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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

अथ वासवदत्तास्याश्चक्रे देव्याः प्रसङ्गतः। अम्लानमालातिलको वत्सेशात्पूर्वशिक्षितौ ॥३१॥ तद्भूषितां च दृष्ट्वा तां माता पद्मावतीं रहः। पप्रच्छ मालातिलको केनेमौ निर्मिताविति ॥३२॥ ऊचे पद्मावती चेनामत्र मन्मन्दिरे स्थिता। लाविडावन्तिका नाम तया कृतमिदं मम ॥३३॥ तच्छ्रुत्वा सा बभाषे तां मातापुत्रि ! न सा हि सा। मानुषी कापि देवी सा यस्या विज्ञानमीदृशम् ॥३४॥ देवता मुनयश्चापि वञ्चनार्थं सतां गृहं। तिष्ठन्त्येव सथा चैतामत्र पुत्रि ! कथां शृणु ॥३५॥ कुन्तीकथा बभूव कुन्तिभोजाख्यो राजा तस्यापि वेश्मनि। आगत्य तस्थौ दुर्वासा वञ्चनैकरसो मुनिः ॥३६॥ स तस्य परिचर्यार्थं राजा कुन्तीं निजां सुताम्। आदिवेश मुनिं सापि यत्नेनोपचचार तम् ॥३७॥ एकदा स मुनिः कुन्तीं जिज्ञासुः सन्नभाषत। परमान्नं पचे शीघ्रं स्नात्वा यावदुपाम्यहम् ॥३८॥ इत्युक्त्वा त्वरितं स्नात्वा स परिभोक्तुमाययौ। कुन्ती तदन्नपूर्णां च तस्मै पात्रीमढौकयत् ॥३९॥ अतितप्तेन चान्नेन ज्वलन्तीमिव तां मुनिः। मत्वा हस्तप्रहायोग्यां कृत्वा पृष्ठे धृतं वदौ ॥४०॥ सापि पृष्ठेन तां पात्रीं दधौ सम्बाधया मुनेः। ततः स बुभुजे स्वच्छं कुन्तीपृष्ठं त्वदह्यत ॥४१॥ दह्यमानापि गाढं सा यत्तस्याप्यविकारिणी। तेन तुष्टो मुनिर्मुक्त्वा ददौ तस्यास्ततो वरम् ॥४२॥ इत्यासीत्स मुनिस्तत्र तथैषावन्तिकापि ते। तद्भावेन स्थिता कापि तत्त्वमाराधयत्यिमाम् ॥४३॥ इति मातुर्मुखाच्छ्रुत्वा पद्मावत्यन्यरूपिणीम्। तत्र वासवदत्तां तां सुतरां बहुमन्यत ॥४४॥ सापि वासवदत्तात्र निजनामविनाकृता। तस्थौ विधुरबिच्छाया निशीथेनेव पद्मिनी ॥४५॥

तृतीय लम्बक २६५

तृतीय लम्बक २६५ वासवदत्ता भी वत्सराज से सीखी हुई एवं कभी न मुरझाने वाली माला और तिलक- रचना से पद्मावती को प्रसन्न करती थी। उसकी माला और तिलक-रचना को देखकर पद्मावती की माता ने एकान्त में उससे पूछा कि यह माला और तिलक की रचना किसने की है ॥३१-३२॥ पद्मावती ने कहा कि मेरे भवन में अवन्तिका नाम की एक महिला ठहरी है। उसी ने यह मेरी तिलक रचना की है। यह सुनकर माता ने पद्मावती से कहा—बेटी! यदि ऐसा है तो वह मानुषी नहीं है वरन् देवी है, जो ऐसा विज्ञान जानती है। देवता और मुनि भी कभी-कभी ठगने के लिए लोगों के घरों में आ जाते हैं। इस प्रसंग में यह एक कथा सुनो ॥३३-३५॥ कुन्ती और दुर्वासा की कथा प्राचीन समय में कुन्ती भोज नाम का एक राजा था। उसके घर में ठहरने के लिए दुर्वासा ऋषि आकर ठहरे ॥३६॥ राजा ने ऋषि की सेवा के लिए अपनी कन्या कुन्ती को नियुक्त किया। वह भी बड़ी ही सावधानी से ऋषि की सेवा करती थी ॥३७॥ एक बार उस मुनि ने कुन्ती की परीक्षा के लिए कहा—'तू खीर पका मैं स्नान करके आता हूँ। ऐसा कहकर और शीघ्र ही स्नान करके ऋषि आ गये। कुन्ती ने खीर से भरी कड़ाही उनके सम्मुख उपस्थित की। अत्यन्त खौलती हुई (गरम-गरम) खीर को हाथ से खाने योग्य न समझकर ऋषि ने कुन्ती की पीठ पर दृष्टि डाली। कुन्ती ने भी ऋषि का मनोभाव समझकर उस कड़ाही को पीठ पर धारण कर लिया। तब ऋषि तो खीर खाने लगे किन्तु कुन्ती की पीठ जलने लगी। जलती हुई भी कुन्ती बिना हिल-डले अविचल भाव से बैठी रही उसके धैर्य से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उसे वरदान दिया। उसी दुर्वासा के समान यह अवन्तिका भी तेरे समीप देवता-रूप में है, तू इसकी भली-भाँति सेवा कर। माता के मुँह से ऐसा सुनकर पद्मावती वासवदत्ता से बहुत अधिक स्नेह करने लगी और अधिक सम्मान करने लगी। पतिविरहिता वासवदत्ता अर्धरात्रि की कमलिनी के समान दीन और मलिन रहती थी। कभी-कभी विदूषक वसन्तक की बालकों के समान विविध चेष्टाएँ, उस वियोगिनी के मुख पर मुस्कान का अवसर प्रदान करती थीं॥३८-४५॥ ३४

२६६ कथासरित्सागर

२६६ कथासरित्सागर वसन्तक-विकारादथ न ते व्यालोषिता मुहुः । मुखे तस्या वियोगिन्या स्मितस्यावसरं ददुः ॥४६॥ अत्रान्तरप्रविदूरतू भ्रान्त्वाखेटकभूमिषु । वत्सराजश्चिरादागात्सायं लावाणकं पुनः ॥४७॥ भस्मीभूतमपश्यच्च सप्रान्तःपुरमग्निना । देवीं दग्धां च शुश्राव मन्त्रिभ्यः सवसन्तकम् ॥४८॥ श्रुत्वैव चापतद् भूमौ मोहेन हृतचेतनः । तद्दुःखानुभव-क्लेशमपाकर्तुमिवेच्छता ॥४९॥ क्षणाच्च लब्धसंज्ञन् प्रजावाल हृदयं शुचा । आविष्ट इव सम्प्रत्य-देवी-दाहैकगाग्निना ॥५०॥ विरुरोद च दुःखार्तो देहत्यागकसम्मुखः । क्षणान्तरे स भूपतिः संस्मृत्यैतद्व्यचिन्तयत् ॥५१॥ विद्याधराधिपः पुत्रो वश्यास्तस्या भविष्यति । एतन्मे नारदमुनिर्भाषितं स्म न च तन्मृषा ॥५२॥ कश्चित्काल च दुःख मे तेनैव मुनिनोदितम् । गोपालकस्य भ्रातस्य शोकः स्वल्प इवेक्ष्यते ॥५३॥ यौगन्धरायणादीनां न चापामतिदुःखिता। दृश्यते तेन जाने सा देवी जीवत्यशङ्कन ॥५४॥ इय किमपि नीतिस्तु प्रयुक्ता मन्त्रिभिर्भवत् । अतो मम भवेज्जातु तया देव्या समागमः ॥५५॥ तत्पक्ष्याम्यत्र पर्यन्तं पर्यालोच्य स भूपतिः । निदधे हृदये धैर्यं बोध्यमानश्च मन्त्रिभिः ॥५६॥ गोपालकश्च संविश्य सद्ययावस्तु तत्क्षणम् । प्रजिघाय शतंपचार भृतिहेतोरलक्षितम् ॥५७॥ एवं गते स्ववृत्तान्ते लावाणकगतस्तदा । गत्वा मगधराजाय चारैः सर्वं निवेदितम् ॥५८॥ स तद्बुद्ध्वैव कालज्ञो वत्सराजाय तां सुताम् । दातुं पद्मावतीमेच्छत्पूर्वं सन्मन्त्रिणागिताम् ॥५९॥ ततो दूतमसन्नमभं वत्सेश्वराय सः । यौगन्धरायणायापि सन्दिवेश यधप्सितम् ॥६०॥ यौगन्धरायणोऽप्या च वत्सक्षोऽङ्गीचकार तत् । प्रच्छावितेतदर्थं स्याद्देवी जीविति चिन्तयन् ॥६१॥

तृतीय लम्बक २६७

तृतीय लम्बक २६७ उधर शिकार के लिए दूर-दूर जंगलों का चक्कर लगाकर उदयन बहुत विलम्ब से लावणक को लौटा। लौटने पर उसने रानी के महल को आग से जला हुआ देखा और मन्त्रियों से महारानी का वसन्तक के साथ जल जाना भी सुना। सुनते ही राजा मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। कुछ समय बाद होश में आने पर शोक से हृदय में जलने लगा और महारानी को जलानेवाली अग्नि में जलकर प्राण-त्याग के लिए उद्यत हुआ ॥४९-५१॥ कुछ समय के अनन्तर कुछ स्मरण करके सोचने लगा कि 'इस रानी से मेरा पुत्र उत्पन्न होगा जो विद्याधरों का राजा होगा—ऐसा नारद मुनि ने कहा था वह झूठ नहीं हो सकता ॥५०-५२॥ मुनि ने यह भी कहा था कि कुछ समय तक कष्ट झेलना पड़ेगा। और रानी के भाई इस गोपालक को भी अधिक शोक नहीं मालूम देता॥५३॥ यौगन्धरायण आदि मन्त्री भी अत्यन्त दुःखी नहीं दीखते। इससे यह कल्पना होती है कि रानी जीवित हो जाय यह सम्भव है॥५४॥ मेरे मन्त्रियों ने यह किसी नीति का प्रयोग किया हो यह भी सम्भव है। अतः कभी-न- कभी देवी के साथ समागम हो सकता है॥५५॥ तो अब मैं इस घटना का अन्त देखता हूँ—ऐसा सोचकर मन्त्रियों द्वारा आश्वासित राजा हृदय में धैर्य धरकर कुछ शान्त हुआ॥५६॥ लावणक में यह दुर्घटना होने पर लावणक स्थित गुप्तचरों ने यह समाचार मगध-नरेश के समीप पहुँचाया। समय-ज्ञ मगधराज ने भी इस अवसर का उपयुक्त समझकर अपनी कन्या पद्मावती देने की इच्छा की जिसे वत्सराज के मन्त्री यौगन्धरायण ने पहले ही माँगा था। मगधेश ने अपने गुप्त दूतों द्वारा अपने धैर्य के लिए यौगन्धरायण को भी संदेश भेजा ॥५७-६०॥ वत्सराज ने यह सोचकर कि 'यौगन्धरायण ने कदाचित् वासवदत्ता को छिपा रखा हो' इसलिए यौगन्धरायण का प्रस्ताव स्वीकार करके पद्मावती से विवाह करना स्वीकार कर लिया॥६१॥

२१८ कथासरित्सागर

२१८ कथासरित्सागर

ततो लग्नं विनिर्दिश्य तूर्ण योगन्धरायणः । तस्मै मगधराजाय प्रतिदूतं व्यसर्जयत् ॥६२॥ त्वदिच्छाङ्गीकृतास्माभिस्तदितः सप्तमे दिने । पद्मावतीविवाहाय वत्सेशोऽप्यागमिष्यति ॥६३॥ शीघ्रं वासवदत्तां च येनासौ विस्मरिष्यति । इति चास्मै महामन्त्री सन्दिदेश स भूभृते ॥६४॥ प्रतिदूतः स गत्वा च यथासन्दिष्टमभ्यधात् । ततो मगधराजाय स चाप्यभिननन्द तम् ॥६५॥ ततः स दुहितृस्नेहनिजच्छाभिवर्धितम् । विवाहोत्सव-सम्भारं चकार मगधेश्वरः ॥६६॥ सा चाभीष्टवरश्रुत्या मुदं पद्मावती ययौ । प्राप वासवदत्ता च तद्वार्ताश्रवणान्त्सुदम् ॥६७॥ सा मार्त्ता क्षणमागत्य तस्या वैवर्ण्यादायिनी । प्रच्छन्नवासवैरूप्यसाहाय्यनमिवार्करोत् ॥६८॥ दृप्तं मित्रीकृतं दातुनं च भर्त्तान्यया त्वयि । वसन्तकोऽतिरित्यस्याः सखीव विदधे धृतिम् ॥६९॥ अथासन्नविवाहायाः पद्मावत्या मनस्विनी । अम्लानमालातिलको दिव्यो भूयश्चकार सा ॥७०॥ ततो वत्सेश्वरस्तत्र सम्प्राप्ते सप्तमेऽहनि । ससैन्यो मन्त्रिभिः साकं परिणेतुं किलाययौ ॥७१॥ मनसापि तदुद्योगे विरष्टौ स कथं स्पृशन् । देवीं लभेय तामेवमित्याशा न भवेद्यदि ॥७२॥ प्रत्युद्ययौ च तं सद्यः सानन्दो मगधेश्वरः । प्रदानेनोत्सवं चन्द्रमुदयस्त्यमिवाम्बुधिः ॥७३॥ विवेशाथ स वत्सेशो मगधाधिपतेः पुरम् । समन्तात्पौरलोकस्य मानसं च महोत्सवः ॥७४॥ विरहक्षामवपुषं मनःसम्मोहदायिनम् । ददृशुस्तत्र नार्य्यस्तं रतिहीनमिव स्मरम् ॥७५॥ प्रविश्य मगधेशस्य वत्सेशोऽप्यथ मन्दिरम् । सभाषं पतिवत्नीभिः कौतुकागारमाम्यौ ॥७६॥

तृतीय लम्बक २६१

तृतीय लम्बक २६१ यौगन्धरायण ने तुरन्त लग्न लिखवाकर मगधराज के पास अपना दूत भेजा कि 'हम लोगों ने आपका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। अतः आज के सातवें दिन वत्सराज विवाह के लिए आपके यहाँ बरात लेकर आयेगा' ॥६२ ६३॥ महामन्त्री ने यह भी कहलाया कि 'यदि राजा का विवाह शीघ्र ही हो जाय तो वह वासवदत्ता को भूल जायगा। मगधराज ने सन्देश सुनकर उसका अभिनन्दन किया और कन्या के स्नेह अपने उदार हृदय वैभव एवं मर्यादा आदि के अनुरूप विवाह की तैयारी में लग गया ॥६४-६६॥ पद्मावती मनचाहे अनुरूप पति के मिलने की आशा से प्रसन्न हुई और इस वृत्तान्त को सुनकर वासवदत्ता का हृदय शोक से सन्तप्त हो गया ॥६७॥ वासवदत्ता को मलिन कर देनेवाला यह समाचार, उसके गुप्तनिवास और विकृत परिस्थिति के लिए सहायक हुआ ॥६८॥ 'इस प्रकार यौगन्धरायण ने शत्रु को मित्र बना लिया पति का प्रेम तो तुमपर उसी प्रकार है' इत्यादि बातें समझाकर वसन्तक ने रानी को धैर्य बँधाया ॥६९॥ पद्मावती का विवाह कुछ समय के अनन्तर विवाह का समय समीप आने पर वासवदत्ता ने अम्लान माला और तिलक-रचना से पद्मावती को पुनः सजा दिया ॥७०॥ सात दिन व्यतीत होने पर वत्सराज उदयन अपने मन्त्रियों और सेनाओं के साथ विवाह के लिए मगध की राजधानी में धूमधाम से जा पहुँचा ॥७१॥ वत्सराज उदयन के मन में यदि यह आशा न होती कि वासवदत्ता प्राप्त हो जायगी तो वह इस विवाह-प्रपंच में मन से भी उत्साहित न होता ॥७२-७३॥ इधर राजा ने मगध की राजधानी में प्रवेश किया और उधर नागरिकों के हृदय में महान् आनन्द ने प्रवेश किया ॥७४॥ नागरिक स्त्रियों ने विरह से दुर्बल शरीरवाले तथापि मन को मोहन करनेवाले राजा को रति-हीन कामदेव के समान देखा। पुर प्रवेश के अनन्तर राजा राजमहल में जाकर सौभाग्यवती स्त्रियों से भरे हुए विवाहगृह (कौतुकागार) में पहुँचा ॥७५-७६॥

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तृतीय लम्बक २७१

तृतीय लम्बक २७१ वहाँ आकर राजा ने अपने पूर्णचन्द्र के समान मुख से पूर्णिमा के चन्द्र को लजानेवाली पद्मावती को देखा। उसके शरीर पर, अपनी दिव्य माला और तिलक देखकर उसे यह चिन्ता हुई कि ये वस्तुएँ इसे कैसे प्राप्त हुई ॥७७-७८॥ तदनन्तर विवाह-वेदी पर बैठकर उसने जो पद्मावती का हाथ पकड़ा वही मानों समस्त पृथ्वी के कर-ग्रहण का प्रारम्भ था ॥७९॥ यह वासवदत्ता के अतिरिक्त दूसरी पत्नी को देखना भी नहीं चाहता मानों इसीलिए धुएं ने उसकी आँखें बन्द कर दीं ॥८०॥ अग्नि की प्रदक्षिणा के समय धूएं से लाल पद्मावती का मुख मानों इसीलिए क्रोध से तमतमाने लगा था ॥८१॥ विवाह-विधि सम्पन्न हो जाने पर, वत्सराज ने वधू के हाथ को त्याग दिया। किन्तु हृदय से वासवदत्ता को नहीं छोड़ा। विवाह के दहेज में मगध-नरेश ने राजा को इतने रत्न भेंट किय कि मालूम होता था कि समूची पृथ्वी के रत्न दुह लिये गये ॥८२-८३॥ उसी अवसर पर यौगन्धरायण ने अग्नि को साक्षी करके मगधेश्वर से यह विश्वास प्राप्त किया कि वह जामाता वत्सराज से कभी भी विरोध न करेगा ॥८४॥ विवाहोत्सव में कपडे और गहने बाँटे गये चारणों ने सुन्दर गीत गाये और वेश्याओं ने नृत्य किये ॥८५॥ पति का अभ्युदय चाहनेवाली वासवदत्ता खोई हुई की तरह एकान्त में स्थित होकर उस समय वैसी प्रतीत होती थी जैसी दिन में चन्द्रमा की कान्ति ॥८६॥ तब अन्तःपुर में वत्सराज उदयन के आ जाने पर बुद्धिमान यौगन्धरायण को आशंका हुई कि कहीं राजा वासवदत्ता को न देख ले ॥८७॥ वासवदत्ता के छिपाने का मन्त्र भंग न हो जाय इस भय से यौगन्धरायण ने मगधेश से कहा कि राजा आज ही तुम्हारे यहाँ से विदा हो जायगा ॥८८॥ मगध-नरेश ने इसे स्वीकार कर लिया उसी प्रकार वत्सराज ने भी इसे स्वीकार किया ॥८९॥ बारातियों के खाने-पीने के अनन्तर वत्सराज उदयन क्षत्रियों के साथ पद्मावती को लेकर लौट आया ॥९०॥

पद्मावत्या विसृष्टं च सुखमारुह्य वाहनम्। तयैव च समादिष्टैस्तन्महत्तरकैः सह ॥९१॥ आगाद् वासवदत्तापि गुप्तं सैन्यस्य पृष्ठतः। क्रूराङ्गपविकृतं तं पुरस्कृत्य वसन्तकम् ॥९२॥ क्रमाल्लावाणकं प्राप वत्सेशो वसतिं निजाम्। प्रविवेश समं यध्वा ववी विसतस्तु क्वस ॥९३॥ एत्य वासवदत्तापि सा गोपालकमन्दिरम्। विवक्षाथ निशीथ च परिसंस्थाप्य महत्तरान् ॥९४॥ तत्र गोपालकं दृष्ट्वा भ्रातरं दर्शितादरम्। कण्ठे जग्राह रुदती बाष्पव्याकुललोचनम् ॥९५॥ तत्क्षणं स्थितसन्निध्व तत्र यौगन्धरायणः। आययौ सप्रमम्दकस्तया देव्या कृतादरः ॥९६॥ सोऽस्याः प्रोत्साहविश्लेषद्वेषं यावद्व्यपोहति। तावत्पद्मावती-पार्श्वं प्रत्यूस्ते महत्तराः ॥९७॥ आगतावन्तिका देवि किमप्यस्मान्विहाय तु। प्रविष्टा राजपुत्रस्य गृहं गोपालकस्य सा ॥९८॥ इति पद्मावती सा तैर्विज्ञप्ता स्वमहत्तरैः। वत्सश्वराग्रे साशङ्का तानेव प्रत्यभाषत ॥९९॥ गच्छन्तावन्तिकां ब्रूध निक्षेपस्त्वं हि मे स्थिता। तदत्र किं ते यन्नाह तत्रैवागम्यतामिति ॥१००॥ तच्छ्रुत्वा तेषु यातेषु राजा पद्मावतीं रहः। पप्रच्छ मालातिलकौ केनेमौ तौ कृताविति ॥१०१॥ सावोचदथ मद्गेहे न्यस्ता विप्रेण कश्चित्। भावन्तिकाभिधा यैषा तस्याः शिल्पमिदं महत् ॥१०२॥ तच्छ्रुत्वैव स वत्सशो गोपालगृहमाययौ। नूनं वासवदत्ता सा भवेदत्रेति चिन्तयन् ॥१०३॥ प्रविवेश च गत्वा तद्द्वारस्थितमहत्तरम्। अन्तस्तद्देवीगोपालकमन्त्रिव्रयवसन्तसम् ॥१०४॥ तत्र वासवदत्तां तां ददर्श प्रोषितागताम्। उपक्तञ्जनिर्मुक्तां मूर्तिं चान्द्रमसीमिव ॥१०५॥

तृतीय लम्बक २७३

तृतीय लम्बक २७३ पद्मावती के द्वारा दिये गये सुन्दर रथ पर सखी के नौकरों के साथ वासवदत्ता भी सेना के पीछे रथ बदलते हुए वसन्तक को आगे बैठाकर गुप्त रूप से चली ॥९१-९२॥ क्रमशः वत्सराज अपने निवास-स्थान लावानक नामक गाँव में पहुँचा और नवीन वधू पद्मावती के साथ राज-भवन में प्रविष्ट हुआ किन्तु वासवदत्ता के हृदय में अकेला ही प्रविष्ट हुआ ॥९३॥ वासवदत्ता भी आधी रात के समय सवारियों को ठहराकर अपने भाई गोपालक के निवास स्थान (डेरे) में चली गई ॥९४॥ सबसे पीछे आती हुई वासवदत्ता ने भी लावानक में पहुँचकर भाई गोपालक का स्वागत करते हुए देखा और रोते हुए भाई के गले से लिपटकर रोने लगी ॥९५॥ उसी समय इस योजना का नेता यौगन्धरायण रुमण्वान् के साथ आया और वासवदत्ता ने उसका स्वागत किया। इधर यौगन्धरायण उधर वासवदत्ता के कष्ट के प्रति महानुभूति प्रकट कर रहा था और उधर वासवदत्ता के पहरेदार पद्मावती के पास पहुँचे। और उन्होंने कहा 'देवि ! अवन्तिका हमलोगों के साथ आई, किन्तु यहाँ आते ही हमलोगों को छोड़कर वह राजकुमार गोपालक के घर में चली गई' ॥९६-९८॥ वत्सराज के सामने ही पहरेदारों (सवारों) द्वारा इस प्रकार निवेदित पद्मावती सशंक होकर उनसे बोली—'जाओ अवन्तिका से कहो कि तुम मेरे पास धरोहर के रूप में रखी गई हो इसलिए वहाँ तुम्हारा क्या है ? जहाँ मैं हूँ वहीं तुम भी रहो। जाओ' ॥९९-१००॥ यह सुनकर उनके चले जाने पर राजा ने एकान्त में पद्मावती से पूछा कि 'तुम्हें यह माला और तिलक किसने दिया ? ॥१०१॥ पद्मावती बोली—'किसी ब्राह्मण ने मेरे पास अवन्तिका नाम की एक कन्या धरोहर के रूप में रखी है उसी की यह कारीगरी है ॥१०२॥ यह सुनकर उदयन वहाँ से उठकर सीधे गोपालक के घर पर आया कि अवश्य ही वासवदत्ता उसके घर पर होगी ॥१०३॥ राजा पहरा लगे हुए गोपालक के द्वार पर पहुँचा। अन्दर वासवदत्ता गोपालक यौगन्धरायण रुमण्वान् और वसन्तक बैठे हुए थे। वहाँ उसने हृदय में मुख्य चन्द्र-मूर्ति के समान प्रकाश से लीपी हुई वासवदत्ता को देखा ॥१०४-१०५॥ ३५

२७४ कथासरित्सागर

२७४ कथासरित्सागर पपाताथ महीपृष्ठे स शोकद्विपविह्वलः। कम्पो वासवदत्ताया हृदये स उदपद्यत॥१०६॥ सत साप्यपतद् भूमौ गात्रैर्विरहपाण्डुरैः। विललाप च निन्दन्ती सदाचरितमात्मनः॥१०७॥ अथ तौ दम्पती शोकदीनौ रक्षितुंस्तदा। यौगन्धरायणोऽभ्यासीद् वाष्पधौतमुखो यथा॥१०८॥ तथाविधं च सङ्क्रुत्त्वा काले सोत्साहसं तदा। पद्मावत्यपि तत्रैव साकुला समुपागमत्॥१०९॥ श्रमादवगतार्था च राजवासवदत्तयोः। तुल्यावस्थय माप्यासीत्स्निग्धमुग्धा हि सन्प्रियः॥११०॥ किं जीवितेन मे कार्यं भर्तुर्दुःखप्रदायिना। इति वासंवदत्ता च जगाद रुदती मुहुः॥१११॥ मगधपसुतालाभान्नासौ साम्राज्यशंसिना। श्रुतमद्यमया न्व्वै! दय्या दोषो न कञ्चन॥११२॥ इयं स्वस्या मपत्यज्य प्रयास धीरभाषिणी। इत्युवाचाथ यत्नेन धीरो योगन्धरायणः॥११३॥ अहमत्र विनाम्यग्नावस्याः शुद्धिप्रपादनः। इति पद्मावती तत्र जगादामरगराशया॥११४॥ अहमप्यापराध्यामि मन्युत श्मृग्सानयम्। मांडो दय्यापि हि कञ्चन इति राजाप्यभाषत॥११५॥ अग्निप्रवेशः कार्यो मे रामो ह्यन्योनुदयः। इति वासवदत्ता च यभाषे बडनिश्चया॥११६॥ ततश्च कृत्तिनां धूर्यो धीमान्योगन्धरायणः। भाषम्य प्राष्टमुग णुड इति वाष्पमुद्द्मन्॥११७॥ यद्यहं शिरसाज्ञा देवी शुद्धिमन्ये यदि। शून मां मोक्षणान्गत्त यहं त्यजाम्यहम्॥११८॥ इत्युक्त्वा विरम मर्ष्मन्त्व्या वागुन्भून्दिवः। भन्दग्ध्य मुञ्च ! दस्य मन्या योगन्धरायण॥११९॥ यन्दा वासवदत्ता च भार्या प्राग्जन्मजन्निता। स एव शङ्खवत्याख्या इत्युक्त्वा वागुपारमत्॥१२०॥

तृतीय लम्बक २७५

तृतीय लम्बक २७५ उसे देखते ही शोक के विष से व्याकुल राजा भूमि पर अचेत होकर गिर गया और वासवदत्ता के हृदय में कम्पन होने लगा। विरह से पीन और विवश अंगोंवाली वासवदत्ता भी उसी समय अचेत होकर गिर गई और अपने किये हुए कार्य के लिए विलाप करने लगी ॥१ ९-१०७॥ इस प्रकार दोनों दम्पती शोक से विकल होकर रोने लगे। यौगन्धरायण का मुँह भी आँसुओं से मानो धुल गया ॥१ ०८॥ इधर इस प्रकार का कोलाहल सुनकर व्याकुल पद्मावती भी वहाँ पहुँच गई ॥१ ०९॥ राजा और वासवदत्ता की हालत देखकर पद्मावती भी उन्हीं के समान शोकाकुल हो गई क्योंकि अच्छी स्त्रियाँ स्नेह-युक्त और सरल होती हैं ॥११ ०॥ पति को दुःख देनेवाले मेरे जीवन का क्या प्रयोजन ! इस प्रकार वासवदत्ता रोती हुई बार-बार प्रलाप करती थी ॥१११॥ मगध-नरेश की कन्या की प्राप्ति से तुम्हें साम्राज्य का लाभ हो—यह सोचकर मैंने यह सब कांड किया इसमें महारानी का कोई भी दोष नहीं। इसके प्रवास-काल में महासती के चरित्र की साक्षी स्वयं महारानी को सौंप पद्मावती है—इस प्रकार फूटकर यौगन्धरायण ने कहा ॥११२ ११३॥ विशुद्ध हृदया पद्मावती ने कहा कि वासवदत्ता की सच्चरित्रता को सिद्ध करने के लिए मैं स्वयं अग्नि में प्रवेश करने को उद्यत हूँ ॥११४॥ राजा ने कहा—'इस सारे अपराध का अपराधी एकमात्र मैं ही हूँ जिसके लिए महारानी ने इतना कष्ट-सहन किया ॥११५॥ वासवदत्ता ने दृढ़तापूर्वक कहा कि महाराजा की हृदय-शुद्धि के लिए मम अग्नि- प्रवेश करना चाहिए ॥११६॥ यह सब सुनकर धीरों में धन्य यौगन्धरायण पूर्व मुख बैठकर विशुद्ध मन से आचमन करके बोला—'हे लोकपालो ! यदि मैं राजा का हितकारी हूँ और महारानी भी सच्चरित्रा है तो आस्फोट वाणी हो नहीं तो मैं शरीर-त्याग करता हूँ ॥११७-११८॥ ऐसा कहकर यौगन्धरायण के मौन होने पर आकाशवाणी हुई—'वह राजा धन्य है, जिसके मन्त्री तुम्हारे ऐसे हैं और जिसकी स्त्री वासवदत्ता पूर्वजन्म की देवी है। इसमें कुछ भी दोष नहीं है ॥११९ १२ ० ॥

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तृतीय लम्बक २७७

तृतीय लम्बक २७७ घने मेघों के गर्जन के समान चारों दिशाओं को गुंजित करनेवाली आकाशवाणी को, मोरों के समान ऊँची गर्दन किये हुए उन सब लोगों ने सुना ॥१२१॥ गोपालक के साथ राजा उदयन ने यौगन्धरायण के कार्य की प्रशंसा की और समस्त पृथ्वी को अपने अधीन माना ॥१२२॥ परमसुखी वत्सराज मूर्तिमान् रति और निर्वृति (सुख)-स्वरूप और निरन्तर सहवास के कारण परस्पर अनुरक्त उन दोनों पत्नियों के साथ अत्यन्त सुख का अनुभव करने लगा ॥१२३॥ महाकवि श्रीसोमदेव भट्ट-रचित कथासरित्सागर के लावानक लम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त तृतीय तरंग वत्सराज की कथा (चालू) किसी एक दिन एकान्त में वत्सराज ने वासवदत्ता और पद्मावती के साथ पान क्रीड़ा करके गोपालक रुमण्वान् और वसन्तक के साथ यौगन्धरायण को बुलाया और गुप्त गोष्ठी करने लगा ॥१-२॥ उस अवसर पर अपने विरह के प्रसंग में वत्सराज ने उन सब के सुनते रहने पर यह कथा कहना प्रारम्भ किया ॥३॥ पुरूरवा और उर्वशी की कथा प्राचीन युग में परमवैष्णव (विष्णु-भक्त) पुरूरवा नाम का राजा था। पृथ्वी के समान स्वर्ग में भी उसकी बे-रोक-टोक गति थी ॥४॥ एक बार नन्दन-उद्यान में घूमते हुए उसे उर्वशी अप्सरा ने देखा जो कामदेव के सम्मोहन नामक दूसरे अस्त्र के समान थी ॥५॥ पुरूरवा को देखते ही उर्वशी संज्ञाहीन (बेहोश) हो गई। उसके कारण रम्भा आदि उसकी सखियों का हृदय काँपने लगा ॥६॥ राजा पुरूरवा भी लावण्य-रस की निर्झरिणी के समान उर्वशी को देखकर भी जो उसका सान्निध्य प्राप्त न कर सका उस प्यास से मानो मूर्च्छित हो गया ॥७॥

२७८ कथासरित्सागर

२७८ कथासरित्सागर अथादिदेश सर्वज्ञो हरिः क्षीराम्बुधिस्थितः। नारदाख्यं मुनिवरं दर्शनायमुपागतम् ॥८॥ देवर्षे ! नन्दनोद्यानवर्ती राजा पुरूरवाः। उर्वशीहृतचित्तः सन् स्थितो विरहनिःसहः ॥९॥ तद्गत्वा मम वाक्येन बोधयित्वा शतक्रतुम्। दापय त्वरितं तस्मै राज्ञे तामूर्वशीं मुने ! ॥१०॥ इत्यादिष्टः स हरिणा तथेत्यागत्य नारदः। प्रबोध्य च तथाभूतं पुरूरवसमब्रवीत् ॥११॥ उत्तिष्ठ त्वत्कृते राजन्प्रहितोऽस्मीह विष्णुना। स हि निर्व्याजभक्तानां नैवापदमुपेक्षते ॥१२॥ इत्युक्त्वाश्वासितेनाथ स पुरूरवसा सह। जगाम देवराजस्य निकटं नारदो मुनिः ॥१३॥ हरेरादेशमिन्द्राय निवेद्य प्रणतात्मने। उर्वशीं दापयामास स पुरूरवसे ततः ॥१४॥ तदभूदूर्वशीदानं निर्जीवकरणं दिवः। उर्वश्यास्तु शवेवासीन्मृतसञ्जीवनौषधम् ॥१५॥ अथाजगाम भूलोकं समादाय पुरूरवाः। स्वर्वधू-दर्शनाश्चर्यपर्याप्तमर्त्यचक्षुषाम् ॥१६॥ ततोऽनपायिनौ तौ द्वावूर्वशी च नृपश्च सः। अन्योन्यदृष्टिपानेन नितृप्ताविव तस्थतुः ॥१७॥ एकदा दानवैः साकं प्राप्तयुद्धेन वज्रिणा। साहाय्यार्थमाहूतो ययौ नाकं पुरूरवाः ॥१८॥ तत्र तस्मिन् हते मायाधरनाम्न्यसुराधिपे। प्रनृत्तस्वर्वधूनाट्ये शक्रस्याभवदुत्सवः ॥१९॥ तत्र रम्भां नृत्यन्तीमाचार्ये तुम्बरौ स्थिते। भ्रष्टाभिनयां दृष्ट्वा जहास स पुरूरवाः ॥२०॥ ज्ञानन्मिथ्यामिदं नृत्तं किं त्वं जानासि मानुष ! इति रम्भापि तत्पार्श्वे मातृपं तमभाषत ॥२१॥

तृतीय लम्बक २७१

तृतीय लम्बक २७१ राजा को इस प्रकार सन्तप्त जानकर क्षीर-समुद्र में विश्राम करते हुए सर्वज्ञ भगवान् विष्णु ने दर्शन के लिए आये नारद मुनि को आदेश दिया ॥८॥ हे देवर्षि ! नन्दन-उद्यान में स्थित राजा पुरूरवा उर्वशी पर मोहित हो गया है और उर्वशी के विरह को सहन नहीं कर पा रहा है ॥९॥ इसलिए तुम मेरी ओर से इन्द्र के पास जाकर और उसे समझाकर उर्वशी को राजा के लिए तुरन्त दिलवा दो ॥१०॥ भगवान् हरि से इस प्रकार आज्ञापित नारद ने आकर पुरूरवा को होश में लाकर कहा— 'राजन् ! उठो तुम्हारे लिए मुझे भगवान् विष्णु ने भेजा है। वे अपने निष्कपट भक्तों के कष्ट की उपेक्षा नहीं करते ॥११ १२॥ इस प्रकार आश्वासित पुरूरवा के साथ नारद मुनि इन्द्र के पास गये और प्रणाम करते हुए इन्द्र को हरि की आज्ञा सुनाकर, उर्वशी को राजा पुरूरवा के लिए विदा दिया ॥१३-१४॥ इस प्रकार उर्वशी का दान स्वर्ग को निर्जीव करने और उर्वशी को मानों मृत-संजीवन औषधि देने के समान था ॥१५॥ स्वर्गीय पत्नी को ग्रहण करके मर्त्यलोकवासियों की आँखों को आश्चर्य में डालते हुए पुरूरवा उसे लेकर भू-लोक में आ गया ॥१६॥ इस प्रकार कभी नष्ट न होनेवाले पुरूरवा और उर्वशी—दोनों परस्पर आकृष्ट होकर बँधे हुए-से रहने लगे ॥१७॥ एक बार मायाधर नामक असुरराज के साथ इन्द्र का युद्ध होने पर इन्द्र ने अपनी सहायता के लिए पुरूरवा को बुलाया और पुरूरवा स्वर्ग को गया ॥१८॥ इस युद्ध में मायाधर के मारे जाने पर इन्द्र के यहाँ उत्सव हुआ जिसमें सभी स्वर्गीय स्त्रियों ने भाग लिया। उस उत्सव में आचार्य तुम्बुरु के उपस्थित रहते हुए रम्भा नाम की वेश्या नृत्य कर रही थी उसके नृत्य में कुछ त्रुटि होने पर पुरूरवा ने हँस दिया। उसकी हँसी से चिढ़कर रम्भा ने कहा—'यह देव-नृत्य है इसे मैं जानती हूँ। हे मनुष्य ! तू इसे क्या जाने ॥१९ २१॥

जानेऽहमुर्वशीसङ्गातद्यथेति न तुम्बुरुः। युष्मद्गुरुरपीत्येनामूचाषाथ पुरूरवाः ॥२२॥ तच्छ्रुत्वा तुम्बुरुः कोपात्तस्मै शापमथादिशत्। उर्वश्या ते वियोगः स्यादाकृष्णाराधनादिति ॥२३॥ श्रुतशापश्च गत्वैव तमुद्दश्य पुरूरवाः। अकालाशनिपातोप्रं स्ववृत्तान्तं न्यवेदयत् ॥२४॥ ततोऽकस्मान्निपत्यैव निन्ये क्वाप्यपहृत्य सा। अदृष्टस्तेन भूपेन गन्धर्वैरूर्वशी किल ॥२५॥ अवधाय शापदोषं तं सोऽप्य गत्वा पुरूरवाः। हरेराराधनं चक्र ततो बदरिकाश्रमम् ॥२६॥ उर्वशी तु वियोमार्त्ता गन्धर्वविषयस्थिता। आसीन्मृतेव सुप्तेव लिखितेव विचेतना ॥२७॥ आश्चयं यच्च सा प्राज शापान्ताद्यावलम्बिनी। मुक्ता विरहदीर्घामु चक्रवाकीव रात्रिषु ॥२८॥ पुरूरवाश्च तपसा तेनाच्युतमतोषयत्। तत्प्रसादेन गन्धर्वा मुमुचुस्तस्य चोर्वशीम् ॥२९॥ शापान्तरुग्मया मुक्तं पुनरप्सरसा तया। दिब्यान् स राजा बुभुजे भोगा मृतमत्र्त्त्योऽपि ॥३०॥ इत्युक्त्वा विरते राज्ञि श्रुतोर्वश्यनुरागया। सापि सोडवियोगत्वाद्व्रीडा बासवदत्तया ॥३१॥ तां दृष्ट्वा युक्त्युपालब्धां राजा देवीं विलक्षिताम्। अथाप्यामयितुं भूपमाह यौगन्धरायणः ॥३२॥ न श्रुता यदि तन्नामन्कथेयं श्रूयतां त्वया। अस्तीह तिमिरा नाम नगरी मन्दिरं श्रियः ॥३३॥ तस्यां विहितसेनाख्यः ख्यातिमानभवन्नृपः। तस्य तेजोवतीत्यासीद् भार्या क्षितितलाप्सराः ॥३४॥ तस्याः कण्ठग्रहेऽप्याप्र स राजा स्पर्शलोलुपः। न सेहे कञ्चुकेनापि क्षिप्रामाच्छुरितं वपुः ॥३५॥ कदाचित्तस्य राज्ञश्च जज्ञे वीर्य्यज्वरामयः। यदा निवारयामासुस्तया देव्यास्य सङ्गमम् ॥३६॥

राजा ने कहा—'उर्वशी के सम्पर्क से जो कुछ मैं जानता हूँ उसे तुम्हारे गुरु तुम्बुरु भी नहीं जानते'। यह सुनकर तुम्बुरु ने क्रोध में भरकर राजा को शाप दिया कि जबतक कृष्ण की आराधना न करोगे तबतक उर्वशी से तुम्हारा वियोग हो जायगा ॥२२-२३॥

शाप को सुनकर राजा पुरूरवा ने अकास में वज्रपात के समान यह शाप उर्वशी को कह सुनाया ॥२४॥

तदनन्तर अकस्मात् गन्धर्वों ने तुम्बुरु की आज्ञा से आकर गुप्त रूप से उर्वशी का अपहरण कर लिया ॥२५॥

पुरूरवा ने इसे शाप का फल समझ कर बदरिकाश्रम में जाकर भगवदाराधन प्रारम्भ किया ॥२६॥

गन्धर्व-लोक में राजा के वियोग से सन्तप्त उर्वशी निर्जीव-सी सोई-सी चित्रलिखित-सी एवं संज्ञाहीन होकर पड़ रही। वह शाप के अन्त की आशा पर अवलम्बित विरह से लम्बी रात्रियों में चकवी के समान तड़पती-सी रहती किन्तु प्राणों से विरक्त न हुई ॥२७-२८॥

इधर पुरूरवा ने भगवान् विष्णु को तप से प्रसन्न किया। भगवान् की कृपा से गन्धर्वों ने उसकी उर्वशी को छोड़ दिया ॥२९॥

शाप के अन्त में पुनः प्राप्त हुई उर्वशी के साथ राजा भूलोक में स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करता था ॥३०॥

इस प्रकार कथा सुनाकर राजा के चुप होने पर उर्वशी की विरह-वेदना की सहन-शक्ति को जानकर वासवदत्ता मन-ही-मन लज्जित हुई ॥३१॥

राजा के द्वारा युक्तिपूर्वक उपालम्भ दी गई वासवदत्ता को कुछ लज्जित देखकर उसे आश्वासन देने के लिए यौगन्धरायण ने कहा ॥३२॥

विहितसेन और तेजस्वती की कथा

हे राजन् ! यदि तुमने यह कथा न सुनी हो तो सुनो। भू-लोक में लक्ष्मी के निवास भवन के समान तिमिश्र नाम की समृद्ध नगरी है ॥३३॥

उसमें विहितसेन नाम का राजा राज्य करता था। उसकी रानी तेजस्वती भूतल की अप्सरा थी। उसके कण्ठाश्लेष में संलग्न-हृदय वह राजा अपने शरीर पर कुरते का आवरण भी सहन नहीं करता था ॥३४-३५॥

एक बार राजा को जीर्ण ज्वर हुआ। वैद्यों ने उस रानी के साथ मिलने से मना कर दिया ॥३६॥

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१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर देवी सम्पर्कहीनस्य हृदये तस्य भूभृतः। औषधोपक्रमासाध्यो व्याधिः समुदपद्यत॥३७॥ भयाच्छोकाभिघाताद् वा राज्ञो रोगः कदाचन। स्फुटेदयमितिस्माहुर्भिषजो मन्त्रिणो रहः॥३८॥ यः पुरा पृष्ठपतिते न तत्रास महोरगे। नान्तःपुरप्रविष्टेऽपि परानीके च चुक्षुभे॥३९॥ तस्यास्य राज्ञो जायेत भय सत्ववतः कथम्। नास्त्यत्रोपायबुद्धर्न किं कुर्मस्तेन मन्त्रिणः॥४०॥ इति सञ्चिन्त्य समन्त्र्य ते देव्या सह मन्त्रिणः। तां प्रच्छाद्य तमूचुश्च मृता देवीति भूपतिम्॥४१॥ तेन शोकातिभारेण मथ्यमानस्य तस्य सः। पुस्फोट हृदयव्याधिर्विद्रुतस्य महीभृतः॥४२॥ उत्तीर्णरोग-विपदे तस्मै राज्ञेऽथ मन्त्रिभिः। अर्पिता सा महादेवी सुसम्पदिवापरा॥४३॥ बहु मेने च सोऽप्येनां राजा प्राप्तप्रदामिवाम्। न पुनर्मतिमानस्यै धृक्रोधाच्छादितात्मने॥४४॥ हितैषिणा हि या पत्युः सा देवीत्वस्य कारणम्। प्रियकारित्वमात्रेण देवीशब्दो न लभ्यते॥४५॥ सा मन्त्रिता च यद्राज्यकार्यभारैकचिन्तनम्। चित्तानुवर्तनं यत्तदुपजीवकलक्षणम्॥४६॥ अतो मगधराजेन सन्धाय परिपन्थिना। पृथ्वीविजयहेतोस्ते यत्नोऽस्माभिरयं कृतः॥४७॥ तेन देव! भवद्भक्तिसोढासद्यवियोगया। दम्या नैवापराधः ते पूर्णानूपकृतिः कृता॥४८॥ एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य यथार्थं मुख्यमन्त्रिणः। मेनेऽपराधमात्मानं वत्सराजस्तुतोष च॥४९॥ उवाच चतज्मानेऽहं देव्या युष्मत्प्रयुक्तया। आकारवत्या नीत्येव मम दत्तेयं मेदिनी॥५०॥ क्क त्वद्विप्रजयादेसग्मयोक्तमसमञ्जसम्। अनुरागाधममसां विचारसहता कृतः॥५१॥

तृतीय लम्बक २८३

तृतीय लम्बक २८३ देवी के सम्पर्क से रहित उस राजा का रोग भीतर-ही-भीतर बढ़ने लगा जो औषधियों के उपचार से असाध्य हो गया। 'भय, शोक या अभिघात से सम्भव है, राजा का रोग अच्छा हो सके'—ऐसा वैद्यों ने एकान्त में मन्त्रियों से कहा। मन्त्रियों ने सोचा कि राजा अत्यन्त जीवट वाला है। एक बार पीठ पर भीषण सर्प के गिरने पर और शत्रुओं के रनिवास तक घुस आने पर भी जो न डरा उसे किस प्रकार डराया जा सकता है। इसके लिए कोई उपाय नहीं सूझता। हमारी बुद्धि काम नहीं करती ॥४३-४४॥ इस प्रकार सोच-विचार कर मन्त्रियों ने रानी के साथ परामर्श करके और उसे कपट से ढककर राजा से कह दिया कि 'महारानी मर गईं' ॥४५॥ इस भीषण शोक-संवाद से राजा का हृदय मथित और व्यथित हो गया और शोक-विह्वल राजा का हृदय-रोग नष्ट हो गया ॥४६॥ उस रोग-रूपी विपत्ति से छूट जाने पर मन्त्रियों ने दूसरी गुप्त-सम्पत्ति के समान महारानी को राजा के लिए भेंट कर दिया ॥४७॥ उस प्राणदायिनी रानी को राजा बहुत मानने लगा और बुद्धिमान् राजा ने छिपी हुई रानी पर क्रोध भी नहीं किया ॥४८॥ पति की हितैषिता ही महारानीपन है। केवल राजा को प्रसन्न रखना ही रानीपन नहीं है ॥४९॥ मन्त्रित्व भी वही है—राज-कार्य की समुचित चिन्ता रखना। राजा की 'हाँ-में-हाँ' मिलाना तो केवल नौकरी-मात्र है ॥४९॥ इसीलिए विरोधी मगधराज से सन्धि करने तथा समस्त पृथ्वी पर विजय करने के लिए हमलोगों ने यह यत्न किया ॥४७॥ अतः आपकी भलाई के कारण उत्पन्न वियोग को सहन करनेवाली महारानी वासवदत्ता ने अपराध नहीं किया प्रत्युत बड़ा उपकार ही किया ॥४८॥ प्रधान मन्त्री के वचन सुनकर वत्सराज ने अपने को अपराधी समझा और इस घटना पर सन्तोष प्रकट किया और कहा—आरोग्य की प्राप्ति सुतीक्ष्ण औषधि के समान महारानी ने मुझे सारी पृथ्वी प्रदान की ॥४०-५१॥ मैंने जो कुछ कहा वह प्रेम के अतिशय के कारण कहा—'प्रेम से अन्ध हृदयवाले लोगों में विचार करने की शक्ति कहाँ रह जाती है? ॥५२॥