कर्मयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Karma Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द / पं. बदरीदत्त शर्मा द्वारा
६८ कर्मयोग
को न झुका दिया हो। बुद्ध ने त्याग और सदाचार के सिवा ईश्वर के सम्बन्ध में कोई भी शिक्षा नहीं दी, परन्तु फिर भी संसार में उसका कितना मान है। कट्टर मनुष्य इस बात को नहीं देखता कि जिसके साथ उसका मतभेद है, उसका भी उद्देश या अन्तिम लक्ष्य वही है, जो कि इसका अपना है। ईश्वर पर सच्चा विश्वास रखनेवाला और धर्म का आचरण करनेवाला--ये दोनों एक ही स्थान पर पहुँचते हैं। ईश्वर-भक्त जो कुछ करता है, वह सब ईश्वर के अर्पण कर देता है। धर्मात्मा भी अपने लिए कुछ नहीं करता, किन्तु दूसरों के लिए करता है। जिस प्रकार ज्ञानी ज्ञान से ममता को दूर कर देता है, इसी प्रकार त्यागी भी त्याग से ममता को अपने पास नहीं आने देता। यही वह उच्च पद है कि जहाँ आकर कर्म, भक्ति और ज्ञान ये तीनों एक हो जाते हैं। प्राचीन समय के आध्यात्मिक उपदेष्टा कहा करते थे कि संसार ईश्वर नहीं है अर्थात् ईश्वर और वस्तु है और संसार और वस्तु है और यह भेद अनुचित नहीं है। संसार से तात्पर्य स्वार्थ है और ईश्वर में स्वार्थ या काम का लेश नहीं। जो संसार में लिप्त होते हैं, वे ही स्वार्थी हैं; जो ईश्वर-परायण होते हैं, वे संसार में रहते हुए भी निष्काम हो सकते हैं। सम्भव है कोई मनुष्य राजसिंहासन पर बैठा हुआ और स्वर्ण-जटित मन्दिरों में रहता हुआ भी निःस्वार्थ जीवन व्यतीत करे, उसका मन ईश्वर में लगा है। दूसरा मनुष्य झोपड़े में रहता हुआ और चिथड़े पहनता हुआ कामुक बना रहे तो यही संसारी है।
अब हम फिर अपने प्रकृत विषय पर आते हैं। कोई शुभ कर्म ऐसा नहीं है, जिसमें अशुभ का अंश न हो और न कोई अशुभ कर्म
पाँचवाँ अध्याय ६८
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ऐसा है, जिसमें कुछ न कुछ शुभ का अंश मिश्रित न हो। जब यह दशा है तो कहिए कोई क्या करे ? संसार में ऐसे मनुष्य वा समुदाय भी हुए हैं, जिन्होंने दूसरों की हिंसा से बचने के लिए अपनी हिंसा करना उचित समझा क्योंकि उनकी समझ में जीवित रहने से किसी न किसी प्राणी के कष्ट में पड़ने या किसी के प्राणघात होने का भय रहता है। उनकी दृष्टि में मर जाना ही पापों से बचना है। जैनियों का इस सिद्धान्त पर अधिक विश्वास है। देखने में तो यह सिद्धान्त अच्छा मालूम होता है परन्तु इसकी मीमांसा केवल भगवद्गीता करती है। गीता कहती है "कर्म किये जाओ, पर बेलाग बने रहो।" जो कर्म बुरे या भले हम अपने लिए करते हैं उनका फल बुरा या भला हमको ही मिलता है। किन्तु जो कर्म हम अपने लिए नहीं करते उनका फल भी हमारे लिए नहीं होता। यदि कोई मनुष्य यह जानता हुआ कि "मैं अपने लिए काम नहीं कर रहा हूँ" हज़ारों मनुष्यों को मार डाले या आप ही मर जावे तो वह न तो मारनेवाला है और न मरनेवाला। इसलिए कर्मयोग की यह शिक्षा है कि "संसार को न छोड़ो, उसमें रह कर सदा कर्म करते रहो, पर यह बात स्मरण रक्खो कि तुम संसार नहीं हो और न यह संसार तुम्हारे लिए है। किन्तु संसार मैं तुम हो और संसार के लिए तुम हो। अपने आप को बिलकुल मिटा दो, सारे विश्व को अपना ही रूप समझो।" मूर्ख माता-पिता अपने पुत्रों को यह प्रार्थना सिखाते हैं—"हे ईश्वर ! तूने मेरे लिए चन्द्र, सूर्य बनाये।" मानो ईश्वर के लिए सिवा इन बच्चों के खिलौने बनाने के और काम ही न था। ऐसी तुच्छ बातें अपनी सन्तान को कभी
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न सिखाओ। और भी मनुष्य हैं जो दूसरे प्रकार की मूर्खता करते हैं। वे कहते हैं कि ये सब जीव-जन्तु हमारे लिए बनाये गये हैं, इनको मारो और खाओ। यह संसार केवल मनुष्य का भोगायतन है। ये सब स्वार्थी और लोलुप मनुष्यों के क्षुद्र और नीच भाव हैं। सिंह कह सकता है कि "मनुष्य मेरे लिए बनाये गये हैं।" और वह मूर्ख मनुष्यों के समान प्रार्थना कर सकता है,—"हे ईश्वर ! मनुष्यों को मेरे पास भेज दे कि मैं इनको खाकर अपनी भूख बुझाऊँ। तैने इनको मेरे लिए बनाया है और ये मुझसे भागते हैं।" यदि संसार हमारे लिए बना है तो हम भी संसार के लिए बने हैं। यह कहना कि संसार हमारे भोग-विलास के लिए बनाया गया है, बिलकुल असत्य है। यदि यह सत्य होता तो हम इन भोग-विलासों को छोड़ कर संसार से मुँह न मोड़ते। संसार में हम नहीं रहते, पर भोग-विलास हमारे पीछे भी रहते हैं। इससे तो यह सिद्ध है कि हम भोगों को नहीं भोगते, किन्तु भोग हमें भोग लेते हैं। अतः संसार हमारे लिए नहीं, किन्तु हम संसार के लिए हैं❄
कर्म करने के लिए सब से पहली बात यह है कि हमारा उसमें राग ( लगाव ) न हो, केवल साक्षी और तटस्थ होकर कर्म किये जाओ। मेरे पूज्य और वृद्ध गुरु कहा करते थे—"अपने खास बच्चों
❄ इस सच्चाई को राजर्षि भर्तृ हरिजी ने अपने वैराग्य-शतक में किस उत्तमता से दिखलाया है:—"भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः। कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥" अर्थात् हमने भोग नहीं भोगे किन्तु भोगों ने हमको भोग लिया, हमने तप नहीं तपा, किन्तु तीन तापों में हम तप गये। समय नहीं गया, हम चल दिये। तृष्णा पुरानी नहीं हुई, हम बूढ़े हो गये।
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को तुम उसी दृष्टि से देखा करो, जिस दृष्टि से उनकी धात्री (दाया) उनको देखा करती है। दाया तुम्हारे पुत्र को गोद में लेकर खूब खिलावेगी और प्यार करेगी, परन्तु जहाँ तुमने उसको अलग किया, वह उसी समय अपना डेरा डंडा उठा कर चल देगी और उसको तुम्हारे घर से कुछ भी सम्बन्ध न रहेगा, सब कुछ भूल जायगी और लड़कों के वियोग से उसे कुछ भी दुःख न होगा। यदि तुम सोचो तो अपने ही लड़कों के साथ तुम्हारी भी यही दशा है। यदि ईश्वर पर तुम्हारा विश्वास है तो ये सारे पदार्थ जो तुमको प्राप्त हुए हैं, सब उसी के हैं। तुम्हारा इन पर कुछ भी अधिकार नहीं। न तुम किसी की सहायता करते हो और न किसी को तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है। जिसने यह जगत् बनाया है और जो इन सब पदार्थों का वास्तविक स्वामी है वही हमारी, तुम्हारी, सबकी सहायता कर रहा है। तुमको केवल दूसरों की सहायता करने का अधिकार सौंपा गया है और यह कैसा पवित्र अधिकार है। इससे हमको प्रसन्नता होती है और शिक्षा मिलती है। वह शिक्षा जो हमको और तुमको इस संसार में सीखनी है और जिस समय हमने उसको भली भाँति समझ लिया, फिर हम इस संसार में कभी दुःखी न होंगे। हम चाहे जिस समाज में रहें, जो काम करें, हमको कोई हानि न पहुँचा सकेगा। तुम्हारी स्त्री हो, पति हो, माता-पिता हो, पुत्र वा पुत्रियाँ हों, नौकर-चाकर हों, बड़े बड़े पद और कार्य्य-भार हों, यदि तुम इस सिद्धान्त पर काम करो अर्थात् संसार के होकर न रहों तो तुमको कभी क्लेश न होगा। तुमको बहुत से मित्रों का
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वियोग हुआ होगा। क्या वे फिर लौट कर संसार में आवेंगे? और क्या यह जीवन-मरण का चक्र कभी बन्द होगा? कभी नहीं। अतएव अपने मस्तिष्क से इस संस्कार को निकाल डालो कि संसार तुम्हारी किसी बात की अपेक्षा रखता है, या तुम किसी की सहायता कर सकते हो। यह अभिमान है, स्वार्थ है, जो तुम को बन्धन में जकड़ता है। जब तुम किसी को कुछ दान करो तो उससे प्रत्युपकार की आशा न करो। उसकी कृतघ्नता तुम्हें कुछ हानि न पहुँचायेगी। तुम ने उसको जो कुछ दिया है, वह उसका अधिकारी था। उसके कर्म ने तुम्हें देने के लिए बाध्य किया। तुम्हारे कर्म ने तुमको भारवाही बना रक्खा था, फिर तुमको क्यों दान का अभिमान हो। तुम उसके कोषाध्यक्ष बने थे, वह अपना रुपया तुम से ले गया। सोचो, समझो, इसमें अभिमान की बात क्या है? जहाँ तुम बेलाग बने, फिर न कोई तुम्हारे लिए अच्छा है, न बुरा। केवल स्वार्थ से ही भलाई, बुराई पैदा होती है। इस रहस्य का समझना ज़रा कठिन है, पर समय आवेगा, जब तुम इसको समझोगे। तब संसार को तुम्हारे ऊपर कठोरता करने का अवसर हाथ न आवेगा। मनुष्य का आत्मा स्वतन्त्र है, वह स्वार्थ और काम के वश में हो कर ही अपने को परतन्त्र बना लेता है। निष्काम और निःस्वार्थ होना ही उस परतन्त्रता पर विजय पाना है। तुम स्वयं संसार के दास बन कर दूसरों की परतन्त्रता स्वीकार करते हो। जब संसार के मान, अपमान, हर्ष, शोक और प्रिय, अप्रिय तुम पर अपना प्रभाव न डाल सकेंगे, तब तुम स्वाधीन बनोगे।
व्यास एक बड़ा ऋषि था। वह वेदान्त सूत्रों का बनाने वाला
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भी था। उसके पिता और पितामह ने बहुत कुछ यत्न किया कि वह ज्ञानी वा तत्वदर्शी बन जावे, पर सफलता नहीं हुई। किन्तु उसका पुत्र शुकदेव पूर्ण ज्ञानी तथा आत्मदर्शी हुआ। व्यास ने अपने पुत्र को ज्ञान सीखने के लिए राजा जनक के पास भेजा। जनक "विदेह" कहलाता था। 'विदेह' शब्द का अर्थ यह नहीं है कि जिसका देह न हो, किन्तु देह की ममता जिसको न हो उस को विदेह कहते हैं। वह एक राजा होने पर भी राज्य को क्या शरीर को भी अपना नहीं समझता था। शुकदेव बालरूपन में ही शिक्षा पाने के लिए उसके पास आया। राजा को मालूम हो गया कि व्यास-पुत्र उसके पास ज्ञान सीखने के लिए आ रहा है। इसलिए उसने पहले से ही कुछ प्रबन्ध कर रक्खा था। जब शुकदेव राजप्रासाद के द्वार पर पहुँचा तब द्वारपालों ने उसको बैठने के लिए जगह तो दे दी, पर किसी ने उसकी बात नहीं पूछी। तीन दिन, तीन रात तक वह वहीं बैठा रहा, किसी ने उससे कुछ न पूछा। तीन दिन के पश्चात् राजा के मंत्री उसके पास आये और बड़े आदर व सम्मान से उसको रत्नजटित घरों में ले गये। वहाँ सुगन्धित जल से स्नान कराया, उत्तम वस्त्र पहनाये और सब ऐश्वर्य के सामान उसके लिए उपस्थित कर दिये। आठ दिन तक इसी प्रकार उसकी परिचर्या की गई, परन्तु इन सब क्रियाओं का उसके मन पर कुछ भी प्रभाव न हुआ। न वह अपमान से क्रुद्ध हुआ था और न मान से प्रसन्न। दोनों दशाओं में वह निरीह निःस्पृह पाया गया। इसके पश्चात् वह राजा जनक के सामने लाया गया। राजा ने उसके हाथ में एक दूध का भरा हुआ पात्र दिया और
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कहा कि इस मंदिर की सात परिक्रमा करो, पर सावधान रहो कि दूध की एक बूँद न गिरने पावे। लड़के ने प्याला हाथ में लिया। यद्यपि वहाँ नृत्य-गान और अनेक भाँति के क्रीड़ा-कौतुक हो रहे थे, परन्तु लड़के का ध्यान अपने काम पर रहा। वह राजा के आज्ञानुसार सात बार परिक्रमा दे आया और एक बूँद भी प्याले में से न गिरी। जब वह अपना काम समाप्त करके राजा के पास पहुँचा तब राजा ने कहा,—जो कुछ शिक्षा तेरे पिता ने तुझको दी है, वह ठीक है। मैं भी केवल उसी का अनुवचन कर सकता हूँ; इसलिए तू घर जा, तू पूर्ण ज्ञानी है और तेरे हृदय में विवेक का दीपक जल रहा है।
शुकदेव अपने मन को यहाँ तक वश में किये हुए था कि किसी प्रकार के बाह्य दर्शन या प्रलोभन उसको अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकते थे। ऐसे मनुष्य को कोई बन्धन में नहीं डाल सकता। वह जहाँ भी रहे, जो कुछ भी करे, सब से निर्लेप है।
संसार के विषय में मनुष्यों के दो प्रकार के मत हैं। किन्हीं लोगों का मत है कि संसार बड़ा भयानक और दुःखमय है। दूसरे कहते हैं, संसार बड़ा रमणीय और सुख का स्थान है। जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियों को वश में नहीं किया, उनके लिए यह संसार वास्तव में भयानक है और जिन लोगों ने आत्म-संयम-रूप शस्त्र से इस दुर्जय मन को जीत लिया है, उनके लिए यह संसार एक विचित्र और सुन्दर अद्भुतालय है। जैसे अजायबखाने की वस्तुओं के बनने और बिगड़ने का दर्शक पर कुछ प्रभाव नहीं
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पड़ता, ऐसे ही इस संसार की वस्तुओं के बनने और बिगड़ने का उस मनुष्य पर, कि जिसने अपने मन को जीत लिया है, कुछ प्रभाव नहीं पड़ता। प्रत्येक वस्तु अपने अवसर और स्थान पर अच्छी और शोभित मालूम पड़ती है। जो लोग संसार को भयानक या नरक बतलाते हैं, जब वह मन को जीत कर आत्मशासन में प्रवेश करते हैं, तो यही संसार उनको स्वर्ग से भी अधिक सुखदायक मालूम पड़ता है। कर्मयोग बातों से नहीं प्राप्त होता, किन्तु अभ्यास से सिद्ध होता है। जब हम निष्काम होकर इसका आरम्भ करते हैं तब थोड़े ही दिनों में यह अपना फल दिखाता है और हम में त्याग और वैराग्य के संस्कार प्रबल होने लगते हैं जो अभिमान, स्वार्थ और ममत्व के संस्कारों को प्रथम मन्द और अन्त में जाकर निर्मूल कर देते हैं। तब यह संसार हमारे लिए शान्ति-धाम बन जाता है और चारों ओर हमको आनन्द ही आनन्द दीख पड़ता है। यह कर्मयोग का वास्तविक परिणाम है।
योग अनेक प्रकार के हैं, परन्तु उनमें परस्पर विरोध नहीं है, सबका अन्तिम उद्देश एक ही है। यदि हम विश्वास और अभ्यास से काम लें तो सब हमको एक ही अभीष्ट स्थान पर पहुँचाते हैं। सारी शक्ति अभ्यास में छिपी हुई है। पहले सुनो, फिर मनन करो, तत्पश्चात् कर्म करो; प्रत्येक प्रकार का योग यही शिक्षा देता है। पहले श्रवण, मनन और निदिध्यासन हैं, इन्हीं को ज्ञान का साधन भी कहते हैं। तत्पश्चात् साक्षात्कार है, इसी को ज्ञान का फल भी कहते हैं। प्रत्येक वस्तु का ज्ञाता और व्याख्याता तुम्हारा आत्मा है। यथार्थ में तुम अपने शिक्षक आप ही हो। बाह्य गुरु या उप-
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देष्टा तुम्हें केवल उपाय बतलाता है, जब तक तुम्हारा आन्तरिक उपदेशक आत्मा—जो तुम्हारे अन्तःकरण में विद्यमान है—उनको ग्रहण या आचरण न करेगा, तुम उनसे कुछ भी लाभ नहीं उठा सकते। यद्यपि तुम्हारा आत्मा तुमको प्रत्येक समय उपदेश करता रहता है, तथापि जब तक तुम्हारा मन एकाग्र नहीं होता तब तक तुम उसके उपदेश पर ध्यान नहीं देते। इसलिए जब तुम अपने मन को एकाग्र कर लोगे तब तुम्हें अपने आत्मा में ही सब कुछ दीखने लगेगा और तुम्हारे सारे संदेह और विकल्प स्वयं निवृत्त हो जायँगे। अभ्यास इस एकाग्रता को दृढ़ करता है। अभ्यास से पहले अनुभव, फिर इच्छा और फिर काम करने की शक्ति उत्पन्न होती है और इस शक्तिसे शरीर की सब नाड़ी और नसें संचालित होती हैं। यहाँ तक कि सारा शरीर निष्काम कर्मयोग का साधन बन जाता है और तब साधक को त्याग और वैराग्य की सिद्धि प्राप्त होती है। यह सिद्धि किसी सिद्धान्त, विश्वास या विशेष प्रकार की शिक्षा पर निर्भर नहीं है। चाहे साधक किसी मत पर विश्वास रखनेवाला या किसी सम्प्रदाय पर चलनेवाला हो, अभ्यास और एकाग्रता से समान लाभ उठा सकता है। किन्तु प्रश्न केवल यह है कि क्या तुम में निष्काम भाव है ? यदि है तो तुम बिना किसी धर्म-पुस्तक को पढ़ने के भी धर्मात्मा बन सकते हो। चाहे मन्दिर, मसजिद या गिरजे में जाओ या न जाओ; कर्मयोग में इनकी आवश्यकता नहीं। वहाँ केवल तुम्हारा हृदय-मन्दिर ही उपासनालय है। हमारे संपूर्ण योग बिना जाति, देश और धर्म-भेद के मनुष्य-मात्र को इसी स्थान पर पहुँचाते हैं। क्योंकि उन
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सबका तात्पर्य मनुष्य को बन्धन से छुड़ा कर मुक्ति दिलाने का है। केवल मूर्ख और अज्ञानी पुरुष ही कहा करते हैं कि ज्ञान और कर्म में भेद है। विद्वान् लोग जानते हैं कि यद्यपि उनकी अवस्था और अधिकार में कुछ भेद हो, तथापि उन दोनों का लक्ष्य और उद्देश्य एक ही है।
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मुक्ति
कर्म का फल भी कर्म ही कहलाता है। मन, वचन और कर्म से जो फल उत्पन्न होता है, वह भी काल पांकर कर्म-चक्र में सम्मिलित हो जाता है। इस प्रकार कर्म से फल और फल से कर्म का चक्र संसार में सदा चलता रहता है। वस्तुतः कर्म में कार्य्य-कारण-भाव दोनों रहते हैं। जहाँ कोई कार्य होगा वहाँ उसका कारण अवश्य होगा, चाहे वह गुप्त हो। इसी प्रकार कारण की उपस्थिति में कार्य्य भी बिना हुए न रहेगा, चाहे अभी न हुआ हो। यह कर्म का सिद्धान्त, जिसको हमारा शास्त्र बतलाता है, संसार भर में सच्चा माना गया है। जो कुछ हम देखते, छूते या करते हैं, वह कर्म है। जहाँ उससे कुछ फल उत्पन्न होते हैं, वहाँ उन फलों के सम्बन्ध में बहुत से नये कर्म भी बन जाते हैं। जहाँ कहीं एक कर्म हो रहा है वहाँ उसके सम्बन्ध में अनेक कर्मों का बार बार होना आवश्यक और प्रत्यक्ष है। नैयायिक (तार्किक) लोगों ने इसके लिए एक विशेष परिभाषा "व्याप्ति" नियत कर ली है। उनके मतानुसार इस सिद्धान्त के सम्बन्ध में हमारे संपूर्ण मानसिक, वाचिक और कायिक कर्मों में व्याप्ति काम कर रही है। मन में एक विशेष प्रकार का सङ्कल्प उठते ही हम देखते हैं कि उससे सम्बन्ध रखनेवाले और अनेक प्रकार के भाव तरङ्गों के
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समान उत्पन्न हो जाते हैं। यह एक प्रत्यक्ष बात है। संस्कृत में इसी को "व्याप्ति" कहते हैं। बाह्य और आन्तरिक जगत् में सर्वत्र यह सिद्धान्त समान रूप से काम करता है। एक भाव के पश्चात् दूसरे भाव का आना या युगपत् अनेक सम्बद्ध भावों का प्रादुर्भूत होना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
दूसरी बात विचारणीय यह है कि यह कर्म का सिद्धान्त एक-देशी है या सर्वदेशी। यह पृथिवी, जिस पर हम रहते हैं, इस अपरिमित ब्रह्माण्ड का—जो देश काल और निमित्त के संयोग से बना है—एक छोटा सा भाग है। इससे स्पष्ट है कि यह संसार नैमित्तिक है। इससे आगे चल कर फिर कोई नियम (कानून) या उसका प्रभाव (असर) नहीं रहता। जब हम संसार का वर्णन करते हैं तब उससे हमारा अभिप्राय ब्रह्माण्ड के उस भाग से होता है, जिसको हमारे मन ने आक्रान्त (सीमाबद्ध) कर रक्खा है। और यह ऐन्द्रिय जगत् है जिसमें हम देखते, छूते, सुनते, अनुभव करते, सोचते और समझते हैं। इससे आगे चल कर फिर कार्य-कारण का नियम नहीं रहता। जो वस्तु हमारे मन और इन्द्रियों से परे है, वहाँ न प्रत्यक्ष का गम्य है न अनुमान का। इस सृष्टि में जहाँ तक नाम-रूप की छाप लगी हुई है वहीं तक कार्य-कारण-भाव की सीमा है और वहीं प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द काम करते हैं। इसी जगत् में प्राकृत नियम अपना काम करते हैं। यद्यपि यहाँ अपनी मानसिक शक्ति से हम काम लेते हैं, तथापि पूरी स्वतन्त्रता के न होने से हमारी आत्मिक-शक्ति दबी रहती है। यहाँ हमारा ज्ञान भी उस सीमा के भीतर और उन्हीं प्राकृत नियमों के अनुसार होता
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है। जिस वस्तु को हम जानते हैं, या जिसका जानना सम्भव है वह उस प्राकृत नियम के अधीन है, जिसके द्वारा हम अपने मन और इन्द्रियादि से काम लेते हैं और जहाँ अधीनता है, वहाँ "स्वतन्त्रता" इस शब्द का प्रयोग करना भी अनुचित है। परन्तु वह वस्तु जिसने देश, काल और निमित्त के संयोग से अपनी दशा और शक्ति में परिवर्तन स्वीकार किया है, जो पहले सम्पूर्ण शक्तियों का केन्द्र था और अब भी है (चाहे प्रकृति के आवरण ने कुछ काल के लिए उन शक्तियों को दबा दिया हो) स्वरूप से मुक्त (पूर्ण स्वतन्त्र) है। उसमें तभी तक यह बन्धन है जब तक देश, काल और निमित्त का संयोग है। जहाँ यह संयोग मिटा वहाँ वह फिर शुद्ध बुद्ध और मुक्त है। वह मुक्ति से आकर बन्धन में पड़ा है, बन्धन से छूट कर फिर मुक्त हो जाता है।
यह प्रश्न उपनिषदों में आता है कि यह संसार कहाँ से उत्पन्न हुआ, किसमें रहता है और कहाँ जायगा। इस का यह उत्तर दिया गया है कि वह मोक्ष से आता है, बन्धन में रहता है और फिर मोक्ष को चला जायगा। अतएव जहाँ कहीं और जब कभी हम मनुष्य का वर्णन करते हैं, वहाँ और तब हमारा यह अभिप्राय होता है कि यह मनुष्य उस अनन्त, अखण्ड और सर्वव्यापक सत्ता का एक अंश है। यह ब्रह्माण्ड स्वयं उस अनन्त सत्ता में एक बिन्दु की उपमा रखता है। हमारे कर्म और उनके फल, इच्छायें और आशायें सब इसी ऐन्द्रिय-जगत् से सम्बन्ध रखते हैं और हमारी उन्नति और अवनति भी इसीके भीतर हो रही है। यह आशा करना कि यह जगत् सदा रहेगा एक बाल-चेष्टा है। इसके
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अस्तित्व का कारण केवल हमारा मन है। स्वर्ग भी इसी जगत् का एक कल्पित रूपान्तर है। तुम ज़रा सोचो तो सही, इस बात की इच्छा करना कि अनन्त और अपरिमित सत्ता हमारे इस परिमित जगत् के अनुसार हो, कैसी अनुचित और बालेच्छा है। जो मनुष्य इस संसार पर ऐसा मोहित हो गया है कि बार बार इस संसार में ही जन्म लेकर रहने की इच्छा प्रकट करता है वह आध्यात्मिक पद से यहाँ तक गिर गया है कि उस सर्वोच्च पद की भावना तक अपने मन में नहीं कर सकता। वह इस छोटे से जगत् को ही सब कुछ मान रहा है, उसको उस अनन्त सत्ता का ज्ञान ही नहीं है। उसकी धारणा क्षणिक सुख-दुःख और हर्ष-शोक तक ही पर्याप्त है। वह परिमित को ही अपरिमित और पराधीनता को ही स्वाधीनता समझ रहा है। भगवान् बुद्ध कहते हैं कि वह तृष्णा के समुद्र में डूबा हुआ इस जीवन को ही सर्वस्व समझता है। सम्भव है इस जगत् से बाहर करोड़ों प्रकार के सुख हों, असंख्य उन्नति के सोपान हों, अगणित नियम अपना काम करते हों। क्योंकि जिस जगत् में हम रहते हैं वह उस अनन्त ब्रह्माण्ड का समुद्र में बिन्दुवत् एक छोटा सा अंश है।
मोक्ष प्राप्त करने के लिए हमको इस संसार की सीमा से बाहर जाना होगा, यहाँ उसकी आशा रखना व्यर्थ है, क्योंकि वह यहाँ नहीं है। पूर्ण शान्ति जिसमें सारे प्राकृत विकार नष्ट हो जाते हैं, इस संसार में नहीं है, न स्वर्ग और न वैकुण्ठ में है, न किसी ऐसे स्थान में मिल सकती है जहाँ हमारा मन और चित्त पहुँच सकता है। ऐसे किसी स्थान में मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती, क्योंकि ये
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सारें स्थान हमारे सीमाबद्ध संसार में होंगे और देश, काल और निमित्त से घिरे हुए होंगे । यह सम्भव है कि आकाश-मण्डल में ऐसे अगणित लोक या स्थान हों, जहाँ अत्यन्त सूक्ष्म सृष्टि बसती हो और वहाँ के भोग-विलास और सुख-साधन यहाँ की अपेक्षा उत्तम हों। परन्तु ये लोक और स्थान भी इसी संसार के अन्तर्गत हैं और इसलिए बन्धन के नियम से मुक्त नहीं हो सकते । मुमुक्षु को इनसे भी परे जाना होगा। जहाँ यह संसार समाप्त होगा वहीं से, उस परम पद का आरम्भ होता है । ये सुख-दुःख और हर्ष-शोक और इनका संवेदन सब यहीं समाप्त हो जाता है । वहाँ केवल आत्म-दर्शन और तज्जनित आनन्द शेष रहता है । जब तक हम इस परिवर्त्तन-शील और क्षण-भङ्गुर जगत् से बेलाग नहीं होते और जब तक तृष्णा की तरङ्गें हमें मोह के समुद्र में बहाये लिये जा रही हैं, तब तक हम मुक्ति के अधिकारी नहीं बन सकते और न शान्ति के तट पर पहुँच सकते हैं। केवल विवेक का पोत (जहाज़) ही हमको इस दुस्तर समुद्र के पार लगा सकता है । विवेक हमको बतलाता है कि उस परम स्वाधीनता (मुक्ति) के प्राप्त करने का (जो मनुष्य-जीवन का उद्देश है) केवल एक ही उपाय है और वह यह है कि इस असार जीवन का मोह त्याग दिया जावे । स्वर्ग, नरक, शरीर, मन और इन्द्रिय इन सब से विरक्ति स्वीकार कर ली जाय । क्योंकि वे सब परिमित और क्षणिक हैं। बन्धन से छुटकारा पाने के लिए आवश्यक है कि कार्य-कारण और उनके नियमों की सीमा से हम बाहर हो जावें ।
परन्तु इस संसार का छोड़ना बहुत कठिन काम है । विरले
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ही मनुष्य इस योग्य हो सकते हैं। हमारे शास्त्रों में इसके दो साधन बतलाये गये हैं। एक को "नेति, नेति" "यह नहीं, यह नहीं" कहते हैं। दूसरे को "इति, इति" "यह है, यह है" कहते हैं। पहला निवृत्ति-मार्ग और दूसरा प्रवृत्ति-मार्ग कहलाता है। इनमें से पहला अत्यन्त कठिन है। उसकी केवल वेही मनुष्य साधना कर सकते हैं, जिन्होंने अपने इन्द्रिय और मन पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करके संसार और उसके विषयों को विषवत् त्याग दिया है; सांसारिक कोई इच्छा या आशा कभी जिनको अपने उद्देश से विचलित नहीं कर सकती। परन्तु ऐसे मनुष्य विरले ही होते हैं। साधारण मनुष्यों को दूसरे मार्ग का अनुसरण करना पड़ता है। यह मार्ग पहले की अपेक्षा सरल है। इसमें वे संसार के समस्त बन्धनों में रहते हुए और अपने कर्तव्य-कर्म का आचरण करते हुए अन्त में जाकर उन सबको छिन्न भिन्न कर डालते हैं। यह भी एक प्रकार का तप है। भेद केवल इतना है कि यह काम क्रमशः और शनैः शनैः होता है। इसमें मनुष्य क्रमशः अपना अनुभव और अभ्यास बढ़ाते हुए, त्रिवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ और काम से लाभ उठाते हुए, सत्यासत्य, हिताहित और कर्माकर्म का विवेक प्राप्त करते हुए अन्त में जाकर निष्काम बन जाता है और मुक्त हो जाता है। निवृत्ति-मार्ग वाले केवल ज्ञान की सहायता से अपना काम करते हैं। वे अपने उद्देश की सिद्धि में कर्म का सहारा लेना नहीं चाहते। इसी को सांख्य और वेदान्त की परिभाषा में "ज्ञानयोग" कहते हैं। प्रवृत्ति-मार्गवाले कर्म की नींव पर अपना मन्दिर निर्माण करते हैं। उनकी दृष्टि में बिना कर्म के
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कोई सिद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। यह "कर्मयोग" है, इसमें उत्साह और तीव्रता के साथ कर्म करना पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य के लिए कर्म करना आवश्यक है। केवल वे लोग जो सदा आत्मा के ही ध्यान में निमग्न रहते हैं, आत्मा के सिवा न किसी को देखते, न सुनते और न अनुभव करते हैं। जिनका सब कुछ आत्मा ही है, वे अलबत्ता कर्म के बन्धन से मुक्त हैं; अन्य सबको कर्म करना ही पड़ता है। पानी की लहर ज़ोर के साथ चलती है और किसी गहरी जगह में पहुँच कर भँवर बन जाती है और बार बार चक्कर लगा कर फिर ज़ोर के साथ वह निकलती है और स्वतन्त्र लहर बन जाती है। मनुष्य का जीवन एक निरन्तर बहनेवाला प्रवाह है, जिसमें इच्छाओं की अनेक लहरें उठा करती हैं, जो उसको मोह के गम्भीर भँवर में फँसा देती हैं, जिसमें पड़ा हुआ मनुष्य चक्कर खाया करता है। देश, काल और निमित्त के संयोग से कुछ दिन इसको इस भँवर में फँसा रहना पड़ता है। माता, पिता, भ्राता और पुत्रादि के मोह तथा ख्याति और प्रशंसा के लोभ में तड़पना होता है। पर अन्त में जाकर वह उससे निकल भागता है और स्वतन्त्र लहर के समान उस अवस्था में पहुँच जाता है, जिसमें फिर कोई बन्धन नहीं रहता।
चाहे हम इसको जानें या न जानें, मूर्ख हों या पण्डित; पर इसमें संदेह नहीं हो सकता कि हम सब लोग संसार के बन्धन से मुक्त होने के लिए कर्म करते रहते हैं। मनुष्य का अनुभव उसके जीवन की नौका को भवसागर से पार लगाने के लिए पतवार का काम देता है। सारा संसार कर्म कर रहा है, जड़ से लेकर चेतन तक
छठा अध्याय
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और अणु से लेकर सूर्य्य तक सब कर्म कर रहे हैं। कोई एक क्षण भर के लिए भी बिना कर्म के नहीं रह सकता। यह कर्म क्यों हो रहा है? मुक्ति के लिए। सब मुक्ति चाहते हैं और बन्धन से भागते हैं। संसार में दो प्रकार की शक्तियाँ काम कर रही हैं। एक आकर्षक, दूसरी विकर्षक। आकर्षक शक्ति वह है कि जो हमें मुक्ति की ओर खींच रही है और विकर्षक शक्ति वह है, जो हमें बन्धन से हटा रही है।
कर्मयोग हमें क्या सिखाता है? कर्म किस प्रकार करना चाहिए? यही कर्मयोग की शिक्षा है। जो इस विद्या को नहीं जानता, वह सदा संसार की चक्की में पिसता रहता है। कर्मयोग ही से हम कर्म के रहस्य को समझते हैं। इसी से कर्म के बन्धन को, जिस प्रकार काँटे से काँटे को और विष से विष को दूर करते हैं, शिथिल कर सकते हैं। यदि हम कर्मयोग को नहीं जानते तो कर्म करने में हमारी शक्ति का दुरुपयोग ही नहीं होता, किन्तु वह कर्म और भी हमारे बन्धन को दृढ़ कर देता है। कर्मयोग कर्म का सायन्स है, इससे तुम सीख सकते हो कि किस प्रकार कर्म करने से उसका फल शीघ्र और तुम्हारे अनुकूल हो सकता है। कर्म करना आवश्यक है, तथापि हमको किसी श्रेष्ठ उद्देश को सम्मुख रख कर कर्म करना चाहिए। कर्मयोग हमको बतलावेगा कि यह संसार परिवर्तनशील है, इसमें स्थायी सुख नहीं है। यह उस स्थान तक हमको पहुँचाने के लिए (जहाँ निराबाध सुख है) एक मार्ग (सड़क) है। हमको धीरे धीरे बल और अधिकार प्राप्त करते हुए इस सड़क से जाना है। संसार में शुकदेव जैसे मनुष्य बिरले ही होते
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हैं जो एकदम संसार को छोड़ कर उससे विरक्त हो जाते हैं; जैसे साँप केचुली को छोड़ कर उससे अलग हो जाता है। ऐसे लोगों के लिए कर्मयोग का विधान नहीं है। यह सड़क प्रायः उन्हीं लोगों के लिए बनाई गई है कि जो संसार की एषणाओं को सहसा नहीं त्याग सकते। सांसारिक सुखों का अनुभव करते हुए जो मुक्ति की ओर जाना चाहते हैं, ऐसे लोगों को कर्मयोग बतलाता है कि वे किस प्रकार कर्म के द्वारा अपने अभीष्ट को सिद्ध कर सकते हैं।
कर्मयोग हमें शिक्षा देता है कि "उत्साह के साथ कर्म किये जाओ परन्तु बेलाग बने रहो। उसके फल में अपने को न लपेटो, अपने मन को वश में रक्खो।" तुम देखते हो, संसार में सुख-दुःख का चक्र चल रहा है। कभी हर्ष है, कभी शोक है। ये आगन्तुक अवस्थायें हैं, इनसे हमारे आत्मा का कोई सम्बन्ध नहीं। हमारा आत्मा सुख-दुःख से परे है। ये सब इन्द्रिय और मन के विकार हैं, जिनको मूर्खता से हम आत्मा में आरोपित कर लेते हैं। दुःख केवल संसर्ग से उत्पन्न होता है; कर्म से नहीं। जब हम किसी कर्म के फल में लिपट जाते हैं तभी दुःख का अनुभव करने लगते हैं। किन्तु यदि हम उससे अलग रह सकें, तो रात-दिन कर्म करते हुए भी कभी दुःखी न होंगे। दूसरे के घर में आग लगने से हमें दुःख नहीं होता, परन्तु जब हमारे घर में आग लगती है तो हम रोते हैं। हज़ारों मनुष्य प्रति दिन मरते रहते हैं, हमें मालूम भी नहीं होता, परन्तु जब कोई हमारा सम्बन्धी या आत्मीय मर जाता है तो हम शोक से विह्वल हो जाते हैं। इसका क्या कारण है? इसका कारण केवल ममता है। जिन पदार्थों में हमारी ममता है अर्थात् जिनको
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हम अपना समझते हैं, उनके वियोग से हमें दुःख होता है और जहाँ ममत्व बुद्धि नहीं है, वहाँ न संयोग से सुख और न वियोग से दुःख होता है। जिस घर या मनुष्य को हमने अपना मान रक्खा था, उसके नष्ट होने से हमको दुःख होता है और जिस घर या मनुष्य से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है, उसके नष्ट होने से हमें कुछ भी दुःख नहीं होता। इससे सिद्ध है कि सम्बन्ध ( लगाव ) ही सारे दुःखों की जड़ है। सम्बन्ध ही से स्वार्थ उत्पन्न होता है और स्वार्थ दुःख का मूल है। चित्त में मेरे-पन और तेरे-पन की जितनी लहरें उठती हैं, उनके साथ पराधीनता की बेड़ियाँ लगी रहती हैं, जो मनुष्य को जकड़ कर बाँध लेती हैं। इसलिए कर्म-योग हमको बतलाता है कि तुम संसार के सब पदार्थों को देखो और उनसे प्रसन्नता-लाभ करो, परन्तु उनको अपना कभी मत समझो, यहाँ तक कि अपने शरीर पर भी ममत्व-बुद्धि न करो। यह कभी न कहो कि यह वस्तु मेरी है। जिसको तुम अपना कहोगे वही तुम्हारे दुःख का कारण बन जायगी। मेरा पुत्र, मेरा घर, मेरा शरीर ये सब बन्धन और दुःख की परिभाषायें हैं, जो अज्ञानी लोगों ने बना ली हैं। वास्तव में न हमारा कोई है और न हम किसी के हैं। हम केवल साक्षी मात्र बन कर संसार में आते हैं, पर अविद्या से वादी और प्रतिवादी बन जाते हैं और इसीसे सारे झगड़े पैदा होते हैं। यह शरीर क्या है ? आत्मा का एक कल्पित चित्र या मूर्त्ति है। जैसे किसी चित्र या मूर्त्ति के टूटने फूटने से शरीर को कुछ हानि नहीं पहुँचती वैसे ही इस शरीर के नष्ट होने से आत्मा का कुछ नहीं बिगड़ता।