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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

उस (कंकण) पर राजा का नाम लिखा होने के कारण सिपाही उसे पकड़कर राजभवन में ले गये ॥८४॥ राजभवन में 'तुमने यह कड़ा कहाँ पाया' इस प्रकार शोक-संतप्त राजा सहस्रानीक ने उस सँपेरे से पूछा ॥८५॥ राजा के पूछने पर सँपेरे भील ने उदय पर्वत पर साँप पकड़ने से लेकर यहाँ तक का सारा वृत्तान्त राजा से कह सुनाया ॥८६॥ भील द्वारा यह समाचार जानकर और पत्नी के उस कंकण को पहचानकर राजा सहस्रानीक विचारों के हिंडोले में झूलने लगा ॥८७॥ 'राजन् ! तुम्हारा शाप नष्ट हो गया है। तुम्हारी रानी मृगावती पुत्र के साथ उदय पर्वत पर जमदग्नि के आश्रम में है। इस प्रकार की आकाशवाणी ने वियोग की अग्नि में जलते हुए राजा को इस प्रकार आनन्दित कर दिया जैसे ग्रीष्मकाल की बौछार मयूर को आनन्दित कर देती है ॥८८-८९॥ तदनन्तर प्रिया-मिलन की उत्कण्ठा से वीर्घीभूत उस दिन के किसी प्रकार बीतने पर दूसरे दिन प्रातःकाल बेचैन राजा सहस्रानीक प्रियतमा को प्राप्त करने के लिए उसी सँपेरे (भील) को पथ-प्रदर्शक बनाकर अपनी सेनाओं के साथ उदयाचल के आश्रम की ओर चला ॥९०॥ प्रथम तरग समाप्त

द्वितीय तरग

उस दिन राजा (सहस्रानीक) कुछ दूर रास्ता चलकर किसी जंगली तालाब के किनारे पड़ाव डालकर ठहर गया ॥१॥ उस शिविर में सन्ध्या के समय सेवा के लिए आये हुए घंटक नामक कथा कहने- (कहानी सुनाने) वाले सेवक १ से राजा ने कहा ॥२॥ मृगावती के मुखकमल का दर्शन करने के लिए उत्सुक मेरे मन को बहलानेवाली कोई कथा (कहानी) सुनाओ ॥३॥ तब घंटक ने कहा—'राजन् ! क्यों व्यर्थ संताप करते हो। शाप के नष्ट होते ही तुम्हारा महारानी के साथ समागम सुनिश्चित है ॥४॥ हे स्वामिन् ! जीवन में मनुष्य को अनेक संयोग और वियोग हुआ करते हैं। इस सम्बन्ध में तुमको मैं एक कहानी सुनाता हूँ सुनो ॥५॥


१ प्राचीन समय में राजाओं के यहाँ ऐसे सेवक होते थे जो रात के समय राजाओं के शरीर-पैर आदि दबाते हुए मनोरंजक कहानियाँ सुनाते थे ताकि राजा को शीघ्र और अच्छी नींद आ जाय। अनु

११२ कथासरित्सागर

११२ कथासरित्सागर धीदत्तभूतावृत्त्यो कथा मालवे यज्ञसोमाख्यो द्विजः कश्चिदभूत्पुरा। तस्य च द्वौ सुतौ साधोर्जायेते स्म जनप्रियौ ॥६॥ एकस्तयोरभून्नाम्ना कालनेमिरिति श्रुतः। द्वितीयश्चापि विगतभय इत्याख्यायाऽभवत् ॥७॥ पितरि स्वर्गते तौ च भ्रातरौ जीर्णशेषधनौ। विद्याप्राप्त्यै प्रयततुः पुरं पाटलिपुत्रकम् ॥८॥ तत्रैवोपार्तविद्याभ्यामुपाध्यायो निजे सुते। देवशर्मा ददौ ताभ्यां मृते विप्रो द्वयापरः ॥९॥ अथायान्वीक्ष्य तानाढ्यानगृहस्थानीयया धियम्। होमैः स साधयामास कालनेमिः कृतव्रतः ॥१०॥ सा च तुष्टा सती साक्षाद्देवः श्रीस्तमभाषत। भूरि प्राप्स्यसि वित्तं च पुत्रं च पृथिवीपतिम् ॥११॥ किञ्चन्ते चौरसदृशो वंशस्तव भविष्यति। हुतमग्नौ त्वया यस्मादनपक्लृप्तात्मना ॥१२॥ इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे लक्ष्मीः कालनेमिरपि क्रमात्। महाधनोऽभूल्लि... भास्य दिनं पुत्रोऽप्यजायत ॥१३॥ श्रीवरादेव सम्प्राप्त इति नाम्ना तमात्मजम्। श्रीदत्तमकरोत्सोऽपि पिता पूर्णमनोरथः ॥१४॥ क्रमात्स वृद्धिं सम्प्राप्तः धीदत्तो ब्राह्मणोऽपि सन्। अस्त्रेषु बाहुयुद्धेषु बभूवाप्रतिमो भुवि ॥१५॥ कालनेमेरथ भ्राता तीर्थार्थी सर्पभक्षिताम्। भार्यामुद्दिश्य विगतभयो देशान्तरं ययौ ॥१६॥ धीदत्तोऽपि गुणज्ञेन राज्ञा बल्लभशक्तिना। तत्र विक्रमशक्तौ स स्वपुत्रस्य कृतः सखा ॥१७॥ राजपुत्रेण तत्रास्य सहवासाद्भिमानिनः। यास्य दुर्योधननेव भीमस्यासीत्तरस्विनः ॥१८॥ द्वावेतस्याथ मित्रत्वं विप्रस्यावन्द्विधद्वजो। क्षत्रियो बाहुशाली च वयमुच्छ्रित्य जग्मतुः ॥१९॥ बाहुयुद्धजिताश्चान्ये दाक्षिणात्या गुणप्रियाः। स्वयंवरमुहुस्त्वेन मन्त्रिपुत्रास्तमाश्रयन् ॥२०॥

द्वितीय लम्बक १३३

द्वितीय लम्बक १३३ श्रीदत्त और मृगांकवती की कथा मालव देश में यज्ञसेन नाम का एक ब्राह्मण था। उस सज्जन ब्राह्मण के दो लोकप्रिय पुत्र थे ॥६॥ उनमें एक कालनेमि के नाम से और दूसरा विगतभय नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥७॥ पिता की मृत्यु के पश्चात् वे दोनों भाई बाल्यावस्था के अनन्तर विद्या प्राप्ति के लिए पाटलिपुत्र नगर को गये ॥८॥ वहाँ पर विद्या-प्राप्ति के अनन्तर उनके अध्यापक देवशर्मा ने मूर्त्तिमती विद्याओं के समान अपनी दो कन्याएं उन्हें दान दे दी ॥९॥ विवाह के अनन्तर कालनेमि ने अन्यान्य पड़ोसी गृहस्थों को अपने से अधिक धनवान् और सुखी देखकर ईर्ष्या के कारण होम के द्वारा नियमपूर्वक लक्ष्मी की आराधना प्रारम्भ की ॥१०॥ उसकी आराधना से प्रसन्न लक्ष्मी ने स्वयं प्रकट होकर प्रसन्नतापूर्वक उससे कहा कि तुम पर्याप्त धन और पृथ्वीपति पुत्र प्राप्त करोगे ॥११॥ किन्तु इतना सब होते हुए भी अन्त में तुम्हारा वध चोरों के समान होगा क्योंकि तुमने अग्नि में जो हवन किया है वह ईर्ष्या से कलुषितचित्त होकर किया है ॥१२॥ ऐसा कहकर लक्ष्मी अन्तर्धान हो गई और कालनेमि भी धीरे-धीरे महाधनी हो गया। कुछ दिनों बाद उसके एक पुत्र भी उत्पन्न हुआ ॥१३॥ श्री (लक्ष्मी) के वरदान से यह पुत्र उत्पन्न हुआ है, इसलिए उसका नाम श्रीदत्त रखा और पिता का मनोरथ पूर्ण हुआ ॥१४॥ श्रीदत्त ब्राह्मण होने पर भी क्रमशः बड़ा होने पर, अस्त्र-शस्त्र-विद्याओं में एवं मल्लयुद्ध में अद्वितीय हो गया ॥१५॥ कालनेमि का दूसरा भाई विगतभय पत्नी को सर्प के काट लेने के कारण उसकी सद्गति के निमित्त तीर्थयात्रा के लिए दूसरे देश को चला गया ॥१६॥ श्रीदत्त को धीर और वीर जानकर गुणग्राही राजा वल्लभशक्ति ने अपने पुत्र विक्रमशक्ति का मित्र बना दिया ॥१७॥ अत्यन्त अभिमानी राजपुत्र विक्रमशक्ति के साथ श्रीदत्त की मित्रता इस प्रकार हुई जैसे दुर्योधन के साथ भीमसेन की थी ॥१८॥ तदनन्तर अवन्ति-देश में उत्पन्न हुए बाहुशाली और वज्रमुष्टि नामक दो क्षत्रिय श्रीदत्त के मित्र बन गये ॥१९॥ मल्लयुद्ध में जीते हुए अन्यान्य गुणग्राही दक्षिण देशवासी तथा मंत्रियों के पुत्र श्रीदत्त के स्वयं मित्र बन गये ॥२०॥

११४ कथासरित्सागर

११४ कथासरित्सागर

महाबलव्याघ्रभटावुपेंद्रबल इत्यपि। सघा निष्ठुरको नाम सौहार्दं तस्य चक्रिरे ॥२१॥ कदाचिदथ वर्षासु विहर्तुं जाह्नवीतटे। श्रीदत्त सह तैर्मित्रै राजपुत्रसखी ययौ ॥२२॥ स्वभृत्यास्तत्र तं चक्रुर्निज राजसुतं नृपम्। क्रीडतोऽपि स तत्काल राजा मित्रैरकल्प्यत ॥२३॥ तावता जातोरोष राजपुत्रेण तेन सः। विप्रवीरो रणायाशु समाहूतो मदस्पृशा ॥२४॥ स तेन बाहुयुद्धेन श्रीदत्तेनाथ निर्जितः। चकार हृदि वध्यं तु वर्धमान कलङ्कित ॥२५॥ ज्ञात्वा च तमभिप्रायं राजपुत्रस्य शङ्कितः। श्रीदत्त सह तैर्मित्रैस्तत्समीपादपासरेत् ॥२६॥ उपसर्पंत्स चापश्यद् गङ्गामध्यगतां स्त्रियम्। ह्रियमाणां जलौघेन सागरस्यामिव श्रियम् ॥२७॥ सतदक्षावतारैतामुद्धर्तुं जलमध्यतः। पड्बाहुशालिप्रमुखांस्थापयित्वा तटे सखीन् ॥२८॥ तां च कक्षेष्वापे प्राप्तां निमग्नां दूरमम्भसि। अनुसर्तुं स्त्रियं सोऽपि वीरस्तत्रैव मग्नवान् ॥२९॥ निमज्ज्य च ददर्शात्र स श्रीदत्त क्षणादिति। शैव देवकुलं दिव्यं न पुम्वारि न स्त्रियम् ॥३०॥ तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यान्नतो नत्वा वृषध्वजम्। उद्याने सुन्दर तत्र तां निनाय विभावरीम् ॥३१॥ प्रातश्च देवमीशानं सा पूजयितुमागता। ददृशे तेन मूर्तेव रूपश्री स्त्रीगुणाश्विता ॥३२॥ ईश्वरं पूजयित्वा च सा ततो निजमन्दिरम्। ययाविन्दुमुखी सोऽपि श्रीदत्तोऽनुजगाम ताम् ॥३३॥ दन्तं मन्दिरं तच्च तस्या सुरपुरोपमम्। प्रविवेश च सम्भ्रान्तो सावमानच मानिनी ॥३४॥ माप्यसम्भाष्यमानच तमन्तर्वासवेश्मनि। तन्वी व्यषीदत्पर्यङ्के स्त्रीमत्स्योपसखिता ॥३५॥

द्वितीय लम्बक १३५

यहाँ पृष्ठ का मूल पाठ दिया गया है:

द्वितीय लम्बक १३५ महाबल, व्याघ्रभट, उपेन्द्रबल एवं निष्ठुरक आदि नाम के अनेक व्यक्ति धीदत्त के गुणों से आकृष्ट होकर उसके मित्र बन गये॥२१॥ एक बार वर्षा के दिनों में विहार करने के लिए राजपुत्र तथा ऊपर कहे गये मित्रों के साथ श्रीदत्त गंगा के तट पर गये॥२२॥ वहाँ जाकर विनोद-क्रीड़ा में राजकुमार विक्रमशक्ति के भृत्यों ने राजकुमार को राजा बनाया उसी समय श्रीदत्त के मित्रों ने भी उसे राजा बना दिया॥२३॥ इसी बीच मदोन्मत्त राजकुमार ने उस ब्राह्मण-वीर को युद्ध के लिए ललकारा॥२४॥ श्रीदत्त ने राजकुमार को मल्ल-युद्ध में जीत लिया। अतः क्रोध से भरे हुए राजकुमार ने उसे मार डालना चाहा॥२५॥ राजकुमार के अभिप्राय को जानकर श्रीदत्त अपने उन मित्रों के साथ उसका साथ छोड़कर दूर हट गया॥२६॥ हटते हुए श्रीदत्त ने गंगा के बीच जलप्रवाह से बहाई जाती हुई स्त्री को इस प्रकार देखा जैसे सागर लक्ष्मी को लिए जा रहा हो॥२७॥ धीदत्त उसे देखकर बाहुशाली आदि अपने छह मित्रों को तटपर नियुक्त करके उस स्त्री को जल से निकालने के लिए गंगा में उतर पड़ा॥२८॥ डूबती हुई स्त्री के केशों को पकड़कर भी धीदत्त ने उसे अधिक जल-गर्त में डूबी हुई देखकर स्वयं भी उसका अनुसरण किया अर्थात् उसके साथ ही डूब गया॥२९॥ डूबने पर धीदत्त ने क्षणभर में ही एक दिव्य शिव-मन्दिर देखा वहाँ न जल था और न वह स्त्री ही थी॥३०॥ इस महान् आश्चर्य को देखकर थके हुए धीदत्त ने शिवजी को प्रणाम करके उस सुन्दर उद्यान में वह रात्रि व्यतीत की॥३१॥ प्रातः उठकर धीदत्त ने देखा कि स्त्रीयूथ से युक्त साक्षात् लक्ष्मी के समान वह सुन्दरी शिवजी की प्रातःकालीन पूजा के लिए आई॥३२॥ वह रूपसुन्दरी शिवजी की पूजा करके अपने घर चली गई। साथ ही धीदत्त भी उसके पीछे-पीछे गया॥३३॥ उसने देव-भवन के समान उसके उस गृह को देखा। वह रूपमानिता-सी मानवती सुन्दरी सम्मुख द्वार से उस भवन में प्रविष्ट हुई॥३४॥ वह भी धीरता से बिना कुछ कहे ही उस भवन के भीतरी कमरे में जाकर अनेक स्त्रियों से घिरी हुई कन्या के पास बैठ गया॥३५॥

१६६ कथासरित्सागरे

१६६ कथासरित्सागरे धीवतोऽपि स सत्रैव निपसाद तदन्तिके। अथाकस्मात्प्रववृते तया साध्व्या प्ररोदितम्॥३६॥ निपेतु स्तनयोस्तस्याः सम्प्राप्ता बाष्पबिन्दवः। श्रीदत्तस्य च तत्काल कारुण्य हृदय गतम्॥३७॥ तत स चैनां पप्रच्छ का त्व दुःख च किं तव। वद सुन्दरि शक्तोऽह तन्निवारयितु यत ॥३८॥ तत कथञ्चित्सावादीद् वय दैत्यपतेर्बले । पौत्र्यो बभूविम तासां ज्येष्ठा विद्युत्प्रभत्यहम्॥३९॥ स नः पितामहो नीतो विष्णुना दीर्घबन्धनम्। पिता च बाहुयुद्धेन हतस्तनैव शौरिणा॥४०॥ तं हृत्वा तन च निजात्पुरान्निर्वासिता वयम्। प्रवेशरोधकृत्तत्र सिंहश्च स्थापितोऽन्तर॥४१॥ आवृत तत्पद तन दुःखन हृदय च नः। स च यक्षः कुबेरस्य शापात् सिंहत्वमागत ॥४२॥ मर्त्येश्चाभिभवस्तस्य शापान्त कथित पुरा। पुरप्रवेशोपायार्थं विज्ञप्तो विष्णुरार्ययात्॥४३॥ अत स द्वयुरस्माकं केशरी जीयतां त्वया। तदर्थमेव चानीतो मया वीर! भवानिह॥४४॥ मृगाङ्ककास्य खड्ग च जितात्तस्मादवाप्स्यसि। पृथिवीं यत्प्रभावेण जित्वा राजा भविष्यसि॥४५॥ तच्छ्रुत्वा स सधैर्येण धीदत्तोऽसीत्तदहिन। अन्यद्युर्वर्त्समन्यास्ताः कृत्वाग्रे तत्पुर ययौ॥४६॥ जिगाय बाहुयुद्धेन तत्र च सिंहमुद्धतम्। सोऽपि शापविमुक्त सन्बभूव पुरुषाकृतिः॥४७॥ दत्त्वा चास्मै स खड्गं स्वं तुष्टः शापान्तकारिण। सहासुराङ्गनादुःखमारेणावक्षन ययौ॥४८॥ सोऽथ सानुजया सार्धं श्रीदत्तो दैत्यकन्यया। बहिर्गतमिवामन्द तद्विवेश पुरोत्तमम्॥४९॥ मङ्गुलीय द्विपद्मं च सास्मै दैत्यसुता ददौ। तत सोऽत्र स्थितस्तस्यां साभिलाषोऽभवद्युवा॥५०॥

द्वितीय लम्बक १४७

द्वितीय लम्बक १४७ साथ जाता हुआ धीदत्त भी उसी पलंग पर उसके साथ ही बैठ गया। इसके उपरान्त उस खड़ी स्त्री ने सहसा रोना प्रारम्भ किया॥३६॥ उसके उष्ण अश्रुबिन्दु स्तनों पर गिरते गये इस प्रकार उसका रुदन देखकर धीदत्त के हृदय में दया आ गई॥३७॥ धीदत्त न उससे पूछा-'तुम कौन हो? तुम्हें क्या दुःख है? बताओ सुन्दरि ! मैं तुम्हारे दुःख को दूर करने में समर्थ हूँ'॥३८॥ तब उसने अत्यन्त कठिनता से कहा-'हम दैत्यराज बलि की एक सहस्र पुत्रियां हैं जिनमें सबसे बड़ी विद्युत्प्रभा मैं हूँ'॥३९॥ विष्णु ने मेरे पितामह (दादा) बलि को लम्बे बन्धन में डाल दिया है और हमारे पिता को मरुद्बुद्ध में मार डाला॥४०॥ मेरे पिता को मारकर उस विष्णु ने हम अपने नगर से निर्वासित कर दिया। साथ ही नगर में जाने की रोक के लिए बीच में एक सिंह को खड़ा कर दिया है॥४१॥ उस सिंह ने वह स्थान और हमारा हृदय दोनों आक्रान्त कर दिया। वह सिंह एक यक्ष है, जो कुबेर के शाप से सिंह बन गया है॥४२॥ जब पुर-प्रवेश के लिए हम लोगों ने विष्णु से प्रार्थना की तब उन्होंने इस यक्ष का शाप नष्ट होने की बात कही थी। (मनुष्य द्वारा इस सिंह की हत्या होगी तब इसका शाप नष्ट होगा) ॥४३॥ इसलिए तुम हमारे शत्रु उस सिंह को जीतो या मार डालो। हे वीर ! मैं तुम्हें इसीलिए यहाँ लाई हूँ॥४४॥ उस सिंह को मार डालने पर उससे मृगांक नामक खड्ग भी तुम्हें प्राप्त होगा जिसके प्रभाव से तुम पृथ्वी को जीतकर राजा बनोगे॥४५॥ ऐसा सुनकर और ठीक है यह कहकर धीदत्त ने वह दिन वहीं व्यतीत किया और अगले दिन उन दैत्य-कन्याओं को आगे करके उस नगर को गया॥४६॥ यहाँ पर उसने मल्लयुद्ध से उस सिंह को जीत लिया। वह सिंह भी शापमुक्त होकर पुरुष के आकार में बदल गया॥४७॥ शाप से छुड़ानेवाले धीदत्त पर प्रसन्न होकर उस पुरुष ने उसे एक तलवार दी और दैत्यकन्याओं के मुख के साथ ही अदृश्य हो गया॥४८॥ तदनन्तर धीदत्त छोटी बहनों के साथ उस दैत्य-कन्या को लिये हुए उस नगर में गया॥४९॥ दैत्य-कन्या ने धीदत्त को विषनाश करनेवाली एक अंगूठी दी। वहाँ रहते हुए युवा धीदत्त का हृदय उस दैत्य-कन्या की ओर आकृष्ट हुआ॥५०॥ १८

१४ कथासरित्सागर

१४ कथासरित्सागर एव निष्ठुरकाच्छ्रुत्वा पितरावनुशोच्य स। निदधे प्रतिसारास्यामिव खड्गे दृशं मुहु ॥६७॥ कालं प्रतीक्षमाणोऽथ वीरो निष्ठुरकान्वितः। प्रतस्थे तान् सखीन् प्राप्तुं स तामूज्जयिनीं पुरीम् ॥६८॥ भ्रामज्जनान्ते वृत्तान्तं सस्यूतस्तस्य च वर्णयन्। धीदत्तः स ददर्शैकां क्रोशन्तीमवलां पथि ॥६९॥ अबला भ्रष्टमार्गाहि मालवं प्रस्थितेति ताम्। ब्रुवन्तीं वयसा सोऽथ सह प्रस्थायिनीं व्यधात् ॥७० ॥ तया दयानुरोधाच्च स्त्रिया निष्ठुरकान्वितः। कस्मिंश्चिञ्छून्यनगरे दिनं तस्मिन्नुवास स ॥७१॥ तत्र रात्रावकस्माच्च मुक्तनिद्रो ददर्श ताम्। स्त्रियं निष्ठुरकं हत्वा हृष्टात मांसमश्नतीम् ॥७२॥ उत्तिष्ठत्समाकृष्य सोऽथ खड्गं मृगाङ्ककम्। सापि स्त्री राक्षसीरूपं घोरं स्वं प्रत्यपद्यत ॥७३॥ स च केशेषु जग्राह निहन्तुं तां निशाचरीम्। तत्क्षणं दिव्यरूपत्वं सम्प्राप्ता समुवाच सा ॥७४॥ मा मां वधीर्महाभाग मुञ्च नैवास्मि राक्षसी। अयमेवविधः शापो ममाभूत्कौशिका मुनेः ॥७५॥ तपस्यतो हि तस्याहं धनाधिपतिनामुना। विघ्नाय प्रेषिता पूर्वं तत्पदप्राप्तिकांक्षिणः ॥७६॥ तस्य कान्तेन रूपेण न क्षोभयितुमक्षमा। लज्जिता त्रासयन्त्यनमकार्षं भैरवं वपुः ॥७७॥ तद्दृष्ट्वा स मुनिः शापं सदृशं मय्यथो दधौ। राक्षसी भव पापे त्वं निघ्नन्ती मानुषानिति ॥७८॥ स्वतः केशग्रहे प्राप्ते शापान्तं मे स चाकरोत्। इत्यहं राक्षसीभावमिमं कष्टमुपागमम् ॥७९॥ मयैव नगरं ह्येतद् ग्रस्तमद्य च मे चिरात्। त्वया कृतः स शापान्तस्तद्गृहाणाधुना वरम् ॥८०॥ इति तस्या वचः श्रुत्वा धीदत्तः सादरोऽभ्यधात्। किमन्येन वरेणाद्य जीवत्वेष सखा मम ॥८१॥

द्वितीय लम्बक १४१

द्वितीय लम्बक १४१ निष्ठुरक की बातें सुनकर धीवत्त ने माता-पिता की मृत्यु पर शोक किया और मानों बदला लेने की भावना से अपनी आँखों को खड्ग पर डाला ॥६७॥ इसके पश्चात् प्रतिशोध के लिए अवसर की प्रतीक्षा करता हुआ धीवत्त निष्ठुरक को साथ लेकर अपने मित्रों से मिलने के लिए उज्जयिनी पुरी को गया ॥६८॥ गंगा में गोता लगाने के बाद का अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त मित्र निष्ठुरक को मार्ग में सुनाते हुए धीवत्त ने एक रोती हुई स्त्री को देखा ॥६९॥ 'मैं असहाय अबला हूँ मालव देश को जाती हुई मार्ग भूल गई हूँ'—उस अबला के ऐसा कहने पर धीवत्त ने दया करके उसे अपने साथ ले लिया ॥७०॥ दया और अनुरोध के कारण उस स्त्री और निष्ठुरक को साथ लेकर धीवत्त उस दिन किसी उजड़े हुए, वल्लभ शून्य नगर में ठहर गया ॥७१॥ इस यात्रा में एक दिन अकस्मात् रात को सोकर उठे हुए धीवत्त ने उस स्त्री को जो निष्ठुरक को मारकर उसका मांस खा रही थी देखा ॥७२॥ यह देखते ही धीवत्त मृगांक नामक खड्ग को खींचकर उसे मारने के लिए उठा। उधर उस स्त्री ने भी अपना रूप छोड़कर भीषण राक्षसी का रूप धारण कर लिया ॥७३॥ धीवत्त ने उस राक्षसी को मारने के लिए उसके केशों को पकड़ा तो इतने ही में वह राक्षसी का रूप छोड़कर दिव्य स्त्री का रूप धारण करके कहने लगी— ॥७४॥ "महाभाग! मुझे मत मारो। मैं राक्षसी नहीं हूँ। मुझे कौशिक ऋषि का शाप था ॥७५॥ जब कौशिक मुनि तपस्या कर रहे थे उस समय कुबेर ने मुझे उसकी तपस्या में विघ्न करने के लिए भेजा था क्योंकि वह कुबेर का पद पाने के लिए तपस्या कर रहा था ॥७६॥ इस सुन्दर रूप से मुनि को लुभाने में असमर्थ एवं लज्जित होकर उसे डराने के लिए मैंने यह भीषण रूप धारण किया ॥७७॥ मेरे राक्षसी-रूप को देखकर उस मुनि ने मुझे समुचित शाप दिया कि 'पापिन्! तू मनुष्यों को खाती हुई राक्षसी बन जा' ॥७८॥ उस ऋषि ने तुम्हारे द्वारा बालों के पकड़े जाने पर शाप का अन्त बताया था। इस प्रकार इस दुःखप्रद राक्षसीपन को प्राप्त हुई ॥७९॥ मैंने ही बहुत समय से इस नगर को ग्रस रखा है। आज तुमने मेरे शाप का अन्त कर दिया अतः अब तुम मुझसे वरदान ग्रहण करो' ॥८०॥ उसकी इस प्रकार बातें सुनकर धीवत्त ने आदर के साथ कहा— 'इस समय और दूसरा वर क्या माँगूँ? यह मेरा मित्र जी जाय यही वर दो' ॥८१॥

११८ कथासरित्सागरे

११८ कथासरित्सागरे साथ युक्त्या जगादैनं वाप्यां स्नानमितः कुरु। आदायैनं च मज्जस्व खड्गं ग्राहभयापहम् ॥५१॥ तथेति वाप्यां मग्नः सन् श्रीदत्तो जाह्नवीतटात्। तस्मादेव समुत्तस्थौ यस्मात्पूर्वमवातरत् ॥५२॥ खड्गाङ्गुलीयकं पश्यन्पातालादुत्थितोऽथ सः। विषण्णो विस्मितश्चासीद् वञ्चितोऽसुरकन्यया ॥५३॥ ततस्तान्सुहृदोऽन्वेष्टुं स्वगृहाभिमुखं ययौ। गच्छंश्चिष्टूरकाख्यं च मित्रं मार्गे ददर्श सः ॥५४॥ स चोपैत्य प्रणम्याथ नीत्वैकान्तं च सत्वरम्। तं पृष्टस्वजनोदन्तमेवं निष्ठुरकोऽब्रवीत् ॥५५॥ गङ्खान्तस्थां तदा भग्नमन्विष्य दिवसान्वहून। स्वशिरंसि शुचा छेत्तुमभूम वयनुद्यताः ॥५६॥ न पुत्राः साहस कार्य जीवन्नेष्यति वः सखा। इत्यन्तरिक्षाद् वाणी नस्तमुद्योगं न्यवारयत् ॥५७॥ ततश्च त्वत्पितुः पार्श्वमस्मासु प्रतिगच्छताम्। मार्गे सत्वरमभ्येत्य पुमानेकोऽब्रवीदिदम् ॥५८॥ नगरं न प्रवेष्टव्यं युष्माभिरिह साम्प्रतम्। यतो वल्लभशक्तिः स विपन्नोऽद्य महीपतिः ॥५९॥ दत्तो विक्रमशक्तिश्च राज्ये सम्भूय मन्त्रिभिः। प्राप्तराज्यः स चान्वेषु कालनेमेरगाद् गृहम् ॥६०॥ धीमन् क्व स ते पुत्र इति क्षामपनिर्भरैः। घस्रैरुच्छ्रसंश्चाप्येनं प्राह वेद्मीत्यथापतत् ॥६१॥ प्रच्छादितोऽमुना पुत्र इति तं निपूदितः। कालनेमिः स शूखायां राज्ञा चौर इति क्रुधा ॥६२॥ तद्दृष्ट्वा तस्य भार्यायाः स्वयं हृदयमस्फुटत्। पापं पापानुरागेणक्रूरं हि क्रूरकर्मणाम् ॥६३॥ तन चान्विष्यते द्रष्टुं सोऽपि विक्रमशक्तिना। धीदत्तस्तद्वयस्याश्च यूयं तद्गम्यतामितः ॥६४॥ इति तेनोदिताः पुंसा शोकार्तास्ते निजां भुवम्। बाहुपात्यान्य पञ्च सम्मन्त्र्योज्जयिनीं गताः ॥६५॥ प्रच्छन्नस्यापिनाद्याहं स्वदद्यमिह तं मग। तदेहि तावद् गच्छावस्तत्रैव सुहृदन्तिकम् ॥६६॥

द्वितीय लम्बक १३१

द्वितीय लम्बक १३१ धीदत्त की भावना को समझकर दैत्य-कन्या ने उससे कहा कि 'तुम इस वापी में खड्ग को लेकर स्नान करो जिससे ग्राह का भय न रहे' ॥५१॥ दैत्य-कन्या के कथनानुसार उस वापी में गोता लगाते ही श्रीदत्त फिर उसी गंगा-तट पर जा निकला जहाँ से वह जल में उतरा था ॥५२॥ पाताल से गंगा-तट पर निकला हुआ धीदत्त खड्ग और अंगूठी को देखता हुआ दुःखी और चकित हो रहा था क्योंकि उस कन्या ने उसे पुनः यहाँ भेजकर ठग लिया ॥५३॥ गंगा-तट पर उन छोड़े हुए अपने मित्रों को ढूँढ़ने के लिए वह अपने घर की ओर चला। जाते हुए उसने निष्ठुरक नामक मित्र को मार्ग में देखा ॥५४॥ निष्ठुरक उसे देखकर उसके समीप आकर प्रणामपूर्वक उससे अपने मित्रों का समाचार पूछते हुए उसे एकान्त में ले जाकर बोला—॥५५॥ “तुम्हें उस समय गंगा में डूबा हुआ देखकर तुम्हारे शोक के कारण हम लोग अपने-अपने गले काटने के लिए उद्यत हुए ॥५६॥ ‘बेटो ! ऐसा साहस न करो’—इस प्रकार की आकाशवाणी ने हमारे गले काटने के प्रयत्न को रोक दिया ॥५७॥ जब तुम्हारे पिता के समीप समाचार कहने के लिए जाते हुए हम लोगों को मार्ग में मिलकर एक पुरुष ने इस प्रकार कहा—॥५८॥ ‘तुम लोगों को नगर में प्रवेश नहीं करना चाहिए। नगर का राजा वल्लभशक्ति इस समय मर गया है और उसके पुत्र विक्रमशक्ति को मन्त्रियों ने सम्मति करके राजा बना दिया है। विक्रमशक्ति राज्य पाते ही दूसरे दिन कालनेमि (तुम्हारे पिता) के घर पहुँचा और पूछा कि वह तुम्हारा बेटा श्रीदत्त कहाँ है ? उत्तर में कालनेमि ने कहा—कि ‘मैं नहीं जानता’ ॥५९ ६०-६१॥ ‘इसने अपने लड़के को छिपा दिया’—ऐसा अपराध लगाकर राजा विक्रमशक्ति ने क्रुद्ध होकर कालनेमि को फाँसी दे दी ॥६२॥ पति की इस परिस्थिति को देखकर उसकी स्त्री (तुम्हारी माता) का हृदय स्वयं फट गया। सच है क्रूर व्यक्तियों का पाप उनके लिए किये गये अन्यान्य पापों के कारण अत्यन्त क्रूर हो जाता है ॥६३॥ अब विक्रमशक्ति श्रीदत्त और उसके मित्रों को वध करने के लिए ढूँढ़ रहा है। इसलिए तुम लोग नगर में न जाकर और कहीं चले जाओ' ॥६४॥ इस प्रकार किसी नागरिक पुरुष के कहने पर शोक-सन्तप्त बाहुशाली आदि हम पाँचों मित्र परस्पर सम्मति करके अपनी मातृभूमि उज्जयिनी को चल गये। और तुम्हारे लिए मुझे छिपकर यहाँ रहने का आदेश दे गये। तो चलो उज्जयिनी में मित्रों के समीप चलें” ॥६५ ६६॥

१४ कथासरित्सागर

१४ कथासरित्सागर एवं निष्ठुरकाच्छ्रुत्वा पितरावनुशोच्य स। निदधे प्रतिनाराच्यामिव खड्गे दृशं मुहुः॥६७॥ काल प्रतीक्षमाणोऽथ वीरो निष्ठुरकान्वितः। प्रतस्थे तान् सखीन् प्राप्तुं स तामूज्जयिनीं पुरीम्॥६८॥ आमज्जनान्तं वृत्तान्तं सख्युस्तस्य च वर्णयन्। धीदत्तः स ददर्शाकां क्रोशन्तीमबलां पथि॥६९॥ अबला भ्रष्टमार्गाहि मालवं प्रस्थितेति ताम्। ब्रुवतीं वयया सोऽथ सह प्रस्थायिनीं व्यधात्॥७०॥ तया वयानुरोधाच्च स्त्रिया निष्ठुरकान्वितः। कस्मिंश्चिच्छून्यनगरे दिने तस्मिन्नुवास स॥७१॥ तत्र रात्रावकस्माच्च मुक्तनिद्रो ददर्श ताम्। स्त्रियं निष्ठुरकं हत्वा हृष्टां मांसमश्नतीम्॥७२॥ उदतिष्ठत्समाकृष्य सोऽथ खड्गं मृगाङ्ककम्। सापि स्त्री राक्षसीरूपं घोरं स्वं प्रत्यपद्यत॥७३॥ स च केशेषु जग्राह निहन्तुं तां निशाचरीम्। तत्क्षणं दिव्यरूपञ्च सम्प्राप्ता समुवाच सा॥७४॥ मा मां वधीर्महाभाग मुञ्च नैवास्मि राक्षसी। अयमेवविधः शापो ममाभूत्कौशिका मुनेः॥७५॥ तपस्यतो हि तस्याहं धनाधिपतिनामुया। विघ्नाय प्रहिता पूर्वं तत्पदप्राप्तिकांक्षिणः॥७६॥ तत कान्तेन रूपेण तं क्षोभयितुमक्षमा। लज्जिता त्रासयन्त्यन्यमकार्षं भैरवं वपुः॥७७॥ तद्दृष्ट्वा स मुनिः शापं सदृशं मय्यथो दधे। राक्षसी भव पापे त्वं निघ्नन्ती मानुषानिति॥७८॥ त्वत् केशग्रहे प्राप्ते शापान्तं मे स चाब्रवीत्। इत्यहं राक्षसीभावमिमं कष्टमुपागमम्॥७९॥ मयैवं नगरं यत्तद् ग्रस्तमद्य च मे चिरात्। त्वया कृतः स शापान्तस्तद्गृहाणाधुना वरम्॥८०॥ इति तस्या वचः श्रुत्वा धीदत्तः सादरमभ्यधात्। किमन्येन वरेणायं जीवत्वेष सखा मम॥८१॥

द्वितीय लम्बक १४१

द्वितीय लम्बक १४१ निष्ठुरक की बातें सुनकर धीदत्त ने माता-पिता की मृत्यु पर शोक किया और मानों ढाढस देने की भावना से अपनी आँखों को हृदय पर डाला ॥६७॥ इसके पश्चात् प्रतिशोध के लिए अवसर की प्रतीक्षा करता हुआ धीदत्त निष्ठुरक को साथ लेकर अपने मित्रों से मिलने के लिए उज्जयिनी पुरी को गया ॥६८॥ गंगा में गोता लगाने के बाद का अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त मित्र निष्ठुरक को मार्ग में सुनाते हुए धीदत्त ने एक रोती हुई स्त्री को देखा ॥६९॥ मैं असहाय अबला हूँ मालव देश को जाती हुई मार्ग भूल गई हूँ—उस अबला के ऐसा कहने पर धीदत्त ने दया करके उसे अपने साथ ले लिया ॥७०॥ दया और अनुरोध के कारण उस स्त्री और निष्ठुरक को साथ लेकर धीदत्त उस दिन किसी उजड़े हुए, अतएव शून्य नगर में ठहर गया ॥७१॥ इस यात्रा में एक दिन अकस्मात् रात को सोकर उठे हुए धीदत्त ने उस स्त्री को जो निष्ठुरक को मारकर उसका मांस खा रही थी देखा ॥७२॥ यह देखते ही धीदत्त मृगांक नामक खड्ग को खींचकर उसे मारने के लिए उठा। उधर उस स्त्री ने भी अपना रूप छोड़कर भीषण राक्षसी का रूप धारण कर लिया ॥७३॥ धीदत्त ने उस राक्षसी को मारने के लिए उसके केशों को पकड़ा तो इतने ही में वह राक्षसी का रूप छोड़कर दिव्य स्त्री का रूप धारण करके कहने लगी— ॥७४॥ "महाभाग ! मुझे मत मारो। मैं राक्षसी नहीं हूँ। मुझे कौशिक ऋषि का शाप था ॥७५॥ जब कौशिक मुनि तपस्या कर रहे थे उस समय कुबेर ने मुझे उनकी तपस्या में विघ्न करने के लिए भेजा था क्योंकि वह कुबेर का पद पाने के लिए तपस्या कर रहा था ॥७६॥ इस सुन्दर रूप से मुनि को लुभाने में असमर्थ एवं लज्जित होकर उसे डराने के लिए मैंने यह भीषण रूप धारण किया ॥७७॥ मेरे राक्षसी-रूप को देखकर उस मुनि ने मुझे समुचित शाप दिया कि 'पापिन् ! तू मनुष्यों को खाती हुई राक्षसी बन जा' ॥७८॥ उस ऋषि ने तुम्हारे द्वारा बालों के पकड़े जाने पर शाप का अन्त बताया था। इस प्रकार मैं इस दुःखप्रद राक्षसीपन को प्राप्त हुई ॥७९॥ मैंने ही बहुत समय से इस नगर को त्रस्त रखा है। आज तुमने मेरे शाप का अन्त कर दिया अतः अब तुम मुझसे वरदान ग्रहण करो" ॥८०॥ उसकी इस प्रकार बातें सुनकर धीदत्त ने आदर के साथ कहा— 'इस समय और दूसरा वर क्या माँगूँ ? यह मेरा मित्र जी जाय यही वर दो' ॥८१॥

१४९ कथासरित्सागर

१४९ कथासरित्सागर एवमस्त्विति सा चास्मै वरं दत्त्वा तिरोदधे। अक्षताङ्गः स चोत्तस्थौ जीवन्पिष्ठुरकः पुनः ॥८२॥ सेनेव सह च प्रातः प्रहृष्टो विस्मितश्च सः। ततः प्रतस्थे धीदत्तः प्राप चोज्जयिनीं क्रमात् ॥८३॥ तत्र सम्भावयामास सखीन्मार्गोन्मुखान्स तान्। दर्शनेन यथाकालो नीलकण्ठानिवाम्बुदः ॥८४॥ कृतातिथ्यविधिश्चासौ स्वगृहं बाहुशालिना। नीतोऽभूत् कथितशेषनिजवृत्तान्तकौतुकः ॥८५॥ तत्रोपचर्यमाणः सन् पितृभ्यां बाहुशालिनः। स उवास समं मित्रैः धीदत्तः स्वगृहे यथा ॥८६॥ कदाचित्सोऽथ सम्प्राप्ते मधुमासमहोत्सवे। यात्रामुपवनं द्रष्टुं जगाम सखिभिः सह ॥८७॥ तत्र कन्यां ददर्शैकां राज्ञः श्रीबिम्बकेः सुताम्। आगतामाकृतिमतीं साक्षादिव मधुश्रियम् ॥८८॥ सा मृगाङ्कवती नाम हृदयं तस्य तत्क्षणम्। विवेश दत्तमार्गेव दृष्ट्यास्य सविलासया ॥८९॥ तस्या अपि मुहुः स्निग्धा प्रथमप्रमदासिनी। न्यस्ता च प्रति दूतीव दृष्टिञ्चक्रे गतागतम् ॥९०॥ प्रविष्टां वृक्षगहनं तामपश्यंश्च क्षणात्। श्रीदत्तः शून्यहृदयो तिष्ठोऽपि न ददर्श सः ॥९१॥ ज्ञातं मया ते हृदयं सखे! मापहृतं वृथा। तदेहि तत्र गच्छावो यत्र राजसुता गता ॥९२॥ इत्युक्तश्चेङ्गितज्ञेन सुहृदा बाहुशालिना। तथेति स ययौ तस्याः सन्निकर्षं सुहृत्सखः ॥९३॥ हा कष्टमहिना दष्टा राजपुत्रीति तत्क्षणम्। आक्रन्द उदभूत्तत्र श्रीदत्तहृदयज्वरः ॥९४॥ विषघ्नमाङ्गुलीयं च विद्या च सुहृदोऽस्य मे। अस्तीति गत्वा जगदे कञ्चुकी बाहुशालिना ॥९५॥ स च तत्क्षणमभ्येत्य कञ्चुकी चरणानतः। निकटं राजदुहितुः धीदत्तमनयद्द्रुतम् ॥९६॥

द्वितीय लम्बक १४३

द्वितीय लम्बक १४३ 'ऐसा ही हो'—इस प्रकार वर देकर वह अन्तर्धान हो गई। और वह निष्ठुरक सम्पूर्ण अंगों से अक्षत रहकर जीवित हो उठा॥८२॥ प्रातःकाल चकित और प्रसन्न धीदत्त उठा और निष्ठुरक के साथ क्रमशः उज्जैन पहुँचा॥८३॥ उज्जैन जाकर उत्सुकतापूर्वक राह देखते मित्रों को उसने ऐसा आनन्दित किया जैसे मेघ मयूरों को आनन्दित करता है॥८४॥ अपने आश्चर्यपूर्ण समस्त वृत्तान्त को कहने के पश्चात् बाहुशाली विधिपूर्वक आतिथ्य सत्कार करके धीदत्त को अपने घर ले गया॥८५॥ वहाँ पर बाहुशाली के माता-पिता द्वारा अपने बालक के समान उनका प्रेम प्राप्त करता हुआ धीदत्त अपने घर के समान ही रहने लगा॥८६॥ किसी समय वसन्तोत्सव के अवसर पर धीदत्त अपने मित्रों के साथ किसी उद्यान में मेला देखने गया॥८७॥ वहाँ मेले में उसने राजा धीबिम्बट की कन्या को मूर्ति धारण करके आई हुई साक्षात् वसन्त-लक्ष्मी (शोभा) के समान देखा॥८८॥ तदनन्तर वह मृगाङ्कवती नाम की राजकुमारी विकसित नेत्रों के मार्ग से धीदत्त के हृदय में प्रवेश कर गई॥८९॥ राजकुमारी की प्रेममयी सरल दृष्टि भी दूती के समान धीदत्त के साथ यातायात करने लगी॥९०॥ घूमती-फिरती राजकुमारी के वृक्षों के झुरमुट में छिप जाने के कारण धीदत्त को विभ्रम होने लगा। उसे कुछ सूझता न था॥९१॥ 'मित्र! मैंने तुम्हारा हृदय जान लिया छिपायो नहीं आओ, इधर ही चलें जिधर राजकुमारी गई है'॥९२॥ ऐसा कहकर धीदत्त को उसका मित्र बाहुशाली राजकुमारी के समीप ले गया॥९३॥ इतने ही में वहाँ अरे रे राजकुमारी को साँप ने काट लिया—इस प्रकार कोलाहल सुनाई दिया जिसे सुनकर धीदत्त के हृदय में ज्वर-सा हो गया॥९४॥ इतने में बाहुशाली ने राजकुमारी के कंचुकी से कहा कि मेरे इस मित्र के पास विष दूर करनेवाली एक ओषधी है और यही विष उतारने का मंत्र भी जानता है॥९५॥ उसी समय वह कंचुकी धीदत्त के चरणों में झुककर प्रणाम करके धीदत्त को राजकुमारी के समीप ले गया॥९६॥

१४४ कथासरित्सागरः

१४४ कथासरित्सागरः सोऽपि तस्यास्तदङ्गुल्यां निक्षिपारङ्गुलीयकम्। ततो जजाप विद्यां च तेन प्रत्युज्जिजीव सा ॥९७॥ अथ सवजने दृष्टे धीदत्तस्तुतितत्पर। तत्रैव ज्ञातवृत्तान्तो राजा बिम्बचिराययौ ॥९८॥ सेनासौ सखिभि सार्धमगृहीताङ्गुलीयकः । प्रत्याजगाम धीदत्तो भवनं बाहुशालिनः ॥९९॥ तत्र तस्मै सुवर्णादि यत्प्रीतः प्राहिणोन्नृपः। तद्बाहुशालिनः पित्रे समग्रं स समर्पयत् ॥१०० ॥ अथ तां चिन्तयन्कान्तां स तथा पर्यतप्यत। यथा किङ्कर्यतामूढा वयस्यास्तस्य जज्ञिरे ॥१०१॥ ततो भावनिका नाम राजपुत्र्या प्रिया सखी। अङ्गुलीयार्पणव्याजात्तस्यान्तिकमुपाययौ ॥१०२॥ उवाच चाम मस्सख्यास्तस्याः सुभग! साम्प्रतम्। त्वं वा प्राणप्रदो भर्त्ता मृत्युर्वाप्येष निश्चयः ॥१०३॥ इत्युक्ते भावनिकया धीदत्तः स च सापि च। बाहुशाली च तेऽन्ये च मन्त्रं सम्भूय चक्रिरे ॥१०४॥ हरामो निभृतं युक्त्या राजपुत्रीमिमां वयम्। निवासहेतोर्गूप्तं च गच्छामो मधुरांमित ॥१०५॥ इति सम्मन्त्रित सम्यक्कार्यसिद्धय च संविदि। अन्योन्यं स्थापितायां सा ययौ भावनिका ततः ॥१०६॥ अन्यद्युर्बाहुशाला च वयस्यमितयाचत। वणिज्याव्यपदशन जगाम मधुरां प्रति ॥१०७॥ स गच्छन्स्थापयामाम वाहनानि पदे पदे। राजपुत्र्यभिमारार्थं गूढानि चतुराणि च ॥१०८॥ धीदत्तोऽपि ततः काञ्चिद्बहुहिम्ना सहितां स्त्रियम्। माम राजमुतावास पाययित्वा मधु न्यधात् ॥१०९॥ ततोऽत्र दीपोद्देशेन दत्वाग्नि वासवेश्मनि। प्रच्छन्नं भावनिकया निन्ये राजसुता बहिः ॥११०॥ तदाण तां च सम्प्राप्य धीदत्तः स बहिःस्थितः । प्राप्तप्रस्थितस्य निकटं प्राहिणोद् वाहनासिनः ॥१११॥ इतो मित्रद्वयं यास्या पश्चाद्भावनिका तया।

द्वितीय लम्बक १४५

द्वितीय लम्बक १४५ श्रीदत्त ने जाकर राजकुमारी की अँगुली में अंगूठी पहना दी और मंत्र भी पढ़ा। इससे वह पुनर्जीवित हो उठी ॥९७॥ राजकुमारी के स्वस्थ होते ही वहाँ एकत्र सभी व्यक्ति श्रीदत्त की प्रशंसा करने लगे। यह समाचार सुनकर राजा बिम्बकि भी वहाँ आ पहुँचा ॥९८॥ राजा के आने पर श्रीदत्त अपनी अंगूठी बिना लिये ही अपने मित्र बाहुशाली के साथ उसके घर लौट आया ॥९९॥ राजा बिम्बकि ने प्रसन्न होकर श्रीदत्त के लिए जो सोना आदि उपहार के रूप में भेजे थे उन्हें श्रीदत्त ने बाहुशाली के पिता को दे दिया ॥१००॥ तदनन्तर श्रीदत्त उस राजकुमारी के विरह में इतना व्याकुल रहने लगा कि उसके मित्र भी घबराकर किंकर्तव्यविमूढ़-से हो गये ॥१०१॥ कुछ समय के पश्चात् राजकुमारी की प्रिय सहेली भावनिका अंगूठी लौटाने के बहाने श्रीदत्त के समीप आई ॥१०२॥ और बोली- हे सौभाग्यशालिन् ! मेरी सहेली को प्राणदान करनेवाले तुम उसके स्वामी बनो अन्यथा उसकी मृत्यु हो जायगी इसमें सन्देह नहीं ॥१०३॥ भावनिका के इस प्रकार कहने पर श्रीदत्त भावनिका बाहुशाली तथा अन्य मित्र मिलकर गुप्त मंत्रणा करने लगे ॥१०४॥ हम लोग किसी भी उपाय से राजकुमारी का हरण कर लें और रहने के लिए गुप्त रूप से यहाँ से मथुरा चलें ॥१०५॥ कार्य सिद्धि के लिए इन लोगों की सम्मति में परस्पर ऐसा निश्चय करके भावनिका अपने घर लौट गई ॥१०६॥ दूसरे दिन अपने तीन मित्रों के साथ बाहुशाली व्यापार के बहाने मथुरा चला गया ॥१०७॥ उसने मथुरा जाते हुए मार्ग में स्थान-स्थान पर सवारी का प्रबन्ध करके राजकुमारी के आने के लिए चारों ओर से गुप्त प्रबन्ध किया ॥१०८॥ श्रीदत्त ने भी कन्या के साथ किसी परदेशी स्त्री को सायंकाल राजकुमारी के निवास-स्थान में ठहरा दिया ॥१०९॥ उधर भावनिका ने दीपक जलाने के बहाने से उस घर में आग लगा दी और गुप्त रूप से राजकुमारी को लेकर बाहर आ गई ॥११०॥ बाहर प्रतीक्षा करते हुए श्रीदत्त ने उसी समय अपने दो मित्रों के साथ राजकुमारी को आगे गये हुए बाहुशाली के समीप भेज दिया ॥१११॥ और, उसके पीछे (या साथ) भावनिका भी गई। १९

१४६ कथासरित्सागर

१४६ कथासरित्सागर सम्मन्दिरं च दग्धा सा धीवा स्त्री सुतया सह ॥११२॥ लोकस्तु तां सखीयुक्तां मेन दग्धां नृपात्मजाम्। प्रातश्च पूर्ववत्तत्र श्रीदत्तो ददृशे जनैः ॥११३॥ ततो रात्रौ द्वितीयायां स गृहीतमृगाङ्ककः। श्रीदत्तः प्रययौ पूर्वं प्रस्थितां तां प्रियां प्रति ॥११४॥ तया च रात्र्यातिक्रम्य दूरमध्वानमुत्सुकः। विन्ध्याटवीमथ प्राप स प्रातः प्रहरे गते ॥११५॥ तत्राधावनिमिषाक्षि पश्चादपि ददर्श तान्। सर्वान्निहाराभिहतान्सपद्मवनिकान् सखीन् ॥११६॥ ते च दृष्ट्वा निजगुस्तं सम्भ्रान्तमुपागतम्। मुषिताः स्मो निपत्याथ बह्वश्वारोहसेनया ॥११७॥ एकेन चाश्वारोहेण राजपुत्री भयाकुला। अस्मास्वतदवस्थेषु नीताश्वमभिरोप्य सा ॥११८॥ दूरं न यावन्नीता च तावद् गच्छानया दिशा। अस्माकमन्तिकं मा स्थाः सर्वषामभ्यधिका च सा ॥११९॥ इति तैः प्रेषितो मित्रैर्मुहुः पश्यन्निवृत्त सः। जवेन राजतनयां श्रीदत्तोऽनुससार ताम् ॥१२०॥ गत्वा सुदूरं लेभे च तामश्वारोहवाहिनीम्। युवानमेकं तन्मध्ये क्षत्रियं स ददर्श च ॥१२१॥ तेनोपरि तुरङ्गस्य गृहीतां तां नृपात्मजाम्। अपश्यच्च ययौ चास्य क्षत्रसूनोऽन्तिकं क्रमात् ॥१२२॥ सास्त्रेण राजपुत्रीं ताममुञ्चन्तं च पावतः। अश्वादाक्षिप्य दृषदि श्रीदत्तस्तमचूर्णयत् ॥१२३॥ तं हत्वा च तमेवाश्वमारुह्य निजघान तान्। अन्यान्यपि बहून्क्रुद्धानश्वारोहान् प्रभाववान् ॥१२४॥ हतशेषास्ततस्ते च तद्दृष्ट्वा तस्य तादृशम्। वीरस्यामानुषं वीर्यं पलाय्य त्रस्य युः ॥१२५॥ स चापि तुरगारूढो राजपुत्र्या तया सह। मृगाङ्कवत्या श्रीदत्तः प्रययौ तान् सखीन् प्रति ॥१२६॥ स्तोकं गत्वा च तस्याश्वः सङ्ग्रामे व्रणितो भृशम्। समाग्रस्यावतीर्णस्य पपात प्राप पञ्चताम् ॥१२७॥

द्वितीय लम्बक १४७

द्वितीय लम्बक १४७ इधर कुमारी के भवन में आग लगने से धीदत्त की भेजी हुई वह पायक-स्त्री कन्या के साथ जल गई॥११२॥ वहाँ के लोगों ने भावनिका के साथ राजकुमारी को जला हुआ समझ लिया और प्रातःकाल धीदत्त को वहाँ उपस्थित देखा॥११३॥ दूसरी रात को धीदत्त 'मृगांक' नामक खड्ग को हाथ में लेकर पहले से भागी हुई प्रिया (राजकुमारी) से मिलने के लिए चल पड़ा॥११४॥ उत्सुक धीदत्त रात में ही लम्बा रास्ता तै करके प्रातःकाल एक प्रहर व्यतीत होने पर विन्ध्याचल के घोर जंगल में जा पहुँचा ॥११५॥ धीदत्त ने प्रस्थान करते हुए पहले अशुभसूचक शकुन देखे और पीछे भावनिका के साथ आक्रमण से व्याकुल अपने मित्रों को देखा ॥११६॥ वे लोग घबराकर भागे हुए धीदत्त से बोले—'हम लोग बहुत बड़ी घुड़सवार-सेना द्वारा घेर लिये गये हैं॥११७॥ हम लोगों के घायल होने पर एक घुड़सवार सैनिक राजकुमारी को घोड़े पर बैठा कर ले भागा॥११८॥ अतः जबतक वे लोग दूर नहीं चले जाते तबतक इसी मार्ग से उस ओर जाओ। हम लोगों के पास न रहो। उस (राजकुमारी) की रक्षा प्रधान कर्त्तव्य है' ॥११९॥ इस प्रकार उन मित्रों का भेजा हुआ धीदत्त लौटकर वेग से घोड़ा दौड़ाता हुआ गया। कुछ ही दूर आगे उसने घुड़सवार-सेना को देखा और उसके बीच एक युवा क्षत्रिय को भी उसने देखा॥१२०-१२१॥ उस युवा द्वारा घोड़े पर चढ़ाकर पकड़ी हुई राजकुमारी को भी उसने देखा और क्रमशः उन दोनों के समीप आ गया॥१२२॥ शान्तिपूर्वक राजकुमारी को न छोड़ते हुए उस युवक को धीदत्त ने पैरों से खींचकर पत्थर पर दे मारा और घोड़े से गिराकर चूर-चूर कर दिया ॥१२३॥ उसने उसे मारकर और उसी के घोड़े पर सवार होकर अन्यान्य क्रुद्ध एवं भागते हुए उसके सिपाहियों को भी मारा। बचे हुए सिपाही धीदत्त के अमानुष पराक्रम को देखकर डर से इधर-उधर भाग गये॥१२४-१२५॥ अकस्मात् धीदत्त भी राजकुमारी मृगांकवती को साथ लेकर अपने मित्रों की ओर लौटा ॥१२६॥ कुछ दूर जाने पर लड़ाई में घायल हुआ उसका घोड़ा गिर गया। धीदत्त जब अपनी पत्नी को लेकर उससे उतरा तब वह घोड़ा मर गया ॥१२७॥

१४८ कथासरित्सागर

१४८ कथासरित्सागर तत्कालं चास्य सत्रेण सा मृगाङ्कवती प्रिया । त्रासायासपरिश्रान्ता तृषार्त्ता समपद्यत ॥१२८॥ स्नापयित्वा च तां तत्र गत्वा दूरमितस्ततः । जलमन्विष्यतश्चास्य सवितास्तमुपाययौ ॥१२९॥ ततः स लब्धेऽपि जले मार्गनाशवशाद् भ्रमन् । चक्रवाकवधूकूजां निनाय निशां वने ॥१३०॥ प्रातः प्राप च तत्स्थानं पतिताश्वोपलक्षितम् । न च तत्र क्वचित् कान्तां राजपुत्रीं ददर्श ताम् ॥१३१॥ ततः स मोहाद् विन्यस्य भुवि खड्गं मृगाङ्ककम् । वृक्षाग्रमारुहोन्नामवेक्षितुमितस्ततः ॥१३२॥ तत्क्षणं तेन मार्गेण कोऽप्यागच्छच्छबराधिपः । स चागत्यैव जग्राह वृक्षमूलान् मृगाङ्ककम् ॥१३३॥ तं दृष्ट्वापि स वृक्षाग्रादवतीर्यैव पृष्टवान् । प्रियाप्रवृत्तिमार्त्तं धीदस्तं शबराधिपम् ॥१३४॥ इतस्त्वं गच्छ मत्पल्लीं जाने सा तत्र ते गता । अह्रं तत्रैव चैष्यामि दास्याम्यसिमिमं च ते ॥१३५॥ इत्युक्त्वा प्रेषितस्तेन शबरेण स चोत्सुकः । धीवरस्तां ययौ पल्लीं तदीये पुरुषैः सह ॥१३६॥ श्रमं तावद् विमुञ्चेति तत्रोक्तः पुरुषैश्च सः । प्राप्य पल्लीपतेर्गेहं श्रान्तो निद्रां क्षणाद्ययौ ॥१३७॥ प्रबुद्धश्च ददर्श स्वौ पादौ निगडसंयुतौ । असम्यर्थद्गतौ कान्ताप्राप्त्युपायोधमाविव ॥१३८॥ अथ क्षण दरासुखां क्षणान्तरविभाविनीम् । दैवस्य च गतिं शोचन् तस्थौ शोचन् स तां प्रियाम् ॥१३९॥ एकदा तमुवाचास्य चटी मोषणिकामिषा । आगतोऽसि महाभाग कुनेहं बत मृत्यवे ॥१४०॥ कार्यसिद्धय स हि क्वापि प्रयातः शबराधिपः । आगत्य चण्डिकायास्त्वामुपहारीकरिष्यति ॥१४१॥ एतदर्थं हि तेन त्वमितो विन्ध्याटवीतलात् । प्राप्य युक्त्या विसृज्येह नीतः सम्प्रति बन्धनम् ॥१४२॥