करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
करत कलोल फिरत अंजियन संग |
आपन मरन उनहूँ न जाना॥
'अजा' बकरी को कहते हैं । 'कलौल' यानी खेलकूद। वो गड़रिये की बकरियों के साथ खेलता था। अपना भेद उसे मालूम नहीं था कि शेर हूँ । बड़ा हो गया। घास भी खाने लगा। घास क्यों खाने लगा ? आपके बच्चे भी कभी मिट्टी खाते हैं। बच्चों की जीभ इंद्री तेज़ होती है। मिट्टी में एक तत्व है। खाने की चीज़ नहीं थी । विषैले पदार्थ भी हैं। पर आदत पड़ गयी । मिट्टी खाना गंदी आदत है। आत्मा को इंद्रियों के साथ रहने की बड़ी गंदी आदत पड़ गयी है । मेरा भतीजा मिट्टी खाता था । उसकी माँ कहती थी कि यह मिट्टी खाता है । मैंने कहा कि घर में मिट्टी न रखा करो। बाद में वो कहने लगी कि यह बाहर जाकर मिट्टी खाता है। मैंने कहा कि बाहर न जाने दो। फिर एक दिन कहने लगी कि जूते के तलवे से मिट्टी निकालकर खाता है । देखा न, कितनी गंदी आदत थी ! मैंने कहा कि जूते ऊँची जगह पर रखा करो। फिर एक दिन कहने लगी कि अब दीवारों को चाटता है । अब दीवारें थोड़ा तोड़नी थीं । वाह ! ऐसा ही है मन।
तीन लोक में मनहिं विराजी । ताहिं न चीह्नत पंडित काजी ॥
तो उसे बाद में समझाया, भय दिया कि नहीं खाओ । मिट्टी खाने की चीज़ नहीं है । इस तरह शेर के लिए घास खाने की चीज़ नहीं है। एक भैंस का कट्टा है। भैंस को चारा देने जाऊँ तो वो मेरे पैर की टो पकड़कर नौचता है। उसने दोनों टो खा ली हैं। भूखा होता है तो कुछ खाना चाहता है। वो खाने की चीज़ नहीं है; पर भूखा था । संभवतः, शेर का बच्चा भी घास खाना इसलिए सीख गया होगा, क्योंकि उसे कुछ और न मिला होगा। उसने देखा होगा कि बाकी भी यही खा रहे हैं। वो भी खाने लग गया। वो लड़ाई भी भेड़ की तरह ही करने लग गया। बोलने भी भेड़ की तरह ही लगा । गरजने की जगह मिनमिनाने लगा। कुत्ता भौंकता है, हाथी चिंगाड़ता है, शेर गरजता है, बकरी मिनमिनाती है । वो मिनमिनाने लगा। शेर को मिनमिनाना नहीं है । पर वो भेड़ों को मिनमिनाते देखता था। पूरे काम बकरियों वाले करने लगा । चलना भी बकरियों की तरह
हो गया। वो बकरियों के साथ रह-रहकर बकरी बन गया। शेर कैसे बकरी बन सकता है ? बकरियों की संगत में रहने से सुभाव से बकरी बन गया ।
मृगपति और जंगल से आयो ।
ताहि देख वो बहु डराना॥
अब जो बक्करवाल था, वो जब भी बकरियों को डंडा मारता था तो शेर को भी मारता था। जैसे सभी उसके काबू में थे, वो भी था। जब कहीं खो जाता तो बक्करवाल उसे पकड़ लाता था । क्या आदमी शेर को पकड़ सकता है? नहीं, बकरियों के संग में उसका यह हाल हो गया। वो पूरी-पूरी बकरी बन गया। अपने को नहीं जानता था । तो—
मृगपति और जंगल से आयो, पाल पोस कर कियो सयाना ॥
'मृगपति' शेर को कहते हैं । मृगा 27 फीट छलाँग लगाता है। शेर 28 फीट मारता है। शेर का स्वभाव है कि अपना शिकार एक्टिव करके मारता है । जैसे आप भोजन लचीला करके खाते हैं। शेर पहले दौड़ाता है । आप फुलका ठीक से बनाकर खा रहे हैं। शेर भी ऐसे ही करता है । वो पीछे से वार नहीं करता है। पहले भयभीत करता है। भागने का मौका देता है। दौड़ा-दौड़ाकर फिर मारता है। यह उसका स्वभाव है । उसे मृगा से चुनौती मिलती है। वो शेर को चैलिंज देता है। मृगा को शेर बड़े शौक से मारकर खाता है। पर जो शेर इंसान का माँस एक बार खा ले, वो फिर नरभक्षी हो जाता है, फिर दूसरे जानवर का शिकार करना उसे अच्छा नहीं लगता है। वो इंसान को ही खाता है। क्योंकि इंसान की चमड़ी ही माँस है । भालू को खायेगा तो पहले बाल हैं; वो नौचता है । जिस शेर के मुँह पर इंसान का खून एक बार लग जाए तो वो दूसरे जानवर का शिकार नहीं करता है। तो दूसरे जंगल का मृगपति आया । उसे देखकर वो बकरी बना हुआ शेर का बच्चा डर गया ।
ताहि देख वो बहु डराना ॥
शेर ने देखा कि यह शेर का बच्चा है और घास खा रहा है, बकरियों के साथ में है और डंडे भी पड़ रहे हैं । यह तो बकरी बना हुआ है। यह तो शेर के धर्म के ख़िलाफ़ है। वो उसके पास पहुँचा । उसे देख बच्चा डर गया। एक बार लंगूरों के टोले में इंसान भी था । वो क्या कर रहा था ? जैसे
लंगूर छलाँग मार रहे थे, वो भी मार रहा था । इतना तेज़ कोई आदमी पेड़ों में नहीं जा सकता है। वो लंगूरों के साथ लंगूर हो गया था। जहाँ लँगूर जाएँ, वो भी चला जाता था । अव सवाल उठा कि वो कैसे लंगूर बन गया ? था वो आदमी। 2-3 चीजें हैं। पहली बात है कि 90 प्रतिशत मेलजोल है। आदमी की 90 प्रतिशत आदतें मिलती हैं। पर टेक्निकॅल् कारण कुछ और है। वो क्यों छलाँगें मार रहा था? क्योंकि फल खाने और दूध पीने से उसका शरीर लचीला हुआ। छोटेपन ही लंगूरन उठाकर ले गयी होगी और उसे ममता दे दी होगी, अपना दूध पिला दिया होगा । मैंने अखबार में पढ़ा कि एक कुत्तिया कूड़े के ढेर पर पड़े हुए छोटे- से बच्चे को रोज़ दूध पिलाने जाती थी । किसी ने बच्चे को कूड़े के ढेर पर फेंक दिया था। कुतिया ने सोचा होगा कि कचरे में पड़ा है। वो रोज़ दूध पिलाने जाती थी। उसका टॉइटल भी था - कुतिया की ममता । संभवता लंगूरनी ले गयी होगी और प्यार दे दिया होगा। बच्चे ने भी उसे ही अपनी माँ समझ लिया होगा । जैसे कोई बच्चा अपनाते हैं तो वो तो उन्हें ही अपने माता-पिता समझता है न! ऐसा ही हुआ होगा। अब धीरे-धीरे उसे सब सिखा दिया होगा । पर उसके शरीर का ढाँचा आदमी की तरह था । दूध पीने और फल खाने से आदमी तेज़ होगा । पर यह नहीं कह रहा हूँ कि अनाज नहीं खाना। क्योंकि लोग मेरी बात को उलट-पुलट कर देते हैं। एक दिन मुझे किसी ने कहा कि गाय माता है तो भैंस क्या है? लोग सवाल पूछते हैं। भैंस की दो चीज़ें उसे थोड़ा किनारा कर रही हैं। भैंस पहले अपना शरीर बनाती है, पर गाय जितना खिलाओ, वापिस कर देती है । पर ईमानदारी से देखें तो-
जिसका पीजिए दूध, तिसको कहिये माय ॥
इसलिए सभी की रक्षा करनी है । तो वो बच्चा लंगूर हो गया। वो इंसान से किनारा करता गया । लंगूर बन गया। छलाँगें इसलिए मार रहा था कि दूध वही पिया, जीनस् आ गये। लंगूरों के टोले में भाषा भी सीख गया। बच्चों की याददाश्त भी बड़ी तेज़ होती है।
एक बार गुरुदेव के पास कुछ लोग आए, कहा कि यह कैसा कलयुग आ गया है, इंसान का बच्चा लंगूर बन गया है। तो गुरुदेव ने यह बात बताई थी । वो लंगूरों की तरह ही काट भी रहा था, लंगूरों की तरह आदमी से चिढ़ रहा था, सब काम कर रहा था, उलटे लटक रहा था। संभवतः वो शेर का बच्चा भी वैसे ही हो गया। एक गाय ने बच्चा दिया तो दूसरे दिन मर गयी । अब दूसरी गाय उसे दूध पिलाने लगी। वो समझ रही थी कि इसकी माँ मर गयी है। कभी-कभी वो दूध पिला देती थी। फिर उसे निप्पल से दूध पिलाने लगे। पहले विरोध हुआ । पर बाद में वो समझ गया कि उसकी जीविका का कोई और साधन नहीं है। संभवत: इसी तरह हमारी आत्मा मन और इंद्रियों के संग में बिगड़ी है। तो जंगल के शेर ने देख लिया कि घास खा रहा है । फिर आश्चर्य हुआ। वो वहाँ गया तो उसे देख बच्चा डरने लगा। शेर ने कहा कि डरो नहीं। उसने कहा कि तुम मुझे खा जाओगे। शेर ने कहा कि तू भी शेर है । उसने कहा कि मैं तो बकरी हूँ। वो डरने लगा।
पकड़ भेद ताहि समझाना ॥
वो बच्चे को चश्मे के पास ले गया और उसे दिखाया कि देख, मैं और तू एक जैसे ही हैं। उसने कहा कि क्या सच में मैं शेर हूँ ? शेर ने कहा कि तू शेर है। उसने उसे सब कुछ सिखा दिया। पंजा चलाना भी सिखा दिया । दहाड़ना भी सिखा दिया। उसकी वो ताक़त तो थी ही । इस तरह आत्मा की ताक़त कम नहीं हुई है, केवल मन के संग में कुंद हो गयी है ।
सबकी गठरी लाल है, कोई नहीं कंगाल ॥
...तो मृगपति और जंगल से आयो......
तो जब जंगल का शेर आया तो सब सिखा दिया ।
पकड़े भेद ताहि समझाना ॥
पानी के चश्मे में दिखाया कि तू क्या है। कहा कि तू अपनी माँ से बिछड़ गया था । उसे सब कुछ सिखाया, कहा कि अब जा ! सभी सिखाते हैं। चिड़िया उड़ना सिखाती है । कुत्तिया भी अपने बच्चे को सिखाती है । तो जब वो बकरियों के बीच में गया तो जैसे गडरिया पहले सबकी तरह उसे भी डंडा
मारता था, अब भी मारने लगा तो वो दहाड़ा। सारी भेड़ें भाग गयीं; गडरिया भी भाग गया। रूपांतर यह है कि परमात्म रूपी शेर का बच्चा इंद्रिय रूपी भेड़ों के साथ विषय रूपी घास खा रहा है । मन रूपी गडरिया उसे डंडे मार रहा है। जंगल के शेर रूपी संतजन मिलते हैं तो आज्ञाचक्र रूपी चश्मे के पास ले जाते हैं, कहते हैं कि देख, तू आत्मा है। उसकी ताक़त कहीं कम नहीं हुई थी। पर कहाँ थी ताक़त ? ताक़त भेड़ों जैसी बन गयी क्या ? नहीं, भेड़ों के साथ रहकर भी शेर जैसी ही ताक़त थी। ताक़त नहीं बदली। वही थी। स्वभाव बदल गया । भेड़ों की संगत में रह- रहकर भेड़ों की तरह ही हो गया । शेर मिला तो उसे उसका स्वरूप दिखा दिया । इस तरह संतजन मिलते हैं तो आत्मा को जगा देते हैं । इंद्रिय रूपी भेड़ें भी डरने लगती हैं। मन कहीं भटकाता है तो आत्मा कहती है कि यह नहीं करना है । मन की ताक़त नहीं रह जाती है । इस तरह आपको बदल दिया । यह बदलाव कैसे आया? आत्मदेव अपनी ताक़त समझ चुका कि मेरी इच्छा के बिना कुछ नहीं हो सकता है। इसलिए आप स्थिर हो गये और इच्छाएँ ख़त्म हो गयीं । आप अनूठे हो गये । आप निराले हो गये। अब आत्मदेव भ्रमित नहीं हो रहा है । जगत के पदार्थों का आकर्षण ख़त्म हो गया। कैसे ख़त्म हो गया ? जैसे भ्रमवश रस्सी को साँप मानने के भ्रम से भयभीत थे। अगले पल यथार्थ ज्ञान हो गया तो भ्रम ख़त्म हो गया। फिर चाहें कि डरें तो भी उस रस्सी से भय नहीं लगता है । इस तरह चाहने पर भी अब दुनिया के कामों में मज़ा नहीं मिलने वाला है।
सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण ।
नाम अकेला रह गया, पाया पद निर्वाण ॥
सद्गुरु ने बड़ा ही अनूठा काम किया।
पकड़े भेद ताहि समझायो ॥
इस तरह मन का बड़ा ज़ोर है । आत्मा को भ्रमित करता है । गुरु आत्मरूप दिखाकर इस मन से पार कर देता है ।
कोटि जन्म का पंथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय ॥
यह काम गुरु नाम-दान के समय एक पल में कर देता है । साहिब ने
एक भी बात झूठी नहीं बोली है, एक भी बात बेकार नहीं कही है। वो कह रहे है गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह । लगा बिलगे नहीं,
एक रूप दो देह ॥
क्या यथार्थ में गुरु शिष्य में समा जाता है। जब मैं था तो गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गली अति साँकरी, जामें दो ना समाहिं ॥
एक बात ज़ाहिर हो रही है, एक बात का अनुभव मिल रहा है, इन शब्दों से एक बात साफ़ हुई कि यर्थाथ में गुरु शिष्य में समा सकता है। वाणी में साहिब पुकार कर कह रहे हैं - अब गुरु हैं मैं नाहिं.... । एक बात पता चल रही है, दो तथ्यों से सामने आ रही है। इसका मतलब है, कुछ बात है कि गुरु शिष्य में समा सकता है। और 'बिलगाए बिलगे नहीं।' यानी एक दूसरे के तद्रूप भी हो सकते हैं। इसका मतलब है कि तथ्यों से पता चल रहा है कि संभव है । फिर साहिब कह रहे हैं—
पारस में अरु संत में, तू बड़ो अन्तरो जान ।
वह लोहा कंचन करे, वह करले आप समान ॥
ये दोहे यथार्थ में एक बिंदू की तरफ ले चल रहे हैं । कुछ ऐसा आध्यात्मिक जेनिसिस्म है । कुछ ऐसा आध्यात्मिक खेल है कि जीव उस महान स्थिति तक पहुँच सकता है। यह काम पल भर में हो जाता है। एक बड़ी असमंजस आई। यह तो ठीक है - गुरु करले आप समान । एक डॉ० किसी को भी डॉ० बना सकता है । एक इंजीनियर किसी को भी इंजीनियर बना सकता है । पर एक इंजीनियर अपने अंदर का इंजीनियर निकालने में बड़ा समय लगा देता है। वो अपने अंदर का इंजीनियर निकालने में 4-5 साल लगा देता है। एक डॉ० अपने अंदर का डॉ० निकालने में बड़ा समय लगा देता है। पर यह काम गुरु पल भर में कर देता है। गुरु अपना ज्ञान, अपने गुण, अपनी आदतें, अपनी शक्तियाँ सभी चीजें पल-भर में स्थानांतरित कर देता है। यह बड़ा कौतुकमय विषय है । इशारा मिल रहा है।
गुरु को कीजे दण्डवत, कोटि कोटि प्रणाम ।
कीट न जाने भृंग को, गुरु करले आप समान ॥
कभी-कभी आप सब एक दूसरे को समझाते हैं, अपना रंग चढ़ाने की कोशिश करते हैं, पर पूरा रंग नहीं चढ़ा पाते हैं। बच्चों को समझाते हैं कि अच्छे काम करो, झूठ नहीं बोलो, पर उसपर इस समझ की पूरी रंगत नहीं चढ़ पाती है, लेकिन साहिब कह रहे हैं गुरु अपने समान बना लेता है। ऐसा क्या फार्मूला है पूर्ण गुरु के पास कि अपनी तरह कर देता है। यह बहुत बड़ी बात हुई । वो अपनी तरह कर देता है। अभी तक विज्ञान इसको समझ नहीं पा रहा है। यह क्या चीज़ है ? किस तरह बदल देता है ? इसमें सत्य कितना है, इसमें वास्तिविकता कितनी है, वज़न कितना है ? इसके प्रमाण मिल रहे हैं कि यह चीज़ हो सकती है। आदमी परमात्मा के दर्शन क्यों करना चाहता है ? क्योंकि उसमें गुण है कि जो भी उसे देखता है, उसकी तरह हो जाता है । अब ध्यान क्यों कर रहे हैं? बड़ी खास चीज़ है यह। जाने-अनजाने यह मानव जानता है कि ध्यान से परमात्मा मिल जाते हैं। यानी ध्यान में परमात्मा तक पहुँचने की, उनसे बात करने की ताक़त है। दिव्य शक्तियाँ हैं ध्यान में कहीं। कभी-कभी महात्मा को कहते हैं कि ध्यान करके देखो कि हमारा काम सफल होगा या नहीं। इसका मतलब है कि गुरु जो शक्तियाँ स्थानांतरित करता है, ध्यान से करता है। माता-पिता नहीं कर पाते हैं यह काम | वो केवल ढाँचा ही बदल पाते हैं, पर व्यक्तित्व को नहीं । हमें अपनी तरह नहीं बना पाते हैं । साहिब एक जगह और कह हैं-
पारस में अरु संत में, तू बड़ो अंतरो जान ।
वह लोहा कंचन करे, गुरु करले आप समान ॥
उदाहरण देता हूँ । जबसे आप मेरे संपर्क में आए, पहले वाला व्यक्तित्व ख़त्म कर दिया। मैंने पहले वाले को मार दिया और उसे मधुमय बना दिया। अब आपकी विचारधारा, आपका स्वभाव सब मिलेगा मुझसे। माँ - बाप से नहीं मिलता है। आप कहते भी हैं कि बेटा अच्छा नहीं है, पता नहीं किस पर गया है, पर गुरु यह कला करता है। इस बात में वज़न है । भृंगा को भण्डारिन भी कहते हैं । वो बड़ा अजीब जीव है। सभी स्त्री-पुरुष हैं, पर वो केवल पुरुष
है, उसकी मादा नहीं है । फिर वो बड़े प्यारे तरीके से अपनी पीढ़ी चलाता है। वो कीड़े को पकड़ अपनी आवाज़ सुनाता है और अपनी तरह कर लेता है। साहिब कह रहे हैं कि इस तरह गुरु भी अपनी तरह कर लेता है । प्रमाण मिल रहे हैं। जब भी आप अपने व्यक्तित्व को देख रहे हैं तो बहुत बड़ा बदलाव मिल रहा है। कभी अपने में बदलाव देख अचरज होता होगा आपको । एक दिन अवतार सिंह ने कहा कि मुझे लगता था कि मुझसे बुरा कोई नहीं है दुनिया में, सभी गलत काम कर लेता था मैं, पर अब लगता है कि मुझसे अच्छा कोई नहीं है। मैं बदल गया हूँ । कहा- अगर मैं कई जन्म तपस्या भी करता तो भी शायद इतना नहीं बदल सकता था । साहिब सच ही तो कह रहे हैं- सतगुरु मोर रंगरेज, चुनरि मोरि रंग डारी....... आपको बदल दिया। फिर वाणी में आ रहा है-
जब मैं था तो गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गलि अति साँकरी, तामें दो ना समाहिं ॥
आख़िर क्या करते हैं गुरुदेव ? आप हम सब वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। क्लोन्स बन रहे हैं। बकरी के क्लोन्स, इंसान के क्लोन्स, पर वो हमारे बाहरी रूप को बदल रहे हैं, स्वभाव को नहीं बदल पा रहे हैं । यह वैज्ञानिकों की पकड़ से बाहर है। फिर क्या है संत के पास, जो वो बदलने में सक्षम है। पारस सुरति संत के पास ........ उनकी सुरति में एक ताक़त है । जैसे सीपी में स्वाति की बूँद को मोती में बदलने की ताक़त है। उसके पेट में यह सिस्टम है। पर पानी की बूँद को मोती बनाना वैज्ञानिकों के बस की बात नहीं है। किसी ने आज तक यह काम नहीं किया है। यह काम एक वैज्ञानिक नहीं कर सकता है । उसके बस की बात नहीं है। मृगा की नाभि में सिस्टम है कि वो कस्तूरी का सृजन करता है । कस्तूरी मृगा का वीर्य है। वो कस्तूरी में बदल जाता है। पर अभी तक कोई केमिकल्स से कस्तूरी नहीं बना पाया है। इस तरह एक महापुरुष की सुरति के अंदर ताक़त है कि आपको बदल सकता है । क्या है ध्यान ? यह ध्यान ही आत्मा है। जब वहाँ पहुँचती है तो बाकी सब कुछ छूट जाता है, कुछ बचता है तो ध्यान, सुरति बचती है। वो परमात्मा के सम्मुख पहुँचती है, भौतिक शरीर छूट जाता है। वो उसका विषय नहीं है, उसमें वहाँ पहुँचने की ताक़त नहीं है।
जैसे नासिका में सूँघने की ताक़त है, पर यह काम कानों से नहीं हो सकता है। ऐसे ही वो परमात्मा केवल आत्मा से जाना जा सकता है। इसका मतलब है कि आत्मा में ताक़त है। तो वो परम चेतन हो जाती है । यही चीज़ महापुरुषों के सान्निध्य में मिलती है । उनकी हाज़िरी में बड़ा अंतर है, बड़ी अनुभूतियाँ होती हैं। उनकी सुरति से हो जाता है । कभी आप कहते हैं कि गुरु जी, हमपर | ध्यान रखना, सुरति देना, कृपा करना । ऐसा क्यों कहा गया ? जैसे बरसात में छाता रख देते हैं तो धूप नहीं लगती है । इस तरह उनकी छत्रछाया में कुछ अजीब मिलेगा, ठंडक मिलेगी । यह तय है कि मिलेगा। इस तरह उनका ध्यान सक्षम है। तभी तो साहिब कह रहे हैं— सुरति में रच्यो ससारा, सुरति का है खेल सारा । आपके व्यक्तित्व में सबसे अलग सुरति ही है। सुरति संभाले काज है, तू मत भरम भुलाय। अगर दुनिया में आपका कुछ भटक रहा है तो वो है—ध्यान, अगर उत्थान - पतन हो रहा है हैन । वो हमारी सुरति को भ्रमित कर रहा है। गुरुजनों से पास जाकर कहते हैं कि हृदय में प्रकाश कर दो। क्या किया जा सकता है? हाँ ! कौन-सा प्रकाश ? क्या बल्ब जगाना है कोई ? यह हृदय प्रकाश से क्या मतलब है? कैसा प्रकाश चाहते हैं हम ? 'शून्य महल में घोर अँधेरा, करो नाम उजियारा ।' भाइयो, यह प्रकाश यानी सुरति से गुरु आपकी आत्मा को चेतन करता है । तब हृदय के विकार दिखते हैं। कमरे में अँधकार है तो कुछ नहीं देख पाते हैं। रोशनी होती है तो सब चीज़ दिखने लग जाती है। जब गुरुजन हृदय में प्रकाश करते हैं तो मन के सब खेल नज़र आने लग जाते हैं, काम, क्रोध आदि दिखने लग जाते हैं । कोई बल्ब, कोई दिया नहीं जलाना है। क्या प्रकाश होता है ? बिलकुल । साहिब वाणी में कह रहे हैं—
नाम बिन हृदय शुद्ध न होई । कोटिन भांति करे जो कोई ॥
तो नाम दान की क्रिया हृदय को प्रकाशित करती है । अब आप बहुत बदल गये। पहले मन जहाँ चाहता था, वहाँ बरबस खींच ले जाता था, पर अब उसका ज़ोर नहीं चल रहा है, लगता है कि हृदय प्रकाशित हो गया । स्वभाव बदल गया। अब आप चाहकर भी पाप नहीं कर पा रहे हैं। जब आप अपनी पहली ज़िदगी से अपने को तौलते हैं तो पाते हैं कि बहुत बदलाव आ गया। हर
नामी यह बदलाव अनुभव कर सकता है। जो मैं कह रहा हूँ कि जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्मांड में कही नहीं है । इस वस्तु के साथ तीन चीजें आ जाती हैं । पहला तो मन और आत्मा अलग हो जाते हैं । दूसरा संसार का आकर्षण समाप्त हो जाता है । हृदय में रोशनी हो गयी, प्रकाशित कर दिया। सुकरात ने कहा कि अँधा वो नहीं है जिसकी आँखें फूटी हैं; अँधा वो है जिसे अंदर के दोष नहीं दिखते। अक़्ल दे दी। जिसका नाम ग़लत है, जब वो करने जायेंगे तो दिमाग़ समझायेगा कि यह ग़लत है । बड़ा तगड़ा दिमाग़ कर दिया। देखो, ब्रह्माण्ड में विस्फोट हो रहे हैं । सूर्य से भी बड़ा ग्रह हैं, जहाँ इस समय मई 2007 से आतिशबाजी हो रही है। वो खरबों मील दूर है, उसके टुकड़े यहाँ नहीं आयेंगे। बड़े-बड़े धूमकेतु यहाँ पहुँचे हैं, बड़े-2 खड्डे किये हैं । 150 कि. मी. खड्डा किया था, पूरी धरती को हिलाकर रख दिया था। आज भी चल रहे हैं। वैज्ञानिक यहाँ से बड़ी-बड़ी दूरबीनों से देख रहे हैं । आम आदमी नहीं देख पा रहा है। आपके शरीर में बड़ी लूट हो रही है । चश्म दिल से देख तू, क्या क्या तमाशे हो रहे ।..... आप नहीं देख पा रहे हैं वो ब्लास्टिंग । नासा केंद्र से वैज्ञानिक देख रहे हैं । आप आकाश की तरफ देखें, पर नहीं दिखाई देगा। ऐसे ही आपको वो चश्मा दिया है कि अंदर के शत्रु दिख रहे हैं, विकारों को आप देख पा रहे हैं। यह मामूली काम नहीं है। आम आदमी नहीं देख पा रहा है। फिर तीसरा एक पूर्ण सुरक्षा मिल जाती है। आपमें ईश्वरीय सत्ता पैदा की। बच्चे को चिंता नहीं है कि खाना कब है, सोना कहाँ है । जानता है कि माँ की चिंता है। वो निश्चिंत है। उसने आजमाया है, वो दिल से मानता है कि माँ सरंक्षक है। ऐसे ही आप जानते हैं कि गुरु सरंक्षक है । आप अपने को संसार के लोगों में अलग पाते होंगे । उनका मन पर कोई नियंत्रण नहीं है। पर आपका मन पर होल्ड हो गया है। एक महात्मा के अंदर यह होता है कि बदल देगा। दुनिया खालमखाली है, हम बदल देंगे आपको । नाम देते समय आख़िर संत - सतगुरु क्या करते हैं, संक्षेप में इस बात को इस तरह समझें।
पहले सेवक की सुरति को मसलते हैं। जिन सात स्थानों पर मन ने सुरति को अपने में उलझा रखा था वहाँ से छुड़ा लेते हैं । इस तरह आत्मा को मन से अलग कर देते हैं और अपनी सुरति के साथ मिला लेते हैं । 2. सुरति को चेतन कर देते हैं, जिससे हृदय प्रकाशित हो जाता है। इस तरह मन के सारे विकार समझ आने लगते हैं । 3. नाम के समय उस सुपर पॉवर को ही साथ कर देते हैं, जो शिष्य की सोते और जागते हुए पक्के तौर पर सुरक्षा करती है । मन को संसार में कोई भी जीत नहीं सकता । " मनहिं निरंजन सबै नचावै। नाम होय तो माथ नमावै ॥" नाम क्या चीज़ है ? सतगुरु की सुरति में सिस्टम हैं। नामदान के समय- (1) मन और आत्मा अलग करना (2) हृदय प्रकाशित करना (3) सुरक्षा (कम्पलीट सिक्योरिटी) ।
पारस में अरु संत में, तू बड़ो अंतरो जान।
वह लोहा कंचन करे, गुरु करले आप समान ॥
सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण। नाम अकेला
रह गया, पाया पद निर्वाण ॥
इस तरह सद्गुरु नाम देकर मन-माया के सारे जाल काट हंस को छुड़ाकर ले जाता है। तहाँ अनहद की घोर शब्द झनकार है । लागि रहे सिद्धि साधु न पावत पार है।
सन्तो सो सतगुरु मोहि भावे, जो आवागमन मिटावै ।
द्वार ना मूदे पवन न रोके, न अनहन उरझावे ॥
- साहिब कबीर
4. सोई निज पीव हमारा है
सोई निज पीव हमारा है
संतों ने जिसे 'साहिब' कहकर पुकारा है, वो साहिब ही हमारा परमात्मा है । वो ही हमारा प्रियतम है । सब जीव उसी के अंश हैं। वह आनन्द का सागर है। कहते हैं कि जीवात्माएँ उससे बिछुड़ कर इस संसार में आ फँसी हैं। तो आइए, अब देखते हैं कि जीवात्माएँ अपने साहिब से कैसे बिछुड़ गयीं ? एक बार धर्मदास जी ने अमर - लोक तथा सृष्टि-उत्पत्ति के विषय में जानने की इच्छा से कबीर साहिब से प्रार्थना करते हुए पूछा -
अब साहिब मोहि देउ बताई । अमर - लोक सो कहां रहाई॥
कौन द्वीप हंस को वासा। कौन द्वीप पुरुष रह वासा॥
तीन लोक उत्पत्ति भाखो । वर्णहुसकल गोय जनि राखो॥
काल-निरंजन किस विधि भयऊ। कैसे षोडश सुत निर्मयऊ ॥
कैसे चार खानि बिस्तारी । कैसे जीव कालवश डारी ॥
त्रय देवा कौन विधि भयऊ। कैसे महि आकाश निर्मयऊ ॥
चन्द्र सूर्य कहु कैसे भयऊ। कैसे तारागण सब ठयऊ॥
किस विधि भई शरीर की रचना । भाषो साहिब उत्पत्ति बचना ॥
हे सहिब ! कृपा करके अब मुझे बताओ कि वह अमर- कहाँ है? उस अमर-लोक में जीव किस स्थान पर रहते हैं ? तीन लोक की उत्पत्ति कैसे हुई ? काल-पुरुष कैसे हुआ ? सोलह पुत्र कैसे बने ? यह निर्मल आत्मा चार खानियों में कैसे गयी ? आत्माएँ काल - पुरुष के चंगुल में कैसे फँस गयीं? त्रिदेव कैसे बने? पृथ्वी और आकाश कैसे बने ? शरीर की रचना कैसे हुई? हे साहिब ! कृपा करके मुझे सृष्टि की उत्पति का सारा भेद समझाकर कहिए । तब धर्मदास को अधिकारी जानकर कबीर साहिब ने फरमाया-
तब की बात सुनहु धर्मदासा । जब नहिं महि पाताल अकाशा ॥
जब नहिं कूर्म बराह और शेषा । जब नहिं शारद गोरि गणेश ।
जब नहिं हते निरंजन राया। जिन जीवन कह बांधि झुलाया ॥
तैतिस कोटि देवता नाहीं । और अनेक बताऊं काहीं ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश ने तहिया । शास्त्र वेद पुराण न कहिया ॥
तब सब रहे पुरूष के माहीं । ज्यों बट वृक्ष मध्य रह छाहीं ॥
हे धर्मदास! मैं तब की बात कह रहा हूँ, जब धरती और आकाश नहीं थे; जब कूर्म, शेष, बाराह, शरद, गोरी, गणेश आदि कोई भी न था; जब जीवों को कष्ट देने वाला निरंजन भी न था; जब तैतीस करोड़ देवता भी न थे.... और अधिक क्या बताऊँ ? ब्रह्मा, विष्णु और महेश न थे । वेद, शास्त्र, पुराण आदि भी न थे। लेकिन वह एक था । कबीर साहिब कहते हैं कि प्रारम्भ में सत्य - पुरुष गुप्त थे। उनका कोई साथी-संगी नहीं था । वे कभी बने नहीं हैं और न ही मिटेंगे । जिस किसी वस्तु का सृजन होता है, वह अन्ततः नष्ट भी अवश्य हो जाती है। लेकिन जो परम - पुरुष कभी बना ही नहीं, वह मिट कैसे सकता है! साहिब धर्मदास से कहते हैं कि साकार, निराकार, लोक - लोकान्तर आदि सब बाद में बने; अतः गवाही किसकी दूँ ! चारों वेद भी सत्य पुरुष की कहानियाँ नहीं जानते और सभी निराकार अर्थात काल - पुरूष तक की बात ही कहते हैं । धरती, आकाश, ब्रह्माण्ड, निरंजन, त्रिदेव आदि की उत्पति के विषय में बताते हुए साहिब फरमाते हैं कि सर्वप्रथम परम-पुरुष ने इच्छा करके एक शब्द पुकारा, जिससे एक अद्भुत श्वेत रंग का प्रकाश हुआ और वह अद्भुत प्रकाश अनन्त में फैल गया। वह प्रकाश सांसारिक प्रकाश की भांति न था, वह इतना अद्भुत था की जिसका एक-2 कण करोड़ों सूर्यों को भी लज्जा दे। जब वह प्रकाश अनन्त में फैल गया तो फिर वे सत्य-पुरुष स्वयं उस प्रकाश में समा गये। अब वह प्रकाश चेतन हो गया, जीवित हो गया । जिस प्रकार आत्मा के शरीर में आने से शरीर चेतन हो जाता है । उसी तरह वह प्रकाश भी जीवित हो उठा। प्रकाश में आने से पहले वे सत्य - पुरूष अगम थे, गुप्त थे जबकि प्रकाश में आकर ही वे सत्य - पुरुष कहलाए और वह अद्भुत प्रकाश, जो स्वयं सत्य-पुरूष ही थे, अमर-लोक कहलाया ।
अभी भी सत्य - पुरूष अकेले ही थे । फिर उनकी मौज हुई और उन्होंने उस प्रकाश को अर्थात अपने ही स्वरूप को अपने में से छिटका दिया। अनन्त बिन्दुएँ हुईं, जो वापिस उस अद्भुत अनन्त प्रकाश में आयी। जिस प्रकार समुद्र में से पानी को मुट्ठी में या हाथों में भरकर उछालने से कई कण बिखर जाते हैं, उसी तरह उस प्रकाश में से भी अनेक कण बिखर गये। लेकिन जिस प्रकार समुद्र की बूँदें पुन: समुद्र में गिर, समुद्र का ही रूप हो जाती हैं, उसी तरह वे अनन्त कण भी वापिस उस अद्भुत प्रकाश में आए; लेकिन अचरज यह था कि वे बिन्दुएँ जब वापिस प्रकाश में आयीं तो वे प्रकाशमय नहीं हुईं, क्योंकि सत्य-पुरूष ने इच्छा की कि इनका अपना अलग अस्तित्व भी रह जाए। वे ही जीव (आत्माएं) कहलाये । वे सब जीव उसी अद्भुत प्रकाश में विचरण करने लगे । आत्माओं का उस प्रकाश में अलग अस्तित्व के साथ विचरण करना बड़े अचरज की बात थी क्योंकि समुद्र की बूँदों का समुद्र में अपना अलग अस्तित्व नहीं होता । जिस तरह पानी में मछली घूमती रहती है, उसी तरह सब जीव उस प्रकाश में घूमने लगे । ये देख परम-पुरूष बड़े खुश हुए और उन आत्माओं से बहुत प्यार करने लगे। बहुत समय ऐसे व्यतीत हो गया और सभी जीव उस अद्भुत प्रकाश में विचरण करते हुए परम-आनन्द लूट रहे थे। ‘सदा आनन्द होत है वा घर, कबहु न होत उदासा।' वहाँ उस अमर-लोक में आत्मा का प्रकाश 16 सूर्य का है और परम-पुरूष के मात्र एक रोम का प्रकाश ही करोड़ों सूर्य तथा चन्द्रमा को लज्जा देने वाला है । अत: जब परम-पुरूष के एक रोम की ऐसी महिमा है तो फिर वह परम-पुरूष स्वयं कैसा होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती । फिर परम-पुरूष ने शब्दों से पुत्र उत्पन्न किये अर्थात जो बोलते जा रहे थे, वह पुत्र बन रहा था। जैसे ही परम - पुरूष ने इच्छा करके दूसरा शब्द पुकारा तो 'कूर्म' उत्पन्न हुआ । इसी तरह तीसरे शब्द से 'ज्ञान' और चौथे शब्द से 'विवेक' उत्पन्न हुआ। परम-पुरूष ने सोचा कि मैं जो बोल रहा हूँ, वह सब पैदा हो रहा है, तो क्यों न एक अपने जैसा भी बना दूँ! अतः इस बार परम-पुरूष ने एक और परम-पुरूष बनाने की इच्छा से तीव्र आवाज़ में शब्द पुकारा। यह शब्द
परम-पुरूष ने थोड़ी संशय में पुकारा । इस शब्द से 'निरंजन' (मन) हुआ । परम-पुरूष तब यह जानने के लिए कि क्या उनके द्वारा उत्पन्न पाँचवां शब्द पुत्र उनके जैसा ही है या नहीं, उस समय परम-पुरूष निरंजन में समाए। परम- पुरूष को एक क्षण के लिए शंका आई कि यह तो मेरा शरीर नहीं है और अपने को वहाँ से खींचकर अपने शरीर में लाए। फिर परम-पुरूष ने छठा शब्द पुकारा तो उससे 'सहज' की उत्पति हुई। सातवें शब्द से 'संतोष', आठवें से ‘चेतना', नौवें से ‘आनन्द', दसवें से 'क्षमा', ग्यारहवें से 'निष्काम', बारहवें से 'जलरंगी', तेहरवें से 'अचिन्त' चौदहवें से 'प्रेम', पन्द्रहवें से ' दीन- दयाल', तथा सोलहवें शब्द से 'धैर्य', उत्पन्न हुआ । उस अमर - लोक की शोभा को बढ़ाने के लिए ही परम-पुरुष ने इन शब्द पुत्रों को उत्पन्न किया । ये सभी उसी अमर-लोक में विचरण करने लगे । ये सब परम-पुरूष के शब्द पुत्र थे, जिन्हें परम - पुरूष ने इच्छा से पैदा किया, लेकिन आत्मा इच्छा से नहीं बनी। आत्मा तो परम - पुरुष का ही अंश है । इस तथ्य को कबीर साहिब ने बड़े सुन्दर ढंग से कहा है-
जीवरा अंश पुरुष का आही ।
आदि अन्त कोउ जानत नाहीं ॥
जीवों को उस अमर-लोक में विचरण करते हुए बहुत समय बीत गया। उसके पश्चात् पाँचवां पुत्र 'निरंजन' ध्यान करने लगा। उसने 70 युग तक एकाग्रचित होकर परम-पुरूष का ध्यान किया। परम-पुरुष सेवा से प्रसन्न हुए और पूछा कि इतना घोर तप क्यों कर रहे हो ? निरंजन ने कहा कि मुझे भी कहीं थोड़ा सा स्थान दे दो । परम - पुरुष ने तब निरंजन को मानसरोवर स्थान दिया (मानसरोवर अमर - लोक का ही एक द्वीप है ) । मानसरोवर पहुँच कर निरंजन बड़ा खुश हुआ और आन्नद वहाँ रहने लगा। लेकिन कुछ ही समय बाद पुनः परम-पुरूष का ध्यान करने लगा । निरंजन ने पुन: 70 युग तक परम- पुरुष का ध्यान किया। परम-पुरूष ने सेवा से प्रसन्न होकर पूछा कि अब क्या चाहते हो ? निरंजन-
इतना ठांव न मोहि सुहाई ।
अब मोहि बकसि देहहु ठकुराई ॥
कै मोहि देहु लोक अधिकारा ।
कै मोहि देहु देश इक न्यारा ॥
निरंजन ने कहा “मैं इतने से खुश नहीं हूँ । अब कृपा करके या तो इस अमर-लोक का राज्य ही मुझे दे दो या फिर एक अलग से न्यारा देश दो, जिस पर मेरा पूरा अधिकार हो, जहां मैं स्वतन्त्र रूप से बिना किसी रोक- टोक के अपना कार्य कर सकूँ ।" परम-पुरूष ने तब निरंजन से कहा कि तुम्हारे बड़े भाई कूर्म के पास पाँच तत्त्व का बीज (जो सूक्ष्म रूप में था) है। तुम उसके पास जाकर प्रार्थना करना और पाँच तत्त्व का बीज ले लेना । उससे तुम शून्य में तीन - लोक बनाना। जाओ! तुम्हें 17 चौकड़ी असंख्य युग का राज्य देता हूँ । निरंजन कूर्म जी के पास पहुँचा, लेकिन कूर्म जी से प्रार्थना नहीं की, और बल से पाँच तत्त्व का बीज उसी प्रकार उनसे छीन लिया, जैसे किसी के शरीर से खून खींचकर निकालते हैं । कूर्म जी शांत थे, उन्होंने सोचा कि यह कौन शैतान यहाँ आ गया है ! कूर्म जी ने तब परम- पुरूष से पुकार की, कहा- यह किस शैतान को यहाँ भेज दिया है ! इसने तो मेरे साथ बल का प्रयोग करके पाँच तत्त्व का बीज छीना है। परम-पुरूष ने कूर्म जी से कहा कि तुम शांत रहो, यह तुम्हारा छोटा भाई है, इसे माफ कर दो । लोकिन परम-पुरूष ने सोचा कि यह कैसा निरंजन उत्पन्न हुआ है ! पाँच तत्त्व का बीज लेकर निरंजन ने उससे पाँच तत्त्व (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश ) बनाए । जिस तरह कुम्हार मिट्टी से तरह -2 की वस्तुएँ बनाता है, उसी तरह निरंजन ने भी इन पाँच तत्त्वों से 49 करोड़ योजन पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, तारे, सप्त-पाताल, सप्त- लोक, सब बना दिया । ऐसे शून्य में कई दिन रहा, लेकिन जीव नहीं थे, इसलिए यह निर्जीव सृष्टि थी । निरंजन ने सोचा कि यदि जीव ही नहीं है तो फिर सृष्टि का क्या लाभ ! अतः उसने पुन: 64 युग तक परम-पुरुष का ध्यान किया। परम-पुरूष ने पूछा कि अब क्या चाहिए ? निरंजन - -
दीजै खेत बीज निज सारा ।।
निरंजन ने कहा "मैंने तीन-लोक की रचना तो की है, लेकिन जीव ही नहीं हैं तो राज्य किस पर करूँ ! इसलिए कृपा करके थोड़े से जीव मुझे भी दे दें, ताकि मैं उन पर राज्य कर सकूँ ।' परम-पुरुष ने तब इच्छा करके ऐसी कन्या (आद्य-शक्ति) की उत्पत्ति की, जिसकी आठ भुजाएँ थीं । आद्य शक्ति ने परम - पुरुष को प्रणाम करते हुए पुछा कि उसे क्यों बनाया गया है ? परम-पुरुष ने अनन्त आत्माएं देते हुए कहा कि पुत्री ! मानसरोवर में निरंजन है, जिसने शून्य में तीन-लोक की रचना की है। तुम ये आत्माएं लेकर उसके पास जाओ और दोनों मिलकर शून्य में सत्य-सृष्टि करो (आत्माओं को योनियों में न लाकर अर्थात शरीरों में न डालकर सत्य-सृष्टि करने की आज्ञा दी, जैसी कि अमर - लोक की सृष्टि थी)। रुद्र मांस वाली सृष्टि करने की आज्ञा नहीं दी थी। यहीं पर जीवात्माएँ अपने साहिब से बिछुड़ गयीं। निरंजन ने फिर आद्य-शक्ति को भी बलपूर्वक अपने साथ रख लिया और सत्य - पुरुष की आज्ञा का उलंघन करते हुए उसने सत्य-सृष्टि के बजाय शरीर - सृष्टि की और जीवों को अनेकानेक कष्ट देना प्रारम्भ कर दिया । जीवों का सारा आनन्द लुट गया। साहिब कह रहे हैं- बासुरि सुख ना रैणि सुख, नाँ सुपिनै माहिं ।
कबीर बिछुड़ा साहिब सूं, ना सुख धूप न छाहिं ॥
तथा
चकवी बिछुड़ी रैणि की, आई मिली परभाति ।
जे जन बिछुड़े साहिब सूं, ते दिन मिले न राति ॥
साहिब कह रहे हैं कि चकवी (एक पक्षी, जो रात को अपने प्रियतम से बिछुड़ जाती है ) चाहे रात्रि में अपने प्रियतम से बिछुड़ जाती है, पर प्रात: होते ही पुन: मिल जाती है अर्थात उसका कष्ट थोड़ी देर का होता है, पर जीवात्माएँ अपने साहिब से बिछुड़ कर पुनः मिल नहीं पा रही हैं, उन्हें निरन्तर कष्ट सहने पड़ रहे हैं। अनेक कुकर्म करने के कारण सत्य - पुरुष ने निरंजन को मानसरोवर से निकाल दिया था और एक लाख जीव नित्यप्रति ग्रसित करने का शाप दे
दिया था। पहले सत्य-पुरुष ने उसे मिटाने की बात भी सोची, लेकिन तब तक वे उसे 17 चौकड़ी असंख्य युग का राज्य करने का 'शब्द' दे चुके थे; अतः ऐसा करने से उनका शब्द कट जाता था। जब निरंजन जीवों को तप्त शिला पर भून भून कर खा रहा था, उन्हे अनेकानेक कष्ट दे रहा था, तब सब जीवों ने मिलकर सत्य - पुरुष को पुकारा। सब जीवों ने मिलकर कहा कि यदि कोई परमात्मा है तो हमें बचाओ ! काल-पुरुष का दण्ड हमसे सहा नहीं जा रहा। अब निरंजन को मिटाया भी नहीं जा सकता था, क्योंकि उसे शब्द मिल चुका था और जीवों की पुकार को अनसुना भी नहीं किया जा सकता था। साहिब भी अब करे तो क्या करे ! अब साहिब ने स्वयं को मथा और अपने में से ही एक परम - सत्ता निकाली। जैसे दही के मथने पर घी बाहर आ जाता है, वैसे ही साहिब ने अपने को मथ साहिब - सत्य - कबीर को निकाला और उनसे कहा कि जीवों को शून्य में निरंजन बड़ा कष्ट दे रहा है, उन्हें छुड़ाओ । एक बार तो कबीर साहिब ने निरंजन का शीश ही उखाड़ फेंका, लेकिन फिर सत्य-पुरुष के शब्द का ख्याल करके पुनः सुरति करके जोड़ दिया । कबीर साहिब कभी-2 इस संसार में सद्गुरू रूप में अवतरित होकर युक्ति - 2 रूप से जीवों को सत्य - भक्ति में लगाकर अमर - लोक लेने आते हैं। चूंकि यहाँ पर सब काल - पुरुष की भक्ति में लीन हैं, इसलिए यह काम थोड़ा कठिन भी हो जाता है । सब जीव आसानी से उन्हें समझ नहीं पाते हैं और उलटे उन्हीं के शत्रु हो जाते हैं । इसलिए जो सत्य - पुरुष के अंकुरी जीव हैं वे सत्यगुरू की शिक्षा सुनकर ऐसे दौड़कर मिलते हैं जैसे लोहे से चुम्बक चिपट जाता है और जो काल - पुरुष के जीव हैं उन पर सत्य-पथ की शिक्षा का कुछ प्रभाव नहीं पड़ता है । विडम्बना यही है जीव साहिब से बिछुड़ कर काल की दुनिया में अनेक कष्ट सहते हुए भी बार-बार काल-पुरुष के जाल में उलझ रहे हैं और पुनः साहिब से मिलने का प्रयत्न नहीं कर रहे। सब गफलत की नींद में सो रहे हैं। तभी तो साहिब चेता रहे हैं-
कबीर सोकर क्या करे, उठ और उठकर जाग ।
जिनके संग से बिछुड़ा, वा ही के संग लाग ॥
कह हैं कि जिस साहिब रूपी प्रियतम से बिछुड़ गया है, उसी की भक्ति कर । आगे कह रहे हैं-
तुमको बिसर गईं सुध घर की महिमा अपन जनाई हो॥
निरंकार निर्गुण है माया, तुम को नाच नचाई हो ॥
चर्म दृष्टि का कुलफा देके, चौरासी भरमाई हो ॥
कह रहे हैं कि हे हंसा! तुम्हें अपने सही घर की सुध भूल गयी है । तुम अपनी महिमा को नहीं जानते हो, अपनी ताक़त को नहीं समझते हो । जो निर्गुण है, निरंकार है, वो सब माया है; वो तुम्हें नाना नाच नचा रही है । तुम्हें भौतिक आँखों की परेशानी देकर, माया में लुभाकर चौरासी की धारा में भरमा दिया है। आगे कह रहे हैं- - चार वेद हैं जाकी स्वांसा, ब्रह्मा अस्तुति गाई हो ।
सो कथि ब्रह्मा जगत भुलाए, तेहि मार्ग सब जाई हो ॥
चार वेद उस निर्गण की स्वांसा से उत्पन्न हुए हैं और उन्हीं की अस्तुति ब्रह्मा जी ने गाई है। ऐसे में सब जीव भ्रमित हो गये हैं और उसी निर्गुण परमात्मा की राह पर जा रहे हैं, जो उन्हें चौरासी में भ्रमित किए हुए है। .... तो साहिब ने परम - पुरुष रूपी सच्चे प्रियतम की बात कही। वो सगुण-निर्गुण से परे है। दुनिया परमात्मा को निराकार कह रही है। इस पर साहिब कह रहे हैं— बेचूने जग राँचिया, साहिब नूर निनार ।
आखिर केरे वक्त को, किसका करै दीदार ।।
दुनिया निराकार में मग्न है । यदि वो निराकार है तो अंत में किसका दर्शन करोगे! वो सच्चा साहिब तो शब्द और प्रकाश स्वरूप है । पर वो नि:शब्द शब्द है, अनहद शब्द नहीं। वो अद्भुत प्रकाश है, सांसारिक प्रकाश नहीं । दुनिया कह रही है कि वो अवतार धारण करके संसार में आता है, पर साहिब कह रहे हैं-
दशरथ कुल औतर नहीं आया। नहीं लंका के राव सताया।।
पृथ्वी रमण धमन नहीं करिया । पैठि पाताल न बलि छलिया ।।
... ई सब काम साहिब के नाहीं । झूठ कहै संसारा ।।
ये सब काम साहिब के नहीं हैं, निरंजन के हैं। वो किसी से छल नहीं करता । वो किसी को नहीं मारता ।
है दयाल द्रोह न वाके, कहु कौन को मारा ।।
यह सारा पसार उसी का है।
जन्म मरण से रहित है, मेरा साहिब सोय ।
बलिहारी उस पीव की, जिन सिरजा सब कोय ।।
साहिब धर्मदास को परम-पुरुष के विषय में बताते हुए कह रहे हैं-
अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड रच, सब से रहे न्यार ।
जिन्द कहे धर्मदास सों, ताका करो विचार ॥
कह रहे हैं कि जो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों की रचना करके स्वयं सबसे न्यारा है, उसका विचार करो ।
देस हमार न्यार तिहुँ पुर ते । अहिपुर नरपुर अरु सुरपुर से ॥
तहाँ नहीं यम का प्रवेशा। आदि पुरुष का है वह देशा ॥
सत्यलोक तेहि देस सुहेला । सत्यनाम गहि कीजे मेला ॥
अद्भुत ज्योति पुरुष की काया । हंसन शोभा अधिक सुहाया ॥
एक हंस जस षोडस भाना । अग्र वासना हंस अघाना ॥
सत्यपुरुष की ऐसी बाता । कोटिक शशी इक रोम लजाता ।।
एक रोम की शोभा ऐसी । और बदन की बरनौं कै सी ॥
अनगिनत चन्दा
जगत में, अनगिनत दरसें
सूर ॥
झलकें नूर सब, नूर नूर
भरपूर ॥
ऐसी शोभा लोक की, सत्य पुरुष की
कोटि चन्द की शीतलता, कोटि सूर्य का
सेज ॥
तेज ॥
कह रहे हैं कि परम-पुरुष के एक-एक रोम की महिमा इतनी है कि करोड़ों सूर्य और चंद्रमा लजा जाएँ। फिर पूरे शरीर की महिमा कैसे वर्णन करूँ !!
शब्द अखण्ड होत दिन राती । न कोई पूजा न कोई पाती ॥
ऐसी हकीकत को मैंने जाना । अरस कुरस नूर कोटि भानु साँच दरस, तेज मानु, रोम रोम पुंज देखा ॥ देखा । - गरीबदास जी