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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३३ अग्निमित्यग्निम् ॥१३॥ तस्मिन्नरण्ये सपत्नक्षयणी- रादधात्यश्वत्थबधकत्वाद्वङ्गाह्वखदिरशराणाम् ॥ १४॥ उक्ताः पाशाः॥१५॥आश्वत्थानि कूटानि भाङ्गानि जालानि ॥ १६ ॥ बाधकदण्डानि ॥ १७॥ स्वाहैभ्य इति मित्रेभ्यो जुहोति ॥१८॥ दुराहामीभ्य इति सव्येनेङ्गडममित्रेभ्यो बाधके ॥ १९ ॥ उत्तरतोऽग्नेर्लोहिताश्वत्थस्य शाखां निहृत्य नीललोहिताभ्यां सूत्राभ्यां परितत्य नीललो- हितेनामूनिति दक्षिणा प्रहापयति ॥ २० ॥ ये बाहव उत्तिष्ठतेति·यथालिङ्गं सम्प्रेष्यति ॥२१॥ होमार्थे पृषदा- ज्यम् ॥२२॥ प्रदानान्तानि वाप्यानि ॥२३॥ वाप्यैस्त्रिष- न्धीनि वज्ररूपाण्यर्बुदरूपाणि ॥२४॥ शितिपदीं सम्पा- मंत्रण करे ॥ १२ ॥ “अग्नि” इस आधी ऋचा से उत्पन्नाग्नि का अनुमंत्रण करे ॥१३॥ इसी अग्नि में सेना कर्म करे । यह कर्म वन में होगा न कि सेना में ॥ शत्रुक्षयणी कहे इध्मों का अर्थात् अश्वत्थ, वधक, एरण्ड, पलाश, खदिर और शर इनका आधान करे ॥१४॥ इस कर्म में सूत्रोक्त पाश काम में लाये जाय जो भाङ्ग एवं मौज का प्रयोग करे ॥१५॥ स्वाभा- विक गर्त्त को कूट कहते हैं । सेनाकार्य्य में पीपल का कूट बनावे और जानवरों को बांधने के लिये जाल होती है इसको भाङ्ग का बनावे॥१६॥ और बाधक वृक्ष का दण्ड करे ॥१७॥ स्वाहैभ्यः इत्यादि और “अमित्रेभ्यो” से आहुति करे ॥१८॥ “दुराहामीभ्य०” को पढ़कर वधक के काठ से प्रज्वलित अग्नि में वाम हाथ से इङ्गिड को और शत्रु के लिये बाधक अग्नि में आहुति देवे ॥१९॥ अग्नि के उत्तर भाग में लाल अश्वत्थ की शाखा को काटकर नीले एवं लाल रंग के सूतों से लपेट करके “नील लोहितेनामून्”० इत्यादि से दक्षिण द्वार होकर छोड़ देवे ॥२०॥ “ये बाहव उत्तिष्ठत”० इत्यादि इस अनुवाक को शुद्ध समय में कर्ता जप करे ॥ और संकेतानुसार संप्रेषण करे ॥२१॥ होम के लिये पृषदाज्य (दही का छिटा दिया घृत) लेवे ॥२२॥ सब स्थानों में—पाश में अश्वत्थ के कूट में, भाङ्ग के जालों में, बाधक दण्डों में, वज्र रूप पात्रों में और इङ्गिड के अलङ्करण में क्रुद्धानुमंत्रण करे ॥२३॥२४॥ शितिपदी ५

३४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । तवर्तीं दर्भरज्ज्वा क्षत्रियायोपासङ्गदण्डे बध्नाति ॥२५॥ द्वितीयामस्यति ॥२६॥ अस्मिन् वस्विति राष्ट्रावगमनम् ॥२७॥ आनुशूकानां व्रीहीणामात्रस्कजैः काम्पलैः शृतं सारूपवत्समाशयति ॥२८॥ अभीवर्त्तेनेतिरथनेमिमणि- मयः सीसलोहरजतताम्रवेष्टितं हेमनाभिं वासितं बद्ध्वा सूत्रोतं बर्हिषि कृत्वा सम्पातवन्तं प्रत्यूचं भृष्टीरभीव- र्त्तोत्तमाभ्यामाच्योतति ॥२९॥ अचिक्रदद्धा त्वा गन्निति यस्माद्राष्ट्रादवरुद्धस्तस्याशायां शयनविधं पुरोडाशं दर्भेषूदके निनयति ॥३०॥ ततो लोष्टेन ज्योतिरा- यतनं संस्तीर्य क्षीरौदनमश्नाति ॥३१॥ यतो लोष्टस्ततः संभाराः ॥ ३२ ॥ तिसृणां प्रातरशिते पुरोडाशे व्यह्यन्ते को पृषदाज्य से सम्पात करके दर्भरज्जु से क्षत्रिय के विश्रामार्थ उर्ध्वज दण्ड में बांध देवे ॥२५॥ और दूसरी शितिपदी को शत्रु सेना में फेंक देवे ॥२६॥ “अस्मिन्वसु”० से अपने राष्ट्र में प्रवेश करे ॥ जो शत्रु द्वारा अपने राष्ट्र से निकाला जाकर पुनः अपने राष्ट्र में जाता है उसके लिये यह प्रवेश विधि है ॥२७॥ आनुशूक ( पहिले बार के काटे जाने पर फिर उत्पन्न हो ) धान्य ( यव आदि ) के कटने पर श्रपण काठ और गुण्डारोचन लता से समान रूप रंग के बच्चा वाली गौ के दूध में पका कर राजा को खिलावे ॥२८॥ रथचक्र के बाहर पुष्टि के अवयव को मणि के आकार का बनाकर सीसा, लोहा, चान्दी, तामा, इनसे वेष्टित कर नाभिमणिद्वार को सुवर्ण मणिद्वार बनाकर कस्तूरी से त्रयोदशी आदि तिथि में बान्ध देवे और सूत से पोहकर कुश पर धरकर “अभी- वर्त्तोत्तमामुदसोसपत्नक्षयणः” इत्यादि दो ऋचाओं से प्रत्येक ऋचा से दूध का धार मणि से देवे ॥२९॥ जिस देश से शत्रु राजा द्वारा निकाला गया हो उस राष्ट्र की ओर के क्षेत्र से व्रीहि, जल, दर्भ आदि लेकर निवास देश में शयन स्थान में विधि पुरोडाश को करके-कुशों को बिछाकर मंत्र के अन्त में जल के साथ लावे ॥३०॥ परराष्ट्र की दिशा से मट्टी का ढेला लेकर चूर्णित करे एवं उसको अग्नि स्थान के उत्तर भाग में विकिर देवे । जहाँ से मट्टी का ढेला लेवे वहीं से अन्य साधनों

॥३३॥७॥१६॥ भूतो भूतेष्विति राजानमभिषेक्ष्यन्महानदे शान्त्युदकं करोत्यादिष्टानाम् ॥१॥ स्थालीपाकं श्रपयित्वा दक्षिणतः परिगृह्याया दर्भेषु तिष्ठन्तमभिषिञ्चति ॥२॥ तल्पार्षभं चर्मारोहयति ॥३॥ उदपात्रं समासिञ्चेते ॥४॥ विपरिधाने ॥५॥ सहैव नौ सुकृतं सह दुष्कृतमिति ब्रह्मा ब्रूयात् ॥६॥ यो दुष्कृतं करवत्तस्य दुष्कृतं सुकृतं नौ सहेति ॥७॥ आशयति ॥८॥ अश्वमारोह्यापराजितां प्रति- पादयति ॥९॥ सहस्रं ग्रामवरो दक्षिणा ॥१०॥ विपरिधा- नान्तमेकराजेन व्याख्यातम् ॥११॥ तल्पे दर्भेष्वभिषि- ञ्चति ॥१२॥ वर्षीयसि वैयाघ्रं चर्मारोहयति ॥१३॥ ऋत्वा- को भी ग्रहण करे ॥३२ ॥ राष्ट्र के तीन जनों के प्रातःकाल भोजन कर लेने पर पुरोडाश से हवन करे ॥३३॥७॥१६॥ यह सोलहवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥१६॥ अब लघुअभिषेक विधि को कहेंगे ॥ माण्डलिक, सामन्त, युवराज, सेनापति, या अन्य किसी का अभिषेक कर्म जानना । राजा आदि अभि- षेक करने की इच्छा वाला महानदी गंगा, यमुना आदि के जल से पुरोहित मंत्रोक्त जल से तय्यार करे ॥१॥ स्थालीपाक को पकाकर अग्नि के दक्षिण भाग में बिछाये हुए कुशों पर बैठे राजा आदि को पुरोहित यथाविधि “भूतोभूतेषु”० इत्यादि अभिषेक गण मंत्रों से अभिषेक करे ॥२॥ पलङ्ग पर लाल बैल के चर्म को बिछा कर उसपर राजा को पुरोहित आरोहण करावे ॥ जलपात्र को जल से सिञ्चन करे ॥४॥ पुरोहित राजा के बदले “सह नौ सुकृतं सह दुष्कृतम्” ऐसा ब्रह्मा कहे ॥६॥ राजा उत्तर देवे । “यो दुष्कृतं करवत्तस्य दुष्कृतं सुकृतं नौ सह” ॥७॥ स्थाली पाक को भक्षण करे ॥८॥ राजा घोड़ा पर चढ़कर पश्चिम दिशा की ओर जावे ॥९॥ सहस्र गौ दक्षिणा में पुरोहित को देवे ॥१०॥ सार्वभौम राजा का अभिषेक, माण्डलिक राजा के अभिषेक की अपेक्षा भिन्न है ऐसा कहा गया जानना ॥११॥ मंचान पर, कुशों पर, बैठे हुओं को अभिषिंचन करे इसका विकार फिर कुशोंपर का कहना तल्प के सम्बन्धार्थ जानना ॥१२॥ अधिक उमर वाले व्याघ्र के

३६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

रो राजपुत्रास्ताल्पाः पृथक् पादेषु शयनं परामृश्य सभां प्रापयन्ति ॥१४॥ दासः पादौ प्रक्षालयति ॥१५॥ महा- शूद्र उपसिञ्चति ॥१६॥ कृतसम्पन्नानक्षानातृतीयं विचि- नोति ॥१७॥ वैश्यः सर्वस्वजैनमुपतिष्ठत उत्सृजायुष्म- न्निति ॥१८॥ उत्सृजामि ब्राह्मणायोत्सृजामि क्षत्रियायो- त्सृजामि वैश्याय धर्मो मे जनपदे चर्यतामिति ॥१९॥ प्रतिपद्यते ॥२०॥ आशयति ॥२१॥ अश्वमारोह्यापराजि- तां प्रतिपादयति ॥२२॥ सभामुदायाति ॥२३॥ मधुमिश्रं ब्राह्मणान् भोजयति ॥२४॥ रसानाशयति ॥२५॥ महि- षाण्युपयाति ॥२६॥ कुर्युर्गामिति गार्ग्यपार्थश्रवसौ नेति भागलिः ॥२७॥ इममिन्द्र वर्धय क्षत्रियं म इति क्षत्रियं प्रातः प्रातरभिमन्त्रयते ॥२८॥ उक्तं समासेचनं विपरि- धानम् ॥२९॥ सविता प्रसवानामिति पौरोहित्ये वत्स्य- चर्म पर आरोहण करावे ॥१३॥ और राजपुत्र राजा के शयन-शय्या के पैर की ओर जब तक राजा को नींद न आवे तब तक शयन सम्बन्धि बातें करे और सभा को पहुँचावे ॥१४॥ शूद्रदास राजा के पैरों को प्रक्षालन करे ॥१५॥ महाशूद्र प्रक्षालन करते समय जल ढारा करे ॥१६॥ पुष्टिद्यूत के लिये बहेरा के फलों को चूने और द्यूत के लिये अक्षों को तय्यार कर तीसरे पाशा को चुन लेवे यों राजा द्यूत खेले ॥१७॥ “उत्सृज आयुष्मन्”० ऐसा कहकर वैश्य राजा के पास बैठे ॥१८॥ “उत्सृ- जामि”० इत्यादि मंत्र राजा पढ़े और वैश्य, राजा के निकट पहुँचे ॥१९॥२०॥ सब वर्णों से आज्ञा पाकर वैश्य सब पटरानियों के घरों में जावे और राजा को घोड़े पर चढ़ाकर पश्चिम दिशा में पहुँचा कर सभा में राजा को लेकर आवे ॥२३॥ और मधु मिला अन्न ब्राह्मणों को भोजन करावे । रसों को भोजन करावे ॥२५॥ और सब महिषियों के घरों में राजा जावे ॥२६॥ “कुर्युर्गाम्”–ऐसा गार्ग्य पार्थश्रवस ये दो आचार्य मानते हैं और भागलि नहीं मानते हैं ॥२७॥ 'इममिन्द्र वर्धय क्षत्रियम्'० प्रति दिन प्रातः समय पुरोहित अभिमंत्रणा किया करे

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ३७ न्वैश्वलोपीः समिध आधाय ॥३०॥ इन्द्र क्षत्रमिति क्षत्रियमुपनयीत ॥३१॥ तदाहुर्न क्षत्रियं सावित्रीं वाच- येदिति ॥३२॥ कथं नु तमुपनयीत यन्न वाचयेत् ॥३३॥ वाचयेदेव वाचयेदेव ॥३४॥८॥१७॥ इत्यथर्ववेदे कौशिक- सूत्रे द्वितीयोऽध्यायः समाप्तः ॥२॥ पूर्वस्य पूर्वस्यां पौर्णमास्यामस्तमित उदकान्ते कृष्ण- चेलपरिहितो निर्ऋतिकर्माणि प्रयुङ्क्ते ॥१॥ नाव्याया दक्षिणावर्ते शापेटं निखनेत् ॥२॥ अपां सूक्तैरवसि- ञ्चति ॥३॥ अप्सु कृष्णं जहाति ॥४॥ अहतवसन उपमु- च्योपानहौ जीवघात्याया उदाव्रजति ॥५॥ प्रोष्य तामुत्त- रस्र्यां साम्पदं कुरुते ॥६॥ शापेटमालिप्याप्सु निबध्य तस्मिन्नुपसमाधाय संपातवन्तं करोति ॥७॥ अश्नाति ॥२८॥ जलका आसेचन विपरियान करके कहा गया है ॥२९॥ “सविता प्रसवाना”० इत्यादि मंत्र से अमावस्या को पुरोहित उपवास रहकर समिदाधान करे ॥३०॥ “इन्द्रक्षत्रम्”० से क्षत्रिय का उपनयन करे ॥३१॥ सो कहा है कि क्षत्रिय से सावित्री मंत्र न बचवावे ॥३२॥ तो कैसे उसका उपनयन किया जावे ? (जब सावित्री न बचवायी जावे) ॥३३॥ बचवावे ही बचवावे ही ॥३४॥ ८॥१७॥ यह सतरहवीं कण्डिका पूरी हुई ॥१७॥ और अथर्ववेद के कौशिकसूत्र के दूसरे अध्याय का भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥ “पूर्वं त्रिषप्तीयम्”० सूक्त के अनुसार पहिली पौर्णमासी को सूर्यास्त समय जल के पास जाकर काला वस्त्र पहन कर निर्ऋति कर्मों (दरिता दूर करने के लिये) को करने में प्रयुक्त होवे ॥१॥ नाव के दक्षिण भाग में शापेट को खने और अप सूक्तों से जल से सिंचन करे ॥२॥३॥ और जो काला वस्त्र पहिना है उसको जल में छोड़ देवे ॥४॥ और अखण्ड नये वस्त्र और जीवित पशु को मारकर जो चर्म लिया गया हो उससे बने जूते को छोड़ पीछे लौट कर देखता हुआ घर को आवे ॥५॥ उस रात्रि में वहाँ रहकर दूसरी रात्रि में ब्रह्मचारि साम्पद् करे ॥६॥

३८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ॥८॥ आधाय कृष्णं प्रवाहयति ॥९॥ उपमुच्य जरदुपान- हौ सव्येन जरच्छत्रं दक्षिणेन शालातृणान्यादीप्य जीर्णं वीरिणमभिन्यस्यति ॥१०॥ अनावृतमावृत्य सकृ- ज्जुहोति ॥११॥ सव्यं प्रहरत्युपानहौ च ॥१२॥ जीर्णे वीरिण उपसमाधायायं ते योनिरिति जरत्कोष्ठाद्व्रीहि- च्छर्करामिश्रानावपति ॥१३॥ आ नो भरेति धानाः ॥१४॥ युक्ताभ्यां सह कोष्ठाभ्यां तृतीयाम् ॥१५॥ कृष्ण- शकुनेः सव्यजंघायामङ्कमनुबध्याङ्के पुरोडाशं प्रपतेत इत्य- नावृतं प्रपादयति ॥१६॥ नीलं सन्धाय लोहितमाच्छाद्य शुक्लं परिणह्य द्वितीयोष्णीषमङ्केनोपसाद्य सव्येन सहाङ्केनावाडप्सुप्रविध्यति

हरितबर्हिषमश्नाति ॥२०॥ अन्वक्ताः प्रादेशमात्रीराद- धाति ॥२१॥ नाव्ययोः सांवेद्ये पश्चादग्नेर्भूमिपरिलेखे कीलालं मुखेनाश्नाति ॥२२। तेजोव्रतं त्रिरात्रमश्नाति ॥२३॥ तद्दक्षः ॥२४॥ शम्भुमयोभुभ्यां ब्रह्मजज्ञानमस्य वामस्य यो रोहित उदस्य केतवो मूर्द्धां विषासहिमिति सलिलैः क्षीरौदनमश्नाति ॥२५॥ मन्थान्तानि ॥२६॥ द्वितीयेन प्रवत्स्यन् हविषामुपदधीत ॥२७॥ अथ प्रत्येत्य ॥२८॥ अथ प्रत्येत्य ॥२९॥ अथ प्रार्थयमाणः ॥३०॥ अथ प्रार्थयमाणः ॥३१॥ चत्वारो धायाः पलाशय- वस्त्र को लोहदण्ड के साथ जल में डाल देवे ॥ “एता एना०” इस ऋचा से नील वस्त्र को लोह खण्ड के साथ जल में फेंककर घर को आवे ॥ तब पौष्टिक और सम्पादन कर्मों को करे ॥ निर्ऋति कर्म समाप्त हुआ ॥ “त्रिषप्रीयं०” इत्यादि सूक्त से पौष्टिकादि कर्मों को चैत्र की पौर्णमासी को या चित्रा नक्षत्र में करे ॥१९॥ पक्षि के घोंसले को जलाकर पक्व स्थालीपाक को गर्म करके हरे कुश के साथ खावे ॥२०॥ प्रादेश बरा- बर समिधाओं को जल में भिंगो कर आधान करे ॥२१॥ जिन दो नदियों में नौकायें आती जाती हों, उनके संगम पर अग्नि धर कर उसके पश्चिम भाग में भूमि पर रेखा करके परशु की भाँति मुख करके खावे हाथ से नही ॥२२॥ और तीन रात तक नित्य घी खावे ॥२३॥ उसको खाने वाला ‘शम्भुमयोभुभ्यां०” इत्यादि सलिल गण के मंत्रों से .क्षीरौदन खावे ॥२५॥ मन्थान्त कर्मों को “त्रिः ज्योतिः कुरुते०” से करे ॥२६॥ “ब्रह्मजज्ञानमवाप्ता”० इत्यादि से राह चलता मन्थान्त कर्मों को उपवास रहता हुआ हविष द्वारा आहुति करता हुआ करे ॥२७॥ जब मार्ग में जावे तब यह कर्म करे। जब गाँव जावे तब यह कर्म करे ॥ यह प्रस्थान-कर्म समाप्त हुआ ॥२८॥२९॥ यथार्थ याचना करने वाला द्रव्य की कामना से यह कर्म करे॥ या निष्काम भी यह कर्म करे ॥३०॥ ॥३१॥ अब समुद्र कर्म (सर्व फल कर्म) को कहेंगे ॥ अभ्यातानान्त कर्म करके चार फूलका पलाश की समिधाओं का, चार कुशों का फूल का बारी २ से (एक समिद्धारक, दूसरी उस पर दर्भ भारक) फिर उसी

४० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ष्टीनां भवन्ति ॥३२॥ दर्भाणामुपोलवानां चत्वारः ॥३३॥ तं व्यतिषक्तमष्टावरमिध्मं सात्रिकेऽग्नावाधायाज्येना- भिजुहुयात् ॥३४॥ धूमं नियच्छेत् ॥३५॥ लेपं प्राश्नीयात् ॥३६॥ तमु चेन्न विन्देदथ सत्रस्यायतने यज्ञायतनमिव कृत्वा ॥३७॥ समुद्र इत्याचक्षते कर्म ॥३८॥१॥१८॥ अम्बयो यन्ति शम्भुमयोभुभ्यां ब्रह्म जज्ञानमा गाव एका च म इति गा लवणं पाययत्युपतापिनीः ॥१॥ प्रजननकामाः ॥२॥ प्रपामवरुणद्धि ॥३॥ सं सं स्रव- न्त्विति नाड्याभ्यामुदकमाहरतः सर्वत उपासेचम् ॥४॥ तस्मिन् मैश्रधान्यं श्रुतमश्नाति ॥५॥ मन्थं वा दधिमधु- प्रकार आठ ऊपर करके "ब्रह्मजज्ञानेन सहस्रधारेण" मंत्र से आज्य की आहुति देवे ॥३२॥३३॥३४॥ आज्य होम के अनन्तर तांत्रिकाग्नि का धूम भक्षण करे ॥३५॥ पलाश के डांड में से अग्नि के संयोग से "सिलि सिलिनः" इस मंत्र को पढ़कर प्राशन करे ॥३६॥ सात्रिक अग्नि का प्रणयन या यज्ञ स्थान में यह कार्य करे । इस कर्म का फल धन, धान्य, लक्ष्मी, पुत्र, यश, मेधा, धर्म, आयु, बल, प्रजा, सम्पत्, ग्राम, कूपादि की प्राप्ति होती है । इसलिये इस कर्म का नाम समुद्रकर्म है ॥३७॥३८॥१॥१८॥ यह अठारहवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥१८॥ “अम्बयो यन्ति, शम्भुमयोभुभ्यां ब्रह्मजज्ञानमागावएकाचमे” ० इत्यादि मंत्रों से गौओं को लवण पान करावे-इससे सारे रोग छूट कर गौयें हृष्ट पुष्ट हो जाती हैं-परन्तु स्मरण रहे कि लवण देने पर थोड़ा जल भी पीने को न देवे ॥१॥ गौओं को हृष्ट पुष्ट अच्छे बच्चे नीरोग हों ऐसी कामनावाले गौ को लवण तो खवावे परन्तु उसे थोड़ा जल भी पीने को न देवें ॥ गौओं को बहुत दूध होवे, रोग रहित रहें, ज्वर, गण्डमालादि रोगों में और गर्भ रहने के लिये यह कर्म होता है ॥ ॥२॥ तड़ाग को रोक कर तब गौओं को जल पिलावे ॥३॥ सब ही प्रयो- जन के लिये पुष्टि कर्मों को कहते हैं । दो नदियों के जल को लाकर उससे सब ओर उपसेचन करे ॥ ४ ॥ उस जल से दूध में मैश्रधान्य को पकाकर खावे ॥ ५॥ या मन्थ ( दधि मधु मिला ) खावे ॥ ६ ॥

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ४१ मिश्रम् ॥ ६ ॥ यस्य श्रियं कामयते ततो व्रीह्याज्यपय आहार्य क्षीरौदनमश्नाति ॥ ७ ॥ तदलाभे हरितगो- मयमाहार्य शोषयित्वा त्रिवृति गोमयपरिचये शृतम- श्नाति ॥ ८ ॥ शेरभकेति सामुद्रमप्सु कर्म व्याख्यातम् ॥ ९ ॥ अनपहृतधाना लोहिताजाया द्रप्सेन संनीया- श्नाति ॥१०॥ एतावदुपैति ॥११॥ तृणानां ग्रन्थीनुद्ग- थ्नन्नपक्रामति ॥१२॥ तानुदाव्रजन्नुदपात्रस्योदपात्रेणा- भिप्लावयति मुखं विमार्ष्टि ॥१३॥ एह यन्तु पशवः सं वो गोष्ठेन प्रजावतीः प्रजापतिरिति गोष्ठकर्माणि ॥१४॥ गृष्टेः पीयूषं श्लेष्ममिश्रमश्नाति ॥१५॥ गां ददाति ॥१६॥ उदपात्रं निनयति ॥१७॥ समुह्य सव्येनाधिष्ठायार्धं दक्षि- जिस धनी के धन को हरण करना चाहे उसके घर से व्रीहि, आज्य, दूध किसी प्रकार लावे और उसमें क्षीरौदन पकाकर खावे ॥ ७ ॥ यदि ऐसा न कर सके तो, गीला गोबर लाकर सुखा लेवें और उसको एकत्र कर उसे पकाकर खावे ॥८॥ यह पुष्टि कर्म समुद्र जल में किया जाता है। शापैटक को लीपकर जल में निविध कर उस पर अग्नि का प्रणयन कर “शेरभक०” इत्यादि सूक्त से भात को सम्पातन और अभिमंत्रण कर खावे ॥ ९ ॥ बिन टुकड़े किये हुए जौओं को लावा भून कर उसको लाल बकरी के दूध के मट्ठे के साथ मिलाकर खावे ॥ १० ॥ समुद्र जल से इस कर्म को-इस परिमाण से करे ॥११॥ तृणों को एकत्र कर उनमें गांठे देकर उन पर वधू को चलावे ॥१२॥ उन गांठे हुए तृणों को लेकर जल में जाकर जलपात्र को जल में प्रवाहित करे और अपने मुख को जल से मार्जन करे ॥ १३ ॥ “एह यन्तु०” इत्यादि मंत्रों से वक्ष्यमाण गोष्ठ कर्मों को करे ॥१४॥ दूसरी बार ब्याई हुई गौ के पहिले दिन के दूध का नाम पीयूष है॥ इस पीयूष को गौके मुँह के लार को मिलाकर खावे ॥१५॥ ब्राह्मण को गौ देवे ॥१६॥ जलपात्र को अभिमंत्रण कर उसको गोशाला में लावे ॥१७॥ गौ गृह के भीतर—स्थान को पञ्च भूसंस्कार करके गोशाला में धूलि को ढेर किये हुए के आधे भाग को दक्षिण ६

४२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । णेन विक्षिपति ॥१८॥ सारूपवत्से शकृत्पिण्डान् गुग्गु- ललवणे प्रतिनीय पश्चादग्नेर्निखनति ॥१९॥ तिसृणां प्रातरश्नाति ॥२०॥ विकृते संपन्नम् ॥२१॥ आयमगन्नयं प्रतिसरोऽयं मे वरणोऽरातीयोरिति मन्त्रोक्तान् वासि- तान् बध्नाति ॥२२॥ उत्तमस्य चतुरो जातरूपशकलेनानु- सूत्रं गमयित्वावभुज्य त्रैधं पर्यस्यति ॥२३॥ एतमिध्ममि- त्युपसमाधाय ॥२४॥ तमिमं देवता इति वासितमुल्लुप्य ब्रह्मणा तेजसेति बध्नाति ॥२५॥ उत्तमो असीति मंत्रोक्तम् दिशा में फेक देवे ॥१८॥ सारूपवत्सवाली गौ के गोबर-पिण्डों को, गुग्गुल लवण में लाकर अग्नि के पश्चिम भाग में गाड़ देवे ॥१९॥ तीन रात बीत जाने पर प्रातःकाल उसे उखाड़ कर खावे ॥२०॥ और भूमि में गाड़े हुए पीयूष को निकालने पर वह तय्यार हुआ कि नहीं इसकी परीक्षा-उसका गन्ध, स्वाद, और रूप की देखभाल चखकर जानना । क्योंकि विकार रहित होने ही से यह ठीक हुआ समझना चाहिये ॥२१॥ “आयमग्न०” इत्यादि मंत्र से मणि द्रव्यों को मंत्रों से अभिमंत्रण कर वासित करके त्रयोदशी आदि नियमों से वासित मणियों को “पुष्टिफ- लत्वं मह्यं ददतु पुष्टये ।” “अयमागन्न०” से पलाशमणि, आदि वृक्षोंके “अयं प्रतिसर ।” “अयं मे वरण” से वरण, आडे खादिर, चिबुका ( मुचु- कुन्दवृक्ष ) ॥ उक्त मणि के सोने की ४ माला लाइ के साथ गांधने के योग्य करके टेढा करके एक २ माला को तीन २ बार लपेट कर बगल में सब तरफ लोहे के मोटे पत्तर से एक सौ दक्षिण सुवर्ण सूत्र करे ॥ ॥ तात्पर्य यह है कि यह प्रकरण सब कामनाओं की सिद्धि हेतु सर्व- काममणि शान्ति कहाता है ॥ पलाश मणि को तीन बार वासित करके डालकर अभिमंत्रण कर त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावास्या इन तीन तिथियों में दही, मधु में वासना देकर मणि को धारण करे ॥ २२ ॥ ॥ २३ ॥, “एतमिध्मम्०” से उपसमाधान करके “तमिमं देवता०” से मणि को छेदकर “ब्रह्मणा तेजसा०” से अपने उत्तमाङ्ग में बान्धे ॥ २४ ॥ ॥ २५ ॥ “उत्तमो अस्योषधीनां तव वृक्षा०” से जिस द्रव्य का⁻

॥२६॥ अक्षितास्त इति यवमणिम् ॥२७॥ प्रथमा ह व्युवास सेत्यष्टक्याया वपां सर्वेण सूक्तेन त्रिर्जुहोति ॥२८॥ समवत्तानां स्थालीपाकस्य ॥२९॥ सहहुतानाज्य- मिश्रान्हुत्वा पश्चादग्नेर्वाग्यतः संविशति ॥३०॥ महा- भूतानां कीर्तयन् संजीहिते ॥३१॥२॥१९॥ सीरा युञ्जन्तीति युगलाङ्गलं प्रतनोति ॥१॥ दक्षिण- मुष्टारं प्रथमं युनक्ति ॥२॥ एहि पूर्णकेत्युत्तरम् ॥३॥ कीनाशा इतरान् ॥४॥ अश्विना फालं कल्पयतामुपावतु मणि हो उसी को इस मंत्र से बान्धे ॥२६॥ “अक्षितास्त०” से यव मणि को बान्धे ॥ २७॥ माघ मास की अष्टका में पूर्वाह्न समय यज्ञोपवीती होकर यज्ञशाला निवेशन के लिये पञ्च भूसंस्कार करके उपवास रहकर भात खाकर स्नानकर अखण्ड नये वस्त्र को पहन ओढ़- कर-रात्रि में प्रयोग करे अर्थात् वश्य तन्त्रानुसार पाकयज्ञ विधान से धान आदि को पकाकर आज्यभागान्त होम करके अग्नि के पूर्वभाग में पश्चिम में गौ को धरे ॥ अग्नि के पश्चिम भाग में पूर्व मुख बैठ कर अन्वारब्ध हुआ शान्त्युदक करे ॥ “प्रथमा ह व्युवास स०” इत्यादि सम्पूर्ण सूक्त से घी की आहुति देवे ॥ सूक्त को तीन बार पढ़कर आहुतियां करे । इसके अनन्तर मांस होम में “प्रथमा ह व्युवास स०” इत्यादि सम्पूर्ण सूक्त से तीन बार आहुतियां देवे ॥ फिर ‘प्रथमा ह व्युवास०” सम्पूर्ण सूक्त से स्थालीपाक की आहुति देवे ॥२९॥ सह हवन क्रियों के साथ आज्य मिला आहुति देकर अग्नि के पश्चिम भाग में वाक् संयम कर बैठे ॥३०॥ महाभूतों ( पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ) के गुणों के वर्णन करता रहे, जिससे नीन्द न आवे ॥३१॥२॥१९॥ यह उन्नीसवी कंडिका पूरी हुई ॥१९॥ “सीरायुञ्जन्ति०” इत्यादि से कर्त्ता हलके दहिने भाग मे और “उष्टारं प्रजन- यितारं०” मंत्र पढ़कर दाहिने युग धुरि में । उत्तरां युगं धुरि सेक्तारमेव “एहि पूर्णक०” से वाम भाग में बैल जोते। “युनक्तसीरावियुगातनोत०” को पढ़कर जोतने वाले से कहे कि तुम खेत जोतो और अलग २ सीरोरे कर जोतो' ऐसा कहने पर कर्षक खेत जोते ॥१॥२॥३॥४॥ “अश्विना

४४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।

बृहस्पतिः। यथासदद्बहुधान्यमयदमं बहुपूरुषमिति फाल- मतिकर्षति ॥५॥ इरावानसि धार्तराष्ट्रे तव मे सत्रे राध्यतामिति प्रतिमिमीते ॥६॥ अपहताः प्रतिष्ठा इत्य- पूपैः प्रतिहत्य कृषति ॥७॥ सूक्तस्य पारं गत्वा प्रयच्छति ॥८॥ तिस्रः सीताः प्राचीर्गमयन्ति कल्याणीर्वाचो वदन्तः ॥९॥ सीते वन्दामहे त्वेत्यावर्तयित्वोत्तरस्मिन् सीता- न्ते पुरोडाशेनेन्द्रं यजते ॥१०॥ अश्विनौ स्थालीपाकेन ॥११॥ सीतायां संपातानानयन्ति ॥१२॥ उदपात्र उत्तरान् ॥१३॥ शष्पहविषामवधाय ॥१४॥ सर्वमनक्ति ॥१५॥ यत्रसंपा- तानानयति ततो लोष्टं धारयन्तं पत्नी पृच्छत्यकृक्षतेति ॥१६॥ अकृक्षामेति ॥१७॥ किमाहार्षीरिति ॥१८॥ वित्तिं भूतिं पुष्टिं प्रजां पशूनन्नमन्नाद्यमिति ॥१९॥ उत्तरतो मध्य-


फालम्०” इत्यादि से फाल को अभिमंत्रित करे ॥५॥ “इरावानसि०” इत्यादि से खेत को नाप कर जोते ॥६॥ “अपहताः प्रतिष्ठा०” इत्यादि से फाल को अपूपों से वेष्टित कर जोते ॥ अपूप घी में पका हो । “लांगलं पवीरवत्” इत्यादि मंत्र पढ़कर जोते ॥७॥ और कर्त्ता हल को कर्षकों को देवे-तब तक स्वयं जोते जब तक पूरा सूक्त पढ़ना समाप्त न हो ॥८॥ “अभिवर्षतु निष्पद्यतां बहुधान्यं, आरोग्यम्” इत्यादि कल्याणी बातों को बोले जब तक तीन सीरावर पश्चिम की ओर जोते ॥९॥ “सीते वन्दा- महे त्वं०” इत्यादि मंत्र को जाप करते हुए लोट पोट करता रहे तब तक पुरोडाश से इन्द्रदेवता की पूजा करे ॥१०॥ “अश्विनौ०” देवता को स्थालीपाक से पूजा करे ॥११॥ सीरावरों पर आहुतियों का घार देवे ॥१२॥ जलपात्र को उत्तर दिशा में घरे ॥१३॥ शल्य ( हरी दूब ) की आहुति करके सब हलों को प्रक्षालन करे ॥ जहां सम्पातों को लावे वहां से ढेला लेते हुए को पत्नी पूछे तुमने जोता ? कारयिता कहे मैं सम्पातों को जोतता हूं । मट्टी के पिण्ड को लेकर घरे पत्नी (स्वामिनी) पूछे “अकृ- ष्याम०”१४।१५।१६।१७। फिर पत्नि पति को पूछे “किमाहार्षीः” तो उत्तर में पत्नी कहे-वित्ति, भूति, पुष्टि, प्रजा, पशु, अन्न, और अन्नाद्य इनको

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ४५ सायां निवपति ॥२०॥ अभ्यज्योत्तरफालं प्रातरायोजनाय निदधाति ॥२१॥ सीताशिरःसु दर्भानास्तीर्य प्लक्षौदुम्ब- रस्य त्रींस्त्रींश्चमसान्निदधाति ॥२२॥ रसवतो दक्षिणे शष्पवतो मध्यमे पुरोडाशवत उत्तरे ॥२३॥ दर्भान् प्रत्य- वभज्य संवपति ॥२४॥ सारूपवत्से शकृत्पिण्डान् गुग्गुलु- लवणेप्रतीनीयाश्नाति ॥२५॥अनडुत्सांपदम् ॥२६॥३॥२०॥ पयस्वतीरिति स्फातिकरणम् ॥१॥ शान्तफलशिला- कृतिलोष्टवल्मीकराशिवापं त्रीणि कूदीप्रान्तानि मध्य- मपलाशे दर्भेन परिवेष्ट्य राशिपल्येषु करोति ॥२॥ सायं भुञ्जते ॥३॥ प्रत्यावपन्ति शेषम् ॥४॥ आ भक्तयातनात् लेती हूं ॥१९॥ बीच के सीरवर में के ढेला को वरे । और उत्तर देश में अश्विनौ देवता को स्थालीपाक से पूजे ॥२०॥ पूजाकर उस उत्तर सम्पादि संस्कृत जल से दूसरे दिन प्रातःकाल आयोजना होगी उसके लिये रख छोड़े ॥२१॥ सीता के शिर पर कुशों को आस्तरण करके प्लक्ष, गूलर के तीन २ इध्म को डाले ॥२२॥ रसवाले दक्षिण में शष्पवाले बीच में पुरोडाश वाले उत्तर में डाले ॥२३॥ कुशों को टेढा करके चमसों पर डाले ॥२४॥ सरूपवत्सा गौ के गोबर के पिण्डों को गुग्गुल लवण में मिलाकर खावे ॥२५॥ अनडुत्साम्पद् (हमको बहुत बैल हो एसी इच्छावाले) करे ॥२६॥३॥२०॥ यह बीसवी कण्डिका पूरी हुई ॥२०॥ “पयस्वतीः०” इत्यादि से स्फातिकरण (किसी पदार्थ की वृद्धि) कर्म को करे ॥१॥ शान्तफल, शिलाकृति, मट्टी का ढेला, दीमक के मट्टी के ढेर को तीन कूदीप्रान्तों को, पलाश के पत्ते में कुश के साथ लपेट कर बान्धे और अन्न के ढेर पर या वखार में धरे ॥२॥ अन्न को नाप कर सायंकाल में भोजन करे ॥३॥ मनुष्य के हिसाब से अधिक कोष्ठागार में धरे और शेष को आहुति करे ॥४॥ जब २ भात पकावे, तब २ उसे अभिमंत्रित करे । और जब २ छाटने, कूटने, साफ करने, रंधन करने, परीक्षण करने, छन देने का काम करे तब २ उसे अभिमंत्रण करे ॥५॥

॥५॥ अनुमन्त्रयते ॥६॥ अयं नो नभसस्पतिरिति पल्येऽ- श्मानं सम्प्रोक्ष्यान्वृचं काशीनोप्यावापयति ॥७॥ आ गाव इति गा आयतीः प्रत्युत्तिष्ठति ॥८॥ प्रावृषि प्रथमधार- स्येन्द्राय त्रिर्जुहोति ॥९॥ प्रजावतीरिति प्रतिष्ठमाना अनुमन्त्रयते ॥१०॥ कर्कीप्रवादानां द्वादशदाम्यां सम्पा- तवत्यामयं घास इह वत्सामिति मन्त्रोक्तम् ॥११॥ यस्ते शोकायेति वस्त्रसाम्पदी ॥१२॥ तिस्रः कूदीमयोरूर्णनाभि- कुलाय परिहिता अन्वक्ता आदधाति ॥१३॥ अद्यन्तेषीका मौञ्जपरिहिता मधुना प्रलिप्य चिक्रशेषु पर्यस्य ॥१४॥ उत पुत्र इति ज्येष्ठं पुत्रमवसाययति ॥१५॥ मितशरणः साम्पदं कुरुते ॥१६॥ अर्धमर्धेनेत्यार्द्रपाणी रसं ज्ञात्वा प्रयच्छति ॥१७॥ शान्तशाखया प्राग्भागमपाकृत्य ॥१८॥ ॥६॥ “अयं नो नभसस्पतिः” से धान्यराशि में पत्थर को संप्रोक्षण करके प्रत्येक ऋचा से निर्वाप करे और दूसरा पुरुष आवपन करावे ॥७॥ यह स्फाति कर्म्म समाप्त हुआ ॥ जब गौयें जंगल आदि से चर कर गोशाला में आवें तो “आ गाव” से प्रत्युपस्थान करे ॥८॥ वर्षाऋतु में “प्रथमधा- रस्येन्द्राय” की आहुति देवे ॥१०॥ “कर्कीप्रवाद०” मंत्रों में से द्वादश नाम वाली ऋचा ( सूर्यस्य रश्मीक इत्यादि ) से सम्पातवती करके “अयं घास इह वत्सां” इत्यादि “इह वत्सां निबध्नीम०” इत्यादि से बच्चों के पैरों में बान्धे” “अयं घास०” से खाने को घास देवे गौ और बच्छरे दोनों की यह गोशान्ति समाप्त हुई ॥ “यस्ते शोकाय०” इत्यादि से वस्त्र की प्राप्ति होती है ॥१२॥ तीन कूदीमयी मकरे के जालमें बनी हुई को घी से चपोड़कर आहुति देवे और इषीका ( शरपत की ) को मूँजमें लपेट कर मधु से लीप कर तीन जौ के चिकसा से सब ओर प्रक्षिप्तकर तीन समिधोंकी आहुतियां देवे ॥१३॥१४॥ “उत पुत्र” मंत्र से ज्येष्ठ पुत्र से पिता अवशान करावे अर्थात् पुत्रों में घर बटवा देवे ॥१५॥ ज्येष्ठ पुत्र घर बना कर इसी में अवशान कर्म करे ॥१६॥ ज्येष्ठ पुत्र हाथ पैर धोकर “अर्धमर्धेन०” से “ददामि” ऐसा समझ कर देवे ॥१७॥ शान्त-

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ४७ प्रत्यग्नि परिचृतति ॥१९॥ तस्या अमावास्यायां तिस्रः प्रादेशमात्रीरादधाति ॥२०॥ स्वे क्रतुमिति रसप्राशनी ॥२१॥ रसकर्माणि कुरुते ॥२२॥ स्तुष्व वर्ष्मन्निति प्राजा- पत्यामावास्यायामस्तमिते वल्मीकशिरसि दर्भांवस्तोर्णेऽ- ध्यधिदीपं धारयंस्त्रिर्जुहोति ॥२३॥ तण्डुलसंपातानानीय रसैरुपसिच्याश्नाति ॥२४॥ एवं पौर्णमास्यामाज्योतान् ॥२५॥४॥२१॥ ऋधग्द्व्यन्त्रस्तदिदासेति मैश्रधान्यं भृष्टपिष्टं लोहि- तालंकृतं रसमिश्रमश्नाति ॥१॥ अभृष्टं प्लक्षोदुम्बरस्यो- त्तरतोऽग्नेस्त्रिषु चमसेषु पूर्वाह्नस्य तेजसाग्रमन्नस्य प्राशिषमिति पूर्वाह्ने ॥२॥ मध्यन्दिनस्य तेजसा मध्य- वृक्ष की शाखा से गौ आदि के भागों को लेकर देवे ॥१८॥ विभक्त हुए पुत्र गण अपने २ घरों में प्रति अग्नि में शान्तवृक्ष की शाखा को बान्धे ॥१९॥ उस शाखा की तीन समिधाओं को ( प्रादेश परिमिता ) अग्नि में डाले ॥२०॥ “त्वे क्रतु०” इत्यादि से रसास्तनपा प्राशन्तः रसा अनया प्राश्यन्ते । रस कर्मों को इसी से करे ॥२२॥ “स्तुष्व वर्ष्मन्०” इत्यादि की देवता प्रजापति है। इस ऋचा से अमावास्या को सूर्य्य के अस्त होने पर दीमक की मट्टी के ढेर पर कुशों को बिछाकर उस पर खपर धरकर उसमें अग्नि स्थापन करे और दीप जला देवे, और तीन बार आहुतियां देवे ॥२३॥ चावल के सम्पातों को लाकर रसों से उसका उप- सेचन कर खावे ॥२४॥ और पौर्णमासी को आज्य से उपसेचन कर खावे ॥२५॥४॥२१॥ यह इक्कीसवी कण्डिका समाप्त हुई ॥२१॥ ‘ऋधग्द्व्यन्त्रस्तदिदास०” इत्यादि मंत्र से मैश्रधान्य को भूनकर उसके सत्तू को लोहित ( रक्तचन्दन या लाल 'शोभांज वृक्ष ) से अलंकृत रस को मिलाकर खावे ॥१॥ बिना भूने हुए मिश्रधान्य के सत्तू को अग्नि के उत्तर भाग में लक्ष, गूलर के तीन चमसों को पूर्वाह्न समय “पूर्वाह्नस्य तेजसाग्रमन्नस्य प्राशिषम्” इत्यादि से आहुति देवे ॥२॥

मन्दस्य प्राशिषमिति मध्यन्दिने ॥३॥ अपराह्नस्य तेजसा सर्वमन्नस्य प्राशिषमित्यपराह्ने ॥४॥ ऋतु- मत्या स्त्रिया अङ्गुलिभ्यां लोहितम् ॥५॥ यत् क्षेत्रं काम- यते तस्मिन् कीलालं दधिमधुमिश्रम् ॥६॥ संवत्सरं स्त्रियमनुपेत्य शुक्त्यां रेत आनीय तण्डुलमित्रं सप्तग्रामम् ॥७॥ द्वादशीममावास्येति क्षीरभक्षो भवत्यमावास्यायां दधिमधुभक्षस्तस्य मूत्र उदकदधिमधुपल्पूलनान्यासिश्च्य ॥८॥ क्रव्यादं नाडी प्रविवेशाग्निं प्रजाभाङ्गिरतो माययैतौ । आवां देवी जुषाणे घृताची इममन्नाद्याय प्रविशतं स्वाहेति ॥६॥ निशायामाग्रयणतण्डुलानुदक्यान्मधु- मिश्रान्निदधात्या यवानां पङ्क्तेः ॥१०॥ एवं यवानुभया- न्समोप्य ॥११॥ त्रिवृति गोमयपरिचये शृतमश्नाति ॥१२॥ “मध्यन्दिनस्य तेजसा मध्यमन्नस्य प्राशिषम्” इत्यादि से मध्यान्ह में आहुति देवे ॥ ३॥ “अपराह्नस्य तेजसा सर्वमन्नस्य प्राशिषम्” इत्यादि से अपराह्न समय आहुति देवे ॥४॥ ऋतुमती स्त्री को गर्भकाल युक्त होने से उसके योनि से रुधिर निकलता है उस रुधिर को तर्जनी एवं मध्यमा अङ्गुलियों से अपने कुल की पुष्टि के लिये पीवे ॥५॥ जिस खेत की कामना हो उसमें जाकर जल, दही, मधु मिलाकर खावे ॥६॥ एक वर्ष तक स्त्री के पास न जाकर सीप में अपने वीर्य्य को लेकर उसमें चावल मिलाकर खावे तो सात ग्राम का लाभ होगा ॥७॥ द्वादशी से लेकर अमावास्या पूर्व केवल क्षीर खावे, और अमावास्या को दही, मधु, खावे, और इन तीन दिनों में क्षीर खावे, तो उस पुरुष के जल में जल, दही, मधु, पल्पूलन को आसेचन करके खावे ॥ ८॥ “क्रव्यादं नाडी०” इत्यादि मंत्र से स्वाहा करे ॥ रात्रि में अगहनी धान के चावलों में (चावलों को धो करके) मधु मिलाकर आहुति देवे ॥ शरद् ऋतु में जिस किसी रात्रि में व्रीहि तण्डुल और श्यामा मधु मिलाकर जब तक व्रीहि को जव की पंक्तिमें दोनों को न डाले ॥ इस प्रकार दोनों यवों को डाल कर ॥११॥ तीन बार गोबर एकत्र ढेर पर पका कर खावे ॥ १२ ॥

समृद्धमिति काङ्कायनः ॥१३॥ ममाग्नेवर्च इति सात्रि- कानग्नीन्दर्भपूतीकभाङ्गाभिः परिस्तीर्य गार्हपत्यशृतं सर्वेषु सम्पातवन्तं गार्हपत्यदेशेऽश्नाति ॥१४॥ एवं पूर्व- स्मिन्नपरयोरुपसंहृत्य ॥१५॥ एवं द्रोणकलशे रसानु- क्तम् ॥१६॥५॥२२॥ यजूंषि यज्ञ इति नवशालायां सर्पिर्मधुमिश्रमश्नाति ॥१॥ दोषो गायेति द्वितीयाम् ॥२॥ युक्ताभ्यां तृतीयाम् ॥३॥ आनुमतीं चतुर्थीम् ॥४॥ शालामङ्गुलिभ्यां सम्प्रोक्ष्य तो इससे समृद्धि होती है ऐसा काङ्कायन आचार्य्य कहते हैं॥१३॥ “ममा- ग्ने वर्च०” इत्यादि से सात्रिक ( याज्ञिक ) अग्नियों को दर्भपूतिक भाङ्ग- द्वारा परिस्तरण करके अर्थात् शत्रुदेश में जा कर गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय अग्नियों में कर्म करे । इसके अनन्तर गार्हपत्य अग्नि में अभ्यातानान्त आहुति करके “ममाग्ने वर्च” इत्यादि से सारूपवत्स गौ के दूध को गर्म कर पहिले उतार कर तब उत्तर तन्त्र करके पूतीक दर्भ से स्तरण करे । तब अभ्यातानान्त करके सारूपवत्स दूध को अग्नि पर से उतार के फिर आह्वनीयाग्नि के पास स्तरण करे । तब उसी सारूपवत्स दूध को उतार कर इसी सूक्त से एकवार अभिमंत्रण करके खावे । तब गार्हपत्य प्रभृति उत्तर तंत्र को करे । गार्हपत्य देश में भोजन करे । उत्तर तंत्र, व्रतग्रहणादि करे । दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि, आहवनीयाग्नियों में यथाक्रमसे व्रतग्रहणादि करे ॥ गार्हपत्याग्नि का स्तरण कुशों से, दक्षि- णाग्नि का पूतीक काष्ठों से और भाङ्ग से आहवनीयाग्नि का स्तरण करे ॥ यह समुद्र कर्म समाप्त हुआ ॥१५॥१६॥५॥२२॥ यह बाईसवी कण्डिका पूरी हुई ॥२२॥ अब नूतन घर, गोशाला, अग्निशाला, या गाँव या पुर या अन्यत्र अभिमत स्थानों में कर्मों को करे ॥ चाहे घर पत्थर, काठ, फुस, या इंटों के बने हों सर्वत्र नये मकानों में गृह प्रवेश कर्म करे । घी, मधु मिला करे । अर्थात् “यजूंषि यज्ञ” इत्यादि से आज्य द्वारा अंग होम और प्रधान होम सर्पिष में मधु मिला कर करे ॥१॥ “दोषो गाय”० से दूसरी, दोनों मंत्रों को मिला कर तीसरी, और “अनुमति सर्वम्”-इस ७

्मर्णमौदु- Wait, is there an anusvara before ष्म? No. So वाष्मर्णमौदु-.

Wait! Let's check L3: म्बरं मन्थप्रतिरूपमभिजुहोति ॥७॥ असङ्ख्याता अधि- Let's check: "म्बरं मन्थप्रतिरूपमभिजुहोति ॥७॥ असङ्ख्याता अधि-"

  • 'म्बरं' : म् + ब + र + ं = म्बरं.
  • 'मन्थप्रतिरूपमभिजुहोति' : म, न्था? No, म, न् + थ = मन्थ. प्रतिरूपमभिजुहोति.
  • '॥७॥'
  • 'असङ्ख्याता' : अ, स, ङ् + ख्य + ा = ङ्ख्या, त, ा = असङ्ख्याता.
  • 'अधि-' : अ, ध, ि, hyphen.

L4: श्रुत्य सप्तागमशष्कुलीः ॥८॥ त्वष्टा म इति प्रातर्विभु-

  • 'श्रुत्य' : श्र, ु, त, ्य = श्रुत्य. Wait, is it श्रुत्य or श्रित्य? Look at the letter: It has श, with a subscript: is it ऋ or ु? In Kausika Sutra: "असङ्ख्याता अधिश्रित्य" (adhikṣ

अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ५१ लोहितं निर्मृज्य रसमिश्रमश्नाति ॥१५॥ सर्वमौदुम्बरम् ॥१६॥ यस्येदमा रज इत्यायोजनानामप्ययः ॥१७॥६॥२३॥ उच्छ्रयस्वेति बीजोपहरणम् ॥१॥ आज्यमिश्रान्य- वानुर्वरायां कृष्टे फालेनोडुह्यान्वृचं काशीन्निनयति निव- ति ॥२॥ अभि त्यमिति महावकाशेऽरण्य उन्नते विमिते प्राग्द्वारप्रत्यग्द्वारेष्वप्सु सम्पातानानयति ॥३॥ कृष्णा- जिने सोमांशून् विचिनोति ॥४॥ सोममिश्रेण सम्पात- वन्तमश्नाति ॥५॥ आदीप्ते सम्पन्नम् ॥६॥ तां सवित- रिति गृष्टिदाम बध्नाति ॥७॥ सं मा सिञ्चन्त्विति सर्वो- दके मैश्रधान्यम् ॥८॥ दिव्यं सुपर्णमित्यृषभदण्डिनो इक्षु काश के कण्डी से रुधिर का मार्जन कर उसमें रस मिला कर पान करावे ॥१४॥१५॥ इन कर्मों को गूलर के काठ से करे ॥१६॥ “यस्येदमा रज०” इत्यादि से यज्ञ सम्बन्धि सामग्रियों के आयोजन में करे ॥१७॥ ६॥२३॥ यह तेईसवी कण्डिका समाप्त हुई ॥ “उच्छ्रयस्व०” इत्यादि से बीज को अभिमन्त्रण करके बीज को बोने के लिये खेत में ले जावे ॥१॥ और उसमें से तीन मुठ्ठी लेकर खेत में धर कर उसे मट्टी से ढक देवे । और तब तय्यार खेत में प्रति ऋचा से बीज बोवे ॥२॥ उच्च स्थान में जाकर अभ्यातानान्त करके “अभित्यं०” इत्यादि ४ ऋचा वाले सूक्त से जलपात्र धर करके उस जलपात्र में सोम रस मिला कर सारूपवत्स गौ के दूध में ओदन पकाकर अभिमंत्रण करके भोजन करे । तब उत्तर तंत्र करे । यह कर्म मण्डप के पूर्व तथा पश्चिम द्वार पर करे । मण्डप के पश्चिम अग्नि से जलावे ॥३॥४॥५॥६॥ काले मृग के चर्म पर सोमांशू को बखेर देवे और सोम रस मिले को खावे ॥५॥ यदि वह सोमरस मिला-सम्पात वाला-काल पाकर स्वयं जल उठे तो जानो कि मनोरथ सफल हुआ ॥६॥ “तां सवित०” इत्यादि से गो दामन बान्धे ॥७॥ “संमासिञ्चन्तु०” से सर्वोदक में मैश्र धान्य को स्थालीपाक पका कर खावे ॥८॥ “दिव्यं सुपर्णं” इत्यादि से

५२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । वपयेन्द्रं यजते ॥६॥ अनुबद्धशिरःपादेन गोशालां चर्म- णावच्छाद्यावदानकृतं ब्राह्मणान् भोजयति ॥१०॥ प्रोष्य समिध आदायोर्जं बिभ्रदिति गृहसङ्काशे जपति ॥११॥ सव्येन समिधो दक्षिणेन शालावलीकं संस्तभ्य जपति ॥१२॥ अतिव्रज्य समिध आधाय सुमङ्गलि प्रजावति सुसीमेऽहं वां गृहपतिर्जीव्यासमिति स्थूणे गृह्णात्यु- पतिष्ठते ॥१३॥ यद्वदामीति मन्त्रोक्तम् ॥१४॥ गृहप- त्न्यासाद् उपविश्योदपात्रं निनयति ॥१५॥ इहैव स्तेति प्रवत्स्यन्नवेक्षते ॥१६॥ सूयवसादिति सूयवसे पशून्निष्ठा- पयति ॥१७॥ दूर्वाग्रैरञ्जलावप आनीय दर्शं दाशर्भि- गौओं में जो सबसे बली हो उसकी वपा से 'वृषभेन्द्र की'पूजा करे वशा विधान की रीति से ॥९॥ शिर पैर को बान्धकर गोशाला में धर कर चमड़े से ढक देवे ॥ और टुकड़े २ करके ब्राह्मणों को भोजन करावे ॥१०॥ भूमि को प्रोक्षण कर समिध लाकर "ऊर्जं बिभ्रत्०"इत्यादि मंत्र का जप करे । अर्थात् जहाँ २ देशान्तर में जाकर जंगल से समिधाओं को लाकर जहाँ २ घर में मिले वहाँ २ उक्त मंत्र का जप करे और समिदाधान करे और मकान के छप्पर को छूकर"ऊर्जं बिभ्रत्०"इत्यादि मन्त्र का जप करे ॥११॥ बाँये हाथ से समिधा को एवं दहिने से मकान के छप्पर को स्पर्श कर मंत्र का जप करे ॥१२॥ बहुत दूर जाकर समिदाधान कर "सुमङ्गलि०" इत्यादि से घर के स्थूणा को पकड़ कर उपस्थान करे ॥ "यद्वदामि०" से घरवालों से प्रियवचन बोले ॥१४॥ और घर के स्वामिनी के रंधन गृह में बैठ कर जलपात्र को लावे ॥१५॥ उपवास किया हुआ "इहैव स्त०" से घर और मनुष्यों को देखे ॥१६॥ "सूयव- सात्" से सूयवस पशुओं को स्थिर करे ॥१४॥ यजमान के गृहप्रवेश कर्म को कहते हैं ॥ यजमान मौन होकर समिदाधान करके घर को देख कर "ऊर्जं बिभ्रत्"८ छः ऋचावाले सूक्त का जप करे । वाम हाथ से समिधाओं को लेकर दहिने से शाला के छप्पर को स्पर्श कर"ऊर्जंबिभ्रत्०" सूक्त का अप करे । तब अग्नि में समिध डाले । और "सुमङ्गलि०"