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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

३३८ ] [ कल्कि पुराण मैं स्नेह और मोह के वशीभूत होकर आत्मविस्मृति को प्राप्त हुआ हूँ, परन्तु इस बात को कौन जानता है ? ।५२। इस प्रकार मैं भार्या, धन के भंडार और पुत्र के विवाहादि मे अत्यन्त अनुरक्त शोक और दुख मे युक्त हो गया। मै सोचने लगा कि मैं अनन्त कौन हूँ ? परतु कुछ भी नही समझ पाया । सभी विषय स्वप्न के समान लगने लगे ।५३। तभी मेरी मानिनी पत्नी मुझे उस विवश और मूढ के समान अवस्था मे देख कर मेरे पास आकर रोती हुई चिल्लाने लगी कि हा, यह क्या हुआ ! ।५४। वहाँ अपनी पूर्व भार्या को इस प्रकार देख कर और फिर उन स्त्री-पुरुषो का स्मरण करके अत्यन्त कातर हृदय तथा सन्तप्त हो उठा । तभी एक वीर, सर्वज्ञानी, पूर्ण धर्मज्ञ, सूर्य के समान तेजस्वी, सतोगुणी , शान्त, शुद्ध तथा ससार-शोक का नाश करने मे समर्थ परमहस मुझे ज्ञान देने के निमित्त वहाँ पधारे। तभी मेरे बाधवो ने उनका पूजन किया और मेरे कल्याण का उपाय पूछने लगे ।५५-५७।

द्वितीय अंश: अध्याय १-३ (कीकट देश प्रस्थान व म्लेच्छ युद्ध)

द्वितीयांश— पंचम अध्याय उपविष्टे तदा हंसे भिक्षां कृत्वा यथोचिताम् । तत प्राहुरनन्तस्य शरीररोगकाम्यया ।१। हंसस्तेषां मतं ज्ञात्वा प्राह मां पुरतः स्थितम् । तव चारुमती भार्या पुत्रः पञ्च बुधादयः ।२। धनरत्नन्वितं सद्मा सम्बाधं सौवस्रकुलम् । त्यक्त्वा कदागतोऽसीह पुत्रोद्वाहदिने न तु ।३। समुद्रतीरसञ्चारः पुराद्धर्म्यजनादृतः । निमन्त्र्य मामिहायातः शोकसंविग्नमानसः ।४। त्वञ्च सप्ततिवर्षीयस्तत्र दृष्टो मया प्रभो ! । त्रिंशद्वर्षीयवत्कस्मादिति मे संभ्रमो महान् ।।५।। सूतजी बोले — यथोचित भिक्षा प्राप्त करके परमहंस जब विराजमान हुए, तब पुरुषोत्तम तीर्थ के निवासियो ने उनसे पूछा कि अनन्त का शरीर रोग-रहित कब होगा ? ।१। परमहंस उनके प्रश्न का तात्पर्य जान कर और मुझे अपने समक्ष स्थित देख कर बोले — हे अनन्त ! तुम अपनी पत्नी चारुमती, बुधादि पाँचो पुत्र धन रत्नादि से युक्त भवन आदि को त्याग कर यहाँ कब आये ? क्या आज तुम्हारे पुत्र का विवाह-दिवस है ? ।२-३। मैं आज भी तुम्हे इस समुद्र तट पर घूमते देखता हूँ । वहाँ के सभी धार्मिक व्यक्ति तुम्हारा आदर करते हैं । मैं भी आज निमंत्रित हूँ । परन्तु तुम यहाँ आकर शोक से सन्तप्त होरहे दिखाई देते हो ।४। हे प्रभो ! वहाँ तो तुम सत्तर वर्ष के वृद्ध थे, परन्तु २२९

३४० ] [ कल्कि पुराण यहाँ तीस वर्ष के युवक कैसे दिखाई दे रहे हो ? ।५। इय भार्या सहाया ते न तत्रालोकिता क्वचित् । अह वा क्व कुतस्तस्मात्क्व वा काशित् ।६। स एव वा न वापि त्व नाह वा भिक्षुरेव स. । आवयोरिह सयोगश्चेन्द्रजाल इवाभवत् ।७। त्व गृहस्थ. स्वधर्म्मज्ञो भिक्षुकोऽह परात्मक. । आवयोरिह सवादो बालकोन्मत्तयोरिव '८। तस्मादीशम्य मायेय त्रिजन्मोहकारिणी । ज्ञानाप्राप्याद्वैतलभ्या मन्येहमिति भा द्विज । ।६। तुम्हारी इस सहायिका भार्या को मैंने वहाँ कभी भी नही देखा । मैं भी यह नही जानता कि मैं इस स्थान पर कहाँ से और किस प्रकार आ गया ? तथा मुझे यहाँ कौन लाया है ? ।६। क्या तुम वही अनन्त हो या और कोई हो ? मैं भी वही भिक्षुक हूँ या कोई अन्य हूँ ? यहाँ मेरा तुम्हारा मिलन भी इन्द्रजाल के समान ही प्रतीत होता है ।७। तुम अपना धर्म का पालन करने वाले गृहस्थ हो और मैं परमार्थ चिन्तक भिक्षुक । यहाँ हम-तुम दोनो का पारस्परिक सवाद एक बालक और उन्मत्त के सवाद के समान निरर्थक है ।८। हे द्विज ! इससे मैं समझता हूँ कि यह भगवान् की त्रैलोक्य-मोहिनी माया है । इस माया का रहस्य साधारण ज्ञान से नही, अद्वैत बुद्धि से ही समझा जा सकता है ।६। इति भिक्षुः समाश्राव्य यदन्यत्प्राह विस्मित. । मार्कण्डेय ! महाभाग ! भविष्य कथयामि ते ।१०। प्रलये या त्वया दृष्टा पुरुषस्योदराम्भसि । सा माया मोहजनिका पन्थानं गणिका यथा ।११। तमोह्ययननसन्तापा नोदनोद्यतमक्षरी ययेदमखिलं लोकमवृत्या वस्थयास्स्थितम् ।१२। लये लीने त्रिजगति ब्रह्मातन्मात्रतां गतः । निरुपाधौ निरालोके सिसृक्षुरभवत् परः ।१३।

पञ्चम अध्याय - २ ] [ ३४१ ब्रह्मण्यपि द्विधाभूते पुरुष प्रकृती स्वयं । भासा सजनयामास महान्तं कालयोगतः ।१०। कालस्वभावकर्मात्मा सोऽहङ्कारस्ततोऽभवत् त्रिवृद्विष्णु-शिव-ब्रह्म-मयः ससारकारणम् ॥१५॥ विस्मयान्वित हृदय से भिक्षुक परमहंस ने मुझसे इतना ही कहा। फिर उन्होंने मार्कण्डेय से कहा - हे मार्कण्डेय ! हे महाभाग ! मैं अब तुम्हें भविष्य की बात सुनाता हूँ ।१०। प्रलयकाल मे उस परम पुरुष के उदर में स्थित जल मे, पथ मे बैठने वाली गणिका के समान, सब मे मोह उत्पन्न करने वाली माया निवास करती है ।११। तमोगुण रूप हुई यही माया अनन्त सन्ताप उत्पन्न करने वाली और इस मिथ्या जगत में सब की गति करने वाली है। यही माया तीनो लोको मे व्याप्त होकर उन्हें स्थित करती है । इस मायाका नाश संभव नही है ।१२। प्रलयकाल मे तीनो लोको के लीन होजाने पर सर्वत्र अंधकार छा जाता है, तब दिशा देश और काल आदि का भी कोई चिह्न नही रहता। उस समय ब्रह्म ही सृष्टि करने की इच्छा से, अपनी हीं महिमा द्वारा प्रकृति और पुरुष इन दो रूपो मे विभक्त हो जाते हैं। तब काल के सह- योग से प्रकृति और पुरुष, का सयोग होने पर महत्तत्व उत्पन्न होता है ।१३-१४। प्रकृति से काल और स्वभाव उत्पन्न हुए । महत्तत्व से अह- कार हुआ। वही अहंकार तीनो गुणो मे विभक्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव को उत्पन्न करने वाला हुआ। यही ब्रह्मा, विष्णु और शिव सम्पूर्ण विश्व के कारण हैं ।१५। तन्मात्राणि ततः पञ्च जज्ञिरे गुणवन्ति च । महाभूतान्यपि ततः प्रकृतौ ब्रह्मसंश्रयात् ।१६। जाता देवासुरनरा ये चान्ये जीवजातयः । ब्रह्माण्डभाण्डसम्भार-जन्मनाशक्रियात्मिकाः ।१७ मायया मायया जीव-पुरुष परमात्मनः । ससारशरणाव्यग्रो न वेदात्मगति क्वचित् ।१८ अहो बलवती माया ब्रह्माद्या यद्वशे स्थितः ।

३४२ ] [ कल्कि पुराण गावो यथा नसि प्रोता गुणाबद्धा. खगा इव ।१६। तां मायां गुणमय्या ये तितीर्षन्ति मुनीवरा । स्त्रवन्ती वासनानक्रां त एवार्थविदो भुवि ॥२०॥ अहङ्कार से प्रथम त्रिगुणात्मक पञ्चतन्मात्र प्रकट हुआ। पञ्चतन्मात्र से पञ्चमहाभूत हुए। इस प्रकार प्रकृति में पुरुष के अधिष्ठान करने से ही सृष्टि का उदय होता है ।१६। फिर देवता, दानव, मनुष्य तथा अन्यान्य जीव अर्थात् जितने भी जन्म लेने वाले और मरणधर्मी प्राणी हैं, वे सब उत्पन्न होते हैं ।१७। ईश्वर की माया के वश में पड़े रहने से सभी जीव सांसारिक कार्यों में लिप्त रहे आते हैं तथा अपने उद्धार का प्रयत्न नहीं कर पाते ।१८। अहो, यह माया कैसी बलवती है, जिसके वश में ब्रह्मादि देवता भी नाथे हुए बैल और डोरी से बाँधे हुए पक्षी के समान नाचते करते हैं ।१६। जो मुनिवर इस प्रकार के वासना रूपी नक्र की उत्पत्ति- त्री गुणमयी माया से मुक्त होने का उपाय करते हैं, उन्ही ज्ञानियों का जन्म सार्थक समझो ।२०। मार्कण्डेयो वसिष्ठश्च वामदेवादयोऽपरे । श्रुत्वा गुरुवचो भूय. किमाहु श्रवणादृताः ।२१। राजानोऽनन्तवचनमिति श्रुत्वा सुधोपमम् । किं वा प्राहुरहो सूत ! भविष्यमिह वर्णय ।२२। इति तद्वच आश्रुत्य सूतः सत्कृत्य तं पुनः । कथयामास कात्स्न्र्येन शोकमोहविघातकम् ।२३। तत्रानन्तो भूपगणै. पृष्ट प्राह कृतादर । तपसा मोहनिधनमिन्द्रियाणाञ्च निग्रहम् ।२४। अतोऽहवनमासाद्य तप्तं कृत्वा विब्रानत. । नेन्द्रियाणा न मनसो निग्रहोऽभूत्कदाचन ।२५। शौनक बोले — हे ब्रह्मन् ! मार्कण्डेय, वसिष्ठ, वामदेव तथा अन्यान्य मुनियो ने परमहंस के वचन सुन-कर क्या कहा था ? तथा अनन्त के इस उपाख्यान को सुनने वाले राजाओ ने अनन्त के सुधा के समान

पञ्चम अध्याय-२ ] [ ३४३ वचन सुन कर क्या कहा ? यह सभी भविष्य-वार्ता हमे सुनाइये ।२१- २२। यह सुन कर सूतजी शोक-मोह का नाश करने वाली एव तत्व- ज्ञानमयी उस वार्ता का वर्णन पुनः करने लगे ।२३। सूतजी ने कहा— फिर उन राजागण के जिज्ञासा करने पर अनन्त ने तपस्या के द्वारा माया का निवारण और इन्द्रियो के निग्रह का प्रसग कहा ।२४। II बोला—मैं वन मे पुन जाकर विधिवत् तप करने लगा, तो भी अपनी इन्द्रियो और मन का निग्रह नही कर पाया ।२५। वने ब्रह्म ध्यायतो मे भार्यापुत्रधनादिकम् । विषयान्तरा शश्वत्स्मारयति मे मनः ।२६। तेषा स्मरणमात्रेण दुःखशोकभयादयः । प्रतुदन्ति मम प्राणान्धारणा-ध्याननाशका ।२७। ततोऽह निश्चितमतिरिन्द्रियाणांच घातने । मनसो निग्रहस्तेन भविष्यति न सशय ।।२८।। अतो मामिन्द्रियाणाञ्च निग्रहव्यग्रचेतसम् । तदधिष्ठातृदेवाश्च दृष्ट्वा मामीयुरञ्जसा।२६। रूपिणो मामथोचुस्ते भोऽनन्त ! इति ते दश । दिग्व तार्कप्रचेतोऽश्वि-वह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ।।३०।। मैं जब-जब ब्रह्म का ध्यान करने में तत्पर होता, तब-तब ही मुझे स्त्री, पुत्र, धनादि की बातें स्मरण हो आती और मेरा ध्यान भग हो जाता २६। इस प्रकार स्त्री, पुत्र तथा धनादि का स्मरण होते ही मेरा अन्तरात्मा दुख, शोक और भय आदि से व्याकुल हो जाता । इस प्रकार ध्यान में बाधा उपस्थित हो गई ।२७। मैंने पुनः यह विचार करके कि इन्द्रिय-निग्रह से मन भी वश मे हो जायगा, इन्द्रियो के निग्रह का ही संकल्प किया ।२८। ऐसा संकल्प करके जब मैं इन्द्रियों के दमन मे तत्पर हुआ, तब इन्द्रियो के अधिष्ठातृ देवता मेरी ओर ताकने लगे ।२६। तब दशो इन्द्रियो के अधिष्ठातृ देवताओ ने साक्षात् प्रकट होकर मुझसे कहा--

३४४ ] [ कल्कि पुराण हे अनन्त ! हम दिशा, वात, प्रचेता, अश्विद्वय, अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र और मित्र देवता हैं । ३०। इन्द्रियाणां वयं देवास्तव देहे प्रतिष्ठिताः । नखाग्रकाण्डसभिन्नान्नास्मान्कर्तु मिहार्हसि । ३१ न श्रयो हि तवानन्त ! मनोनिग्रहकर्मणि । छेदने भेदनेऽस्माकं भिन्नमर्मा मरिष्यसि । ३२। अन्धानां बधिराणाञ्च विकलेन्द्रियजीविनाम् । वनेऽपि विषयव्यग्र मानस लक्षयामहे । ३३। जीवस्यापि गृहस्थस्य देहो गेह मनोज्ञनुग । बुद्धिर्भार्या तदनुगा वयमित्यवधारय । ३४। कर्मायत्तस्य जीवस्य मनो बन्धविमुक्तिकृत् । संसारयति लुब्धस्य ब्रह्मणो यस्य मायया । ३५। हम दश इन्द्रियो के अधिष्ठातृ देवगण तुम्हारे देह मे स्थित हैं। हमको नखाग्र से छिन्न-भिन्न करना सर्वथा अनुचित है । ३१। इस प्रकार मन को वश करने के प्रयत्न मे तुम्हारा कल्याण नही होगा । इन्द्रियो के छेदन-भेदन से मर्मस्थल आहत हो जायगा तो तुम्हारी मृत्यु हो जायगी । ३२। अन्धे, बहरे अथवा विकल इन्द्रियो वाले जीव भी निर्जन वन मे वास करते हुए विषयासक्त दिखाई देते हैं । ३३। जीव रूपी गृहस्थ का घर यह देह ही है तथा मन की अनुगता बुद्धि ही इसकी भार्या है। इस प्रकार हम सभी उस बुद्धि रूपी भार्या के ही अनुगत रहते हैं । ३४। सभी जीव अपने कर्म के वश मे हैं । मोक्ष और बन्धन का कारण मन है। प्रभु-माया का अनुगत हुआ मन ही इस लोलुप प्राणी को भवचक्र मे डालता रहता है । ३५। तस्मान्मनोनिग्रहार्थं विष्णुभक्ति समाचर । सुखमोक्षप्रदा नित्य दाहिका सर्वकर्मणाम् ॥३६॥ द्वैताद्वैतप्रदान्दन्दस् न्दोहा हरिभक्तिका । हरिभक्त्या जीवकोष-विनाशान्ते महामते । । ३७।

पंचम अध्याय-२ ] [ ३४५ परं प्राप्स्यसि निर्वाण कल्केरालोकनात्तया । इत्यह बोधितस्तेन भक्तवा सुपूज्य केशवम् ।३८। कल्कि दिदृक्षुरायात. कृष्णं कलिकुलान्तकम् ।।३६।। दृष्ट रूपमरूपस्य स्पृष्टस्तत्पदपल्लवः । अपदस्य श्रुत वाक्यमवाच्यस्य परात्मनः ।४०। इसलिए यदि मन का निग्रह करना है तो भगवान् विष्णु की भक्ति करो । क्योकि वही सब कर्मोकी दाहिका और मोक्ष-सुख के देने वाली है ।।३६।। हरि-भक्ति ही द्वैत-अद्वैत का ज्ञान एव आनन्द और सन्दोह के देने वाली है, उसी के द्वारा जीवकोष का दमन सम्भव है ।३७। कल्कि भगवान् के दर्शन करने से ही तुम मोक्ष को प्राप्त हो जाओगे । परमहंस का यह उपदेश सुनकर मैं भक्ति सहित भगवान् केशव का पूजन करके कलिकुलनाशक कल्किरूप श्रीकृष्ण के दर्शनार्थ यहाँ उपस्थित हुआ । ।३८-३६। यहाँ आकर निराकार ईश्वर के रूप का मुझे दर्शन हुआ । चरण-रहित परमात्मा के चरण-स्पर्श का सौभाग्य प्राप्त हुआ और अवाच्य प्रभु की वाणी सुनाई दी ।४०। इत्यनन्तः प्रमुदितः पद्मानाथ निजेश्वरम् । कल्कि कमलपत्राक्ष नमस्कृत्य ययौ मुनिः ।।४१।। राजानो मुनिवाक्येन निर्वाण-पदवी गता. । कल्किमभ्यर्च्य पद्माञ्च नमस्कृत्य मुनिव्रता. ।।४२।। अनन्तस्य कथामेतामज्ञानध्वान्त-नाशिनीम मायानियन्त्रीं प्रपठञ्छृण्वन्बन्धाद्विमुच्यते ।।४३।। संसाराब्धि-विलासलासमति. श्रीविष्णुसेवापरो भक्त्याख्यानमिद स्वभेद-रहितं निर्माय धर्मात्मना । ज्ञानोल्लास-निशात-खड्गमुदित. सद्भक्ति-दुर्गाश्रयः षड्वर्गञ्जयतादशेषजगतामात्मस्थित वैष्णव. ॥४४॥ यह कह कर अत्यन्त हर्षित हुए मुनिवर अनन्त पद्मपत्राक्ष एवं पद्मा के पति भगवान् कल्कि को नमस्कार करके वहाँ से चले गये ।४१।

३४६ ] [ कल्कि पुराण मुनिवर अनन्त के इन वचनो को सुन कर राजाओ ने भी उनके ही समान व्रतादि का अनुष्ठान किया और पद्मा सहित भगवान् कल्कि का पूजन करके निर्वाण-पदवी को प्राप्त हुए ।४२। शुक बोला—अनन्त की इस कथा के पढने से अज्ञान रूपी अधकार दूर होता तथा भव-माया से छुट- कारा होकर ससार-बधन से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।४३। जो धर्मात्मा पुरुष विष्णु की सेवा तत्पर रह कर भी वासना जनित भवसिन्धु मे गोते लगाते रहते हैं, वे इस प्रसग के द्वारा अभेद-ज्ञान स्वरूप उल्लसित हुई तीक्ष्ण तलवार को धारण करके, हरि-भक्ति रूपी दुर्ग के आश्रय मे स्थित हो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य रूप अपने छ श्रो शत्रुओ पर विजय प्राप्त कर लेते हैं ॥४४॥

द्वितीयांश— षष्ठम अध्याय गते नृपगणे कल्किः पद्मया सह सिंहलात् । शम्भलग्राम-गमने मतिं चक्रे स्वसेनया ॥१॥ तत्त कल्केरभिप्रायं विदित्वा वासवस्त्वरन् । विश्वकर्म्माणमाहूय वचनञ्चेदमब्रवीत् ॥२॥ विश्वकर्मञ्छम्भलेत्वं गृहोद्यानाट्ट-घट्टितम् । रत्नस्फटिक-वैदूर्य्य नानामणि-विनिर्मितैः । तत्रैव शिल्पनैपुण्यं तव यच्चास्ति तत्कुरु ॥४॥ श्रुत्वा हरेर्वचो विश्वकर्मा शर्म निजं स्मरन् । शम्भले कमलेशस्य स्वस्त्यादि-प्रमुखान्गृहान् ॥५॥ सूतजी बोले — फिर जब वे राजागण चले गए तब भगवान् कल्कि ने पद्मा और सेना के सहित सिंहलद्वीप से प्रस्थान करने का विचार किया ।१। जब इन्द्र ने उनका यह अभिप्राय जाना, तब उसने उसी समय विश्वकर्मा को अपने पास बुला कर कहा ।२। इन्द्र बोला — हे विश्वकर्मन् ! तुम सम्भल ग्राम मे जाकर स्वर्ण से अट्टालिकाद्यो से युक्त सुन्दर भवन और उद्यान आदि का निर्माण करो और उन्हे रत्न, स्फटिक तथा वैदूर्यादि विविध प्रकार की मणियो से जड़ कर अपना शिल्प-नैपुण्य दिखाओ ।३-४। इन्द्र के वचन सुन कर विश्वकर्मा अपना कल्याण जानता हुआ शम्भल ग्राम पहुँचा और वहाँ उसने पद्मापति के निमित्त स्वस्ति आदि मगल चिन्हो से युक्त सुन्दर भवनादि का निर्माण किया ।५।, हर्म्यैसिंहसुपर्णादिमुखांश्चक्रे स विश्वकृत् । १४७

३४८ ] [ कल्कि पुराण पर्यंपरि तापघ्नवातायनमनोहरान् ।६। नानावनलतोद्यानसरोवापीसुशोभितः । शम्भलश्चाभवत्केतपेथेन्द्रस्यामरावती ।७। कल्किस्तु सिंहलाद्द्बोपादूबहिः सेनागणैर्वृतः । त्यक्त्वा कारुमती कूले पाथोधेरकरोत्स्थितम् ।८। बृहद्रथस्तु कौमुद्या सहितः स्नेहकातरः । पद्माया सहितायास्मै पद्मनाथाय विष्णवे ।६। ददौ गजानामयुत लक्ष मुख्यञ्च वाजिनाम् । रथानाञ्च द्विसाहस्रं दासीनां द्वे शता मुदा ।१०। दत्त्वा वासांसि रत्नानि भक्तिस्नेहाश्रुलोचनः । तयोर्मुखालोकनेन नाशकत्कियदीरितुम् ।११। हंस, सिंह, गरुड आदि की आकृति से युक्त अनेक प्रकार के गृह बनाये गये । अनेक भवनो मे कई-कई मजिने बनाई गई और गर्मी का ताप शान्त करने के लिए मनोहर वातायन निर्मित किये गये ।६। विचित्र प्रकार के वन, लताओ से युक्त उद्यान, सरोवर और बावडी आदि से समन्वित होने के कारण वह शम्भल ग्राम अमरावती के समान शोभा पाने लगा ।७। इधर भगवान् कल्कि सेना के सहित सिंहल द्वीप की कारु - मती नगरी से निकल कर समुद्र तट पर आये ।८। अपनी रानी कौमुदी के साथ राजा बृहद्रथ स्नेह से कातर हो गया और उसने पद्मा सहित पद्मनाथ को दश हजार हाथी, एक लाख घोडे, दो हजार रथ, दो सो दासियाँ और विविध प्रकार के वस्त्र-रत्नादि भक्ति सहित दिये और आँखों मे स्नेह के आँसू भर कर अपनी पुत्री और जामाता को अपलक देखते रहे ।६-११। महाविष्णुदम्पती तौ प्रस्थाप्य पुनरागतौ । पूजितौ कल्किपद्माभ्यां निजकारुमती पुरीम् ।१२। कल्किस्तु जलघेरम्भो विगाह्य पृतना गणैः । पार जिगमिषु दृष्ट्वा जम्बुक स्तम्भिताऽभवत् ।१३।

पंचम अध्याय-२ ] [ ३४६ जलस्तम्भमथालोक्य कल्कि. सबलवाहन । प्रययौ पद्मया राशेरुपरि श्रीनिकेतन. ॥१४॥ गत्वा पार शुक प्राह याहि मे शम्भलालयम् ।१५। फिर राजा बृहद्रथ ने अपनी पुत्री और जामाता का पूजन कर उन्हे विदा किया और स्वयं अपनी कारुमती नगरी मे लौट गया ।१२। फिर कल्किजी ने सेना के सहित समुद्र के जल मे स्नान किया और तभी वहाँ एक श्रृगाल उस स्तम्भित हुए जल पर होता हुआ पार चला गया ।१६। जब कल्किजी ने जल को इस प्रकार स्तम्भित हुआ देखा तो वे अपनी सेना और वाहनादि के सहित समुद्र के जल पर चलते हुए पार हो गये ।१४। समुद्र के पार पहुँच कर उन्होंने शुक के प्रति कहा -हे शुक ! तुम शम्भल ग्राम स्थित मेरे घर पर जाओ ।१५। विश्वकर्मकृत यत्र देवराजाज्ञया बहु । सद्म सम्बाधममलं मत्प्रियार्थं सुशोभनम् ।१६। तत्रापि पित्रोर्ज्ञातीनां स्वस्ति ब्रूया यथोचितम् । यद्वत्राङ्ग ! विवाहादि सर्वं वक्तुं त्वमर्हसि ।१७। पश्चाद्यामि वृतस्त्वेकैस्त्वमादौ याहि शम्भलम् ।१८। कल्केर्वचनमाकर्ण्य कीरो धीरन्ततो ययौ । आकाशगामी सर्वज्ञ. शम्भल सुरपूजितम् ।१६। सप्तयोजनविस्तीर्णं चातुर्वर्ण्यजनाकुलम् । सूर्य्यश्मिप्रतीकाश प्रासादशतशोभितम् ।२०। देवराज इन्द्र की आज्ञा से मेरा प्रिय करने के लिए वहाँ विश्व- कर्मा ने अनेको शोभा सम्पन्न भवनो का निर्माण किया है ।१६। तुम वहाँ जाकर मेरे माता-पिता और जाति-बन्धुओ को मेरा कुशल समाचार देकर विवाहादि का प्रसग उन्हे बताना ।१७। तुम आगे-आगे शम्भल ग्राम पहुचो, मैं भी सेना सहित पीछे पीछे आ रहा हूँ ।१८। कल्किजी के वचन सुन कर वह धीर शुक आकाश मार्ग से होता हुआ शीघ्र ही शम्भल ग्राम

३५० ] कल्कि पुराण मे जा पहुचा ।१६। सात योजन विस्तार वाले उस शम्भल ग्राम मे चारो वर्ण निवास करते हैं। वहाँ सूय किरणो के समान चमचमाते हुए सैकडो प्रासाद सुशोभित हैं ।२०। सर्वर्तु सुखद रम्य शम्बल विह्वलोऽविशत् ।२१। गृहाद्गृहान्तर दृष्ट्वा प्रासादपि चाम्बरम् । वनाद्वनातर तत्र वृक्षाद्वृक्षान्तर व्रजन् ।२२। शुक. स विष्णुयशशः सदन मुदितोऽव्रजत् । त गत्वा रुचिरालापै. कथयित्वा प्रिया. कथा. ।२३। कल्केरागमन प्राह सिंहलात्पद्मया सह ।२४। ततस्त्वरन्विष्णुयशाः समानोर्यप्रजाजनान् । विशाखयूपभूपाल कथयामास हर्षित. ।२५। सब ऋतुओ में समान सुख देने वाले सुरम्य शम्भल ग्राम को देखते ही विह्वल हुए शुक ने उसमे प्रवेश किया । वह वहां एक घर से दूसरे में, प्रासाद के आगे से आकाश में, एक उद्यान से अन्य उद्यान मे तथा एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर विचरने लगा ।२१-२२ इस प्रकार ह ष- विह्वल शुक विष्णुयशजी के घर में जाकर अपनी मधुर वाणी में उन्ही सम्पूर्ण प्रिय कथा सुनाने लगा ।२३। तथा पद्मा के सहित भगवान् कल्कि के आगमन का समाचार सुनाया ।२४। यह सुनते ही विष्णुयश हर्ष से पुलकित हो उठे और उन्होने विशाखयूप-नरेश आदि राजाओ और प्रजाजनो को वह सब समाचार सुना दिया ।२५। स राज्ञा कारयामास पुर-ग्रामादि मण्डितम् । स्वर्णकुम्भे. सदम्भोभिः पूरितैश्चन्दनोक्षितंः ।२६। कालागुरुसुगन्धाढ्यैर्दीपलाजाङ्कूरक्षतैः । कुसुमैः सुकुमारैश्च रम्भा-पूग-फलान्वितं । शुशुभे शम्भलग्रामो विबुधाना मनोहरः ।२७। त कल्किः प्राविशद्भीम-सेनागण-विलक्षण ।

षष्ठ अध्याय २ ] [ ३५१ कामिनी-नयनानन्दमन्दिराग कृपानिधिः ।२८। पद्मया सहित पित्रोः पदयोः प्रणतोऽपतत् । सुमतिर्मुदिता पुत्र स्नुषा शक्रं शचीमिव । ददृशे त्वमरावत्या पूर्णकामा दिति सती ।२६। तब विशाखयूप-नरेश ने चन्दन युक्त जल को स्वर्णाकलश मे भरवा कर नगर और ग्राम मे उससे छिड़काव कराया ।२६। उस समय वह शम्भल ग्राम दीपमाल, पुष्पो, अगर आदि सुगंधित द्रव्यो, कदली, पुगीफल, नवीन किसलय, अक्षत तथा ताम्बूल आदि से समन्वित होकर देवताओ की पुरी के समान मनोहर दिखाई देने लगा ।२७। इसी अवसर पर स्त्रियो के नेत्रों को आनन्द देने वाले भगवान् कल्कि अपनी सेना आदि के सहित ग्राम मे प्रविष्ट हुए ।२८। भगवान् कल्कि ने पद्मा के सहित अपने माता पिता के चरणो मे प्रणाम किया । जैसे इन्द्र और शची को प्रणाम करते देख कर दिति को आनन्द हुआ था, वैसे ही सुमति भी अपने पुत्र और पुत्रवधू को देख कर पूर्ण मनोरथ एव अत्यत हर्षित हुई ।२६। शम्भलग्राम नगरी पताका ध्वज-शालिनी अवरोधसुजघना प्रासादविपुलस्तनी । मयूरचूचका हस-सघहारमनोहरा ।३०। पटवासोद्योतधूमवसना कोकिलस्वना । सहासगोपुरमुखी वामनेत्रा यथांगना । कल्कि पति गुणवती प्राप्य रेजे तमीश्वरम् ।३१। स रेमे पद्मया तत्र वर्षपूगानजाश्रयः । शम्भले विह्वलाकारः कल्किः कल्कविनाशनः ।३२। कवेः पत्नी कामकला सुषुवे परमेष्ठिनो । बृहत्कीर्त्तिबृहद्वाहू महाबल पराक्रमौ ।३३। प्राज्ञ य सन्नतिर्भार्या तस्या पुत्रौ बभूवतु ।

३२५ ] [ कल्कि पुराण यज्ञविज्ञौ सर्वलोकपूजितौ विजितेन्द्रियौ ।३४। सुमन्त्रकस्तु मालिन्या जनयामास शासनम् । वेगवन्तञ्च साधूना द्वावेतावुपकारको ।।३५।। शम्बल ग्राम नामक वह नगरी ध्वजा-पताका से युक्त उन्नत प्रासादो वाली, मयूर, हंसादि से सुशोभिता, सुगन्ध-धूम-वसना कोकिल के समान मधुरालाप युक्ता तथा कामिनी के समान सर्व प्रकार सजी हुई थी। वह कल्किजी को पति रूप मे प्राप्त कर अत्यन्त शोभामयी हो गई ।३०-३१। वे अजन्मा, सर्वाश्रय रूप एव कलि-विनाशक कल्किजी अनेक वर्ष तक शम्भल मे रह कर पद्मा के साथ बिहार करते रहे ।३२। तद- नन्तर कवि की पत्नी कामकला ने दो पुत्र उत्पन्न किये जिनके नाम बृहत्कीर्ति और बृहद्बाहु हुए । यह दोनो अत्यन्त बली और पराक्रमी थे ।३३। प्राज्ञ की भार्या सुमति ने जितेन्द्रिय और सर्वलोक पूजित यज्ञ और विज्ञ नामक दो पुत्र उत्पन्न किये ।३४। सुमन्त्र की पत्नी मालिनी ने शासन और वेगवान् नामक दो पुत्रो को जन्म दिया । यह दोनो साधुजनो का उपकार करने वाले हुए ।३५। तद्द्वैतः कल्किश्च पद्मायां जयो विजय एव च । द्वौ पुत्रौ जनयामास लोकख्यातौ महाबलौ ।।३६।। एतै परिवृतोऽमात्यै सर्वसम्पन्समान्वितौ । वाजिमेधविधानार्थ मुद्यत पितर प्रभु ।३७। समीक्ष्य कल्कि प्रोवाच पितामहन्निवेश्वरर. । दिशा पालान्विजित्याह घनान्याहृत इत्युत ।३८। कारयिष्याम्याश्वमेध यामि दिग्विजयोय भो ! ।३६। इति प्रणम्य त प्रीत्या कल्कि पटपुरञ्जयः । सेनागणैः परिवृतः प्रययौ कोकट पुरम् ।४०। कल्किजी की पत्नी पद्मा ने जय, विजय नामक दो पुत्र प्रसव किये । यह दोनो महाबली तीनो लोको में प्रसिद्ध हुए ।३६। इस प्रकार उनका परिवार पुत्रवान् और सर्व ऐश्वर्य सम्पन्न हो गया । फिर कल्कि

षष्ठम अध्याय-२ ] [ ३५३ जी ने अपने पिता को अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान मे ब्रह्माजी के समान तत्पर देखकर कहा— हे पिता जी ! मैं दिक्पालो को जीत कर धन एकत्र करूँगा, जिससे आपका अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न होगा । अब मैं दिग्विजय के लिए प्रस्थान करता हूँ । ३७-३६। शत्रु-पुर पर विजय प्राप्त करने वाले कल्किजी ने यह कह कर प्रसन्नतापूर्वक अपने पिता को प्रणाम किया और सेना को साथ लेकर कीकटपुर की ओर चल दिये ।४०। बुद्धालय सुविपुल वेदधर्मबहिष्कृतम् । पितृदेवार्चनाहीन परलोकविलोपकम् ।४१। देहात्मवादबहुल कुलजातिविवर्जितम् । धने स्त्रीभिर्भक्ष्यभोज्यै. स्वपराभेददर्शिनम् ।४२। नानाजनैः परिवृत पानभोजनतत्परैः ।४३। श्रुत्वा जिनो निजगणै कल्केरागमन क्रुधा । अक्षौहिणीभ्या सहित. सबभूव पुराद्बहिः ।४४। गजरथतुरगै समाचिता भू कनक विभूषणभूषितैर्वराङ्गै । शत शतरथिभिधृतास्त्रशस्त्रै.। ध्वजपटराजि- निवारितातपर्विभो सा ॥४५॥ अत्यन्त विस्तार वाला कीकटपुर बौद्धों का निवास स्थान था । यहाँ रहने वाले व्यक्ति वैदिक धर्म तथा देवता और पितरो के अर्चन से हीन और परलोक के न मानने वाले थे ।४१। यह लोग देहात्मवादी, कुल धर्म और जाति धर्म के न मानने वाले तथा धन, स्त्री और भोज- नादि मे अभेद देखने वाले थे ।४२। पान एव भोजन मे ही व्यस्त रहने वाले विविध प्रकार के मनुष्यो से ही यह नगर परिपूर्ण था ।४३। वहाँ के अधिपति जिन ने जब युद्ध के अभिप्राय से सेना सहित कल्किजी का आग- मन सुना तो वह प्रतीकारार्थ दो अक्षौहिणी सेना को लेकर नगर से बाहर आया ।४४। असंख्य हाथी, रथ, अश्व स्वर्ण के आभूषणों से भूषित श्रेष्ठ रथी और शस्त्रास्त्रधारी वीरो से पृथिवी ढक गई । सेनाओ के ध्वजो से धूप भी रुक गई ।४५।

द्वितीयांश— सप्तम अध्याय ततो विष्णु : सर्वजिष्णु कल्कि कल्कविनाशनः । कालयामास ता सेना करिणीमिव केसरी ।१। सेनागना ता रतिसगरक्षती रक्ताक्तवस्त्रा विवृतोरुमध्‍याम् । पलायती चारुविकीर्णकेशा विकूजती प्राह स कल्किनायकः ॥२॥ रे बौद्धा ! मा पलायध्व निवर्त्तध्व रणाङ्कणे । युध्यध्व पौरुष साधु दर्शयध्व पुनर्मम ॥३॥ जिनो हीनबल कोपात्कल्केराकर्ण्य तद्वचः । प्रतियोद्धु वृषारूढः खड्गचर्मधरो ययौ ।४। नाना प्रहरणोपेतो नानायुधविशारद कल्किना युयुधे धीरो देवाना विस्मयावहः ॥५॥ सूतजी बोले—जैसे सिंह हथियो पर आक्रमण करता है, वैसे ही पाप का नाश करने वाले तथा सब विजेता कल्किजी ने उसकी सेना पर आक्रमण कर दिया ।१। युद्ध रुधिर रूपी वस्त्रो का धारण करने वाली विवृत ऊरु सम्पन्ना, विकीर्ण केशा प्रलाप करती हुई अर्थात हाहाकार करती हुई, रति युद्ध में आहत नारी के समान भागने वाली उस सेना से कल्किजी ने कहा ।२। अरे बौद्धो ! तुम इस युद्ध स्थल से मत भागो । आओ, लौट आओ और अपना पौरुष दिखाने मे पीछे न हटो ।३। कल्कि की बात सुन कर बल से हीन हुआ जिन क्रोध पूर्वक चर्म की तलवार लेकर युद्ध करने के लिए उनके समक्ष आया ।४। विविध प्रकार के युद्धो मे विशारद जिन कल्किजी से युद्ध करने लगा । उसका रणचातुर्य देख कर देवता भी आश्चर्य करने लगे ।५। ३५४

षष्ठम अध्याय-२ ] [ ३५५ शूलेन तुरगं विद्वा कल्कि बाणेन मोहयन् । क्रोडीकृत्य द्रुतं भूमेर्नाशक्तस्तोलना हत ।५। जिनो विश्वम्भरं ज्ञात्वा क्रोधाकुलितलोचनः । चिच्छेदास्य तनुत्राणं कल्केः शस्त्रञ्च दासवत् ।७। विशाखयूपोऽपि तथा निहत्य गदया जिनम् । मूर्च्छितं कल्किमादाय लीलया रथमारुहत् ।८। लब्धसञ्ज्ञस्तथा कल्किः सेवकोत्साहदायकः । समुत्पत्य रथात्तस्य नृपस्य जिनमाययौ ।६। शूलव्यथां विहायजौ महासत्त्वस्तुरङ्गम रिगणैर्भ्रमणैः पादविक्षेपेहननैर्मुहुः ।१०। दण्डाघातैः सटाक्षेपैर्बौद्धसेनागणान्तरे । निजघान रिपून्कोपाच्छतशोऽथ सहस्रशः ॥११॥ उसने अपने शूल से अश्व को विद्ध कर दिया तथा बाण से कल्किजी को सम्मोहित कर अंक मे भरने लगा, परन्तु उसे सफलता नही मिली ।५। जिन न कल्कि को विश्वंभर रूप जान लिया और क्रोध पूर्वक नेत्रो से उन्हे बदी के समान देखना हुआ, उसने उनके शस्त्रास्त्र और कवच को छिन्न-भिन्न कर दिया ।७। यह देख कर विशाखयूप-नरेश ने अपनी गदा से जिन को आहत कर दिया और लीला पूर्वक मूर्च्छित हुए कल्किजी को लेकर रथ पर चढ गये ।८। जब उन्हे चेत हुआ, तब वे भक्तो को उत्साह देने वाले कल्किजी राजा के रथ से उतर कर जिन के सामने पहुँचे ।६। कल्किजी का अश्व भी शूल की वेदना को भूल कर युद्धभूमि मे कूद पडा और घूमता हुआ पदाघात, दन्ताघात, केशघात आदि के द्वारा बौद्ध सेना के हजारो वीरो को क्रोधपूर्वक मारने लगा ।१०-११। निश्वासवातैरुड्डीय केचिद्द्दीपान्तरेऽपतन् । हस्त्याश्वरथसङ्घाधाः पतिता रणमूर्द्धनि ।१२।

३५६ ] [ कल्कि पुराण गर्ग्यो जघ्नु षष्टिशत भर्ग्य कोटिशतायुतम् । विशालास्तु सहस्राणा पञ्चाविश रणे त्वरन् ।१३। अयुते द्वे जघानाजौ पुत्राभ्या सहितः कवि । दशलक्ष तथा प्राज्ञ पञ्चलक्ष सुमन्त्रक ।१४। जिन प्राह हन्सकल्किस्तिष्ठाग्रे ममदुर्मते ! । दैव मा विद्धि सर्वत्र शुभाशुभफलप्रदम् ।१५। अश्व के भयंकर श्वास से उड कर कोई-कोई वीर तो अन्य द्वीपो मे जाकर गिर गये तथा कुछ वीर गज, अश्व एव रथादि से टक्कर खा कर युद्ध स्थल मे ही धराशायी हो गये ।१२। गर्ग्य ने अपने अनुगामियो को साथ लेकर बौद्धो की छ. हजार सेना का सहार कर दिया। भर्ग्य और उसकी सेना ने दस हजार सेना मार दी तथा विशाल और उसकी सेना ने पच्चीस हजार सेना नष्ट कर डाली ।१३। कवि और उनके दोनो पुत्रो ने बीस सहस्र सैनिक मार डाले । प्राज्ञ ने दस लाख और सुमन्त्रक ने पाँच लाख सेना का सहार कर दिया ।१४। फिर जिन को भागता देख कर कल्किजी ने हँस कर उससे कहा-अरे दुर्मते ! भाग कर न जा । तू मुझे अदृष्ट स्वरूप एव सभी शुभाशुभ फलो का देने वाला समझ कर मेरे सामने आ ।१५। मद्बाणजालभिन्नाङ्गो निःसङ्गो यास्यसि क्षयम् । न यावत्पश्य तावत्व बन्धूना ललित मुखम् ।१६। कल्केरितीरित श्रुत्वा जिन ग्राह हसन्बली । दैव त्वदृश्य शास्त्रे ते वधोऽयमुरीकृतः । प्रत्यक्षवादिनो बौद्धा वय यूय वृथाश्रमाः ।१७ यदि वा दैवरूपस्त्व तथाप्यग्रे स्थिता वयम् । यदि भेत्तासि बाणौघैस्तदा बौद्धैः किमत्र ते ।१८। सोपालम्भ त्वया ख्यातं त्वयेवास्तु स्थिरो भव । इति क्रोधाद्वाणजालै. कल्किं घोरै. समावृणोत् ।१६।

षष्ठम अध्याय-२ ] [ ३५७ स तु बाणमयं वर्षं क्षयं निन्येऽर्कवद्धिमम् ॥२०॥ तू मेरे बाणो से आहत होकर अभी परलोक को प्राप्त होगा । तब तेरा साथ कोई भी नही देगा । इसलिए अब तू अपने बधु-बांधवो का सुन्दर मुख देख ले । १६। कल्किजी के वचन सुन कर वह बली जिन हँसा हुआ बोला--अदृष्ट कभी समक्ष नही हो सकता । हम बौद्ध गण प्रत्यक्षके अतिरिक्त अन्य कुछभी नही मानते । हमारा शास्त्र कहता है कि हम अदृष्ट को नष्ट कर देंगे ।१७। यदि तुम दैव रूप हो तो हम तुम्हारे सामने खडे हैं । यदि तुम हमे बाण से आहत करोगे तो क्या बौद्ध गण तुम्हे छोड देंगे ।१८। जो तुम हमारे प्रति तिरस्कार के वचन कहते हो, वे वचन तुम पर ही लौट जाएँगे, अब तुम सावधान होजाओ । यह कह कर जिन ने अपने तीक्ष्ण बाणो से कल्किजी को समावृत्त कर दिया ।१९। जैसे सूर्य के दिखाई देने पर हिमपात नाश को प्राप्त होता है, वैसे ही जिन द्वारा की गई बाण-वर्षा कल्किजी के स्पर्श से क्षीण होने लगी ।२०। ब्राह्म वायव्यमाग्नेय पार्जन्यं चान्यदायुधम् । कल्केर्दर्शनमात्रेण निष्फलान्यभवन्क्षणात् ।२१। यथोपरे बीजमुप्त दानमश्रोत्रिये यथा । यथा विष्णौ मता द्वेषाद्भक्तिर्येन कृताप्यहो ।२२। कल्किस्तु तं वृषारूढमवप्लुत्य कचेऽग्रहीत् । ततस्तौ पेततुर्भू मौ ताम्रचूडाविव क्रु धा ।२३। पतित्वा स कल्किकचं जग्राह कट्करं करे ।२४। तत. समुत्थितौ व्यग्रौ यथा चाणूरकेशवौ । धृतहस्तौ धृतकचौ ऋक्षाविव महाबलौ । युयुधाते महावीरो जिनकल्की निरायुधौ ।२५। जिन द्वारा प्रेरित ब्रह्मास्त्र, वायव्या, आग्नेयास्त्र, मेघास्त्र और अन्यान्य सभी अस्त्र कल्किजी के दर्शन मात्र फल-हीन हो गये ।२१। जैसे