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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

षष्ठ लम्बक ७९३

षष्ठ लम्बक ७९३ राजा द्वारा इस प्रकार युवराज के मन्त्रियों के नियुक्त किये जाने पर आकाश से पुष्पवृष्टि के साथ दिव्यवाणी हुई कि 'ये सभी मन्त्री इसके अभिन्नहृदय मित्र होंगे किन्तु गोमुख इसके शरीर से भी भिन्न न होगा' ॥११७-११८॥ इस प्रकार दिव्यवाणी से कहा गया वत्सराज अत्यन्त प्रसन्न हुआ और वस्त्र-आभूषण आदि से उसने सबका सम्मान किया ॥११९॥ उस राजा उदयन के सेवकों पर धन की वर्षा करने पर दरिद्र शब्द के केवल अर्थ की ही संगति नहीं रही¹ ॥१२० ॥ वायु द्वारा आन्दोलित अतएव फड़फड़ाती हुई पताकाओं के वस्त्रों की पंक्ति से मानो यह नगरी निमन्त्रित नर्तकियों और चारणों से भर गई थी ॥१२१॥ होनेवाले कलिङ्गसेना के जामाता के इस महोत्सव में मानो विद्याधरों की राजलक्ष्मी स्वयं आ गई ॥१२२॥ तदनन्तर रानी वासवदत्ता पद्मावती तथा कलिङ्गसेना ये तीनों मिलकर सम्मिलित धत्तियों के समान नाचने लगी ॥१२३॥ वायु द्वारा आन्दोलित लताएं चारों ओर नृत्य कर रही थीं और उद्यानों के वृक्ष इस नृत्य में भाग ले रहे थे। चेतन प्राणियों की तो बात ही क्या है ? ॥१२४॥ अभिषिक्त युवराज नरवाहनदत्त जयकुंजर पर चढ़कर बाहर निकला और नागरिक स्त्रियों के नीलकमल रूपी-लावे (धान के खीलों) की अंजुलियों के समान नील श्वेत और लाल नेत्रों से ढक दिया गया ॥१२५ १२६॥ युवराज सवारी से मयर-देवता का दर्शन करता हुआ एवं बन्दियों और सूतों से स्तुति किया जाता हुआ अपने मन्त्रियों के साथ युवराज-भवन में गया ॥१२७॥ वहां पर सबसे पहले कलिङ्गसेना ने अपने वैभव से भी बढ़कर भोजन-पान की दिव्य वस्तुओं से उनका स्वागत किया और जामाता के स्नेह से गद्गद होकर विविध प्रकार के वस्त्र और आभूषण मन्त्रियों-सहित युवराज को दिये ॥१२८ १२९॥ इस प्रकार, अमृतास्वाद के समान सुन्दर महोत्सव का यह दिवस वत्सराज आदि सबने सुख के साथ व्यतीत किया ॥१३० ॥ रात होने पर कन्या के विवाह के लिए विचार-विमर्श करने के लिए कलिङ्गसेना ने अपनी प्राणप्यारी सखी सोमप्रभा का स्मरण किया ॥१३१॥ १ अर्थात् राज्य में कोई दरिद्र न रह गया।—अनु १

७९४ कथासरित्सागर

७९४ कथासरित्सागर एतया स्मृतमात्रा सा मयासुरसुता तदा । भव्यां भर्त्ता महामानी जगाद नलकूबरः ॥१३२॥ कलिङ्गसेना त्वामद्य सोत्सुका स्मरति प्रिये । तद्गच्छ दिव्यमुद्यानं कुरु चैतत्सुताकृते ॥१३३॥ इत्युक्त्वा भावि भूतं च कथयित्वा च तद्गतम् । तत्रैव प्रेषयामास पत्नीं सोमप्रभां पतिः ॥१३४॥ सा चागत्य चिरोत्कण्ठाकृतकण्ठग्रहां सखीम् । कलिङ्गसेनां कुशलं पृष्ट्वा सोमप्रभाब्रवीत् ॥१३५॥ विद्याधरेण तावत्त्वं परिणीता महद्धिना । अवतीर्णा रतिस्ते च सुता शार्वानुग्रहात् ॥१३६॥ कामावतारस्यैषा च वत्सेशात्मसम्भवन् । नरवाहनदत्तस्य पूर्वभार्या विनिर्मिता ॥१३७॥ विद्याधराधिराज्यं स दिव्यं कल्पं करिष्यति । तस्यैषान्यावरोधानां मूर्ध्नि माया भविष्यति ॥१३८॥ त्वं चावतीर्णा भूलोके शक्रशापच्युताप्सराः । निष्पन्नकार्यशेषा च शापमुक्तिमवाप्स्यसि ॥१३९॥ एतन्मे सर्वमाख्यातं भर्त्रा ज्ञानवता सखि । तस्माच्चिन्ता न ते कार्या भावि सर्वं शुभं तव ॥१४०॥ अहं चेह करोम्येषा दिव्यं स्वतनयाकृते । उद्यानं नास्ति पाताले न भूमौ यन्न वा दिवि ॥१४१॥ इत्युक्त्वा दिव्यमुद्यानं सा निर्माय स्वमायया । कलिङ्गसेनामामन्त्र्य सोत्कां सोमप्रभा ययौ ॥१४२॥ ततो निशि प्रभातायामकस्मात्सम्पूर्णं दिवः । भूमाविव च्युतं लोको ददर्शोद्यानमत्र सत् ॥१४३॥ शुश्राव राजा वत्सैशः सभार्यः सचिवैः सह । नरवाहनदत्तश्च सानुगोऽत्र समाययौ ॥१४४॥ ददृशुस्ते तमुद्यानं सदा पुष्पफलद्रुमम् । नानामणिमयस्तम्भभित्तिभूभागवापिकम् ॥१४५॥ सुवर्णवर्णविहगं दिव्यसौरभमारुतम् । देवादेशावतीर्णं वत्स्वर्गास्तरमिव क्षितौ ॥१४६॥

षष्ठ लम्बक ७१५

षष्ठ लम्बक ७१५ कलिङ्गसेना द्वारा स्मरण की गई मयासुर की कन्या सोमप्रभा को उसके महाज्ञानी पति नलकुबर ने कहा—॥१३२॥ 'प्यारी आज कलिङ्गसेना अत्यन्त उत्कण्ठा से तेरा स्मरण कर रही है इसलिए जाओ और उसके लिए दिव्य उद्यान बनाओ' ॥१३३॥ ऐसा कहकर और कलिङ्गसेना के सम्बन्ध में भूत और भविष्य का वर्णन करके सोमप्रभा को उसके पति ने तुरन्त भेज दिया ॥१३४॥ वह सोमप्रभा भी आकर चिर-उत्कंठा से गल मिलती हुई कलिङ्गसेना से कुशल-समाचार पूछने के उपरान्त कहने लगी—॥१३५॥ 'तू अत्यन्त धनी विद्याधर के साथ विवाहित हुई है और शिवजी की कृपा से तेरे यहाँ रति ने अवतार लिया है ॥१३६॥ तेरी यह कन्या वत्सराज के यहाँ उत्पन्न हुए कामदेव के अवतार नरवाहनदत्त की पूर्व जन्म की पत्नी है ॥१३७॥ वह नरवाहनदत्त दिव्य कल्प वर्षों तक विद्याधरों पर राज्य करेगा और तुम्हारी कन्या उसके यहाँ के स्त्री-समाज में सर्वमान्य और सम्राज्ञी बनी रहेगी ॥१३८॥ तू भी इन्द्र के शाप से भूलोक में पतित पूर्व जन्म की अप्सरा है और कुछ शेष कार्यों को समाप्त करके मुक्ति प्राप्त करेगी ॥१३९॥ हे सखि यह सब मेरे ज्ञानी पति ने मुझे बताया है। और मैं तुम्हारी कन्या के लिए एक उद्यान बना देती हूँ। ऐसा उद्यान पाताल पृथ्वी और स्वर्ग में कहीं भी नहीं होगा' ॥१४०-१४१॥ ऐसा कहकर और अपनी माया से दिव्य उद्यान का निर्माण करके उत्कण्ठित कलिङ्गसेना से पूछकर सोमप्रभा चली गई ॥१४२॥ तदनन्तर प्रातःकाल होते ही लोगों ने उस उद्यान को इस प्रकार देखा मानो स्वर्ग का नन्दन-वन अकस्मात् यहाँ उतर पड़ा हो ॥१४३॥ इस समाचार को सुनकर वत्सराज अपनी पत्नियों और मन्त्रियों-सहित वहाँ आया। युवराज नरवाहनदत्त भी अपने साथियों के साथ वहाँ गया ॥१४४॥ राजा ने वहाँ उस उद्यान को देखा जिसमें सदा फल और फूल देनेवाले वृक्ष लगे हुए थे। विविध प्रकार के मणिरत्न-समूहों द्वारा चबूतरा और बावलियों से वह शोभित था। उसमें स्वर्णिम पक्षी विहार कर रहे थे। दिव्य सुगन्धवाली वायु बह रही थी। यह सब देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि मानो देवताओं की आज्ञा से पृथ्वी पर दूसरे स्वर्ग का निर्माण किया गया हो ॥१४५-१४६॥

७९६ कथासरित्सागर

७९६ कथासरित्सागर दृष्ट्वा तदद्भुतं राजा किमेतदिति पृष्टवान्। कलिङ्गसेनामातिथ्यमग्र्यं वत्सेश्वरस्तदा ॥१४७॥ सा प्रत्युवाच सर्वेषु शृण्वत्सु नृपतिं च तम्। विश्वकर्मावतारोऽस्ति मयो नाम महासुरः ॥१४८॥ युधिष्ठिरस्य यश्चक्रे पुरं रम्यं च दक्षिण। तस्य सोमप्रभा नाम तनयास्ति सखी मम ॥१४९॥ तया रात्राविहागत्य मत्समीपं स्वमायया। प्रीत्या कृतमिदं दिव्यमुद्यानं मत्सुताकृते ॥१५०॥ इत्युक्त्वा यच्च सख्यास्या मूर्त्तं माभ्युदितं तया। तत्तथैवोक्तमित्युक्त्वा तदा सर्वं शशंस सा ॥१५१॥ ततः कलिङ्गसेनोक्तिं ससंवादामवेक्ष्य_ताम्। निरस्तसंशयाः सर्वे तोषं तत्रातुलं ययुः ॥१५२॥ कलिङ्गसेनातिथ्येन निनाय दिवसं च तत्। उद्यानेनैव वत्सेशो भार्या पुत्रादिभि सह ॥१५३॥ अन्येद्युर्निर्गतो द्रष्टुं देवं देवकुले च सः। ददर्श नृपतिर्बह्वी सुवस्त्राभरणाः स्त्रियः ॥१५४॥ का यूयमिति पृष्टाश्च तेन तास्तं वभाषिरे। वयं विद्याः कलाश्चैतास्त्वत्पुत्रार्थमिहागताः ॥१५५॥ गत्वा विशाम स्तस्तान्तरित्युक्त्वा तास्तिरोऽभवन्। सविस्मयः स राजापि वत्सेशोऽभ्यन्तरं ययौ ॥१५६॥ तत्र वासवदत्तायै देव्यै मन्त्रिगणाय च। तच्छशंसाम्यनन्दंस्ते देवानुग्रह च तम् ॥१५७॥ ततो राजनिवेशनं वीणा वासवदत्तया। नरवाहनदत्तेऽत्र प्रविष्टे जगृहे क्षणात् ॥१५८॥ वादयन्तीं ततस्तां च मातरं विनयेन सः। राजपुत्रोऽब्रवीद् वीणा च्युता स्थानादसाविति ॥१५९॥ त्वं वाद्य गृहाणैतामिति पित्रोदितेऽथ सः। वीणामवादयत् कुर्वन् गन्धर्वानपि विस्मितान् ॥१६०॥ एवं सर्वासु विद्यासु कलासु च परीक्षितः। पित्रा यावद् वृतस्ताभिः स्वयं सर्वं विवेद सः ॥१६१॥

षष्ठ लम्बक ७९७

षष्ठ लम्बक ७९७ उस अद्भुत उद्यान को देखकर वत्सराज ने स्वागतातिथ्य में व्यग्र कलिङ्गसेना से पूछा कि 'यह सब क्या है ? ॥१४७॥ तब कलिङ्गसेना सबके सामने राजा से बोली—'महाराज ! विश्वकर्मा का अवतार मयासुर नाम का एक महान् असुर है, जिसने इन्द्र की आज्ञा से युधिष्ठिर का सुन्दर नगर बनाया था। सोमप्रभा नाम की उसी की कन्या मेरी सखी है। उसने रात में मेरे पास आकर अपनी माया के और अपने ही प्रेम से मेरी कन्या के लिए यह उद्यान बनाया है' ॥१४८-१५०॥ ऐसा कहकर, और भी सहेली ने भूत एवं भविष्य की जो बातें बताई थीं राजा को उसी प्रकार सुना दीं ॥१५१॥ तब सभी ने कलिङ्गसेना की बात को प्रामाणिक मानकर, संशय-रहित होकर परम हर्ष और विश्वास प्रकट किया ॥१५२॥ वत्सराज ने वह समस्त दिन अपनी स्त्री और पुत्र आदि के साथ कलिङ्गसेना के स्वागत में ही व्यतीत किया ॥१५३॥ दूसरे दिन देव-मन्दिर में दर्शन के लिए गये राजा ने सुन्दर और बहुमूल्य वस्त्राभरणों से अलंकृत स्त्रियों को देखा ॥१५४॥ 'तुम सब कौन हो'—राजा के इस प्रकार पूछने पर वे स्त्रियाँ कहने लगीं—'हम सब विद्याएँ और कलाएँ हैं और तुम्हारे पुत्र के लिए यहाँ आई हैं ॥१५५॥ अब जाकर उसी में प्रवेश करती हैं, इतना कहने के उपरान्त वे सब अन्तर्धान हो गईं और आश्चर्यचकित राजा भी मन्दिर के भीतर गया ॥१५६॥ उसने वहाँ जाकर यह वृत्तान्त अपनी रानियों और मन्त्रियों को सुनाया। सब उसे देवता का अनुग्रह समझकर उसका अभिनन्दन करने लगे ॥१५७॥ तदनन्तर राजा की आज्ञा से वासवदत्ता ने भी वीणा उठाई और राजकुमार नरवाहनदत्त ने मन्दिर में प्रवेश किया ॥१५८॥ वीणा बजाती हुई माता से राजकुमार ने नम्रतापूर्वक कहा—'तुम्हारी वीणा स्थान (स्वर-स्थापन की मात्रा) से भ्रष्ट हो रही है ॥१५९॥ तदनन्तर तू इसे ले और बजा' पिता की आज्ञा पाकर वीणा बजाते हुए राजकुमार ने गन्धर्वो को भी विस्मित कर दिया ॥१६०॥ इस प्रकार, सभी विद्याओं और कलाओं में पिता द्वारा परीक्षित राजकुमार ने उत्तीर्णता प्राप्त की। वह स्वयं सब कुछ जान गया था ॥१६१॥

७१८ कथासरित्सागर

७१८ कथासरित्सागर वीक्ष्य तं सगुणं पुत्रं वत्सेशास्तामशिक्षयत् । कलिङ्गसेनातनयां नृत्तं मदनमञ्चुशाम् ॥१६२॥ यथा यथा पूर्णकला साभूत्सुमुरिखन्दवी । नरवाहनदत्ताब्धिवृद्धये स तथा तथा ॥१६३॥ अरस्त तां च गायन्तीं नृत्यन्तीं च विलोकयन् । पठन्तीमिव कामाज्ञामङ्गाभिनयमूर्ताम् ॥१६४॥ सापि क्षणमपश्यन्ती तन्मुखेन्दुं सुधामयम् । क्लान्तासीदुप काले जलाद्रेव कुमुद्वती ॥१६५॥ सवत धासहः स्थातुं तन्मुखालोकनं विना । नरवाहनदत्तोऽसौ तत्तदुद्यानमाययौ ॥१६६॥ तत्र पार्श्वं तयानीय सुतां मदनमञ्चुकाम् । कलिङ्गसेनया प्रीत्या रज्यमानः स तस्थिवान् ॥१६७॥ गोमुखश्चास्य चित्तज्ञः स्वामिनोऽत्र चिरस्थितिम् । इच्छन्कलिङ्गसेनार्थं तां तामकथयत्कथाम् ॥१६८॥ चित्रग्रहेण तेनास्या राजपुत्रस्तुतोष सः । हृदयानुप्रवेशो हि प्रेम्णो सवतनं परम् ॥१६९॥ गुप्तादियोग्यां कृप्ते तस्मिन्मदनमञ्चुकाम् । तत्र स्वयं च संगीतवेश्मन्युद्यानवर्त्तिनि ॥१७०॥ नरवाहनदत्तं स ह्रेपयन्वरचारुमान् । तस्यां प्रियायां नृत्यन्त्यां सर्वास्तोद्यान्यवादयत् ॥१७१॥ जिगाय चागतान् दिग्भ्यो विविधां पण्डितांस्तथा । गजाश्वरथशास्त्रास्त्रचित्रपुस्तादिकोविदः ॥१७२॥ एवं विहरतो विद्यास्वयंवरवृतस्य ते । नरवाहनदत्तस्य शैशवे बासरा ययुः ॥१७३॥ एकदा चान्न यात्रायामुद्यानं स प्रियसखः । ययौ नागवनं नाम राजपुत्रः समंत्रिकः ॥१७४॥ तत्राभिलाषिणी काचिद् वणिग्भार्या निराकृता । इयेष गोमुखं हन्तुं सविषाहृतपानका ॥१७५॥ तद्विवेद च तरसस्या मुखादत्त च गोमुखः । नाददे पानकं तच्च स्त्रियं एवं निनिन्द च ॥१७६॥

षष्ठ लम्बक ७९९

षष्ठ लम्बक ७९९ राजकुमार को सभी विद्याओं और कलाओं में प्रवीण जानकर वत्सराज ने कलिंगसेना की कन्या मदनमंचुका को नृत्त-विद्या (वह नाच जिसमें केवल अंगों का विक्षेप किया जाता है) सिखा दी॥१६२॥ जैसे-जैसे चन्द्रमा के समान शरीरवाली वह मदनमंचुका कलापूर्ण होने लगी वैसे ही वैसे नरवाहनदत्त-रूपी समुद्र क्षुब्ध और उद्वेलित होने लगा॥१६३॥ वह (नरवाहनदत्त) उस (मदनमंचुका) को नाचती और गाती देखकर प्रसन्न होता था क्योंकि वह मदनमंचुका अपने अंग आदि के अभिनय से मानों कामदेव की आज्ञा का पाठ करती थी॥१६४॥ वह मदनमंचुका भी अमृतमय उस सुन्दर पति को न देखकर रोने लगती तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे प्रभातकालीन तुषार-बिन्दुओं से परिपूर्ण कुमुद्वती हो ॥१६५॥ उसे देखे बिना बेचैन नरवाहनदत्त निरन्तर और बार-बार उसके उद्यान में घूमता रहता था॥१६६॥ वहाँ पर कलिंगसेना अपनी कन्या मदनमंचुका द्वारा सन्तुष्ट किये जाते हुए नरवाहनदत्त को देखकर अत्यन्त प्रसन्न होती थी॥१६७॥ नरवाहनदत्त के हृदय को जाननेवाला उसका नम्र सचिव गोमुख उस स्थान पर दीर्घकालीन स्थिति की कामना से कलिंगसेना को विविध प्रकार की कथाएं सुनाया करता था॥१६८॥ इस प्रकार उसके हृदय को आकृष्ट करने से वह राजकुमार सन्तुष्ट होता था। सच है स्वामी के हृदय में प्रवेश करना अर्थात् उसके हृदय को समझकर कार्य करना ही स्वामी की सबसे बड़ी सेवा है॥१६९॥ उस उद्यान की रंगशाला में नरवाहनदत्त मदनमंचुका को स्वयं ही समुचित शिक्षा दिया करता था॥१७०॥ नरवाहनदत्त मदनमंचुका के गाने पर सभी प्रकार के वाद्य को स्वयं बजाया करता था जिसको वादक भरत भी देखकर लज्जित होते थे॥१७१॥ उस नरवाहनदत्त ने बाहर के देशों से आनेवाले विविध शास्त्रों और कलाओं के मर्मज्ञ विद्वानों और कलाकारों को प्रतियोगिता में जीत लिया था॥१७२॥ स्वयं ही विधाता द्वारा वरण किये गये नरवाहनदत्त के बाल्यकाल के दिन इसी प्रकार के विनोद में व्यतीत हुए॥१७३॥ एक बार नरवाहनदत्त ने अपनी पत्नी मदनमंचुका के साथ विहार (भ्रमण) करने की इच्छा से मित्रों और मन्त्रियों को साथ लेकर नागवन की यात्रा की॥१७४॥ वहाँ पर किसी बनिये की कामुकी स्त्री को गोमुख ने तिरस्कृत कर दिया था फलतः उस स्त्री ने क्रोध में आकर विष मिला हुआ शर्बत पिलाकर गोमुख को मार डालना चाहा॥१७५॥ गोमुख ने उस स्त्री की सहेली से यह सब जान लिया और उसने डगरा दिया हुआ शर्बत नहीं पिया प्रत्युत स्त्रियों की निन्दा की॥१७६॥

८० कथारित्सागर

८० कथारित्सागर अहो धात्रा पुरः सृष्टं साहसं तदनु स्त्रियः । नैतासां दुष्करं किञ्चिन्निसर्गादिह विद्यते ॥१७७॥ नूनं स्त्री नाम सृष्टेयममृतेन विषेण च । अनुरक्तामृतं सा हि विरक्ता विषमेव च ॥१७८॥ ज्ञायते कान्तवदना केन प्रच्छन्नपातका । कुस्त्री प्रफुल्लकमला गूढनक्रा पद्मिनी ॥१७९॥ दिवः पतति काचित्तु गुणचक्रप्रमोदिनी । भर्तृश्लाघासहा सुस्त्री प्रभा भानोरिवामला ॥१८०॥ हन्त्येवाशु गृहीतान्या पररक्ता गतस्पृहा । पापा विरागविषमूढं भर्तरि भुजगीव सा ॥१८१॥ शत्रुघ्नस्य दुष्टभार्यास्तत्फलप्राप्तश्च कथा यथा हि कुत्रचिद् ग्रामे शत्रुघ्न इति कोऽप्यभूत् । पुरुषस्तस्य भार्या च बभूव व्यभिचारिणी ॥१८२॥ स ददर्श कदा सायं भार्या तां जारसङ्गताम् । जघान तं च तज्जारं खड्गेनान्तर्गृहस्थितम् ॥१८३॥ रात्र्यपेक्षो च तस्थौ स द्वारि भार्या निरुध्य ताम् । तत्कालं च निवासार्थी तमत्र पथिकोऽभ्यगात् ॥१८४॥ दत्त्वा तस्याश्रयं युक्त्या तेनैव सह तं मृतम् । पारदारिकमादाय रात्री तत्राटवीं ययौ ॥१८५॥ तत्रान्धकूपे यावत्स शवं क्षिपति तं तया । तावदागत्य पश्चात्क्षिप्तः सोऽप्यत्र भार्यया ॥१८६॥ एवं कुयोषित्कुरुते किं किं नाम न साहसम् । इति स्त्रीचरितं वाणोप्यनिन्दत्सोऽत्र गोमुखः ॥१८७॥ ततो नागावने तत्र नागानभ्यर्च्य स स्वयम् । नरवाहनदत्तोऽगात् स्वावासं सपरिच्छदः ॥१८८॥ राजनीतिवादः तत्र जिज्ञासुरम्येषु मन्त्रिणान् गोमुखादिकान् । जानन्नपि स पप्रच्छ राजनीति समुच्चयम् ॥१८९॥ १ अत्र समुपवर्णिता राजनीतिः कामन्दकशुक्रमनुचाणक्यवादिमतानुसारिणी प्रतीयते ।

षष्ठ लम्बक ८१

षष्ठ लम्बक ८१ आश्चर्य है कि ब्रह्मा ने पहले साहस को उत्पन्न किया और उसके पश्चात् ही स्त्रियों को। इन स्त्रियों के लिए स्वभावतः कुछ भी कर डालना कठिन नहीं है। स्त्री की सृष्टि अवश्य ही अमृत और विष दोनों से की गई है, यद्यपि वही स्त्री अनुरक्त होने पर अमृत के समान और विरक्त होने पर विष के समान हो जाती है॥१७७-१७८॥ बाहर से देखने में सुन्दर और गुप्त रूप से पाप करनेवाली स्त्री उस बावली के समान है जिसमे जल के ऊपर तो कमल खिले हों और भीतर भीषण मगर तथा हिंसक जन्तुओं से पूर्ण हो॥१७९॥ कोई ही गुणवती और सुभगी सूर्य की निर्मल प्रभा के समान स्वर्ग से आती है, जो पति का गुणगान करनेवाली होती है॥१८०॥ पति के प्रति विरक्त और पर-पुरुषों पर वासक्त एवं वैराग्य-रूपी विष से भरी हुई स्त्री नागिन के समान अपने पति का विनाश कर देती है॥१८१॥ शत्रुघ्न और उसकी दुष्टा स्त्री की कथा इसी प्रकार, किसी गाँव में शत्रुघ्न नाम का एक पुरुष रहता था और उसकी स्त्री व्यभिचारिणी थी॥१८२॥ उसने एक बार सन्ध्या के समय अपनी स्त्री को उसके प्रेमी से मिलते देखा और देखकर उसने घर के भीतर बैठे हुए उस स्त्री के यार को तलवार से मार दिया और रात की प्रतीक्षा में वह अपनी पत्नी को रोककर बैठा रहा। इतने ही में निवास-स्थान का इच्छुक कोई बटोही वहाँ उसके पास आया॥१८३-१८४॥ शत्रुघ्न उस पथिक को स्थान देकर और युक्तिपूर्वक उसे भी मारकर, उस व्यभिचारिणी को लेकर जंगल में चला गया॥१८५॥ जंगल में जाकर जब वह उस शव को एक अँधेरे कुँए में फेंकने लगा इतने ही में पीछे से आती हुई उसकी स्त्री ने उसे भी उसी कुँए में ढकेल दिया॥१८६॥ इस प्रकार दुष्टा स्त्री कौन-सा साहसिक कार्य नहीं कर सकती। गोमुख ने बालक होते हुए भी इस प्रकार स्त्री चरित्र की निन्दा की॥१८७॥ तदनन्तर वह नरवाहनदत्त वहाँ पर नागों की पूजा करके अपने परिवार और साथियों सहित अपने निवास-स्थान पर लौट आया ॥१८८॥ राजनीति का सार एक दिन जिज्ञासु नरवाहनदत्त ने जानते हुए भी अपने मन्त्रियों से राजनीति का सार पूछा॥१८९॥ १. यह नीति-वर्णन कामन्दकनीति शुक्रनीति, मनु और याज्ञवल्क्य आदि ग्रन्थों के अनुसार है। विशेष विवरण संस्कृत-टिप्पणी में देखिए।-अनु. ११

८२ कथासरित्सागर

८२ कथासरित्सागर सर्वस्तत्वं सभाप्येतद् ब्रूमः पृष्टा वयं त्वया। इत्युक्त्वा सारमन्योन्यं ते निश्चित्यैवमब्रुवन् ॥१९०॥ आरुह्य नृपति पूर्वमिन्द्रियाश्वान् वशीकृतान्। कामक्रोधादिकां जित्वा रिपूनाभ्यन्तरांश्च तान् ॥१९१॥ ज्रयेदात्मानमेवादी विजयायान्यविद्विषाम्। अजितात्मा हि विवशो वशी कुर्यात्कथं परम् ॥१९२॥ ततो जानपदत्वादिगुणयुक्तांश्च मन्त्रिणः। पुरोहितं चाध्वंशं कुर्याच्च तपोनन्वितम् ॥१९३॥ उपाधिभिर्भये लोभे धर्मे कामे परीक्षितान्। योग्येष्वमात्यान् कार्येषु युञ्जीतान्तरवित्तमः ॥१९४॥ सत्यं द्वेषप्रयुक्तं वा स्नेहोक्तं स्वार्थसंहतम्। वचस्तेषां परीक्षेत मिथः कार्येषु जल्पताम् ॥१९५॥ सत्ये तुष्येदसत्ये तु यथार्हं दण्डमाचरेत्। जिज्ञासेत पृथक् चैषां चारैराचरितं तथा ॥१९६॥ इत्यनावृतवृक्षस्यन् कार्याण्युत्थाय कण्टकान्। उपार्य्य कोषडण्डादि साधयेद् दृढमूलताम् ॥१९७॥ उत्साहप्रभुतामन्त्रशक्तिन्त्रययुतस्तत १ परदेशजिगीषुः स्याद् विचार्य स्वपरान्तरम् ॥१९८॥ आदौ धूतान्वितं प्राज्ञेमन्त्रं कुर्यादनायतम्। तैनिश्चितं स्वबुद्ध्या यत्सर्वाङ्गं परिशोधयेत् ॥१९९॥ सामदानाद्युपायज्ञो योगक्षेमं प्रसाधयेत्। प्रयुञ्जीत ततः सन्धिविग्रहादीन् गुणांश्च' षट् ॥२ ०० ॥ एवं वितन्द्रो विदधत्स्ववेशपरवेदाभोः। धिन्तां राजा जयत्येव न पुनर्जतु जीयते ॥२०१॥


१ अयं परीक्षाप्रकारः कामन्दके चतुर्थे सर्गे पञ्चत्रिंशत्तमे श्लोके समुल्लिखितः। २ याज्ञवल्क्यस्मृतौ प्रथमाध्याये ३३८ संख्याकः श्लोको द्रष्टव्यः। ३ कामन्दके नवमे सर्गे षोडशधा सन्धिः प्रतिपादितः।

षष्ठ लम्बक ८ ३

षष्ठ लम्बक ८ ३ 'आप तो सब कुछ जानते हैं फिर भी आपके पूछने पर हमलोग कहते हैं'—इस प्रकार रहकर मन्त्रियों ने परस्पर निश्चय करके कहा—॥१९०॥ "युवराज राजा को चाहिए कि वह सबसे पहिले इन्द्रिय-रूपी घोडों पर चढ़कर काम क्रोध लोभ आदि भीतरी शत्रुओं को जीतकर, अन्य बाहरी शत्रुओं को जीतने के पहले इस प्रकार अपनी आत्मा पर ही विजय प्राप्त करे ॥१९१॥ जो आत्मविजय ही नहीं कर पाया वह स्वयं विवश या पराधीन दूसरों पर क्या विजय प्राप्त कर सकेगा ? ॥१९२॥ आन्तरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके जनपद रस आदि की उन्नति करनेवाले मन्त्रियों तथा अथर्ववेद को जाननेवाले चतुर एवं तपस्वी पुरोहित की नियुक्ति करे। तदनन्तर राजा को भय में क्रोध में लोभ में और धर्म में उन लोगों की कपट-परीक्षा करके उनके हृदयों को भली भाँति जानकर उन्हें योग्य कार्यों पर नियुक्त करे ॥१९३ १९४॥ इस प्रकार, उनकी बातों की भी परीक्षा करनी चाहिए कि वे आन्तरिक स्नेह से बातें करते हैं या स्वार्थ अथवा कपटपूर्ण होकर। पारस्परिक वार्तालाप से उनकी यह परीक्षा करनी चाहिए। सत्य बात पर प्रसन्न होना और असत्य बात पर दंड देना चाहिए। उनके चरित्रों का पता भी अलग-अलग गुप्तचरों द्वारा लगाना चाहिए। इस प्रकार, आँखें खोले रहकर चौतर्फे राज्य के कार्यों को देखते हुए, विरोधियों को उखाड़कर, कोष और सेना का बल संग्रह करके अपनी जड़ सुदृढ़ कर लेनी चाहिए ॥१९५ १९७॥ तदनन्तर प्रभाव उत्साह और मन्त्र —इन तीनो शक्तियों से युक्त होकर अपने और शत्रु के बलाबल को भली भाँति समझकर दूसरे देशों को जीतने की इच्छा करनी चाहिए ॥१९८॥ अत्यन्त विश्वासी नीति आदि शास्त्रा को जाननेवाले प्रतिभाशाली मन्त्रियों से मन्त्रणा करनी चाहिए। उनके निर्णयों को अपनी बुद्धि द्वारा कार्यान्वित करके राज्य के सभी अंगों को दृढ़ करना चाहिए ॥१९९॥ साम दाम आदि उपायों से योग और क्षेम की साधना करनी चाहिए और सन्धि विग्रह आदि छह् गुणों का प्रयोग करना चाहिए ॥२ ०० ॥ इस प्रकार आलस्य और प्रमाद-रहित होकर जो राजा अपने और पराये देश की चिन्ता करता है, वह सदा विजयी रहता है और किसी से जीता नहीं जा सकता ॥२०१॥

अज्ञस्तु कामलोभान्धो यथा मार्गप्रदर्शिभिः। नीत्वा श्वभ्रेषु निक्षिप्य मुष्यते धूर्तभेटकैः ॥२०२॥ नैवावकाशं लभते राज्ञस्तस्यान्तिके परः। धूर्तेर्निवद्धवाटस्य घालेरिव कृपीवरुः ॥२०३॥ अन्तर्भूय रहस्येषु तैर्वशीक्रियते हि सः। तत्र धीरविशेषज्ञात् बिभ्रा तस्मात् पलायते ॥२०४॥ तस्माज्जितात्मा राजा स्याद्युक्तदण्डो विशेषवित्। प्रजानुरागादेव हि स भवेद् भाजनं श्रियः ॥२०५॥

शूरसेननृपतेः तन्मन्त्रिणाम्च कथा पूर्वं च शूरसेनाख्यो मृत्तकप्रत्ययो नृपः। सचिवैः पेटकं कृत्वा भुज्यते स्म वशीकृतः ॥२०६॥ यस्तस्य सेवको राज्ञस्तस्मै तन्मन्त्रिणोऽत्र ते। दातुं नैच्छंस्तृणमपि दित्सत्यपि च भूपतौ ॥२०७॥ तेषां तु सेवको योऽत्र बभूवस्तस्मै स्वयं च ते। ते च विज्ञप्य राजानमनर्हायाप्यदापयन् ॥२०८॥ तद्दृष्ट्वा स नृपः बुद्ध्या शनैस्तद्धूर्तपेटकम्। अन्योन्यं प्रज्ञया युक्त्या सचिवास्तानभेदयत् ॥२०९॥ भिन्नेषु तेषु नष्टेषु मिथः पैशुन्यकारिषु। सम्यक्शशास राज्यं तत्स राजाऽथैरवञ्चितः ॥२१०॥ हरिसिंहश्च राजामूत्सामान्यो नीतितत्त्ववित्। कृतभक्त्युपसामात्यः सदुर्गः सार्थसञ्चयः ॥२११॥ अनुरक्ताः प्रजाः कृत्वा चेष्टते स्म यथा तथा। चक्रवर्त्यभियुक्तोऽपि न जगाम पराभवम् ॥२१२॥ एष विचार्यचिन्ता च सारं राज्येऽधिकं नु किम्। इत्याद्युक्त्वा यथास्वं ते विरेमुर्गोमुखादयः ॥२१३॥ नरवाहनदत्तश्च तेषां श्रद्धाय तद्वचः। चिन्त्ये पुरुषारम्भेऽप्यचिन्त्यं दैवमभ्यधात् ॥२१४॥


१ आसन्नवृक्षमुर्गुरारभ्य इत्यभिधीयते। —कामन्दके।

मूर्ख सामान्य और लोभी राजा झूठे और अनुचित माप प्रदर्शित करनेवाले धूर्ती और ठगों द्वारा गड्ढे में गिरा-गिराकर भ्रष्ट कर दिया जाता है। इस प्रकार के स्वार्थयों से घिरे हुए मूर्ख राजा के पास बुद्धिमान् और श्रेष्ठ व्यक्ति उसी प्रकार नहीं जा सकते जिस प्रकार निपुण किसान द्वारा लगाई गई बाड़ को पारकर धान के खेत तक नहीं पहुँचा जा सकता ॥२ २-३ ॥।

ऐसा राजा धूर्तों का अन्तरङ्ग बन जाता है और अपना रहस्य प्रकट कर बैठता है। फलतः, वह उनके वश में हो जाता है। और, ऐसे मूर्ख जनभिन्न राजा से खिन्न होकर राज्यलक्ष्मी भाग जाती है ॥२ ४॥

इसलिए राजा को आत्मविजयी, उचित दंड देनेवाला और राजनीति आदि में विशेषज्ञ होना चाहिए। ऐसा होने पर प्रजा के प्रेम से वह राजा लक्ष्मी का निवास-स्थान का पात्र बन पाता है ॥२ ५॥

राजा शूरसेन और उसके मन्त्रियों की कथा

प्राचीन समय में शूरसेन नाम का एक राजा था जो एकमात्र सेवको पर विश्वास किया करता था। वे सेवक एक दल बनाकर राजा को वश में करके उसे चूमा करते थे ॥२ ६॥

जिस योग्य सेवक को राजा कुछ देना भी चाहता था मन्त्रिगण उस एक तिनका भी नहीं देन देते और जो उनके निजी चापलूस नौकर थे उन्हें वे स्वयं भी देत और राजा द्वारा भी दिलाते थे ॥२ ७-८ ॥

यह सब देखकर और उन धूर्तों के दल को समझकर राजा ने अपनी बुद्धि से उनमे परस्पर फूट उत्पन्न करा दी ॥२ ९॥

फूट के कारण उन चुगलखोर सेवकों के पृथक हो जाने पर अन्य अच्छे और सुधी व्यक्तियों से युक्त वह राजा भली भाँति शासन करने लगा ॥२१० ॥

हरिदत्त नाम का एक नीतिज्ञ और साधारण राजा था उसने अपने महल मन्त्री रखे थे। सुदृढ वित्त और बल का संग्रह भी पर्याप्त किया था। वह प्रजा को अपने प्रति अनुरक्त करके जैसा चाहता था वैसा करता था। इसी कारण वह एक चक्रवर्ती राजा के आक्रमण करने पर भी पराजित न हो सका ॥२११ २१२॥

इसलिए विचार और चिन्तन के अतिरिक्त राज्य का सार और क्या हो सकता है? इतना कहकर अपनी-अपनी सम्मति देकर गोमुख आदि मन्त्री चुप हो गये ॥२१३॥

नरवाहनदत्त ने उनके विचारो पर श्रद्धा प्रकट करते हुए कहा— पुरुष का कर्तृव्य चिन्तनीय होने पर भी दैवगति अचिन्तनीय है ॥२१४॥

८६ कथासरित्सागर

८६ कथासरित्सागर ततश्चोत्थाय तत्रैव क्षात्रं तां प्रेक्षितुं ययौ। स विरम्बकृतोत्कण्ठां प्रियां मदनमञ्जुकाम् ॥२१५॥ प्राप्ते तन्मन्दिरे तस्मिन्नामनस्ये कृतादृशः। क्षण स्फुरितनेनाय गोमुख विस्मिताब्रवीत् ॥२१६॥ नरवाहनदत्तंश्च राजसूतामनागते। उत्सुका पदवीमस्य द्रष्टु मदनमञ्जुषा ॥२१७॥ हर्म्याग्रभूमिमारूढा गोमुखानुगता मया। यावत्तावत्पुमानेको नभसोऽत्रावतीर्णवान् ॥२१८॥ स किरीटी च खड्गी च मां दिव्याकृतिरब्रवीत्। अह मानसवेगाख्यो राजा विद्याधरेश्वरः ॥२१९॥ स्वस्त्री सुरभिदत्ताख्या स्व च शापच्युता भुवि। सुता च सव दिव्ययमेतन्न विन्त्रि किम ॥२२०॥ तदहि म सुतामेतां मच्चम्व गच्छतो ह्ययम्। इत्युक्त तन् रहमा विहस्याहं समग्रवम् ॥२२१॥ नरवाहनदत्तोऽस्या भर्त्ता दवनिर्मितः। सर्वेषां यत्र युष्माकं चक्रवर्ती भविष्यति ॥२२२॥ इत्युक्तः स मयात्याज्य ख्याम् विद्याधरो गतः। मन्दुर्नीनयनादेवकाराण्डवितुन्नतोषम ॥२२३॥ गच्छन्त्या गोमगा रात्रौप्रत्नान्नग्गिमस्वामिनोह न । शत्रपुत्रेन्नग्णिासन्नुदुष्यामु भाविनं प्रभुम् ॥२२४॥ पातं विधातुमप्येष्यन्तमद्य विद्याधरा रिताः। उक्त्वाऽतो निधनार्थं च वञ्चयत्विनं प्रभुम् ॥२२५॥ गत्वाच रक्षितं पालाद् गतानाञ्च शम्भना। मार्गावारयिष नातमाप्यमाना श्श मया ॥२२६॥ अद्य विद्याधराः सन्त्र्यवरप्रसाद विशाधिनः। श्श्या कश्चित्त्गनेनात् गधुष्यान्मभियाडवीर्र ॥२२७॥ भाजना सहि नो यावन् मद्धर्म्मसमन्चता। सच्दा गन्तुश श्कि स चास्तु विशाद्यते॥ २२८॥ ल्लान्तारूगवातं गत्वा तां शापशान्ये। उपत्यन्तेव शौण्डिभ्यन् गत्वा प्रदेशामिति ॥ २२९॥

षष्ठ लम्बक ८७

षष्ठ लम्बक ८७ तब नरवाहनदत्त अपने उन साथियों के साथ चिरकाल से उत्कण्ठित प्रिया मदनमंचुका को देखने के लिए गया ॥२१५॥ उसके निवास-स्थान पर पहुँचते ही आसन पर बैठकर स्वागत-सत्कार करती हुई विस्मित कलिङ्गसेना गोमुख से कहने लगी—॥२१६॥ 'गोमुख राजकुमार नरवाहनदत्त के यहाँ न आने पर, अर्थात् उनके आने से पूर्व उनके आने की प्रतीक्षा में उत्कण्ठिता मदनमंचुका भवन के ऊपर की छत पर चढ़ी और उसके पीछे मैं भी गई। इतने में ही एक दिव्य मुकुटधारी पुरुष आकाश से उतरा ॥२१७-२१८॥ उसके हाथ में तलवार थी और सिर पर किरीट था। उस दिव्य पुरुष ने मुझसे कहा— 'मैं मानसवेग नामक विद्याधरों का राजा हूँ ॥२१९॥ तू शाप से पतित सुरभिला नाम की स्वर्गीय स्त्री है। तुम्हारी कन्या भी दिव्य स्त्री है। यह मुझे ज्ञात है ॥२२० ॥ इसलिए तू इस कन्या को मुझे दे दे। उसका और मेरा यह सम्बन्ध योग्य है। उसके इस प्रकार कहने पर मैंने हँसकर कहा—॥२२१॥ देवताओं द्वारा पहले से ही निश्चित किया गया नरवाहनदत्त इसका पति हो चुका है। वह तुम सब विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा ॥२२२॥ मेरी कन्या को ले जाने के लिए आरम्भित उसकी बिजली के समान मुझसे इस प्रकार कहकर वह विद्याधर आकाश में उड़ गया ॥२२३॥ यह सुनकर गोमुख बोला— हमारा यह राजकुमार नरवाहनदत्त जब उत्पन्न हुआ था तभी आकाशवाणी ने सूचना दी थी कि वह विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा होगा। इसलिए उसे अपना भावी राजा समझकर विद्याधरगण उसे नष्ट करने का प्रयत्न कर रहे हैं। किन्तु कोई भी दुष्ट बलवान् विधि के विधान के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता। भगवान् शंकर ने उसकी रक्षा के लिए गण को नियुक्त किया है ऐसा नारद मुनि ने यह पिता से कहा है और उनसे मैंने सुना है ॥२२४-२२६॥ इसीलिए ये विद्याधर इस समय हमारे विरोधी बने हुए हैं। इतना कहकर कलिङ्गसेना अपने रोते हुए दामाद के रूप में बातें — दर्प भले ही समाप्त मदनमंचुका सहित नहीं की उन्होंने या हँसी नहीं जाती है गोमुख ही समझदार उपाय कर उसने विचार कर कार्य नष्ट कर दिया गया ॥२२७-२२८॥ कलिङ्गसेना की बातें सुनकर दामाद आदि कहने लगे कि इस कार्य के लिए शीघ्र ही वासवदत्त को सूचित करो ॥ ॥

८८ कथासरित्सागर

८८ कथासरित्सागर ततस्तद्विगतभीस्तस्मिन्नुद्याने व्यहरद्दिनम्। नरवाहनदत्तस्तां पश्यन् मदनमञ्जुकाम् ॥२३०॥ उत्फुल्लपद्मवदनां दलत्कुवलयेक्षणाम्। बन्धूककमनीयोष्ठीं मन्दारस्तबकस्तनीम् ॥२३१॥ शिरीष सुकुमाराङ्गीं पञ्चपुष्पमयीमिव। एकामेव जगज्जैत्रीं स्मरेण विहितामिषुम् ॥२३२॥ कलिङ्गसेनाऽप्यन्येद्युर्गत्वा वत्सेश्वरं स्वयं। सुताविवाहहेतोस्तद्यथामीष्टं व्यजिज्ञपत् ॥२३३॥ वत्सेशोऽपि विमृश्यैतामाहूय निजमन्त्रिणः। देव्यां वासवदत्तायां स्थितायां निजगाद तान् ॥२३४॥ कलिङ्गसेना त्वरते सुतोद्वाहाय तत्कथम्। कुर्मो यद्वचकीत्येतां लोको वक्ष्यत्यसामिति ॥२३५॥ लोकोऽथ सर्वदा रक्ष्यस्तत्रावेहि किं पुरा। रामभद्रेण शुद्धापि त्यक्ता देवी न जानकी ॥२३६॥ अम्बा हृतापि भीष्मेण बलाद् भ्रातुः कृते तथा। प्रतीपं किं न वा रक्ष्यं वृत्तपूर्वैरन्यभर्तृका ॥२३७॥ एवं कलिङ्गसेनषा स्वयंवरवृते मयि। व्यूढा मदनवेगेन तेनैतां गर्हते जनः ॥२३८॥ अतोऽस्यास्तनयामेतां गान्धर्वेविधिना स्वयम्। नरवाहनदत्तोऽसावुद्वहत्वनुरूपिकाम् ॥२३९॥ इत्युक्ते वत्सराजन स्माह यौगन्धरायणः। इच्छेत्कलिङ्गसेनेतःनौचित्यं न च प्रभो! ॥२४०॥ न्ध्येषा हि न सामान्या गन्तुसेत्यगङ्गोद्गतम्। मित्रण चैतदुक्तं मे ज्ञानिना ब्रह्मराक्षसा ॥२४१॥ इत्यादि तत्र ते यावद् विमृशन्ति परस्परम्। एवं माहेश्वरी वाणी तावत् प्रादुरभूद् दिवः ॥२४२॥ मत्रेवानल्दग्यस्य सृष्ट्म्यात्र मनोभुवः। नरवाहनदत्तस्य भार्यैषा विनिर्मिता ॥२४३॥ तपस्तुष्टेन भार्यास्य रतिर्मदनमञ्जुका। एतया मद्विशिष्यार्थं मर्वान्तिपुरमृध्यता। ॥२४४॥ विद्याधरगणिपत्यं श दिव्यं वन्यं करिष्यति। मत्प्रसादाद् विजिक्ष्यागीतियुक्त्वा विरराम खात् ॥२४५॥

षष्ठ लम्बक ८१

षष्ठ लम्बक ८१ तब नरवाहनदत्त उस दिन मन्दारगुच्छ के समान स्तनोंवाली शिरीष-सुमन के समान मुखमण्डल विकसित कमल के समान मुखवाली और प्रफुल्ल कुमुदों के समान नेत्रोंवाली दुपहरिया फूल की भाँति लाल होठों वाली मानों जगद्विजय के लिए निर्मित कामदेव के एक बाण के समान उस मदनमञ्चुका के साथ उद्यान में विहार करता रहा ॥२३ २३२॥ दूसरे दिन कलिङ्गसेना ने भी स्वयं वत्सराज के पास जाकर अपना अभिलषित प्रस्ताव निवेदित किया जो कन्या-विवाह के सम्बन्ध में था ॥२३३॥ वत्सराज ने भी कलिङ्गसेना को विदा करके अपने मन्त्रियों को बुलाकर रानी वासवदत्ता की उपस्थिति में उनसे कहा—॥२३४॥ 'कलिङ्गसेना कन्या के विवाह के लिए शीघ्रता कर रही है। अतः हम यह विवाह कैसे करें क्योंकि उस साध्वी को भी लोग व्यभिचारिणी कहते हैं ॥२३५॥ जनापवाद से तो सदा बचना ही चाहिए। प्राचीनकाल में श्रीरामचन्द्रजी ने जनापवाद के ही कारण क्या जानकी को नहीं त्याग दिया था ? ॥२३६॥ भीष्म ने अपने भाई के लिए अपहरण की गई पूर्व-विवाहित अम्बा को क्या नहीं छोड़ दिया था ? ॥२३७॥ इसी प्रकार कलिङ्गसेना स्वयंवर द्वारा मेरा वरण कर लेने पर भी मदनवेग से विवाहित हुई। यही कारण है कि लोग इसकी निन्दा करते हैं ॥२३८॥ इसलिए नरवाहनदत्त अपने अनुकर इसकी कन्या को गान्धर्व-विधि से विवाहित कर लेगा ॥२३९॥ वत्सराज के ऐसा कहने पर यौगन्धरायण ने कहा—'स्वामिन् ! यदि कलिङ्गसेना ऐसा चाहती है तो यह अनुचित कैसे हो सकता है ? वह साधारण नहीं दिव्य स्त्री है। इसलिए इसकी कन्या भी दिव्य है। यह बात मेरे मित्र ब्रह्मराक्षस ने मुझसे बार-बार कही है ॥२४ २४१॥ इस प्रकार जब वे परस्पर विचार कर ही रहे थे इतने ही में आकाश से दिव्यवाणी सुनाई पड़ी —॥२४२॥ 'मेरे नेत्रानल से दग्ध कामदेव के अवतार नरवाहनदत्त के लिए मैंने ही कामदेव की भार्या रति के तप से सन्तुष्ट होकर इस मदनमंचुका की सृष्टि की है। यह नरवाहनदत्त की प्रधान महिषी होकर, मेरी कृपा से शत्रुओं को जीतकर दिव्य मलयपर्यन्त विद्याधरों की साम्राज्ञी बनी रहेगी इतना कहकर दिव्यवाणी मौन हो गई ॥२४३ २४५॥ ११

८१० कथासरित्सागर

८१० कथासरित्सागर नरवाहनदत्तस्य मदनमञ्‍चुकायाश्च विवाहः श्रुत्वैतां भगवद्वाणीं वत्सेन सहपरिच्छदः। सं प्रणम्य सुतोद्वाहे सानन्दो निश्चय व्यधात् ॥२४६॥ अथ स सचिवमुख्यै पूर्वविज्ञाततत्त्व नरपतिरभिनन्द्याहूय मोहूर्त्तिकांश्च। शुभफलदमपृच्छल्लग्नमूचुस्तु ते तं कतिपयदिनमध्ये भावि प्राप्तपूजाः ॥२४७॥ कालं मनागनुभविष्यति कश्चिदत्र पुत्रो वियोगमनया सह भार्यया च। जानीमहे वयमि' निजशास्त्रदृष्ट्या वत्सेश्वरेति जगदुर्गणका पुनस्ते ॥२४८॥ ततःससूनोर्निजवैभबोचितं विवाहसम्भारविधिं व्यधान्नृपः। तथा यथास्य स्वपुरी म केवलं पृथिव्यपि क्षोभमगातदुद्यमात् ॥२४९॥ प्राप्ते विवाहदिवसेऽथ कलिङ्गसेना पित्रा निसृष्टनिजदिव्यविभूषणायाः। तस्याः प्रसाधनविधिं दुहितुश्चकार सोमप्रभा पतिनिवेशवशागता च ॥२५०॥ कृतदिव्यकौतुका सा सुतरामेव मदनमञ्चुका व्यभौ। मन्वेषमेव कान्ता चन्द्रतनुः कान्तिकानुगता ॥२५१॥ दिव्याङ्गनाश्च तस्या दूराच्च श्रूयमाणगीतरवाः। तद्रूपजिताच्छम्भा ह्रीता इव गङ्गरुं विदधुः ॥२५२॥ भक्तानुकम्पिनि जयात्रिसुतं त्वयाद्य रत्त्यास्तपः स्वयमुपेत्य कृतं कृतार्थम्। इत्यावि दिव्यवरचारणवाद्यमिश्र-- वाक्सानुमेयमपि सन्दिदृशेऽत्र गौर्या ॥२५३॥ अथ नरवाहनदत्त प्रविवेश मदनमञ्चुकाध्युषितम्। कृतवरकौतुकसोमी विविधमहातोद्यभूवृविवाहगृहम् ॥२५४॥ निर्वर्त्य तत्र बहुलोद्यतविप्रमत्तबीवाह मङ्गलविधिं च वधूबरी तौ। वेदीं समारुरुहतुर्ज्वलिताग्निमुच्चै राज्ञो शिरोमणिमिवामलरत्नदीपाम् ॥२५५॥

षष्ठ लम्बक ८११

षष्ठ लम्बक ८११ नरवाहनदत्त और मदनमंचुका का विवाह वत्सराज ने अपने साथियों-सहित इस प्रकार भगवद्वाणी को सुनकर उसे प्रणाम किया और पुत्र के विवाह के लिए आनन्द के साथ निर्णय किया॥२४६॥ तदनन्तर वत्सराज ने सारी वास्तविक स्थिति को समझनेवाले मुख्यमन्त्री यौगन्धरायण का अभिनन्दन करके और ज्योतिषियों को बुलाकर शुभफल देनेवाला विवाह-लग्न पूछा और समुचित दक्षिणा आदि से पुरस्कृत ज्योतिषियों ने कुछ ही दिनों में विवाह-लग्न निश्चित कर दिया॥२४७॥ ज्योतिषियों ने कहा—'महाराज आपका यह पुत्र कुछ दिनों तक इस पत्नी के वियोग का कष्ट झेलेगा यह हमलोग शास्त्र की दृष्टि से जानते हैं॥२४८॥ तदनन्तर राजा ने अपने वैभव के अनुसार पुत्र के विवाह की तैयारी आरम्भ की। उसकी तैयारी के उद्योग से केवल कौशाम्बी नगरी में ही नहीं प्रत्युत सारी पृथ्वी में हलचल मच गई॥२४९॥ विवाह का दिन आने पर कन्या के पिता मदनवेग द्वारा दिये गये वस्त्र और अलंकारों से माता कलिङ्गसेना ने और पति की आज्ञा से आई हुई कलिङ्गसेना की सखी सोमप्रभा ने कन्या मदनमंचुका को विवाहोचित रूप में सुसज्जित कर दिया॥२५०॥ दिव्य सामग्री से अलंकृत मदनमंचुका इतनी सुन्दर लग रही थी जैसे कात्तिक मास (शरदऋतु) में चन्द्रमा शोभित होता है॥२५१॥ शिवजी की आज्ञा से आयी हुई दिव्य स्त्रियाँ मदनमंचुका के रूप से पराजित होकर अतएव लाज से छिपकर मानों मंगल-गान कर रही थीं॥२५२॥ भक्तों पर दया करनेवाली हे पार्वती ! तुम्हारी जय हो। तुमने आज स्वयं उपस्थित होकर रति के तप को सफल किया'—इत्यादि वाक्यों से वे देवी की स्तुति करने लगीं और गन्धर्व गण वाद्य-ध्वनि करने लगे॥२५३॥ वर के वेष में सुसज्जित अतएव शोभित नरवाहनदत्त वाद्यों की ध्वनि से मुखरित और मदनमंचुका से अलंकृत विवाह-मंडप में प्रविष्ट हुआ॥२५४॥ बड़े-बड़े विद्वान् ब्राह्मणों द्वारा विवाह-विधि को सम्पन्न करके वर और वधू राजा के किरीट-स्थित निर्मल रत्नदीपों के समान देदीप्यमान अग्नि की प्रदक्षिणा के लिए वेदी के निकट गये॥२५५॥

८१२ कथासरित्सागर

८१२ कथासरित्सागर यदि युगपदिहेन्दुमूर्तिमान् कनकगिरिं भ्रमतोऽभितः कदाचित् । भवति तदुपमा तयोस्तदानीं जगति वधूवरयोः प्रदक्षिणेऽग्नेः ॥२५६॥ यथा विवाहोत्सवतूल्यनादा नपोधमन्दन्दुभयोऽन्तरिक्ष । तथा वधूत्सारितहोमलाजाः सुरोज्झिताः कौसुमवृष्टयोऽत्र ॥२५७॥ सत कनकराशिभिर्मणिमयैश्च जामातर समर्धयदुदारधीः किल शशिकूसेना तया। यथात्र बुबुधे जनैरपि सुदुर्गंतोऽस्या पुरः स काममलकापतिः कृपणभूभृताऽन्ये तु के ॥२५८॥ निष्पन्नावृद्यचिराभिमतस्यानुरूप— पाणिग्रहोत्सवविधौ च वधूवरौ तौ। अभ्यन्तरं विविशतुः प्रमदोपरुद्धं लोकस्य मानसमिवामलचित्रमक्ति ॥२५९॥ सङ्वाहिनीपरिगतैरपि विश्ववन्द्य शौर्याधितैरपि जितावनतैर्नरेन्द्रैः। सा वारिराशिभिरिवाशु पुरी पुपूरे वत्सेश्वरस्य सवुपायनरत्नहस्तैः ॥२६ ॥ अनुजीबिजनाय सोऽपि राजा व्यकिरद्धेम तथा महोत्सवेऽस्मिन् । यदि परमभवन्न जातरूपा जननीगर्भंगता यथास्य राष्ट्रे ॥२६१॥ वरचारणनर्तकीसमूहैर्विविधदिगन्तसमागतैस्तदात्र। परितः स्तवनृत्तगीतवाद्यैर्बुबुधे तन्मय एव जीवलोकः ॥२६२॥ वातोद्धूतपताकाबाहुलसा नोरुखेऽत्र कौशाम्बी। सापि ननर्तेव पुरी पौरस्त्रीरचितमण्डनाभरणा ॥२६३॥