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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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ब्राह्मण ३ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४६१

ब्राह्मण ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६१ उद्गान किया । घ्राणमें जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और जो कुछ वह शुभ गन्ध सूँघता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके समीप जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अनुचित सूँघता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है । फिर उन्होंने चक्षुसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो।' तब चक्षुने "तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया । चक्षुमे जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और जो कुछ वह शुभ दर्शन करता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध कर दिया। यह जो अनुचित (निषिद्ध पदार्थोंको) देखता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है । फिर उन्होंने श्रोत्रसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो।' तब श्रोत्रने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया । श्रोत्रमें जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और वह जो शुभ श्रवण करता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अनुचित ( ईश्वरनिन्दा, परनिन्दा, आत्म प्रशंसा आदि) श्रवण करता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है। फिर उन्होंने मनसे कहा, 'तुम हमारे लिये उद्गान करो ।' तब मनने 'तथास्तु' कहकर उनके लिये उद्गान किया । मनमें जो भोग है, उसे उसने देवताओंके लिये आगाान किया और वह जो शुभ सङ्कल्प करता है, उसे अपने लिये गाया । असुरोंको मालूम हुआ कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उसके पास जाकर उन्होंने उसे पापसे विद्ध कर दिया । यह जो अनुचित (काम-क्रोध लोभ-वैर- हिंसा आदिके) सङ्कल्प करता है, यही वह पाप है, यही वह पाप है। इस प्रकार निश्चय ही इन देवताओंको पापका ससर्ग हुआ और ऐसे ही [ असुरोंने ] इन्हें पापसे विद्ध किया ॥ २-६॥ फिर अपने मुखमें रहनेवाले प्राणसे कहा, 'तुम हमा लिये उद्गान करो।' तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर इस प्राणने उनके लिये उद्गान किया । असुरोंने जाना कि इस उद्गाताके द्वारा देवगण हमारा अतिक्रमण करेंगे । अतः उन्होंने उसके पास जाकर उसे पापसे विद्ध करना चाहा। किंतु जिस प्रकार पत्थरसे टकराकर मिट्टीका ढेला नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार वे विध्वस्त होकर अनेक प्रकारसे नष्ट हो गये । तब देवगण [ विजेता होकर ] प्रकृतिस्थ हो गये और असुरोंका पराभव हुआ । जो इस प्रकार जानता है, वह प्रजापतिरूपसे स्थित होता है और उससे द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य (सौतेले भाई) का पराभव होता है ॥ ७ ॥ वे बोले, 'जिसने हमें इस प्रकार देवभावको प्राप्त करवाया हे, वह कहाँ है ?' [उन्होंने विचार करके निश्चय किया कि] 'यह आस्य ( मुख ) के भीतर है, अतः यह अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि यह अङ्गोंका सार-रस है।' इस पूर्वोक्त देवताका 'दूर' नाम है, क्योकि इससे मृत्यु दूर है । जो ऐसा जानता है, उससे मृत्यु दूर रहता है ॥ ८-९ ॥ उस इस प्राणदेवताने इन वागादि देवताओंके पापरूप मृत्युको हटाकर जहाँ इन दिशाओंका अन्त है वहाँ पहुँचा दिया । वहाँ इनके पापको उसने तिरस्कारपूर्वक स्थापित कर दिया । अतः 'मैं पापरूप मृत्युसे संश्लिष्ट न हो जाऊँ' इस भयसे अन्त्यजनोंके पास न जाय और अन्त दिशामें भी न जाय । उस इस प्राणदेवताने इन देवताओंके पापरूप मृत्युको दूरकर फिर इन्हें मृत्युके पार [ अग्न्यादि देवतात्म- भावको प्राप्त ] कर दिया । उस प्रसिद्ध प्राणने प्रधान वाग्देवताको [ मृत्युके ] पार पहुँचाया। वह वाक् जिस समय मृत्युसे पार हुई, यह अग्नि हो गयी। वह यह अग्नि मृत्युसे परे उसका अतिक्रमण करके देदीप्यमान है। फिर प्राणका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह वायु हो गया। वह यह अतिक्रान्त वायु मृत्युने परे बहता है। फिर चक्षुका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह आदित्य हो गया । वह यह अतिक्रान्त आदित्य मृत्युसे परे तपता है। फिर श्रोत्रका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह दिशा हो गया । वे ये अतिक्रान्त दिशाएँ मृत्युसे परे हैं। फिर मनका अतिवहन किया। वह जिस समय मृत्युसे पार हुआ, यह चन्द्रमा हो गया। वह यह अतिक्रान्त चन्द्रमा मृत्युसे परे प्रकाशमान है। इसी प्रकार यह देवता उसका मृत्युसे अतिवहन करती है -जो कि इसे इस प्रकार जानता है। फिर उसने अपने लिये अन्नाद्यरूपी खाद्यका आवाहन किया, क्योंकि जो भी कुछ अन्न खाया जाता है, वह प्राणके ही द्वारा खाया जाता है तथा उस अन्नमें प्राण प्रतिष्ठित होता है ॥ १०-१७ ॥ वे देवगण बोले, 'यह जो अन्न है, वह सब तो इतना ही है, उसे तुमने अपने लिये आवाहन कर लिया है। अतः

४६२ - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ अध्याय १

४६२ - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ अध्याय १

अब पीछेसे हमें भी इस अन्नमे भागी बनाओ।' [ प्राणने कहा ] 'वे तुमलोग सब ओरसे मुझमे प्रवेश कर जाओ।' तब 'बहुत अच्छा' ऐसा कहकर वे सब ओरसे उसने प्रवेश कर गये । अतः प्राणके द्वारा पुरुष जो अन्न खाता है उससे ये प्राय भी तृप्त होते हैं। अतः जो इस प्रकार जानता है उसका ज्ञाति-जन सब ओरसे आश्रय ग्रहण करते हैं वह स्वजनोंका भरण करनेवाला उनमें श्रेष्ठ और उनके आगे चलनेवाला होता है तथा अन्न भक्षण करनेवाला और सबका अधिपति होता है। ज्ञातियोंमेसे जो भी इस प्रकार जानने- वालेके प्रति प्रतिकूल होना चाहता है वह अपने आश्रितोंका पोषण करनेमें समर्थ नहीं होता और जो भी इसके अनुकूल रहता है—जो भी इसके अनुसार रहकर अपने आश्रितोंका भरण करना चाहता है वह निश्चय ही अपने आश्रितोंके भरणमें समर्थ होता है ॥ १८ ॥

वह प्राण अयास्य आङ्गिरस है, क्योकि वह अङ्गोंका रस (सार) है। प्राण ही अङ्गोंका रस है, निश्चय प्राण ही अङ्गोंका रस है क्योंकि जिस किसी अङ्गसे प्राण उत्क्रमण कर जाता है वह उसी जगह सूख जाता है, अतः यही अङ्गोंका रस है। यही वृहस्पति है । वाक् ही बृहती है, उसका यह पति है इसलिये यह बृहस्पति है । यही ब्रह्मणस्पति है। वाक् ही ब्रह्म—वेद है, उसका यह पति है, इसलिये यह ब्रह्मणस्पति है। यही साम है। वाक् ही 'सा' है और यह (प्राण) अम है। 'सा' और 'अम ही साम हैं। यही सामका सामत्व है। क्योकि यह प्राण मक्खीके समान है, मच्छरके समान है, हाथीके समान है, इस त्रिलोकीके समान है और इस सभीके समान है, इसीसे यह साम है। जो इस सामको इस प्रकार जानता है वह सामका सायुज्य और उसकी सलोकता प्राप्त करता है। यही उद्गीथ है। प्राण ही उत् है, प्राणके द्वारा ही यह सब उत्तब्ध—धारण किया हुआ है। वाक् ही गीथा है। वह उत् है और गीथा भी है इसलिये उद्गीथ है ॥ १९-२३ ॥

उस [प्राण] के विषयमे यह आख्यायिका भी है— चैकितानेय ब्रहादत्तने यज्ञमें सोम भक्षण करते हुए कहा, 'यदि अयास्य और आङ्गिरसनामक मुख्य प्राणने वाणीसे युक्त प्राणसे भिन्न अन्य देवताद्वारा उद्गान किया हो तो यह सोम मेरा सिर गिरा दे।' अतः उसने प्राण और वाक्‌ने ही द्वारा उद्गान किया था—ऐसा निश्चय होता है ॥ २४ ॥

जो इस पूर्वोक्त सामसम्बन्धान्य मुख्य प्राणके स्व (धन) को जानता है उसे धन प्राप्त होता है । निश्चय स्वर ही उसका धन है। अतः ऋत्विक् कर्म करनेवालेको वाणीमे स्वरकी इच्छा करनी चाहिये। उस स्वरसम्पन्न वाणीसे ऋत्विक् कर्म करे । इसीसे यज्ञमे स्वरवान् उद्गाताको देखनेकी इच्छा करते ही हैं। लोकमे भी जिसके पास धन होता है [उसे ही देखना चाहते हैं]। जो इस प्रकार इस सामके धनको जानता है उसे धन प्राप्त होता है। जो उस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण प्राप्त होता है। उसका स्वर ही सुवर्ण है। जो इस प्रकार इस सामके सुवर्णको जानता है उसे सुवर्ण मिलता है। जो उस सामकी प्रतिष्ठाको जानता है वह प्रतिष्ठित होता है। उसकी वाणी ही प्रतिष्ठा है। निश्चय वाणीमे प्रतिष्ठित हुआ ही यह प्राण गाया जाता है। कोई-कोई यह कहते हैं कि 'वह अन्नमे प्रतिष्ठित होकर गाया जाता है ॥ २५-२७ ॥

अब आगे पवमान नामक सामोंका ही अभ्यारोह कहा जाता है। वह प्रस्तोता निश्चय सामका ही प्रस्ताव (आरम्भ) करता है। जिस समय वह प्रस्ताव करे उस समय इन मन्त्रोको जपे—'असतो मा सङ्गमय 'तमसो मा ज्योतिर्गमय'• 'मृत्योर्माऽमृतं गमय' ।* वह जिस समय कहता है—'मुझे असत्से सत्की ओर ले जाओ यहाँ मृत्यु ही असन् है और अमृत सन् है । अतः वह यही कहता है कि मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ अर्थात् मुझे अमर कर दो। जब कहता है—'मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले जाओ तो यहाँ मृत्यु ही अन्धकार है और अमृत ज्योति है। यानी उसका यही कथन है कि मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ—मुझे अमर कर दो। मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले जाओ—इसमें तो कोई बात छिपी है ही नहीं। इनके पीछे जो अन्य स्तोत्र हैं उनमे अपने लिये अन्नाद्यका आगान करे । उनका गान किये जानेपर यजमान वर माँगे और जिस भोगकी इच्छा हो, उसे माँगे । इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता अपने या यजमानके लिये जिस भोगकी कामना करता है उसीका आगान करता है। वह यह प्राणदर्शन लोकप्राप्तिका साधन है। जो इस प्रकार इस सामको जानता है उसे लोक-प्राप्ति न होनेकी आशा तो होती ही नही ॥ २८ ॥


  • 'मुझे असत्‌से सत्‌की ओर ले जाओ', 'मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले जाओ', 'मुझे मृत्युसे अमृतत्वकी ओर ले जाओ।'

ब्राह्मण ४ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४६३

ब्राह्मण ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६३ चतुर्थ ब्राह्मण ब्रह्मकी सर्वरूपता और चातुर्वर्ण्यकी सृष्टि पहले यह पुरुषाकार आत्मा ही था। उसने आलोचना करनेपर अपनेसे भिन्न और कोई न देखा। उसने आरम्भमें 'अहमस्मि' ऐसा कहा, इसलिये उसका 'अहम्' नाम हुआ। इसीसे अब भी पुकारे जानेपर पहले 'अयमहम्' ऐसा ही कहकर उसके पश्चात् अपना जो दूसरा नाम होता है वह बतलाता है। क्योंकि इस सबसे पूर्ववर्ती उस [आत्मसञ्ज्ञक प्रजापति] ने समस्त पापोंको उपन-दग्ध कर दिया था इसलिये यह पुरुष हुआ। जो ऐसी उपासना करता है, वह उसे दग्ध कर देता है, जोउससे पहले प्रजापति होना चाहता है ॥ १ ॥ वह भयभीत हो गया। इसीसे अकेला पुरुष भय मानता है। उसने यह विचार किया 'यदि मेरे सिवा कोई दूसरा नहीं है तो मैं किससे डरता हूँ १' तभी उसका भय निवृत्त हो गया। किंतु उसे भय क्यों हुआ ? क्योंकि भय तो दूसरेसे ही होता है। वह [ अकेला ] रमण नहीं करता था। इसी कारण अब भी एकाकी पुरुष रमण नहीं करता। उसने दूसरेकी इच्छा की। जिस प्रकार परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुष होते हैं, वैसा ही उसका परिमाण हो गया। उसने इस अपनी देहको ही दो भागोंमें विभक्त कर डाला। उससे पति और पत्नी हुए। इसलिये यह शरीर अर्द्धबृगल (द्विदल अन्नके एक दल) के समान है—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा। इसलिये यह [ पुरुषार्द्ध ] आकाश स्त्रीसे पूर्ण होता है। वह उस (स्त्री) से संयुक्त हुआ, उसीसे मनुष्य उत्पन्न हुए हैं। उस (शतरूपा) ने यह विचार किया कि 'अपनेसे ही उत्पन्न करके यह मुझसे क्यों समागम करता है ? अच्छा, मैं छिप जाऊँ' अतः वह गौ हो गयी, तब दूसरा यानी मनु वृषभ होकर उससे सम्भोग करने लगा, इससे गाय-बैल उत्पन्न हुए। तब वह घोड़ी हो गयी और मनु अश्वश्रेष्ठ हो गया। फिर वह गर्दमी हो गयी और मनु गर्दभ हो गया और उससे समागम करने लगा। इससे एक खुरवाले पशु उत्पन्न हुए। तदनन्तर शतरूपा बकरी हो गयी और मनु बकरा हो गया। फिर वह भेड़ हो गयी और मनु मेढ़ा होकर उससे समागम करने लगा। इससे बकरी और भेड़ोंकी उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार चींटीसे लेकर ये जितने मिथुन (स्त्री-पुरुषरूप जोड़े) हैं, उन सभीकी उन्होंने रचना कर डाली ॥ २-४ ॥ १ मैं हूँ। २ यह मैं हूँ। उस प्रजापतिने 'मैं ही सृष्टि हूँ' ऐसा जाना। मैने इस सबको रचा है। इस कारण वह 'सृष्टि' नामवाला हुआ। जो ऐसा जानता है वह इस (प्रजापति) की सृष्टिमें [ स्रष्टा ] होता है। फिर उसने इस प्रकार मन्थन किया। उसने मुखरूप योनिसे दोनों हाथोंद्वारा [ मन्थन करके ] अग्निको रचा। इसलिये ये दोनों भीतरकी ओरसे रोमरहित हैं, क्योंकि योनि भी भीतरसे रोमरहित ही होती है। अत [ याज्ञिक लोग अग्नि, इन्द्र आदिको ] एक-एक (भिन्न-भिन्न) देवता मानते हुए जो ऐसा कहते हैं कि 'इस (अग्नि) का यजन करो, इस (इन्द्र) का यजन करो' सो वह तो इस एक ही देवकी विसृष्टि है। यह [ प्रजापति ] ही सर्वदेवरूप है। इसके बाद जो कुछ यह द्रवरूप है, उसे उसने वीर्यसे उत्पन्न किया, वही सोम है। इतना ही यह सब अन्न और अन्नाद है। सोम ही अन्न है और अग्नि ही अन्नाद है। यह ब्रह्माकी अति- सृष्टि है कि उसने अपनेसे उत्कृष्ट देवताओंकी रचना की— स्वयं मर्त्य होनेपर भी अमृर्तोंको उत्पन्न किया। इसलिये यह अतिसृष्टि है। जो इस प्रकार जानता है वह इसकी इस अति- सृष्टिमें ही हो जाता है ॥ ५-६ ॥ यह पूर्वोक्त जगत् उस समय (उत्पत्तिसे पूर्व) अव्याकृत था। वह नाम-रूपके योगसे व्यक्त हुआ, अर्थात् 'यह इस नाम और इस रूपवाला है' इस प्रकार व्यक्त हुआ। अतः इस समय भी यह अव्याकृत वस्तु 'इस नाम और इस रूपवाली है' इस प्रकार व्यक्त होती है। वह यह (व्यक्तात्मा) इस (शरीर) में नखाग्रपर्यन्त प्रविष्ट किये हुए है, जिस प्रकार कि क्षुरा क्षुरेके घरमें छिपा रहता है अथवा विश्वका भरण करनेवाला अग्नि अग्निके आश्रय (काष्ठादि) में गुप्त रहता है। परन्तु उसे लोग देख नहीं सकते। वह असम्पूर्ण है; प्राणनक्रियाके कारण ही वह प्राण है, बोलनेके कारण वाक् है, देखनेके कारण चक्षु है, सुननेके कारण श्रोत्र है और मनन करनेके कारण मन है। ये इसके कर्मानुसारी नाम ही हैं। अतः इनमेंसे जो एक एककी उपासना करता है, वह नहीं जानता। वह असम्पूर्ण ही है। वह एक एक विशेषणसे ही युक्त होता है। अतः 'आत्मा है' इस प्रकार ही उसकी उपासना करे, क्योंकि इस (आत्मा) में ही वे सब एक हो जाते हैं। यह जो आत्मा है, वही इन सबका प्राप्य है, क्योंकि यह

४६४ - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ अध्याय १

  • ४६४ - बृहदारण्यकोपनिषद् - [ अध्याय १ आत्मा है, उस आत्माके ज्ञात होनेसे ही मनुष्य इस सब जगत्‌को जानता है। जिस प्रकार पदों (खुर आदिके चिन्हों) द्वारा [खोये हुए पशुको] प्राप्त कर लेते हैं, उसी प्रकार जो ऐसा जानता है, वह इसके द्वारा यश और इष्ट पुरुषोंका सहवास प्राप्त करता है। वह यह आत्मतत्त्व पुत्रसे अधिक प्रिय है, धनसे अधिक प्रिय है, और अन्य सबसे भी अधिक प्रिय है, क्योंकि यह आत्मा उनकी अपेक्षा अन्तरतर है। वह जो आत्मप्रियदर्शी है यदि आत्मासे भिन्न (अनात्मा) को प्रिय कहनेवाले पुरुषसे कहे कि 'तेरा प्रिय नष्ट हो जायगा' तो वैसा ही हो जायगा, क्योंकि वह समर्थ होता है। अतः आत्मारूप प्रियकी ही उपासना करे। जो आत्मारूप प्रियकी ही उपासना करता है उसका प्रिय अत्यन्त मरणशील नहीं होता ॥ ७-८ ॥ [ब्राह्मणोंने] यह कहा कि ब्रह्मविद्याके द्वारा मनुष्य 'हम सर्व हो जायँगे ऐसा मानते हैं, [सो] उस ब्रह्मने क्या जाना जिससे वह सर्व हो गया ?' ॥ ९ ॥ पहले यह ब्रह्म ही था, उसने अपनेको ही जाना कि मैं 'ब्रह्म हूँ'। अतः वह सर्व हो गया। उसे देवोंमेंसे जिस जिसने जाना, वही तद्रूप हो गया। इसी प्रकार ऋषियों और मनुष्यों- मेंसे भी [जिसने उसे जाना, वह तद्रूप हो गया]। उसे आत्मरूपसे देखते हुए ऋषि वामदेवने जाना-'मैं मनु हुआ और सूर्य भी।' उस उस ब्रह्मको इस समय भी जो इस प्रकार जानता है कि मैं 'ब्रह्म हूँ', वह यह सर्व हो जाता है। उसके पराभवमें देवता भी समर्थ नहीं होते, क्योंकि वह उनका आत्मा ही हो जाता है। और जो अन्य देवताकी 'यह अन्य है और मैं अन्य हूँ' इस प्रकार उपासना करता है, वह नहीं जानता। जैसे पशु होता है, वैसे ही वह देवताओंका पशु है। जैसे लोकमें बहुत से पशु मनुष्यका पालन करते हैं, उसी प्रकार एक एक मनुष्य देवताओंका पालन करता है। एक पशुका ही हरण किये जानेपर अच्छा नहीं लगता, फिर बहुतोंका हरण होनेपर तो कहना ही क्या है? इसलिये देवताओंको यह प्रिय नहीं है कि मनुष्य [ब्रह्मात्मतत्त्वको] जानें ॥ १० ॥ आरम्भमें यह एक ब्रह्म ही था। अकेला होनेके कारण वह विभूतियुक्त कर्म करनेमे समर्थ नहीं हुआ। उसने अति- शयतासे क्षत्र रूप प्रशस्त रूपकी रचना की। अर्थात् देवताओं- में क्षत्रिय जो ये इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, मेघ, यम, मृत्यु और ईशानादि हैं, उन्हें उत्पन्न किया। अतः क्षत्रियसे उत्कृष्ट कोई नहीं है। इसीसे राजसूय यज्ञमें ब्राह्मण नीचे बैठकर क्षत्रियकी उपासना करता है, वह क्षत्रियमे ही अपने यशको स्थापित करता है। यह जो ब्राह्मण है, क्षत्रियकी योनि है। इसलिये यद्यपि राजा उत्कृष्टताको प्राप्त होता है तो भी [राजसूयके] अन्तमे वह ब्राह्मणका ही आश्रय लेता है। अतः जो क्षत्रिय इस (ब्राह्मण) की हिंसा करता है, वह अपनी योनिका ही नाश करता है। जिस प्रकार श्रेष्ठकी हिंसा करनेसे पुरुष पापी होता है, उसी प्रकार वह पापी होता है ॥ ११ ॥ वह (ब्रह्म) विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने वैश्यजातिकी रचना की। जो ये वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और मरुत् इत्यादि देवगण गणशः कहे जाते हैं [उन्हें उत्पन्न किया]। [फिर भी] वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने शूद्रवर्णकी रचना की। पूषा शूद्रवर्ण है। यह पृथिवी ही पूषा है, क्योंकि यह जो कुछ है, यही उसका पोषण करती है ॥ १२-१३ ॥ तब भी वह विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने अतिशयतासे श्रेयरूप धर्मको रचा। यह जो धर्म है, क्षत्रियका भी नियन्ता है। अतः धर्मसे उत्कृष्ट कुछ नहीं है। इसलिये जिस प्रकार राजाकी सहायतासे [प्रबल शत्रुको भी जीतनेकी शक्ति आ जाती है] उसी प्रकार धर्मके द्वारा निर्बल पुरुष भी बलवान्‌को जीतनेकी इच्छा करने लगता है। वह जो धर्म है, निश्चय सत्य ही है। इसीसे सत्य बोलनेवालेके विषयमें कहते हैं कि 'यह धर्म भाषण करता है' तथा धर्म भाषण करनेवालेसे कहते हैं कि 'यह सत्य भाषण करता है', क्योंकि ये दोनों यही (धर्म ही) हैं ॥ १४ ॥ वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण हैं। [इन्हें उत्पन्न करनेवाला] ब्रह्म अग्निरूपसे देवताओंमें ब्राह्मण हुआ। तथा मनुष्योंमे ब्राह्मणरूपसे ब्राह्मण, क्षत्रियरूपसे क्षत्रिय, वैश्यरूपसे वैश्य और शूद्ररूपसे शूद्र हुआ। इसीसे अग्निमें ही [कर्म करके] देवताओंके बीच कर्मफलकी इच्छा करते हैं तथा मनुष्योंके बीच ब्राह्मणजातिमें ही कर्मफलकी इच्छा करते हैं, क्योंकि ब्रह्म इन दो रूपोंसे ही व्यक्त हुआ था। तथा जो कोई इस लोकसे आत्माका दर्शन किये बिना ही चला जाता है, उसका यह अविदित आत्मलोक [शोक मोहादिकी निवृत्तिके द्वारा] वैसे ही पालन नहीं करता, जैसे कि बिना अध्ययन किया हुआ वेद अथवा बिना अनुष्ठान किया हुआ कोई अन्य कर्म। इस प्रकार (आत्माको) न जाननेवाला पुरुष यदि इस लोकमे कोई महान् पुण्यकर्म भी करे, तो भी अन्तमे उसका वह कर्म क्षीण हो ही जाता है; अतः

ब्राह्मण ५ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४६५

ब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६५ आत्मलोककी ही उपासना करनी चाहिये। जो पुरुष आत्मलोक- की ही उपासना करता है, उसका कर्म क्षीण नहीं होता। इस आत्मासे पुरुष जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, उसी- उसीको प्राप्त कर लेता है ॥ १५ ॥ यह आत्मा (गृही कर्माधिकारी) समस्त जीवोंका लोक (भोग्य) है। वह जो हवन और यज्ञ करता है, उससे देवताओंका भोग्य होता है; जो स्वाध्याय करता है, उससे ऋषियोंका, जो पितरोंके लिये पिण्डदान करता है और सन्तानकी इच्छा करता है, उससे पितरोंका, जो मनुष्योंको वासस्थान और भोजन देता है, उससे मनुष्योंका और जो पशुओंको तृण एव जलादि पहुँचाता है, उससे पशुओंका भोग्य होता है। इसके घरमें जो [कुत्ते-बिल्ली आदि] श्वापद, पक्षी और चींटीपर्यन्त जीव-जन्तु इसके आश्रित होकर जीवन धारण करते हैं, उससे यह उनका भोग्य होता है। जिस प्रकार लोकमें सब अपने शरीरका अविनाश चाहते हैं, उसी प्रकार यों जाननेवालेका सब जीव अविनाश चाहते हैं। इस (हवन आदि) कर्मकी अवश्यकर्तव्यता [पञ्चमहायज्ञप्रकरणमें] ज्ञात है और [अवदानप्रकरणमें] इसकी मीमांसा की गयी है ॥ १६ ॥ पहले एक यह आत्मा ही था। उसने कामना की कि 'मेरे स्त्री हो, फिर मैं सन्तानरूपसे उत्पन्न होऊँ। तथा मेरे धन हो, फिर मैं कर्म करूँ।' बस, इतनी ही कामना है। इच्छा करनेपर इससे अधिक कोई नहीं पाता। इसीसे अब भी एकाकी पुरुष यह कामना करता है कि मेरे स्त्री हो, फिर मैं सन्तान- रूपसे उत्पन्न होऊँ तथा मेरे धन हो तो फिर मैं कर्म करूँ। वह जबतक इनमेंसे एकको भी प्राप्त नहीं करता, तबतक वह अपनेको अपूर्ण ही मानता है। उसकी पूर्णता इस प्रकार होती है—मन ही इसका आत्मा है, वाणी स्त्री है, प्राण सन्तान है और नेत्र मानुष-वित्त है, क्योंकि वह नेत्रसे ही गौ आदि मानुष-वित्तको जानता है। श्रोत्र दैव-वित्त है, क्योंकि श्रोत्रसे ही वह उसे (दैव-वित्तको) सुनता है। आत्मा (शरीर) ही इसका कर्म है, क्योंकि आत्मासे ही यह कर्म करता है। यह आत्मदर्शनरूप यज्ञ पाङ्क्त है, पशु पाङ्क्त है, पुरुष पाङ्क्त है तथा यह कर्म एव साधनरूप जो कुछ है, सब पाङ्क्त है। जो ऐसा जानता है, वह इन सभीको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥ पञ्चम अन्नकी उत्पत्ति और , मन, वाणी और प्राणके रूपमें सृष्टिका विभाग पिता (प्रजापति) ने विज्ञान और कर्मके द्वारा जिन सात अन्नोंकी रचना की, उनमेंसे इसका एक अन्न साधारण है (अर्थात् वह सभी प्राणियोंका भोग्य है), दो अन्न उसने देवताओंको बाँट दिये, तीन अपने लिये रक्खे, एक पशुओंको दिया। उस (पशुओंको दिये हुए अन्न) में, जो प्राणनक्रिया करते हैं और जो नहीं करते, वे सभी प्रतिष्ठित हैं। ये अन्न सर्वदा खाये जानेपर भी क्षीण क्यों नहीं होते? जो इस (अन्नके) अक्षयभावको जानता है, वह मुखरूप प्रतीकके द्वारा अन्न भक्षण करता है। वह देवताओंको प्राप्त होता है तथा अमृतका भोक्ता होता है। इस विषयमें ये श्लोक (मन्त्र) हैं—॥ १ ॥ 'यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता' इसका यह अर्थ प्रसिद्ध है कि पिताने ज्ञान और कर्मके द्वारा ही अन्नोंको उत्पन्न किया। उसका एक अन्न साधारण है। अर्थात् यह जो खाया जाता है, वही इसका साधारण अन्न है। जो इसीके परायण रहता है, वह पापसे दूर नहीं होता; क्योंकि यह अन्न मिश्र (समस्त प्राणियोंका सम्मिलित धन) है। दो अन्न उसने देवताओंको बाँटे—वे हुत और प्रहुत हैं। इसलिये गृहस्थ पुरुष देवताओंके लिये हवन और बलि अर्पण करता है। कोई ऐसा भी कहते हैं कि ये देवताओंके दो अन्न दर्श और पूर्णमास हैं, इसलिये इन्हें कामनापूर्वक न करे। एक अन्न पशुओंको दिया, वह दुग्ध है। मनुष्य और पशु पहले दुग्धके ही आश्रय जीवन धारण करते हैं, इसलिये उत्पन्न हुए बालक- को पहले घृत चटाते हैं, या स्तनपान कराते हैं, तथा उत्पन्न हुए बछड़ेको भी अतृणाद (तृण भक्षण न करनेवाला) कहते हैं। जो प्राणनक्रिया करते हैं और जो नहीं करते, वे सब इस (पश्वन्न) में ही प्रतिष्ठित हैं। अर्थात् जो प्राणन करते हैं और जो नहीं करते, वे सब हवि दुग्धमे ही प्रतिष्ठित हैं। अतः ऐसा जो कहते हैं कि एक सालतक दुग्धसे हवन करने- वाला पुरुष अपमृत्युको जीत लेता है, सो ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि वह जिस दिन हवन करता है, उसी दिन अपमृत्युको जीत लेता है [एक सालकी अपेक्षा नहीं करता]। इस प्रकार जाननेवाला (उपासना करनेवाला) पुरुष देवताओं- को सम्पूर्ण अन्नाद्य प्रदान करता है, किंतु सर्वदा खाये जानेपर भी वे अन्न क्षीण क्यों नहीं होते ? इसका कारण यह है कि पुरुष अविनाशी है, वही पुनः-पुनः इस अन्नको उ० अं० ५९—

४६६ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १

४६६ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय १ उत्पन्न कर देता है । जो भी इस अक्षयभावको जानता है अर्थात् पुरुष ही क्षयरहित है, वही इस अन्नको ज्ञान और कर्मद्वारा उत्पन्न कर देता है, यदि वह इसे उत्पन्न न करता तो यह क्षीण हो जाता—[ ऐसा जो जानता है ] वह प्रतीकके द्वारा—मुख ही प्रतीक है, अतः मुखके द्वारा अन्न भक्षण करता है । वह देवताओंको प्राप्त होता है और अमृतका भोक्ता होता है । यह ( फलश्रुति ) प्रशंसा है ॥ २ ॥ उसने तीन अन्न अपने लिये किये अर्थात् मन वाणी और प्राणको उसने अपने लिये नियत किया । ‘मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैंने नहीं देखा, मेरा मन अन्यत्र था, इसलिये मैने नहीं सुना' [ ऐसा जो मनुष्य कहता है, इससे निश्चय होता है कि ] वह मनसे ही देखता है और मनसे ही सुनता है । काम, सङ्कल्प, सशय, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति (धारणशक्ति), अधृति, लज्जा, बुद्धि, भय—ये सब मन ही हैं । इसीसे पीछेसे स्पर्श किये जानेपर मनुष्य मनसे जान लेता है। जो कुछ भी शब्द है—वह वाक् ही है, क्योंकि यह वाच्यार्थके कथनमें रत है, इसलिये प्रकाश्य नहीं, प्रकाशक है । प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान और अन—ये सब प्राण ही हैं। यह आत्मा ( शरीर ) वाङ्मय, मनोमय और प्राणमय ही है ॥ ३ ॥ तीनो लोक ये ही हैं। वाक् ही यह लोक है, मन अन्तरिक्षलोक है और प्राण वह ( स्वर्ग ) लोक है । तीनों वेद ये ही हैं । वाक् ही ऋग्वेद है, मन यजुर्वेद है और प्राण सामवेद है । देवता, पितृगण और मनुष्य ये ही हैं। वाक् ही देवता है, मन पितृगण है और प्राण मनुष्य हैं। पिता, माता और सन्तान ये ही हैं। मन ही पिता है, वाक् माता है और प्राण सन्तान है। विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञात ये ही हैं । जो कुछ विज्ञात है वह वाक्का रूप है । वाक् ही विज्ञाता है। वाक् इस (अपने ज्ञाता) की विज्ञात होकर रक्षा करती है । जो कुछ जिज्ञासाके योग्य है, वह मनका रूप है। मन ही विजिज्ञास्य है । मन विजिज्ञास्य होकर इसकी रक्षा करता है। जो कुछ अविज्ञात है, वह प्राणका रूप है। प्राण ही अविज्ञात है । प्राण अविज्ञात होकर इसकी रक्षा करता है ॥ ४-१० ॥ उस वाक्का पृथिवी शरीर है और यह अग्नि ज्योतीरूप है । इनमे जितनी वाक् है, उतनी ही पृथिवी है और उतना ही यह अग्नि है । तथा इस मनका द्युलोक शरीर है, ज्योतीरूप यह आदित्य है; इनमें जितना मन है, उतना ही द्युलोक और उतना ही वह आदित्य है । वे (आदित्य और अग्नि) मिथुन (पारस्परिक संसर्ग) को प्राप्त हुए। तब प्राण उत्पन्न हुआ । वह इन्द्र है और वह असपत्न— शत्रुहीन है, दूसरा [अर्थात् प्रतिपक्षी ] ही सपत्न होता है । जो ऐसा जानता है, उसका सपत्न नहीं होता । तथा इस प्राणका जल शरीर है, वह चन्द्रमा ज्योतीरूप है । इनमें जितना प्राण है, उतना ही जल है और उतना ही वह चन्द्रमा है । ये सभी समान हैं और सभी अनन्त हैं । जो कोई इन्हें अन्तवान् समझकर उपासना करता है, वह अन्तवान् लोकपर जय प्राप्त करता है और जो इन्हें अनन्त समझकर उपासना करता है, वह अनन्त लोकपर जय प्राप्त करता है ॥ ११-१३ ॥ इस सवत्सररूप प्रजापतिकी सोलह कलाएँ ( अङ्ग ) हैं। उसकी तिथियाँ ही पन्द्रह कलाएँ हैं, इसकी सोलहवीं कला ध्रुवा (नित्य) है। वह तिथियोंके द्वारा ही [ शुक्लपक्षमें ] वृद्धिको प्राप्त होता है तथा [कृष्णपक्षमें] क्षीण होता है । अमावास्याकी रात्रिमें वह (चन्द्रमा ) इस सोलहवीं कलासे इन सब प्राणियोंमें अनुप्रविष्ट हो फिर [ दूसरे दिन ] प्रातःकालमें उत्पन्न होता है। अतः इस रात्रिमें किसी प्राणीके प्राणका विच्छेद न करे, यहाँतक कि इसी देवताकी पूजाके लिये [ इस रात्रिमें ] गिरगिटके भी प्राण न ले ॥ १४ ॥ जो भी यह सोलह कलाओंवाला सवत्सर प्रजापति है, यह वही है जो कि इस प्रकार जाननेवाला पुरुष है। वित्त ही उसकी पंद्रह कलाएँ हैं तथा आत्मा (शरीर) ही उसकी सोलहवी कला है । वह वित्तसे ही बढता और क्षीण होता है । यह जो आत्मा (पिण्ड) है, वह नभ्य ( रथचक्रकी नाभिरूप) है और वित्त प्रधि (रथचक्रका बाहरका घेरा— नेमि) है । इसलिये यदि पुरुष सर्वस्वहरणके कारण ह्रासको प्राप्त हो जाय, किंतु शरीरसे जीवित रहे, तो यही कहते कि केवल प्रधिसे ही क्षीण हुआ है ॥ १५ ॥ अब मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक—ये ही तीन लोक हैं । वह यह मनुष्यलोक पुत्रके द्वारा ही जीता जा सकता है, किसी अन्य कर्मसे नहीं । तथा पितृलोक कर्मसे और देवलोक विद्या (उपासना) से जीते जा सकते हैं। लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ है, इसलिये विद्याकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥ अब सम्प्रत्ति [ कही जाती है—] जब पिता यह समझता है कि मैं मरनेवाला हूँ तब वह पुत्रसे कहता है— 'तू ब्रह्म है, तू यज्ञ है, तू लोक है।' वह पुत्र बदलेमें कहता

ब्राह्मण ५ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४६७

ब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४६७ है—'मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ।' जो कुछ भी स्वाध्याय है, उस सबकी 'ब्रह्म' यह एकता है। जो कुछ भी यज्ञ हैं, उनकी 'यज्ञ' यह एकता है। और जो कुछ भी लोक हैं, उनकी 'लोक' यह एकता है। यह इतना ही गृहस्थ पुरुषका सारा कर्तव्य है। [ फिर पिता यह मानने लगता है कि ] यह मेरे इस भारको लेकर इस लोकसे जानेपर मेरा पालन करेगा। अतः इस प्रकार अनुशासन किये हुए पुत्रको 'लोक्य' (लोकप्राप्तिमें हितकर ) कहते हैं। इसीसे पिता उसका अनुशासन करता है। इस प्रकार जाननेवाला वह पिता जब इस लोकसे जाता है, तब अपने इन्हीं प्राणोंके सहित पुत्रमें व्याप्त हो जाता है। यदि किसी कोणाच्छिद्र (प्रमाद ) से उस (पिता) के द्वारा कोई कर्तव्य नहीं किया होता है तो उस सबसे पुत्र उसे मुक्त कर देता है। इसीसे उसका नाम 'पुत्र' है। वह पिता पुत्रके द्वारा ही इस लोकमें प्रतिष्ठित होता है। फिर उसमें ये हिरण्यगर्भसम्बन्धी अमृत प्राण प्रवेश करते हैं ॥ १७ ॥ पृथिवी और अग्निसे इसमे दैवी वाक्‌का आवेश होता है। दैवी वाक् वही है, जिससे पुरुष जो जो भी बोलता है, वही- वही हो जाता है। द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव मनका आवेश हो जाता है। दैव मन वही है, जिससे यह सुखी ही होता है, कभी शोक नहीं करता। जल और चन्द्रमासे इसमें दैव प्राणका आवेश हो जाता है। दैव प्राण वही है, जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न नष्ट ही होता है। इस प्रकार जाननेवाला वह समस्त भूतोंका आत्मा हो जाता है। जैसा यह देवता (हिरण्यगर्भ) है, वैसा ही वह हो जाता है। जिस प्रकार समस्त प्राणी इस देवताका पालन करते हैं, उसी प्रकार ऐसी उपासना करनेवालेका समस्त भूत पालन करते हैं। जो कुछ ये जीव शोक करते हैं, वह (शोकादिजनित दुःख) उन्हींके साथ रहता है। इसे तो पुण्य ही प्राप्त होता है, क्योंकि देवताओंके पास पाप नहीं जाता ॥ १८-२० ॥ अब यहाँसे व्रतका विचार किया जाता है। प्रजापतिने कर्मों (कर्मके साधनभूत वागादि करणों) की रचना की। रचे जानेपर वे एक दूसरेसे स्पर्धा करने लगे। वाक्‌ने व्रत किया कि 'मैं बोलती ही रहूँगी' तथा 'मै देखता ही रहूँगा' ऐसा नेत्रने और 'मै सुनता ही रहूँगा' ऐसा श्रोत्रने व्रत किया। इसी प्रकार अपने-अपने कर्मके अनुसार अन्य इन्द्रियोने भी व्रत किया। तब मृत्युने श्रम होकर उनसे सम्बन्ध किया और उनमे व्याप्त हो गया। उनमें व्याप्त होकर मृत्युने उनका अवरोध किया। इसीसे वाक् श्रमित होती ही है, नेत्र श्रमित होता ही है, श्रोत्र श्रमित होता ही है; किंतु यह जो मध्यम प्राण है, इसमें वह (मृत्यु) व्याप्त न हो सका। तब उन इन्द्रियोंने उसे जाननेका निश्चय किया। 'निश्चय यही हममें श्रेष्ठ है, जो सञ्चार करते और सञ्चार न करते हुए भी व्यथित नहीं होता और न क्षीण ही होता है। अच्छा, हम सब भी इसीके रूप हो जायँ'—ऐसा निश्चयकर वे सब इसीके रूप हो गयीं। अतः वे इसीके नामसे 'प्राण' इस प्रकार कही जाती हैं। इसीसे जो ऐसा जानता है, वह जिस कुलमें होता है, वह कुल उसीके नामसे बोला जाता है। तथा जो ऐसे विद्वान्‌से स्पर्धा करता है, वह सूख जाता है और सूखकर अन्तमें मर जाता है। यह अध्यात्म-प्राणदर्शन है ॥ २१ ॥ अब अधिदैवदर्शन कहा जाता है—अग्निने व्रत किया कि 'मैं जलता ही रहूँगा।' सूर्यने नियम किया, 'मैं तपता ही रहूँगा।' तथा चन्द्रमाने निश्चय किया, 'मै प्रकाशित ही होता रहूँगा।' इसी प्रकार अन्य देवताओंने भी यथादैवत (जिस देवताका जो व्यापार था, उसीके अनुसार) व्रत किया। जिस प्रकार इन वागादि प्राणोंमें मध्यम प्राण है, उसी प्रकार इन देवताओंमें वायु है, क्योंकि अन्य देवगण तो अस्त हो जाते हैं, किंतु वायु अस्त नहीं होता। यह जो वायु है, अस्त न होनेवाला देवता है ॥ २२ ॥ इसी अर्थका प्रतिपादक यह मन्त्र है—'(जिस (वायुदेवता) से (चक्षुरूप) सूर्य उदय होता है और जिसमें वह अस्त होता है' इत्यादि। यह प्राणसे ही उदित होता है और प्राणमें ही अस्त हो जाता है। उस धर्मको देवताओंने धारण किया है। वही आज है और वही कल भी रहेगा। देवताओंने जो व्रत उस समय धारण किया था, वही आज भी करते हैं। अतः एक ही व्रतका आचरण करे। प्राण और अपान-व्यापार करे। मुझे कहीं पापी मृत्यु व्याप्त न कर ले—इस भयसे [ इस व्रतका आचरण करे]। और यदि इसका आचरण करे तो इसे समाप्त करने- की भी इच्छा रक्खे। इससे वह प्राणरूप इस देवतासे सायुज्य और सालोक्य प्राप्त करता है ॥ २३ ॥

४६८ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १

४६८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय १ षष्ठ नाम-रूप और कर्म यह नाम, रूप और कर्म—तीनका समुदाय है। उन नामोंकी 'वाक्' यह उक्थ (कारण) है, क्योंकि सारे नाम इसीसे उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है। यही सब नामोंमें समान है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त नामोंको धारण करती है। अब, रूपोंका चक्षु समन्वय है, यह इसका उक्थ है। इसीसे सारे रूप उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त रूपोंके प्रति सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त रूपोंको धारण करता है। अब, कर्मोंका समन्वय आत्मा (शरीर) है। यह इनका उक्थ है। इसीसे सब कर्म उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त कर्मोंके प्रति सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त कर्मोंको धारण करता है। ये तीन होते हुए भी एक आत्मा हैं और आत्मा भी एक होते हुए इन तीन रूपोंमें है। वह यह अमृत सत्यसे आच्छादित है। प्राण ही अमृत है और नाम रूप सत्य हैं, उनसे यह प्राण आच्छादित है ॥ १-३ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय

ॐ द्वितीय अध्याय प्रथम गार्ग्य और अजातशत्रुका संवाद, अजातशत्रुका गार्ग्यको आत्माका स्वरूप समझाना

ॐ गार्ग्य-गोत्रोत्पन्न बालाकि नामक एक पुरुष बड़ा घमंडी और बहुत बोलनेवाला था । उसने काशिराज अजातशत्रुके पास जाकर कहा—'मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँ ।' अजातशत्रु- ने कहा, 'इस वचनके लिये मैं आपको सहस्र [गौएँ] देता हूँ, लोग 'जनक, जनक' यों कहकर दौड़ते हैं। (अर्थात् सब लोग यही कहते हैं कि 'जनक बड़ा दानी है, जनक बड़ा श्रोता है।' ये दोनों बातें आपने अपने वचनसे मेरे लिये सुलभ कर दी हैं । इसलिये मैं आपको सहस्र गौएँ देता हूँ )' ॥१॥ गार्ग्यने कहा, 'यह जो आदित्यमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । यह सबका अतिक्रमण करके स्थित है, समस्त भूतोंका मस्तक है और राजा (दीप्तिमान् ) है—इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ । जो पुरुष इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह सबका अतिक्रमण करके स्थित, समस्त भूतोंका मस्तक और राजा होता है।' गार्ग्य बोला, 'यह जो चन्द्रमामें पुरुष है, इसी- की मै ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । यह महान्, शुक्ल- वस्त्रधारी, सोम राजा है—इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ । जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसके लिये नित्यप्रति सोम सुत और प्रसूत होता है, अर्थात् प्रकृति- विकृतिमय दोनों-प्रकारके यज्ञानुष्ठानमें वह समर्थ हो जाता है । तथा उसका अन्न क्षीण नही होता ।' वह गार्ग्य बोला, 'यह जो विद्युत्में पुरुष है, इसीकी मै ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसकी चर्चा मत करो, इसकी तो मै तेजस्त्रीरूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है तथा उसकी सन्तान भी तेजस्विनी होती है।' वह गार्ग्य बोला, 'यह जो आकाशमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । मैं उसकी पूर्ण और अप्रवर्त्तिरूपसे उपासना करता हूँ जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह सन्तान और

पशुओंसे पूर्ण होता है और इस लोकमे उसकी सन्ततिका उच्छेद नहीं होता ।' वह गार्ग्य बोला, 'यह जो वायुमें पुरुष है, इसकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी तो मै इन्द्र, वैकुण्ठ और अपराजिता सेना—इस रूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह विजयी, कभी न हारनेवाला और शत्रुविजेता होता है।' वह गार्ग्य बोला, 'यह जो अग्निमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं- नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी तो मैं विषासहिरूप- से उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय सहन करनेवाला होता है और उसकी सन्तति भी सहन करनेवाली होती है।' वह गार्ग्य बोला, 'यह जो जलमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी मैं 'प्रतिरूप' रूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसके पास प्रतिरूप ही आता है, अप्रतिरूप नहीं आता और उससे प्रतिरूप [पुत्र] उत्पन्न होता है' ॥ २-८ ॥ गार्ग्य बोला, 'यह जो दर्पणमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं- नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी तो मैं रोचिष्णु (दीप्तिमान्) रूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय दीप्तिमान् होता है, उसकी सन्तान भी दीप्तिमान् होती है और उसका जिनसे सगम होता है, उन सबसे बढकर वह दीप्तिमान् होता है।' वह गार्ग्य बोला, 'जानेवालेके पीछे जो यह शब्द उत्पन्न होता है, इसी- की मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी तो मैं प्राण- रूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना

१ अग्निमें जो हविष्य डाला जाता है उसे वह भस्म करके सहन कर लेता है, इसलिये अग्नि विषासहि—सहन करनेवाला है ।

४७० बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २

४७० * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय २ करता है वह इस लोकमें पूर्ण आयु प्राप्त करता है, इसे प्राण समयसे पहले नहीं छोड़ता' ॥ ९-१० ॥ गार्ग्य बोला, 'यह जो दिशाओंमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं नहीं, इसके विषयमें बात मत करो, मैं इसकी द्वितीय और वियुक्तरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह द्वितीयवान् (साथीवाला) होता है और उससे गणका (पुत्रादि समूहका) विच्छेद नहीं होता' ।११। गार्ग्य बोला, 'यह जो छायामय पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं- नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी तो मैं मृत्युरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह इस लोकमें पूर्ण आयु प्राप्त करता है और इसके पास समयसे पहले मृत्यु नहीं आती' ॥ १२ ॥ गार्ग्य बोला, 'यह जो आत्मामें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो, इसकी तो मैं आत्मवान्रूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय आत्मवान् होता है और उसकी सन्तान भी आत्मवान् होती है।' तब वह गार्ग्य चुप हो गया ॥१३॥ [उसे मौन देखकर] वह अजातशत्रु बोला, 'बस, क्या इतना ही है ?' [ गार्ग्य—] 'हाँ, इतना ही है।' [ अजातशत्रु—] 'इतनेसे तो ब्रह्म नहीं जाना जाता।' वह गार्ग्य बोला, 'मैं आपकी शिष्यभावसे शरण लेता हूँ' ॥ १४ ॥ अजातशत्रुने कहा, 'ब्राह्मण क्षत्रियके प्रति, इस उद्देश्यसे कि यह मुझे ब्रह्मका उपदेश करेगा, शिष्यभावसे शरण हो—यह तो विपरीत है। तो भी मैं आपको उसका ज्ञान कराऊँगा ही।' तब अजातशत्रु उसके हाथ पकड़कर उठा और वे दोनों एक सोये हुए पुरुषके पास गये । अजातशत्रुने उसे 'हे ब्रह्म ! हे पाण्डरवास ! हे सोम राजन् !' इन नामोंसे पुकारा । परन्तु वह न उठा । तब उसे हाथसे दबा-दबाकर जगाया तो वह उठ बैठा ॥ १५ ॥ अजातशत्रुने कहा, 'यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब सोया हुआ था, तब कहाँ था ? और यह कहाँसे आया ?' किंतु गार्ग्य यह न जान सका ॥ १६ ॥ उस अजातशत्रुने कहा, 'यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब यह सोया हुआ था, उस समय यह विज्ञानके द्वारा इन इन्द्रियोंकी ज्ञानशक्तिको ग्रहणकर यह जो हृदयके भीतर आकाश है उसमें शयन करता है। जिस समय यह उन ज्ञानशक्तियोंको ग्रहण कर लेता है, उस समय इस पुरुषका 'स्वपिति' नाम होता है। उस समय घ्राणेन्द्रिय लीन रहती है, वाणी लीन रहती है, चक्षु लीन रहता है, श्रोत्र लीन रहता है और मन भी लीन रहता है । जिस समय यह आत्मा स्वप्नवृत्तिसे वर्तता है, उस समय इसके वे लोक (दृश्य) उत्पन्न होते हैं। वहाँ कभी यह महाराज होता है, कभी महाब्राह्मण होता है अथवा ऊँची नीची [ गतियों ] को प्राप्त होता है। जिस प्रकार कोई महाराज अपने प्रजाजनोंको लेकर (अधीन कर) अपने देशमें यथेच्छ विचरता है, उसी प्रकार यह प्राणोंको ग्रहणकर अपने शरीरमे यथेच्छ विचरता है। इसके पश्चात् जब वह गाढ निद्रामें होता है, जिस समय कि वह किसीके विषयमें कुछ भी नहीं जानता, उस समय हिता नामकी जो बहत्तर हजार नाडियाँ हृदयसे सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त होकर स्थित हैं, उनके द्वारा बुद्धिके साथ जाकर वह शरीरमें व्याप्त होकर शयन करता है। जिस प्रकार कोई बालक अथवा महाराज किंवा महाब्राह्मण आनन्दकी दुःखनाशिनी अवस्थाको प्राप्त होकर शयन करे, उसी प्रकार यह शयन करता है ॥१७-१९॥ जिस प्रकार वह ऊर्णनाभि (मकड़ा) तन्तुओंपर ऊपरकी ओर जाता है तथा जैसे अग्निसे अनेकों क्षुद्र चिनगारियाँ उड़ती हैं, उसी प्रकार इस आत्मासे समस्त प्राण, समस्त लोक, समस्त देवगण और समस्त भूत विविध रूपसे उत्पन्न होते हैं। 'सत्यका सत्य' यह उस आत्माका नाम है। प्राण ही सत्य हैं। उन्हींका यह सत्य है ॥ २० ॥ द्वितीय ब्राह्मण शिशु नामसे मध्यम प्राणकी उपासना जो कोई आधान, प्रत्याधान, स्थूणा और दाम (बन्धन- रज्जु) के सहित शिशुको जानता है, वह अपनेसे द्वेष करने- वाले सात भ्रातृव्योंका अवरोध करता है। यह जो मध्यम प्राण है, वही शिशु है, उसका यह (शरीर) ही आधान (अधिष्ठान) है, यह (सिर) ही प्रत्याधान है, प्राण स्थूणा (अन्न-पानजनित शक्ति) है और अन्न दाम है ॥ १ ॥

ब्राह्मण ४ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४७१

ब्राह्मण ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४७१

उसका ये सात अक्षितियाँ (नेत्रोंके अङ्ग) उपस्थान (स्तवन) करती हैं— उनमेंसे जो ये आँखमे लाल रेखाएँ हैं उनके द्वारा रुद्र इस मध्यप्राणके अनुगत है, नेत्रमें जो जल है उसके द्वारा मेघ, जो दर्शनशक्ति है उसके द्वारा आदित्य, जो कालिमा है उसके द्वारा अग्नि और जो शुक्लता है उसके द्वारा इन्द्र अनुगत है। नीचेके पलकद्वारा पृथिवी इसके अनुगत है एव ऊपरके पलकद्वारा द्युलोक । जो इस प्रकार जानता है, उसका अन्न क्षीण नहीं होता ॥ २ ॥ इस विषयमे यह मन्त्र है—'चमस नीचेकी ओर छिद्र- वाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ होता है, उसमें विश्वरूप यश निहित है, उसके तीरपर सात ऋषिगण (दो कान, दो नेत्र, दो नासिका और एक रसना) और वेदके द्वारा सवाद करनेवाली आठवी वाणी रहती है। जो नीचेकी ओर छिद्र- वाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ चमस है, वह सिर है; क्योकि यही नीचेकी ओर छिद्रवाला और ऊपरकी ओर उठा हुआ है । उसमें विश्वरूप यश निहित है—प्राण ही विश्वरूप यश हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। उसके तीरपर सात ऋषि रहते हैं, प्राण ही ऋषि है, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। वेदके द्वारा सवाद करनेवाली वाक् आठवीं है, वही वेदके द्वारा सवाद करती है। ये दोनों [ कान ] ही गोतम और भरद्वाज हैं, यह ही गोतम है और यह [ दूसरा ] भरद्वाज है। ये दोनों [नेत्र ] ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं, यह ही विश्वामित्र है और यह दूसरा जमदग्नि है। ये दोनों [नासारन्ध्र ] ही वसिष्ठ और कश्यप हैं, यह ही वसिष्ठ है और यह दूसरा कश्यप है। तथा वाक् ही अत्रि है, क्योकि वागिन्द्रियद्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है। जिसे अत्रि कहते हैं, उसका निश्चय 'अत्ति' ही नाम है। जो इस प्रकार जानता है, वह सबका अत्ता (भोक्ता) होता है, सब उसका अन्न (भोग्य) हो जाता है ॥ ३-४ ॥

तृतीय ब्राह्मण ब्रह्मके दो रूप

ब्रह्मके दो (द्विविध) रूप है—मूर्त और अमूर्त, मर्त्य और अमृत, स्थित और यत् (चर) तथा सत् और त्यत्। जो वायु और अन्तरिक्षसे भिन्न है, वह मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है और यह सत् है । उस इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका, इस सत्का यह रस है, जो कि यह तपता है। यह सत्का ही रस है । तथा वायु और अन्तरिक्ष अमूर्त हैं, ये अमृत है, ये यत् हैं और ये ही त्यत् है। उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह सार है, जो कि इस मण्डलमें पुरुष है, यही इस त्यत्का सार है। यह अधि दैवत-दर्शन है। अब अध्यात्म मूर्तामूर्तका वर्णन किया जाता है। जो प्राणसे तथा यह जो देहान्तर्गत आकाश है, उससे भिन्न है, यही मूर्त है। यह मर्त्य है, यह स्थित है, यह सत् है। यह जो नेत्र है, वही इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका एव इस सत्का सार है। यह सत्का ही सार है। अब अमूर्तका वर्णन करते हैं—प्राण और इस शरीरके अन्तर्गत जो आकाश है, वे अमूर्त हैं, यह अमृत है, यह यत् है और यही त्यत् है। उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह रस है जो कि यह दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है, यह त्यत्का ही रस है ॥ १—५ ॥ उस इस पुरुषका रूप-चमत्कार ऐसा है जैसा कुसुमसे रँगा हुआ वस्त्र हो, जैसा सफेद ऊनी वस्त्र हो, जैसा इन्द्रगोप (बीरबहूटी) हो, जैसी अग्निकी ज्वाला हो, जैसा श्वेत कमल हो, और जैसे बिजलीकी चमक हो। जो ऐसा जानता है, उसकी श्री बिजलीकी चमकके समान [ सर्वत्र एक साथ फैलनेवाली ] होती है। अब इसके पश्चात् 'नेति-नेति' यह ब्रह्मका निर्देश है। 'नेति-नेति' इससे बढकर कोई उत्कृष्ट आदेश नहीं है। 'सत्यका सत्य' यह उसका नाम है। प्राण ही सत्य हैं, उनका यह सत्य है ॥६॥

चतुर्थ याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी-संवाद, याज्ञवल्क्यका मैत्रेयीको अमृतत्वके साधनरूपमें परमात्म-तत्त्वका उपदेश

'अरी मैत्रेयि !' ऐसा याज्ञवल्क्यने [ अपनी पत्नीसे ] कहा। 'मै इस स्थान (गार्हस्थ्य-आश्रम) से ऊपर (सन्यास- आश्रममें ) जानेवाला हूँ। अतः [ तेरी अनुमति लेता हूँ और चाहता हूँ ] इस (दूसरी पत्नी) कात्यायनीके साथ तेरा बँटवारा कर दूँ' ॥ १ ॥ मैत्रेयीने कहा, 'भगवन् ! यदि यह धनसे सम्पन्न

४७२ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय २

[बायाँ स्तम्भ] सारी पृथिवी मेरी हो जाय तो क्या मैं उससे किसी प्रकार अमर हो सकती हूँ ?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'नहीं, भोग- सामग्रियोंसे सम्पन्न मनुष्योंका जैसा जीवन होता है, वैसा ही तेरा भी जीवन हो जायगा। धनसे अमृतत्वकी तो आशा है ही नहीं' ॥ २ ॥ मैत्रेयीने कहा, 'जिससे मैं अमर नहीं हो सकती, उन भोगोंको लेकर मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ अमृतत्वका साधन जानते हों, वही मुझे बतलावें' ॥ ३ ॥ याज्ञवल्क्यजीने कहा, 'धन्य ! अरी मैत्रेयि, तू पहले भी मेरी प्रिया रही है और इस समय भी मुझे प्रिय लगने- वाली ही बात कह रही है। अच्छा आ, बैठ जा; मैं तेरे प्रति उस (अमरत्व) की व्याख्या करूँगा, तू व्याख्यान किये हुए मेरे वाक्योंके अर्थका चिन्तन करना' ॥ ४ ॥ उन्होंने कहा-'अरी मैत्रेयि ! यह निश्चय है कि पतिके प्रयोजनके लिये पति प्रिय नहीं होता, आत्माके अपने ही प्रयोजनके लिये पति प्रिय होता है; स्त्रीके प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया नहीं होती, अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्री प्रिया होती है, पुत्रोंके प्रयोजनके लिये पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजन- के लिये पुत्र प्रिय होते हैं; धनके प्रयोजनके लिये धन प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये धन प्रिय होता है; ब्राह्मणके प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये ब्राह्मण प्रिय होता है; क्षत्रियके प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय नहीं होता, अपने ही प्रयोजनके लिये क्षत्रिय प्रिय होता है, लोकोंके प्रयोजनके लिये लोक प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये लोक प्रिय होते हैं, देवताओंके प्रयोजनके लिये देवता प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये देवता प्रिय होते हैं, प्राणियोंके प्रयोजनके लिये प्राणी प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये प्राणी प्रिय होते हैं, तथा सबके प्रयोजनके लिये सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजनके लिये सब प्रिय होते हैं। अरी मैत्रेयि ! यह आत्मा- अपना-आप ही दर्शनीय, श्रवणीय, मननीय और ध्यान किये जाने योग्य है। मैत्रेयि ! इस आत्माके ही दर्शन, श्रवण, मनन एव विज्ञानसे इस सबका ज्ञान हो जाता है ॥ ५ ॥ ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है, जो ब्राह्मणजातिको आत्मासे भिन्न जानता है। क्षत्रियजाति उसे परास्त कर देती है, जो क्षत्रियजातिको आत्मासे भिन्न देखता है। लोक उसे परास्त कर देते हैं, जो लोकोंको आत्मासे भिन्न देखता है। देवगण उसे परास्त कर देते हैं, जो देवताओंको आत्मासे

[दायाँ स्तम्भ] भिन्न देखता है। भूतगण उसे परास्त कर देते हैं, जो भूतोंको आत्मासे भिन्न देखता है। सभी उसे परास्त कर देते हैं, जो सबको आत्मासे भिन्न देखता है। यह ब्राह्मणजाति, यह क्षत्रियजाति, ये लोक, ये देवगण, ये भूतगण और ये सब जो कुछ भी हैं, सब आत्मा ही है ॥ ६ ॥ इसमें दृष्टान्त ऐसा है कि जिस प्रकार बजती हुई दुन्दुभि (नकारे) के बाह्य शब्दोको कोई पकड़ नहीं सकता, किंतु दुन्दुभि या दुन्दुभिके आघातको पकड़ लेनेसे उसका शब्द भी पकड़ लिया जाता है। यह [दूसरा दृष्टान्त] ऐसा है- जैसे कोई बजाये जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता, किंतु शङ्खके अथवा शङ्खके बजानेको ग्रहण करनेसे उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है। वह [तीसरा दृष्टान्त] ऐसा है-जैसे कोई बजायी जाती हुई वीणाके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता, किंतु वीणा या वीणाके स्वरका ग्रहण होनेपर उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है। वह [चौथा दृष्टान्त है-] जिस प्रकार जिसका ईंधन गीला है, ऐसे आधान किये हुए अग्निसे पृथक् धूआँ निकलता है, हे मैत्रेयि ! इसी प्रकार ये जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वाङ्गिरस (अथर्ववेद), इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, मन्त्रविवरण और अर्थवाद हैं, वे सब इस परमात्माके ही निःश्वास हैं ॥ ७-१० ॥ दृष्टान्त है-जिस प्रकार समस्त जलोंका समुद्र एक अयन (आश्रय स्थान) है, इसी प्रकार समस्त स्पशोंका त्वचा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त गन्धोंका दोनों नासिकाएँ एक अयन हैं, इसी प्रकार समस्त रसोंका जिह्वा एक अयन है, इसी प्रकार समस्त रूपोंका चक्षु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त शब्दोंका श्रोत्र एक अयन है, इसी प्रकार समस्त सङ्कल्पोंका मन एक अयन है, इसी प्रकार समस्त विद्याओका हृदय एक अयन है, इसी प्रकार समस्त कर्मोंका हस्त एक अयन है, इसी प्रकार समस्त आनन्दोंका उपस्थ एक अयन है और इसी प्रकार समस्त विसर्गोंका पायु एक अयन है, इसी प्रकार समस्त मार्गोंका चरण एक अयन है और इसी प्रकार समस्त वेदोका वाणी एक अयन है ॥ ११ ॥ इसमें यह दृष्टान्त है-जिस प्रकार जलमे डाला हुआ नमकका डला जलमें ही घुल-मिल जाता है, उसे जलसे निकालनेके लिये कोई समर्थ नहीं होता तथा जहाँ-जहाँसे भी जल लिया जाय वह नमकीन ही जान पड़ता है, हे मैत्रेयि ! उसी प्रकार यह परमात्म-तत्त्व अनन्त, अपार और विज्ञानघन ही है। यह इन [सत्यशब्दवाच्य] भूतोंसे प्रकट होकर उन्हींके

ब्राह्मण ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * । ४७३

साथ अदृश्य हो जाता है; देहेन्द्रियभावसे मुक्त होनेपर इसकी कोई विशेष सञ्ज्ञा नहीं रहती । हे मैत्रेयि ! ऐसा मैं तुझसे कहता हूँ'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा ॥ १२ ॥ उस मैत्रेयीने कहा, 'शरीरपातके अनन्तर कोई सञ्ज्ञा नहीं रहती—ऐसा कहकर ही श्रीमान्‌ने मुझे मोहमें डाल दिया है।' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे मैत्रेयि ! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ, अरी ! यह तो उस परमात्माका विज्ञान कराने- के लिये पर्याप्त है' ॥ १३ ॥ जहाँ (अविद्यावस्था में) द्वैत सा होता है, वहीं अन्य अन्यको सूँघता है, अन्य अन्यको देखता है, अन्य अन्यको सुनता है, अन्य अन्यका अभिवादन करता है, अन्य अन्य- का मनन करता है तथा अन्य अन्यको जानता है; किंतु जहाँ इसके लिये सब आत्मा ही हो गया है, वहाँ किसके द्वारा किसे सूँघे, किसके द्वारा किसे देखे, किसके द्वारा किसे सुने, किसके द्वारा किसका अभिवादन करे, किसके द्वारा किसका मनन करे और किसके द्वारा किसे जाने ? जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उसे किसके द्वारा जाने ? अरी मैत्रेयि ! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने ? ॥ १४ ॥

पञ्चम ब्राह्मण मधुविद्याका उपदेश, आत्माका विविध रूपोंमें वर्णन यह पृथिवी समस्त भूतोंका मधु है और सब भूत इस पृथिवीके मधु हैं। इस पृथिवीमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्मशारीर तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। ये जल समस्त भूतोंके मधु हैं और समस्त भूत इन जलोंके मधु हैं। इन जलोंमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म रैतस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह अग्नि समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस अग्निके मधु हैं। इस अग्निमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म वाङ्मय तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह वायु समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस वायुके मधु हैं। इस वायुमें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्मप्राणरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह आदित्य समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आदित्यके मधु हैं। यह जो इस आदित्यमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म चाक्षुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। ये दिशाएँ समस्त भूतोंका मधु हैं तथा समस्त भूत इन दिशाओंके मधु हैं। यह जो इन दिशाओंमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क (प्रत्येक श्रवणवेलामें रहनेवाला) तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह चन्द्रमा समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस चन्द्रमाके मधु हैं। यह जो इस चन्द्रमामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म मनःसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह विद्युत् समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस विद्युत्के मधु हैं। यह जो इस विद्युत्में तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म तैजस तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह मेघ समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस मेघके मधु हैं। यह जो इस मेघमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म शब्द एव स्वरसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह आकाश समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आकाशके मधु हैं। यह जो इस आकाशमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म हृदयाकाशरूप तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह धर्म समस्त उ० अ० ६०-६१-

४७४ , ' बृहदारण्यकोपनिषद् ' [ अध्याय २ भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस धर्मके मधु हैं । इस धर्ममें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म धर्मसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह सत्य समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस सत्यके मधु हैं। यह जो इस सत्यमे तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म- सत्यसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे बतलाया गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह मनुष्यजाति समस्त भूतोंका मधु है और समस्त भूत इस मनुष्यजातिके मधु हैं। यह जो इस मनुष्यजातिमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म मानुष तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस श्रुतिद्वारा बतलाया गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। यह आत्मा (देह) समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आत्माके मधु हैं। यह जो इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह आत्मा तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है। वह यह आत्मा समस्त भूतोंका अधिपति एव समस्त भूतोंका राजा है। इस विषयमें दृष्टान्त- जिस प्रकार रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे समर्पित रहते हैं, इसी प्रकार इस परमात्मामें समस्त भूत, समस्त देव, समस्त लोक, समस्त जीवन और ये सभी आत्माएँ समर्पित हैं [ सभी उस परमात्मासे जुड़े हुए और उसीके सहारे स्थित हैं।] ॥ १-१५॥ इस पूर्वोक्त मधुको दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने अश्विनीकुमारोंसे कहा था । इस मधुको देखते हुए ऋषि (मन्त्र) ने कहा- मेघ जिस प्रकार वृष्टि करता है, उसी प्रकार हे नराकार अश्विनी- कुमारो ! मैं लाभके लिये किये हुए तुम दोनोंका वह उग्र दक्ष कर्म प्रकट किये देता हूँ, जिस मधुका दध्यङ्ङाथर्वण ऋषिने तुम्हारे प्रति अश्वके सिरसे वर्णन किया था ॥ १६ ॥ उस इस मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया । इसे देखते हुए ऋषि (मन्त्रद्रष्टा) ने कहा है-हे अश्विनीकुमारो ! तुम दोनों आथर्वण दध्यङ्के लिये घोड़ेका सिर लाये । उसने सत्यपालन करते हुए तुम्हें त्वाष्ट्र (सूर्यसम्बन्धी) मधुका उपदेश किया तथा हे शत्रुहिंसक ! जो [ आत्मज्ञानसम्बन्धी ] गोपनीय मधु था [ वह भी तुमसे कहा ] ॥ १७ ॥ इस पूर्वोक्त मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। इसे देखते हुए ऋषिने कहा-परमात्माने दो पैरोंवाले शरीर बनाये और चार पैरोंवाले शरीर बनाये। पहले वह पुरुष-परमात्मा पक्षी होकर शरीरोंमें प्रविष्ट हो गया । वह यह पुरुष समस्त पुरों ( शरीरों ) मे पुरिशय है। ऐसा कुछ भी नहीं है, जो परमात्मासे न ढका हो तथा ऐसा भी कुछ नहीं है, जिसमे परमात्माका प्रवेश न हुआ हो-जो उससे व्याप्त न हो ॥ १८ ॥ इस पूर्वोक्त मधुका दध्यङ्ङाथर्वणने अश्विनीकुमारोंको उपदेश किया। यह देखते हुए ऋषिने कहा-वह रूप रूपके प्रतिरूप हो गया। इसका वह रूप प्रतिख्यापन (प्रकट) करनेके लिये है। ईश्वर मायासे अनेकरूप प्रतीत होता है। [ शरीररूप रथमें जोड़े हुए ] इसके घोड़े सौ (नाड़ियां) और दस (इन्द्रियाँ) हैं। यह (परमेश्वर) ही हरि (इन्द्रिय- रूप अश्व ) है, यही दस, सहस्र, अनेक और अनन्त है। वह यह ब्रह्म अपूर्व (कारणरहित), अनपर (कार्यरहित), अनन्तर (विजातीय द्रव्यसे रहित) और अबाह्य है। यह आत्मा ही सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है। यही समस्त वेदान्तोंका अनुशासन (उपदेश) है ॥ १९ ॥ षष्ठ ब्राह्मण मधुविद्याकी परम्पराका वर्णन अब [ मधुकाण्डका ] वंश बतलाया जाता है- पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने पौतिमाष्यसे, पौतिमाष्यने गौपवनसे, गौपवनने कौशिकसे, कौशिकने कौण्डिन्यसे, ने शाण्डिल्यसे, शाण्डिल्यने कौशिकसे और गौतमसे, गौतमने आग्निवेश्यसे, आग्निवेश्यने शाण्डिल्यसे और आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने आनभिम्लातसे, आनभिम्लातने गौतमसे, गौतमने सैतव और प्राचीनयोग्यसे, सैतव और प्राचीनयोग्यने पाराशर्यसे, पाराशर्यने

ब्राह्मण ६ ] $\qquad$ $\div$ महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति $\div$ $\qquad$ ४७५ भारद्वाजसे, भारद्वाजने भारद्वाजसे और गौतमसे, गौतमने $\quad$ वत्सनपात् बाभ्रवने पन्था सौभरसे, पन्था सौभरने अयास्य भारद्वाजसे, भारद्वाजने पाराशर्यसे, पाराशर्यने वैजवापायनसे, $\quad$ आङ्गिरससे, अयास्य आङ्गिरसने आभूति त्वाष्ट्रसे, आभूति वैजवापायनने कौशिकायनिसे, कौशिकायनिने घृतकौशिकसे, $\quad$ त्वाष्ट्रने विश्वरूप त्वाष्ट्रमे, विश्वरूप त्वाष्ट्रने अश्विनीकुमारोंसे, घृतकौशिकने पाराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने पाराशर्यसे, $\quad$ अश्विनीकुमारोंने दध्यङ्ङाथर्वणसे, दध्यङ्ङाथर्वणने अथर्वा पाराशर्यने जातूकण्यंसे, जातूकर्ण्यने आसुरायणमे और यास्कसे, $\quad$ दैवमे, अथर्वा दैवने प्राध्वसन मृत्युने, प्राध्वसन मृत्युने आसुरायणने त्रैवणिसे, त्रैवणिने औपजन्धनिसे, औपजन्धनिने $\quad$ प्रध्वन्सनसे, प्रध्वन्सनने एकर्षिसे, एकर्षिने विप्रचित्तिसे, आसुरिसे, आसुरिने भारद्वाजने, भारद्वाजने आत्रेयसे, आत्रेयने $\quad$ विप्रचित्तिने व्यष्टिने, व्यष्टिने सनातनसे, सनातनने सनातनसे, माण्टिसे, माण्टिने गौतममे, गौतमने गौतमसे, गौतमने वात्स्यसे, $\quad$ सनातनने सनगसे, सनगने परमेष्ठीसे और परमेष्ठीने ब्रह्मासे वात्स्यने शाण्डिल्यमे, शाण्डिल्यने कैशोर्य काप्यसे, कैशोर्य $\quad$ [ इसे प्राप्त किया ] । ब्रह्मा स्वयम्भू—है, ब्रह्माको नमस्कार काप्यने कुमारहारितमे, कुमारहारितने गालवसे, गालवने $\quad$ है ॥ १-३ ॥ विदर्भीकौण्डिन्यमे विदर्भीकौण्डिन्यने वत्सनपात बाभ्रवसे, ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त

तृतीय अध्याय

ॐ तृतीय अध्याय प्रथम ब्राह्मण जनकके यज्ञमें याज्ञवल्क्य और अश्वलका संवाद

विदेहदेशमें रहनेवाले राजा जनकने एक बड़ी दक्षिणावाले यज्ञद्वारा यजन किया। उसमें कुरु और पाञ्चाल देशोंके ब्राह्मण एकत्रित हुए । उस राजा जनकको यह जाननेकी इच्छा हुई कि 'इन ब्राह्मणोंमें अनुवचन (प्रवचन) करनेमें सबसे बढ़कर कौन है ?' इसलिये उसने एक सहस्र गौएँ गोशालामें रोक लीं। उनमेंसे प्रत्येकके सींगोंमें दस दस पाद सुवर्ण बँधे हुए थे ॥ १ ॥ उसने उनसे कहा—'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपमें जो ब्रह्मनिष्ठ हो, वह इन गौओंको ले जाय।' किंतु उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ। तब याज्ञवल्क्यने अपने ही ब्रह्मचारीसे कहा, 'हे सौम्य सामश्रवा ! तू इन्हें ले जा।' तब वह उन्हें ले चला। इससे वे ब्राह्मण 'यह हम सबमें अपनेको ब्रह्मनिष्ठ कैसे कहता है' इस प्रकार कहते हुए क्रुद्ध हो गये। विदेहराज जनकका होता अश्वल था, उसने याज्ञवल्क्यसे पूछा, 'याज्ञवल्क्य ! हम सबमें क्या तुम ही ब्रह्मनिष्ठ हो ?' उसने कहा, 'ब्रह्मनिष्ठको तो हम नमस्कार करते हैं, हम तो गौओंकी ही इच्छावाले हैं।' इसीसे होता अश्वलने उससे प्रश्न करनेका निश्चय किया ॥ २ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह सब जो मृत्युसे व्याप्त है, मृत्युद्वारा स्वाधीन किया हुआ है, उस मृत्युकी व्याप्तिका यजमान किस साधनसे अतिक्रमण करता है?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'वह यजमान होता ऋत्विकूरूप अग्निसे और वाक्‌से उसका अतिक्रमण कर सकता है । वाक् ही यज्ञका होता है, यह जो वाक् है, वही यह अग्नि है, वह होता है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है' ॥ ३ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब दिन और रात्रिसे व्याप्त है, सब दिन और रात्रिके अधीन है। तब किस साधनके द्वारा यजमान दिन और रात्रिकी व्याप्तिका अतिक्रमण कर सकता है ?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'अध्वर्यु ऋत्विक् और चक्षुरूप आदित्य- के द्वारा । अध्वर्यु यज्ञका चक्षु ही है। अतः यह जो चक्षु है, वह यह आदित्य है और वह अध्वर्यु है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है' ॥ ४ ॥

'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो कुछ है, सब पूर्वपक्ष और अपरपक्षसे व्याप्त है, सब पूर्वपक्ष और अपर- पक्षद्वारा वशमे किया हुआ है। किस उपायसे यजमान पूर्वपक्ष और अपरपक्षकी व्याप्तिसे पार होकर मुक्त होता है ?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'उद्गाता ऋत्विकूसे और वायुरूप प्राणसे; क्योकि उद्गाता यज्ञका प्राण ही है। तथा यह जो प्राण है, वही वायु है, वही उद्गाता है, वही मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है' ॥ ५ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'यह जो अन्तरिक्ष है, वह निरालम्ब सा है। अतः यजमान किस आलम्बनसे स्वर्गलोकमें चढता है ?' [ इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'ब्रह्मा ऋत्विजके द्वारा और मनरूप चन्द्रमासे । ब्रह्मा यज्ञका मन ही है। और यह जो मन है; वही यह चन्द्रमा है, वह ब्रह्मा है, वह मुक्ति है और वही अतिमुक्ति है।' इस प्रकार अतिमोक्षोंका वर्णन हुआ, अब सम्पदोंका निरूपण किया जाता है ॥ ६ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज कितनी ऋचाओके द्वारा होता इस यज्ञमें शस्त्र शसन करेगा ?' [ याज्ञवल्क्यने कहा—] 'तीनके द्वारा।' [ अश्वल—] 'वे तीन कौन-सी हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या।' [ अश्वल— ] 'इनसे यजमान किसको जीतता है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'यह जितना भी प्राणिसमुदाय है [ उस सबको जीत लेता है] ' ॥ ७ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमे यह अध्वर्यु कितनी आहुतियाँ होम करेगा ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'तीन।' [ अश्वल—] 'वे तीन कौन कौन-सी है ?' [ याज्ञ- वल्क्य— ] 'जो होम की जानेपर प्रज्वल्लित होती हैं, जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं और जो होम की जानेपर पृथ्वीके ऊपर लीन हो जाती हैं।' [ अश्वल—] 'इनके द्वारा यजमान किसको जीतता है ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'जो होम की जानेपर प्रज्वलित होती हैं, उनसे यजमान देवलोकको ही जीत लेता है, क्योंकि देवलोक मानो देदीप्यमान हो रहा है। जो होम की जानेपर अत्यन्त शब्द करती हैं, उनसे वह पितृलोकको ही जीत लेता है; क्योंकि पितृलोक मानो अत्यन्त

कल्याण

ब्रह्मचारियोंको याज्ञवल्क्यका आदेश

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ब्राह्मण २ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४७७

ब्राह्मण २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४७७ शब्द करनेवाला है । जो होम की जानेपर पृथ्वीपर लीन हो जाती हैं, उनसे मनुष्यलोकको ही जीतता है क्योंकि मनुष्यलोक अधोवर्ती-सा है' ॥ ८ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज यह ब्रह्मा यज्ञमें दक्षिणकी ओर बैठकर कितने देवताओंद्वारा यज्ञकी रक्षा करता है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'एकके द्वारा ।' [ अश्वल— ] 'वह एक देवता कौन है ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'वह मन ही है। मन अनन्त है और विश्वेदेव भी अनन्त हैं, अत उस मनसे यजमान अनन्त लोकको जीत लेता है' ॥ ९ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा अश्वलने कहा, 'आज इस यज्ञमे उद्गाता कितनी स्तोत्रिया ऋचाओंका स्तवन करेगा ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'तीनका ।' [ अश्वल— ] 'वे तीन कौन-सी हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'पुरोनुवाक्या, याज्या और तीसरी शस्या ।' [ अश्वल—] 'इनमें जो शरीरान्तर्वर्ती है, वे कौन-सी हैं ?' [ याज्ञवल्क्य—] 'प्राण ही पुरोनुवाक्या है, अपान याज्या है और व्यान शस्या है।' [अश्वल—] 'इनसे यजमान किनपर जय प्राप्त करता है?' [याज्ञवल्क्य—] 'पुरोनुवाक्यासे पृथिवीलोकपर ही जय प्राप्त करता है, तथा याज्यासे अन्तरिक्ष- लोकपर और शस्यासे द्युलोकपर विजय प्राप्त करता है।' इसके पश्चात् होता अश्वल चुप हो गया ॥ १० ॥

द्वितीय ब्राह्मण याज्ञवल्क्य और आर्तभागका संवाद फिर उस (याज्ञवल्क्य) से जारत्कारव आर्तभागने पूछा, वह बोला, 'याज्ञवल्क्य ! ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं?' [ याज्ञवल्क्य—] 'आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं।' [ आर्तभाग—] 'वे जो आठ ग्रह और आठ अतिग्रह हैं, वे कौन-से हैं ?' ॥ १ ॥ प्राण ही ग्रह है, वह अपानरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी अपानसे ही गन्धोंको सूँघता है। वाक् ही ग्रह है, वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी वाक्‌से ही नामोका उच्चारण करता है। जिह्वा ही ग्रह है, वह रसरूप अतिग्रहमे गृहीत है, क्योंकि प्राणी जिह्वासे ही रसोंको विशेष- रूपसे जानता है। चक्षु ही ग्रह है, वह रूप-रूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी चक्षुसे ही रूपोंको देखता है। श्रोत्र ही ग्रह है, वह शब्दरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योकि प्राणी श्रोत्रसे ही शब्दोंको सुनता है। मन ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी मनसे ही कामोंकी कामना करता है। हस्त ही ग्रह है, वे कर्मरूप अतिग्रहसे गृहीत हैं क्योंकि प्राणी हस्तसे ही कर्म करता है। त्वचा ही ग्रह है, वह स्पर्शरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी त्वचासे ही स्पर्शोको जानता है। इस प्रकार ये आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं ॥ २-९ ॥' 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'यह जो कुछ है सब मृत्युका खाद्य है, सो वह देवता कौन है, जिसका खाद्य मृत्यु है ?' [इसपर याज्ञवल्क्यने कहा—] 'अग्नि ही मृत्यु है, वह जलका खाद्य है। [ इस प्रकारके जानसे ] पुनर्मृत्युका पराजय होता है' ॥ १० ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह मनुष्य मरता है, उस समय इसके प्राणोंका उत्क्रमण होता है या नहीं ?' 'नहीं, नहीं' ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'वे यहाँ ही लीन हो जाते हैं। वह फूल जाता है अर्थात् वायुको भीतर खींचता है और वायुसे पूर्ण हुआ ही मृत होकर पड़ा रहता है' ॥ ११ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह पुरुष मरता है, उस समय इसे क्या नहीं छोड़ता ?' [ याज्ञवल्क्य— ] 'नाम नहीं छोड़ता, नाम अनन्त ही हैं, विश्वेदेव भी अनन्त ही हैं, इस आनन्त्यदर्शनके द्वारा वह अनन्त लोकको ही जीत लेता है' ॥ १२ ॥ 'याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय इस मृतपुरुषकी वाणी अग्निमें लीन हो जाती है तथा प्राण वायुमें, चक्षु आदित्यमे, मन चन्द्रमामें, श्रोत्र दिशामे, शरीर पृथिवीमे, हृदयाकाश भूताकाशमें, रोम ओषधियोंमें और केश वनस्पतियोंमें लीन हो जाते हैं तथा रक्त और वीर्य जलमें स्थापित हो जाते हैं, उस समय यह पुरुष कहाँ रहता है ?' [याज्ञवल्क्य—] 'प्रियदर्शन आर्तभाग ! तू मुझे अपना हाथ पकड़ा, हम दोनों ही इस प्रश्नका उत्तर जानेंगे, यह प्रश्न जनसमुदायमे होने योग्य नहीं है।' तब उन दोनोंने उठकर [ एकान्तमें ] विचार किया । उन्होंने जो कुछ कहा, वह कर्म ही कहा, तथा जिसकी प्रशंसा की, वह कर्मकी ही प्रशंसा की। वह यह कि पुरुष पुण्यकर्मसे पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी होता है। इसके पीछे जारत्कारव आर्तभाग चुप हो गया ॥ १३ ॥