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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

प्र० ६६ : अ० १३ ] दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम ३१३

(१) प्रक्षेपानुरूपश्चास्य निष्क्रयः । (२) दण्डप्रणीतः कर्मणा दण्डमुपनयेत् । (३) आर्यप्राणो ध्वजाहृतः कर्मकालानुरूपेण मूल्यार्धेन वा विमुच्येत । (४) गृहजातदायागतलब्धक्रीतानामन्यतमं दासमूनाष्टवर्षं विबन्धु-मकामं नीचे कर्मणि विदेशे दासीं वा सगर्भामप्रतिविहितगर्भभर्मण्यां विक्र-याधानं नयतः पूर्वः साहसदण्डः, क्रेतृश्रोतॄणां च । (५) दासमनुरूपेण निष्क्रयेणार्यमकुर्वतो द्वादशपणो दण्डः । संरोध-श्चाकारणात् । दासद्रव्यस्य ज्ञातयो दायादाः । तेषाम् अभावे स्वामी । (६) स्वामिनः स्वस्यां दास्यां जातं समातृकमदासं विद्यात् । गृह्या चेत् कुटुम्बार्थचिन्तनी, माता भ्राता भगिनी चास्या अदासाः स्युः ।


को चुकता कर वह आर्यश्रेणी में आ सकता है । इसी प्रकार उदरदास ( आजीवन दास ) और आहितक दास ( गिरवी रखा हुआ दास ) के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।

( १ ) गिरवी रखने के अनुसार ही उनके छुड़ाने का मूल्य भी होना चाहिए ।

( २ ) जिस व्यक्ति को दण्ड का धन भुगतान न करने के कारण दास बनना पड़ा हो, वह किसी तरह का कार्य कर उस धन का भुगतान करके स्वतन्त्र हो सकता है ।

( ३ ) आर्य जाति का कोई व्यक्ति यदि युद्ध में पराजित होने पर दास बनाया गया हो तो वह अपने कार्य के बल पर या समय के अनुसार या अपने पकड़े जाने का आधा मूल्य देकर छुटकारा पा सकता है ।

( ४ ) अपने ( स्वामी के ) घर में पैदा हुए, दाय-भाग के समय अपने हिस्से में आये या स्वयं खरीदे हुए, बन्धु-बान्धवों से रहित, आठ वर्ष से कम उम्र के दास को उसकी इच्छा के विरुद्ध, यदि कोई व्यक्ति नीच कार्य के लिए किसी विदेशी के हाथ बेचे या गिरवी रखे तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय; इसी प्रकार यदि कोई स्वामी गर्भिणी दासी को, उसके गर्भ की रक्षा का कोई प्रबन्ध न करके दूसरे के हाथ बेचे या गिरवी रखे तो उसको भी प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । इनके अति-रिक्त उनके खरीदने वालों और गवाहों को भी यही दण्ड दिया जाय ।

( ५ ) जो व्यक्ति उचित मूल्य पाने पर भी किसी को दासता से मुक्त नहीं करता, उस पर बाहर पण दण्ड किया जाय । यदि मुक्त न करने का कोई कारण न हो तो उसको कारवास का दण्ड दिया जाय । दास की सम्पत्ति के उत्तराधिकारी उसके बन्धु-बांधव एवं कुटुम्बी लोग होते हैं । उनके न होने पर दास का स्वामी ही उसकी सम्पत्ति का अधिकारी है ।

( ६ ) यदि स्वामी द्वारा अपनी दासी में सन्तान पैदा हो जाय तो वह सन्तान

३१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

३१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) दासं दासीं वा निष्क्रीय पुनर्वििक्रयाधानं नयतो द्वादशपणो दण्डः, अन्यत्र स्वयंवादिभ्यः । इति दासकल्पः । (२) कर्मकरस्य कर्मसम्बन्धमासन्ना विद्युः । यथासम्भाषितं वेतनं लभेत । कर्मकालानुरूपमसम्भाषितवेतनम् । कर्षकः सस्यानां, गोपालकः सर्पिषां, वैदेहकः पण्यानामात्मना व्यवहृतानां दशभागमसम्भाषितवेतनो लभेत । सम्भाषितवेतनस्तु यथासम्भाषितम् । (३) कारुशिल्पिकुशीलवचिकित्सकवाग्जीवनपरिचारकादिराशाकारिकवर्गस्तु यथान्यस्तद्विधः कुर्यात् । यथा वा कुशलाः कल्पयेयुः तथा वेतनं लभेत । साक्षिप्रत्ययमेव स्यात् । साक्षिणामभावे यतः कर्म ततोऽनुयुञ्जीत । (४) वेतनादाने दशबन्धो दण्डः, षट्पणो वा । अपव्ययमाने द्वादशपणो दण्डः, पंचबन्धो वा ।


और उसकी माता, दोनों को दासता से मुक्त कर दिया जाय । यदि वह स्त्री सद्गृहिणी बनकर स्वामी के घर में ही उसकी पत्नी बनकर रहना चाहे तो उसकी माँ, बहिन और भाइयों को दासता से मुक्त कर दिया जाय ।

( १ ) एक बार मुक्त हुए दास-दासी को यदि फिर कोई व्यक्ति बेचे या गिरवी रखे तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । किन्तु दास-दासी ही यदि स्वयं बिकने और गिरवी रखे जाने को कहें तो किसी को दोष न दिया जाय । यहां तक दास-दासियों के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।

( २ ) नौकर का वेतन : पास-पड़ोस के रहने वालों की जानकारी में ही नौकर की नियुक्ति की जाय । जिसका वेतन तय हो गया हो वह उसी पर कार्य करे; किन्तु जिसका वेतन पहिले तय न हुआ हो वह अपने कार्य और समय के अनुसार अपना वेतन ले । किसान का नौकर अनाज का, ग्वाले का नौकर घी का और बनिये का नौकर अपने द्वारा व्यवहार की हुई वस्तुओं का दसवां हिस्सा ले; बशर्ते कि उसका वेतन तय न हुआ हो । यदि वेतन पहिले से तय है तो उसी पर नौकरी करे ।

( ३ ) कारीगर, नट, नर्तक, चिकित्सक, वकील ( वाग्जीवन ) और नौकर-चाकर आदि मेहनताने की आशा से कार्य करने वाले ( आशाकारिक ) व्यक्तियों को वैसा ही वेतन दिया जाय, जैसा अन्यत्र दिया जाता हो, अथवा जो भी वेतन कुशल पुरुष नियत कर दे तदनुसार दिया जाय । इस विषय पर विवाद होने पर साक्षियों के अनुसार ही निर्णय दिया जाय । यदि साक्षी न हों तो जैसा कार्य किया हो, उसी के अनुसार फैसला किया जाय ।

( ४ ) उनका वेतन न देने पर वेतन का दसवां हिस्सा या छह पण दण्ड किया जाय । अपव्यय करने पर उसका पांचवां हिस्सा या बारह पण दण्ड किया जाय ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में स्वाम्यधिकार नामक

प्र० ६९ : अ० १३ ] दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम ३१५

(१) नदीवेगज्वालास्तेनव्यालोपरुद्धः सर्वस्वपुत्रदारात्मदानेनार्त-स्त्रातारमाहूय निस्तीर्णः कुशलप्रदिष्टं वेतनं दद्यात् । तेन सर्वत्रार्तदानानुशया व्याख्याताः ।
(२) लभेत पुंश्चली भोगं सङ्गमस्योपलिङ्गनात् ।
अतियाच्ञा तु जीयेत दौर्मत्याविनयेन वा ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे स्वाम्यधिकारो नाम त्रयोदशोऽध्यायः,
आदित एकोनसप्ततितमः ।

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( १ ) नदी के प्रवाह में बहता हुआ या अग्नि, चोर, सांप और हिंसक पशुओं से घिरा हुआ कोई व्यक्ति यदि जान बचाने की गरज से किसी को अपना सर्वस्व, स्त्री, पुत्र धन आदि, देने का वायदा कर आपत्ति से बच जाय तो उस पर तत्कालीन चतुर व्यक्ति जो भी निर्णय दे दें उसी के अनुसार रक्षक को दिया जाय । इसी प्रकार आपद्युक्त लोगों के दूसरे प्रणों के सम्बन्ध में भी जान लेना चाहिए ।

( २ ) वेश्या को चाहिए कि वह संभोग शुल्क को पहिले ही ले ले । यदि वह बुरी नियत से या डरा-धमका कर अनुचित तरीके से अधिक धन लेना चाहे तो उसे वह कदापि न दिया जाय ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में स्वाम्यधिकार नामक
तेरहवाँ अध्याय समाप्त

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प्रकरण ७० अध्याय १४

कर्मकरकल्पः, सम्भूयसमुत्थानम्


(१) गृहीत्वा वेतनं कर्म अकुर्वतो भृतकस्य द्वादशपणो दण्डः । संरोधश्चाकारणात् । (२) अशक्तः कुत्सिते कर्मणि व्याधौ व्यसने वा अनुशयं लभेत, परेण वा कारयितुम् । तस्य व्ययकर्मणा लभेत, भर्ता वा कारयितुम् । (३) नान्यस्त्वया कारयितव्यो मया वा नान्यस्य कर्तव्यमित्यवरोधे भर्तुरकारयतो भृतकस्याकुर्वतो वा द्वादशपणो दण्डः । कर्मनिष्ठापने भर्तुरन्यत्र गृहीतवेतनो नासकामः कुर्यात् । (४) उपस्थितमकारयतः कृतमेव विद्यादित्याचार्याः । (५) नेति कौटिल्यः । कृतस्य वेतनं, नाकृतस्यास्ति । स चेदल्पमपि कारयित्वा न कारयेत्, कृतमेवास्य विद्यात् । देशकालातिपातनेन कर्मणा-


मजदूरी के नियम और साझेदारी का हिस्सा

(१) वेतन लेकर जो नौकर कार्य न करे उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि अकारण ही वह कार्य न करे तो उसे कारावास में बन्द कर दिया जाय ।

(२) किसी अशक्त, कुत्सित कार्य के आ जाने पर, बीमारी में या किसी आपत्ति में फँस जाने के कारण नौकर आकस्मिक छुट्टी (अनुशय) ले सकता है; अथवा अपनी एवज में किसी दूसरे व्यक्ति को रखकर छुट्टी ले सकता है। स्थानापन्न नौकर की मजदूरी उसके कार्य से ही पूरी की जाय अथवा मालिक ही किसी दूसरे से कार्य ले ।

(३) 'न तो आप किसी से कार्य करवायेंगे और न मैं ही किसी का कार्य करूँगा' इस प्रकार के आपसी समझौते को यदि मालिक भंग करे तो बारह पण दण्ड और यदि नौकर भंग करे तो भी बारह पण दण्ड दिया जाय । यदि किसी मजदूर ने दूसरी जगहों से अग्रिम वेतन ले लिया हो, तो पहिले मालिक का कार्य पूरा करने पर ही, वह दूसरी जगह जा सकता है ।

(४) कुछ आचार्यों का अभिमत है कि हाजिर हुआ मजदूर यदि कुछ कार्य न भी करे तो हाजिरी मात्र से ही उसका कार्य समझ लिया जाय ।

(५) परन्तु आचार्य कौटिल्य ऐसा नहीं मानते हैं। उनका कथन है कि वेतन कार्य करने का दिया जाता है, खाली बैठने का नहीं। यदि मालिक थोड़ा ही काम

प्र० ७० : अ० १४ ] मजदूरी के नियम ३१७

मन्यथाकरणे वा नासकामः कृतमनुमन्येत । सम्भाषितादधिकक्रियायां प्रयासं न मोघं कुर्यात् । (१) तेन संघभृता व्याख्याताः । तेषामाधिः सप्तरात्रमासीत । ततोऽन्यमुपस्थापयेत्; कर्मनिष्पाकं च । न चानिवेद्य भर्तुः संघः कंचित्परिहरेदुपनयेद्वा । तस्यातिक्रमे चतुर्विंशतिपणो दण्डः । संघेन परिहृतस्यार्धदण्डः । इति भृतकाधिकारः । (२) सघंभृताः सम्भूयसमुत्थातारो वा यथासम्भाषितं वेतनं समं वा विभजेरन् । (३) कर्षकवैदेहका वा सस्यपण्यारम्भपर्यवसानान्तरे सन्नस्य यथाकृतस्य कर्मणः प्रत्यंशं दद्युः । पुरुषोपस्थाने समग्रमंशं दद्युः । संसिद्धे तूद्धृतपण्ये सन्नस्य तदानीमेव प्रत्यंशं दद्युः । सामान्या हि पथि सिद्धिश्चासिद्धिश्च ।


कराके फिर न कराये तो नौकर का पूरा काम किया हुआ समझा जाय । मालिक के आज्ञानुसार ठीक स्थान और समय पर काम न करने से या कार्यों को उलटा कर देने से नौकर काम किया हुआ न समझा जाय । मालिक जितना काम बताये नौकर यदि उससे अधिक कार्य कर डाले तो वह अतिरिक्त मेहनत व्यर्थ समझनी चाहिए ।

( १ ) मिल, कारखाना और कम्पनियों में काम करने वाले मजदूरों के लिए भी यही नियम समझना चाहिए । ठीक तरह से कार्य न करने वाले मजदूरों की सात दिन की मजदूरी दबाये रखनी चाहिए, इतने पर भी यदि वे ठीक तरह से कार्य न करें तो वह कार्य दूसरे को दे देना चाहिए, और उस कार्य को ठीक कराकर दूसरे को उचित मजदूरी दे देनी चाहिए । मजदूरों को चाहिए कि मालिक को बिना सूचित किये वे न तो किसी वस्तु को नष्ट करें और न ले जाँय । इस नियम का उल्लंघन करने पर चौबीस पण दण्ड दिया जाय यदि सभी मजदूर मिलकर ऐसा करें तो उनको आधा दण्ड दिया जाय । यहाँ तक मजदूरों ( भृतकों ) के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।

( २ ) संघ से एक मुष्ट मजदूरी पाने वाले या मिलकर ठेके आदि पर काम करने वाले मजदूर पहले से तय की हुई मजदूरी आपस में बराबर-बराबर बांट लें ।

( ३ ) किसान को चाहिए कि वह फसल के आरम्भ से अन्त तक और खरीद-फरोख्त करने वाले व्यापारी को चाहिए कि माल खरीदने से लेकर बेचने तक वे अपने साझीदार को उसके कार्य के अनुसार हिस्सा दें । यदि कोई साझीदार अपनी एवज में किसी दूसरे व्यक्ति को नियत कर दे तब भी उसका पूरा हिस्सा दिया जाय, माल बिक जाने पर दुकान उठने से पहिले ही साझीदार को उसका हिस्सा भी दिया जाय; क्योंकि आगे कार्य करने सफलता और असफलता समान है ।

३१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) प्रक्रान्ते तु कर्मणि स्वस्थस्यापक्रामतो द्वादशपणो दण्डः । न च प्राकाम्यमपक्रमणे । (२) चोरं त्वभयपूर्वं कर्मणः प्रत्यंशेन ग्राहयेद्, दद्यात्प्रत्यंशमभयं च । न पुनस्तेये प्रवासनमन्यत्र गमने च । महापराधे तु दूष्यवदाचरेत् । (३) याजकाः स्वप्रचारद्रव्यवजं यथासम्भाषितं वेतनं समं विभजेरन् । (४) अग्निष्टोमादिषु च ऋतुषु दीक्षणादूर्ध्वं याजकः सन्नः पंचममंशं लभेत । सोमविक्रयादूर्ध्वं चतुर्थमंशम् । मध्यमोपसदः प्रवर्त्योद्वासनादूर्ध्वं तृतीयमंशम् । माध्यादूर्ध्वमर्धमंशम् । सुत्ये प्रातस्सवनादूर्ध्वं पादोनमंशम् । माध्यन्दिनात् सवनादूर्ध्वं समग्रमंशं लभेत । नीता हि दक्षिणा भवन्ति । बृहस्पतिसवनवर्जं प्रतिसवनं हि दक्षिणा दीयन्ते । तेनाहर्गणदक्षिणा व्याख्याताः ।


( १ ) कार्य चालू रहते हुए यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति कार्य को छोड़कर चला जाय तो उसे बारह पण दण्ड दिया जाय; क्योंकि इस प्रकार काम छोड़कर चले जाना किसी की इच्छा पर निर्भर नहीं होता ।

( २ ) यदि कोई साझीदार चोरी कर ले तो उसको क्षमाकर उससे सच-सच बात बतला देने एवं उसका पूरा हिस्सा देने के लिए कहा जाय; और यदि वह सच-सच बतला दे तो उसको पूरा हिस्सा देकर माफ किया जाय । यदि वह फिर भी चोरी करे और यदि दूसरे देश में जाकर के चोरी करे तो उसे साझीदारी से अलग कर देना चाहिए, यदि वह कोई बड़ा अपराध करे तो उसके साथ राजकीय अपराधी जैसा व्यवहार किया जाय ।

( ३ ) याज्ञिकों का बँटवारा : यज्ञ करने वाले निजी उपयोग में आने वाली वस्तुओं को छोड़कर बाकी सारे वेतन को पूर्व निश्चय के अनुसार या बराबर-बराबर बाँट लें ।

( ४ ) अग्निष्टोम आदि यज्ञों में दीक्षा के बाद ही यदि अकस्मात् याजक बीमार पड़ जाय तो उसे पूर्व निश्चित सामग्री वेतन आदि का पाँचवाँ हिस्सा दिया जाय । यदि याजक सोम-विक्रय के बाद बीमार पड़े तो चौथा हिस्सा; मध्यमोपषद सम्बन्धी प्रवर्त्योद्वासन ( सोम तैयार करने सम्बन्धी क्रिया ) के बाद बीमार पड़े तो दूसरा हिस्सा; मध्यमोपषद के बाद बीमार पड़े तो आधा हिस्सा; सोम के अभिषव काल में प्रातःसवन के बाद बीमार पड़े तो तीन हिस्से; और माध्यन्दिन सवन के बाद बीमार पड़े तो सम्पूर्ण दक्षिणा ले ले, क्योंकि यज्ञ की समाप्ति पर दक्षिणा पूरी हो जाती है । बृहस्पति सवन को छोड़कर शेष सभी सवनों में दक्षिणा दी जाती है । इसी प्रकार अहर्गण आदि में दी जाने वाली दक्षिणाओं के सम्बन्ध में भी समझना चाहिये ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में कर्मकरविधि नामक चौदहवां अध्याय समाप्त ।

प्र० ७२ : अ० १४ ] मजदूरी के नियम ३१९

(१) सन्नानामा दशाहोरात्राच्छेदभृताः कर्म कुर्युः । अन्ये वा स्वप्रत्ययाः । (२) कर्मण्यसमाप्ते तु यजमानः सीदेत्, ऋत्विजः कर्म समापय्य दक्षिणां हरेयुः । (३) असमाप्ते तु कर्मणि याज्यं याजकं वा त्यजतः पूर्वः साहसदण्डः । (४) अनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः । सुरापो वृषलीभर्ता ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥ असत्प्रतिग्रहे युक्तः स्तेनः कुत्सितयाजकः । अदोषस्त्यक्तुमन्योन्यं कर्मसंकरनिश्चयात् ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे कर्मकरविधिः सम्भूयसमुत्थानं नाम चतुर्दशोऽध्यायः, आदितः सप्ततितमः ।

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( १ ) बीमार हुए याजकों की जगह दक्षिणा लेकर कार्य करने वाले याजक दस दिन तक इस कार्य को पूरा करें अथवा दूसरे याजक अपनी स्वतंत्र दक्षिणा लेकर उस अधूरे कार्य को पूरा करें ।

( २ ) यज्ञ कार्य समाप्त होने से पहिले ही यदि यजमान बीमार पड़ जाय तो ऋत्विजों को चाहिए कि वे यज्ञ पूरा होने के बाद ही दक्षिणा लें ।

( ३ ) यज्ञ की समाप्ति के पूर्व ही यजमान यदि याजक को छोड़ दे अथवा याजक ही यजमान को छोड़ दें तो छोड़ने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) सौ गायों को रखते हुए भी अग्न्याधान न करने वाला, हजार गायों को रखते हुए भी यजन न करने वाला, शराबी, शूद्रा को घर में रखने वाला, ब्राह्मण को मारने वाला, गुरुपत्नी के साथ व्यभिचार करने वाला, कुत्सित दान लेने वाला, चोरों तथा कुकर्मियों के यहाँ यज्ञ करने वाला; याजक अथवा यजमान, यज्ञकर्म की पवित्रता बनाये रखने के लिए, यज्ञ समाप्ति के पूर्व ही, एक दूसरे को छोड़ सकता है ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में कर्मकरविधि नामक चौदहवां अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ७१ | विक्रीतक्रीतानुशयः अध्याय १५


(१) विक्रीय पण्यमप्रयच्छतो द्वादशपणो दण्डः, अन्यत्र दोषोपनिपाताविषह्येभ्यः। (२) पण्यदोषो दोषः। राजचोराग्न्युदकबाध उपनिपातः। बहुगुणहीनमार्तकृतं वाऽविषह्यम्। (३) वैदेहकानामेकरात्रमनुशयः। कर्षकाणां त्रिरात्रम्। गोरक्षकाणां पञ्चरात्रम्। व्यामिश्राणामुत्तमानां च वर्णानां वृत्तिविक्रये सप्तरात्रम्। (४) आतिपातिकानां पण्यानामन्यत्राविक्रेयमित्यविरोधेनानुशयो देयः। तस्यातिक्रमे चतुर्विंशतिपणो दण्डः, पण्यदशभागो वा। (५) क्रीत्वा पण्यमप्रतिगृह्णतो द्वादशपणो दण्डः, अन्यत्र दोषोपनिपाताविषह्येभ्यः। समानश्चानुशयो विक्रेतुरनुशयेन।


क्रय विक्रय का बयाना

( १ ) सौदा बेचने के बाद जो सौदागर देने से मुकर जाय उस पर बारह पण दण्ड किया जाय; सौदागर यदि किसी दोष, उपनिपात अथवा अविषह्य के कारण बेची हुई वस्तु को नहीं देता तो वह निर्दोष है।

( २ ) बेची हुई वस्तु में किसी प्रकार की खराबी आ जाना दोष कहलाता है। बेची हुई वस्तु में राजा, चोर, अग्नि तथा जल आदि के द्वारा हुई बाधा उपनिपात है। बेची हुई वस्तु का अत्यधिक गुणहीन या दुःखदाई होना अविषह्य कहलाता है।

( ३ ) क्रय-विक्रय करने वाले व्यापारियों द्वारा खरीदे गये माल का बयाना एक दिन तक लौटाया जा सकता है। इसी प्रकार किसानों का विक्रय तीन दिन तक; ग्वालों का विक्रय पाँच दिन तक और सङ्कर जाति तथा उत्तम वर्णों के जीवन-निर्वाह के आधारभूत भूमि आदि का विक्रय सात दिन तक वापिस किया जा सकता है।

( ४ ) अल्पायु ( आतिपातिक ) वस्तुओं का बयाना ( अनुशय ) इस शर्त पर दिया जाय कि वह उसको किसी दूसरे के हाथ न बेचेगा। इस नियम का उल्लङ्घन करने वाले को चौबीस पण या बिकी हुई वस्तु का दसवाँ हिस्सा दण्ड किया जाय।

( ५ ) किसी वस्तु को खरीद कर उसको लेने से यदि खरीददार मुकर जाय तो

प्र० ७१ : अ० १५ ] क्रय विक्रय का बयाना ३२१

(१) विवाहानां तु त्रयाणां पूर्वेषां वर्णानां पाणिग्रहणासिद्धमुपावर्तनम् । शूद्राणां च प्रकर्मणः । वृत्तपाणिग्रहणयोरपि दोषमौपशायिकं दृष्ट्वा सिद्धमुपावर्तनम् । न त्वेवाभिप्रजातयोः ।

(२) कन्यादोषमौपशायिकमनाख्याय प्रयच्छतः षण्णवतिर्दण्डः । शुल्कस्त्रीधनप्रतिदानं च ।

(३) वरयितुर्वा वरदोषमनाख्याय विन्दतो द्विगुणः । शुल्कस्त्रीधननाशश्च ।

(४) द्विपदचतुष्पदानां तु कुष्ठव्याधिताशुचीनामुत्साहस्वास्थ्यशुचीनामाख्याने द्वादशपणो दण्डः ।

(५) आ त्रिपक्षादिति चतुष्पदानामुपावर्तनम् । आ संवत्सरादिति मनुष्याणाम् । तावता हि कालेन शक्यं शौचाशौचे ज्ञातुमिति ।


उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि दोष, उपनिपात और अविषह्य आदि कारणों से ऐसा किया गया हो तो खरीदार निर्दोष है । खरीदने वाले के लिए भी बयाना देने का वही नियम है, जो बेचने वाले के लिए बताया गया है ।

( १ ) विवाह सम्बन्धी शर्तें : ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, इन तीनों जातियों में विवाह के बाद स्त्री पुरुष के किसी प्रकार का उलट-फेर नहीं हो सकता है । शूद्रों में प्रथम संयोग हो जाने पर स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को छोड़ सकते हैं । ब्राह्मण आदि तीन वर्णों में विवाह के बाद सुहागरात के समय यदि पति-पत्नि को एक-दूसरे में कोई योनिलिङ्ग दोष जान पड़े तो सम्बन्ध-विच्छेद हो सकता है । सन्तान हो जाने पर किसी भी तरह सम्बन्ध-विच्छेद सम्भव नहीं है ।

( २ ) कन्या के किसी गुप्त दोष को छिपाकर उसका विवाह करने वाले व्यक्ति पर छियानबे पण दण्ड किया जाय और उसे जो शुल्क तथा स्त्री धन दिया है वह वापिस लिया जाय ।

( ३ ) इसी प्रकार जो वर के दोषों को छिपा कर विवाह करता है, उस पर दुगुना अर्थात् १९२ पण दण्ड किया जाय और उसको दिया हुआ शुल्क तथा स्त्री धन भी जब्त कर लिया जाय ।

( ४ ) पशुओं की विक्री : कोढी, बीमार तथा व्यधिग्रस्त मनुष्यों और पशुओं को स्वस्थ-सुंदर बताने वाले व्यक्ति पर बारह पण जुर्माना किया जाय ।

( ५ ) चौपाये पशु डेढ मास तक और मनुष्य साल भर तक लौटाये जा सकते हैं क्योंकि इस अवधि में इनकी अच्छाई-बुराई का भली भांति अन्दाजा लगाया जा सकता है ।

२१ कौ०

३२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) दाता प्रतिग्रहीता च स्यातां नोपहतौ यथा। दाने क्रये वानुशयं तथा कुर्युः सभासदः॥

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे विक्रीतक्रीतानुशयो नाम पंचदशोऽध्यायः; आदित एकसप्ततितमः।

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( १ ) धर्मस्थ ( सभासद ) लोगों को चाहिए कि वे लेन-देन और क्रय विक्रय के अनुशय में ऐसी व्यवस्था करें कि किसी को कोई नुकसान न उठाना पड़े ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में क्रीतविक्रीतानुशय नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ७२-७३दत्तस्यानपाकर्म, अस्वामिविक्रयः,
अध्याय १६स्वस्वामिसम्बन्धश्च

(१) दत्तस्याप्रदानमृणादानेन व्याख्यातम् । (२) दत्तमव्यवहार्यमेकत्रानुशये वर्तेत । सर्वस्वं पुत्रदारमात्मानं प्रदा- यानुशयिनः प्रयच्छेत् । धर्मदानमसाधुषु, कर्मसु चौपघातिकेषु वा । अर्थ- दानमनुपकारिषु अपकारिषु वा । कामदानमनर्हेषु च । यथा च दाता प्रतिग्रहीता च नोपहतौ स्यातां तथानुशयं कुशलाः कल्पयेयुः । (३) दण्डभयादाक्रोशभयादनर्थभयाद्वा भयदानं प्रतिगृह्णतः स्तेयदण्डः । प्रयच्छतश्च । रोषदानं परहिंसायाम् । राज्ञामुपरि दर्पदानं च । तत्रोत्तमो दण्डः ।


दान किये हुए धन को न देना, अस्वामि-विक्रय, स्व-स्वामि संबंध

(१) दान किये हुए धन को न देना, कर्जा न देने के समान ही समझना चाहिए ।

(२) दान किया हुआ धन यदि उपयोग में लाने के योग्य न हो तो उसे अमा- नत (अनुशय) के तौर पर सुरक्षित रखा जाय । दाता को चाहिए कि वह अपनी सारी संपत्ति, स्त्री, पुत्र, कलत्र आदि, यहाँ तक कि अपने आप को भी गिरवी रख- कर दान पाने वाले (अनुशयी) का धन चुकता करे । धर्मबुद्धि से अनजाने में असा- धुओं को दान में दिया हुआ धन; या सद्बुद्धि से अच्छे कार्य के लिए बुरे व्यक्तियों को दान में दिया हुआ धन; अनुपकारी तथा अपकारी को दान में दिया हुआ धन; और काम-तृप्ति के लिए वेश्या आदि को दिया हुआ धन अमानत (अनुशय) के तौर पर सुरक्षित रखा जाय । कुशल धर्मस्थ व्यक्तियों को चाहिए कि वे अनुशय का इस प्रकार निर्णय करें, जिससे दाता और प्रतिगृहीता, दोनों को किसी प्रकार की हानि न हो ।

(३) जो भी व्यक्ति दण्ड, निंदा और रोग आदि के भय से दान दें तथा दान लें, उन सब को चोरी का दण्ड दिया जाय । दूसरे को मारने की नीयत से दान देने और दान लेने वाले व्यक्तियों को भी यही दण्ड दिया जाय । यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य में अभिमानवश राजा से अधिक दान दे तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।

३२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) प्रातिभाव्यं दण्डशुल्कशेषमाक्षिकं सौरिकं कामदानं च नाकामः पुत्रो दायादो वा रिक्थहरो दद्यात् । इति दत्तस्यानपाकर्म । (२) अस्वामिविक्रयस्तु । नष्टापहृतमासाद्य स्वामी धर्मस्थेन ग्राहयेत्, देशकालातिपत्तौ वा स्वयं गृहीत्वोपहरेत् । धर्मस्थश्च स्वामिनमनुयुञ्जीत– कुतस्ते लब्धमिति । स चेदाचारक्रमं दर्शयेत, न विक्रेतारं, तस्य द्रव्यस्यातिसर्गेण मुच्येत । विक्रेता चेद्दृश्येत, मूल्यं स्तेयदण्डं च । स चेदपसारमधिगच्छेदपसरेदापसारक्षयादिति । क्षये मूल्यं स्तेयदण्डं च दद्यात् । (३) नाष्टिकं च स्वकरणं कृत्वा नष्टप्रत्याहृतं लभेत । स्वकरणाभावे पञ्चबन्धो दण्डः । तच्च द्रव्यं राजधर्म्यं स्यात् । (४) नष्टापहृतमनिवेद्योत्कर्षतः स्वामिनः पूर्वः साहसदण्डः ।


(१) व्यर्थ का ऋण, दण्डशेष (जुरमाना), शुल्कशेष (दहेज का धन), जुए में हारा धन, शराबखोरी में लिया हुआ ऋण और वेश्या को दिया जाने वाला धन आदि को; मृत पुरुष का कोई भी वारिस यदि न देना चाहे तो कानूनन उसको बाध्य नहीं किया जा सकता है। यहाँ तक प्रतिज्ञात वस्तु को न दिए जाने के संबंध में कहा गया।

(२) अस्वामि-विक्रय : किसी वस्तु का स्वामी न होते हुए भी जो व्यक्ति उस वस्तु को बेच दे उसका दण्ड-विधान इस प्रकार है : अपनी खोई हुई या चोरी गई वस्तु को उसका मालिक जिस व्यक्ति के पास देखे उसको धर्मस्थ के द्वारा गिरफ्तार करा दे। यदि देश या काल उसमें बाधक हो तो स्वयं ही पकड़ कर उस व्यक्ति को धर्मस्थ के हवाले कर दे। धर्मस्थ उससे पूछे कि 'तुम्हें यह कहाँ मिली?' यदि वह प्राप्त वस्तु के संबन्ध में पूरा विवरण बताकर कहे कि उसको वह वस्तु कहीं पड़ी हुई मिली है और उस वस्तु को उसके असली मालिक को लौटा दे, तो उसे बरी कर दिया जाय। यदि वह उस वस्तु के बेचने वाले व्यक्ति का नाम बताये, तो उस विक्रेता से उस वस्तु का मूल्य खरीदने वाले को दिलाया जाय और वह वस्तु उसके असली मालिक को सौंप दी जाय और बेचने वाले को चोरी का दण्ड दिया जाय। यदि वह भी किसी दूसरे विक्रेता का नाम ले; वह भी किसी दूसरे को बताये, इस प्रकार जो भी उसका पहला विक्रेता सिद्ध हो वही उस वस्तु का मूल्य और चोरी का जुरमाना अदा करे।

(३) खोई हुई वस्तु को उसका मालिक प्रमाणरूप में लेख तथा साक्षी दिखा-कर ही प्राप्त कर सकता है। यदि वह पुरुष उस वस्तु को अपनी सिद्ध न कर सके तो उसके मूल्य का पाँचवाँ हिस्सा जुरमाना भरे और वह वस्तु धर्मानुसार राजा के अधिकार में दे दी जाय।

(४) अपनी खोई हुई वस्तु को किसी के पास देखकर बिना धर्मस्थ को सूचित

प्र० ७२-७३ : अ० १६ ] दान और विक्रय सम्बन्धी नियम ३२५

(१) शुल्कस्थाने नष्टापहृतोत्पन्नं तिष्ठेत् । त्रिपक्षादूर्ध्वमनभिसारं राजा हरेत्, स्वामी वा स्वकरणेन । (२) पञ्चपणिकं द्विपदरूपस्य निष्क्रयं दद्यात्; चतुष्पणिकमेकखुरस्य; द्विपणिकं गोमहिषस्य; पादिकं क्षुद्रपशूनाम् । रत्नसारफलगुकुप्यानां पञ्चकं शतं दद्यात् । (३) परचक्राटवीहृतं तु प्रत्यानीय राजा यथास्वं प्रयच्छेत् । चोरहृतमविद्यमानं स्वद्रव्येभ्यः प्रयच्छेत्, प्रत्यानेतुमशक्तो वा । स्वयंग्राहेणाहृतं प्रत्यानीय तन्निष्क्रयं वा प्रयच्छेत् । (४) परविषयाद्वा विक्रमेणानीतं यथाप्रविष्टं राज्ञा भुञ्जीतान्यत्रार्य-प्राणद्रव्येभ्यो देवब्राह्मणतपस्विद्रव्येभ्यश्च । इत्यस्वामिविक्रयः ।


किये ही, यदि उसका मालिक स्वयं ही छीनने लगे तो उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

( १ ) किसी का खोया हुआ या चोरी गया माल मिल जाय तो वह चुंगीघर में जमा कर दिया जाय । डेढ महीने तक यदि उसका मालिक उसको न ले तो उसको सरकारी माल में जमाकर दिया जाय; अथवा साक्षी आदि के द्वारा मालिक अपना स्वत्व सिद्ध करके उस माल को ले ले ।

( २ ) नष्ट या अपहृत दास-दासी को छुड़ाने के लिए प्रति व्यक्ति के हिसाब से पांच पण, छुड़ाने वाला, जमा करे । इसी प्रकार घोड़े, गधे आदि को छुड़ाने के लिए चार पण; गाय, भैंस आदि को छुड़ाने के लिए दो पण, छोटे-छोटे पशुओं को छुड़ाने के लिए ¼ पण; रत्न आदि बहुमूल्य, टिकाऊ वस्तुओं, रसहीन ( फल्गु ) वस्तुओं और तांबा आदि धातुओं को छुड़ाने के लिए पांच पण सरकारी टैक्स ( निष्क्रय ) छुड़ाने वाला जमा करे ।

( ३ ) दूसरे राजा के द्वारा या जंगलियों द्वारा अपहरण किये हुए दास, दासी या चौपाया आदि को राजा स्वयं लाकर उनके स्वामियों को दे । चोरों द्वारा चुराई गई वस्तु यदि नष्ट हो जाय या राजा भी उसको लौटा कर न ला सके तो, राजा को चाहिए कि अपने द्रव्यों में से उस वस्तु को उसके स्वामी की दे । चोरों को पकड़ने के लिए नियुक्त हुए राजपुरुषों द्वारा लायी गयी वस्तु उसके मालिक को दे दी जाय; यदि ऐसा संभव न हो तो उस खोई हुई वस्तु का मूल्य उसके स्वामी को दे दिया जाय ।

( ४ ) दूसरे देश से जीत कर लाए हुए धन का उपभोग, राजा की आज्ञा प्राप्त कर किया जाय; किन्तु वह धन यदि आर्यों, देवताओं, ब्राह्मणों और तपस्वियों का हो तो उसका उपभोग न कर, प्रत्युत उसको लौटा दिया जाय । यहाँ तक अस्वामि-विक्रय के संबन्ध में कहा गया ।

३२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) स्वस्वामिसम्बन्धस्तु भोगानुवृत्तिरुच्छिन्नदेशानां यथास्वं द्रव्याणाम् । (२) यत्स्वं द्रव्यमन्यैर्भुज्यमानं दशवर्षाण्युपेक्षेत, हीयेतास्य । अन्यत्र बालवृद्धव्याधितव्यसनिप्रोषितदेशत्यागराज्यविभ्रमेभ्यः । (३) विंशतिवर्षोपेक्षितमनुवसितं वास्तु नानुयुञ्जीत । (४) ज्ञातयः श्रोत्रियाः पाषण्डा वा राज्ञामसन्निधौ परवास्तुषु विवसन्तो न भोगेन हरेयुः; उपनिधिमाधिं निधिं निक्षेपं स्त्रियं सीमां राजश्रोत्रियद्रव्याणि च । (५) आश्रमिणः पाषण्डा वा महत्यवकाशे परस्परमबाधमाना वसेयुः । अल्पां बाधां सहेरन् । पूर्वागतो वा वासपर्यायं दद्यात् । अप्रदाता निरस्येत । (६) वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणामाचार्यशिष्यधर्मभ्रातृसमानतीर्थ्यारिक्थभाजः क्रमेण ।

(१) स्वस्वामि-सम्बन्ध : जिस संपत्ति को कोई व्यक्ति लगातार भोगता आ रहा हो । उसके संबंध में कोई साक्षी न मिलने पर भी, उस संपत्ति पर भोग करने वाले का ही अधिकार माना जाय ।

(२) जो व्यक्ति, दस वर्ष तक दूसरों के उपभोग में लायी गयी, अपनी संपत्ति की खोज खबर नहीं करता, उस संपत्ति पर उस व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं रह जाता है। किन्तु वह संपत्ति यदि ऐसे व्यक्तियों की हो, जो बाल, बूढे, बीमार, आपद्ग्रस्त, परदेश गये, देश त्यागी और राजकीय कार्य के लिए बाहर गये हों, तो दस वर्ष बाद भी अपनी संपत्ति पर उनका अधिकार बना रहता है ।

(३) यदि कोई किरायादार मालिक मकान की रजामंदी से बीस वर्ष तक उसके मकान पर रहे तो उस मकान पर किरायेदार का अधिकार हो जाता है ।

(४) बंधु-बांधव, श्रोत्रिय और पाखण्डी आदि व्यक्ति राजा से दूर दूसरों के मकानों में रहते हुए भी उनके मालिक नहीं सकते हैं । इसी प्रकार उपनिधि, आधि, निधि, निक्षेप, स्त्री, सीमा, राजा और श्रोत्रिय की वस्तुओं पर कोई भी व्यक्ति अधिकार नहीं कर सकता है ।

(५) आश्रमवासी और पाखंड (अवैदिक एवं व्रत-उपवास करने वाले) एक-दूसरे को किसी प्रकार की हानि न पहुँचाते हुए निवास करें । यदि एक-दूसरे को वे थोड़ी सी हानि पहुँचायें तो सहन कर लें । पहिले से रहने वाला व्यक्ति, बाद में आये व्यक्ति को स्थान दे दे; यदि स्थान न दे उसे बाहर कर दिया जाय ।

(६) वानप्रस्थी, संन्यासी और ब्रह्मचारियों की संपत्ति के उत्तराधिकारी क्रमशः उनके आचार्य, शिष्य और धर्म भाई या सहपाठी होते हैं ।

प्र० ७२-७३ : अ० १६ ] दान और विक्रय सम्बन्धी नियम ३२७

(१) विवादपदेषु चैषां यावन्तः पणा दण्डाः तावती रात्रीः क्षपणा-भिषेकाग्निकार्यमहाकृच्छ्रवर्धनानि राज्ञश्चरेयुः । अहिरण्‍यसुवर्णाः पाषण्डाः साधवः । ते यथास्वमुपवासव्रतै राराधयेयुः । अन्यत्र पारुष्यस्तेयसाहससंग्रहणेभ्यः । तेषु यथोक्ता दण्डाः कार्याः ।

(२) प्रव्रज्यासु वृथाचारान् राजा दण्डेन वारयेत् । धर्मो ह्यधर्मोपहतः शास्तारं हन्त्युपेक्षितः ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दत्तस्यानपाकर्म-अस्वामिविक्रय-स्वस्वामिसम्बन्धो नाम षोडशोऽध्यायः; आदितो द्विसप्ततितमः ।

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(१) इन लोगों में परस्पर झगड़ा हो जाने के कारण अपराधी को जितना पण दण्ड किया जाय, उतनी ही रात्रि वह राजा के कल्याण के लिए उपवास, स्नान, अग्निहोत्र और कठिन चांद्रायण व्रतों का अनुष्ठान करे । हिरण्य-सुवर्ण आदि रखने वाले धर्मशील पाखंडी भी दण्डित होने पर राजा की कल्याण-कामना के लिए यथोचित व्रत-आदि करें । यदि वे मार-पीट, चोरी, डाका और व्यभिचार करें तो उन्हें सहज ही में न छोड़ा जाय बल्कि अपराध के अनुसार उनको पूर्वोक्त सभी प्रकार के दण्ड दिये जायें ।

(२) संन्यासियों के बीच होने वाले मिथ्या आचार-विचारों को राजा दण्ड के द्वारा ही दूर करे क्योंकि अधर्म से दबाया और उपेक्षा किया हुआ धर्म शासन करने वाले राजा को नष्ट कर देता है ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दानविक्रय सम्बन्ध नामक सोलहवां अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ७४## साहसम्
अध्याय १७

(१) साहसमन्वयवत्प्रसभकर्म । निरन्वये स्तेयमपव्ययने च । (२) रत्नसारफल्गुकुप्यानां साहसे मूल्यसमो दण्डः, इति मानवाः । मूल्यद्विगुण इत्यौशनसाः । यथापराध इति कौटिल्यः । (३) पुष्पफलशाकमूलकन्दपक्वान्नचर्मवेणुमृद्भाण्डादीनां क्षुद्रकद्रव्याणां द्वादशपणावरश्चतुर्विंशतिपणपरो दण्डः । (४) कालायसकाष्ठरज्जुद्रव्यक्षुद्रपशुपटादीनां स्थूलकद्रव्याणां चतुर्विंशतिपणावरोऽष्टचत्वारिंशत्पणपरो दण्डः । ताम्रवृत्तकंसकाचदन्तभाण्डादीनां स्थूलकद्रव्याणामष्टचत्वारिंशत्पणावरः षण्णवतिपरः पूर्वः साहसदण्डः । महापशुमनुष्यक्षेत्रगृहहिरण्यसुवर्णसूक्ष्मवस्त्रादीनां स्थूलकद्रव्याणां द्विशतावरः पञ्चशतपरः मध्यमः साहसदण्डः ।


साहस

( १ ) खुले आम बलात्कार करना, डाके डालना तथा मारधाड़ करना साहस कहलाता है । छिपकर किसी वस्तु का अपहरण करना या किसी वस्तु को लेकर देने से मुकर जाना चोरी कहलाता है ।

( २ ) मनु के मतानुयायी विद्वानों का कथन है कि 'रत्न, बहुमूल्य टिकाऊ वस्तुओं, रसहीन वस्तुओं तथा ताँबा आदि धातुओं पर डाका डालने वाले व्यक्ति को, उनकी कीमत के बराबर दण्ड दिया जाय' । औशनस संप्रदाय के विद्वानों की राय है कि मूल्य के बराबर नहीं 'मूल्य से दुगुना दण्ड दिया जाय ।' किन्तु आचार्य कौटिल्य का अभिमत है कि उन्हें 'अपराध के अनुसार ही दंड दिया जाय ।'

( ३ ) फूल, फल, शाक, मूल, कंद, पका अन्न, चमड़ा, बाँस और मिट्टी के बर्तन आदि छोटी-छोटी वस्तुओं का अपहरण करने वाले पर बारह पण से लेकर चौबीस पण तक का दंड किया जाय ।

( ४ ) इसी प्रकार लोहा, लकड़ी, रस्सी, छोटे पशु और वस्त्र आदि वस्तुओं के अपहरण में चौबीस से अड़तालीस पण तक का दण्ड किया जाय । तांबा, पीतल, कांसा, कांच और हाथीदांत आदि की बनी हुई वस्तुओं पर डाका डालने वाले पर

प्र० ७४ : अ० १७ ] साहस ३२९

(१) स्त्रियं पुरुषं वाभिषह्य बध्नतो बन्धयतो बन्धं वा मोक्षयतः पंच- शतावरः सहस्रपर उत्तमः साहसदण्ड इत्याचार्याः।

(२) यः साहसं प्रतिपत्तेति कारयति स द्विगुणं दद्यात् । यावद्धिरण्य- मुपयोक्ष्यते तावद्दास्यामीति स चतुर्गुणं दण्डं दद्यात् । य एतावद्धिरण्यं दास्यामीति प्रमाणमुद्दिश्य कारयति स यथोक्तं हिरण्यं दण्डं च दद्याद् इति बार्हस्पत्याः ।

(३) स चेत्कोपं मदं मोहं वापदिशेद्यत्, यथोक्तवद्दण्डमेनं कुर्यात्, इति कौटिल्यः ।

(४) दण्डकर्मसु सर्वेषु रूपमष्टपणं शतम् । शतावरेषु व्याजीं च विद्यात्पञ्चपणं शतम् ॥


अड़तालीस से छियानवे पण तक का जुर्माना किया जाय; इसी को प्रथम साहस दण्ड कहते हैं। बड़े पशु, मनुष्य, खेत, मकान, हिरण्य, सोना और बड़ी कीमत के वस्त्र आदि द्रव्यों पर डाका डालने वाले को दो-सौ पण से पाँच सौ पण तक का दंड दिया जाय; इसी का नाम मध्यम साहस दण्ड है।

(१) स्त्री-पुरुष को जबर्दस्ती बाँधने, बँधवाने वाले और राजाज्ञा से बँधे हुए स्त्री-पुरुष को अनधिकार जबर्दस्ती छोड़ने या छुड़वाने वाले व्यक्ति को पाँच-सौ पण लेकर हजार पण तक का दंड दिया जाय; प्राचीन आचार्यों के मतानुसार यही उत्तम साहस दण्ड कहलाता है।

(२) जो व्यक्ति जान-बूझ कर या सूचना देकर डाका (साहस) डालता है, उसे दुगुना दंड दिया जाय । जो व्यक्ति किसी को डाका डालने के लिए यह कह कर प्रेरित करे कि 'तुम्हारे छुड़ाने पर जितना खर्च होगा, उतना मैं लाऊँगा' उसे चौगुना दंड दिया जाय । जो व्यक्ति 'तुम्हें इतना सुवर्ण दूंगा' इस प्रकार धन की तादाद का प्रलोभन देकर डाका डलवाये, उससे उतना ही सुवर्ण वसूल किया जाय और इसके अतिरिक्त उसे यथोचित दंड दिया जाय; आचार्य बृहस्पति के अनुयायी विद्वानों का ऐसा निर्देश है ।

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'इस प्रकार साहस कार्य कराने वाले व्यक्ति को यदि वह इसका कारण क्रोध, उन्माद या अज्ञानता बताये तो वही दंड दिया जाय, जो साहस आदि कर्म करने वालों के लिए बताया गया है।'

(४) सब दंडों में प्रति सैकड़ा आठ पणरूप (सरकारी टैक्स) और दंड की रकम सौ से कम होने पर प्रति सैकड़ा पाँच पण व्याजी (सरकारी टैक्स) समझना चाहिए ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में साहस नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ।

३३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) प्रजानां दोषबाहुल्याद्राज्ञां वा भावदोषतः ।
रूपव्याजावधर्मिष्ठे धर्म्या तु प्रकृतिः स्मृता ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे साहसं नाम सप्तदशोऽध्यायः;
आदितस्त्रिसप्ततितमः ।

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( १ ) प्रजा के दोषों अपराधों की अधिकता होने पर या राजा के मन में बेईमानी की नियत आ जाने से रूप तथा व्याजी नामक सरकारी टैक्स धर्मानुकूल नहीं माने जाते हैं । इसलिए शास्त्रों में विधान किये गए दंड ही धर्मानुकूल माने गये हैं ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में साहस नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

प्रकरण ७५
अध्याय १८

वाक्पारुष्यम्


(१) वाक्पारुष्यमुपवादः कुत्सनमभिभर्त्सनमिति । (२) शरीरप्रकृतिश्रुतवृत्तिजनपदानां शरीरोपवादेन काणखञ्जादिभिः सत्ये त्रिपणो दण्डः । मिथ्योपवादे षट्पणो दण्डः । (३) शोभनाक्षिदन्त इति काणखंजादीनां स्तुतिनिन्दायां द्वादशपणो दण्डः । (४) कुष्ठोन्मादक्लैब्यादिभिः कुत्सायां च सत्यमिथ्यास्तुतिनिन्दासु द्वादशपणोत्तरा दण्डास्तुल्येषु । विशिष्टेषु द्विगुणः । हीनेष्वर्धदण्डः । परस्त्रीषु द्विगुणः । प्रमादमदमोहादिभिरर्धदण्डाः ।


वाक्पारुष्य

(१) गाली-गलौज, निन्दा और धमकाना आदि वाक्पारुष्य नामक अपराध के अन्तर्गत हैं। वाक्पारुष्य के पाँच भेद हैं : १. शरीर, २. प्रकृति, ३. श्रुत, ४. वृत्ति और ५. देश ।

(२) शरीर : इनमें शरीर को लक्ष्य करके यदि कोई व्यक्ति काणे, गंजे, लंगड़े, लूले को काणा, गंजा, लंगड़ा, लूला कहकर पुकारे तो उस पर तीन पण दंड किया जाय । यदि झूठी निन्दा करे तो छह पण दंड किया जाय ।

(३) यदि कोई व्यक्ति किसी काणे, लंगड़े आदि की व्याजस्तुति के भाव से यह कहे कि 'वाह तुम्हारी आँखें आदि कितनी सुन्दर हैं' तो उस पर बारह पण दंड किया जाय ।

(४) किसी व्यक्ति की कोढ़ी, पागल या नपुंसक आदि कहकर निन्दा करने वाले पर भी बारह पण दंड किया जाय । यदि कोई व्यक्ति अपने बराबर वालों की सच्ची, झूठी तथा व्याजस्तुति से निन्दा करे तो उस पर क्रमशः बारह, चौबीस और छत्तीस पण दंड किया जाय । यदि अपने से बड़ों के साथ कोई ऐसा व्यवहार करे तो उस पर दुगुना दंड किया जाय । अपने से छोटों के साथ ऐसा करने पर आधा दंड किया जाय । दूसरों की स्त्रियों के साथ ऐसा करने वाले पर भी दुगुना दंड किया जाय । यदि ऐसी निन्दा पागलपन, मद या किसी मोह के कारण की गई हो तो उस पर भी आधा दंड किया जाय ।

३३२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) कुष्ठोन्मादयोश्चिकित्सकाः। संनिकृष्टाः पुमांसश्च प्रमाणम्। क्लीबभावे स्त्रियः मूत्रफेनः अप्सु विष्ठानिमज्जनं च। (२) प्रकृत्युपवादे ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रान्तावसायिनामपरेण पूर्वस्य त्रिपणोत्तरा दण्डाः। पूर्वेणापरस्य द्विपणाधराः। कुब्राह्मणादिभिश्च कुत्सायाम्। (३) तेन श्रुतोपवादो वाग्जीवनानां, कारुकुशीलवानां वृत्त्युपवादः, प्राग्घूणकगान्धारादीनां च जनपदोपवादा व्याख्याताः। (४) यः परम् ‘एवं त्वां करिष्यामि’ इति करणेनाभिभत्सर्येदकरणे, यस्तस्य करणे दण्डस्ततोऽर्धदण्डं दद्यात्। (५) अशक्तः कोपं मदं मोहं वाऽपदिशेत् द्वादशपणं दद्यात्। (६) जातवैराशयः शक्तश्चापकर्तुं यावज्जीविकावस्थं दद्यात्।


(१) किसी को कोढ़ी पागल सिद्ध करने के लिए उनके चिकित्सक या साथ रहने वाले ही प्रमाण माने जाँय। पेशाब में झाग न उठना और पानी में विष्ठा का डूब जाना नपुंसक स्त्री का प्रमाण समझना चाहिए।

(२) प्रकृति : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्त्यज जातियों (प्रकृतियों) में यदि पूर्व-पूर्व वे एक दूसरे की निन्दा करें तो अन्त्यज को तीन पण, छह पण, नौ पण और बारह पण दंड दिया जाय। इसी प्रकार ब्राह्मण निन्दा करे तो दो पण, चार पण, छह पण और आठ पण उसको दंड दिया जाय। इसी प्रकार कुब्राह्मण, महाब्राह्मण आदि निन्दित वाक्य कहने वाले को भी यही दंड दिया जाय।

(३) श्रुति : पढ़ाई, विद्वत्ता, योग्यता आदि विषयों को लेकर वाग्जीवी, व्यक्ति यदि एक दूसरे की निन्दा करें तो उन्हें भी यही दंड दिया जाय।

वृत्ति : शिल्पी, कुशीलव (नट, नर्तक, गायक) आदि यदि एक दूसरे की आजीविका की निन्दा करें तो उन्हें भी यही दंड दिया जाय।

देश : भिन्न-भिन्न देशों के रहने वाले यदि एक दूसरे के देश की निन्दा करें तो उन्हें भी उक्त दंड दिया जाय।

(४) यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को यह कहकर कि 'मैं तुम्हें पीटूंगा या तुम्हारे साथ ऐसा कार्य करूँगा' धमकाये, पर मारे-पीटे नहीं तो उसे पूर्वोक्त दंड से आधा दंड दिया जाय; किन्तु जो धमकाने के साथ-साथ मारे-पीटे भी उसको आगे 'दंडपारुष्य' प्रकरण में निर्दिष्ट नियमों के अनुसार दंड दिया जाय।

(५) यदि कोई निर्बल व्यक्ति, किसी को डराये-धमकाये, क्रोध, उन्माद या पागलपन प्रकट करे तो उसपर बाहर पण दंड किया जाय।

(६) यदि यह बात साबित हो जाय कि किसी ने शत्रुतावश किसी दूसरे