कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
४६६ | कंब रामायण
रहित ही गया।—यों विचार कर वह (वाली) हँस पड़ा और फिर मन में लज्जा से भर गया।
बड़ी पीड़ा से शिथिल हो पड़ा हुआ वह वाली, जो एक बड़े गड्ढे में गिरे हुए बलवान् मत्तगज के समान था, मन में लज्जा से भरकर अपने किरीट-भूषित शिर को झुकाता, अट्टहास करता, फिर (मौन हो) सोचता और विचार करता कि क्या इस प्रकार शर का प्रयोग करना धर्म हो सकता है ?
यदि सब (लोकों) के प्रभु (राम) ही धर्म से च्युत हो गये, तो निम्न व्यक्तियों का स्वभाव कैसा होगा ? मेरे विषय में इन प्रभु ने अन्याय कर दिया है।—ऐसे वचन मुँह से बोलनेवाले उस (वाली) के सम्मुख वे रामचन्द्र आ उपस्थित हुए, जो वेद-प्रतिपादित सत्य और क्षत्रियों के लिए विहित प्राचीन धर्म को अस्खलित रूप में सुरक्षित रखने के लिए अवतीर्ण हुए थे।
वाली ने अपनी आँखों के सामने उस विष्णु के अवतार (राम) को देखा, जो ऐसा था, मानों वर्षाकालिक नीलजलद-धनुष को धारण किये, अपने पार्श्व में विकसित स्वर्ण-वन (लक्ष्मण) के साथ, धरती पर उतर आया हो। उस (वाली) ने अपनी आँखों से, घावों से बहनेवाले रुधिर के सदृश ही रक्तवर्ण अग्नि-कणों को निकालते हुए राम को देखा और कहा—'तुमने क्या सोचा ? क्या किया ?' फिर उनकी निंदा में कहने लगा—
सत्य तथा कुल-धर्म की रक्षा करने के लिए अपने उत्तम प्राणों को भी छोड़ने-वाले उदारगुण एवं पवित्रात्म (दशरथ) के हे पुत्र ! तुम भरत से पूर्व (अर्थात्, भरत का बड़ा भाई होकर) जनमे। यदि दूसरों को बुरा काम करने से रोककर स्वयं बुरा काम करो, तो क्या वह पाप नहीं माना जायगा ? संसार के लिए मातृ-वात्सल्य के साथ निष्ठा तथा धर्म का भी निर्वाह करनेवाले (हे राम) ! कहो तो।
उच्च कुल तुम्हारा है। श्रेष्ठ विद्या तुम्हारी है। विजय तुम्हारी है। उचित सत्कर्म तुम्हारे हैं। त्रिभुवन का नायकत्व भी तुम्हारा ही है न ! बल तुम्हारा। इस संसार की रक्षा करनेवाली महिमा भी तुम्हारी। तो भी सबको विस्मृत-सा करके, इस सारी महिमा को विनष्ट करनेवाला ऐसा कार्य करना क्या तुम्हारे लिए उचित है ?
हे चित्र में अंकित करने के लिए दुष्कर सौंदर्य से विशिष्ट ! तुम्हारे कुल के सब लोगों के लिए क्षत्रिय-धर्म स्वल्प बना हुआ है न ? तो अब क्या तुम अपने प्राण-समान, हंसिनी-तुल्य, जनक की पुत्री, जो तुम्हें अमृत के सदृश प्राप्त हुई थी, उस देवी को खोकर अपने कर्त्तव्य से भी भ्रांत हो गये हो ?
यदि राक्षस तुम्हारा अहित करें, तो उसके बदले, उनके मित्र एक वानर-राजा को मार दो—क्या यही तुम्हारे मनु-धर्मशास्त्र में लिखा है ? क्या नामरूप गुण को तुमने कहीं खो दिया ? मुझमें तुमने कौन-सा दोष देखा ? हे तात ! तुम्हीं यदि ऐसे अपयश का भाजन हो जाओगे, तो यश को धारण करनेवाला और कौन होगा ?
हे कुलनाथ ! सदाचारित ! शब्दायमान समुद्र से आवृत पृथ्वी पर दौड़ते, उछलते रहनेवाले वानरों के मध्य ही क्या कलिकाल आ गया है ? क्या सत्कर्म तथा उच्चवर्गीय कुल
किष्किन्धाकाण्ड ४६७
बलहीनों के पास ही रहने योग्य हो गये हैं ? यदि बलवान् लोग नीच कार्य करेंगे. तो उससे क्या उन्हें अपयश न होकर सुयश प्राप्त होगा ?
हे ( युद्ध में ) किसी की सहायता की अपेक्षा न रखनेवाले वीर ! पिता से दिये गये ऐश्वर्य को उसी समय अपने भाई का स्वत्व बनाकर तुम वनवास के लिए आये । इस प्रकार नगर में तुमने एक ( विलक्षण ) कार्य किया, किंतु मेरे अनुज को यह राज्य देकर वन मे तुमने एक दूसरा ही कार्य किया, इससे बढ़कर भी क्या कोई कार्य हो सकता है ? ( यहाँ वाली व्यंग्य करता है। )
मुखर वीर-वलय तथा विजयमाला को धारण करनेवाले वीर लोग जो भी काम करते हैं, वह वीरों के योग्य ही तो माना जायगा । सब पुरातन शास्त्रों के प्रभु बने हुए तुमने यदि मेरे विषय में ऐसा क्षुद्र कार्य किया है, तो हे क्रोधरहित ! अब लङ्काधिप के अधर्म-कृत्य पर तुम कैसे क्रोध कर सकते हो ?
जब दो व्यक्ति युद्ध करने में निरत हों, तब उन दोनों को समान रूप से न देखकर यदि एक पर दया दिखायो और दूसरे पर आड़ में खड़े होकर अपने दृढ धनुष को भली भाँति झुकाकर तीक्ष्ण बाण को मर्म-स्थान में प्रयुक्त करो, तो क्या यह धर्म है अथवा और कुछ है ? जैसे भी हो. ऐसा पक्षपात अनुचित है ।
( तुम्हारे इस कार्य मे ) वीरता नहीं है । ( शस्त्र मे ) विहित विधि भी नहीं है। वह सत्य में सम्मिलित होनेवाला कार्य भी नहीं है। तुम्हारा स्वत्व बनी हुई इस पृथ्वी के लिए मेरा यह शरीर भारभूत भी नहीं है। मैं तुम्हारा शत्रु भी नहीं हूँ । तो, सद्गुण का त्याग कर ऐसा दया-रहित कार्य तुमने क्यों किया ?
द्विविध कर्मों ( इस लोक के और परलोक के लिए हितकारी कर्म ) का भली भाँति विचार करके, सबके लिए ( अर्थात्, शत्रु. मित्र और तटस्थ—तीनों प्रकार के लोगों के लिए ) समान रूप से उत्तम कार्य करना ही तो धर्म की रक्षा है और उसी में महत्त्व है । अन्यथा पक्षपात से एक को सहायता पहुँचाना क्या धर्म माना जा सकता है और क्या ऐसा करके कोई अपने को दोष से मुक्त रख सकता है ?
तुम्हारी रक्षा को दूरकर ( सीता का ) अपहरण करनेवाले शत्रु ( रावण ) को विनष्ट करने के लिए यदि तुम किसी दूसरे की सहायता पाना चाहते हो, तो तुम्हारा यह कैसा प्रयत्न है कि काले मेघ-जैसे हाथी के प्राण पीनेवाले, क्रोध से उमड़नेवाले सिंह को छोड़कर, तुम एक मगर को अपना साथी बना रहे हो ?
विश्व में विचरण करनेवाले चन्द्र में प्राचीन काल से ही कलङ्क लगा है, कदाचित् यह देखकर ही सूर्य के वंश में तुमने जन्म लेकर उस वंश के लिए भी एक अमिट कलङ्क उत्पन्न कर दिया है ।
युद्ध के लिए किसी दूसरे के आह्वान करने पर मैं यहाँ आया था । तुमने छिप-कर मेरा प्राण-हरण किया । अब जब मैं धरती पर गिरा हूँ, तब तुम दूसरों की दृष्टि में सिंह बनकर यहाँ आ खड़े हुए हो। वाह !
हे प्रतापी वीर ! शास्त्र-विधान की, अपने वंश के पितृ-पितामहों के शील तथा
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स्वभाव की रक्षा किये विना, तुमने (मुझे निहत करके) वाली को नहीं, किंतु राजधर्म की बाड़ को ही गिरा दिया है।
किसी ने तुम्हारी पत्नी का हरण किया, तो तुमने किसी दूसरे पर हाथ उठाया। तुम्हारे हाथ का भार बना हुआ यह धनुष वीरता के लिए कलंक है। तुम्हारी धनुर्विद्या की प्रवीणता, क्या सामने न आकर आड़ में खड़े होकर एक निःशस्त्र के वक्ष में शर छोड़ने के लिए ही है ?
यों अपने दाँतों को पीसता हुआ और अपनी आँखों से चिनगारियाँ निकालता हुआ वाली बोला। तब उसके सामने खड़े हुए महावीर (राम) कहने लगे—
जब तुम (मायावी का पीछा करते हुए) गुहा के भीतर गये थे और अनेक दिनों तक नहीं लौटे थे, तब दुःखी होकर सुग्रीव भी उसी गुहा में जाना चाहता था। उसे देखकर तुम्हारे कुल के बुद्धिमान् वृद्धों ने समझाया कि हे स्वर्णहार-भूषित (सुग्रीव) ! हमारी बात सुनो। अब तुम्हारा राजा बनना ही उचित है।
इसपर सुग्रीव ने कहा—मेरे ज्येष्ठ भ्राता वाली को मायावी ने मारकर वीर-स्वर्ग का शासन दिया है, अतः मैं उस मायावी को उसके परिवार-सहित मिटा दूँगा। या स्वयं प्राण-त्याग करूँगा। मैं जीवित रहकर राज्य करना नहीं चाहता। आपके वचन मेरे लिए योग्य नहीं हैं।
तब उत्तम सेनापतियों और सर्वज्ञ तथा अनुभवी वृद्धों ने उसका मार्ग रोककर समझाया—तुम्हारा राज्य करना ही सब प्रकार से उचित है। तब उस दोषहीन (सुग्रीव) ने विजय-किरीट धारण किया।
वह (सुग्रीव) तुम्हें लौट आया देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने तुम्हें नमस्कार कर निवेदन किया—हे प्रभु, यह तुम्हारा राज्य है, जिसका भार वृद्धों ने मुझपर हठ करके रखा है। इस प्रकार, गर्वरहित सुग्रीव ने पूर्व-घटित सारा वृत्तांत तुमसे निवेदन किया था। किंतु तुम उसपर क्रुद्ध हुए और—
उसको निरपराध जानकर भी उसपर तुमने दया नहीं की। जब वह तुमसे यह प्रार्थना कर रहा था कि मैं तुम्हारी शरण में हूँ, मेरे अपराध को क्षमा करो, तब भी उसको क्षमा न करके तुमने बड़े क्रोध के साथ उसे मारा-पीटा।
बल-समृद्ध सुग्रीव, यह कहकर कि मैं तुम्हारे साथ युद्ध में पराजित हो गया हूँ, अपने शिर पर हाथ जोड़े खड़ा रहा, किंतु तुम उसके प्राण यम को सौंप देना चाहते थे। तब वह चारों दिशाओं में भागने लगा था।
उसे उस प्रकार भागते जानकर भी तुमने उसपर दया नहीं की। यह विचार न करके कि वह तुम्हारा अनुज है, तुम उसका पीछा करने लगे। फिर मुनि के शाप से सुरक्षित पर्वत (ऋष्यमूक) पर जब सुग्रीव चला गया, तब तुम वहाँ से हटे।
दया, कुलीनता, वीरता, विद्या और उसके द्वारा प्राप्त नीति—इन सबका प्रयोजन तो यही है कि पर-नारी के शील की रक्षा करे।
यदि स्वच्छ विवेकवाला भी यह सोचकर कि मैं बड़ा बलवान् हूँ, अपने मन को
किष्किन्धाकाण्डं ४६२
कुमार्ग पर चलाये और बलहीनों पर क्रोध करे, तो वह वीरधर्म से च्युत हो जाता है। ऐसे ही यदि कोई पर-पुरुष की सुरक्षित शीलवाली स्त्री के चारित्र्य को मिटाता है, तो वह भी धर्म से च्युत होता है।
धर्म क्या है?—तुमने यह नहीं सोचा। इहलोक तथा परलोक के फलों (यश और पुण्य) का विचार भी नहीं किया। यदि तुमने यह सोचा होता, तो क्या अधर्मता के साथ अपने छोटे भाई की प्राण-समान पत्नी की संगति प्राप्त करते ?
इन कारणों से, तथा उस सुग्रीव के मेरे प्राणसम मित्र होने से, मैंने तुम्हारे प्राण हरण किये। इतना ही नहीं, पराया होने पर भी, बलहीनों के दुःख को दूर करना ही मेरा ध्येय है।
तुम्हारा यही अपराध है। जब अतिसुन्दर महावीर राम ने इस प्रकार कहा, तब अनुचित कार्य करनेवाला वाली फिर कहने लगा—तुम्हारा यह कथन मेरे लिए लागू नहीं होता। क्योंकि, हम वानरों के लिए अपनी इच्छा के अनुकूल कार्य करना कुछ अधर्म नहीं होता।
वाली ने कहा—हे प्रभु ! पातिव्रत्य धर्म तथा उसके अनुकूल अन्य सद्गुणों से युक्त कर्म, तुम्हारे असत्य-रहित कुल की स्त्रियों के लिए, कमलभव (ब्रह्मा) ने जिस प्रकार विवाह का विधान किया है, उसी प्रकार हमारे कुल की स्त्रियों के लिए नहीं किया। किंतु, हमारे यहाँ जब जैसा संयोग मिले, तब वैसा ही संबंध करने का विधान है।
हे शत्रुओं की मज्जा तथा घृत से लिप्त चक्रायुध धारण करनेवाले ! हमारा मन जैसा चाहता है, वैसा ही हमारा आचरण भी होता है। इसके अतिरिक्त, हम वानरों के लिए वेद-प्रतिपादित विवाह का कोई विधान नहीं है। कुल-परंपरागत गुण भी हममें नहीं होते।
मुझे जीतनेवाले हे विजयशील ! यही हमारे कुल की नीति है। अतः, मैंने अपने कुल-धर्म के अनुसार कोई पाप नहीं किया है। यह तुम समझ लो। वाली के यह कहने पर रामचन्द्र ने उत्तर दिया—
तुम उत्तम गुणवाले देवों के पुत्र बनकर उत्पन्न हुए हो और शाश्वत धर्म-मार्ग के ज्ञाता हो। तुम मृग नहीं हो। अतः, विजय-मालाओं से भूषित रहनेवाले तुम-जैसे वीर के लिए ऐसा कार्य अनुचित ही है।
क्या धर्म, पंचेंद्रियों के वशीभूत शरीर से ही संबंध रखता है ? क्या वह विषयों का विवेचन करनेवाले विवेक से संबंध नहीं रखता है ? तुमने तो (शरीर से वानर होने पर भी विवेक से) धर्म के महत्त्व को भली भाँति जाना है। अतः, क्या पापकर्म करना तुम्हारे लिए उचित है ?
वह गजेंद्र भी जन्म से मृग-जाति का ही तो था, जिसने एक मगर से ग्रस्त होकर शंखधारी विजयशील भगवान् (विष्णु) को पुकारा था और अपने अनुपम विवेक के कारण मोक्ष-पद प्राप्त किया था।
मेरे पितृ-तुल्य वह जटायु भी तो एक गृद्ध ही था, जिसने धर्म-मार्ग में अपने मन
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को निरत रखकर स्वर्ण-कंकण-धारिणी लक्ष्मी (-सदृश सीता) के दुःख को दूर करने के प्रयत्न में भयंकर युद्ध किया था और इस संसार से मुक्ति प्राप्त की थी ।
पशुओं का स्वभाव ऐसा होता है कि वे भले और बुरे के विवेक से हीन रहकर जीवन व्यतीत करते हैं । किंतु, तुम्हारे मुख से निकले वचन ही बता रहे हैं कि चिरंतन धर्म का ऐसा कोई मार्ग नहीं है, जिसे तुमने नहीं जाना हो ।
यह उचित है, यह अनुचित है—इस प्रकार का विवेक किसी व्यक्ति में भी न हो, तो वह भी पशु ही होता है। यदि कोई पशु भी मनु के बताये मार्ग पर चले, तो वह देव-तुल्य हो जाता है ।
तुमने यम के प्रभाव को भी मिटा देनेवाले, परशु धारण करनेवाले शिव के प्रति जो भक्ति की थी, उसी के फलस्वरूप, विष्णु के द्वारा सृष्ट चार महाभूतों की शक्ति प्राप्त की थी।
जन्म से नीच कहे जानेवाले, धर्म-मार्ग पर चलनेवाले, निष्पाप तपस्या करनेवाले, अनेक गुणों से युक्त देवता तथा पाप-कृत्य करनेवाले—इन सब लोगों में भी बुरे आचरण करनेवाले होते हैं ।
अतः, किसी भी कुल में उत्पन्न व्यक्ति की महत्ता या क्षुद्रता उसके कार्य से ही होती है। यह जानते हुए भी तुमने अन्य की पत्नी के शील को मिटाया—इस प्रकार, मनु-नीति पर दृढ रहनेवाले (राम) ने कहा।
(रामचन्द्र का) यह कथन सुनकर कपियों के राजा वाली ने राम से पूछा—हे प्रभु ! ऐसी बात है, तो तुम को युद्ध-क्षेत्र में आकर मुझसे युद्ध करते हुए बाण छोड़ना चाहिए था। किंतु, ऐसा न करके, कहीं छिपकर धनुष से शर का प्रयोग तुमने क्यों किया?—इस प्रश्न का उत्तर लक्ष्मण देने लगा ।
तुम्हारा भाई (सुग्रीव), पहले ही उन (राम) की शरण में आ गया था। तब उन्होंने उसे यह वचन दिया था कि नीति से भ्रष्ट हुए तुमको वे निहत करेंगे। यदि वे युद्ध-क्षेत्र में तुम्हारे सम्मुख आते, तो कदाचित् तुम भी अपने प्राणों के मोह से उनकी शरण माँगते—यही सोचकर मेरे भ्राता ने तुम्हारे सामने न आकर छिपकर शर-संधान किया।
कपिकुल के प्रभु वाली ने, जिसने शास्त्रों का ज्ञान रूपी संपत्ति प्राप्त की थी, लक्ष्मण के कथन को हृदयंगम किया और यह जानकर कि अति महिमावान् रामचन्द्र धर्म का विनाश कभी नहीं करेंगे, शांत हो गया और (राम के प्रति) सिर नवाकर क्षुद्र विचारों से हीन वाली कहने लगा—
हे पुरुषोत्तम ! तुम प्राणियों पर मातृ-समान प्रेम रखते हो। धर्म, निष्पक्षता आदि सद्गुणों की साकार मूर्ति हो । (वेद-प्रतिपादित) सन्मार्ग के अनुसार देखा जाय, तो हम श्वान-समान हैं, और हम दोषहीन भी नहीं हैं। हमारे पापों को क्षमा करो।
फिर, रामचन्द्र से वाली ने प्रार्थना की—हे प्रभु ! मुझे विवेकहीन वानर तथा श्वान-सदृश तुच्छ व्यक्ति समझकर मेरे वचनों को मन में न रखो। दुःखद जन्म-व्याधि के लिए अपूर्व औषधि-समान मेरे स्वामी । सब अभीष्टों को देनेवाले हे उदार ! मेरी एक बात सुनो—यह कहकर वाली फिर बोला—
किष्किन्धाकाण्डं ४७१
संधान कर प्रयुक्त किये गये वाण से मुझे आहत कर, प्राण छूटने के समय, श्वान-सदृश मुझ क्षुद्र व्यक्ति को तुमने आत्मज्ञान प्रदान किया। त्रिदेव तुम्ही हो। आदि परब्रह्म तुम्ही हो। पाप और पुण्य भी तुम्ही हो। शत्रु और मित्र भी तुम्ही हो। अन्य सब भी तुम्ही हो।
तुम्हारे शर ने, त्रिपुर-दाह करनेवाले (शिव) आदि देवो के द्वारा मुझे दिये गये सब वरो को निष्फल बनाकर मेरे दोषहीन दृढ वक्ष मे प्रविष्ट होकर मेरे प्राणो को पी लिया। तुम्हारे ऐसे शर के अतिरिक्त अन्य पृथक धर्म क्या है ? (अर्थात्, तुम्हारा शर स्वय धर्म-स्वरूप है।)
हे देव। विचार करने पर ज्ञात होता है कि अति-बलिष्ठ शूल को धारण करने-वाले (शिवजी), उनकी प्रार्थना करनेवाले सब लोगो को श्रेष्ठ वर देते हैं, तो वह तुम्हारे अनुपम नाम का जप करने के ही प्रभाव से ऐसा करते हैं। वैसे प्रभावशाली नाम के विषयभूत तुमको प्रत्यक्ष देखने पर अब मेरे लिए दुष्प्राप्य फल क्या रह गया ? (अर्थात्, मेरी सब अभिलाषाएँ पूर्ण हो गइ।)
तुम सब प्राणी, सब पदार्थ-समूह, सब ऋतुएँ तथा उन ऋतुओ के फल बनकर इस प्रकार व्याप्त रहते हो, जिस प्रकार पुष्प के भीतर सुगंधि रहती है। हे अनुपम ! तुम कौन हो और तुम्हारा रूप क्या है?—यह मेरे ज्ञान ने मुझे जता दिया। अब क्या शाश्वत परमपद भी मेरे लिए दुष्प्राप्य हो सकता है ? (अर्थात्, वह भी सुलभ है।)
सद्धर्म को ही अपना स्वरूप बनाये रहनेवाले तुमको मैने देख लिया है। अब मुझे और क्या देखना शेष रह गया है ? मेरा बहुत बड़ा दीर्घकालिक कर्मजात आज समाप्त हो गया (अर्थात्, अब मै उस कर्म-बधन से मुक्त हो गया)। तुम्हारा दिया हुआ यह दड ही मुझे सद्गति देनेवाला है।
हे गगन से भी उन्नत महत्त्व और विजय से युक्त नरेश। मेरा भाई मुझे मरवाने के लिए तुम्हे ले आया और तुच्छ वानरो की अच्छी मत्रणा से शासित किये जानेवाले मेरे इस चिरकालीन क्षुद्र राज्य को स्वयं लेकर मुझे मुक्ति का राज्य दिया है। इससे बढकर मेरा और क्या उपकार हो सकता है ?
हे चित्र-सदृश आकारवाले। इस दास को तुमसे कुछ माँगना है। मेरा भाई (सुग्रीव) पुष्प-मधु का पान करने से कभी विकृतबुद्धि होकर कोई अपराध भी कर दे, तो उसपर तुम क्रोध मत करना और जिस शर-रूपी यम का प्रयोग मुझपर किया है, उसका प्रयोग उसपर मत करना।
एक और प्रार्थना है। तुम्हारे भ्राता लोग यह सोचकर कि उसने अपने बडे भाई को मरवा डाला है, मेरे भाई को कभी अपमानित न करें। हे उत्तम गुणवाले ! तुम उन्हे वैसा करने से रोकना। हे प्रभु ! तुमने पहले इसके कार्य को पूर्ण करने का वचन दिया था, अतएव इसने जो किया है (अर्थात्, अपने बडे भाई को मरवाया), वह भाग्य का ही खेल है। क्या भाग्य के परिणाम से मुक्त होना संभव है ?
हे विजयी प्रभु ! मुझसे और कुछ नही हो सकता था, तो भी मै अपने वानर
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जन्म के योग्य, कम-से-कम इतना कार्य तो कर दिखाता कि उस मायावी राक्षस (रावण) को अपनी पूँछ में बाँधकर तुम्हारे सम्मुख ला खड़ा कर देता। मेरा उतना भी भाग्य नहीं हुआ। पर जो बीत गया, उसके बारे में कहने से कुछ लाभ नहीं। कोई कार्य पूरा करवाना हो, या कुछ महत्त्व का कार्य हो, तो उसे करने के लिए यह हनुमान् योग्य व्यक्ति है।
हे चक्रधारी ! हनुमान् को तुम अपने अरुण हस्त में रखा हुआ धनुष समझो। इसके सदृश सहायक अन्य कोई नहीं है। नभ से भी उन्नत कंधोंवाले। तुम उस देवी (सीता) का अन्वेषण करके उसे प्राप्त करो।
राम के प्रति ये वचन कहकर, उस वाली ने, अपनी दोनों बाँहों को बढ़ाकर निकट-स्थित अपने भाई का आलिंगन किया और कहा—हे तात ! तुम्हें कहने योग्य एक हित-वचन है। उसे अपने मन में ठीक से बिठा लो। हे पर्वतोन्नत कंधोंवाले ! मेरी मृत्यु पर तुम शोक मत करना। यह कहकर वह फिर आगे बोला—
हे अधिक विवेकवाले ! जिस परम तत्त्व के बारे में वेद, शास्त्र, मुनि तथा कमलासन ब्रह्मा आदि वर्णन करते हैं, वही परब्रह्म धर्म-मार्ग को सुरक्षित रखने के लिए शब्दायमान वीर-कंकणधारी राम के रूप में अवतीर्ण हुआ है और शत्रुनाशक धनुष लेकर यहाँ आया है। इसमें कोई संदेह नहीं है। तुम इसे भली भाँति जान लो।
हे स्वर्णमय पर्वत-सदृश अति उज्ज्वल कंधोंवाले ! शाश्वत आनंद (अर्थात्, मुक्ति) रूपी संपत्ति की कामना करके, उसके योग्य मार्ग पर चलनेवाले सब प्राणी इसी का नाम जपते हैं। इसी का ध्यान करते हैं। इस बात को तुम जान लो। यदि इसके सामान्य गुणों का ही विचार करें, तो भी इसके प्रभाव का प्रमाण देने के लिए इतना पर्याप्त है कि इसने मुझे मारा है। इससे बढ़कर और कोई प्रमाण आवश्यक नहीं।
हे तात ! जो वंचक हैं, जिन्होंने असंख्य असाध्य पाप किये हैं, वैसे जन भी इस उदार के शर-प्रयोग से मारे जाकर अति उत्तम मुक्ति-पद को प्राप्त करते हैं, तो उन लोगों के द्वारा मुक्ति-पद प्राप्त करने के बारे में कहना ही क्या है, जो इनके उभय चरणों की सेवा में निरत रहते हैं ?
जब भाग्य ही स्वयं सहायता देने के लिए प्रस्तुत हो, तो फिर दुर्लभ वस्तु क्या हो सकती है ? अतः, इहलोक और परलोक, दोनों के फल तुमने प्राप्त कर लिये हैं। अब यही तुम्हारा कर्त्तव्य रह गया है कि लक्ष्मी तथा श्रीवत्स-चिह्नों से अंकित वक्षवाले इस (राम) की आज्ञा को शिरोधार्य करके, उसी में अपने चित्त को एकाग्र बना लो। यों त्रिभुवनों में तुम-उन्नति पाओगे।
वानर-सुलभ अज्ञान और चपलता को दूर कर दो। उदारमना (रामचन्द्र) के द्वारा किये गये उपकार को कभी न भूलो। उसके लिए आवश्यक होने पर अपने प्राण भी त्यागने के लिए सन्नद्ध रहो। परमपद को प्रदान करनेवाले उस परब्रह्म की सभी आज्ञाओं का सुचारु रूप से पालन करके अपार जन्म-परंपरा से अनायास ही मुक्त हो जाओ।
राज्य प्राप्त करने के आनन्द से मत्त होकर इसकी उपेक्षा न कर बैठना। उसके कमल-चरणों की छाया से कभी न हटना। इसी भाँति जीवन बिताना। यह स्मरण रखना
किष्किन्ध्याकाण्ड ४७३
कि नरपति जलती अग्नि की उपमा के योग्य होते हैं। इसके बताये गये सब कार्य पूर्ण करना। यह न सोचना कि नरपति तुच्छ सेवकों के अपराधों को क्षमा कर देते हैं।
इस प्रकार के हित-वचन अपने दुःखी भाई के प्रति कहकर वाली ने अपने सम्मुख स्थित सुन्दर (राम) को देखकर कहा—हे चक्रवर्त्ती कुमार। यह (सुग्रीव) अपने सारे परिवार-सहित तुम्हारी ही शरण में है। यह कहकर अपने अनुज को राम के समीप प्रेषित किया और अपने दोनो कर शिर पर जोड़ लिये।
इस प्रकार, हाथ जोड़ने के पश्चात् अपने प्रेम-पात्र अनुज का मुख देखकर (वाली ने) कहा—तुम मेरे प्यारे पुत्र (अंगद) को शीघ्र बुलाओ। सुग्रीव के बुलाने पर, अपने हाथो से समुद्र को मथनेवाले उस (वाली) का पुत्र अंगद शीघ्र वहाँ आ पहुँचा।
वह अंगद, जिसने कभी कल्पना में भी दुःखी मनवाले व्यक्तियों को नही देखा था, उज्ज्वल पूर्णचन्द्र के समान वहाँ आ पहुँचा। आकर उसने अपनी आँखो से अपने प्रिय पिता को, पुष्पमय सुगंधित शय्या के बदले रक्त-समुद्र के मध्य पड़ा हुआ देखा।
सूर्य-चन्द्र के सदृश दो उज्ज्वल लोल कुंडलों से विभूषित तथा पुष्ट कंधोवाले कुमार ने अपने पिता को उस दशा में पड़े हुए देखा। देखकर अपने पिता के शरीर पर ऐसा गिरा, जैसे अश्रु तथा रक्त के प्रवाह के मध्य, धरती पर पड़े हुए चन्द्र-मंडल पर, गगन तल से कोई उज्ज्वल नक्षत्र आ गिरा हो।
हाय मेरे पिता ! मेरे पिता ! तुमने अपने मन से या कर्म से, उत्तुंग तरंग-भरे समुद्र से आवृत इस धरती पर, किसी को हानि नही पहुँचाई। फिर, भी तुम पर यह विपदा क्यो आई ? खैर जो हो, किंतु यह कैसे हुआ कि तुम्हारी आँखो के सामने ही यम भी तुम्हारे पास आ पहुँचा ? उस (यम) के सामर्थ्य को निर्भय होकर मिटा देनेवाले (तुम्हारे) अतिरिक्त और कौन है ?
जिस रावण ने, अष्ट दिशाओ मे कील के समान ठोके गये-से अविचल रहनेवाले दिग्गजो को भी परास्त किया था, उसका मन भी तुम्हारी पुष्ट मूलवाली सुन्दर पूँछ का स्मरण होने मात्र से ऐसा धड़क उठता है, जैसे पटह बजाया जा रहा हो। हाय ! उसका वह भय अब समाप्त हो गया।
हे पिता ! कुलपर्वतो तथा चक्रवाल नामक गगनोन्नत पर्वतो के शिखर अब तुम्हारे सुन्दर पद-चिह्नों से रहित हो जायेंगे। मंदर पर्वत, वासुकि सर्प, चन्द्रमा तथा अन्य उपकरणो को लेकर तरंगायमान समुद्र को मथने के लिए किसी से-प्रार्थना करनी हो, तो अब कौन उसे मथ सकेगा ?
रूई-जैसे कोमल चरणोवाली पार्वती को अपने अर्धभाग मे धारण किये हुए शिवजी के चरणो के अतिरिक्त और किसीके प्रति कभी तुमने अजलि नही दी। ऐसे शासन-चक्र से युक्त हे मेरे पिता ! तुम्हारे द्वारा क्षीरसागर के मथे जाने से ही देवगण भी मरणहीन बने हुए हैं। किन्तु, मधुर अमृत देनेवाले तुम, मृत्यु को प्राप्त हो रहे हो। तुम्हारे सदृश महिमा-वाले अन्य कौन हैं ?
इस प्रकार के विविध वचन कहकर अंगद रोने लगा। उसे देखकर अतिशोकातुर,
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कंब रामायण
रक्त-नेत्र वाली ने, जिसका मन आग में पडे मोम के-जैसा पिघल गया था, उसे आलिंगन करते हुए कहा—अब तुम दुःखी मत होओ। यह, प्रभु (राम) का किया हुआ पुण्य-कार्य है।
त्रुटिहीन रूप से यदि विचार करके देखो, तो विदित होगा कि जन्म लेना और मृत्यु पाना—तीनो लोको के निवासियो के लिए आदि से ही नियत हैं। मेरे पूर्वकृत तप के कारण ही मुझे इस प्रकार की मृत्यु मिली है। सर्वसाक्षी बने हुए महावीर ने स्वय आकर मुझे मुक्ति प्रदान की है।
हे तात ! हे पुत्र ! तुम बाल्यावस्था को पार कर चुके हो। यदि मेरी बात मानो, तो कहूँगा कि वही परमतत्त्व, जिससे परे और कोई तत्त्व नहीं है, हमारी दृष्टि के गोचर बनकर, (मनुष्य-रूप में) अपने चरणो को धरती पर रखे और कर में धनुष धारण करके उपस्थित हुआ है। अज्ञान में डालनेवाली जन्म-रूपी व्याधि की यह (राम) ओषधि है। यह जान लो और इसको नमस्कार करो।
हे स्वर्णमय आभरणधारी ! इसने मेरे प्राण हरण किये—यह बात किंचित् भी न सोचना। तुम अपने प्राणों की रक्षा करो। यदि इस (राम) का शत्रुओं के साथ युद्ध छिडे, तो तुम इसका साथी बनना। यह (राम), सब जीवो का उनके सस्कार के अनुसार, हित करनेवाला है। इसके कमल सदृश-चरणो को अपना शिर पर धारण करके जीना।
इस प्रकार के हित-वचन कहने के उपरांत पर्वत से भी अधिक दृढ कंधोंवाले वानर-राज ने अपने पुत्र (अंगद) का अपनी दीर्घ बाँहो से आलिंगन कर लिया। फिर, स्वर्णमय रत्नखचित आभरण पहननेवाले रक्षक राम को देखकर बोला—
हे असत्य मनवालो के लिए अदृश्य ज्ञान-स्वरूप ! यह मेरा पुत्र ऐसे कंधोवाला है, जो घृत लगे दीर्घ त्रिशूलधारी कालवर्ण राक्षस-सेना-रूपी तूल-समुदाय के लिए अग्नि-स्वरूप है। दोषहीन आचरणवाला है। यह तुम्हारी शरण मे है।—यों कहकर वाली ने उसे राम को दिखाया। तब—
वह (अंगद) राम के चरणो पर नत हुआ। कमल-सदृश विशाल नयनोवाले राम ने अपने सुन्दर करवाल को अंगद के आगे बढाकर उससे कहा—यह लो। तब सातों लोक उन (राम) की प्रशंसा कर उठे। वाली अपना शरीर छोडकर उत्तम लोको के परे रहनेवाले परमपद को जा पहुँचा।
उस समय वाली के हाथ शिथिल पड़ गये। वेगवान् बाण वाली के यम-समान कठोर वक्ष मे न रहकर उसको पार करके निकल गया और ऊपर उठ गया। फिर, पवित्र समुद्र के जल में धुलकर, देवताओं के दिये पुष्पहारो से विभूषित होकर, प्रभु (राम) की पीठ से कभी न हटनेवाले विजयी तूणीर मे जा पहुँचा। (१-१५३)
अध्याय ८
शासन पटल
वाली स्वर्ग को सिधारा। वटपत्र पर शयन करनेवाले (विष्णु के अवतार राम) उसको अनंत आनंद (अर्थात्, मोक्ष) देकर अपने सम्मुख खड़े सूर्यपुत्र के अरुण हस्त को अपने कर में लिये, अंगद को भी साथ लेकर वहाँ से चले गये। जब शूल-जैसे नयनोंवाली तारा ने (वाली की मृत्यु का) समाचार पाया, तब वह वहाँ आकर उसके शरीर पर गिर पड़ी।
वाली के शरीर से बहनेवाले भयंकर रक्त-प्रवाह से, उसके पर्वतोपम स्तन, जिनका अग्रभाग मुकुलित था, कुंकुमरस-लिप्त जैसे हो गये। उसके घुँघुराले केश लाल हो गये। वह, वहाँ गिरे हुए मनोहर तथा विशाल कंधोंवाले वाली के वक्ष पर इस प्रकार लोटने लगी, जिस प्रकार सूर्य के अरुण किरणों से आवृत विशाल गगन में कोई विद्युत् कौंध रही हो।
तारा विषण्ण हुई। दीन और व्याकुल हुई। आह भरी। द्रवितहृदय हुई। अपने दोनों करों को सिर पर जोड़कर रखा। शिथिल हुई। उसका केश-पाश गलित होकर बिखर पड़ा। वह ऊँचे स्वर में निम्नलिखित प्रकार के वचन कह-कहकर रो पड़ी। उसके कंठ की ध्वनि से बाँसुरी, मधुर नादवाला याऴ् और वीणा के नाद भी लज्जित हो गये :
हे मेरे अत्युत्तम अपूर्व प्राण ! हे मेरे हृदय ! हे मेरे प्रभु ! तुम्हारी पर्वत-सदृश भुजाओं के मध्य, नित्य सुरक्षित रहती हुई, मैंने कभी वेला-हीन दुःख-सागर को देखा भी नहीं था। अब मैं तुम्हारी यह दशा देखकर बहुत त्रस्त हो रही हूँ।
तुम कभी मेरे प्रतिकूल नहीं हुए। तुम्हारे इस दुःख को देखकर भी मैं प्राण छोड़े बिना जीवित हूँ। अतः, अब तुम मुझे अपने निकट नहीं बुलाओगे। हे मेरे भाग्य-देवता ! प्राणों के जाने पर क्या देह जीवित रह सकती है ?
हे मेरे प्रभु ! क्या यमदेवता यह नहीं जानते कि तुम्हारे द्वारा सुरभिमय अमृत दिये जाने के कारण ही वे अमर बने हुए हैं ? क्या वे इतने क्षुद्र हैं कि अपने प्रति (तुम्हारे द्वारा) किये उपकार का स्मरण नहीं करते ?
तुम सब दिशाओं में जाकर, सच्ची भक्ति के साथ, न कुम्हलानेवाले पुष्पों से, अपने अर्धांग में उमादेवी को धारण करनेवाले देव की पूजा किये बिना, इतनी देर तक यहीं पड़े हो। क्या यह उचित है ?
हे प्रभो ! पुष्पशय्या पर, मृदु वस्त्रों के आवरण पर, शयन करनेवाले तुम अब भूमि पर पड़े हो। यह देखकर मेरा मन द्रवित हो रहा है। मैं तुम्हारे सम्मुख खड़ी होकर आँसू बहा रही हूँ। फिर भी, तुम मुझसे कुछ नहीं कह रहे हो। मुझसे कौन-सा अपराध हुआ है ?
हे कभी असत्य न बोलनेवाले पुण्यात्मा ! मैं यहाँ रहकर इस प्रकार दुःखी हो रही हूँ और तुम सत्य-परायण देवों के लोक में जाकर सुख भोग रहे हो। हे प्रभु ! क्या
| ४७६ | कंब रामायण |
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तुम्हारा यह कथन असत्य ही है कि मैं तुम्हारा प्राण हूँ ? (अर्थात्, तुम जो यह कहते थे कि तुम मेरे प्राण हो, क्या वह कथन झूठ ही था ?)
युद्ध के अभ्यस्त कंधोंवाले ! यदि यह सत्य है कि मैं तुम्हारे हृदय में हूँ, तो शत्रु का शर मेरे प्राण भी हर लेता। यदि यह सत्य है कि तुम मेरे हृदय में रहते हो, तो तुम निश्चय ही जीवित रहते । हम दोनों ही एक दूसरे के हृदय में नहीं थे।
हे मेरे प्रभु ! देवताओं ने तुम्हारा यह उपकार स्मरण करके कि तुमने उन्हें अमृत ला दिया था, जिससे वे अमर बन सके, अब क्या (तुमको स्वर्ग में आये हुए देखकर) उन्होंने तुम्हें कल्पपुष्प प्रदान करके, तुम्हें अपना मित्र समझकर, तुम्हारी आवभगत करके तुम्हारा सत्कार कर रहे हैं ?
तुम तो अमरता प्रदान करनेवाला अमृत भी (देवों को) ला देनेवाले हो। छिपे रहकर शर छोड़ने के लिए तैयार होकर आया हुआ राम यदि अपने मुँह से माँगता, तो क्या तुम अपना सर्वस्व भी उसको नहीं दे देते ?
मैंने पहले ही कहा था (कि राम सुग्रीव की सहायता करने के लिए आया है)। मेरा कहना न मानकर, यह कहते हुए कि वह राम वैसा अनुचित कार्य नहीं करेगा, तुम अपने भाई से युद्ध करने लगे और युगात तक जीवित रहने योग्य तुम मृत्यु को प्राप्त हो गये। मैं तुम्हे फिर कब देखूँगी ?
यदि तुम प्रहार करते, तो मेषूपर्वत भी चूर-चूर हो जाता। आह ! एक शर ने तुम्हारे सामने होकर तुम्हारे वक्ष को कैसे विदीर्ण कर दिया ? क्या यह देवों की माया है? मैं नहीं समझ रही हूँ। अथवा यहाँ जो मरा पड़ा है, वह कोई दूसरा ही वाली है ?
हे नाथ ! तुम्हारे भाई ने उत्तम यश की गरिमा से युक्त रहकर तुम से वैर किया, जिसके परिणाम-स्वरूप तुम मृत्यु को प्राप्त हुए और हमारा सर्वस्व विनष्ट हो गया। हाय! तुम हमारी यह दशा क्यों नहीं देखते ?
अपूर्व अमृत के समान विपदाओं को दूर करनेवाले उस राम ने अब एक वीर का अहित सोचकर क्या कार्य कर दिया ? क्या यह वचन केवल कथन ही है (किंतु, यथार्थ नहीं है) कि धर्म पर स्थिर रहनेवालों की कसौटी, उनके कार्य ही होते हैं ?
इस प्रकार के अनेक वचन कहकर, अति दुःखित हो, बुद्धिभ्रष्ट हो वह निश्चेष्ट पड़ी रही। उसकी वह दशा देखकर नीतिनिपुण तथा दृढ़ पर्वत के सदृश हनुमान् ने--
वानर-स्त्रियों के द्वारा उसको उसके निवास पर पहुँचा दिया और वाली के अंतिम कृत्य करवाये। फिर, श्रीरामचन्द्र के पास जाकर सब वृत्तांत सुनाया।
तब सूर्यदेव, जो अपने प्रकाश से अंधकार को निर्मल कर देता है, अपने गम्य-स्थान अस्ताचल पर जा पहुँचा। वह (सूर्य) पर्वत-सदृश वानरराज (वाली) के मुख की समता कर रहा था (अर्थात्, रक्तवर्ण दीखता था)।
संध्या के समय सूर्य अस्त हुआ। उदारशील (राम) सीता का स्मरण करते हुए, विश्रांत होकर शिथिल तथा द्रवितहृदय हो उठे। और, इस प्रकार (कष्टों से) भरे हुए उस निशा-सागर को बड़ी कठिनाई से पार किया।
किष्किन्धाकाण्ड ४७७
सूर्य, यह सोचकर कि उसका पुत्र (सुग्रीव) स्वर्ण-मुकुट धारण करनेवाला है, बड़ी उमंग से भर गया। (उस राजतिलक के उत्सव में) सहयोग देने के लिए लक्ष्मी का भी आगमन हो—इस उद्देश्य से, उस (सूर्य) ने अपने अरुण करों से उत्तम कमल-दल-रूपी कपाट खोल दिये।
उस समय, करुणानाथ (राम) ने अपने उत्तम मतिवाले अपने अनुज को देखकर यह आदेश दिया—हे तात ! तुम अपने हाथों से सूर्य-पुत्र को यथाविधि राज्य पर अभिषिक्त कर दो।
आज्ञापालक, महिमावान् लक्ष्मण ने तुरत ही जाकर नीति से स्खलित न होने-वाले तथा युद्ध में कुशल हनुमान् से कहा—हे वीर ! इस शुभ कार्य के लिए आवश्यक समस्त सामग्री को तुम अभी ले आओ—तब,
अभिषेक के योग्य तीर्थ-जल, मंगल-द्रव्य, प्रशंसनीय स्वर्णमुकुट आदि उपकरण—सब हनुमान् के द्वारा लाये गये। पुरुषोत्तम (राम) के भाई लक्ष्मण ने महिमा-भरे सुग्रीव से व्रत आदि कर्त्तव्य कराये। फिर—
ब्राह्मण लोग आशीर्वाद दे रहे थे। देव मधु-पूर्ण पुष्प बरसा रहे थे। सद्धर्म के पथपर चलनेवाले मुनि (पुरोहित बनकर) कृत्य करा रहे थे। धर्मात्माओं के बताये विधि से लक्ष्मण ने उस महाभाग (सुग्रीव) को मुकुट पहनाया।
स्वर्णमय किरीट धारण करके सुग्रीव ने असत्य-रहित प्रभु (राम) के महिमामय चरणों को प्रणाम किया। तब प्रभु ने, जो अर्थपूर्ण वाणी के भी परे हैं, अपने सुन्दर वक्ष से उसे लगा लिया, और कहा—
हे वीर ! तुम यहाँ से अपने प्राकृतिक निवास-स्थान (अर्थात्, किष्किन्धानगर) में जाओ, और अपने द्वारा करणीय कार्यों का ठीक-ठीक विचार कर, यथाविधि उन्हें पूरा करो। यों जिस राज्य-भार को तुमने अपने ऊपर लिया है, उसके लिए आवश्यक सब कार्य करो और युद्ध में मरे हुए वाली का जो प्रिय पुत्र है, उसके साथ उत्तम ऐश्वर्य के साथ चिर-काल तक जीते रहो।
सत्य से भरित, विवेकपूर्ण मन्त्रियों के साथ तथा दोष-रहित सदाचारी एवं पराक्रमी सेनापतियों के साथ पवित्र मैत्री का भाव रखो, और तुम स्वयं भी त्रुटिहीन कार्य करते हुए इस प्रकार रहो कि वे (मन्त्री तथा सेनापति) तुम्हारे अति निकट या अति दूर न रहकर तुम्हें देवता के समान मानकर व्यवहार करें।
संसार इतना विवेक-पूर्ण है कि यदि कहीं धूम दिखाई पड़े, तो यह अनुमान कर लेता है कि वहाँ जलती आग भी होगी। अतः, तुम्हें चाहिए कि तुम शास्त्रज्ञों के द्वारा कथित कूटनीति को भी अपनाओ। तुम हँसमुख रहो। मधुर वचन बोलो और दूसरों के स्वभाव को जानकर, इस प्रकार आचरण करते रहो कि उससे तुम्हारे प्रति वैर रखनेवालों का भी हित हो।
वह दोष-रहित महान् ऐश्वर्य, जिसे देखकर देवलोक भी मुग्ध होते हैं, तुमको प्राप्त हुआ है। तो उस सम्पत्ति के महत्त्व को ठीक-ठीक पहचानकर सदा सजग रहो। क्योंकि,
| ४७८ | कम्ब रामायण |
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तीनो लोकों के निवासी ऐसे होते हैं, जो मुनियो के प्रति भी घनी मित्रता रखते हैं, कुछ उनके वैरी होते हैं, तो कुछ तटस्थ स्वभाव रखते हैं।
उपर्युक्त तीनों प्रकार के स्वभाववालो मे से तुम किसी के प्रति अहित कार्य न करना। अपने कर्त्तव्य कार्य पूरा करना। यदि कोई तुम्हारी निंदा करे, तो भी उसके प्रति निंदा-रहित मधुर वचन कहना। दूसरों के धन का अपहरण करने का लोभ न रखना। ये सब धर्म किसी व्यक्ति का, उसके बन्धु-परिवार-सहित, उद्धार करनेवाले होते हैं। अतः, तुम इसी प्रकार के धर्म का आचरण करना।
हे पुष्ट कंधोंवाले! किसी को बलहीन जानकर उसे दुःख न देना। मैं (अपने बाल्यकाल में) इम धर्म-मार्ग की सीमा को पारकर गया था और शरीर से विकृत होकर भी बुद्धि से बढी हुई कुब्जी के कारण राज्यभ्रष्ट हो गया¹ और कठोर दुःख-सागर मे डूबा।
यह निश्चित जानो कि स्त्रियो के कारण पुरुषो को मृत्यु प्राप्त होती है। वाली का जीवन ही इसका प्रमाण है और उन्ही स्त्रियों के कारण दुःख और अपवाद भी उत्पन्न होते हैं। यह तुम मेरे जीवन से जान सकते हो। इस विषय के ज्ञान से बढकर अन्य हित-कारी शिक्षा क्या हो सकती है?
अपनी प्रजा की इस प्रकार रक्षा करना कि वे यह कहे कि, हमारे राजा राजा नहीं हैं, किन्तु हमारा लालन-पालन करनेवाली माता हैं। ऐसा आचरण करते हुए भी यदि कोई व्यक्ति तुम्हारा अहित करे, तो उसे धर्म से स्खलित न होते हुए दड देना।
यथार्थ का विचार करें तो (विदित होगा कि) जन्म और मृत्यु सर्वदा, अपने-अपने कार्यों के परिणामस्वरूप ही होती है। कमलभव ब्रह्मा ही क्यो न हो, धर्म से स्खलित होने पर विनाश को प्राप्त होता है। धर्म का अंत जीवन का अत है—यह बडे लोगो का कथन है, अब अन्यों के बारे में क्या कहा जाय?
परस्पर के आघात से उन्माद उत्पन्न करनेवाले मल्लयुद्ध मे कुशल वीर! सपन्नता और निर्धनता—दोनो जीवो के पुण्य और पाप के फलो के अतिरिक्त और भी कुछ हैं, इसे अनुपम शास्त्रो मे निपुण विद्वान् भी नही जानते (अर्थात्, प्राणियो के पाप-पुण्य के फलस्वरूप ही निर्धनता और सपन्नता होती है)। अतः, पुण्य को छोड़कर क्या पाप को ग्रहण करना कभी उचित हो सकता है?
यही राजाओ के योग्य कर्तव्य है। विधि के अनुसार तुम राज्य करो और समीप आई हुई वर्षा ऋतु के व्यतीत होने के पश्चात् अपनी समुद्र-सदृश विशाल सेना को लेकर मेरे पास आओ। अब तुम जाओ—यों उस सुन्दर (राम) ने कहा। तब सुग्रीव ने कहा—
हे उदार! वृक्षो तथा जलाशयो से भरा हुआ (किष्किन्धा के) पर्वत वानरो का निवास है, केवल यही तो इसमें दोष है। अन्यथा यह स्थान सभा-मडप से विभूषित
१. इस पद्य में उस घटना की ओर सकेत है कि रामचन्द्र बचपन में अपने धनुष से मथरा के पृष्ठड को लक्ष्य करके मिट्टी की गोली मारते थे, जिससे मथरा मन-ही-मन चिढ़ती थी। इसी का बदला लेने के लिए मथरा ने ऐसा उपाय किया, जिससे रामचन्द्र को राज्य-भ्रष्ट होकर वन जाना पड़ा।—अनु०
किष्किन्धाकाण्ड ४७६
स्वर्ग से भी अधिक मनोहर हैं। अतः, तुम कुछ दिन हमारे यहाँ आकर ठहरो, जिससे हम तुम्हारी करुणापूर्ण आज्ञा का पालन कर सकें।
हे अरिंदम ! तुम्हारी शरण मे आकर हम तुम्हारी करुणा के पात्र बने हैं। तुमसे वियुक्त होकर जो ऐश्वर्य्य हम पायेगे, वह दरिद्रता से भी अधिक गर्हित होगा। अतः, जबतक तुम्हारी देवी का अन्वेषण करने का समय न आवे, तबतक तुम हमारे साथ (नगर मे) आकर ठहरने की कृपा करो--यो कहकर सुग्रीव ( राम के ) चरणो पर गिर पड़ा।
यह वचन सुनकर महाभाग ने मधुर मदहास करते हुए कहा--राजाओ के निवास-योग्य नगर, मेरे जैसे व्रतधारियो के लिए योग्य नही है और यदि मै वहाँ आऊँ, तो मेरी सेवा में ही तुम्हारा सारा समय लग जायगा। तुम, विचार कर किये जाने योग्य शासन-कार्य से, स्खलित हो जाओगे।
हे चिरजीव ! मैने यह प्रण किया है कि चौदह वर्ष वन में रहूँगा। अतः, (इस अवधि मे) मै राजाओ के निवास मे नही ठहर सकूँगा। हे दृढ तथा सुन्दर कधोवाले ! वीणा-नाद-सदृश स्वरवाली अपनी देवी के बिना क्या मै सुख भोग सकूँगा ? यह तुमने कदाचित् सोचा नही।
हे तात ! यह अपवाद क्या त्रिभुवनो के विनाश होने पर भी मिट सकेगा कि, राक्षस के द्वारा अपनी पत्नी के बंदी बनाकर रखे जाने पर भी राम, स्वय, अपने प्यारे मित्रो महित, अपार सुखो का भोग करता रहा।
जिन लोगो ने गृहस्थाश्रम का त्याग नही किया है, वैसे लोगो के लिए योग्य धर्म को मैने पूरा नही किया। युद्ध मे धनुष लेकर किये जानेवाले कर्त्तव्य को भी मैने पूर्ण नही किया। यो व्यर्थ जीवन बितानेवाले मुझ-जैसे के लिए सब ( सुग्रीव के साथ नगर मे रहना इत्यादि ) महत्त्वहीन क्षुद्र कार्य हैं। उत्तम गृहस्थ-धर्म को छोड़कर, वानप्रस्थ व्रत का आचरण करके मै अपने पापो का परिहार करूँगा। --यो राम ने कहा।
फिर कहने के लिए सुकर, किंतु करने के लिए दुष्कर सच्चारित्र्य में स्थिर रहने-वाले ( राम ) ने आगे कहा--हे वीर ! शामन के सब कार्यों को यथाविधि पूर्ण करके चार माम व्यतीत होने पर, उत्तुग तरगो से पूर्ण समुद्र-सदृश अपनी सेना को साथ लेकर मेरे निकट आओ। यही तुमसे मेरी प्रार्थना है।
वानरो का नेता इसके विरुद्ध कुछ नही कह सका। यह सोचकर कि गगनोन्नत ( गंभीर ) आकारवाले तथा तपस्वी वेषधारी ( राम ) के मन के अनुसार करना ही दोष-मुक्त बनने का उपाय है, अपने विशाल नयनो से अश्रु बहाता हुआ दडवत् किया और अकथनीय दुःख को मन में भरकर वहाँ से चला।
वाली-पुत्र ( अगद ) गम के चरण-कमलो मे प्रणत हुआ। उसे सकरुण देखकर नीले मेघ-जैसे उन महान् ने कहा--तुम शीलवान् हो। इम ( सुग्रीव ) को अपने पिता का भाई जानकर उसकी आज्ञा मे स्थिर रहो।
इम प्रकार के वचन कहकर सुग्रीव के साथ उसको भेज दिया। तब तुरत ही यशस्वी तथा गुणवान् अगद, उनके उत्तम चरणो को नमस्कार करके विदा हुआ। फिर.
| ४८० | कंब रामायण |
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प्रभु ने मारुति को देखकर कहा—हे सुन्दर वीर ! तुम भी उस राजा (सुग्रीव) के शासन के योग्य कार्य अपने विवेक से पूरा करते रहो ।
प्रेम से परिपूर्ण तथा असत्य-रहित मनवाले हनुमान् ने यह कहकर कि, यह दास यहीं रहकर (आपकी) आज्ञा के अनुसार योग्य सेवा करता रहेगा, उनके पदयुगल पर गिर पड़ा । तब सत्य में दृढ रहनेवाले प्रभु ने कहा—
एक प्रतापी राजा के द्वारा शासित अपार ऐश्वर्य से युक्त राज्य को जब दूसरा कोई वीर बलात् हस्तगत कर लेता है, तब उससे सदा भलाई ही हो, ऐसी बात नहीं। किन्तु, उससे कभी बुराई भी उत्पन्न हो सकती है। अतः, हे तात ! वैसा राज्य तुम-जैसे बड़े दायित्व का वहन कर सकनेवाले विवेकी पुरुष से ही स्थिर रह सकता है ।
(गुणों से) परिपूर्ण उस (सुग्रीव) के राज्य को स्थिर बनाकर, उसके पश्चात् मेरे कार्य को पूरा कर सकनेवाला (पुरुष) तुमसे बढ़कर और कौन है ? अतः, तुम मेरी इच्छा के अनुसार, साकार धर्म-जैसे उसके पास जाओ ।
चक्रधारी के ये वचन कहने पर मारुति ने नमस्कार करके कहा—हे प्रभु ! आप विजयी हों ! यदि आपकी यही आज्ञा है, तो यह दास वैसा ही करेगा । और, वहाँ से चला गया । पुरातन सृष्टि के नायक (राम) भी मुखपट्टधारी बड़े हाथी के सदृश अपने भाई के साथ एक ऊँचे पर्वत पर चले गये ।
आर्य (राम) की आज्ञा से सुग्रीव विशाल किष्किन्धा में जा पहुँचा और महिमा-वान् मन्त्रियों तथा बंधुजनों से युक्त होकर तारा को प्रणाम किया और उसको अपनी माता तथा अपने अग्रज के उपदेशों को ही अपना पिता मानकर, उत्तम रीति से शासन करता रहा ।
वह अपार ऐश्वर्य को प्राप्त कर, आनन्द से शासन करता रहा । अन्य वानर उसके अनुकूल आचरण करते रहे। उसका शासन-चक्र दिगन्तों में व्याप्त हुआ । अपार पराक्रम-युक्त अंगद को उसने राज्य का युवराज-पद दिया ।
उदार (राम), वहाँ से चलकर मतंग महर्षि के आवासभूत गगनस्पर्शी (ऋष्यमूक) पर्वत पर जाकर ठहरे, जहाँ उनके उस भाई ने, जिसके मन की सच्ची भक्ति को भर-भरकर लिया जा सकता है, प्रेम से पर्णशाला बनाई थी । यों वे विश्राम करते रहे । (१-५४)
अध्याय ६
वर्षाकाल पटल
सूर्य, महिमा-भरी उत्तर दिशा से (दक्षिण दिशा की ओर) चल पड़ा, मानों चित्रप्रतिमा-समान उज्ज्वल तथा लावण्ययुक्त (सीता) देवी का अन्वेषण करने के लिए देवाधिप (राम) के द्वारा पहले भेजा गया दूत हो ।
किष्किन्धाकाण्ड ४८१
सजल मेघ इस प्रकार शोभायमान हो रहे थे, जिस प्रकार अनेक फनवाले सूर्यराज के द्वारा धारण की गई पृथ्वी-रूपी दीपक मे शब्दायमान समुद्र रूपी तैल के मध्य मेरुपर्वत-रूपी बत्ती की सूर्य-रूपी ज्वाला से उत्पन्न अञ्जन हो ।
घने वादलो के छा जाने से अन्धकार-भरा आकाश का रग ऐसा था, जैसे समुद्र से उत्पन्न अति भयंकर हलाहल विष को पीनेवाले ललाट-नेत्र (शिव) का कंठ हो । उससे सूर्य की किरणें भी तापहीन हो शीतल हो गईं ।
नील आकाश, विष के समान, शीतल तथा विशाल सागर के समान, तरुणियों के अञ्जन-लगे नयनो के समान, (उनके) बिखरे केश-पाशों के समान, मायावी राक्षसो के शरीरो के समान, (उनके) पापकर्मों के समान और (उनके) मन के समान ही कालिमा-मय हो गया ।
वे मेघ, जिन्होने अनेक दिनों से शीतल समुद्र के जल को अपनी जिह्वा से अघाकर पिया था और जिनमें बिजलियाँ चमक रही थी, ऐसे लगते थे, जैसे करवालधारी वीरो के युद्ध में करवालों के आघात से घायल होकर मदजलस्रावी गजराज पड़े हों ।
उदर में जल से भरी हुई काली घनी घटाएँ बडे-बडे काले हाथियों की पंक्तियों के समान थीं और उनके उमड़ने से ऐसा घोर शब्द होता था, मानो तरंग-समान काले समुद्र का विशाल जल ही अनन्त आकाश में छा गया हो ।
कौंधनेवाली बिजलियाँ, इन्द्र आदि देवताओ के चमकते हुए आभरणो की जैसी थी, पर्वतों में फैलकर सब वस्तुओं को जलानेवाली अग्नि के समान थी तथा अनिन्दनीय दिशाओं की हंसी की जैसी थी ।
वर्षाकालिक काली घन-घटा एक भट्ठी की समता करती थी, जहाँ दिशा-रूपी लुहार, सब वस्तुओं से अधिक कालिमापूर्ण आकाश-रूपी कोयले की राशि में उत्तर दिशा की अतिवेगवान् पवन-रूपी बड़ी भाथी लगाकर तीक्ष्ण अग्नि-ज्वालाओं को भड़का रहा था ।
आकाश में तथा दिशाओं में बिजलियाँ इस प्रकार कौंध उठीं, जैसे अपने प्रियतम के वियोग में तरुणियाँ तड़प उठी हों, धरती के गर्भ में स्थित सर्प जलकर तड़प उठे हो, या सूर्य-किरणों को काट-काटकर दिशाओं में फेंक दिया गया हो, अथवा वज्र की लपलपाती जिह्वाएँ तड़प उठी हों ।
वे बिजलियाँ ऐसी थीं, जैसे मणिकिरीटधारी मायावी विद्याधरों के द्वारा कोश से निकालकर घुमाये जानेवाले (शत्रुओं के) रक्त-सिंचित करवाल हों, अथवा दिक्पालों के साथ यात्रा करनेवाले दिग्गजों के मुखपट्ट हों, जो हिल-डुलकर चमक रहे हों ।
वे बिजलियाँ यों चमक उठी, मानों अष्ट दिशाओ में धरती को धारण करनेवाले अष्ट महानागों की जिह्वाएँ व्यास हो रही हों। उस समय झंझावात यों वह चला, मानो विष्णु की कांति के समान काली बनी हुई घटाएँ (अपने गर्भ के भार से) निःश्वास भर रही हो ।
वह वर्षाकालिक पवन ऊँच-नीच का भेद किये विना पर्वतों, वृक्षों तथा अन्य सब प्रदेशों मे वारनारियों के उस चञ्चल मन के समान फैल गया, जो (मन) केवल धन की कामना करके धन देनेवाले किसी भी व्यक्ति के समीप जा पहुँचता है ।
४८२ | कंब रामायण
उत्तर दिशा का वात, अपने प्रियतमो के विरह में पीडित रहनेवाली तरुणियो के तप्त स्तन-तटो को और भी तपाता हुआ वह चला और उस प्रकार बढ चला, मानो कोई पिशाच हो, जो ( उन स्तनो को ) पुष्ट मांसखंड समझकर उनको काटकर खा डालने के लिए चल पड़ा हो।
बड़े शब्द के साथ धूलि ऊपर उठकर आकाश को रूँधने लगी, बिजलियाँ तीक्ष्ण तलवारो के समान घूम-घूमकर चमकने लगी। मेघ पुष्प-मालाओ से अलंकृत बडे नगाडों के जैसे गरजने लगे। आकाश एक बड़े युद्ध-रंग के समान दृष्टिगत होने लगा।
मधुर मदहास करनेवाली जानकी से बिछुडे हुए रामचन्द्र पर मन्मथ पुष्प-बाण बरसा रहा हो—उसी प्रकार बिजलियो से पूर्ण मेघ-मण्डल उस स्वर्णमय पर्वत पर जल-धाराएँ बरसाने लगा।
जल-धाराएँ मेघों के मध्य-स्थित धनुष से प्रयुक्त शरो के समान वेग से पहाड़ों पर आकर गिरती थी, मेघों से उत्पन्न रक्तवर्ण वज्राग्नि के कण ऐसे गिरे, जैसे रात्रि के समय अत्युज्ज्वल रत्न-कण बरस रहे हों।
योद्धा लोग शत्रुओं के बडे हाथियों पर चमकते हुए बरछे प्रयुक्त कर रहे हो—ऐसे ही मेघ पर्वत पर जल-धाराएँ बरसा रहे थे। उन अवार्य जल-धाराओ के प्रहार से शिलाखड टूट-टूटकर ऐसे लुढक रहे थे, जैसे लाल बिंदियोंवाले उत्तम लक्षण-सम्पन्न गज आहत होकर लुढक जाते हो।
मेघ, मीनकेतन (मन्मथ) था, इन्द्र-धनुष ईख का कमान था, बरसती जल-धाराएँ पुष्प-शर थी, पर्वत की दीर्घ घाटियाँ विरहीजन थी, उन पर्वत-शिलाओ पर जल-धाराएँ यो गिरती थी, जैसे मांसल शरीर में शर चुभ जाते हों।
देवता, यह कहकर कि पवित्र मूर्त्ति ( श्रीराम ) तथा कपिगण दोनो मिलकर अब हमारे शत्रुओं ( रावणादि राक्षसों ) को शीघ्र ही मिटा देंगे गर्जन कर उठे हों—यों मेघ गरज उठे, जल-विन्दु पुष्प-वर्षा के समान बरस पडे।
सुन्दर धनुष धारण करनेवाला राक्षस रावण, जब करवाल लिये हुए ( सीता को ) उठाकर आकाश-मार्ग से त्वरित गति से ले जा रहा था, तब उस नारी-रत्न, आभरण-भूषित देवी (सीता) के नयन जिस प्रकार अश्रुवर्षा करने लगे थे, उसी प्रकार मेघ बरस पडे।
शिर पर चन्द्र को धारण करनेवाले भगवान् ( शिव ) आकाश-मार्ग में उडनेवाले तीनो पुरों को दग्ध करने के लिए अग्निमुखी शर प्रयुक्त कर रहे हों—ऐसी लगती थी चमकती हुई बिजलियाँ, वे सान पर रगड़कर पैनाये गये और चमकते हुए बरछों के समान ही विरह-तप्त पुरुषों के मन को दग्ध कर रही थी, जिससे विरहीजन तडप उठे।
वे वर्षाकालिक संपत्ति का अर्जन करने के लिए दूर देशों मे गये हुए जनों के वियोग मे निष्प्राण बनी हुई विरहिणियों को उनके प्रियतम-रूपी प्राणों को चक्रवाले रथों-पर शीघ्र ला देने थे, अत मूर्च्छा उत्पन्न करनेवाली विरह-व्याधि-रूपी सर्प के विनाश के लिए वे ( मेघ ) गरुड के समान थे ।¹
¹ वर्षाऋतु में प्रवास में गये हुए प्रेमी अपने घर वापस आ जाते हैं, अतः मेघ विरहिणियों का, वियोग में दुःख को दूर करनेवाला, साथी है।— अनु०
किष्किन्धाकाण्ड ४८३
बड़े मेघ, बारी-बारी से गरज रहे थे. और जल बरसाते हुए एक-दूसरे के निकट आकर टकराते थे, जैसे बड़े-बड़े हाथी गरजते हुए और मदजल को बहाते हुए क्रोध के साथ दौड़कर एक दूसरे से टकरा जाते हों।
हवाएँ बारी-बारी विभिन्न दिशाओं से बहती थी। मेघ अपने चंचल तथा छोटे जल-विन्दुओं को शरो की बौछार के समान अपने लक्ष्य पर प्रयुक्त करते थे। वह दृश्य ऐसा था, जैसे एक दिशा दूसरी दिशा से युद्ध कर रही हो।
अपनी प्रियतमाओं को छोड़कर दूसरे राज्यों पर विजय प्राप्त करने के लिए गये हुए राजा लोग (वर्षा के आगमन पर) लौटकर आ गये हों और उनके आगमन से पहले निष्प्राण बनी हुई (उनकी पत्नियों की) देह में प्राण के लौट आने मे वे तरुणियाँ निःश्वास भर उठी हों—उसी प्रकार वृक्षों की सूखी शाखाएँ वर्षा के आगमन से पल्लवित होकर नव सौन्दर्य के साथ विकसितमुख-सी दिखाई पड़ती थी।
पाटलवृक्ष (पुष्पहीन हो) दरिद्रता प्रकट करते थे। दिनकर शीतल बन गया, श्वेतकुमुद समृद्ध बन गये। कुवलय-पुष्प निर्धन बन गये। मयूर सम्पत्ति पाये हुए व्यक्ति के समान नाच उठे। कोकिल वियुक्त प्रियतमों के जैसे शिथिल हो चुप हो रहे।
उन पर्वत-सानुओं में जहाँ विविध रंगवाले भ्रमर तथा तितलियाँ उत्तम रत्नो के समान विश्राम करती थी, मधु के भार से झुककर हिलनेवाले अर्द्ध-विकसित रक्त कांदल-पुष्प ऐसा दृश्य उपस्थित करते थे, मानों विशाल धरती-रूपी तरुणी वर्षाकाल के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर, यह विचार कर कि वसंत को भी इस वर्षाकाल ने जीत लिया है, अपने हाथ हिलाती बसन्त ऋतु का तिरस्कार कर रही हो।
करवाल-समान तीक्ष्ण दंतोंवाले सर्प, दीर्घनाल, श्वेतकुमुद की लताओ से जोडन (सर्पों) के फन के जैसे ही पुष्पों को शिर पर धारण किये हुए थे, प्रेम से लिपट जाते थे और उनसे हटते नही थे। वे श्वेतकुमुद भी उन काममत्त सर्पों के समान ही होकर उनसे उलझे पड़े रहते थे।
इन्द्रगोप इस प्रकार फैले थे कि धरती पर तिल रखने का भी स्थान नही था, वे चिरकाल के प्रवास के उपरात लौटे हुए अपने प्रियतमों से मिलनेवाली अगरु तथा पुष्प-वासित कुतलोंवाली तरुणियों के द्वारा वार-बार थूकी हुई पान की पीक के समान ही बिखरे हुए थे।
उस गगनचुंबी मेरुपर्वत से, जिसपर मधुर जम्बूफलों से भरे हुए वृक्ष होते हैं, स्वर्ण को बहाकर ले चलनेवाली (जम्बू-नामक) नदी जिस प्रकार बहती है, उसी प्रकार जलधाराएँ कर्णिकार, बेंगे आदि पुष्पों को बहाती हुई उस पर्वत से बह रही थी।
सुन्दर तथा दीर्घनाल रक्तकुमुद तथा कर्णिकार मनोहर इन्द्रगोपों से भरे हुए ऐसे लगते थे, जैसे पृथ्वी देवी मधुरगान करनेवाले भ्रमरो को अपने विकसित करों को उठा-कर स्वर्ण तथा रत्न प्रदान कर रही हो।
धैवत स्वर मे गानेवाले भ्रमर 'ताल' के समान थे। बिजली, गर्जन तथा वर्षा से युक्त मेघ चर्म से आवृत 'मर्दल' के समान थे। मयूर, कंकण-धारिणी नायिकाओं के समान थे।
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रक्तकुमुद नाट्य-रंग पर रखे हुए दीपो की पंक्तियों के समान थे। कोमल 'करुविल' पुष्प दर्शको के नेत्रों के समान थे।
भ्रमर और भ्रमरी के वेग से उड़कर आने से उत्पन्न होनेवाली ध्वनि, उनके टकराने से उत्पन्न होनेवाली ध्वनि—दोनों ध्वनियाँ—देवागनाओ के नृत्य की ध्वनि की समता करती थी। 'कूदाल' के विशाल पुष्प ऐसे विकसित थे, जैसे उन (देवागनाओ) के अमृत-समान आर्यभाषा (सस्कृत) के गीतों के गायन के उपयुक्त बडे भाल हों।
पुन्नाग के वनों से बहनेवाली नदियाँ अपने पुत्रो के लिए पुष्ट पर्वत-रूपी स्तनों से स्रवित धरतीमाता की दुग्ध-धाराओं के समान थी। कर्णिकार वृक्ष ऐसे थे, मानों धन की इच्छा से आकर याचना करनेवालो को सदा दान देने के लिए अपनी शाखाओ में स्वर्ण-खंडों को लटकाये हुए खड़े हों।
पुष्प-भरे वनों में सर्वत्र मधुर गान करनेवाला विविध चित्तियों से युक्त भ्रमर आदि कीडे भरे हुए थे, जो दर्शकों को वड़ा आनन्द देते थे, हरिण अपने मार्ग में पड़नेवाले वृक्षों से रगड़ खाते हुए और उस कारण से (चन्दन, अगरु आदि) विविध सुगंधों से युक्त होकर आते थे और हरिणियाँ उन्हें (उनकी गंध के कारण) कोई दूसरा मृग समझकर उनसे रूठ जाती थी।
अपने प्रियतम के रथारूढ होकर प्रवास में चले जाने पर जिस प्रकार विरहिणी तरुणियों के भाले-सदृश नयन आनन्दहीन हो मुकुलित हो जाते हैं, उसी प्रकार कुवलय-पुष्प बद हो गये। मन्मथ-सदृश अपने प्रियतमों के आगमन पर जिस प्रकार उमंग से भरी उन तरुणियों का किंचित् दत-प्रकाशन से युक्त मदहास छिटक पडता है, उसी प्रकार कुदललताएँ पुष्पित हो उठी।
पर्वत से प्रवहमाण जलधाराएँ स्वर्ण को बहुलता से दोनों ओर बिखेरने लगीं, मानों आनन्द-नृत्य करनेवाले मयूरों को देखकर उन्हें नटवर्ग समझकर राजा लोग उन्हें भूरि-भूरि पुरस्कार दे रहे हों। कमललताएँ जल-मध्य इस प्रकार उठी हुई थी, मानों गगनपथ में आनेवाले मेघो को देखकर उन्हें अतिथि समझकर आनन्दित हुई (गृहस्थ-धर्म मे निरत) तरुणियों के वदन हों।
कामशास्त्र मे निपुण विटों के समान ही भ्रमर सद्योविकसित मधुपूर्ण पुष्पों का आलिंगन करते हुए उनके मधु का संचय करने लगे। वे ऐसे थे, मानों कविगण भरतशास्त्र के अनुसार नाटक का निर्माण करने के उद्देश्य से सफल अर्थ-व्यवस्था के अनुकूल रस-सञ्चय कर रहे हों।
हिरण अत्यन्त आनन्दित हो उठे, मानों यह सोचकर ही वे ऐसे प्रसन्न हुए हों कि हमे अपनी चितवन से परास्त करनेवाली सूक्ष्म कटि-युक्त अति सुन्दरी (सीता) को एक राक्षस ने हमारा ही रूप धारण कर दुःसह दुःख दिया है, इस कारण से उत्पन्न अपने आनन्द को हम शब्दों में व्यक्त नही कर पाते।
हस छोटी नदियों मे गोते लगाकर इस प्रकार आनन्दित होने लगे. मानों
किष्किन्धाकाण्ड ४८५
दीर्घकाल के विरह से पीडित होने के कारण अब अति प्रेम के साथ अपनी प्रियतमाओ से मिलकर भरपूर आनन्द उठा रहे हो ।
अपार सागर से जल भरकर चलनेवाले काले मेघो के निकट ही पक्ति बाँधकर उड़नेवाले अति धवल बगुलों का झुण्ड कृष्ण नामक काले वर्णवाले भगवान् के वक्ष पर शोभायमान मुक्ताहार के सदृश लगता था ।
सारस पक्षी, जो पक्ति बाँधकर एक-दूसरे से सटकर वर्षाकालिक काले मेघ के निकट हो गगन में उड़ रहे थे, वे दिव्य देवों के द्वारा लक्ष्मी के नायक के रूप में वर्णित अनुपम भगवान् के वक्ष पर शोभायमान उत्तरीय वस्त्र की समता करते थे ।
अधिक ताप उत्पन्न करनेवाले धूप-रूपी राजा के हट जाने तथा उत्तम सद्गुणो से भरे वर्षाकाल-रूपी राजा के आगमन के कारण विशाल पृथ्वी देवी अपने महिमामय मन में आनन्दित और शरीर से रोमाञ्चित हो उठी हो—हरियाली इस प्रकार का दृश्य उपस्थित कर रही थी ।
मयूर ऐसे लगते थे, मानो मधुवर्षी कमलपुष्प में उत्पन्न ब्रह्मा अति ज्ञानवान्, (देव) तत्त्व-ज्ञान के नायक (अर्थात्, वेद आदि के द्वारा प्रशंसित विष्णु के अवतार श्रीरामचन्द्र) के दुःख को देखकर उनका उपकार करने के उद्देश्य से कानन में सर्वत्र अपनी आँखें फैलाये हुए देवी सीता का अन्वेषण कर रहे हों ।
कमलपुष्प ऐसे शोभित हो रहे थे, जैसे तरुणियो के वे चरण हो, जिनमें (शत्रुओ के रक्त से) रक्तवर्ण हुए भालों तथा दृढ धनुषों को धारण करनेवाले वीर पुरुषों के केशों को भी नया रंग देनेवाले महावर का रस लगा हुआ हो । (भाव यह है कि तरुणियों के चरण महावर से रंजित थे । प्रणय-कलह के समय वे तरुणियां अपने प्रियतमों के सिर पर पदाघात करती, तो उससे उन पुरुषों के काले केश भी लाल रंगवाले बन जाते थे ।)
कोकिल मौन हो रहे, मानो उनके प्रति राघव के यह आदेश देने पर कि तुम अपनी जैसी ही बोलीवाली देवी को ढूँढ़कर लाओ, पृथ्वी में सर्वत्र घूम-घूमकर (देवी सीता को) बुलाते रहे हों और अब थककर चुप हो गये हों ।
वर्षा-सिंचित भूमि पर उगी हुई हरी घास को अघाकर चरनेवाली गायें यत्र-तत्र उगे हुए ‘मालान’ नामक छोटे पौधों को अपने खुरों से उखाड़ देती थी । वे पौधे, जिनमे सफेद पुष्प लगे थे, बिखरे हुए गाढ़े दही का दृश्य उपस्थित करते थे । ‘पिडव’ नामक पौधे के पुष्प, मधु-सदृश मीठी बोलीवाली कुड्मल-सदृश स्तनोंवाली ग्वालिनों के घटो में से छलकनेवाले दूध के झाग का दृश्य उपस्थित करती थी ।
‘वैंगै’ नामक वृक्ष, भीलनियों के केशों के समान सुरभित थे । पुन्नाग-वृक्ष मछुआ-त्रियों के केशों के समान गध से युक्त थे, जिनसे शीघ्रगामी भ्रमरकुल आकृष्ट हो रहा था । उत्पल-पुष्प अन्त्यज जाति की स्त्रियों के केशों के समान गध से युक्त थे । नवोविकसित कुंदलताएँ ग्वालिनों के केश के समान महक रही थीं ।
श्रीरामचन्द्र ने देवी सीता के वदन को नहीं, किन्तु मरणदायक मन्मथ को असंख्य सहस्र पुष्पबाण प्रदान करनेवाले वर्षाकाल को ही देखा । वे दुःख-सागर का पार नहीं देख पा