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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

४२० कथासरित्सागर

४२० कथासरित्सागर इत्यालोच्य स तां भार्यामुपेक्षत सकामुकाम् । मत्वा गुरु भिगोप्ये हि चेतसि स्त्रीत्वम् कियत् ॥८१॥ तत्कालं च रतावेगवशात्तस्याः किलापतत् । वणिक्सुतायाः श्रवणात् समुक्तानयं विभूषणम् ॥८२॥ तच्च सा न ददर्शैव सुरतान्ते च सत्वरा । ययौ यथागतं गेहमापुंश्च्योपपति स्ततः ॥८३॥ तस्मिन्नपि गते क्वापि द्रुतं प्रच्छन्नकामुके । स राजपुत्रो दृष्ट्वा तद्रत्नमाभरणमग्रहीत् ॥८४॥ स्फुरद्रत्नशिखाजाल भान्त्रा मोहतमोपहम् । हस्तदीपमिव दत्तं प्रनष्टस्त्रीयवेषणे ॥८५॥ महार्हं च तदालोक्य राजपुत्रः स तत्क्षणम् । निर्गत्य सिद्धकार्यः सन्कान्यकुब्जं ततो ययौ ॥८६॥ तन्न बन्धाय दत्त्वा तत्स्वर्गसक्षेण भूषणम् । क्रीत्वा हस्त्यश्वमगमत्स पार्श्वं चक्रवर्तिनः ॥८७॥ तद्दत्तेन बले साकमत्य हत्वा रिपून् रणे । प्राप तत्पैतृकं राज्यं कृती मात्रामिनन्दितः ॥८८॥ तन्न बन्धाद् विनिर्मोक्ष्य भूषणं स्वश्वशुरान्तिकम् । प्राहिणोत् प्रकटीकर्त्तुं रहस्यं तदधङ्कितम् ॥८९॥ सोऽपि तच्छ्वशुरो दृष्ट्वा स्वसुताकर्णभूषणम् । तत्तमोपागतं तस्मै सम्भ्रान्तं समदर्शयत् ॥९०॥ सापि पूर्वपरिभ्रष्टं चारित्रमिव वीक्ष्य तत् । बुद्ध्वा च भर्त्रा प्रहितं व्याकुलञ्च समस्मरत् ॥९१॥ इव मे पतिन तस्यां रात्रौ सत्रगृहान्तरे । यस्यां सत्र स्थितो दृष्टः स कोऽपि पथिको मया ॥९२॥ तन्नूनं सोऽत्र भर्त्ता मे धीमन्विज्ञामयाययौ । मया तु न म विज्ञातस्तनेदं प्रापि भूषणम् ॥९३॥ इत्येवं धिग्तयस्त्यान्यं पुर्नयव्यक्तिविह्वलम् । वणिक्सुताया हृदयं तस्याः कातरमस्फुटत् ॥९४॥ ततस्तस्या रहस्यज्ञां पृष्ट्वा चटीं स्वयुक्तिभिः । तत्पिता स वणिग्बुद्ध्या तत्त्वं तत्पात्र तज्जुदुपम् ॥९५॥

चतुर्थ लम्बक ४२१

चतुर्थ लम्बक ४२१ ऐसा सोचकर उसने उपपति के साथ उस स्त्री की उपेक्षा कर दी। शत्रु-विजय की प्रबल इच्छा रखनेवाले सज्जनों के हृदय में स्त्री-रूपी तृण का क्या महत्त्व है॥८१॥ उसी समय विहार की हलबल में उस बनिये की बेटी का मणियों से जड़ा हुआ कान का बहुमूल्य आभूषण (तरङ्गी) कहीं गिर पड़ा। जाने की शीघ्रता में उसने गिरे हुए कान के आभूषण को नहीं देखा और वह अपने प्रेमी से आज्ञा लेकर अपने घर चली गई॥८२-८३॥ कुछ समय के उपरान्त उस प्रेमी के भी चले जाने पर राजकुमार ने उस जड़ाऊ गहने को उठा लिया॥८४॥ चमकीले रत्नों की चमचमाती हुई किरणात्मक बहुमूल्य मणियों से जड़ा हुआ वह आभूषण विनष्ट राज्यलक्ष्मी को ढूंढ़ने में सहायक हाथ के दीपक के समान दैव ने मानो राजकुमार के हाथ में दे दिया था॥८५॥ गृहगमनोत्सुक राजकुमार वहाँ से निकलकर उसी समय कान्यकुब्ज (कन्नौज) देश को चला गया॥८६॥ राजकुमार कन्नौज जाकर कान के उस आभूषण का एक भाग मुहरों पर बन्धक (गिरवी) रखकर उस धन से हाथी घोड़े आदि खरीदकर राजोचित ठाट-बाट से कान्यकुब्ज के चक्रवर्ती के समीप गया॥८७॥ उनसे मिलकर और सहायता-स्वरूप उनकी सेनाओं को लेकर वह शत्रुओं पर चढ़ आया। कठिन युद्ध में विजयी होकर उसने पिता का राज्य प्राप्त किया और माता ने भी उसका अभिनन्दन किया॥८८॥ राज्य प्राप्त करने पर उसने बन्धक का रुपया देकर पत्नी के उस कर्णाभूषण को छुड़ा लिया और अपनी पत्नी का रहस्य प्रकट करने के लिए उस आभूषण को अपने श्वशुर के पास भेज दिया। वह वैश्य इस प्रकार अपनी कन्या के कर्णाभूषण को पाकर घबराया हुआ उसके पास गया और उसे दिखाया॥८९ ॥ वह वैश्यपुत्री उसे देखकर और वह भी पति के द्वारा भेजा हुआ जानकर, अत्यन्त व्याकुल हुई॥ ९० ॥ 'मेरे कान का यह आभूषण उस दिन रात को धर्मशाला के भीतर गिर गया था जिस दिन जैन किसी अज्ञात पथिक का डेरा था॥ ९१ ॥ अवश्य ही वह मेरा पति था जो मेरा चरित्र जानने की इच्छा से छिपकर आया था। मैंने उसे नहीं पहिचाना। बस उसी ने यह कर्णाभूषण वहाँ पाया होगा॥ ९२॥ इस प्रकार सोचते हुए पश्चात्ताप से व्याकुल उस वैश्य-कन्या का हृदय उसी समय फट गया और वह मर गई॥ ९३॥ तदनन्तर उसके रहस्य को जाननेवाली उसकी अंगरक्षक दासी से युक्तिपूर्वक सब वृत्तान्त कहकर उसके पिता ने भी उसके मरने पर दुःख नहीं मनाया। प्रत्युत उसका अच्छा कल्याण ही मनाया॥ ९४ ॥

४२२ कथासरित्सागर

४२२ कथासरित्सागर राजपुत्रोऽप्य सम्प्राप्तराज्यो लब्ध्वा गुणाधिकाम् । स चक्रवर्त्तितनयां भार्या भेजेऽपरां धियम् ॥९६॥ तदित्थं साहसं स्त्रीणां हृदयं वज्रकर्कशम् । सत्त्वं साध्वसावगसम्पाते पुण्यपलभ्यम् ॥९७॥ तास्तु काश्चन सद्धंशजाता मुक्ता इवाङ्गनाः । या सुवृत्ताच्छहृदया यान्ति भूपणतां भुवि ॥९८॥ हरिणीव च राजश्रीरेव विप्लुविनी सदा । धयपातन घटु च तामेके जानत बुधाः ॥९९॥ तस्मादापद्यपि त्याज्यं न सत्त्वं सम्यगेविभिः । अयमेवात्र वृत्तान्तो ममात्र च निदर्शनम् ॥१००॥ यन्मया विवुरेऽप्यस्मिंश्चारित्रं देवि ! रक्षितम् । युष्मद्दर्शनकल्याणप्राप्त्या तत्फलितं हि मे ॥१०१॥ इति तस्या मुखाच्छ्रुत्वा ब्राह्मण्यास्तत्क्षणं कथाम् । देवी वासवदत्ता सा सादरा समचिन्तयत् ॥१०२॥ ब्राह्मणी कुलवत्येषा ध्रुवमस्या ह्युदारताम् । भङ्क्तिं स्वशीलोपशपं वज्रप्रौढिश्च शंसति ॥१०३॥ राजसत्प्रभवेणास्या भावीष्यन्वत एव च । इति सञ्चिन्त्य देवी तां ब्राह्मणीं पुनरब्रवीत् ॥१०४॥ भार्या त्वं कस्य को वा ते वृत्तान्तः कथ्यतां त्वया । तच्छ्रुत्वा ब्राह्मणी भूयः साथ वक्तुं प्रचक्रमे ॥१०५॥ पिङ्गलिकाया आत्मकथा मालवे ऽस्ति धात्र्यागीदग्निदत्त इति द्विजः । निष्प्रयो धीमरस्तथ्यो स्वयमाप्तमनोरथेष्वि ॥१०६॥ तस्य च स्यानुरुणो द्वावालश्री शनयो क्रमात् । ज्येष्ठः पतुर्दत्ताख्या नाम्ना शान्तिवरस्ततः ॥१०७॥ तया शान्तिवरस्तस्माद् विद्यार्थी स्वपितुर्गृहात् । स बाल एव निर्गत्य गतः काश विद्याथिने ॥१०८॥ चिन्तयन्तः स तद्‌भ्राता ज्येष्ठो मां परिणायतवान् । अनयोर्यशसाऽनल्प महायभूतसम्पदा ॥१०९॥

चतुर्थ लम्बक ४३१

चतुर्थ लम्बक ४३१ राजकुमार भी अपने पैतृक राज्य को प्राप्त कर और अपने गुणों से प्राप्त चक्रवर्ती की कन्या को पत्नी-रूप में स्वीकार कर परम आनन्द का उपभोग करने लगा। अर्थात् काम्पि- ल्यनगरेन्द्र ने उसकी वीरता से प्रसन्न होकर उसे अपनी कन्या दे दी ॥१९६॥ इस प्रकार साहसिक काल में स्त्रियों का जो हृदय वज्र के समान कठिन होता है, वही आकस्मिक व्याकुलता होने पर पुष्प से भी कोमल हो जाता है ॥१९७॥ अन्तःपुर में वल्लभ मन्त्री के समान चरित्रवती और स्वच्छ हृदयवाली स्त्रियाँ तो इनी- गिनी ही होती हैं जो संसार का भूषण होती हैं ॥१९८॥ राजलक्ष्मी हरिणी के समान सदा उछलती-कूदती और छलाँगें मारती रहती है। उसे धैर्य-रूपी पाश में बाँधना कुछ ही बुद्धिमान् जानते हैं, सभी नहीं ॥१९९॥ इसलिए सम्पत्ति बाहुल्यवाले को घोर विपत्ति में भी धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए ॥२००॥ मैंने भी इस घोर विपत्ति काल में अपने चरित्र की जो रक्षा की है, आपका दर्शन उसी का परिणाम है ॥२०१॥ इस प्रकार ब्राह्मणी के मुख से इस कथा को सुनकर महारानी वासवदत्ता उसके प्रति आदर की भावना से सोचने लगी— ॥२०२॥ अवश्य ही यह ब्राह्मणी उच्चकुल-प्रसूता है। इसकी उदारता और अपने चरित्र को प्रकट करने का ढंग और वार्तालाप की शैली यह बात बता रही है ॥२०३॥ इसी प्रकार राजसभा में आने की चतुरता भी इसकी उच्चता बता रही है। ऐसा सोचकर रानी ब्राह्मणी से फिर बोली— 'तुम किसकी स्त्री हो और क्या विशेष परिस्थिति है, कहो। यह सुनकर ब्राह्मणी कहने लगी ॥२०४-२०५॥ पिंगलिका की आत्मकथा हे महारानी! मालवदेश में अग्निदत्त नाम का एक ब्राह्मण था। वह लक्ष्मी और सरस्वती दोनों का आश्रय था, याचकों का स्वयं धन देनेवाला था ॥२०६॥ उसीके समान उसके क्रमशः दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें बड़े का नाम शंकरदत्त और छोटे का नाम शान्तिकर था ॥२०७॥ छोटा पुत्र शान्तिकर, बाल्यकाल में ही विद्याध्ययन के लिए पिता के घर से कहीं चला गया ॥२०८॥ बड़े पुत्र शंकरदत्त ने यज्ञ के लिए सम्पत्ति एकत्र करनेवाले यज्ञदत्त की कन्या (मुझसे) विवाह कर लिया ॥२०९॥

४२४ कथासरित्सागर

४२४ कथासरित्सागर कालेन तस्य मद्भर्त्तुः सोऽग्निवत्ताभिधः पिता। वृद्धो लोकान्तरं यातो भार्यानुगतः स्वया ॥११०॥ तीर्थोद्देशाच्च मद्भर्त्ता मृतगर्भं विमुच्य माम्। गत्वा सरस्वतीपूरे शोकेनान्धो जहौ तनुम् ॥१११॥ वृत्तान्ते कथित चास्मिन्नेत्य तत्सहयायिभिः। स्वजनभ्यो मया लब्धं नानुगन्तुं सगर्भया ॥११२॥ ततो मय्यार्त्तशोकायामकस्मादेत्य दस्युभिः। अस्मन्निवाससकलोऽप्यप्रहारो विलुष्ठितः ॥११३॥ तत्क्षणं तिसृभिः सार्धं ब्राह्मणीभिरहं ततः। भीरुर्भ्रशभयाद्रातस्वल्पवस्त्रा पलायिता ॥११४॥ देशभङ्गाद् विदूरं च गत्वा देशं सान्विता। मासमात्रं स्थिताऽभूवं कृच्छ्रकर्मोपजीविनी ॥११५॥ श्रुत्वा चानाथशरणं लोकाद् वत्सेश्वरं सतः। सब्राह्मणीका शीलैकपाथेयाहमिहागता ॥११६॥ आगत्यच प्रसूतास्मि युगपत्त नयावुभौ। स्थितासु भासु तिसृषु ब्राह्मणीषु सखीष्वपि ॥११७॥ शोको विदेशो दारिद्र्यं द्विगुणः प्रसवोऽप्ययम्। अहो अपावृतं द्वारमापदां मम वेधसा ॥११८॥ तदेतयोगतिर्नास्ति बालपोषर्णनाय मे। इत्यालोच्य परित्यज्य लज्जां योषिद्विभूषणम् ॥११९॥ मया प्रविश्य वत्सेशो राजा सदसि याचितः। न शक्तः सोढुमापन्नवासार्त्यार्तिवर्धनम् ॥१२ ०॥ तदादेशेन च प्राप्तं मया स्वम्वरजान्तिकम्। विपदश्च निवृत्ता मे द्वारात्प्रतिहता इव ॥१२१॥ इत्येष मम वृत्तान्तो नाम्ना पिङ्गलिकाऽस्म्यहम्। माबाल्याग्निक्रियाधूमैर्यन्मे पिङ्गलितं दृशौ ॥१२२॥ स तु क्षान्तिकरो देवि देवरो मे विदेशगः। कुत्र तिष्ठति वेद्योऽसाविति नाद्यापि बुद्ध्यते ॥१२३॥ एवम्भूतस्ववृत्तान्ता कुलीनेत्यवधार्य ताम्। प्रीतैर्ना ब्राह्मणीं देवी सा वित्यर्थैवमब्रवीत् ॥१२४॥

चतुर्थ लम्बक ४२५

चतुर्थ लम्बक ४२५ समय के अनुसार मेरे पति के पिता वह्निदत्त वृद्धावस्था के कारण परलोक सिधार गये और उनकी पत्नी (मेरी सास) उनके साथ सती हो गई॥११० ॥ मेरे पति ने तीर्थयात्रा के उद्देश्य से मुझ गर्भवती को घर पर छोड़कर और पितृशोक से अन्धे होकर सरस्वती नदी के प्रवाह में अपना शरीर-त्याग कर दिया ॥१११॥ उसके साथी अन्यान्य यात्रियों द्वारा उसका समाचार कहने पर गर्भवती होने के कारण मैंने अपने बन्धुओं से सती होने की आज्ञा नहीं प्राप्त की॥११२॥ जब मैं पति के शोक में मग्न ही थी कि एकाएक लुटेरा ने हमारे निवास-स्थान गांव को ही नष्ट किया॥११३॥ उस समय मैं गांव की तीन ब्राह्मणियों के साथ चरित्र नष्ट होने के भय से थोड़े-से वस्त्रों को साथ लेकर घर से भाग गई॥११४॥ अपना देश नष्ट हो जाने पर उन तीनों के साथ दूर देश को चली गई और एक मास तक परिश्रम के कार्य करके जीवन-निर्वाह करती रही॥११५॥ यहाँ आकर यह सुना कि 'वत्स देश के राजा अनाथों की रक्षा करते हैं तो मैं उन ब्राह्मणियों के साथ एकमात्र चरित्र के सहारे यहाँ आ गई॥११६॥ यहाँ आते ही एक साथ दो बालकों को उत्पन्न किया। उस समय वे तीनों ब्राह्मणी सहेलियाँ मेरे साथ थीं॥११७॥ पति का नाश विदेश दरिद्रता और दूना प्रसव आदि—यह सब देखकर भाग्य ने मेरी विपत्तियां का द्वार खोल दिया है॥११८॥ इन दोनों बच्चों के पालन-पोषण के लिए मेरे पास अब कोई रास्ता नहीं है यह सोचकर, इसीलिए स्त्रियों के भूषण—लज्जा—को छोड़कर मैंने दरबार में आकर वत्सराज से प्रार्थना की। सच है, निरीह शिशुओ की वेदना को कौन सहन कर सकता है॥११ ९२ ॥ उन्हीं की आज्ञा से मैंने तुम्हारे चरणों में स्थान पाया है। फलतः मेरी सारी विपत्तियां मानो राजद्वार से टकराकर पीछे लौट गईं ॥१२१॥ यह मेरा वृत्तान्त है। मेरा नाम पिंगलिका है। बाल्यपन में अग्निहोत्र के धूम से मेरी आंखें पीली हो गईं इसीलिए मेरा नाम पिंगलिका हुआ॥१२२॥ विदेश गया हुआ मेरा देवर शान्तिकर, किस देश में है इसका अभी तक मुझे पता नहीं है॥१२३॥ इस प्रकार अपना वृतान्त कहती हुई उस ब्राह्मणी को कुलीन समझकर रानी प्रेमपूर्वक कहने लगी—॥१२४॥ ५४

४३६ कथासरित्सागर

४३६ कथासरित्सागर इह शान्तिकरो नाम स्थितोऽस्माकं पुरोहितः । गवेषकः स जानंस्तु ववरस्तं भविष्यति ॥१२५॥ इत्युक्त्वा ब्राह्मणीमुक्तां नीत्वा रात्रिं तत्रैव ताम् । देवी शान्तिकरं प्रातरानाय्यापृच्छदन्वयम् ॥१२६॥ उक्तान्वयाय तस्मै च सा सञ्जातसुनिश्चया । इयं स भ्रातृभार्येति ब्राह्मणीं तामदर्शयत् ॥१२७॥ ज्ञातायां च परिज्ञातो ज्ञातबन्धुक्षयोऽथ सः । ब्राह्मणीं भ्रातृभार्यां तां निन्ये शान्तिकरो गृहम् ॥१२८॥ तत्रानुशोच्य पितरौ भ्रातरं च यथोचितम् । आश्वासयामास स तां बालकद्वितयान्विताम् ॥१२९॥ देवी वासवदत्तापि तस्यास्तौ बालकौ सुतौ । पुरोहितौ स्वपुत्रस्य भाविनः पर्यकल्पयत् ॥१३०॥ ज्येष्ठस्तयोः शान्तिसोमो नाम्ना वैश्वानरोऽपरः । कृतस्तथैव देव्या च वितीर्णबहुसम्पदा ॥१३१॥ अन्वस्यैवास्य लोकस्य फलभूमिः स्वकर्मभिः । पुरोर्गमीयमानस्य हेतुमात्रं स्वपौरुषम् ॥१३२॥ यदेत्य लब्धविभवास्तत्र सर्वेऽपि सङ्गताः । बालकौ तौ तयोः सा च माता शान्तिकरश्च सः ॥१३३॥ ततो गच्छत्सु दिवसेष्वेकदा पञ्चभिः सुतैः । सहागतामुपादाय शशवान्कुम्भकारिकाम् ॥१३४॥ दृष्ट्वा स्वमन्दिरे काञ्चिदृष्ट्या वासवदत्तया । सा ब्राह्मणी पिङ्गलिका जगदे पार्श्ववर्तिनी ॥१३५॥ पञ्चैतस्याः सुतोऽद्यापि नैको मे सक्ति दृश्यताम् । पुण्यानामीदृशां पात्रमीदृग्यपि न मादृशी ॥१३६॥ ततः पिङ्गलिकावादीद्देवि दुःखाय जायते । प्रजायं पापभूयिष्ठा दरिद्रेष्वेव भूयसी ॥१३७॥ युष्मादृशेषु जायत यः स कोऽप्युत्तमो भवेत् । तदलं त्वरया प्राप्स्यस्यचिरात्स्वोचितं सुतम् ॥१३८॥ इति पिङ्गलिकाक्तापि सोत्सुका सुतजन्मनि । अभूद् वासवदत्ता सा तच्चिन्तात्राण्तमानसा ॥१३९॥ -

चतुर्थ लम्बक ४९७

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी लिप्यन्तरण है:

चतुर्थ लम्बक ४९७ यहाँ शान्तिकर नाम का हमारा एक पुरोहित रहता है, वह इस देश का नहीं, परदेशी है। मैं समझती हूँ, वह तुम्हारा देवर होगा॥१२५॥ ऐसा कहकर उत्कण्ठित ब्राह्मणी की रात्रि में उसी प्रकार व्यवस्था करके प्रातःकाल ही रानी ने पुरोहित को बुलाकर उसके कुल और देश का पता पूछा॥१२६॥ उसके अपने कुल का पता बताने पर भली भाँति निश्चय कर रानी ने 'यह तुम्हारी भाभी है'—ऐसा कहकर उस ब्राह्मणी को उसे दिखाया॥१२७॥ परिचय होने पर और अपने भाई की मृत्यु का समाचार जानने पर शान्तिकर अपनी भाभी को अपने घर ले गया॥१२८॥ घर जाकर पिता और भाई के लिए समुचित शोक प्रकट करके दोनों बच्चों-सहित भाभी को उसने धैर्य प्रदान किया॥१२९॥ रानी वासवदत्ता ने भी उन दोनों बालकों को उत्पन्न होनेवाले अपने पुत्र का पुरोहित नियुक्त कर दिया॥१३०॥ रानी ने ही उन दोनों पुत्रों में से बड़े का नाम शान्तिसोम और छोटे का नाम वैश्वानर रखा। साथ ही उनके लिए प्रचुर सम्पत्ति प्रदान की॥१३१॥ अन्धे के समान जीव के आगे-आगे चलनेवाला और अपने कर्मों द्वारा फल की ओर ले जानेवाला भाग्य ही होता है, पुरुषार्थ तो एक निमित्तमात्र है॥१३२॥ यही कारण है कि वह ब्राह्मणी दोनों बालक और शान्तिकर इधर-उधर से आकर प्रचुर राज-संपत्ति पाकर परस्पर मिल गये॥१३३॥ इस प्रकार कुछ दिन बीतने पर एक बार एक कुम्हारिन अपने पाँच पुत्रों को साथ लेकर मिट्टी के कुछ पात्रों-सहित वहाँ आई॥१३४॥ उसे अपने भवन में देखकर रानी ने समीप बैठी हुई पुरोहितानी ब्राह्मणी से कहा— 'सखि! देखो इसके पाँच-पाँच लड़के हैं और मुझे अभी तक एक भी नहीं है, वह इतनी पुण्यवती है। गरीब होकर भी यह मेरी जैसी निपूती नहीं है॥१३५-१३६॥ तब पिंगलिका बोली—'महारानी! पाप के फलस्वरूप अधिक सन्तान कष्ट देती है और दरिद्रा के ही होती है॥१३७॥ तुम्हारे समान उच्च लोगों की अल्पकाल सन्तान होती है, वह उत्तम होती है। जल्दी न करो। शीघ्र ही अपने कुल के योग्य सन्तान प्राप्त करोगी॥१३८॥ पिंगलिका के इस प्रकार कहने पर भी पुत्र के लिए उत्कण्ठित रानी चिन्ता करने लगी॥१३९॥

४२८ कथासरित्सागर

४२८ कथासरित्सागर

गिरिशाराधनप्राप्यः पुत्रस्ते नारदोऽभ्यधात् । तद्देवि वरदोऽवश्यमाराध्यः स शिवोऽत्र नः ॥१४०॥ इत्युक्ता वत्सराजेन तत्कालं चागतं सा । देवी सम्भाव्यमेवास्तु चकार व्रतनिश्चयम् ॥१४१॥ तस्यामात्तव्रतायां तु स राजापि समन्त्रिकः । सराष्ट्रश्चापि विदधे शङ्कराराधनव्रतम् ॥१४२॥ त्रिरात्रोपोषितौ तौ च दम्पती स विमुस्ततः । प्रसादप्रकटीभूतः स्वयं स्वप्ने समादिशत् ॥१४३॥ उत्तिष्ठतं स युवयोः कामांशो जनिता सुतः । नाथो विद्याधराणां यो भविता मत्प्रसादतः ॥१४४॥ इति वचनमुदीर्य चन्द्रमौलौ सपदि तिरोहिततां गते प्रबुध्य । अधिगतवरमाशु दम्पती तौ प्रमदमकृत्रिममापतुः कृतार्थौ ॥१४५॥ उत्थाय चोषसि ततः प्रकृतीर्विधाय । तत्स्वप्नकीर्तनसुधारसतर्पितास्ताः । देवी च सा नरपतिश्च सवन्धुभृत्यौ । बद्धोत्सवौ विदधतुर्व्रतपारणामि ॥१४६॥ कतिपयदिबसापगमे तस्याः स्वप्ने जटाधरः पुरुषः । कोऽप्यथ देव्या वासवदत्तायाः फलमुपेत्य ददौ ॥१४७॥ ततः स विनिवेदितस्फुटपवित्रस्वप्नया सह गृहं प्रमुदितस्तया समभिनन्दितो मन्त्रिभिः । विचिन्त्य शशिमौलिनो फलनिभं दत्तं सुतं । मनोरथमदूरगं गणयति स्म वत्सेश्वरः ॥१४८॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे नरवाहनदत्तजनन लम्बके प्रथमस्तरङ्गः ।

द्वितीयस्तरङ्गः (पूर्वानुवृत्ता) वत्सराजकथा - मुखबन्धः अथ वासवदत्ताया वत्ससहृदयोत्सवः । सम्बभूवाचिराद् गर्भः कामांगावतरोज्ज्वलः ॥१॥

चतुर्थ लम्बक ४२९

चतुर्थ लम्बक ४२९ उसी समय आये हुए वत्सराज उदयन ने रानी की चिन्ता का कारण जानकर कहा— देवि ! नारद मुनि ने कहा है कि शिवजी की आराधना करने पर तुम्हें पुत्र प्राप्त होगा' ॥१४०॥ ऐसा कहकर राजा ने शिवजी का व्रत करने का निश्चय किया। रानी के व्रत ग्रहण करने पर राजा ने भी मन्त्रियों और राज्य की प्रजाओं के साथ शंकर की आराधना का व्रत किया ॥१४१ १४२॥ तीन रातों तक उपवास करते हुए राजा और रानी को प्रसन्नता से प्रकट होकर शिवजी ने स्वयं आज्ञा दी—'तुम दोनों उठो ! तुम्हें कामदेव का अंश पुत्र उत्पन्न होगा जो मेरी कृपा से विद्याधरों का राजा होगा ॥१४३ १४४॥ स्वप्न में ऐसा वरदान देकर शिवजी के अन्तर्धान हो जाने पर, प्रातःकाल उठकर वर को पाये हुए राजा और रानी ने हार्दिक आनन्द का अनुभव किया ॥१४५॥ तदनन्तर उठकर राजा ने मन्त्रियों तथा प्रजाओं को देखे हुए स्वप्न के समाचार-रूपी अमृत-रस से तृप्त कर दिया और उन दोनों ने अपने बन्धु-बान्धवों और सेवकों के साथ उत्सव मनाते हुए व्रत का पारण (समाप्ति) किया ॥१४६॥ और कुछ दिनों के बीतने पर स्वप्न में रानी वासवदत्ता को किसी जटाधारी पुरुष ने आकर फल प्रदान किया ॥१४७॥ रानी के द्वारा उस स्वप्न का वृत्तान्त जानकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और मन्त्रियों ने उसे बधाइयां दीं। राजा भी फल के समान शिवजी द्वारा दिये गये पुत्र को समझकर शीघ्र ही पूर्ण होने की आशा करने लगा ॥१४८॥ नरवाहनदत्तजनन नामक लम्बक का प्रथम तरंग समाप्त द्वितीय तरंग वत्सराज की कथा—पुत्र-जन्म कुछ दिनों के अनन्तर वासवदत्ता ने शीघ्र ही वत्सराज के हृदय को आनन्द देनेवाले और कामदेव के अंशावतार से उज्ज्वल गर्भ का धारण किया ॥१॥

४६ कथासरित्सागर

४६ कथासरित्सागर सा बभौ सोरुनेत्रेण मुखेनापाण्डुकान्तिना। क्षणार्ङ्गेनेव गर्भस्थकामप्रेमोपगामिना ॥२॥ आसीनाया पतिस्नेहाद्धतिप्रीती इवागते। रेजतु प्रतिमे तस्या मणिपर्यङ्कपाश्वयो ॥३॥ भाविबिद्याधराधीशगमसेवाधमिष्टदा । मूर्त्ता विद्या इवायाता सख्यस्तो पर्युपासत ॥४॥ विनीलपल्लवश्याममुखौ साथ पयोधरौ। सूनोगर्भभिषेकाय बभार कलशाविव ॥५॥ स्वच्छस्फुरितसञ्छायमणिकुट्टिमशोभिनः । सुलक्षभ्यागता मध्य मन्दिरस्य रराज सा ॥६॥ भाविततनयाक्रान्तिन्नाकम्पितवारिभि । उपत्य सेव्यमानेव समन्ताद्रत्नराशिभिः ॥७॥ तस्या विमानमध्यस्थरत्नोत्था प्रतिमा बभौ। विद्याधरश्रीनमसा प्रणामार्थमिवागता ॥८॥ मन्त्रसाधनसन्ना साधकेन्द्रकथासु च। बभूव सा दोहदिनी प्रसङ्गोपगतासु च ॥९॥ सरसारम्भसङ्गीता विद्याधरवराङ्गनाः। स्वप्ने तामम्बरोत्सङ्गमारुढामुपतस्थिरे ॥१ ०॥ प्रवृत्ता सवितुं साक्षाद्देवाभिमन्ताप सा। नभ क्रीडाविलसितं दृश्यभूतरुकोतुकम् ॥११॥ तं च दोहदमेतस्या देव्या यौगन्धरायणः। यन्त्रमन्त्रेन्द्रजालादिप्रयोगै समपूरयत् ॥१२॥ विजहार च सा तैस्तैः प्रयोगैर्गगनस्थिता। पौरनारीजनोत्दमञ्चोचनान्वयदायिभिः ॥१३॥ एकदा वामवन्धायास्तस्यादघ समजायत। हृदि विद्याधरोदारकथाश्रवणकौतुकम् ॥१४॥ ततस्तयायितो देव्या तत्र यौगन्धरायणः। तस्या सर्वेषु गुह्यम्पु भिजगाद कथामिमाम् ॥१५॥

चतुर्थ लम्बक ४५१

चतुर्थ लम्बक ४५१ उस गर्भवती रानी का मुख चन्द्रमा के समान शोभित होने लगा। उस मुख में नेत्र चंचल थे। उसकी आभा कुछ पीलापन लिये हुई थी मानों चन्द्रमा अपने मित्र कामदेव के प्रेम से आकर, रानी के मुँह में निवास करने लगा था॥२॥ उस रानी के मणियम पलंग के दोनों ओर पति 'कामन्द' के प्रेम से आई हुई रति और प्रीति दोनों पत्नियां मानों प्रतिमा के रूप में चमकती थीं॥३॥ ऐसा लगता था कि विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती उस गर्भस्थ बालक की सेवा के लिए आई हुई विद्याएं रानी की सेवा कर रही थीं॥४॥ रानी मानों गर्भस्थ बालक के अभिषेक के लिए गहरे हरे रंग के नवपल्लवों के समान श्याम मुखवाले दो कुचों को कलशों के सदृश वहन करती थी॥५॥ स्वच्छ चमकीले और प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेवाली भूमि से युक्त शयन-गृह में सुखद शय्या पर सोई हुई रानी बहुत ही भली मालूम पड़ती थी॥६॥ वह रानी मानों उत्पन्न होनेवाले बालक की सुन्दर कान्ति से पराजित होने के भय से चंचल पानीवाले रत्नों की राशि से शोभित हो रही थी। (अर्थात् उसके शरीर पर धारण किये हुए बहुमूल्य रत्नों का पानी चंचल हो रहा था झलमल-झलमल कर रहा था) ॥७॥ भवन के मध्य में जल हुए रत्न के अन्दर दीखती हुई छाया ऐसी मालूम होती थी कि मानो गतस्थ चक्रवर्ती को प्रणाम करने के लिए विद्याधरों की राजलक्ष्मी आकाश से उतर रही हो॥८॥ वह गर्भवती रानी मन्त्रसिद्धि में लगे हुए साधकों की कथाओं तथा इसी प्रकार की बातों में रुचि रखती थी॥९॥ मरण बात गाती हुई विद्याधरों की सुन्दर रमणियां स्वप्न में रानी की स्तुति करती हुई दीखती थीं॥१०॥ रानी जागने पर भी आकाश में उड़कर विहार करने और भूमि के कौतुक (तमाशे) देखने की इच्छा करती थी॥११॥ मन्त्री यौगन्धरायण तन्त्र मन्त्र और ऐन्द्रजालिक प्रयोगों से रानी की इच्छा को पूरी करता था॥१२॥ नागरिक स्त्रियों की आँखों को आश्चर्य देनेवाले उन आकाश-विहार के प्रयोगों से वह आकाश में विहार करती थी॥१३॥ एक बार जब अपने भवन में बैठी हुई थी उसके हृदय में विद्याधरों की उदारतापूर्ण कथा सुनने की इच्छा उत्पन्न हुई॥१४॥ तब उस रानी की प्रार्थना पर सभी लोगों के सामने यौगन्धरायण ने यह कथा कही॥१५॥

४३२ कथासरित्सागर

४३२ कथासरित्सागर जीमूतवाहनकथा¹ अस्त्यम्बिकाजनयिता नगेन्द्रो हिमवानिति। न केवलं गिरीणां यो गुरूणां रीप्सितेरपि॥१६॥ विद्याधरनिवासश्च तस्मिन्विद्याधराधिपः। उवास राजा जीमूतकेतुर्नाम महाबलः॥१७॥ तस्याभूत्कल्पवृक्षश्च गृहे पितृक्रमागतः। नाम्नामर्थेन विख्यातो यो मनोरथदायकः॥१८॥ कदाचिच्च स जीमूतकेतू राजाभ्युपेत्य तम्। उद्याने देवतात्मानं कल्पद्रुममभाषत॥१९॥ सर्वदा प्राप्यतेऽस्माभिस्त्वत्तः सर्वमभीप्सितम्। तदधुनाय मे देहि देव पुत्रं गुणान्वितम्॥२०॥ ततः कल्पद्रुमोऽवादीद्राजन्नुत्पत्स्यते तव। जातिस्मरो दानवीरः सर्वभूतहिते सुतः॥२१॥ तच्छ्रुत्वा स प्रहृष्टः संन्कल्पवृक्षं प्रणम्य तम्। गत्वा निवेद्य तद्राजा निजां देवीमनन्दयत्॥२२॥ अथ तस्याचिरादेव राज्ञः सूनुरजायत। जीमूतवाहन इति नाम्ना स विदधे पिता॥२३॥ ततः सहजया साकं सर्वभूतानुकम्पया। जगाम स महासत्त्वो वृद्धिं जीमूतवाहनः॥२४॥ क्रमाच्च यौवराज्यस्थं परिषर्याप्रसादितम्। लोकानुकम्पी पितरं विजने स व्यजिज्ञपत्॥२५॥ जानामि तात यद्भावा भवऽस्मिन्क्षणभङ्गुराः। स्थिरं तु महतामेकमाकल्पममलं यशः॥२६॥ परोपकृतिसम्भूतं तदेवेह यदि हन्त तत्। किमन्यैस्स्नायुदाराणां धनैः प्राणाधिकप्रियैः॥२७॥ सम्पदश्च विद्युदिव सा लोकलोचनस्वेदकृत्। सोल्ला क्वापि रुजं याति या परानुपकारिणी॥२८॥ १ इयमेव कथा श्रीहर्षप्रणीतस्य नागानन्दनाटकस्याधारभूता।

चतुर्थ लम्बक ४३३

चतुर्थ लम्बक ४३३ जीमूतवाहन¹ की कथा पार्वती का पिता और पर्वतों का राजा हिमालय नाम का पर्वत है, जो गौरी का ही पिता नहीं, गौरीपति शिवजी का भी गृह (श्वशुर) है॥१६॥ उस पर्वत में विद्याधरों² का निवास है। अतः उस महान् पर्वत पर जीमूतकेतु नाम का विद्याधरों का राजा निवास करता था॥१७॥ उसके घर के उद्यान में कुल-परम्परा से एक उद्यान था, जो अपने नाम के अनुसार मनोरथ पूर्ण करने में प्रसिद्ध था॥१८॥ किसी समय राजा जीमूतकेतु ने उद्यान में उस कल्पवृक्ष के समीप जाकर देवता-स्वरूप उस वृक्ष से प्रार्थना की—॥१९॥ 'हे देवस्वरूप, हमलोग सदा से तुम्हारे द्वारा अपना मनोरथ सिद्ध करते आए हैं। इसलिए मुझ पुत्रहीन को पुत्र प्रदान करो'॥२०॥ तब कल्पवृक्ष ने कहा—'हे राजन्! तुम्हें पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाला, प्राणियों का हित करनेवाला और दानवीर पुत्र उत्पन्न होगा'॥२१॥ यह सुनकर प्रसन्न उस राजा ने यह समाचार रानी को सुनाकर उसे भी प्रसन्न किया॥२२॥ तदनन्तर शीघ्र ही राजा जीमूतकेतु के यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ और पिता ने उसका नाम जीमूतवाहन रखा॥२३॥ प्राणियों पर दया के साथ-साथ वह महात्मा बालक धीरे-धीरे बढ़ने लगा॥२४॥ एक बार युवराज पद को प्राप्त वह परोपकारी जीमूतवाहन एकान्त में सेवा से प्रसन्न पिता से बोला—'पिताजी! इस संसार में जो कुछ भी है, वह सब नश्वर (नाशवान्) है। स्थिर रहनेवाला केवल महान् व्यक्तियों का निर्मल यश ही है॥२५॥ यदि परोपकार से उत्पन्न यह यश है, तो फिर उदारव्यक्तियों के लिए प्राणों से प्यारा धन क्या है? ॥२६॥ सम्पत्ति बिजली के समान चञ्चल तथा आँखों की ज्योति को कष्ट देनेवाली चञ्चल और पुरुष को हानि पहुँचानेवाली वस्तु है॥२७॥


१ यही श्रीहर्ष के नागानन्द नाटक की आधारभूत कथा है। २ मन्त्र-तन्त्र-विद्याओं के द्वारा बने हुए देवताओं की एक जाति। ५५

४३४ कथासरित्सागरे

४३४ कथासरित्सागरे सदैव कल्पविटपी कामदो योऽस्ति न स चेत्। परार्थं विनियुज्येत तदाप्त तत्फलं भवेत् ॥२९॥ तत्सत्वाहं करोमीह यथैतस्य समृद्धिभिः। अदारिद्रा भवेदेषा सर्वापिजनसंहतिः ॥३०॥ इति विज्ञाप्य पितरं तदनुज्ञामवाप्य सः। जीमूतवाहनो गत्वा तं कल्पद्रुममब्रवीत् ॥३१॥ देव ! त्वं शश्वदस्माकमभीष्टफलदायकः। तदेकमिदमद्य त्वं मम पूरय वाञ्छितम् ॥३२॥ अदारिद्रां कुरुष्वैतां पृथिवीमखिलां सखे। स्वस्त्यस्तु ते प्रवृत्तोऽसि लोकाय द्रविणार्थिने ॥३३॥ इत्युक्तस्तेन धीरेण कल्पवृक्षो ववर्ष सः। कनकं भूतले भूरि ननन्दुश्चाखिला प्रजाः ॥३४॥ दयालुर्वोधिसत्त्वांशः कोऽन्यो जीमूतवाहनात्। शक्नुयादर्थिसात्कर्त्तुमपि कल्पद्रुमं कृती ॥३५॥ इति ज्ञातानुरागासु ततो दिक्षु विदिक्ष्वपि। जीमूतवाहनस्योच्चैः पप्रथे विशदं यशः ॥३६॥ ततं पुत्रप्रथावर्द्धमूलं राज्यं समत्सराः। दृष्ट्वा जीमूतकेतोस्तद्गोत्रजा विकृतिं ययुः ॥३७॥ दानोपयुक्तसत्कल्पवृक्षमुक्तास्पदं च तत्। मेनिरे निष्प्रभावत्वाज्जेतुं सुकरमेव ते ॥३८॥ ततः सम्भूय युद्धाय कृतबुद्धिषु तेषु च। पितरं तमुवाचेदं धीरो जीमूतवाहनः ॥३९॥ यथा शरीरमेवेदं जलवुद्बुदसन्निभम्। प्रवातदीपचपलास्तथा कस्य कृते श्रियः ॥४०॥ ता अप्यन्योपमर्द्देन मनस्वी कोऽभिवाञ्छति। तस्मात्तात ! मया नैव योद्धव्यं गोत्रजैः सह ॥४१॥ राज्यं त्यक्त्वा तु गन्तव्यमितः क्वापि वनं मया ॥ मास्तां कृपणा एते मा भूत्स्वकुलसंक्षयः ॥४२॥ इत्युक्तवन्तं जीमूतवाहनं स पिता ततः। जीमूतकेतुरप्येवं जगाद कृतनिश्चयः ॥४३॥

चतुर्थ लम्बक ४३५

चतुर्थ लम्बक ४३५ इसलिए हमारे यहाँ यह जो वांछित फलदेने वाला कल्पवृक्ष है, उसे यदि परोपकार के लिए प्रयुक्त किया जाय तो उसकी सफलता हो ॥२९॥ इसलिए मैं चाहता हूँ कि इस वृक्ष की सम्पत्ति से संसार के समस्त याचक धनी हो जायं ॥३०॥ पिता को इस प्रकार निवेदन करके और उनकी आज्ञा प्राप्त करके जीमूतवाहन ने कल्पद्रुम के पास आकर कहा —॥३१॥ 'हे देव ! तुम सर्वथा हमारे अभीष्ट फलों को देते रहे। आज तुम मेरी एक अभिलाषा पूर्ण करो ॥३२॥ हे देव ! तुम इस सारी पृथ्वी को दरिद्रता से रहित कर दो। तुम्हारा कल्याण हो। मैंने तुम्हें धन चाहनेवाले याचकों के लिए दे दिया ॥३३॥ धैर्यशाली जीमूतवाहन द्वारा इस प्रकार प्रार्थित उस कल्पवृक्ष ने भूमि पर प्रचुर स्वर्ण की वर्षा की और सारी प्रजा प्रसन्न हो गई ॥३४॥ दयालु और बोधिसत्त्व के अंश जीमूतवाहन को छोड़कर और कौन ऐसा उदार है, जो कल्पद्रुम को भी याचकों के लिए दे डाले ॥३५॥ इस प्रकार जीमूतवाहन के प्रति दिग्दिगन्त अनुरागपूर्ण हो गये और जीमूतवाहन का उज्ज्वल तथा महान् यश चारों ओर फैल गया ॥३६॥ तब जीमूतकेतु के राज्य को पुत्र-परम्परा से चलनेवाला देखकर, उनके कुटुम्बियों को ईर्ष्या उत्पन्न हुई और वे राजा के विरुद्ध हो गये ॥३७॥ दान के लिए उत्सर्ग किये गये कल्पवृक्ष के निःसार हो जाने पर, अतएव राजा का प्रभाव हीन समझकर उन्होंने उनपर विजय प्राप्त करना आसान समझा ॥३८॥ तदनन्तर उनके इकट्ठे होकर युद्ध के लिए तैयार हो जाने पर धैर्यशाली जीमूतवाहन ने पिता से कहा— जैसे यह शरीर जल के बुलबुला के समान है, उसी प्रकार जीभों के लोलत्व के समान यह राज्यलक्ष्मी किसके उपभोग में आ सकती है। ऐसी अस्थिर लक्ष्मी के लिए कौन बुद्धिमान् आपस में संघर्ष करना चाहता है। इसलिए पिता ! मैं आज कुटुम्बियों के साथ युद्ध करना नहीं चाहता। सोचता हूँ कि इस राज्य को छोड़कर कहीं वन में चला जाना चाहिए। वे हमारे राज्य भोगें और अपने कुल का भी क्षय न हो ॥३९-४०॥ ऐसा कहते हुए जीमूतवाहन को पिता जीमूतकेतु ने निश्चय करके कहा—'बेटा! मैं भी उसी वन में जाना चाहता हूँ ॥४१-४२॥

४३६ कथासरित्सागर

४३६ कथासरित्सागर

मयापि पुत्र गन्तव्यं का हि वृद्धस्य मे स्पृहा। राज्ये तृण इव त्यक्ते यूनापि कृपया त्वया॥४४॥ एवमुक्तवता सार्धं सभार्येण तथेति सः। पित्रा जगाम जीमूतवाहनो मलयाचलम्॥४५॥ तत्राधिवासे सिद्धानां चन्दनच्छन्ननिर्झरे। स तस्याश्रमपदं परिचर्यापरः पितुः॥४६॥ अथ सिद्धाधिराजस्य बली विश्वावसोः सुतः। मित्रं मित्रावसुर्नाम तस्यात्र समपद्यत॥४७॥ तत्स्वसारं च सोऽपश्यदेकान्ते जातु कन्यकाम्। जन्मान्तरप्रियतमां ज्ञानी जीमूतवाहनः॥४८॥ तस्याश्च स वयोगुर्व्या यूनोरन्योन्यवीक्षणम्। अभून्मनोमृगामन्दाऽनुरागवल्लमाश्रितम् ॥४९॥ ततोऽभ्यागममभ्येत्य त्रिजगत्पूज्यमब्रवीत्। जीमूतवाहनं प्रीतः स मित्रावसुरात्मवान्॥५०॥ मम्या मलयवत्याख्या स्वसा मद्रसिके स्थीयताम्। तामहं ते प्रयच्छामि ममेच्छा मान्यतां कृपा॥५१॥ समाश्रित्य स जीमूतवाहनोऽपि जगाद तम्। यथैषात्र ममाभूत्सा भार्या पूर्वैरपि जन्मनि॥५२॥ इदं च तत्रैव मे ज्ञाता स्थितिं पूर्वं गृहम्। जातिस्मरोऽस्म्यहं सर्वं पूर्ववृत्तं स्मरामि तत्॥५३॥ इत्युक्तेन तदाऽमित्रावसुनाऽथ तम्। वृत्तान्तोऽथया साऽप्युक्ता श्रोतुं हि मे॥५४॥ तज्जिज्ञासया गत्वा तस्मै जीमूतवाहनः।

श्रीजीमूतवाहनस्य पूर्वजन्मकथा

गृहस्थोऽहमतुष्टोऽस्य पूर्वजन्मनिवासिनाम्॥५५॥ अर्थिनां पूर्तिकृत् सोऽहमायुर्विद्वत्त्वयोगवान्। स्थितस्त्वनुकम्पावान् लोकेऽर्थं फलवान्॥५६॥ ततश्चैव पिताऽदात् श्रीमत्यो नैव इव। समन्ताद्बहुदेशेषु रत्नानीव जगौ मम॥५७॥

चतुर्थ लम्बक ४३७

चतुर्थ लम्बक ४३७ मुझ वृद्ध की अब कौन-सी चाह शेष रह गई है। जबकि युवक होकर तुम राज्य को तृण के समान त्याग रहे हो' ॥४४॥ पत्नी के साथ राजा के इस प्रकार कहने पर जीमूतवाहन पिता के साथ मलयपर्वत को चला गया ॥४५॥ चन्दन वृक्षों से आवृत झरनोंवाले और सिद्ध-महात्माओं के निवासस्थान मलयपर्वत में वह आश्रम बनाकर पिता की सेवा में तत्पर हो गया ॥४६॥ वहाँ पर सिद्धों के राजा विश्वावसु का पुत्र मित्रावसु जीमूतवाहन का मित्र बन गया। ज्ञानी जीमूतवाहन ने अपने मित्र विश्वावसु की बहिन को किसी समय एकान्त में देखा जो पूर्वजन्म में उसकी प्यारी पत्नी थी ॥४७-४८॥ उस समय उन दोनों युवकों का परस्पर दर्शन मन-रूपी मृग का दृढ़ बन्धन करने में रस्सी के समान हुआ—अर्थात् दोनों ही दोनों के प्रति प्रेम-बंधन में बँध गये ॥४९॥ कुछ समय के अनन्तर तीनों लोक के पूज्य जीमूतवाहन के समीप आकर मित्रावसु प्रसन्नतापूर्वक बोला—॥५०॥ 'मित्र! मलयवती नाम की मेरी छोटी बहिन है। उसे मैं तुम्हें देता हूँ। तुम मना न करना ॥५१॥ यह सुनते ही जीमूतवाहन भी बोला कि 'युवराज! पूर्वजन्म में भी वह मेरी पत्नी थी और उसी जन्म में तुम मेरे दूसरे हृदय के समान मित्र थे ॥५२॥ मैं पूर्वजन्म का ज्ञानी हूँ। इसलिए अपने तुम्हारे और उसके पूर्वजन्म का वृत्तान्त स्मरण करता हूँ ॥५३॥ इस प्रकार कहते हुए जीमूतवाहन का मित्रावसु ने कहा कि 'पूर्वजन्म की कथा सुनाओ! उसे सुनने की मेरी बहुत इच्छा है' ॥५४॥ जीमूतवाहन के पूर्वजन्म की कथा मित्रावसु से यह सुनकर जीमूतवाहन ने पूर्वजन्म की कथा उसके लिए कहनी प्रारम्भ की ॥५५॥ मैं पूर्वजन्म में आकाश में विचरण करनेवाला विद्याधर था। किसी समय उड़ते-उड़ते मैं हिमालय के शिखर का उल्लंघन कर गया। उस शिखर के नीचे शिवजी पार्वती के साथ विहार कर रहे थे ॥५६॥ इस प्रकार शिखर लंघन से क्रुद्ध शिवजी ने मुझे शाप दिया कि मर्त्ययोनि में तेरा पतन हो' ॥५७॥

४३८ कथासरित्सागर

४३८ कथासरित्सागर

प्राप्य विद्याधरीं भार्या नियोज्य स्वपदे सुतम्। पुनर्विद्याधरीं योनिं स्मृतजातिः प्रपत्स्यते ॥५८॥ एवं निशम्य शापान्तमुक्त्वा शर्वे तिरोहिते। अचिरेणैव जातोऽहं भूतले वणिजां कुले ॥५९॥ नगर्यां वलभीनाम्न्यां महाधनवणिक्सुतः। वसुदत्ताभिधानं संवृद्धिं च गतवानहम् ॥६०॥ कालेन यौवनस्थश्च पित्रा कृतपरिच्छदः। द्वीपान्तरं गतोऽभूवं वणिज्याय तदाज्ञया ॥६१॥ आगच्छन्तं ततोऽटव्यां तस्करा विनिपात्य माम्। हृतस्वमनयन्बद्धा स्वपल्लीं चण्डिकागृहम् ॥६२॥ विलोलदीर्घया घोरं रक्तांशुकपताकया। जिघत्सत्तं पशुप्राणान् कृतान्तस्येव जिह्वया ॥६३॥ तत्राहमुपहारार्थमुपनीतो निजस्य तैः। प्रभोः पुलिन्दकाख्यस्य देवीं पूजयतोऽन्तिकम् ॥६४॥ स दृष्ट्वैवार्द्रहृदयः शबरोऽप्यभवन्मयि। व्यक्तिं जन्मान्तरप्रीति र्मनःस्निग्धवशाद्गतम् ॥६५॥ ततो मां मोचयित्वैव बभासे शबराधिपः। ऐच्छदात्मोपहारेण कर्तुं पूजासमापनम् ॥६६॥ मैवं कृथाः प्रसन्नास्मि तव याचस्व मां वरम्। इत्युक्तो दिव्यया वाचा प्रहृष्टश्च जगाद सः ॥६७॥ त्वं प्रसन्ना वरः कोऽन्यस्त्वत्प्राप्त्यानावयोर्द्वयोः। जन्मान्तरेऽपि मे सख्यमनेन वणिजास्त्विति ॥६८॥ एवमस्त्विति शान्तायां वाचि मां शबरोऽथ सः। प्रदत्तमविगण्यैवं प्रेषियाय निजं गृहम् ॥६९॥ मृत्योर्मुक्तात्प्रवासाच्च शनैः प्रत्यागते मयि। अकरोन्नानशूनाम्नः पिता मम महोत्सवम् ॥७०॥ ज्ञात्वा तत्र चापश्यमहं मार्गावलम्बनात्। बद्धंम्रानायितं राज्ञा समेव शबराधिपम् ॥७१॥ गच्छन् पितुरथ विज्ञप्य च महीपतिम्। मोचितः स्वगलक्षण च मया वधनिग्रहात् ॥७२॥

चतुर्थ लम्बक ४३१

चतुर्थ लम्बक ४३१ 'विद्याधरी पत्नी को प्राप्त करके अपने स्थान पर अपने पुत्र को बैठाकर पूर्वजन्म का स्मरण करते हुए पुनः विद्याधर योनि प्राप्त करोगे' ॥५८॥ इस प्रकार शाप का अन्त कहकर शिवजी के अन्तर्धान होने पर मैं पृथ्वी पर वलभी नाम की नगरी में बड़े ही धनी वैश्यकुल में वसुदत्त नाम से उत्पन्न हुआ और बड़ा हुआ ॥५९-६०॥ कुछ समय के पश्चात् युवावस्था में पिता के तैयार कर देने पर उनकी आज्ञा से व्यापार के लिए दूसरे द्वीप में गया ॥६१॥ वहाँ से लौटते हुए मुझे जंगल में लुटेरों ने घेरकर पकड़ लिया। वे मेरा सब कुछ छीनकर और मुझे बाँधकर अपने गाँव के चण्डिका मन्दिर में ले गये ॥६२॥ उस चण्डिका-गृह में काले रंग की लम्बी-लम्बी झण्डियाँ मानो पशुओं के प्राणों का भक्षण करने की इच्छावाले काल की लपलपाती हुई जीभ के समान मालूम हो रही थीं ॥६३॥ उस मन्दिर में बलिदान करने के लिए, वे लुटेरे, मुझे देवी के पूजक पुलिन्दक नामक अपने सरदार के पास ले गये ॥६४॥ वह पुलिन्दक यद्यपि भिल्ल होते हुए भी मुझे देखते ही दया से पिघल गया। बिना कारण ही स्नेह करनेवाला मन पूर्वजन्म के प्रेम-सम्बन्ध को बताता है ॥६५॥ तब उस भील ने मुझे बलिदान से बचाकर अपनी बलि देकर देवी को प्रसन्न करना चाहा ॥६६॥ 'ऐसा न करो मैं तुझसे प्रसन्न हूँ। वर माँग। इस प्रकार आकाशवाणी ने कहा तब वह भीलराज बोला-'हे देवि तू प्रसन्न है तो और क्या वर माँगू इस वैश्य के साथ अगले जन्म में भी मेरी मित्रता बनी रहे यही वर दो' ॥६७-६८॥ 'ऐसा ही हो'—इस प्रकार वर देकर वाणी के बन्द हो जाने पर उस भील ने मेरे धन से भी अधिक धन देकर मुझे अपने घर भेज दिया ॥६९॥ इस प्रकार लम्बी यात्रा और मृत्यु के मुख से मेरे लौटकर आने पर समस्त वृत्तान्त जानकर मेरे पिता ने प्रसन्नता से भारी उत्सव किया ॥७०॥ कुछ समय के अनन्तर मैंने अपने नगर में व्यापारियों को लूट लेने के कारण राजा द्वारा पकड़वाकर लाये गये उस लुटेरों के सरदार भीलराज को देखा ॥७१॥ उसी समय मैंने पिता से कहकर और राजा को सूचित कर उस भीलराज का सब दण्ड स्वयं-सहा देकर उसे प्राणदण्ड से बचा लिया ॥७२॥