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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

( ६ ) शापकृत मानसिकखेद, छूत रोग, वात रोग को दूर करता है और विष तुल्य मादक प्रभावकारी कृमियों को नष्ट करता है। भूतोन्माद का नाशक है। घृताची-देखो बड़ी इलायची चीपद्रु (चीड़वृक्ष) विविध फुन्सी, फोड़ों विद्रधि को नष्ट करता है। जङ्गिडमणि—मोह आदि मानसिक रोगों को दूर करती है। और अनेक प्रकार के असाध्य रोग कृत्या द्वारा किये रोगों को नाश करता है। जीवन्ती—जीवन देने, रोग दूर करने, स्वास्थ्य रक्षक, बल पुष्टि देनेवाली रसायन है। जीवला—(सिंह पिप्पली) पशुओं के रोगों को दूर करती है। तरुणक—(तृण रोहिष तृण) सर्प के काटे विष को नष्ट करती है। तस्तुव—(कड़वी तोरी) सर्प विष को नष्ट को नष्ट करती है। तिल पिञ्जी (तिलों की मञ्जरी एवं नाल) क्षेत्रिय रोगों को नष्ट करती है और तिल नाल के भस्म खेतों के अनुपज दोष को दूर करती है। तौदी—(बड़ी इलायची) देखो पूर्व कहा। दर्भ (दाभ) सर्प के काटे विष का बन्धक है। दर्भमणि—स्वास्थ्य एवं दीर्घायु देने वाला रसायन है। दश वृक्ष (दशमूल) सन्धिवात मस्ति- ष्कवात (मृगी,) रोगों का नाशक है। दासी-(काकजङ्घा) ज्वर को नष्ट करता है। दृत्ति (जोक प्राणी) सर्प काटे विष को चूसने वाली है। देवी (सौराष्ट्र की मट्टि) केशों को लम्बे, काले, दृढ़ बना देती है। नघमार—(कुष्ठभेद मीठा कुष्ठ) शिरो रोग, तृतीयक, सन्तत, ऋतु ज्वर को नष्ट करता है। नघारिष—(कुष्ठभेद कड़वाकूट) उपरोक्त गुण वाला है। नमः—(वज्र अभ्रक) दर्भमणि के गुण जानो। नलदी (जटा- मांसी) विषतुल्य मादक प्रभाव वाले कृमियों को नष्ट करती है। नवती (पिपीलिकायें) सर्प काटे विष को नष्ट करती है। परुषवार— (मूंज) सर्प काटे विप का बन्धक है। पर्जन्य (दारु हल्दी) स्वास्थ्य और आयु को प्रदान करती है, रसायन है। पर्णमणि = इसमें सोमलता के सब गुण हैं। पाढा (पाठा, पाढ़) शस्त्र प्रहार के घाव को अत्यन्त लाभ दायक है। पिङ्ग (हरिताल) प्रसूति रोग, गर्भ भक्षक कृमियों, मृतवत्सा रोग जन्म कर सन्तान मरजाने के रोग को नष्ट करती है। पिप्पली (पीपल दवा) आक्षेपक, पक्षाघात, गठिया, आदि वातरोग को नष्ट करती है। जीवन देनेवाली रसायन है। पीला (पिप्पली) विषतुल्य मादक प्रभावकारी, कृमियों को नष्ट करती है। भूतोन्माद नाशक है। पृश्निपर्णी (पृष्टिपर्णी) बवासीर, दाद, कुष्ठ- रोग, योनिविकार, गर्भक्षय, आदि कृमियों से आक्रान्त रोगों को नष्ट

( ७ ) करती है। विशेषतः योनिदूषक और गर्भघातक कृमियों को नष्ट करती है। पैद्व (सफेद आक या अर्क) सर्प के काटे घाव पर लेप करने से विष को अत्यन्त निर्बल करती है, वमन विरेचन द्वारा विष प्रभाव को बहुत ही नष्ट करती है। प्रक्री-(सोमलता) नशा करने वाले स्थावर विष की मूर्च्छा और उसके प्रभाव को अत्यन्त नष्ट करती है। प्रमन्दनी (प्रमदिनी घातकी) विषतुल्य, मादक प्रभावकारी कृमियों को नष्ट करती है, भूतोन्माद नाशक है। ब्रह्म (ब्रह्म-वृक्ष उदुम्बर गूलर) 'योनिदोष, गर्भस्राव, जात घातक रोग और योनि एवं गर्भाशय में होने वाले कृमियों को नष्ट करती है। भद्रा—(कृष्ण सारिवा) रुधिर बहने, चोट से पिस जाने, दण्डेजाने, कट आने, जल जाने और हड्डी टूट जाने में हितकर हैं। भरी मूल दर्भ (उशीर-खस) क्रोध, मन के उद्वेग रूप भ्रम और उन्माद को शान्त करती है। मगध (पिप्पली) गुण पहिले कहे गये हैं। मधु (शहद) सर्प काटे विषका नाशक है। मधु- जाता (शहद की खाँड) टेढ़े चलने वाले सर्प आदि और मच्छर जैसे विष कृमियों के विष को दूर करती है)—आगे लिखी दवाओं में ये ही गुण हैं। मधुला (कपिलद्राक्षा), मधुश्रुत (महुआ) मधू (मुलहठी) मयूरी (मोरनी, उसके बच्चे) सर्पविषको चूसने नष्ट करनेवाले हैं। मित्र (अतीस) सर्पविष नाशक है। मुनि देवमूल (अगस्त्य वृक्षकी जड़) अपची-गण्डमालाओं को नष्ट करती है। यव पलाली (जौ की मञ्जरी, जौ की नाल) क्षेत्रिय रोग को हटाती है और नाल की भस्म खेत के अनुपज दोष को दूर करती है। रामा (नीलिनी, नील) गुण पहिले कहे गये। रोपणका (दूब) हलीमक, कामला, पाण्डु को नष्ट करती है। रोहिणी, (मांस रोहिणी) रुधिर स्राव, चोटसे पिसजाने, दरेडेजाने, जलजाने, कट जाने, हड्डी टूटजाने में हितकर है। लवण (नमक) ग्रीवा, कक्षा, वंक्षणमें होनेवाली विवर्ण हुई कठोर, बहने वाली अपची गण्डमालाओं का नाशक है। लाक्षा (लाख) टूटे को जोड़ने, पुराने घावों को भरने, नयों को शीघ्र ही ठीक करने, चोटको अच्छा करने वाली है। वचस्-(बचा, बच्छ) गुण पहिले कहे गये। दर्भ मणि के समान गुण। वरणमणि (वरना) वरणावती और वरण नामों में देखो। वरणावती (वरणों की पञ्चाङ्ग खान पान में स्थावर बिष को नष्ट करती है। वरुण (वरदाय वृक्ष) सर्प विषनाशक, शिरोरोग नाशक है। वाक (बक पञ्चाङ्ग अगस्त्य वृक्ष का पञ्चाङ्ग) मन्या. ग्रीवा, स्कन्ध

( ८ )

अपची गोंठा को नष्ट करता है । बाद् ( मूर्वाकन्द ) सर्पविष नाशक है । विक्षर ( समुद्र फेन ) कफमय खांसी को नष्ट करता है । विश्वरूपा ( काला अगर ) पशुओं के रोगों को दूर करता है । विष ( स्थावरविष ) सर्प के काटे विषका नाशक है । विषाणा ( मृगशृङ्ग ) क्षेत्रिय रोगों को या जन्म के हृदय रोग को नष्ट करता है । विषाणा ( मेढा सींगी ) रक्त- स्राव और वात रोग को दूर करती है । विषपुलिङ्ग का ( गुद् पुच्छ को निरन्तर ऊपर नीचे को उचकने वाली चिड़िया ) सर्प के काटे विष को नीचे के गुदा अङ्ग से चूसने वाली है। वृषा ( कपिकच्छ, कौंच ) दुबलेपन को दूर करती, नष्ट वीर्य में पुनः वीर्य स्थापन करती एवं पुरुषत्व शक्ति देती है । और स्वास्थ्य प्रद् है और वशीकरण एवं रसायन है । शकुन्तिका ( भासपक्षी ) सर्प काटे विषको चूसन कर लेती है । शङ्खमणि ( शङ्खमुक्ता मासिकरोगों को नष्ट करती है। तथा विषनाशक है। शतवार मणि ( ऋष- भक ओषधि ) पुत्रोत्पत्ति शक्ति को देती, नपुंसकता, गर्भघातक कृमियों को नष्ट करती है; ज्वर नाशक है एवं ज्वर एवं सन्दिग्ध रोगों को हटाती एवं रसायन है । शुक ( तोता पक्षी ) हलीमक, कामला, पाण्डु रोगों को नष्ट करता है । रोगी के उसके पास रहने से उक्त “रोगों को आकर्षित करता है। शूद्रा ( प्रियंगु लता ) ज्वर को नष्ट करती है। शोचि ( कुशा ) सर्प के काटे विष का बन्धन करती है । श्वेत ( अलर्क सफेद ) वमन विरेचन प्रलेप आदि द्वारा सर्प विषका अत्यन्त नाशक है । समिध ( सुगन्ध काष्ठ या शुद्ध काष्ठ ) पेटके अन्दर कीड़ों को नष्ट करती है । सहदेवी ( महाबला ) पशुओं के रोगों को दूर करती है । समुद्रफल— ईर्ष्या, मानसिक, दाह को नष्ट करता है । सुपर्ण ( गरुड़ पक्षी ) चूसने से या अपने मलमूत्र आदि से सर्प काटे विष को निर्बल करता है । सुभा ( शालपर्णी ) पशुओं के रोगों को दूर करती है । सोम ( सोमलता सोम- वल्ली, महौषधि ) सर्प के काटे विषको दूर करने की महौषधि है । मूर्छा- दि मानसिक रोगों, अयोग्य हीनदृष्टि, दूषित वाणी को ठीक करती हैं । खान पान में से कृमि दोषों को दूर करती है । स्त्री के प्रति प्रसङ्ग से हुए उरःक्षत, राजयक्ष्मा को दूर करती है । क्षेत्रिय रोगों को दूर करती है हवि ( घृत, घृतादि सुगन्ध होम ) राजयक्ष्मा, वातव्याधि, सन्दिग्ध रोग, क्षेत्रिय रोग, इत्यादि रोगों को नाश करती है । स्वास्थ्य और आयु को बढ़ाती है । हारिद्रव ( दारुहल्दी के वृक्ष) इनमें रहने, इनके दर्शन, वायु सेवन, और स्वरस कषाय के पान और अन्य योगों के सेवन

( ९ )

प्रलेप आदि से हलीमक, कामला, पाण्डुरोग नष्ट होते हैं। इसी अथर्व- वेद का यह कौशिक सूत्र—है जिसमें १६ संस्कारों को वर्णन करने के अतिरिक्त-संसार के अत्यन्त प्रयोजनीय विषयों का-उल्लेख और वर्णन है— जिनको संक्षिप्त रूप से आगे दिखलाया गया है ।

कौशिक गृह्यसूत्रम्

कौशिक सूत्र—शौनकीय आदि ४ शाखाओं का संहिता का कल्पसूत्र नामक अङ्ग का एक गृह्यसूत्र है। इस पर पं० दारिल एवं केशव संक्षिप्त टीका मूल और संस्करण श्रीमिस्रर मारीस की ब्लूमफिल्ड साहेब ने अमेरिका से प्रकाशित किया है। अब तक संसार में इसके सिवाय अन्यत्र यह कहीं नहीं प्रकाशित हुआ है। इसका अङ्गरेजी भाषा में किसी २ अंश का अनुवाद ब्लूमफिल्ड साहब कृत Hymns of Atharva veda नामक ग्रंथ में सन्निविष्ट हुआ है। इस सूत्र में अथर्ववेदोक्त मन्त्रोच्चारण के साथ अनेक प्रकारके णीय प्रक्रिया का विस्तृत विवरण है। जैसे— अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के दूसरे सूक्त में और दूसरे काण्ड के तृतीय सूक्त में देह से अत्यधिक स्राव । जैसे—उदरामय, आमाशय, इत्यादिकों के निवारण करने के लिये मुञ्जघास ( Sacch arom arrya ) और झरना का जल लेकर दो मंत्रों से प्रयोग लिखा है। कौशिक सूत्र के इन दो मंत्रों के उच्चारण के साथ निम्नलिखित करणीय प्रक्रिया का भी विवरण है। “इन दो मंत्रों के उच्चारण करते समय (जो उच्चारण करते रहें वह) एक पेड़ मुञ्जघास के सूत से रोगी के शरीर में कवच, या,यंत्र ( ताबीज ) की भांति बांध देवे। उसके बाद थोड़ी दीमक की मिट्टी को पीस कर जळ में मिला कर इस जल को रोगी को पान करावे । उसके बाद रोगी को घी लगा देवे और रोगी के गुह्य स्थान में फूक देवे ।” इस प्रकार अनेक मंत्रों के साथ अनेक प्रकार के करणीय प्रक्रिया का विवरण कौशिक सूत्र में है। यह सूत्र लिखित प्रक्रिया आदि अथर्ववेद में भी है। इस विषय में इस समय भी मतभेद


१—Koushik sutra of the Atharveda, with extract from the commentaries of daril and Keshava, edited by Maurice Bloom field, insided as vol XIV of the journal of the American oriental society.

( १० )

हैं । ※ ( किसी २ के मत में यह है जो, यह प्रक्रिया सब अथर्ववेद के मंत्र रचना समय या उसके परवर्ती काल में परिवर्त्तित हुआ है । इस कौशिकसूत्र में वर्णित प्रक्रियाओं के भैषज्यविज्ञान और चिकित्सा में अधिकतर ज्ञान दृष्ट होने से स्वतः ही मन में होता है, जो ये प्रक्रियायें अथर्ववेद के समय रहने पर भी परवर्ती काल में बदल गयी थी । प्रक्रियाओं को बदलने के सम्बन्ध में मतभेद होने पर भी कौशिक सूत्र अथर्ववेद के पीछे और आयुर्वेद ग्रन्थों के पहिले रचित हुआ था—ऐसा मानना ही पड़ेगा । अथर्ववेद के “भैषज्यानि” और “आयुष्याणि” समुदायमन्त्र । इन सब मंत्रों में अथर्ववेद के समय हिन्दुओं को आयुर्वेद के ज्ञान का परिचय पाया जाता है। कौन २ मंत्र किस २ रोग को सम्बोधन करके रचित और मंत्र रोगों के प्रतिषेधक भेषज और धातु को सम्बो- धन कर उच्चरित हुए । जो सब मंत्र रोगों के प्रति सम्बोधित हैं, उनमें विशेष २ लक्षण वर्णित हैं। दृष्टान्त स्वरूप जैसे—“तक्षण” वा “ज्वर”। इस लक्षण के अनेकों सूक्तों में वर्णित हैं—प्रथम काण्ड, २५ सूक्त, पञ्चम काण्ड, ४ सूक्त, २२ सूक्त ; छठा काण्ड, ३ सूक्त, २० सू०, ९५ सू०, १०२ सू०, ११६ सू०, इन सूक्तों में ज्वरों के अनेक लक्षण वर्णित हुए हैं। और उनका औषध स्वरूप “कुष्ठ” नामक भेषज को ( costus speciosus or Arabicus ) आह्वान किया गया है ( ५ का० सू० ४ ) जो सब मंत्र किसी भेषज को सम्बोधित कर सब भेषज या उसका रस सेवन का


*—The practices mere ( in the Koushika Sutras ) invelve a mare extentive medcen etc and to mare elaborate theropenties, but it is difficult to define in detail the extent to which practices similar to those of the sutras must be presupposed from the start with the charms of the Atherva Veda—Bloom field’s the Atherva Veda. page 68. The value of the sutra is primarily as a help to the under- standing of the ritual and general purposes of a given hymn and so mediatedly its exegeses. Whitney—“Hymns of the Athervaveda.” General Introduction p. 1. XXV.

( ११ ) ( Internal application ) विशेष उल्लेख अथर्ववेद में भी पाया जाता । ये सब भेषज गले में, हाथ में, शरीर के अन्य स्थान में यंत्र ( या तागा परिहस्त वलय ) बन्धन किया जाता है। कौशिकसूत्र में इस प्रकार बन्धन के साथ अन्य २ द्रव्य सेवन करने की व्यवस्था भी है। जैसे—कौशिकसूत्र २५।६।९, २०।१०।१९, २९।२८।२९ इत्यादि । धातु घटित औषधों में भूतयोनि को भगाने के लिये सीसा का यंत्र ( १ का० सू० ६ ) और एक सौ वर्ष परमायु और प्रभूत शक्ति पाने के लिये सोने का यंत्र ( १ का० सू० १६ ) धारण करने की व्यवस्था है। चिकित्सा शास्त्रों के इतिहास की आलोचना करने से जाना जाता है जो पहिले औषधों का बाहरी व्यवहार ( external application ) और पीछे अभिज्ञता की वृद्धि के साथ २ भीतरी व्यवहार ( Internal admini- stration ) हो जाता है। पहिले हाथ या गले में धारण, पीछे मालिस या प्रलेप रूप से व्यवहार और शेष में औषध रूप से अति सूक्ष्म मात्रा में सेवन, इसी प्रकार औषध सेवन का क्रम विकाश संघटित हो जाता है। हम लोग अथर्ववेद में औषधियों को बाहर धारण में हिन्दू चिकि- त्सा के पहिले उन्मेष देखने में आता है। जिन भेषजों का ( जैसे— अश्वत्थ, खैर, हरिद्रा, अपामार्ग, मुञ्ज, शमी, पृश्निपर्णी इत्यादि ) यंत्रों या बूटियों या औषधों को अथर्ववेद में बाहरी ( शरीर के किसी भाग में ) भाग में धारण करना बतलाया है। पीछे उन्हीं सब भेषजों को औषधि रूप से सेवन की व्यवस्था बतलाई गई। धातुओं में से सीसा और स्वर्ण की अथर्ववेद में शरीर के बाहरी भाग में धारण करने की व्यवस्था है। पीछे के तन्त्र ग्रन्थों में ये दोनों एवं अन्यान्य धातुओं के भस्म औषध रूप से सेवन करने की व्यवस्था हुई है। निम्नलिखित कई एक पृष्ठों में अथर्ववेद के प्रत्येक काण्डों में जो सब रोग और भेषज मूलक सूक्त हैं, उनका अति सूक्ष्म विवरण दिया गया है। प्रथम काण्ड ॥ १ ॥ दूसरा सू०। देह से अत्यधिक स्राव ( उदरामय, आमाशयादि ) निवा रण के लिये मुञ्जघास लेकर मंत्र ) २तीय काण्ड में ३रे सू० में इसी उद्देश्य से “झरना का जल लेकर और एक मंत्र है। छठा काण्ड में ४४ सू० में और भी एक मंत्र है। मुञ्जघास को यंत्र रूप से बांधने की प्रक्रिया कौशिक सू० में ( २५।६ ) और दारिल की टीका में विस्तृत भाव से लिखा है।

१. अध्याय १-३: दर्शपूर्णमास, नवीन-शस्येष्टि एवं गृह्य-संस्कार आरम्भ

तीसरा सू०। कोष्ठबद्ध और प्रस्त्राव विरुद्ध में मंत्र । इसी सूक्त में परवर्त्ती काल चिकित्सकों का बस्ति यन्त्र की नाईं एक प्रकार के तृण की सहायता से चिकित्सा विषय का उल्लेख है। कौशिक सू० में इस विषय की जो विस्तृत व्यवस्था है, उसका अनुवाद नीचे दिया हुआ है। कौशिक सूत्र ( २५।१०।१९ ) इन मंत्रों के उच्चारण करते समय मूत्र का वेग जिसमें हो, ऐसा द्रव्य रोगी के शरीर में बान्ध देवे। उसके बाद दीमक की माटी पूतिका ( Guilandina bonduc ) सूखा गुण्डान प्रमन्द और काठ का गुँडा जल में भिंजा कर वही जल रोगी को पीने को देवे। इस सूक्त का शेष दो मंत्र उच्चारण करते २ मलद्वार में एक शलाका— एक सलाई ( Enema ) प्रवेश करा देवे। उसके बाद मूत्रनाली में शलाका दिलवा दे। शेष रोगी को आल, पद्म का शिकड़ और उल इन तीन द्रव्यों का पाचन सेवन करने को देवे। कोष्ठबद्ध होने पर भी इसी प्रकार व्यवस्था है। १६ सूक्त। सीसा का ताबीज। भूतों को भगाने के लिये व्यवस्था है। १७ सूक्त रुधिर गिरने को रोकने के लिये मंत्र। टीकाकार गण कहते हैं जो रक्त स्राव का अर्थ कटने से रक्तस्राव और अत्यधिक रजो- निस्सरण ये दोनों समझना होगा। इन मंत्रों के सहित कौशिक सूत्र (२६।१०) धूलि और पत्थर का चूर्ण जखम की जगह चढ़ा देने से रक्त बन्द करने की व्यवस्था दी है। २२वें सू०। पाण्डु ( कामला—केशव की टीका ) रोग के प्रति मंत्र। इस सूक्त में विशेष कोई जानने के लिये भेषज का उल्लेख नहीं। कौशिक सूत्र में ( २६, १४) इस मंत्र के साथ करणीय प्रक्रिया का विवरण है। २३।२४ सूक्त। श्वेत कुष्ठ रोग के प्रति मंत्र। रजनी ( हरिद्रा ) ( Cacuma longer ) इस रोग को दूर करने के लिये उल्लिखित हुई है। आयुर्वेद ग्रंथों में कुष्ठ रोग में हरिद्रा का व्यव- हार अधिकता से हुआ है। कौशिक सूत्र में (२६।२२।२४) मंत्रों के साथ करणीय आनुषङ्गिक प्रक्रिया वर्णित हुई है। सायनाचार्य और केशव ने अपनी २ टीका में कुष्ठ के लिये भृङ्गराज, हरिद्रा, इन्द्रवारुणी, और नीलिका का उल्लेख किया है। २५ सू०। तक्षण ( ज्वर ) इस सूक्त का और नीचे लिखे सूक्तों का विषय ५ का० ४ सूक्त, २२ सूक्त; ६ का० २० सू०, ९५ सू०, ३ सू०, १०२ सू०, ११६ सू०; १९ का० ३९ सू०। सुश्रुत जैसे ज्वर को रोगों का राजा कहा है उसी प्रकार अथर्ववेद में “तक्षण” को सबकी अपेक्षा भयानक कह कर लिखा है। इन सब सूक्तों में ज्वर के लक्षणादि भली-भांति स्पष्ट हुआ है। लक्षणादि मलेरिया

( १३ ) ज्वर के साथ बहुत मिलते हैं । प्रधान लक्षण पर्याय क्रम से उत्ताप और शीतावस्था, ज्वर को छोड़ कर और दो तीन दिन अन्तर देकर ज्वर होना । ज्वर के साथ मस्तक व्यथा, खांसी बलास ( क्षय रोग ) पामन् (तक्षण का भाई, चूलकना ) और पाण्डु ( कामला ) आकर योग देता है । उत्ताप ज्वर का प्रधान लक्षण होने से उल्लिखित हुआ है। १ का० १२ सू० में “विद्युत्को” जान पड़ता है अग्नि का रूपान्तर कहा है, ज्वर, माथा व्यथा, काश के कारण होने से निर्दिष्ट हुआ है। ज्वर दूर करने के लिये मंत्रोच्चारण और कुष्ठ नामक ( Costus specios or arabicus ) वृक्ष के यंत्र धारण की व्यवस्था सूचित हुई है। कौशिक सूत्र में और भी अनेक आनुषङ्गिक प्रक्रिया वर्णित हुई है; विस्तार भय से उन विषयों का उल्लेख नही किया गया । कौ० सू० सानुवाद में देखना (३५ सू०)। सोने का यंत्र एक सौ वर्ष परमायु और प्रभुत शक्ति लाभार्थ धारण करना चाहिये ऐसा लिखा है । ॥ द्वितीय काण्ड ॥ ३ रा सू० प्रथमकाण्ड दूसरा सू० देखो । चतुर्थ सू० विभिन्न रोग और भूत योनि के लिये “जङ्गिड” नामक वृक्ष को उपलक्ष कर मंत्र । टीकाकारगण इस जङ्गिड वृक्ष के स्वरूप को अब तक निश्चय नहीं कर पाये । सीधे लिखा है “वाराणस्यां” प्रसिद्धः ।—काशी में मशहूर है । १४ काण्ड ३४ सू० में और १९ काण्ड १५ सूक्त में इस सम्बन्ध में और भी दो मंत्र है । ८ म० सू० क्षेत्रिय ( Hereditaridiseases, Pulmon ary consumption Greffiths—इसका अनुवाद रामक रोग का मंत्र इस रोग को टीकाकारगण पुरुषानुक्रमसे प्राप्त यक्ष्मा रोग कहकर निर्देश किया है । इस यक्ष्मा रोग के सम्बन्ध में अनेक मंत्र हैं । तीसरे काण्ड में ६ ठा सू० में हरिण के शृङ्ग के यंत्र की व्यवस्था है । १९ काण्ड में ३९ सू० में कुष्ठ वृक्ष को अन्य २ रोगों में यक्ष्मा को आरोग्य करने के लिये प्रस्तुत हुआ है । ९ सूक्त अथर्ववेद में अनेक स्थलों में भूतयोनि, अप्सरा, गन्धर्व प्रभृति अमानुषिक प्राणिको रोग के कारण कहकर निर्देश किया है ( ६।३७ ) इस सू० में यह सब भूत योनि के आक्रमण से रोगी की रक्षा करने के लिये दश प्रकार के वृक्षों का यंत्र धारण करने की व्यवस्था की है । २५ सू० पृश्निपर्णी ( Hemianitis Cordifolia ) वृक्ष के प्रति मंत्र । रोग के हेतुभूत कण्वनामक दैत्य

को विनाशार्थ पृष्णिपर्णी नामक वृक्ष को अनुरोध किया गया है। सुश्रुत ने गर्भस्राव रोग में दूध के साथ पृष्णिपर्णी की व्यवस्था कियी है। ३१ और ३२ सूक्त में पशु के कृमि का “गोः कृमिः”—केशव की टीका है। और पञ्चम काण्ड २३ सू० में शिशुओं (बच्चे) की कृमि के मंत्र हैं। इन तीन सूक्तों में अनेक प्रकार के कृमियों का वर्णन देख पड़ता है। सादा, काला, तीन मस्तक वाले, चतुर्मस्तक, नाना रंगों के कृमियों का वर्णन है। इन सब सूक्तों में किसी प्रकार के भेषज का वर्णन नहीं पाया गया। केवल मंत्रों की सहायता से कृमिनाश की व्यवस्था है। तीसरा काण्ड ५ म सूक्त में आर्थिक उन्नति लाभ के लिये पर्णवृक्ष का यंत्र। इस पर्णवृक्ष को परवर्त्ती काल में पलास ( Butin Fron dosa ) नाम से कहा गया है। ६ ठे० सू० में अश्वत्थ वृक्ष को शत्रु- नाश के लिये और हरिण शृङ्ग का यंत्र धारण करे। ( २ का०८ मसू० ) । ॥ चतुर्थ काण्ड ॥ ४ र्थ सू०। नष्टवीर्य ( Impotency ) उपद्धार के लिये कपित्थक ( Feronia Elephantum ) नामक वृक्ष का उद्देश्य के लिये मंत्र। ६।७ सू० विष झाड़ने का मंत्र किसी औषधि के नाम का उल्लेख नहीं। ९ वम सू० पाण्डु, यक्ष्मा, दोषस्थ ज्वर के लिये मलहम ( Oeintment ) कौशिक सूत्र में ( ५८।८ ) लिखा गया है कि विधि से उसमें मलहम का यंत्र बान्ध देना चाहिये। १० सू० इस सू० में दीर्घजीवन के लिये मुक्तायंत्र धारण की व्यवस्था की है। मुक्ता की उत्पत्ति के सम्बन्ध में हम लोगों में जो प्रवाद प्रचलित है कि स्वाती नक्षत्र का जल सीप में पड़ने से मुक्ता रूप से परिणत होता है, उसी प्रवाद की सूचना इस सूक्त में पाई जाती है॥ १५॥ १२ सू० में क्षत आरोग्य के लिये अरुन्धती नामक लता के उद्देश्य से यह सूक्त रचित हुआ है। इस सम्बन्ध में पञ्चम काण्ड ५म सू० में और भी एक मंत्र है। उस मंत्र में ( ५, ५, ५, ) कहा गया है—“हे अरुन्धति ! तू पलाश, अश्वत्थ, खदिर, धव प्रभृति वृक्ष के अवलम्ब से उठी है इस सू० में अरुन्धती को शिलादि और लाक्षा ( Lac ) कह 1—Born in the sky, ocean born, brought nether out of the river, this gold born shell farms a life protonging ammulet IV, 10, 4.

कर सम्बोधन किया गया है किसी २ ने कहा है कि अरुन्धती का स्वरूप नहीं मालूम होता है। अनेक लोगों ने लाक्षारूप होने से निर्देश किया है। दोनों सूक्तों में अरुन्धती क्षतरोग के आरोग्यता के लिये निर्दिष्ट हुई है । ६ ठा काण्ड १०९ सू० में पिप्पली ( Heppercam ) क्षत के आरोग्यार्थ स्तुत हुआ है। १७,१८, १९ सूक्त । ये तीन सूक्त अपामार्ग ( चिड़चिड़ी ) ( Achryranthes aspera ) नामक औषधि के उद्देश्य से रचित हुए हैं। इस अपामार्ग और इस का क्षार परवर्त्ती काल के आयुर्वेद ग्रन्थों में बहुत परिमाण से व्यवहृत हुआ है। इन तीन सूक्तों में अपामार्ग की बहुत प्रशंसा वर्णित है। प्रत्युत इसको भेषजों की राणती कह कर निर्दिष्ट की गयी है। यह भेषज सब प्रकार के दोष युक्त रोगों, दैत्य और पाप को दूर करने में समर्थ है। २० सू० इस सू० में छिंपी हुई भूत योनि आविष्कार करने के लिये मंत्र है। पहिले ही कहा गया है जो, भूत योनि को अनेक रोगों का कारण कहकर अथर्ववेद में निर्दिष्ट हुआ है। कौशिक सूत्र (२८।७) इस विषय में करणीय प्रक्रिया वर्णित है। दारिल अपनी टीका में प्रसङ्ग वश सद्- म्पुष्प व्यवहार के लिये उल्लेख किया है।

॥ पञ्चम काण्ड ॥ ४र्थ सू० “तक्षण” ( ज्वर ) ज्वर दूर करने के लिये कुष्ठ नामक वृक्ष को आह्वान किया गया है ( १म का० २५ सू० ) ५म सू०। क्षत आरोग्य कल्प में अरुन्धती की आराधना है। ४ का० १२ सू० । ) १३ सू० । सर्प विष का मंत्र षष्ठ काण्ड, १२, १३ सू० सूक्त में सर्प विष के और दो मंत्र हैं। अनेक प्रकार के सरीसृप का उल्लेख इन तीन सूक्तों में देखने में पाया जाया जाता है। जैसे—किरातन, धूसर वर्ण, कृष्णवर्ण, चाका चाग का दाग विशिष्ट इत्यादि । इस प्रसङ्ग में मधु का उल्लेख देखने में आता है। कौशिक सूत्र में ( २९।२८।२९ ) सर्प विषकी चिकित्सा में रोगी को शीघ्र मधुपान कराने की व्यवस्था दियी गयी है। २२ सू०। तक्षण—( १ म का०, २५ सू० । ) २३ सू० । शिशुओं के कृमि ( २ का०, ३१ सू० । )

॥ षष्ठ काण्ड ॥ तीसरा सू० । तक्षण ( १म का० २३ सू० । ) १२ सू० सर्प विष का मंत्र—( ५म का० २३ सू० । )

( १६ ) १४ सू० । बलास ( क्षय रोग Consumption ) रोग के निवारण का मंत्र । १६ सू० । चक्षु रोग ( Ophthalmia ) आरोग्य का मंत्र टीकाकार गण इस सूक्त को चक्षु रोग में सरिसों का ( mustard ) व्यवहार सूचित होता है । कौशिक इस सूत्र के मंत्र में ( ३०।१।७ ) इस सम्बन्ध में विस्तृत व्यवस्था दृष्ट होती है । इस मंत्र के उच्चारण के साथ सरिसों वृक्ष के यंत्र, सरसों के तैल सिक्त करके बान्ध देवे, सरसों के पत्ते का रस सेवन करने को देवे । और पत्ते को पीस कर नेत्र के ऊपर प्रलेप करे । २० सू० । तक्षण ( १म का० २५ सू० । ) २१ सू० केशवृद्धि के मंत्र । ६ ठा काण्ड १३७ और १३ श सू० में नितत्नी नामक लता को केश बढ़ाने के लिये की गई है इस नितत्नी लता का स्वरूप स्थिर नही हुआ है । मंत्र में यहां तक कहा गया है जो यह लता को जमदग्नि अपनी कन्या के लिये मट्टी से उखाड़ा था । इस लता को सम्बोधन करके कहते हैं—“हे लते ! तू पुरातन केश को दृढ़ कर, नये केश को उत्पादन कर, और वर्तमान केशों को घन कर दो ( ६।१३६।२ ) । छठे काण्ड में ३० सू० में “शमी वृक्ष” ( Drosopis spicogera or Acun sum ) केश बढ़ाने के लिये बुलाया गया है । २४ सू० । शोथ ( Dropsry ) वक्षः पीड़ा ( heart disease ) इस पीड़ा के लिये स्रोत ( सोते के ) के जल की व्यवस्था की गयी है । १ का० ८३ सूक्त में भी शोथका और भी एक मंत्र है । कौशिक सूत्र ( ३२।१४ ) २५ सू० शरीर के ऊपर गण्डमाला का मंत्र है । कौशिक सूत्र ( ३०।१४ ) ८३ सू० में एक और मंत्र है । ५७ सू० में गण्डमाला की चिकित्सा में जालस गोमूत्र व्यवहृत हुआ है । ३० सू० में केश वृद्धि के लिये शमी वृक्ष को बुलाया गया है । ( २१ सू० ) ३७ सू० रोग का मूल कारण अप्सरा, गन्धर्व सबको दूर करने के लिये “अजशृङ्गी” को ( Odinapinata ) आह्वान किया गया है । ४४ सू० । देह से अत्यधिक स्राव निवारण का मंत्र १म काण्ड, २रा सू० । ५७ सू० गण्डमाला की दवा इस सूक्त में कही गयी है । जालस् अर्थात् गोमूत्र इस रोग में व्यवहृत होता है । कौशिक सूत्र (२२।११।१३) में वर्णित है जो गण्डमाला पर गोमूत्र का फेन लेपन करे । ( २५।८३ सू० देखो । ८०म सू० पक्षा- घात आरोग्य करने में सूर्य को इस सूक्त से स्तव किया गया है । ८३ म

( १७ ) सू० इस सू० में अपची गण्डमाला (केशव और सायन) रोग के आरो- ग्यार्थ मंत्र विहित हुआ है। २५ सू० देखो। ८५म सू० में यक्ष्मा रोग को दूर करने के लिये “वरण” वृक्ष के (भरणी Luffa foctidas or Caratoena roseburgeict) यन्त्र धारण की व्यवस्था कियी है। कौशिक' सूत्र में (२६।३३।३७) यह बन्धन प्रक्रिया सविस्तर वर्णित है। ९० सू०। इस सू० में—“शूल रोग” (कौलिक) निवारण कल्प में मंत्र है। इस सू० में किसी भी दवा का नाम नहीं है। केवल मंत्र की सहायता से प्राचीन लोग इस रोग को आरोग्य करते थे। ९१ सू० में जल मिश्रित यव (barley) 'सब रोगों में प्रयुज्य होती—इस सूक्त में लिखा है। ९५ सू० में तक्षण कां० १।२५ सू० १०२ सू० तक्षण—१ काण्ड २५ सू० १०९ क्षुत रोग की चिकित्सा में पिप्पली का (papper carm) व्यवहार सूचित होता है। ४ थे कां० में १२ सू० १११ सू० में पागलपन की दवा है। ११६ सू० में तक्षण—१ म काण्ड, २५ सू०। १२७ सू०। इस सूक्त में “चोपद्रु वृक्ष” सब रोगों के प्रशमनार्थ उल्लेख किया गया है। १३६–१३७ इन दो सूक्तों में केश वृद्धि के लिये नितत्नी नामक लता को सम्बोधन किया गया है। २१ सू० देखो। सप्तम काण्ड ॥ ७ ॥ ५६ सू० सर्प विष का मंत्र—५ म काण्ड १३ सू० ७४।७६ सू० इन दो सू० में—“जायान्य” नामक अर्बुद की चिकित्सा का मंत्र है। ८३ सू० में शोथ रोग का मंत्र है। चतुर्दश काण्ड ॥ १४ ॥ ३८ सू०। २ काण्ड। ४ सू० देखो। उनविंश काण्ड ॥ १६ ॥ ३५ सू०। २ रा काण्ड और ४ था सू० देखो। इस सू० में गुग्गूल का (Beclelleum) मीठे गगनपूर का रोग नाशक की शक्ति का वर्णन है। ३९ सू० में कुष्ठवृक्ष की आराधना का मंत्र है। इस स्थान में कुष्ठवृक्ष को सब प्रकार के रोग जैसे—ज्वर, कास, रोग इत्यादि आरोग्य करने के लिये बुलाया गया है। १ म काण्ड २५ सू०।

( १८ ) उपरि उल्लिखित तालिका देखने से पता लगता है जो, प्राचीन हिन्दुओं की चिकित्सा सम्बन्धी ज्ञान का उत्तम आभास पाया जाता है । अथर्व- वेद में जिन सब रोगों की चिकित्सा या जिन सब भेषजों का रोग नाशक क्षमता मन्त्रों में सूचित हुई है उन्हीं सब रोग और भेषज के सम्बन्ध में कौशिक सूत्र में विस्तृत वर्णन है । और देशव्यापी अद्भुत या अलौकि-सामूहिक दैविक घटना होने की सूचना-प्रकृति के विपरीत कार्यों से वर्षों, महीनों, दिनों पहिले से होती है । इसका भी विशेष उपयोगी वर्णन आया है । यह कौ० सू० अनेकों उपकारी उपदेश रत्नों से पूरित सबको देखने तथा रखने योग्य है। भवदीय— उदयनारायण सिंह ।

❀ श्रीगणेशाय नमः ❀ ❖ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ❖ अथ विधिं वक्ष्यामः॥ १ ॥ स पुनराम्नायप्रत्ययः ॥ २ ॥ आम्नायः पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि च ॥ ३ ॥ तद्यथा ब्राह्मणविधिरेवं कर्मलिङ्गा मन्त्राः॥ ४ ॥ तथान्यार्थाः ॥५॥ तथा ब्राह्मणलिङ्गा मन्त्राः॥ ६॥ तदभावे सम्प्रदायः ॥७॥ प्रमुक्तत्वाद्ब्राह्मणानाम् ॥ ८ ॥ यज्ञं व्याख्यास्यामो देवानां पितॄणां च ॥ ९ ॥ प्राङ्मुख उपांशु करोति ॥१०॥ यज्ञो- पवीती देवानाम् ॥११॥ प्राचीनावीती पितॄणाम् ॥१२॥ भाषार्थः—वेद की संहिता भाग को पढ़ लेने के अनन्तर वेदमंत्रों से यज्ञ, संस्कार आदि का विधान हुआ है। अब उस विधि को कहते हैं। अर्थात् शान्तिक, पौष्टिक, आभिचारिक और अद्भुत कर्म संहिताविधि में उप- दिष्ट है। यह कर्म तीन प्रकार का है। विधिकर्म, अविधिकर्म और उच्छ्रय कर्म। इनमें से विधिकर्म तीन प्रकार का है।—प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द ॥१॥ उक्त विधि का ज्ञान वेद से होता है। और वेद में विधि ज्ञापक मंत्र हैं और ब्राह्मण ग्रन्थ में वेद मंत्रों का कर्मों में विनियोग है ॥२॥ जैसे ब्राह्मण विधि हैं उसी प्रकार कर्म-लिङ्ग मंत्र हैं ॥३॥४॥ इसके अभाव में वेदाचार्यों की परम्परा से यज्ञादिकों के करने की प्राचीन प्रथा भी प्रमाण है ॥५॥६॥७॥ आचार्यों के पठन-पाठन के विश्शृ- ङ्खल होने और पढ़ाने की परम्परा नष्ट होने और प्रमाणों की विस्मृति होने से यज्ञादि करने की प्रक्रिया ने विकृत रूप धारण कर लिया है ॥८॥ अतएव देवताओं एवं पितरों के यज्ञों का उपदेश करेंगे ॥९॥ पूर्व मुख होकर देवकार्य उपांशु ( बिना मंत्र बोले ) करे ॥१०॥ देवकार्य करने में यजमान यज्ञोपवीती होकर करे और पितृकार्य में प्राचीनावीती हो करे ॥११॥१२॥

२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । प्रागुदग्वा देवानाम् ॥१३॥ दक्षिणा पितॄणाम् ॥१४॥ प्रागुदगपवर्गं देवानाम् ॥१५॥ दक्षिणप्रत्यगपवर्गं पितॄ- णाम् ॥१६॥ सकृत्कर्म पितॄणां त्र्यवरार्धं देवानाम् ॥१७॥ यथादिष्टं वा ॥१८॥ अभिदक्षिणमाचारो देवानां प्रसवयं पितॄणाम् ॥१९॥ स्वाहाकारवषट्कारप्रदाना देवाः ॥२०॥ स्वधाकारनमस्कारप्रदानाः पितरः ॥२१॥ उपमूललूनं बर्हिः पितॄणाम् ॥२२॥ पर्वसु देवानाम् ॥२३॥ प्रयच्छ पर्शु- मिति दर्भाहाराय दात्रं प्रयच्छति ॥२४॥ ओषधीर्दन्तु पर्वन्नित्युपरि पर्वणां लूत्वा तूष्णीमाहृत्योत्तरतोऽग्नेरुप- सादयति ॥२५॥ नाग्निं विपर्यावर्तेत ॥२६॥ नान्तरा यज्ञाङ्गानि व्यवेयात् ॥२७॥ दक्षिणं जानु प्रभूज्य जुहोति पूर्व या उत्तर मुख करके दैवकर्म और दक्षिण की ओर मुख कर के पितृकर्म करे ॥१३॥१४॥ दैवकर्म की समाप्ति पूर्व या उत्तर दिशा में और दक्षिण या पश्चिम दिशा में पितृकर्म की समाप्ति करे ॥१५॥१६॥ पितरों का कर्म एक ही बार होता है। और तीन अवरार्ध कर्म देवताओं का होता है ॥१७॥ या आदेशानुसार कर्म करे ॥१८॥ दहिने हाथ को सम्मुख करके दैवकर्म करे और अपसव्य होके पितृकर्म करे ॥१९॥ देवताओं के नाम के अन्त में स्वाहा, वषट् जोड़कर (चतुर्थी विभक्ति के पीछे ) देवताओं को हवन आदि करे ॥२०॥ और पितरों के लिये “स्वधा” और “नमः” लगाकर पिण्डादि देवे ॥२१॥ मूल सहित कुश पितरों के लिये (जड़ के पास से टूटा) ॥२२॥ और जो कुश गिरहों पर से टूटा हो उसका व्यवहार देवकार्य में करे ॥२३॥ “प्रयच्छ पर्शुम्” इत्यादि मंत्र पढ़ के दाँत वाला अस्त्र कुश को काट कर लाने के लिये देवे ॥२४॥ “ओषधीर्दान्तुपर्वन्०” मंत्र पढ़कर कुश के गिरहों पर से काटकर तूष्णीं लावे और अग्नि के उत्तर भाग में धर देवे ॥२५॥ एवं यजमान या उसकी पत्नी या ब्रह्मा कार्य समाप्त होने पर अग्नि के विरुद्ध मुख होके न जावे ॥२६॥ यज्ञ की वेदी की ओर अङ्गों को न फैलावे ॥२७॥ दहिने जानु को भूमि पर टेक कर आहुति देवे ॥२८॥ चतुर्दशी

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३ ॥२८॥ या पूर्वा पौर्णमासी सानुमतिर्योत्तरा सा राका ॥२९॥ या पूर्वामावास्या सा सिनीवाली योत्तरा सा कुहूः ॥३०॥ अद्योपवसथ इत्युपवत्सद्भक्तमश्नाति ॥३१॥ मधुलवणमांसमाषवर्जम् ॥ ३२ ॥ ममाग्ने वर्च इति समिध आधाय व्रतमुपैति ॥३३॥ व्रतेन त्वं व्रतपत इति वा ॥३४॥ ब्रह्मचारी व्रत्यधः शयीत ॥३५॥ प्रातर्हुतेऽग्नौ कर्मणे वां वेषाय वां सुकृताय वामिति पाणी प्रक्षाल्या- परेणाग्नेर्दर्भान्नास्तीर्य तेषूत्तरमानडुहं रोहितं चर्म प्राग्- ग्रीवोत्तरलोम प्रस्तीर्य पवित्रे कुरुते ॥ ३६ ॥ दर्भावप्र- च्छिन्नाग्रान्तौ प्रक्षाल्यानुलोममनुमार्ष्टि विष्णोर्मनसा पूते स्थ इति ॥ ३७ ॥ १ ॥ त्वं भूमिमस्त्येष्योजसा त्वं वेद्यां सीदसि चारुरध्वरे। त्वां पवित्रमृषयो भरन्तस्त्वं पुनीहि दुरितान्यस्मदिति युक्त पौर्णमासी को अनुमति और परिवा युक्त पौर्णमासी को राका कहते हैं ॥२९॥ चतुर्दशी युक्त अमावास्या को सिनीवाली और परिवा युक्त अमावास्या को कुहू कहते हैं ॥३०॥ चतुर्दशी युक्त पौर्णमासी पूर्वा कह- लाती है और परिवा युक्त उत्तरा कहलाती है। इसी प्रकार पूर्वा अमावास्या को उपवास करे एवं उत्तरा अमावास्या को यज्ञ करे ॥ और उपवास करने वाला भात खावे ॥ और क्षार लवण, मांस, उड़ीद को न खावे ॥३१॥३२॥ “ममाग्ने वर्च०” इत्यादि पढ़कर समिध लेवे एवं व्रत करे ॥३३॥ या “व्रतेन त्वं व्रतपत०” से करे ॥३४॥ व्रत करनेवाला ब्रह्मचारी भूमि पर सोवे, खाट आदि पर नहीं ॥३५॥ प्रातःकाल की आहुतियाँ अग्नि में डालकर “कर्मणे वां०” इत्यादि मंत्र से लाल रंग के बैल के चर्म को पूर्व की ओर गला और ऊपर को लोम भाग करके बिछाकर कुश के पवित्रे को बनावे ॥३६॥ कुशों के प्रान्त भाग को तोड़कर जल से प्रक्षालन कर “विष्णोर्मनसा पूते स्थ०” मंत्र से अनुमार्जन करे ॥३७॥ यह प्रथम कण्डिका समाप्त हुई ॥१॥ “त्वं भूमि मत्स्येष्योजसा०” इत्यादि मंत्र से पवित्रे को चमड़े और

४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । पवित्रे अन्तर्धाय हविर्निर्वपति देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे- ऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नये जुष्टं निर्वपामीति ॥१॥ एवमग्नीषोमाभ्यामिति ॥२॥ इन्द्राग्निभ्यामित्यमावा- स्यायाम् ॥३॥ नित्यं पूर्वमाग्नेयम् ॥४॥ निरुप्तं पवित्राभ्यां प्रोक्षत्यमुष्मै त्वा जुष्टमिति यथादेवतम् ॥ ५ ॥ उलूख- लमुसलं शूर्पं प्रक्षालितं चर्मण्याधाय व्रीहीनुलूखल ओप्या- वघ्नंस्त्रिर्हविष्कृता वाचं विसृजति हविष्कृदा द्रवेहीति ॥६॥ अपहत्य सुफलीकृतान्कृत्वा त्रिः प्रक्षाल्य तण्डु- लानग्ने चरुर्यज्ञियस्त्वाध्यरुक्षदिति चरुमधिदधाति ॥७॥ शुद्धाः पूता इत्युदकमासिञ्चति ॥८॥ ब्रह्मणा शुद्धा इति तण्डुलान् ॥९॥ परित्वाग्ने पुरं वयमिति त्रिः पर्यग्नि करोति ॥१०॥ मेक्षणेन त्रिः प्रदक्षिणमुदायौति ॥११॥ अत ऊर्ध्वं यथाकामम् ॥१२॥ उत्तरतोऽग्नेरुपसादयती- व्रीहियों के भीतर धर कर "देवस्य त्वा" इत्यादि मंत्र से हवि का निर्वपण करे ॥१॥२॥३॥ सदैव पहिले आग्नेयविधि को करना चाहिये ॥४॥ निरुप्त हवि को पवित्रे से "अमुष्मै त्वा०" ( जिस देवता के नाम हवि करना हो उसका नाम लेकर ) मंत्र से प्रोक्षण करे ॥५॥ पुनः उलूखल, मुसल, सूप, जो प्रक्षालन किये हुए हों, उनको चमड़े में धरकर धान्यों को ओखरी में डालकर तीन बार कूट कर "हविष्कृदा द्रवेहि०" से वाक् संयम करे । और व्रीहि को कूट छाट कर सूप से फटक कर साफ करके चावलों को तीन बार प्रक्षालन कर "अग्ने चरुर्यज्ञियस्त्वा०" इत्यादि मंत्र से चरु को आग पर चढ़ावे और "शुद्धाः पूताः०" से जल सिक्त करे ॥६॥७॥८॥ "ब्रह्मणा शुद्धा०" से चावलों को जल से सींचे । "परित्वाग्ने०" इत्यादि मंत्र से तीन बार चरु का पर्यग्नि करण करे ॥९॥ ॥१०॥ मेक्षण द्वारा तीन बार प्रदक्षिण चलावे ॥११॥ इसके पश्चात् घोटना, या न घोटना या प्रदक्षिण करना, या न करना—अपनी इच्छा पर है करे या न करे ॥१२॥ अग्नि के उत्तर भाग में इध्मों को और इसके

ध्मम् ॥१३॥ उत्तरं बर्हिः ॥१४॥ अग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षा- मीतीध्मम् ॥१५॥ पृथिव्या इति बर्हिः ॥१६॥ दर्भमुष्टिम- भ्युक्ष्य पश्चादग्नेः प्रागग्रं निदधात्यूर्णम्रदं प्रथस्व स्वासस्थं देवेभ्य इति ॥१७॥ दर्भाणामपादाय ऋषीणां प्रस्तरोऽसोति दक्षिणतोऽग्नेर्ब्रह्मासनं निदधाति ॥१८॥ पुरस्तादग्ने- रास्तीर्य तेषां मूलान्यपरेषां प्रान्तैरवच्छादयन्परिसर्पति दक्षिणेनाग्निमा पश्चार्धात् ॥१९॥ परिस्तृणीहीति सम्प्रे- ष्यति ॥२०॥ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां प्रसूतः प्रशिषा परिस्तृणामीति ॥२१॥ एवमुत्तरतोऽयुजो धातून्कुर्वन् ॥२२॥ यत्र समागच्छन्ति तद्दक्षिणोत्तरं करोति ॥२३॥ स्तीर्णं प्रोक्षति हविषां त्वा

उत्तर में बर्हि को धरे ॥१३॥१४॥ “अग्नये त्वा०” इत्यादि मंत्र से इध्मों का प्रोक्षण करे ॥१५॥ “पृथिव्या ०” से कुश का प्रोक्षण करे ॥१६॥ “ऊर्ण म्रदं प्रथस्व०” इत्यादि मंत्र से दाभ की मुष्टि को अभ्युक्षण करके अग्नि के पश्चिम भाग में पूर्वाग्र धरे ॥१७॥ और कुशों को लाकर “ऋषीणां ०” मंत्र से अग्नि के दक्षिण भाग में ब्रह्मा का आसन धरे ॥१८॥ अग्नि के आगे कुशों को इस प्रकार बिछावे जिसमें. कुशों की जड़ सब अन्य कुशों के प्रान्त भाग को ढाकते हुए रहें और दक्षिण अर्थात् वेदि के मध्य प्रदेश से लेकर बिछावे—जिसमें सब कुशों के अन्त भाग को ढाकता हुआ अग्नि के दक्षिण भाग तक और वेदि के पश्चिम भाग तक बिछ जावें ॥१९॥ तब ब्रह्मा कर्त्ता को “परिस्तृणीहि०” संप्रेषण करे ॥२०॥ “देवस्य त्वा०” इत्यादि से वेदि के स्तरण के लिये कुश की मुट्ठी को पकड़ कर बिछावे ॥२१॥ जिस प्रकार वेदि के दक्षिणार्द्ध में संप्रेषणादि द्वारा स्तरण किया है उसी प्रकार वेदि के उत्तरार्द्ध में भी संप्रेषणादि से स्तरण करना चाहिये । दक्षिण भाग में जितनी मुट्ठियाँ हों उतनी ही उत्तरभाग में करे । उत्तर भाग में बे जोड़ ( विषम ) कहा गया है, इससे दक्षिण भाग में एकत्र समझने के लिये जानो ॥२२॥ दक्षिण उत्तर भाग के स्तरणों का संगम जहाँ हो वह दक्षिण उपकारि कार्य उत्तर का जानो

६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । जुष्टं प्रोक्षामीति ॥२४॥ नानभ्युक्षितं संस्तीर्णमुपयोगं लभेत ॥२५॥ नैधोऽभ्याधानम् ॥२६॥ नानुत्पूतं हविः॥२७॥ नाप्रोक्षितं यज्ञाङ्गम् ॥२८॥ तस्मिन्प्रक्षालितोपवातानि निदधाति ॥२९॥ स्रुवमाज्यधानीं च ॥३०॥ विलीनपूत- माज्यं गृहीत्वाधिश्रित्य पर्यग्नि कृत्वोदगुद्वास्य पश्चाद- ग्‍नेरुपसाद्योदगग्राभ्यां पवित्राभ्यामुत्पुनाति॥३१॥विष्णो- र्मनसा पूतमसि ॥३२॥ देवस्त्वा सवितोत्पुनातु ॥३३॥ अच्छिद्रेण त्वा पवित्रेण शतधारेण सहस्रधारेण सुप्वो- त्पुनामीति तृतीयम् ॥३४॥ तूष्णीं चतुर्थम् ॥३५॥ शृतं हविरभिघारयति मध्वा समञ्जन्घृतवत्कराथेति ॥३६॥ अभिघार्योदञ्चमुद्वासयत्युद्वासयाग्नेः शृतमकर्म हव्यमा- सीद् पृष्ठममृतस्य धामेति ॥३७॥ पश्चादाज्यस्य निधाया- लङ्कृत्य समानेनोत्पुनाति ॥३८॥ अदारसृदित्यवेक्षते ॥३९॥ ॥२३॥ बिछाये हुओं का “हविषां त्वा०” मंत्र से प्रोक्षण करे ॥२४॥ बिछाये हुए कुश विना अभ्युक्षण के काम के योग्य नहीं होते ॥२५॥ बिना अभ्युक्षण के समिद् का आधान भी नहीं हो सकता है॥२६॥ विना उत्पवन के हवि—नहीं हो सकती है। और न विना प्रोक्षण के यज्ञ का अङ्ग ही हो सकता है ॥२७।२८॥ उस प्रक्षालित एवं उत्पवन किये उप- करणों को यज्ञ के लिये आसादन करे। स्रुव और आज्यधानी को भी ॥२९।३०॥ पिघले हुए शुद्ध घृत को अग्नि पर चढ़ाकर गर्म कर और पर्यग्नि करके तथा शुद्ध जल से उद्वासन करके अग्नि के पश्चिम भाग में धर कर उत्तराग्र पवित्रे से केश, कीट, आदि से रहित कर देवे-जिसका मंत्र “विष्णोर्मनसा पूतमसि०” इत्यादि मंत्र पढ़ कर उत्पवन्न तीसरी बार करे। और चौथी बार विना मंत्र के करे ॥३१।३२।३३।३४।३५॥ गर्म किये हुए आज्य को “मध्वा०” इत्यादि मंत्र से अभिघार दे कर “उद्वासयत्यु०” इत्यादि मंत्र से उत्तर की ओर उद्वासन करे ॥३६।३७॥ आज्य के पीछे धर कर अलङ्कृत्य कर के “समानेन०” से उत्पवन करे ॥३८॥ “अदार सृद्०” मंत्र से उठ कर देखे ॥३९॥

उत्तिष्ठतेत्यैन्द्रम् ॥४०॥ अग्निर्भूम्यामिति तिसृभिरुपस- मादधात्यस्मै क्षत्राण्येतमिध्ममिति वा ॥४१॥२॥ युनज्मि त्वा ब्रह्मणा दैव्येन हव्यायास्मै वोढवे जात- वेदः । इन्धानास्त्वा सुप्रजसः सुवीरा ज्योग्जीवेम बलि- हृतो वयं त इति ॥१॥ दक्षिणतो जाङ्ग्यायनमुदपात्रमुप- साद्याभिमन्त्रयते तथोदपात्रं धारय यथाग्रे ब्रह्मणस्पतिः ॥ सत्यधर्मा अदीधरद्देवस्य सवितुः सव इति ॥२॥ अथो- दकमासिञ्चति, इहेत देवीरमृतं वसाना हिरण्यवर्णा अन- वद्यरूपाः । आपः समुद्रो वरुणश्च राजा संपातभागान् हविषो जुषन्ताम् ॥ इन्द्र प्रशिष्टा वरुणप्रसूता अपः समुद्राद्दिवमुद्वहन्तु । इन्द्रप्रशिष्टा वरुणप्रसूता दिव- स्पृथिव्याः श्रियमा वहन्त्विति ॥३॥ ऋतं त्वा सत्येन प- रिषिञ्चामि जातवेद इति सह हविर्भिः पर्युक्ष्य जीवाभि- राचम्योपोत्थाय वेदप्रपद्भिः प्रपद्यत ओं प्रपद्ये भूः प्रपद्ये भुवः प्रपद्ये स्वः प्रपद्ये जनत्प्रपद्य इति ॥४॥ प्रपद्य पश्चा- हस्तीर्णस्य दर्भानास्तीर्याहे दैधिषव्योदतस्तिष्ठान्यस्य सदने


भाषार्थ—“उत्तिष्ठत०” से ऐन्द्रहवि को देखे ॥४०॥ “अग्निर्भूम्यां०” इत्यादि तीन ऋचाओं से आधान करे । या “अस्मै क्षत्राण्येत०” से इध्म को देखे ॥४१॥४२॥ यह दूसरी कण्डिका समाप्त हुई ॥ २ ॥ “युनज्मिन्त्वे०” इन पाँच ऋचाओं से इध्म का आधान करे । और काँसे का पात्र लाकर “तथोदपात्रं धारय०” इत्यादि मंत्र से अभिमंत्रण करे ॥१॥२॥ अन्य जल से “इहेत देवी०” इत्यादि मंत्रों को पढ़ कर आसिंचन करे ॥३॥ “ऋतं त्वा सत्येन०” इत्यादि से हवि के साथ पर्युक्षण कर के “जीवास्थ०” इत्यादि चार मंत्रों से एक बार जल भक्षण करे, कर्त्ता और ब्रह्मा जल से आचमन करे॥ उपोत्थाय वचन से मंत्र की प्रतीति कराई गई है । और “वेदप्रपद्भिः” से प्रपद् करे ॥ “ओं प्रपद्ये भूः०” इत्यादि से प्रपद् करावे ॥४॥ प्रपद् कराके पश्चिम भाग में बिछाये हुए