित, ब्राह्मण, परिवारीजन, मित्र, बन्धु आदि को साथ लेकर मंगल गीत, वाद्य, नृत्य आदि करते हुए कल्कि भगवान को लाने के लिए प्रस्थान किया । स्वर्ण के तोरण और पताकादि से वह कारुमती नगरी अत्यन्त शोभा पाने लगी ।७-८। राजा बृहद्रथ ने जलाशय पर पहुँच कर देखा कि विष्णुयश के पुत्र कल्किजी मणिमय वेदी पर स्थित हैं ।६। जैसे घनघोर मेघ पर बिजली अथवा इन्द्र-धनुष आदि अत्यन्त शोभा पाते हैं, वैसे ही कल्किजी के कृष्णांग पर भूषण दमक रहे हैं ।१०। शरीरे पीतवासाग्रघोरभासा विभूषितम् । रूपलावण्यसदने मदनोद्यमनाशने ॥११॥ ददर्शपुरतो राजा रूपशीलगुणाकरम् । साश्रु सपुलक श्रीश दृष्ट्वा साधु तमर्चयत् ।१२। ज्ञानागोचरमेतन्मे तवागमनमीश्वर ! ।

३२४ ] [ कल्कि पुराण यथा मान्धातृपुत्रस्य यदुनाथेन कानने ।१३। इत्युक्त्वा तं पूजयित्वा समानीय निजाश्रमे । हर्म्यप्रासादसबाधे स्थापयित्वा ददौ सुताम् ।१४। पद्मा पद्म पलाशक्षी पद्मनेत्राय पद्मनीम् । पद्मजादेशतः पद्मनाभायादायथाक्रमम् ।१५। उन रूप-लावण्य के घर, कामदेव के उद्यम को नष्ट करने वाले, देह के अग्रभाग मे पीताम्बर धारण किये हुए तथा रूप, शील और गुण की खान लक्ष्मीपति कल्किजी को देख कर अश्रुयुक्त पुलकित देह के सहित राजा ने उनका विधि पूर्वक पूजन किया ।११-१२। राजा बोला— हे ईश्वर ! जैसे यदुनाथ वन मे जाकर मान्धाता के पुत्र से मिले थे, वैसे ही आप ज्ञानगोचरातीत का आगमन मेरे लिए हुआ है ।१३। यह कह कर कल्किजी का पूजन करके राजा उन्हे अपने भवन में ले आये और सुसज्जित गृह मे टिका कर उन्हे अपनी कन्या का दान कर दिया ।१४। पद्मोत्पन्न ब्रह्माजी के आदेशानुसर पद्मनाभ एव पद्मलोचन भगवान् कल्कि को पद्म-पत्र जैसे नेत्र वाली पद्मिनी संज्ञक पद्मा का यथाविधि दान किया ।१५ । कल्किर्लब्धवा प्रिया भार्यां सिंहले साधुसत्कृत. । समुवास विशेषज्ञ समीक्ष्य द्वीपमुत्तमम् ।१६। राजान. स्त्रीत्वमापन्नाः पद्मायाः सखिता गताः । द्रष्टु समीयुस्त्वरिता, कल्कि विष्णु जगत्पतिम् १७। ता; स्त्रियोऽपि तमालोक्य सस्पृश्यचरणाम्बुजम् । पुनः पु स्त्व समापन्ना रेवासनानात्तदाज्ञया ।१८। पद्माकल्की गौरकृष्णौ विपरीतान्तरावुभौ । बहि.स्फुटौ नीलपीत-वासोव्याजेन पश्यतु ।१९। दृष्ट्वा प्रभाव कल्केस्तु राजानः परमाद्भुतम् । प्रणम्य परया भक्त्या तुष्टुवुः शरणार्थिनः ।२०।

द्वितीय अध्याय-२ [ ३२५ अपनी प्रिय पत्नी को प्राप्त कर साधुजनो से सत्कृत हुए कल्किजी सिंहल द्वीप को श्रेष्ठ स्थान देख कर कुछ दिनो तक वहाँ रहे ।१६। जो राजा स्त्रीत्व को प्राप्त होकर पद्मा की सखी बन गये थे, वे सभी भगवान् कल्कि के दर्शनार्थ वहाँ उपस्थित हुए ।१७। वे सभी स्त्रीत्व को प्राप्त हुए राजागण भगवान् के दर्शन प्राप्त कर उनके चरण स्पर्श करते हुए उनकी आज्ञा से रेवा नदी पर पहुँचे और स्नान करते ही पुरुषत्व को प्राप्त हो गये।१८। पद्मा और कल्कि गौर तथा कृष्ण वर्ण वाले हैं । दोनो विपरीत वर्णों के सम्मिलन से पद्मा के नीलाम्बर और कल्कि के पीताम्बर द्वारा एक बाह्य वर्ण प्रकाशित हुआ और परस्पर समन्वित दिखाई देने लगा ।१६। कल्किजी का अत्यन्त अद्भुत पराक्रम देख कर सभी राजागण उनकी शरण को प्राप्त होकर भक्तिपूर्वक प्रणाम और स्तुति करने लगे ।२०। जय जय निजमायया कल्पिताशेषकल्पनापरिणाम । जलाप्लुतलोकत्रयोपकरणमाकलय्य मनुमनिशम्य पूरितावि- जनाविजनाविर्भूत महामीनशरीर ! त्वं निजकृतधर्म्मसेतुसर- क्षणकृतावतारः ।२१। पुनरिहदितिज-बल-परिलाङ्घत-वासव-सूदनादृत-जितत्रिभुवन पराक्रम-हिरण्याक्षनिधन पृथिव्युद्धरणसकल्प-भिनिवेशेन धृत- कोलावतारः पाहि नः ।२२। पुनरिह जलधि मथनादृत-देवदानवगण मन्दराचलानयनव्या- कुलिताना साहाय्येनादृतचित्त. पर्व्वतोद्धरणामृतप्रासनरचना वतारः कूम्माकारः प्रसीद परेश । त्वं दाननृपाणाम् ।२३। हे प्रभो ! आपकी जय हो । आपकी ही कल्पना-शक्ति से संसार विविध प्रकार से कल्पित हुआ है । जब तीनो लोग प्रलय मे लीन हो गये, तब आपने जनशून्य स्थल मे प्रकट हुए थे । आपने ही धर्म-सेतु के सर- क्षण हेतु महामीन (मत्स्य) देह धारण किया था ।२१। जब दनुज-सैन्य

[३२६ ] कल्कि पुराण

से इन्द्र पराजित होने लगे और त्रैलोक्य-विजयी हिरण्याक्ष इन्द्र को म रने मे तत्पर हुआ, तब आपने ही वाराह रूप धारण कर उसका सहार कर डाला। ऐमे आप हमारी रक्षा कीजिये ।२२। जब देवता और दैत्य दोनो ही मिल कर समुद्र-मन्थन मे तत्पर हुए, तब नदगचल पर्वत को टिकाने की समस्या उत्पन्न हुई । उस समय आपने कूर्मावतार धारण कर अपनी पीठ पर मन्दराचल को टिका लिया । आपका वह कूर्मावतार देवताओ को सुधा-पान कराने के लिये ही हुआ था। हे परेश ! आप ही हम दीन राजाओ की रक्षा कीजिये ।२३। पुनरिह त्रिभुवनजयिनो महाबलपराक्रमस्य हिरण्यकशिपोर- र्द्दिताना देववराणा भयभीताना कल्याणाय दितिसुतवधप्रे- प्सुर्ब्रह्मणो वरदानादवध्यस्य न शस्त्रास्त्ररात्रि दिवास्वर्गम- र्त्यपातालतले देवगन्धर्वकिन्नरनरनागैरिति विचिन्त्य नर- हरिरूपेण नाखाग्रभिन्नोरु दष्टवन्तच्छद त्यक्तासु कृत वानसि ।२४। पुनरिह त्रिजगज्जयिनो बले, सत्र शकानुजो वटुवामनोदैत्यस माहनाय त्रिपदभूमियाञ्चाच्छलेन विश्वकायस्तदुत्सृष्ट-जल- सस्पर्श-विवृद्धमनोऽभिलाषस्तव भू र्ले बलेर्दोवारिकत्वमङ्गी- कृतमुचित दानफलम् ।२५। पुनरिह हैहयादिनृपाणाममितबलपराक्रमाणा नाना मदोल्ल- ङ्घितमर्यादावर्त्मना निधनाय भृगुवंशजो जामदग्न्य पितृहो- मधेनुहरणप्रवृद्धमन्युवशात्रिसप्तकृत्वो निःक्षत्रिया पृथिवी कृ- तवानसि परशुरामावतारः ।२६। फिर जब त्रैलोक्य विजयी, महाबली और पराक्रमी हिरण्यक- कशिपु देवताओ का उत्पीडन करने लगा, तब आपने भयभीत देवताओ के रक्षार्थ उस दैत्यराज का सहार करन का निश्चय किया । ब्रह्माजी के वरू से दैत्य, देवता गन्धर्व, किन्नर, नाग, शस्त्रास्त्र, दिवस, रात्रि, स्वर्ग,

कल्कि पुराण [ ३२७ मर्त्यलोक या पाताल लोक मे कही भी, किसी के द्वारा भी मरने वाला नही था । इन सब बातो पर विचार करके आपने नृसिंहावतार धारण किया और जब आपके उग्र रूप को देख क्रोधित हुआ दैत्य आपसे युद्ध करने लगा, तब आपने अपने नखाग्रो से उसका देह विदीर्ण कर डाला ।२४। फिर त्रैलोक्य विजयी राजा बलि के यज्ञ मे आपने इन्द्र के लघु भ्राता बन कर वामनावतार धारण कर दानवराज के समोहनार्थ तीन पद पृथिवी माँग ली । उत्सर्ग के लिये जल छोडते ही आपने छलपूर्वक विराट् स्वरूप धारण किया । फिर आप त्रैलोक्यदान के फलस्वरूप राजा बलि के द्वारपाल बन गये ।२५। फिर जब महाबल-पराक्रम वाले हैहय आदि राजाओ ने धर्म की मर्यादा को लाँघा, तब आपने उनके विनाशार्थ भृगुवंश मे परशुराम का अवतार लिया और अपने पिता की होमधेनु के हर लिये जाने पर आपने इक्कीस बार इस पृथिवी को क्षत्रियो से रहित कर दिया ।२६। पुनरिह पुलस्त्यवंशावत सस्य विश्रवस पुत्रस्य निशाचरस्य रावणस्य लोकत्रयतापनस्य निधनमुररीकृत्य रविकुलजातद- शरथात्मजो ऽथस्वामित्रादस्त्राण्युपलभ्य वने सीताहरणाश्रा त्प्रवृद्धमन्युना अम्बुधिं वानरैर्निबध्य सगणं दशकन्धरं हतवा- नसि रामावतारः ।२७। पुनरिह यदुकुल-जलधिकलानिधि सकलसुरगणसेवितपादार- विन्दद्वन्द्वः विविधदानवदैत्यदलनलोकत्रयदुरिततापनो वसुदे- वात्मजो रामावतारो बलभद्रस्त्वमसि ।२८। पुनरिह विधिकृत-वेदधर्मानुष्ठान-विहित-नानादर्शनसघृण ससारकर्मत्यागविधिना ब्रह्माभासविलासचातुरी प्रकृतिवि- माननामसम्पादयन् बुद्धावतारस्त्वमसि ।२६। फिर पुलस्त्यवंशावतंस विश्रवापुत्र रावण ने अपने बल से तीनो लोको को भय-सतप्त कर दिया, तब आपने उसका विनाश करने के लिये सूर्यवंशी राजा दशरथ के यहाँ अवतार लिया और विश्वामित्र से अस्त्र-

३२८ ] द्वितीय अध्याय-२ विद्या प्राप्त कर वन-गमन करने और रावण द्वारा सीता का हरण करने पर आपने वानर सेना को साथ लेकर कुल सहित रावण को मार डाला ।२७। फिर आप यदुकुल जनयि-मयङ्क वसुदेव जी के पुत्र रूप श्रीकृष्ण हुए और अनेक दैत्य-दानवो को मार कर तीनो लोको को पाप-मुक्त किया । इसलिये सभी देवता आपके उस श्रीकृष्ण रूप के चरण कमलो की सेवा मे तत्पर हुए । उसी काल मे आपने ही बलभद्रजी का भी अव- तार धारण किया था ।२८। फिर आपने ब्रह्मा द्वारा निश्चित वेद-धर्म मे अनेक बाधाएँ देख कर मिथ्या प्रपञ्च को नष्ट करने के निमित्त एव प्राकृतिक विषय की अवमानना न करने के उद्देश्य से बुद्ध का अवतार लिया ।२६। अधुना कलिकुलनाशावतारो बौद्धाखण्डम्लेच्छादीनाञ्चवे- दधर्मसेतुपरिपालनाय कृतावतारः कलिकरूपेणास्मान् स्त्री- स्वनिरयादुद्धृतवानसि तवानुकम्पा किमिह कथयामः ।३०। क्व ते ब्रह्मादीनामविदितविलासावतरण क्व नः कामा वामाकुलतममृगतृष्णार्तमनसाम् । सुदुष्प्राप्य युष्मच्चरण जलजालोकनमिद कृपापारावार' प्रमुदितदृशाश्वामय निजान् ।३१। अब आप कलिकुल को नष्ट करने तथा बौद्ध पाखण्डियो और म्लेच्छों पर शासन करने के लिये कल्कि अवतार लेकर वेद धर्म रूपी सेतु की रक्षा कर रहे हैं । आपने ही स्त्रीत्व रूपी नरक से हमारा उद्धार किया है । हम आपकी इस कृपा का वर्णन किस प्रकार करे ? ।३०। ब्रह्मादि देवता भी आपकी लीला को जानने मे समर्थ नही हैं । आपकी अवतार विषयक कोई कामना नही रहती । हम स्त्री के देखते ही काम-बाण के द्वारा जर्जर एव मृगतृष्णा से सतप्त हृदय वाले विषयी प्राणियो के लिये आपके पदाम्बुजो का दर्शन दुष्प्राप्य था । हे अपार कृपा वाले प्रभो ! हम अनुगामियो की ओर आप एक बार अपना कृपा कटाक्ष करके: हमे आश्वासन दीजिये ।३१।

द्वितीयांश— चतुर्थ अध्याय श्रुत्वा नृपाणा भक्ताना वचन पुरुषोत्तमः । ब्राह्मणक्षत्रविट्शूद्र-वर्णाना धर्ममाह यत् ॥१॥ प्रवृत्ताना निवृत्ताना कर्म यत्परिकीर्तितम् । सर्वं सश्रावयामास वेदानामनुशासनम् ॥२॥ इति कल्केर्वचः श्रुत्वा राजानो विशदाशयाः । प्रणिपत्य पुन प्राहु पूर्वान्तु गतिमात्मनः ॥३॥ स्त्रीत्व वाप्यथवा पुं स्त्व कस्य वा केन वा कृतम् । जरा-योवन-बाल्यादि सुखदुःखादिक च यत् ॥४॥ कस्मात्कृतो वा कस्मिन् वा किमेतदिति वा विभो । अनिर्णीतान्यविदितान्यपि कर्माणि वर्णय ॥५॥ सूतजी बोले—राजाओ के यह वचन सुन कर पुरुष श्रेष्ठ कल्कि- जी ने उनके प्रति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों के धर्म का वर्णन किया ।१। ससार मे आसक्त एव संसार से विरक्त दोनो के ही जो कर्म हैं, उनका वर्णन उन्होने किया ।२। कल्किजी का उपदेश सुनकर राजाओ के हृदय पवित्र होगये । फिर उन्होने प्रणाम करके कल्किजी से अपनी पूर्वावस्था के विषय मे पूछा ।३। हे प्रभो ! स्त्रीत्व और पुरुषत्व भेद से मनुष्यो की निवृत्ति किस प्रकार होती है ? जरा, यौवन और बाल्यावस्था एव सुख, दु खादि के कारण क्या हैं ? इनके अतिरिक्त भी जिन विषयो से हम अनभिज्ञ हैं, उनका भी वर्णन कीजिये ।४-५। ( तदा तदाकर्ण्य कल्किकरनन्त मुनिमस्मरत् ) । ३२६ ३

३३० ] [ कल्कि पुराण सोऽप्यनन्तो मुनिवरस्तीर्थपादो बृहद्व्रत ॥६॥ कल्केर्दर्शनतो मुक्तिमाकलय्यागतस्त्वरन् । समागत्य पुन' प्राह कि करिष्यामि कुत्र वा । यास्यामीति वचः श्रुत्वा कल्किः प्राह हसन्मुनिम् ॥७॥ कृत दृष्ट त्वया ज्ञात सर्व याह्यनिवर्तकम् । अदृष्टमकृतञ्चेति श्रुत्वा हृष्टमना मुनि ।८। गमनायोद्यत त तु दृष्ट्वा नृपगणास्ततः । कल्किं कमलपत्राक्ष प्रोचुर्विस्मितचेतस ।६। ( यह सुन कर कल्कि जी ने अनन्त मुनि का स्मरण किया ) यह जान कर महानव्रती एव दीर्घ काल से तीर्थ मे निवास करने वाले मुनि- वर अनन्त, कल्किजी के दर्शन से अपनी मुक्ति सभव समझ कर शीघ्र ही वहाँ आ उपस्थित हुए । उन्होने भगवान् कल्कि के पास आकर पूछा— मुझे क्या करना है ? कहां जाना है ? यह सुन कर कल्कि जी हँस कर मुनि से बोले ।६। हे मुने ! आपने मेरे सब किये हुए कर्म देखे हैं । अदृष्ट को कोई काट नही सकता और कर्म के बिना फल भी नही मिल सकता । यह सुन कर मुनि को प्रसन्नता हुई ।८। और फिर जब मुनि वहाँ से जाने लगे, तब उन्हे देख कर आश्चर्य चकित हुए राजागण कल्किजी से बोले ।६। किमनेनापि कथितंत्वया वा किमुताम्युत । सर्वं तच्छ्रोतुमिच्छाम. कथोपकथनं द्वयोः ॥१०। नृपाणां तद्वच' श्रुत्वा तानाह मधुसूदनः । पृच्छतामु मुनिं शान्तं कथोपकथनादृताः ॥११। इतिकल्केर्वचो भूयः श्रुत्वा ते नृपसत्तमाः । अनन्तमाशु' प्रणताः प्रश्नपारतितीर्षवः ॥१२। मुने ! किमत्र कथन कल्किना धर्मवर्मणा । दुर्बोध. केन वा जातस्तत्त्व वर्णय न प्रभो । १३

चतुर्थ अध्याय-२ ] [ ३३१ पुरिकाया पुरि पुरा पिता मे वेदपारग. । विद्रु मो नाम धर्म्मज्ञः ख्यात. परहिते रतः ।१४। सोमा मम विभो ! माता पतिधर्म्मपरायणा । तयोर्वयः परिणतौ काले षण्डाकृतिस्त्वहम् ।१५। राजाओ ने कहा—हे प्रभो ! मुनि ने आपसे क्या कहा और आपने क्या उत्तर दिया ? आपका कथोपकथन किम विषय मे हुआ था ? यह सुनने की हमे इच्छा है ।१०। राजाओ की जिज्ञासा सुनकर भगवान् कल्कि ने कहा—हमारे कथोपकथन के विषय मे इन शान्त हृदय वाले मुनि से ही प्रश्न करो ।११। कल्किजी के वचन सुनकर वे सब श्रेष्ठ राजागण प्रश्न का भेद जानने के लिए मुनि को प्रणाम करके पूछने लगे ।१२। राजाओ ने कहा—हे मुने ! भगवान् कल्कि से आपका कथोप- कथन गूढरूप से क्यो हुआ ? हे प्रभो ! इसका रहस्य हमे बताइये ।१३। मुनि बोले—पूर्वकाल की बात है—पुरिका नाम पुरी मे वेदो मे पारगत विद्रुम नामक एक धर्मज्ञ मुनि रहते थे, वही मेरे पिता थे ।१४। हे विभो ! मेरी माता का नाम सोमा था, उसी पतीव्रता से मेरा जन्म हुआ, परन्तु मैं पुंस्त्वहीन था ।१५। सजात. शोकदो पित्रोलोकाना निन्दिताकृति । मामालोक्य पिता क्लीबदुःखशोक भयाकलः ।१६। त्यक्त्वा गृह शिववन गत्वा तुष्टाव शङ्करम् । सपूज्येश विधानेन धूपदीपानुलेपनैः ।१७। शिवं शान्त सर्वलोकैकनाथ भूता-वासं वासुकीकण्ठभूषम् । जटाजूटाबद्धगङ्गा तरंगवन्दे सान्द्रानन्दसन्दोहदक्षम् ।१८। इत्यादि बहुभिः स्तोत्रैः स्तुतः स शिवदः शिव. । वृषारूढः प्रसन्नह्र्त्मा पितर प्राह मे वृणु ।१६। विद्रु मो मे पिता प्राह मत्यु स्त्वं तापतापित । हसञ्छिवो ददौ पुंस्त्व पार्वीया पृतिमोदितः ।२०।

[३३२ ] [ कल्कि पुराण

मुझे इस प्रकार का उत्पन्न हुआ देख कर मेरे माता-पिता को बडा दुःख हुआ। मेरी आकृति निन्दा योग्य थी। यह देख कर दुःख, शोक और भय से व्याकुल हुए पिताजी शिव वन मे जाकर धूप, दीप, गध आदि से विधिवत् पूजन करके शिवजी की स्तुति करने लगे ।१६ १७। उन्होने कहा-हे शिव ! हे शान्त स्वरूप ! आप सब लोको के नाथ और भूतो को आश्रय स्थान हैं। आपके कठ मे वासुकी नाग और जट जाल मे गंग-तरग सुशोभित हैं। आप आनन्द भडार के दाता शिव को मै प्रणाम करता हूँ ।१८। कल्याण के दाता भगवान् शकर इस स्तोत्र से प्रसन्न होकर वृषभारूढ होकर प्रकट हुए और उन्होने मेरे पिता को वर मागने की आज्ञा दी ।१६। तब मेरे पिता विद्रुम मुनि ने उनसे कहा-हे नाथ ! मेरा पुत्र पुंसत्वहीन है, इसमे मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। तब शिवजी ने हँस कर मेरे पुरुषत्व युक्त होने का वर दिया और पार्वतीजी ने भी उनकी बात का अनुमोदन किया ।२०। मम पुंस्व वरं लब्ध्वा पितायातं पुनर्गृहम् । पुरुषं मा समालोक्य सहर्षः प्रियया सह ।२१। ततः पूवयसौ तौ तु पितरौ द्वादशाब्दके । विवाहं मे कारयित्वा बन्धुभिर्मुदमापतुः ।२२। यज्ञरातसुतां पत्नीं मानिनीं रूपशालिनीम् । प्राप्याहं परितुष्टात्मा गृहस्थः स्त्रीवशोऽभवम् । २३। ततः कतिपये काले पितरौ मे मृतौ नृपा । पारलौकिककार्याणि सुहृद्भिर्ब्राह्मणैर्वृतः ।२४। तयोः कृत्वा विधानेन भोजयित्वा द्विजान्बहून् । पित्रोर्वियोगतप्तोऽहं विष्णुसेवापरोऽभवम् ।२५। मेरे पुरुष होने का वर प्राप्त कर पिताजी घर लौट आये और तब मुझे पुरुषाकार हुआ देख कर माता के सहित वे बडे प्रसन्न हुए ।२१। फिर जब मैं बारह बर्ष का होगया, तब उन्होने बन्धु-बान्धवो सहित मोद मनाते हुए मेरा विवाह कर दिया ।२२। यज्ञरात की पुत्री को

चतुर्थे अध्याय २ ] [ ३३३ अपनी भार्या के रूप मे प्राप्त करके मैं बडा सन्तुष्ट हुआ और गृहस्थाश्रम मे प्रवेश करके उस अत्यन्त रूपवती एव माननी स्त्री के वशीभूत हो गया ।२३। फिर कुछ काल बीतने पर मेरे माता-पिता मर गये तब मैंने अपने सुहृदो और ब्राह्मणो के साथ उनका परलोक सस्कार किया।२४। माता-पिता का मृतक सस्कार करके मैंने अनेक ब्राह्मणो को भोजन कराया । फिर उनके विरह से दुःखी होकर मैंने भगवान् विष्णु की आराधना की ।२५। तुष्टो हरिर्मे भगवाञ्जप पूजादिकर्मभि । स्वप्ने मामाह मायेय स्नेहमोहविनिर्मिता ।२६। अय पितेय मातेति ममताकुलचेतसाम् । शोकदु खभयोद्व गजरामृत्युविधायिका ।२७। श्रुत्वैति वचन विष्णोः प्रतिवादार्थमुद्यतम् । मामालक्ष्यन्तर्हित, स विनिद्रोऽहवम् ।२८। सविस्मयः सभार्योऽह त्यक्त्वा ता युरिको पुरोम् पुरुषोत्तमाख्य श्रीविष्णोरालवञ्चागम नृपाः ! ।२६। तत्रैव दक्षिणे पार्श्वे निर्मायाश्रममुत्तमम् । सभार्य्यः सानुगामात्यः करोमि हरिसेवनम् ।३०। मेरे जप, पूजन आदि कर्म से प्रसन्न हुए भगवान् विष्णु ने एक दिन स्वप्न मे मुझसे कहा कि स्नेह, मोह आदि सब मेरी ही माया है ।२६। यह मेरे पिता हैं, यह मेरी माता है' ऐसी ममता जिनके चित्त को व्याकुल करती हो तो समझ लो कि इस शोक, दुख, भय, उद्वेग, वृद्धावस्था और मृत्यु आदि के क्लेश रूप का कारण मेरी माया ही है ।२७। भगवान् की वाणी सुन कर मैं जैसे ही प्रतिवाद करने को हुआ, वैसे ही वे अन्तर्धान होगये और मेरी नीद टूट गई ।२८। हे राजाओ ! फिर मैं विस्मय मे भर कर पुरिका नामक उस पुरी को छोड कर अपनी पत्नी के सहित पुरुषोत्तम सज्ञक विष्णुधाम में जा पहुँचा ।२६। उस पुरुषोत्तम धाम के

३३४ ] [ कल्कि पुराण दक्षिण भाग में श्रेष्ठ आश्रम बनाकर मैं अपनी पत्नी और अनुगामियो के सहित हरि-सेवा मे तत्पर हो गया ।३०। मायासंदर्शनाकाङ्क्षी हरिसद्मनि संस्थितः । गायन्नृत्यञ्जपन्नाम चिन्तयञ्छमनापहम् ।।३१। एवं वृत्ते द्वादशाब्दे द्वादश्या पारणादिने । स्नातुकाम समुद्रेऽह बन्धुभि, सहितो गत ।३२। तत्र मग्न जलनिधौ लहरीलोलसङ्कुले । समुत्थातुमशक्त मा प्रतुदन्ति जलेचराः ।३३। निमज्जनो मज्जनेन व्याकुलो कृतचेतसम् । जलहिल्लोलमिलनदलिताङ्गमचेतनम् ।३४। जलधेदक्षिणे कूले पतित पवनेरितम् । मा तत्र पतित दृष्ट्वा वृद्धशर्मा द्विजोत्तम ।।३५।। सन्ध्यामुपास्य सघृण स्वपुर मा समानयत् । स वृद्धशर्मा धर्मात्मा पुत्रदारधनान्वितः । कृतवारुग्णान्तु मा तत्र पुत्रवत्पर्यपालयत् ।३६। भगवान् के उस धाम मे रहता हुआ प्रभु माया का दर्शन करने की कामना से मैं नृत्य, गायन तथा जप पूर्वक यम का भय दूर करने वाले भगवान् विष्णु का ध्यान करने लगा ।।३१।। इस प्रकार बारह वर्ष व्यतीत होगए । एक दिन द्वादशी का पारण था, तब मैं स्नान करने के विचार से अपने बन्धुओ सहित समुद्र के तट पर पहुँचा ।।३२।। जैसे ही गोता लगाया, वैसे ही मैं समुद्र की भयंकर तरंगराशि से व्याकुल हो गया। मुझमे उठने की शक्ति नही रही । तभी जलचर जीव मुझे व्यथित करने लगे ।३३। मैं कभी उछलता था, कभी डूबता, इससेमेरा चित्त बडा व्याकुल हुआ । जल की तरगो के थपेडो से शिथिल अ ग हुआ मैं अचेत हो गया ।।३४।। फिर मैं वायु की हिलोर से बहता हुआ समुद्र के दक्षिण किनारे पर लग गया । मुझे अचेतावस्था में पड़ा देख कर वृद्ध शर्मा

[header] चतुर्थ अध्याय-२ ] [ ३३५

नामक एक ब्राह्मण सध्योपासन से निवृत्त हो कर मुझे अपने घर ले गये । स्त्री पुत्रादि से युक्त, धनवान् एव धर्मात्मा वृद्ध शर्मा मुझे स्वस्थ करके पुत्र के समान पालने लगे ॥३५-३६॥ अहन्तु तत्र दीनात्मा दिग्देशाभिज्ञ एव न । दम्पती तौ स्वपितरौ मत्वा तत्रावस नृपाः ।३७। स मा विज्ञाय बहुधा वेदधर्मेष्वनुष्ठितम् । प्रददौस्वा दुहितर विवाहे विनयान्वित ।३८। लब्ध्वा चामीकराकारा रूपशीलगुणान्विता । नाम्ना चारुमती तत्र मानिनी विस्मितोऽभवम् ।३६। तयाह परितुष्टात्मा नानाभोगसुखान्वित. । जनयित्व पञ्चपुत्रान्समदेनावृतोऽभवम् ॥४०॥ हे राजाओ ! उस स्थान पर रहते हुए मुझे दिशा और देश का भी ज्ञान न रहा, इसलिए दुःखित हृदय से उन ब्राह्मण दम्पत्ति को ही अपना माता-पिता मानता हुआ, वही रहने लगा ।३७। उन ब्राह्मण ने मुझे सब प्रकार से वेद-धर्म का अनुष्ठाता जान कर विनय पूर्वक अपनी कन्या का दान कर दिया ।३८। उस तप्त स्वर्गा जैसे वर्ण वाली, रूप, शील और गुण से युक्त कन्या का नाम चारुमती था। उस मानिनी को भार्या रूप मे प्राप्त का मैं विस्मय मे पड गया ।३६। च रुमती ने मुझे सेवा द्वारा सदा सतुष्ट रखा और मैं उसके साथ विभिन्न प्रकार के सुखो का उपभोग करने लगा । उससे मेरे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए और निरन्तर मेरे सुख की वृद्धि होने लगो ।४०। जयश्च विजयश्चैव कमलो विमलस्तथा । बुध इत्यादय. पच विदितास्तनया मम ।४१। न्स्वजनेर्बन्धुभिः पुत्रैर्धनैर्नानाविधैरहम् । विदितः पूजितो लोके देवैरिन्द्रो यथा दिवि ।४२। बुधस्य ज्येष्ठपुत्रस्य विवाहार्थ समुद्यतम्।

३३६ ] [ कल्कि पुराण दृष्ट्वा द्विजवरस्तुष्टो धर्मसारो निजा सुताम् ।४३। दित्सु. कर्माणि वेदज्ञश्चकाराभ्युदयान्द्यपि । वाद्यैर्गीतैश्च नृत्यैश्च स्त्रीगणै. स्वर्णभूषतै. ।४४। अह च पुत्राभ्युदये पितृदेवर्षितर्पणम् । कत्तुं स मुद्रवेलाया प्रविष्ट परमादरात् ।४५। मेरे पाँच पुत्र जय, विजय, कमल, विमल, और बुध इत्यादि नामो से जाने गये ।४१। मैं स्वजनो और पुत्रो से युक्त तथा विविध प्रकार के धनो का स्वामी होकर इन्द्र के समान पूजनीय तथा प्रसिद्ध होगया ।४२। जब मैने अपने ज्येष्ठ पुत्र बुध का विवाह करने ना विचार किया तब धर्मसार नामक एक ब्राह्मण ने अपनी कन्या देने की इच्छा प्रकट की । फिर उसने अपनी कन्या का वैवाहिक सस्कार करने के लिए वेदज्ञ ब्रा- ह्मणो को बुला कर आभ्युदयादि कर्म को पूर्ण कराया । उस समय स्वर्णाभूषणो से विभूषित स्त्रियाँ वाद्य, गीत और नृत्य कर रही थी- ।४३-४४। तब मैं भी पुत्र के अभ्युदय की अभिलाषा करके पितर, देवता और ऋषियो का तर्पण करने के लिए समुद्र के किनारे गया ।४५। वेलालोलायिततनुर्जलादुत्थाय सत्वरः । तीरे सखीन्स्नानसन्ध्या-परान्वीक्ष्याहमुन्मना. ।४६। सद्यः समभव भूपा ! द्वादश्या पारणाहतान् । पुरुषोत्तमसवासान्विष्णो सेवार्थमुद्यतान् ।४७।। तेऽपि मामग्रत, कृत्वा तद्रूपवयसा निधिम् । विस्मयाविष्टमनस दृष्ट्वा मामब्रु वञ्जनाः ।४८। अनन्त ! विष्णो भक्तोऽसि जले कि दृष्टवानिह । स्थले वा व्यग्रमनसं लक्षयाम. कथ तव ।४६। पारणं कुरु तद्ब्रू हि त्यक्त्वा विस्मयमात्मम. । तानब्रुवमह नैव किञ्चिद्ददृष्ट श्रुत जनाः ।५०। कामात्मा तत्कृपाधीर्मया सन्दर्शनादृतः ।

चतुर्थ अध्याय-२ ] [ ३३७ तया हरेर्माययाह मूढो व्याकुलितेन्द्रियः ।५१। जब मैं स्नान — तर्पणादि से निवृत्त होकर जल से निकल कर तट की ओर चला, तभी देखता हूँ कि मेरे पहिले के सभी बंधु बांधव सन्ध्यादि कर्म कर रहे हैं। यह देख कर मेरा मन उद्विग्न हो उठा ।४६। हे राजाओ ! पुरुषोत्तम धाम मे रहने वाले उन ब्राह्मणो को भगवान् विष्णु की सेवा एव द्वादशी के पारण मे तत्पर देख कर मैं चकित हुआ ।४७। मेरे रूप और वय मे पहिले से कुछ भी परिवर्तन न हुआ देख कर और मुझे विस्मयपूर्वक अपने को देखता देख कर उन्होने कहा ।४८। हे अनन्त ! तुम विष्णु भक्त हो । क्या तुमने जल अथवा स्थल मे कही कुछ ऐसा दृश्य देखा है, जिससे इतने व्यग्रचित्त दिखाई दे रहे हो ! ।४६। यदि कुछ देखा हो तो बताओ और विस्मय को छोड कर पारण करो। यह सुन कर मैंने कहा— मैंने कही कुछ भी नही देखा-सुना । परन्तु मैं काम से मोहित होकर दुर्बल हृदय हो गया हूँ। मैं भगवान् श्रीहरि की माया से ही विमूढ और व्याकुल इन्द्रिय वाला हो रहा हूँ ।५०-५१। न शर्मं वेद्मि कुत्रापि स्नेहमोहवशं गतः । आत्मनो विस्मृतिरिय को वेद विदिता तु ताम् ।५२। इति भार्या धनागार-पुत्रोद्वाहानुरक्तधी. । अनन्तोऽह दीनमना न जाने स्वापसम्मितम् ।।५३।। मां वीक्ष्य मानिनो भार्या विवशं मूढवस्थितम् । क्रन्दन्ती किमहोऽकस्मादालपन्ती ममान्तिके । ५४। इह ता वीक्ष्य तास्तत्र स्मृत्वा कातरमानसम् । हंसोऽप्येको बोधयितुमागतो मां सदुक्तिभिः ।५५। घोरो विदितसर्वार्थः पूर्णः परमधर्म्मवित् ।५६। सूर्य्यकार तत्त्वसार प्रशान्त दान्त शुद्ध लोकशोकक्षयि- ष्णा म् । ममाग्रे त पूजयित्वा मदङ्गाः पप्रच्छुस्ते मच्छुभष्या- नकामाः ।५७।