कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
प्रथम लम्बक ३
प्रथम लम्बक ३ प्रथम तरङ्ग¹ मंगलाचरण शिवजी की गोद में बैठी हुई पार्वती के दृष्टिपातों से मानो कामदेव द्वारा वेष्टित शिवजी का श्यामलवर्ण कंठ आपको सम्पत्ति प्रदान करे ॥१॥ सन्ध्याकालीन नृत्य के समय आकाश में बिखरी हुई प्राचीन तारिकाओं को फूँक से हटाकर, सीत्कार के बिन्दुओं से मानो नवीन तारिकाओं की सृष्टि करते हुए गणेशजी आपकी रक्षा करें ॥२॥ मैं समस्त पदार्थों को प्रकाशित करने के लिए दीपशिखा (लौ) के समान सरस्वती भगवती को प्रणाम करके बृहत्कथा के सार का संग्रह करता हूँ ॥३॥ प्रस्तावना इस संग्रह में प्रथम लम्बक का नाम कथापीठ, उसके अनन्तर दूसरे का नाम कथामुख लम्बक और तीसरे का नाम लावान(ण)क लम्बक³ है ॥४॥ इसके अनन्तर नरवाहनदत्त नामक चतुर्थ लम्बक है। चतुर्दारिका लम्बक पाँचवाँ और मदनमञ्चुका लम्बक छठा है ॥५॥ इसके बाद रत्नप्रभा लम्बक सातवाँ और सूर्यप्रभ लम्बक आठवाँ है ॥६॥ इसके बाद नवाँ अलङ्कारवती लम्बक दसवाँ सम्बक शक्तियशा और इसके अनन्तर ग्यारहवाँ वेला नामक लम्बक है ॥७॥ इसके पश्चात् बारहवाँ शशांकवती लम्बक तेरहवाँ मदिरावती लम्बक चौदहवाँ महा- भिषेकवती लम्बक और पन्द्रहवाँ पंच लम्बक है ॥८॥ इसके अनन्तर सोलहवाँ सुरतमंजरी लम्बक सत्रहवाँ पद्मावती लम्बक तथा अठारहवाँ विषमशील नामक लम्बक है ॥९॥ मूल बृहत्कथा में जो कुछ है उसी का इस ग्रंथ में संग्रह किया गया है। मूलग्रन्थ से इसमें तनिक भी अन्तर नहीं है। हाँ विस्तृत कथाओं का संक्षिप्तमात्र किया गया है और भाषा का भेद है (उसकी भाषा पैशाची थी और इसकी संस्कृत है) । १० ।। मैंने यथासम्भव मूलग्रन्थ की औचित्य-परम्परा की रक्षा की है और कुछ नवीन काव्यांगों की योजना करते हुए भी मूलकथा के रस का विघात नहीं होने दिया है ॥११॥ मुझसे यह ग्रन्थ-निर्माण-प्रयत्न पाण्डित्य-प्रसिद्धि के लोभ से नहीं किया गया है किन्तु अनेक लम्बी कथाओं के जाल को स्मरण रखने की सुविधा से किया गया है ॥१२॥ १ तरङ्गों की रचना कथासरित्सागर के रचयिता श्रीसोमदेवभट्ट ने अवान्तर कथाओं के विभाग के लिए की है। मूल कथा में तरङ्ग नाम का विभाग नहीं था क्योंकि तरङ्ग शब्द का सम्बन्ध सागर के साथ उपयुक्त होता है। २ कथासरित्सागर में कामदेव के अवतार नरवाहनदत्त का चरित्र और उसका विजय वर्णित है। अतः कवि ने मंगलाचरण में ही काम की विजय की सूचना दी है। ३ सोमदेव ने लम्बकों का जो क्रम प्रदर्शित किया है, वह मूल बृहत्कथा के ही अनु- सार है, या स्वतन्त्र इसका निश्चय नहीं है। इससे पूर्व महाकवि क्षेमेन्द्र ने 'वृहत्कथामंजरी' के नाम से बृहत्कथा का जो भाषान्तर किया है उसमें लम्बकों का क्रम सागर से भिन्न है। इसका विवरण भूमिका में देखिए ।—अनु.
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर शिवपार्वतीसंवादः अस्ति किन्नर-गन्धर्व-विद्याधर-निषेवितः। चक्रवर्ती गिरीन्द्राणां हिमवानिति विश्रुतः ॥१३॥ माहात्म्यमियतीं भूमिमारूढं मन्ये भूभृताम्। यद्भवानी सुताभावं त्रिजगज्जननी गता ॥१४॥ उत्तरं यस्य शिखरं कैलासाख्यो महागिरिः। योजनानां सहस्राणि बहून्याक्रम्य तिष्ठति ॥१५॥ मन्दरो मथितेऽप्यम्भौ न सुधा-सिततां गतः। अहं त्वमलादिति या हसतीव स्वकान्तिभिः ॥१६॥ धराधरगुरुस्तत्र निवसन्त्यम्बिकासखः। गजैर्विद्याधरैः सिद्धैः सेव्यमानो महेश्वरः ॥१७॥ पिङ्गोत्तुङ्ग-जटाजूट-गतो यस्याश्नुते नवः। सन्ध्यापिञ्जर-पूर्वाद्रि शृङ्ग-सङ्ग-सुखं शशी ॥१८॥ येनान्धकासुरपतेरेकस्यार्पयता हृदि। शूलं त्रिजगतोऽप्यस्य हृद्व्यथैचित्रमुद्धतम् ॥१९॥ चूडामणिषु यत्पादनखाग्रप्रतिबिम्बिताः। प्रसादप्राप्तचन्द्राली इव भान्ति सुरासुराः ॥२०॥ स कदाचित्समुत्पन्न-विश्रम्भा रहसि प्रिया। स्तुतिभिस्तोषयामास भवानीपतिमीश्वरम् ॥२१॥ तस्याः स्तुतिवशात्तुष्टस्तामङ्कमधिरोप्य सः। किं ते प्रियं करोमीति बभाषे शशिशेखरः ॥२२॥ ततः प्रोवाच गिरिजा प्रसन्नोऽसि यदि प्रभो। रम्यां काञ्चित्कथां ब्रूहि देवाद्य मम नूतनाम् ॥२३॥ भूतं भवद् भविष्यद् वा किं तत्स्याज्जगति प्रिये। भवती यन्न जानीयादिति शर्वोऽप्युवाच ताम् ॥२४॥ ततः सा वल्लभा तस्य निर्बन्धमकरोत्प्रभोः। प्रियप्रणयहुंकारि यतो मानवतीमनः ॥२५॥ ततस्तच्चाटुमुग्धैश्च तत्प्रभावानियम्यनाम्। तस्याः स्वस्यां कथा मेव शिवः सम्प्रत्यवर्णयत् ॥२६॥ अस्ति मामीशितुं पूर्वं ब्रह्मा नारायणस्तथा। महीं भ्रमन्तो हिमवत्पादमूलमथापतुः ॥२७॥
प्रथम लम्बक ५
प्रथम लम्बक ५ शिव और पार्वती का संवाद किन्नर, गन्धर्व और विद्याधरों की निवासभूमि तथा समस्त कुलपर्वतों का सम्राट् हिमालय पर्वत प्रसिद्ध है॥१३॥ पर्वतों में इस हिमालय का माहात्म्य इतना बड़ा-चढ़ा है कि साक्षात् त्रिजगज्जननी पार्वती उसकी पुत्री बनीं ॥१४॥ इस हिमालय का उत्तर शिखर कैलास नाम से प्रसिद्ध है, जो सहस्रों योजन के भू-भाग को आक्रान्त करके फैला है॥१५॥ यह कैलास-शिखर, अपनी धवल-धवल कान्ति से मन्दराचल को हँसता है कि उसके द्वारा क्षीर-समुद्र का मन्थन होने पर भी वह मेरे समान सुधा-धवल न हो सका और मैं बिना प्रयत्न के ही शुभ्र हूँ ॥१६॥ उस कैलास शिखर पर, स्थावर-जंगम सृष्टि के स्वामी विद्याधरों और सिद्धों से सेवित महेश्वर नित्य पार्वती के साथ निवास करते हैं॥१७॥ जिस शिवजी के पीतवर्ण एवं ऊँचे जटामूट पर स्थित अभिनव चन्द्रमा उदयाचल के सन्ध्याकालीन पीतवर्ण की शोभा धारण करता है॥१८॥ जिस शिवजी ने अन्धकासुर के हृदय में शूल भौंकते हुए एक साथ ही तीनों लोकों के हृदय से शूल को सदा के लिए निकाल दिया ॥१९॥ जिस शिव के चरणों में प्रणाम करने के कारण मुकुटमणियाें में नख के अग्रभाग के प्रतिबिम्बित होने के कारण सुर और असुर-राज ऐसे मालूम होते हैं कि उन्हें प्रसाद-रूप में अर्धचन्द्र प्राप्त हुआ हो॥२० ॥ किसी समय लोकनाथ स्वामी को एकान्त में बैठे देखकर उनकी प्राणवल्लभा पार्वती ने उन्हें स्तुतियों से प्रसन्न किया॥२१॥ पार्वती के स्तुति-वचनों से प्रसन्न होकर, अतः उन्हें गोद में बैठाकर चन्द्रशेखर शिवजी ने पूछा 'कहो मैं तुम्हारे लिए कौन-सा प्रिय कार्य करूँ' ॥२२॥ तब पार्वती ने कहा—'स्वामिन् हे देव यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो कोई नवीन कथा सुनाओ' ॥२३॥ यह सुनकर शिवजी ने कहा—'प्रिये संसार में भूत वर्तमान और भविष्य की कौन-सी ऐसी बात है जिसे तुम न जानती हो' ॥२४॥ इतना कहने पर भी शिववल्लभा पार्वती ने स्वामी से पुनः कथा सुनाने का आग्रह किया क्योंकि मानिनी स्त्रियों का मन सदा ही प्रियपति के प्रणय की अभिलाषा रखता है॥२५॥ शिवजी ने पार्वती का आग्रह देखकर उसे प्रसन्न करने की दृष्टि से उसी (पार्वती) के सम्बन्ध की स्वस्य कथा का वर्णन किया॥२६॥ एक बार ब्रह्मा और नारायण मेरे दर्शन के लिए निकले और सारी पृथ्वी पर भ्रमण हुए हिमालय की उपत्यका में आये॥२७॥
ततो ददृशतुस्तञ्च ज्वलल्लिङ्गं महत्पुरः। तस्यान्तमीक्षितुं प्रायादेक ऊर्ध्वमथोऽपरः॥२८॥ अलभ्यन्तो सपोभिर्मां तोषयामासतुश्च तौ। आविर्भूय मया चोक्तौ वरः कोऽप्यर्थ्यतामिति॥२९॥ तच्छ्रुत्वाब्रवीद् ब्रह्मा पुत्रो मेऽस्तु भवानिति। अपूज्यस्तेन जातोऽसावत्यारोहेण निन्दितः॥३०॥ ततो नारायणो देवः स वरं मामयाचत। भूयासं तव शुश्रूषापरोऽहं भगवन्निति॥३१॥ अतः शरीरीभूतोऽसौ मम जातस्त्वदात्मना। यो हि नारायणः सा त्वं शक्तिः शक्तिमतो मम॥३२॥ किं च मे पूर्वजायात्वमित्युक्तवसि शङ्करे। कथं ते पूर्वजायाऽहमिति बव्रे स्म पार्वती॥३३॥
पार्वत्याः पूर्वजन्मकथा
प्रत्युवाच ततो भर्गः पुरा दक्षप्रजापतेः। देवि! त्वं च तथान्याश्च बह्व्योऽजायन्त कन्यकाः॥३४॥ स मह्यं भवतीं प्रादाद्धर्मादिभ्यो पराश्च ताः। यज्ञे कदाचिदाहूतास्तेन जामातरोऽखिलाः॥३५॥ वर्जितस्त्वहमन्वंकस्ततोऽपृच्छ्यत स त्वया। किं न भर्त्ता ममाहूतस्त्वया तातोच्यतामिति॥३६॥ कपालमाली भर्त्ता ते कथमाहूयतां मखे। इत्युवाच गिरं सोऽथ त्वत्कर्ण-विष-सूचिकाम्॥३७॥ पापाद्यमस्माज्जातेन किं देहेन मयामुना। इति कोपात्परित्यक्तं शरीरं तत्प्रिये! त्वया॥३८॥ स च दक्षमरूस्तेन मन्युना नाशितो मया। ततो जाता हिमाद्रेस्त्वमम्बेक्ष्वङ्कुररूपा यथा॥३९॥ अथ स्मर तुषाराद्रिं तपोऽर्थेमहमागतः। पिता त्वा च नियुङ्क्ते स्म शुश्रूषायै ममातिथेः॥४०॥ तारकान्तक-सत्पुत्र-प्राप्तये प्रहितः सुरैः। सम्ध्याशङ्काशोऽविध्यन्मां तत्र दग्धो मनोभवः॥४१॥
प्रथम स्तबक ७ हिमालय की तटवर्ती भूमि में उन्होंने अपने सामने एक महान् ज्वालामय लिङ्ग को देखा। उसे देखकर और उसका अन्त देखने के लिए उन दोनों में से एक ऊपर की ओर और दूसरा नीचे की ओर चले ॥२८॥ जब वे दोनों ओर-छोर का पता न पा सके तब श्रान्त होकर तपस्या द्वारा उन्होंने मुझे प्रसन्न किया और मैंने भी उनके सामने प्रकट होकर कहा कि वर मांगो ॥२९॥ ऐसा सुनकर ब्रह्मा ने कहा कि आप मेरे पुत्र हों इसी कारण (ऐसा ऊँचा वर माँगने के कारण) निन्दित होकर ब्रह्मा अपूज्य हो गये ॥३०॥ तब विष्णु ने मुझसे वर माँगा कि 'हे भगवन् ! मैं सदा तुम्हारी सेवा में तत्पर रह सकूँ' ऐसा वर दीजिए ॥३१॥ तभी से वे नारायण तुम्हारे रूप में उत्पन्न होकर मेरे अर्धाङ्ग बने। शक्तिमान् मेरी शक्ति स्वयं नारायण हैं ॥३२॥ और तुम पूर्व जन्म की मेरी पत्नी हो शंकरजी के ऐसा कहने पर पार्वती ने पूछा—'मैं पूर्व जन्म में तुम्हारी स्त्री कैसे हुई, यह बतलाओ' ॥३३॥ पार्वती के पूर्वजन्म की संक्षिप्त कथा तब शिव ने उत्तर दिया— 'देवि प्राचीनकाल में दक्ष प्रजापति की तुम और अनेक कन्याएँ उत्पन्न हुईं ॥३४॥ दक्ष ने तुम्हें मेरे लिए दिया और यम आदि अन्य देवताओं को दूसरी कन्याएँ प्रदान कीं। एक बार उसने अपने यज्ञ में अपने सभी जामाताओं को निमन्त्रित किया ॥३५॥ जब उसने मुझे नहीं बुलाया तब तुमने उससे पूछा कि 'हे पिता ! तुमने मेरे पति को क्यों नहीं बुलाया ? ॥३६॥ तब दक्ष ने कहा—'मुर्दों की माला पहननेवाले (अपवित्र) तुम्हारे पति को पवित्र यज्ञ में कैसे बुलाया जाय'। उनके यह शब्द तुम्हारे कानों में जहरीली सुई के समान चुभे ॥३७॥ पिता का उत्तर सुनकर 'इस पापी शरीर से क्या लाभ'—ऐसा सोचकर तुमने क्रोध से उस शरीर का परित्याग कर दिया ॥३८॥ हे देवि तुम्हारे शरीर-त्याग करने पर मैंने क्रुद्ध होकर उस दक्षयज्ञ का नष्ट कर दिया और उसके पश्चात् तुम हिमालय के घर में इस तरह उत्पन्न हुई जैसे क्षीर-समुद्र से चन्द्रकला उत्पन्न हुई थी ॥३९॥ देवि स्मरण करो उसके अनन्तर मैं हिमालय पर्वत पर तप करने के लिए आया और तुम्हें तुम्हारे पिता ने मुझ अतिथि की सेवा के लिए नियुक्त किया ॥४०॥ त्रिपुरासुर को मारने के लिए मेरे द्वारा पुत्र प्राप्त करने की इच्छा से देवताओं द्वारा प्रेरित कामदेव उस अवसर पर मुझसे हता किया गया था ॥४१॥
६ कथासरित्सागर
६ कथासरित्सागर ततस्तीव्रेण तपसा क्रीतोऽहं धीरया त्वया। तच्च तत्सङ्कथायैव मया सोढं तव प्रिये! ॥४२॥ इत्थं न पूजयाया त्वं किमन्यत्कथ्यते तव। इत्युक्त्वा विरते शम्भौ देवी कोपाकुलाऽब्रवीत् ॥४३॥ पार्वत्याः प्रणयकोपः धूर्तस्त्वं न कथां हृद्यां कथयस्यर्थितोऽपि सन्। गङ्गां बह्वमन्यन्त्यां विदितोऽसि न किं मम॥४४॥ सन्निरुध्या प्रतिपद्येस्या विहितानुनयो हरः। कथां कथयितुं दिव्यां ततः कोपं मुमोच सा॥४५॥ नेह कश्चित्प्रवेष्टव्यमित्युक्तेन तया स्वयम्। निरुद्धे नन्दिना द्वारे हरो वक्तुं प्रचक्रमे॥४६॥ पुनरपि कथोपक्रमः एकान्तसुखिनो देवा मनुष्या नित्यदुःखिताः। दिव्यमानुषचेष्टा तु परभागं न हारिणी॥४७॥ विद्याधराणां चरितमतस्ते वर्णयाम्यहम्। इति देव्या हरो यावद् वक्ति तावदुपागमत्॥४८॥ कथावसरे पुष्पदन्तप्रवेशः प्रसादयितुकः शम्भोः पुष्पदन्तो गणाग्रणीः। न्यषेधि च प्रवेशोऽस्य नन्दिना द्वारि तिष्ठता॥४९॥ निष्कारणं निषेधोऽद्य ममापीति कुतूहलात्। अलक्षितो योगशक्त्या प्राविशत् स तत्क्षणात्॥५०॥ प्रविष्टः श्रुतवान् सर्वं वर्ण्यमानं पिनाकिना। विद्याधराणां सप्तानामपूर्व चरिताद्भुतम्॥५१॥ श्रुत्वाथ गत्वा भार्यायै जयायै सोऽप्यवर्णयत्। विद्याधराणां सप्तानामपूर्व चरिताद्भुतम्॥५२॥ सापि तद्विस्मयाविष्टा गत्वा गिरिसुताग्रतः। जगौ जया प्रतीहारी स्त्रीषु वाक्संयमः कुतः॥५३॥ अतश्चुकोप गिरिजा नापूर्वं वर्णितं त्वया। जानाति हि जयाप्येतदिति शङ्करमभ्यधात्॥५४॥
प्रथम लम्बक ९
प्रथम लम्बक ९ कामदहन के उपरान्त धैर्यशालिनी तुमने कठोर तप करके मुझे खरीद किया और तुम्हारी प्राप्ति के लिए ही मैंने उसे सहन किया ।।४२।। इस प्रकार पूर्व जन्म में तुम मेरी पत्नी थी। अब और क्या कहूँ?” इतना कहकर शिवजी के चुप हो जाने पर क्रुद्ध पार्वती बोली ।।४३।। पार्वती का प्रथम-कोप तुम धूर्त हो मेरी प्रार्थना पर भी मनोहर कथा नहीं सुना रहे हो। तुम एक ओर गंगा को धारण किये हो और दूसरी ओर सन्ध्या का नमस्कार करते हो यह मैं जानती हूँ ।।४४।। पार्वती के व्यंग्य वचन सुनकर शिवजी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और दिव्य कथा सुनाने का वचन दिया। इससे पार्वती प्रसन्न हुई ।।४५।। शिवजी को उद्यत देखकर पार्वती ने स्वयं आज्ञा दी कि यहाँ कोई न आवे। आज्ञानुसार नन्दी के द्वारा प्रवेश बन्द कर देने पर शिवजी ने कथा कहना प्रारम्भ किया ।।४६।। गुप्त कथा का उपक्रम शिवजी कहने लगे— हे देवि देवता सदा सुखी रहते हैं और मनुष्य नित्य दुःखित रहते हैं। इसलिए उनके चरित्र उत्कृष्ट रूप से मनोहर नहीं होते। अतः मैं दिव्य और मानुष दोनों प्रकृतियों से मिश्रित विद्याधरों का चरित्र तुम्हें सुनाता हूँ। शिवजी यह कह ही रहे थे कि उसी समय उनका एक परम कृपापात्र उनका मनोरंजन करनेवाला गण पुष्पदन्त आ गया और द्वार पर बैठे हुए नन्दी ने उसे रोका ।।४७ ४८ ४९ ।। 'बिना कारण ही मेरे ऐसे अन्तरंग व्यक्ति का भी निषेध किया जा रहा है' इस कौतूहल के कारण पुष्पदन्त योगशक्ति द्वारा तुरन्त अन्दर पहुँच गया ।।५० ।। उसने अन्दर प्रवेश कर शिवजी द्वारा वर्णन किये जाते हुए सात विद्याधरों के अपूर्व और अद्भुत चरित्र सुने ।।५१।। पुष्पदन्त ने, शिवजी के मुख से सुनकर सात विद्याधरों के उस अद्भुत चरित्रों को जाकर अपनी पत्नी जया को सुनाया ।।५२।। पुष्पदन्त की पत्नी तथा पार्वती की सखी जया ने पति (पुष्पदन्त) से सुने हुए सात विद्याधरों के चरित्र को पार्वती को जा सुनाया। भला स्त्रियों में वाणी का संयम कहाँ सम्भव है ! ।।५३।। जया से यह कथा सुनकर पार्वती ने क्रोधपूर्वक शिवजी से कहा— तुमने कोई अपूर्व कथा मुझे नहीं सुनाई, इस कथा को तो जया भी जानती है' ।।५४।। २
प्रणिधानादथ ज्ञात्वा जगादेदमुमापतिः। भोगी भूत्वा प्रविश्येमां पुष्पदन्तस्तथाश्रुणोत् ॥५५॥
पुष्पदन्तं प्रति पार्वतीशाप
जयाय वर्णितं तन्न कोऽन्यो जानाति हे प्रिय ! श्रुत्वेत्यानामयद् देवी पुष्पदन्तमिति क्रुधा ॥५६॥ मर्त्यो भवाविनीतेति विह्वल तं शशाप सा। माल्यवन्तं च विज्ञप्तिं कुर्वाणं तत्कृते गणम् ॥५७॥
शापान्तकथनम्
निपत्य पादयोस्ताभ्यां जयया सह बोधिता। शापान्तं प्रति शर्वाणी शनैर्वचनमब्रवीत् ॥५८॥ विन्ध्याटव्यां कुबेरस्य शापात्प्राप्त पिशाचताम्। सुप्रतीकाभिधो यक्षः काणभूत्याख्यया स्थितः ॥५९॥ तं दृष्ट्वा संस्मरन् जातिं यदा तस्मै कथामिमाम्। पुष्पदन्त ! प्रवक्तासि तदा शापाद् विमोक्ष्यसे ॥६०॥ काणभूतः कथां तां तु यदा श्रोष्यति माल्यवान्। काणभूतो तदा मुक्तो कथां प्रख्याप्य मोक्ष्यसे ॥६१॥ इत्युक्त्वा शूलतनया व्यरमत्तो च तत्क्षणात्। विद्युन्मुच्छाविव गणौ दृष्टनष्टौ बभूवतुः ॥६२॥ अथ जातु माति काले गौरी पप्रच्छ शङ्करं सख्या। देव मया तौ शप्तौ प्रमथवरौ कुत्र भुवि जातौ ॥६३॥ अवदच्च चन्द्रमौलिः शोभावत्यस्ति या महानगरी। तस्यां स पुष्पदन्तो वररुचिनामा प्रिय ! जातः ॥६४॥ अन्यश्च माल्यवानपि नगरवरे सुप्रतिष्ठिताख्ये सः। जातो गुणाढ्यनामा देवि ! तयाऽप्य वृत्तान्त ॥६५॥ एव निशम्य स विभु गतानुवृत्तं मूरपावमाननं विभावन-सानुतापाम्। चम्पकताल-तट-वलयित कल्पवल्ली ऽऽशागृहषु दयितां रमयाञ्चकार ॥६६॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे कथापीठलम्बके प्रथमस्तरङ्गः।
प्रथम लम्बक ११
प्रथम लम्बक ११ शिवजी ने समाधि द्वारा वस्तुस्थिति को समझकर पार्वती से कहा— 'जब मैं तुम्हें कथा सुना रहा था उस समय पुष्पदन्त ने योग द्वारा अलक्षित रूप से अन्दर जाकर उसे सुना था अन्यथा जया कैसे जानती ? ॥५५॥ पुष्पदन्त और माल्यवान् को पार्वती का शाप प्रिये ! उसी पुष्पदन्त ने सारी कथा अपनी पत्नी जया को सुना दी। अन्यथा इस कथा को कौन जानता है। यह सुनकर पार्वती ने अत्यन्त क्रोध के साथ पुष्पदन्त को बुलवाया ॥५६॥ व्याकुल हुए पुष्पदन्त को तथा उसे क्षमा करने की प्रार्थना करते हुए माल्यवान् नामक गण को पार्वती ने शाप दिया कि तुम लोग मनुष्य-योनि में उत्पन्न हो ५७। शापान्त की घोषणा जब वे दोनों गण जया के साथ पार्वती के चरणों में गिरकर, क्षमा प्रार्थना करने लगे तब पार्वती ने शाप के अन्त की घोषणा करते हुए कहा—॥५८॥ सुप्रतीक नाम का यक्ष कुबेर के शाप से विन्ध्यारण्य में पिशाच बनकर रहता है जो काणभूति के नाम से प्रसिद्ध है ॥५९॥ हे पुष्पदन्त जब तुम उस काणभूति को देखकर अपने पूर्वजन्म का स्मरण करोगे और यह कथा उसे सुनाओगे तब शाप से मुक्त हो जाओगे ॥६०॥ यह माल्यवान् जब काणभूति से इस कथा को सुनकर प्रसारित करेगा तब काणभूति के मुक्त होने पर यह भी मुक्त हो जायेगा' ॥६१॥ ऐसा कहकर नग-नन्दिनी पार्वती चुप हो गई और वे दोनों गण उसी क्षण देखते-देखते ही अन्तर्धान हो गए ॥६२॥ तदनन्तर कुछ समय बीतने पर पार्वती ने करुणायुक्त होकर शिव से पूछा कि—'देव ! मुझसे शापित वे दोनों गण कहाँ उत्पन्न हुए ? ॥६३॥ तब चन्द्रशेखर शिव ने कहा— 'प्रिये ! कौशाम्बी नाम की जो महानगरी है उसमें पुष्पदन्त वररुचि के नाम से उत्पन्न हुआ है ॥६४॥ और वह माल्यवान् गण भी सुप्रतिष्ठित नाम के नगर में गुणाढ्य नाम से उत्पन्न हुआ है—यही उन दोनों का वृत्तान्त है' ॥६५॥ मघवान् शिव इस प्रकार कहकर, निरन्तर सेवा-निरत सेवकों के अपमान से सन्तप्त पार्वती का मनोविनोद करते हुए, कैलास-तट पर बने हुए कल्प-लता के कुंज-गृहों में निवास करने लगे ॥६६॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथामरित्सागर का कथापीठ लम्बर नामक प्रथम तरंग समाप्त। १ पांडव वंश के राजाओं ने हस्तिनापुर को छोड़कर 'कौशाम्बी' को अपनी राजधानी बनाया था। उस नगरी की स्थिति के सम्बन्ध में ऐतिहासिकों में मतभेद है। किन्तु आजकल यह सिद्धान्त प्रायः स्थिर है कि प्रयाग से दक्षिण १४ मील की दूरी पर स्थित 'कोसम' गांव ही प्राचीन कौशाम्बी है। यहाँ एक वृहत् नगर के अनेक ध्वंसावशेष मिले हैं। महात्मा बुद्ध ने भी यहाँ निवास किया था। पुरातत्त्व-विभाग द्वारा खुदाई करने पर प्राचीन नगरी के तथा बौद्ध-सम्बन्धी अवशेष प्राप्त हुए हैं।
२ कथासरित्सागर
२ कथासरित्सागर द्वितीयस्तरङ्गः वररुचेर्विन्ध्यवासिनीं प्रति गमनम् ततः स मर्त्यवपुषा पुष्पदन्तः परिभ्रमन्। नाम्ना वररुचिः किञ्च कात्यायन इति श्रुतः ॥१॥ पारं सम्प्राप्य विद्यानां कृत्वा नन्दस्य मन्त्रिताम्। खिन्नः समाययो द्रष्टुं कदाचिद् विन्ध्यवासिनीम् ॥२॥ तपसाराधिता देवी स्वप्नादेशेन सा च तम्। प्राहिणोद्विन्ध्यकान्तारं काणभूतिमवेक्षितुम् ॥३॥ व्याघ्रवानरसङ्कीर्ण निस्तोयपर्ण्यद्रुमे। भ्रमंस्तत्र च स प्रांशुं न्यग्रोधतरुमग्रतः ॥४॥ वररुचेः काणभूतिना समागमः ददर्श च समीपस्थं पिशाचानां शतैर्वृतम्। काणभूतिं पिशाचं तं वष्मणा साह्यसन्निभम् ॥५॥ स काणभूतिना दृष्ट्वा कृतपादोपसंग्रहः। कात्यायनो जगादेनमुपविष्टः क्षणान्तरे ॥६॥ सदाचारो भवानेव कथमेतां गतिं गतः। तच्छ्रुत्वा कृतसौहार्दः काणभूतिस्तमब्रवीत् ॥७॥ काणभूतिरचिता शिवोक्ता कथा स्वतो मे नास्ति विज्ञानं किं तु शर्वात्मया श्रुतम्। उन्मथिन्यां श्मशाने यच्छृणु तत्कथयामि वः ॥८॥ कपालेषु श्मशानेषु कस्माद्देव ! रतिस्तव। इति पृष्टस्ततो देव्या भगवानिदमब्रवीत् ॥९॥ पुरा कल्पक्षये वृत्तं जातं जलमयं जगत्। मया ततो विधिद्योश्च रक्तबिन्दुनिपातितः ॥१०॥ जलान्तस्तवभूदण्डं तस्मादण्डेभाकलात्पुमान्। निरगच्छत्ततः सृष्टा सर्गाय प्रकृतिर्मया ॥११॥ तौ च प्रजापतीनन्यान् सृजन्तौ प्रजाश्च ताः। अतः पितामहः प्रोक्तः स पुमाञ्जगति प्रिये ! ॥१२॥ एवं चराचरं सृष्ट्वा विश्वं दर्पमगादसौ। पुष्पदन्त मूर्धानमथतस्याहमच्छिदम् ॥१३॥
प्रथम लम्बक १३
प्रथम लम्बक १३ द्वितीय तरंग वररुचि (पुष्पदन्त) की कथा मानव-शरीर धारण किये हुए पुष्पदन्त नामक यक्ष वररुचि¹ एवं कात्यायन के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।।१।। समस्त विद्याओं का पूर्ण अध्ययन तथा सम्राट नन्द का मन्त्रित्व करके वह (कात्यायन) एक बार खिन्न होकर विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन करने के लिए आया ।।२।। तपस्या से आराधित विन्ध्यवासिनी देवी ने स्वप्न में वररुचि को एक आदेश दिया। उस आदेश के अनुसार वह काणभूति को देखने के लिए विन्ध्यारण्य में गया ।।३।। बाघ और वानरों से भरे हुए, जल-रहित एवं सूखे वृक्षों से व्याप्त उस विन्ध्यारण्य में उसने अत्यन्त ऊँचे और विस्तृत बरगद-वृक्ष को देखा ।।४।। पुष्पदन्त ने उस वटवृक्ष के पास सैकड़ों पिशाचों से घिरे हुए शालवृक्ष के समान लम्बे काणभूति को देखा ।।५।। काणभूति ने कात्यायन को देखकर उसके चरण छूकर प्रणाम किया और कुछ समय के उपरान्त विश्राम कर लेने पर कात्यायन ने काणभूति से पूछा ।।६।। 'हे काणभूते ! ऐसे सदाचारी होकर तुम ऐसी हीन गति को कैसे प्राप्त हुए ? कात्यायन के स्नेहपूर्ण प्रश्न को सुनकर काणभूति ने कहा ।।७।। मुझे स्वयं यह ज्ञात नहीं है कि मैं इस गति को कैसे प्राप्त हुआ किन्तु उज्जयिनी नगरी में—श्मशान में—शिवजी से जो मैंने सुना है वह तुम्हें कहता हूँ सुनो ।।८।। एक बार पार्वती के यह पूछने पर कि 'भगवन् ! कपाल-मुंडों से और श्मशानों से तुम्हें अधिक प्रेम क्यों है ?' शिवजी ने उत्तर दिया ।।९।। 'प्राचीनकाल में प्रलय उपस्थित होने पर सारा संसार जलमय हो गया था। उस समय मैंने अपनी जाँघ को चीरकर उस जल में रक्त की एक बूँद डाल दी ।।१०।। वह रक्त-बिन्दु जल के भीतर अंडे के रूप में परिणत हो गया। उसे फोड़ने पर उसमें से एक पुरुष निकला। उस पुरुष को देखकर सृष्टि के लिए मैंने प्रकृति की रचना की ।।११।। इस प्रकार उन दोनों ने अन्यान्य प्रजापतियों को उत्पन्न किया और उन प्रजापतियों ने अन्य प्रजाओं का उत्पादन किया। इसलिए, हे देवि ! वह प्रथम पुरुष सबसे पुराना होने के कारण जगत् में पितामह के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।।१२।। इस प्रकार चर और अचर-विश्व का सर्जन कर उस पुरुष को यह दर्प हो गया कि 'मैंने इतनी बड़ी रचना कर डाली। उसके दर्प से क्रुद्ध होकर मैंने उस पुराण-पुरुष का सिर काट डाला ।।१३।। १ वररुचि प्राचीन महावैयाकरण हैं। उसका दूसरा नाम कात्यायन भी है जो उसके गोत्र से सम्बन्ध रखता है। इस नाम के अनेक विद्वान् हुए हैं। इसका विवेचन परिशिष्ट प्रकरण में किया गया है।
२२ कथासरित्सागर
२२ कथासरित्सागर द्वितीयस्तरङ्गः वररुचेर्विन्ध्यवासिनी प्रति गमनम् ततः स मर्त्यवपुषा पुष्पदन्त परिभ्रमन्। नाम्ना वररुचि किञ्च कात्यायन इति श्रुतः ॥१॥ पारं सम्प्राप्य विद्यानां कृत्वा मन्त्रस्य मन्त्रिनाम्। खिन्नः समाययौ द्रष्टुं कदाचिद् विन्ध्यवासिनीम् ॥२॥ तपसाराधिता देवी स्वप्नावद्यान सा च तम्। प्राहिणोद्विन्ध्यकान्तारं काणभूतिमवेक्षितुम् ॥३॥ व्याघ्रवानरसङ्कीर्णं निस्तोयपरुषद्रुम। श्मशानं च स प्रांशु न्यग्रोधतरुमैक्षत ॥४॥ वररुचेः काणभूतिना समागमः ददर्श च समीपेऽस्य पिशाचानां शतवृतम्। काणभूतिं पिशाचं च वर्ष्मणा सालसन्निभम् ॥५॥ स काणभूतिना दृष्ट्वा कृतपाद्यापसंग्रहः। कात्यायनो जगादैनमुपविष्टः क्षणान्तरम् ॥६॥ सदाचारो भवानेवं कथमेतां गतिं गतः। उच्छ्रखा कृतसौहार्दं काणभूतिस्तमब्रवीत् ॥७॥ काणभूतिवक्त्रिता शिवोक्ता कथा स्वतो मे नास्ति विज्ञानं किं तु शर्वा गया श्रुतम्। उज्जयिन्यां श्मशाने यच्छृणु तत्कथयामि त ॥८॥ कपाल्यु श्मशानेषु कस्माद्देव ! रतिस्तव। इति पृष्टस्ततो देव्या भगवानिदमब्रवीत् ॥९॥ पुरा कल्पक्षये वृत्ते जातं जलमयं जगत्। मया ततो निमिषोदं रक्तबिन्दुनिपातितः ॥१०॥ अण्डान्तस्तदभूदण्डं तस्माद्देवाहृतात्पुमान्। निरगच्छत्तत सृष्टा सर्गाप प्रवृत्तिमया ॥११॥ तौ च प्रजापतीनन्यान सृष्टवन्तौ प्रजाश्च ते। अतः पितामहः प्रोक्तः स पुमा जगति प्रिये ! ॥१२॥ एवं चराचरं सृष्ट्वा विश्वं दर्पमगादसौ। पुरुषास्तन मूर्धानमथतस्याहमच्छिदम् ॥१३॥
प्रथम लम्बक १३
प्रथम लम्बक १३ द्वितीय तरंग वररुचि (पुष्पदन्त) की कथा मानव-शरीर धारण किये हुए पुष्पदन्त नामक गण वररुचि¹ एवं कात्यायन के नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥१॥ समस्त विद्याओं का पूर्ण अध्ययन तथा सम्राट् नन्द का मन्त्रित्व करके वह (कात्यायन) एक बार खिन्न होकर विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन करने के लिए आया ॥२॥ तपस्या से आराधित विन्ध्यवासिनी देवी ने स्वप्न में वररुचि को एक आदेश दिया। उस आदेश के अनुसार वह काणभूति का दर्शन के लिए विन्ध्यारण्य में गया ॥३॥ बाघ और वानरों से भरे हुए, फल-रहित एवं सूखे वृक्षों से व्याप्त उस विन्ध्यारण्य में उसने अत्यन्त ऊँचे और विस्तृत बरगद वृक्ष को देखा ॥४॥ पुष्पदन्त ने उस वटवृक्ष के पास सैकड़ों पिशाचों से घिरे हुए साक्षाद्यक्ष के समान स्तम्भ काणभूति को देखा ॥५॥ काणभूति ने कात्यायन को देखकर उसके चरण छूकर प्रणाम किया और कुछ समय के उपरान्त विश्राम कर लेने पर कात्यायन ने काणभूति से पूछा ॥६॥ 'हे काणभूते ! ऐसे सदाचारी होकर तुम ऐसी हीन गति को कैसे प्राप्त हुए ?' कात्यायन के स्नेहपूर्ण प्रश्न को सुनकर काणभूति ने कहा ॥७॥ मुझे स्वयं यह ज्ञात नहीं है कि मैं इस गति को कैसे प्राप्त हुआ किन्तु उज्जयिनी नगरी के—श्मशान में—शिवजी से जो मैंने सुना है, वह तुम्हें कहता हूँ, सुनो ॥८॥ एक बार पार्वती के यह पूछने पर कि 'भगवन् ! कपाल-मुंडों से और श्मशानों से तुम्हें अधिक प्रेम क्यों है ?' शिवजी ने उत्तर दिया ॥९॥ 'प्राचीनकाल में प्रलय उपस्थित होने पर सारा संसार जलमय हो गया था। उस समय मैंने अपनी जांघ को चीरकर उस जल में रक्त की एक बूँद डाल दी ॥१०॥ वह रक्त-बिन्दु जल के भीतर अण्ड के रूप में परिणत हो गया। उसे फाड़ने पर उसमें से एक पुरुष निकला। उस पुरुष को देखकर सृष्टि के लिए मैंने प्रकृति की रचना की ॥११॥ इस प्रकार उस दाता ने अष्टादश प्रजापतियों को जन्म दिया और उन प्रजापतियों ने अन्य प्रजाओं का उत्पादन किया। इसलिए, हे देवि ! वह प्रथम पुरुष सबसे पुराना होने के कारण जगत् में पितामह के नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥१२॥ इस प्रकार चर और अचर-विश्व का सर्जन कर उस पुरुष का यह दर्प हो गया कि 'मैंने इतनी बड़ी रचना कर डाली।' उसके दर्प से क्रुद्ध होकर मैंने उस पुराण-पुरुष का सिर काट डाला ॥१३॥ १. वररुचि प्राचीन महावैयाकरण हैं। उसका दूसरा नाम कात्यायन भी है जो उनके गोत्र से सम्बन्ध रखता है। इस नाम के अनेक विद्वान् हुए हैं। इसका विवेचन परिशिष्ट प्रकरण में दिया गया है।
१४ कथासरित्सागर
१४ कथासरित्सागर ततोऽनुतापेन मया महाव्रतमगृह्यत। अतः कपाल-पाणित्वं श्मशानप्रियता च मे ॥१४॥ किं यत्तन्मे कपालात्म जगद्देवि ! करे स्थितम्। पूर्वोक्ताण्डकपाले द्वे रोदसी¹ परिकीर्तिते ॥१५॥ इत्युक्ते शम्भुना तत्र श्रोष्यामीति सकौतुकम्। स्थितं मयि ततो भूयः पार्वती पतिमभ्यधात् ॥१६॥ स पुष्पदन्त नियतं बाह्यनात्मानुपश्यति। तदाकर्ण्याब्रवीद्देवी मामुद्दिश्य महेश्वरः ॥१७॥ पिशाचो दृश्यते योऽयमद्य यक्षवणानुगः। यक्षो मित्रमभून्नास्य रक्षः स्थूरशिरा इति ॥१८॥ सङ्गतं तन पापेन निरीक्ष्यैनं धनाधिपः। विन्ध्याटव्यां पिशाचत्वमादिशद् धनदेश्वरः ॥१९॥ भ्रात्रास्य दीर्घजङ्घेन पतित्वा पादयोस्ततः। शापान्तं प्रति विज्ञप्तो वदति स्म धनाधिपः ॥२०॥ शापावतीर्णादाकर्ण्य पुष्पदन्तान्महाकथाम्। उक्त्वा माल्यवते तां च शापात्प्राप्ताय मर्त्यताम् ॥२१॥ ताभ्यां गणाभ्यां सहितः शापेनेन तरिष्यसि। इतीह धनदेनास्य शापान्तो विनिश्चितस्तदा ॥२२॥ स्वया च पुष्पदन्तस्य स एवेति स्मरप्रिये। एतच्छ्रुत्वा वचः शम्भोः सहर्षोऽहमिहागतः ॥२३॥ इत्थं मे शापदोषोऽयं पुष्पदन्तागमावधिः। इत्युक्त्वा विरते तस्मिन् काणभूतो च तत्क्षणम् ॥२४॥ स्मृत्वा वररुचिर्जातिं सुप्तोत्थित इवावदत्। स एष पुष्पदन्तोऽहं मत्तस्तां च कथां शृणु ॥२५॥ इत्येवं ग्रन्थसंख्यानि सप्त सप्त महाकथाः। कात्यायनन कथिताः काणभूतिस्ततोऽब्रवीत् ॥२६॥ देव ! रुद्रावतारस्त्वं कोऽन्यो वेत्ति कथामिमाम्। त्वत्प्रसादाद् गतप्रायः स शापो मे शरीरतः ॥२७॥
१ द्यावापृथिव्यौ रोदस्यौ—इत्यमरः।
प्रथम लम्बक १७
प्रथम लम्बक १७ उस हत्या के लिए मम पश्चात्ताप हुआ और तब मैंने यह महान् व्रत धारण किया कि सबदा कपाल धारण करूँगा और श्मशान में निवास करूँगा ॥१४॥ हे देवि ! दूसरी बात यह भी है कि यह कपाल-रूपी समस्त संसार सदा मेरे हाथ में रहता है। पहले कहा हुआ अण्डा और यह कपाल दोनों ही आकाश और पृथ्वी कहे जाते हैं ॥१५॥ शिवजी के इस प्रकार कहने पर 'फिर मैं भी कौतूहल से सुनूँगा'—ऐसा सोच ही रहा था कि—पार्वती ने पुनः शंकरजी से कहा ॥१६॥ वह पुष्पवन्त गण कितने दिनों में लौटकर हमारे पास आवेगा ? —पार्वती का यह प्रश्न सुनकर महादेव ने मुझे लक्ष्य करके कहा ॥१७॥ यहाँ कुबेर का अनुचर, जो यह पिशाच दीख रहा है, उसका मित्र स्थूलशिरा नामक यक्ष है ॥१८॥ धनपति कुबेर ने उस यक्ष (काणभूति) का इस पापी राक्षस (स्थूलशिरा) की संगति में देखकर शाप दिया कि 'तू विन्ध्यारण्य में पिशाच बनेगा' ॥१९ ॥ इसके बड़े भाई वीर्यजंघ ने जब कुबेर के चरणों में पड़कर शाप का अन्त करने की प्रार्थना की तब कुबेर ने कहा ॥२० ॥ शाप से पृथ्वी पर अवतीर्ण पुष्पवन्त गण के द्वारा जब यह महाकथा को सुनेगा और इसी प्रकार शाप से मनुष्यता को प्राप्त कर माल्यवान् को समस्त कथा प्रदान करेगा (सुनाएगा ॥२१॥) तब उन दोनों शाप-मुक्त गणों के साथ इस काणभूति का भी शाप-मोचन होगा। इस प्रकार कुबेर ने शाप का अन्त किया ॥२२॥ ‘हे प्रिये ! काणभूति से मिलते ही पुष्पवन्त के शाप का अन्त हो जायगा ऐसा तुमने कहा था इसे स्मरण करो । शिव के इस वचन [को सुन कर मैं हर्ष के साथ यहाँ आया ॥२३॥ इस प्रकार मेरा शापबोध पुष्पवन्त के मिलने तक था । ऐसा कहकर काणभूति के मौन होने पर उसी समय पूर्वजन्म का स्मरण करके वररुचि मानों नींद से जगा और बोला—'मैं वही पुष्पवन्त हूँ। मुझसे वह कथा सुनो । ॥२४ २५॥ इस प्रकार कात्यायन ने सात लाख श्लोकों में सात महाकथाएँ काणभूति से कहीं । उन्हें सुनकर काणभूति ने कहा ॥२६॥ हे देव ! तुम सचमुच रुद्र के अवतार हो। उनके अतिरिक्त इन कथाओं को अन्य कौन जानता है। तुम्हारी कृपा से मेरे शरीर से पिशाचत्व का शाप निकल रहा है ॥२७॥
तद् ब्रूहि निजवृत्तान्तं जन्मनः प्रभृति प्रभो। मां पवित्रय भूयोऽपि न गोप्यं यदि मादृशे ॥२८॥ ततो वररुचिस्तस्य प्रशस्तस्यानुरोधतः। सर्वमाजन्मवृत्तान्तं विस्तरादिदमब्रवीत् ॥२९॥ कौशाम्ब्यां सोमदत्ताख्यो नाम्नाग्निशिख इत्यपि। द्विजोऽभूत्तस्य भार्या च यज्ञादत्ताभिधामवत् ॥३०॥ मुनिकन्या च सा शापात्तस्यां जाताभवत्त्वहम्। तस्यां तस्माद् द्विजवराद्येष जातोऽस्मि साम्प्रतं ॥३१॥ ततो ममातिबालस्य पिता पञ्चत्वमागतः। अतिष्ठद् वर्द्धयन्ती तु माता मां कृच्छ्रकर्मभिः ॥३२॥ अथाभ्यगच्छतां विप्रौ द्वावस्मद्गृहमेकदा। एकरात्रिनिवासात्थं दूराध्वपरिधूसरौ ॥३३॥ तिष्ठतांस्तत्र च तयोरभून्मुरजध्वनिः। तंन मामब्रवीन्माता भर्तुः स्मृत्वा सगद्गदम् ॥३४॥ नृत्यत्येष पितुर्मित्रं तव नन्दो नटः सुतः। अहमप्यवदं मातर्दृष्ट्वामद्व्रजाम्यहम् ॥३५॥ तवापि दर्शयिष्यामि सपाठं सर्वमेव तत्। एतन्मद्वचनं श्रुत्वा विप्रौ तौ विस्मयं गतौ ॥३६॥ अवोचतां च मन्मातां हा पुत्रौ! नात्र संशयः। सकृच्छ्रुतधरो बालः सर्वं च धारयेद्यदि ॥३७॥ जिज्ञासाधर्मयाभ्यां मे प्रातिशाख्य१मपाठ्यत। तथैव तन्मया सर्वं पठितं पश्यतोस्तयोः ॥३८॥ ततस्ताभ्यां समं गत्वा दृष्ट्वा नाट्यं तथैव तत्। गृहमत्याग्रतो मातुः समग्रं दर्शितं मया ॥३९॥ एवन्ध्रुतधरत्वेन मां निश्चित्य कथामिमाम्। व्याडिनामा तयोरेको मन्मातुः प्रजतोऽब्रवीत् ॥४०॥
१ वैदिकं व्याकरणम्। २ व्याडि२यं संग्रहह्वयस्य ग्रन्थस्य प्रणेता एतद् वि परिशिष्टे द्रष्टव्यम्।
प्रथम लम्बक १७
प्रथम लम्बक १७ इसलिए, हे भद्र ! तुम जन्म से लेकर आजतक का अपना समस्त वृतान्त यदि मुझ-जैसे व्यक्ति से गोपनीय न हो तो कहो और मुझे पुनः पवित्र करो ॥२८॥ इसके अनन्तर नम्रतापूर्वक अनुरोध करते हुए काणभूति से वररुचि ने विस्तारपूर्वक अपना वृतान्त कहना प्रारम्भ किया ॥२९॥ वररुचि की जन्म-कथा कौशाम्बी नगरी में सोमदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। उसे अग्निदत्त भी कहते थे। उसकी पत्नी का नाम वसुदत्ता था॥३० ॥ वसुदत्ता पूर्वजन्म में मुनि कन्या थी जो शाप के कारण मानव जाति में उत्पन्न हुई थी। उसी वसुदत्ता के गर्भ से मेरी उत्पत्ति हुई॥३१॥ मेरे शैशव में ही मेरे पिता परलोकवासी हो गये। अतः मेरी माता ने बड़े ही कष्टों के साथ मेरा पालन-पोषण किया॥३२॥ एक बार हमारे घर में लम्बे मार्ग-श्रम से श्रान्त दो ब्राह्मण एक रात निवास के लिए आये ॥३३॥ उनके हमारे यहाँ रहते हुए एक बार मृदंग की ध्वनि हुई। वह सुनकर मेरी माता अपने पति का स्मरण करके गद्गद स्वर में बोली ॥३४॥ 'बेटा ! तुम्हारे पिता का मित्र नन्द नाम का नट नाच रहा है। मैंने भी कहा 'माता ! मैं उसका नाच देखने जाता हूँ। ॥३५॥ मैं उसका नाच देखकर उसके अक्षरशः कथोपकथन के साथ अभिनय करते हुए तुम्हें भी दिखाऊँगा। मेरी यह बात सुनकर वे दोनों ब्राह्मण अति आश्चर्य्यान्वित हुए॥३६॥ उन्हें चकित देखकर मेरी माता बोली—'हे पुत्रो ! यह बालक एक बार जो कुछ सुन लेता है, उसे हृदय में धारण कर लेता है, इसमें कोई संशय नहीं' ॥३७॥ उन्होंने मेरी परीक्षा के लिए प्रातिशाख्य१ (वैदिक व्याकरण) पढ़ाया और मैंने उनके सामने ही उसे यथावत् सुना दिया॥३८॥ इसके अनन्तर मैंने उन दोनों के साथ जाकर नन्द नट का नाच देखा और घर आकर माता के सामने सम्पूर्ण नाटक वैसा ही दिखा दिया जैसा देखा था॥३९॥ एक बार सुनकर स्मरण रखनेवाला मुझे जानकर उन दोनों अतिथियों में एक व्याडि२ नामक ब्राह्मण मेरी माता को प्रणाम करके बोला ॥४० ॥
१ वैदिक व्याकरण का एक ग्रन्थ जिसमें उच्चारण-सम्बन्धी वैदिक व्याकरण के नियम लिखे हैं। २ व्याडि ने व्याकरण-शास्त्र पर संग्रह नामक महाग्रन्थ लिखा है। इसका विवेचन, परिशिष्ट प्रकरण में देखिए।—अनु ३
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर धेतसाख्ये पुरे मातॄदेवस्वामिकरम्भकौ। अभूतां भ्रातरौ विप्रावतिप्रीतौ परस्परम् ॥४१॥ तयोरेकस्य पुत्रोऽयमिन्द्रदत्तोऽपरस्य च। अह व्याडि समुत्पन्नो मत्पितास्तं गतस्ततः ॥४२॥ तच्छोकादिन्द्रदत्तस्य पिता यातो महापंथम्। अस्मज्जनन्योश्च ततः स्फुटितं हृदयं शुचा ॥४३॥ ततोऽनाथौ सति धनऽप्यावां विद्यानिकाङ्क्षिणौ। गतौ प्रार्थयितुं स्वामिकुमारं तपसा ततः ॥४४॥ तपःस्थितौ च तत्रावां स स्वप्ने प्रभुरादिशत्। अस्ति पाटलिकं नाम पुरं नन्दस्य भूपतेः ॥४५॥ तत्रास्ति चको वर्षाख्यो' विप्रस्तस्मादवाप्स्यथः। कृत्स्नां विद्यामतस्तत्र युवाभ्यां गम्यतामिति ॥४६॥ अथावां तत्पुरं यातौ पृच्छन्तौस्तत्र चावयोः। अस्तीह मूर्खो वर्षाख्यो विप्र इत्यवदज्जनः ॥४७॥ ततो दोलाधिरूढेन गत्वा चित्तेन तत्क्षणम्। गृहमावामपश्याव वर्षस्य विधुरस्थिति ॥४८॥ मूषकैः कृतवल्मीकं भित्तिविस्मृतसञ्चरम्। विच्छायं छविदा हीनं जन्मक्षत्रमिवापदाम् ॥४९॥ तत्र ध्यानस्थितं वर्षमालोक्याभ्यन्तरे तथा। उपागतौ स्वस्तत्पत्नी विहितातिथ्यसत्क्रियाम् ॥५०॥ धूसरक्षामवपुषं विशीर्णमलिनाम्बराम्। गुहरागागतां तस्य रूपिणीमिव दुर्गतिम् ॥५१॥ प्रणामपूर्वमावाभ्यां तस्य सोऽथ निवेदितः। स्ववृत्तान्तश्च तद्भर्तुर्मोक्ष्यवार्ता च या श्रुता ॥५२॥ पुत्रौ युवां मे का लज्जा शृणुतं कथयामि वाम्। इत्युक्त्वा सावयोः साध्वी कथामेतामवर्णयत् ॥५३॥ वर्षचरितम् शङ्करस्वामिनामात्र नगरेऽभूद्द्विजोत्तमः। मद्भर्त्ता चोपवर्षश्च तस्य पुत्राविभावुभौ ॥५४॥ १ इन्द्रदत्तविषयेऽपि परिशिष्टेऽवलोकनीयम्। २ वर्षोऽयं पाणिनेश्चाध्याप इति प्रवादः। तद्विषयेऽपि परिशिष्टे विवरणं द्रष्टव्यम्।
प्रथम लम्बक १९
प्रथम लम्बक १९ व्याडि की कथा हे माता ! वेतस नामक नगर में देवस्वामी और करम्भक नाम के दो ब्राह्मण भाई थे व परस्पर अत्यन्त प्रेमपूर्वक रहते थे ॥४१॥ उन दोनों में एक का पुत्र यह इन्द्रदत्त और दूसरे का पुत्र व्याडि नामक मैं हूँ। मेरे जन्म के पश्चात् मेरे पिता का देहान्त हो गया ॥४२॥ भाई के शोक से इन्द्रदत्त के पिता भी स्वर्ग को प्रयाण कर गये। पतियों के शोक से हम दोनों की माताओं के हृदय भी विदीर्ण हो गये—अर्थात् वे मर गईं ॥४३॥ इस प्रकार हम दोनों अनाथ हो गये। इस हाल पर भी विद्या-प्राप्ति की अभिलाषा से हमलोग तपस्या द्वारा स्वामी कार्तिक को प्रसन्न करने गये ॥४४॥ तपस्या करते हुए हमलोगों को स्वप्न में स्वामी कार्तिक ने आदेश दिया कि राजा नन्द का पाटलिपुत्र नामक एक नगर है ॥४५॥ उस नगर में वर्ष नाम का एक ब्राह्मण है। उसके समीप जाकर तुमलोग समस्त विद्याओं को प्राप्त कर सकते हो, अतः तुम दोनों वहीं जाओ ॥४६॥ ऐसा जानकर हम दोनों पाटलिपुत्र गये। वहाँ पूछने पर ज्ञात हुआ कि यहाँ वर्ष नाम का एक मूर्ख रहता है। ऐसा आश्चर्यजनक समाचार लोगों ने दिया ॥४७॥ तब भी संशयान्वित मन से उसी समय हमलोगों ने जाकर वर्ष के जीर्ण-शीर्ण और पुराने घर को देखा ॥४८॥ वर्ष का घर चूहे के बिलों और छविविहीन भित्तियों के कारण टूटे-फूटे छप्परों से भी हीन ऐसा लगता था मानो आपत्तियों का जन्मस्थान हो ॥४९॥ उस मकान के भीतर हमलोगों ने ध्यानमग्न वर्ष को देखा। उसके पश्चात् हम आतिथ्य सत्कार करनेवाली उसकी स्त्री के समीप गये ॥५०॥ भूरे और रूखे शरीरवाली फटे पुराने और मलिन वस्त्र पहिने हुए मतिमती धृति के समान उसकी स्त्री थी ॥५१॥ उसकी पत्नी को प्रणाम कर हमलोगों ने अपने आने का कारण और समाचार कहा और यह भी कह दिया कि सारे नगर में आपके पति मूर्ख-रूप में कुख्यात हैं ॥५२॥ हमारी बातें सुनकर वर्ष की पत्नी ने कहा—पुत्रो ! तुम मेरे पुत्र के समान हो। तुमसे लज्जा या संकोच करने की क्या आवश्यकता है। ऐसा कहकर उस पतिव्रता ने हमें यह कथा सुनाई ॥५३॥ वर्ष का चरित्र इस पाटलिपुत्र नगर में शङ्करस्वामी नाम का एक ब्राह्मण था। उसके दो पुत्र हुए, एक मेरा पति वर्ष और दूसरा उपवर्ष ॥५४॥
२ कथासरित्सागर
२ कथासरित्सागर
अथ मूर्खो दरिद्रश्च विपरीतोऽस्य चानुजः। तेन चास्य नियुक्ताभूत् स्वभार्या गृहपोषणी ॥५५॥ कदाचिदथ सम्प्राप्ता प्रावृट् तस्यां च योषितः। सगुडं पिष्टरचितं गृह्यकूपं जुगुप्सितम् ॥५६॥ कृत्वा मूर्खाय विप्राय ददत्यन्नं कृतं हि ताः। शीतकाल निवाणे च स्नानक्लप्तफलमापहम् ॥५७॥ दत्तं न प्रतिपद्यन्त इत्याचारो हि कुत्सितः। सद्येवरगृहिण्या मे दत्तमस्मै सदक्षिणम् ॥५८॥ तद्गृहीतवायमायातो मया निर्भर्त्सितो भृशम्। मूढभावकृतेनान्तर्मन्युना पर्यतप्यत ॥५९॥ सतु स्वामिकुमारस्य पादमूलं गतोऽभवत्। तपस्तुष्टेन तेनास्य सर्वा विद्या प्रकाशिता ॥६०॥ सकृच्छ्रुतधरं विप्रं प्राप्यतास्त्व प्रकाशय। इत्यादिष्टः स तेनैव सहर्षोऽप्यमिहागतः ॥६१॥ आगत्यैष च वृत्तान्तं सर्व मह्यं न्यवेदयत्। तदा प्रभृत्यविरतं जपन्मध्यास्य तिष्ठति ॥६२॥ अतः श्रुतधरं कञ्चिदन्विष्यनयतं युवाम्। तेन सर्वार्थसिद्धिवों भविष्यति न संशयः ॥६३॥ श्रुत्वैतद्वर्षपत्नीतःसूनं योगत्यहामये। दत्त्वा हेमशतं चास्य निर्गतौ स्वस्ततः पुरात् ॥६४॥ अथावां पृथिवीं भ्रान्तौ न च श्रुतधरः क्वचित्। लभ्यमानो तत श्रान्तौ प्राप्तावद्य गृहं तव ॥६५॥ एकश्रुतधरः प्राप्तो यासोऽयं तनयस्तव। तदनं देहि गच्छावो विद्याद्रविण¹-सिद्धये ॥६६॥ इति व्याडिबचः श्रुत्वा मन्माता सादराऽवदत्। मम सङ्गतमेवैतदस्यच प्रत्ययो मम ॥६७॥ तथाहि पूर्वं जातेऽस्मिन्नेकपुत्रे मम स्फुटा। गगनादवभून्मूर्द्धशरीरा सरस्वती ॥६८॥
१ विद्यारूपं यद् द्रविणं = धनं तस्य लाभायेत्यर्थः।