कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
प्र० ७५ : अ० १८ ] वाक्पारुष्य ३३३
(१) स्वदेशग्रामयोः पूर्वं मध्यमं जातिसंघयोः ।
आक्रोशाद्देवचैत्यानामुत्तमं दण्डमर्हति ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वाक्पारुष्यं नाम अष्टादशोऽध्यायः,
आदितश्चतुस्सप्ततितमः ।
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व्यक्ति के हाथ-पैर तोड़ने की धमकी दी है और वह ऐसा करने में समर्थ भी है, तो उसे उसकी आमदनी तथा हैसियत के अनुसार यथोचित दंड दिया जाय ।
(१) यदि कोई व्यक्ति अपने देश या गाँव की निन्दा करे तो उसे प्रथम साहस दंड, अपनी जाति तथा समाज की निन्दा करे तो उसे मध्यम साहस दंड और देवालयों की निन्दा करे तो उसे उत्तम साहस दंड दिया जाय ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में वाक्पारुष्य नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ७६ |
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| अध्याय १९ |
दण्डपारुष्यम्
(१) दण्डपारुष्यं स्पर्शनमवगूर्णं प्रहतमिति । (२) नाभेरधःकायं हस्तपङ्कभस्मपांसुभिरिति स्पृशतस्त्रिपणो दण्डः । (३) तैरेवामेध्यैः पादष्ठीविकाभ्यां च षट्पणः । छर्दिमूत्रपुरीषादिभिर्द्वादशपणः नाभेरुपरि द्विगुणाः । शिरसि चतुर्गुणाः समेष्व । (४) विशिष्टेषु द्विगुणाः । हीनेषु अर्धदण्डाः । परस्त्रीषु द्विगुणाः । प्रमादमदमोहादिभिरर्धदण्डाः । (५) पाद्वस्त्रहस्तकेशावलम्बनेषु षट्पणोत्तरा दण्डाः । (६) पीडनावेष्टनाञ्जनप्रकर्षणाध्यासनेषु पूर्वः साहसद्ण्डः । पातयित्वाऽपक्रमतोऽर्धदण्डः ।
दण्डपारुष्य
( १ ) किसी को छूना, पीटना या हाथ उठाना और चोट पहुँचाना दंडपारुष्य है ।
( २ ) नाभि से नीचे के हिस्से पर हाथ, कीचड़, राख और धूल डालने वाले व्यक्ति को तीन पण दंड दिया जाय ।
( ३ ) यदि किसी को अपवित्र हाथ से छू दिया जाय, पैर से छू दिया जाय तो उस पर छह पण का दंड करना चाहिए । यही हरकतें यदि नाभि के ऊपर के हिस्से से की जांय तो उसे दुगुना दंड दिया जाय । यदि शिर पर की जांय तो चौगुना दंड दिया जाय ।
( ४ ) यदि अपने से श्रेष्ठ व्यक्तियों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाय तो उसे दुगुना दंड दिया जाय । अपने से छोटों के साथ यदि ऐसा व्यवहार किया जाय तो आधा दंड दिया जाय । दूसरों की स्त्रियों के साथ ऐसी हरकतें करने पर भी दुगुना दंड दिया जाय । यदि कोई व्यक्ति प्रमाद, उन्माद या अज्ञानतावश ऐसा करें तो उसे आधा दंड दिया जाय ।
( ५ ) पैर, वस्त्र, हाथ और बालों को पकड़ने वाले व्यक्ति पर क्रमशः छह, बारह, अठारह और चौबीस पण दंड दिया जाय ।
( ६ ) किसी को पकड़ने पर, बाँधने पर, कालिख पोतने पर, घसीटने पर और नीचे पटक उसके ऊपर चढ़ बैठने पर प्रथम साहस दंड दिया जाय । किसी को जमीन पर पटक कर भाग जाने वाले को प्रथम साहस का आधा दंड दिया जाय ।
प्र० ७६ : अ० १६ ] दण्डपारुष्य ३३५
(१) शूद्रो येनाङ्गेन ब्राह्मणमभिहन्यात् तदस्य छेदयेत् । अवगूर्णे निष्क्रयः स्पर्शेऽर्धदण्डः । तेन चण्डालाशुचयो व्याख्याताः । (२) हस्तेनावगूर्णे त्रिपणावरो द्वादशपणपरो दण्डः । पादेन द्विगुणः । दुःखोत्पादनेन द्रव्येण पूर्वः साहसदण्डः । प्राणाबाधिकेन मध्यमः । (३) काष्ठलोष्टपाषाणलोहदण्डरज्जुद्रव्याणामन्यतमेन दुःखमशोणित-मुत्पादयतश्चतुर्विंशतिपणो दण्डः । शोणितोत्पादने द्विगुणः । अन्यत्र दुष्ट-शोणितात् । (४) मृतकल्पमशोणितं घ्नतो हस्तपादपारश्विकं वा कुर्वतः पूर्वः साहसदण्डः । पाणिपाददन्तभङ्गे कर्णनासाच्छेदने व्रणविदारणे च अन्यत्र दुष्टव्रणेभ्यः । (५) सक्थिग्रीवाभञ्जने नेत्रभेदने वा वाक्यचेष्टाभोजनोपरोधेषु च मध्यमः साहसदण्डः । समुत्थानव्ययश्च । विपत्तौ कण्टकशोधनाय नीयेत ।
( १ ) शूद्र जिस अंग से ब्राह्मण पर प्रहार करे उसका वह अंग काट देना चाहिए। शूद्र यदि ब्राह्मण का हाथ या पैर झटक दे तो उस पर यथोचित दंड किया जाय और केवल छू दे तो उक्त दंड का आधा दंड किया जाय । इसी प्रकार चाण्डाल आदि नीच जातियों के सम्बन्ध में दंड-व्यवस्था समझनी चाहिए ।
( २ ) हाथ से ढकेलने या झटकने पर तीन पण से बारह पण तक का दंड होना चाहिए। पैर से प्रहार करने पर दुगुना दंड दिया जाय । कांटा, सूई आलपीन आदि चुभा देने पर प्रथम साहस दंड और प्राणघातक वस्तु द्वारा चोट पहुँचाने पर मध्यम साहस दंड दिया जाय ।
( ३ ) लकड़ी, ढेला, पत्थर, लोहे की छड़ तथा रस्सी आदि किसी एक वस्तु से मारने पर यदि खून न निकले तो चौबीस पण और खून निकले तो अठतालीस पण दंड दिया जाय । यदि वह खून कोढ, फोड़ा, फुंसी आदि के कारण निकला हो तो दुगुना दंड न दिया जाय ।
( ४ ) यदि बिना खून निकाले ही मारते-मारते किसी को अधमरा कर दिया जाय या उसके हाथ-पैरों के जोड़ तोड़ दिये जाँय तो मारने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । हाथ, पैर तथा दाँत तोड़ देने पर कान तथा नाक काट देने पर और घावों को फाड़ देने पर भी प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । किन्तु वे घाव यदि फोड़े, फुंसी आदि के कारण न हुए हों, उसी दशा में प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
( ५ ) गोड़ या गर्दन तोड़ने पर आँख फोड़ने पर, जीभ, हाथ, पैर और मुँह आदि को काट देने पर मध्यम साहस दण्ड दिया जाय और अपराधी को चाहिए कि तब तक वह उस अपंग व्यक्ति की दवा-दारु, खाने-पीने तथा आवश्यक व्यय का
३३६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) महाजनस्यैकं घ्नतः प्रत्येकं द्विगुणो दण्डः । (२) पर्युषितः कलहोऽनुप्रवेशो वा नाभियोज्य इत्याचार्याः । नास्त्यपकारिणो मोक्ष इति कौटल्यः । (३) कलहे पूर्वगतो जयति, अक्षममाणो हि प्रधावति । इत्याचार्याः । (४) नेति कौटल्यः । पूर्वं पश्चाद्वागतस्य साक्षिणः प्रमाणम् । असाक्षिके घातः कलहोपलिङ्गनं वा । (५) घाताभियोगमप्रतिब्रुवतः तदहरेव पश्चात्कारः । (६) कलहे द्रव्यमपहरतो दशपणो दण्डः । (७) क्षुद्रकद्रव्यहिंसायां तच्च तावच्च दण्डः ।
इन्तजाम करे जब तक वह पूर्ण स्वस्थ न हो जाय । यदि अपराधी को इस प्रकार का दंड देने में देश-काल बाधक सिद्ध हो तो उसे कंटक शोधन अधिकरण में बताये गए नियमों के अनुसार दंड दिया जाय ।
(१) यदि बहुत-से आदमी मिलकर एक आदमी को मारें तो उनमें से प्रत्येक आदमी को उससे दुगुना दंड दिया जाय, जितना दंड एक आदमी द्वारा मारने पर दिया जाता है ।
(२) पुरातन आचार्यों का कहना है कि 'बहुत पुराने झगड़ों तथा चोरियों पर मुकदमा दायर न किया जाय ।' किन्तु आचार्य कौटिल्य का मत है कि 'अपकारी व्यक्ति को कभी भी न छोड़ा जाय ।'
(३) पुरातन आचार्यों का अभिमत है कि 'फौजदारी के मामले में जो व्यक्ति पहिले अदालत में दरखास्त दे, उसी की जीत समझी जाय क्योंकि दूसरे से सताये जाने के कारण, दुःख को बरदास्त न करके ही वह पहिले अदालत की शरण में आता है ।'
(४) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'यह उचित नहीं है; अदालत में कोई आगे आये या पीछे, साक्षियों के कथनानुसार ही मुकदमे का फैसला दिया जाय । यह साक्षी न हों तो चोट आदि से और चोट भी यदि भीतरी हो तो अन्य लक्षणों से झगड़े की असलियत जानकर फैसला करना चाहिये ।'
(५) फौजदारी के मामलों में यदि प्रतिवादी उसी दिन जवाब न दे तो उसकी हार समझी जाय ।
(६) दो आदमियों को झगड़े में फँसा हुआ जानकर उनकी वस्तुओं को यदि कोई तीसरा ही व्यक्ति उड़ाकर ले जाय तो उसे दस पण दंड दिया जाय ।
(७) यदि झगड़े में कोई किसी की छोटी-छोटी वस्तुओं को नष्ट कर दे तो वह उसका मूल्य मालिक को दे और उतना ही दंड राजकोष में जमा करे ।
प्र० ७३ : अ० १९ ] दण्डपारुष्य ३३७
(१) स्थूलकद्रव्यहिंसायां तच्च द्विगुणश्च दण्डः । (२) वस्त्राभरणहिरण्यसुवर्णभाण्डहिंसायां तच्च पूर्वश्च साहसदण्डः । (३) परकुड्यमभिघातेन क्षोभयतस्त्रिपणो दण्डः । छेदनभेदने षट्-पणः । पातनभञ्जने द्वादशपणः प्रतीकारश्च । (४) दुःखोत्पादनं द्रव्यमन्यवेश्मनि प्रक्षिपतो द्वादशपणो दण्डः । प्राणाबाधिकं पूर्वः साहसदण्डः । (५) क्षुद्रपशूनां काष्ठादिभिर्दुःखोत्पादने पणो द्विपणो वा दण्डः । शोणितोत्पादने द्विगुणः । (६) महापशूनामेतेष्वेव स्थानेषु द्विगुणो दण्डः, समुत्थानव्ययश्च । (७) पुरोपवनवनस्पतीनां पुष्पफलच्छायावतां प्ररोहच्छेदने षट्पणः । क्षुद्रशाखाच्छेदने द्वादशपणः । पीनशाखाच्छेदने चतुर्विंशतिपणः । स्कन्धवधे पूर्वः साहसदण्डः । समुच्छित्तौ मध्यमः । (८) पुष्पफलच्छायावद्गुल्मलतास्वर्धदण्डः । पुण्यस्थानतपोवनश्मशानद्रुमेषु च ।
( १ ) यदि इसी प्रकार झगड़े में बड़ी-बड़ी वस्तुएँ नष्ट हो जायें तो उनकी कीमत मालिक को और मूल्य का दुगुना दंड सरकार को दिया जाय ।
( २ ) यदि कोई वस्त्रों आभूषणों और हिरण्य तथा सुवर्ण के बने बर्तनों को नष्ट करे तो वह मालिक को उनकी पूरी कीमत चुकाये और सरकार की ओर से उसे प्रथम साहस दंड दिया जाय ।
( ३ ) दूसरे की दीवार को धक्का देकर या चोट मारकर हिलाने वाले व्यक्ति को तीन पण दंड दिया जाय; दीवार को तोड़ने-फोड़ने पर छह पण तथा गिराने पर बारह पण दंड और नुकसान का मुआवजा लिया जाय ।
( ४ ) यदि कोई व्यक्ति किसी के घर में कोई घातक वस्तु फेंके तो उसे बारह पण दंड दिया जाय; यदि प्राण-घातक वस्तु फेंके तो प्रथम साहस दंड दिया जाय ।
( ५ ) छोटे-छोटे जानवरों को लकड़ी, बाँस आदि से मारने पर एक या दो पण दंड दिया जाय । यदि मारने पर जानवर के खून निकल जाय तो दुगुना दंड किया जाय ।
( ६ ) गाय, भैंस आदि बड़े पशुओं की इसी प्रकार की चोट पहुँचाने पर दुगुना दंड किया जाय और अपराधी से दवा-दारू के लिए भी खर्च लिया जाय ।
( ७ ) नगर के बाग-बगीचों में लगे हुए फल-फूल तथा छायादार पेड़ों के पत्ते आदि तोड़ने पर छह पण; छोटी-छोटी शाखाओं की टहनियाँ तोड़ने पर बारह पण; मोटी-मोटी शाखाओं को काटने पर चौबीस पण; तने के ऊपरी स्कंध को काटने पर प्रथम साहस दंड; और पेड़ को जड़ से काटने पर मध्यम साहस दंड दिया जाय ।
( ८ ) फली-फूली छायादार झाड़ियों तथा लताओं को काटने पर ऊपर कहे गए,
२२ कौ०
३३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
३३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) सीमवृक्षेषु चैत्येषु द्रुमेष्वालक्षितेषु च । त एव द्विगुणा दण्डाः कार्या राजवनेषु च ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दण्डपारुष्यं नाम एकोनविंशोऽध्यायः; आदितः पञ्चसप्ततितमः ।
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दंड का आधा दंड दिया जाय । तीर्थस्थानों, तपोवनों और श्मशानों के वृक्षों को काटने वाले पर भी आधा दंड किया जाय ।
( १ ) सीमा के पेड़ों, मन्दिरों के पेड़ों, राजा की ओर से मुहर लगे पेड़ों और सरकारी जंगलों के पेड़ों को काटने पर दुगुना जुर्माना किया जाय ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दण्डपारुष्य नामक उन्नीसवां अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ७४-७५ | # द्यूतसमाह्वयम्, प्रकीर्णकानि |
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| अध्याय २० |
(१) द्यूताध्यक्षो द्यूतमेकमुखं कारयेत्। अन्यत्र दीव्यतो द्वादशपणो दण्डः गूढाजीविज्ञापनाथँम्।
(२) द्यूताभियोगे जेतुः पूर्वः साहसदण्डः। पराजितस्य मध्यमः। बालिशजातीयो ह्येष जेतुकामः पराजयं न क्षमत इत्याचार्याः। नेति कौटल्यः। पराजितश्चेद्द्विगुणदण्डः क्रियेत न कश्चन राजानमभिसरिष्यति। प्रायशो हि कितवाः कूटदेविनः।
(३) तेषामध्यक्षाः शुद्धाः काकणीरक्षांश्च स्थापयेयुः।
(४) काकण्यक्षाणामन्योपधाने द्वादशपणो दण्डः। कूटकर्मणि पूर्वः साहसदण्डः, जितप्रत्यादानम्। उपधौ स्तेयदण्डश्च।
द्यूत समाह्वय और प्रकीर्णक
( १ ) द्यूत समाह्वय : द्यूताध्यक्ष का चाहिए कि वह किसी एक नियत स्थान में जुआ खेलने का प्रबन्ध करे। उस नियत स्थान को छोड़कर दूसरी जगह जुआ खेलने वाले पर बारह पण दण्ड किया जाय; ऐसा इसलिए किया गया है कि जिससे ठगी, धोखेबाज लोगों का पता लग सके।
( २ ) 'जुए के मुकदमों में जीतने वाले को प्रथम साहस दण्ड; और हारने वाले को मध्यम साहस दण्ड दिया जाय; क्योंकि हारने वाला मूर्ख जीतने की इच्छा से जुआ खेलता है और हार जाने पर अपनी हार को सहन न कर जीतने वाले से झगड़ा कर बैठता है।' ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है। परन्तु आचार्य कौटिल्य इस बात को नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि 'यदि हारने वाले को जीतने वाले से दुगुना दण्ड दिया जायगा तो फिर कोई भी हारने वाला जुआरी अदालत की शरण में न जा सकेगा; और उसका नतीजा यह होगा कि धूर्त लोग कपट से जुआ खेलते रहेंगे।'
( ३ ) द्यूताध्यक्षों को चाहिए कि वे जुआघर में साफ कौड़ी और पाँसे रखवा दें।
( ४ ) यदि कोई जुआरी उन कौड़ियों और पाँसों को बदले तो उसपर बारह पण दण्ड दिया जाय। यदि कोई छल-कपट से जुआ खेले तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय और उसके जीते हुए धन को छीन लिया जाय तथा रखवाये गए पाँसों में कुछ तब्दीली करके दूसरे को धोखा देने के अभियोग में चोरी का दण्ड दिया जाय।
| ३४० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
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(१) जितद्रव्यादध्यक्षः पञ्चकं शतमाददीत, काकण्यक्षारलाशलाकाव- क्रयमुदकभूमिकर्मक्रयं च । द्रव्याणामाधानं विक्रयं च कुर्यात् । अक्षभूमि- हस्तदोषाणां चाप्रतिषेधने द्विगुणो दण्डः । (२) तेन समाह्वयो व्याख्यातः अन्यत्र विद्याशिल्पसमाह्वयादिति । (३) प्रकीर्णकं तु । याचितकापक्रीतकाहितकनिक्षेपकाणां यथादेश- कालमदाने, यामच्छायासमुपवेशसंस्थितीनां वा देशकालातिपातने, गुल्म- तरदेयं ब्राह्मणं साधयतः प्रतिवेशानुवेशयोरुपरि निमन्त्रणे च द्वादशपणो दण्डः । (४) सन्दिष्टमर्थमप्रयच्छतो, भ्रातृभार्यां हस्तेन लङ्घयतो, रूपाजीवा- मन्योपरुद्धां गच्छतः, परवक्तव्यं पण्यं क्रीणानस्य, समुद्रं गृहमूद्भिन्दतः, सामन्तचत्वारिंशत्कुल्याबाधामाचारतश्चाष्टचत्वारिंशत्पणो दण्डः । (५) कुलनीवीग्राहकस्यापव्ययने, विधवां च्छन्दवासिनीं प्रसह्याधि-
( १ ) जीतने वाले जुआरी से द्यूताध्यक्ष पाँच प्रतिशत सरकारी कर ले और कौड़ी, पाँसे, अरल ( पाँसे फेंके जाने के लिए चमड़े की चौकी ), शलाका, जल तथा जमीन का किराया भी वसूल करे जुआरियों को चीजें बेचने और गिरवी रखने को इजाजत भी दे दे । यदि अध्यक्ष, जुआरियों को पाँसे, जमीन, हाथ की सफाई आदि से न रोके तो जितना धन वह जुआरियों से वसूल करे, उससे दुगुना जुरमाना उस पर किया जाय ।
( २ ) यही नियम उन लोगों के सम्बन्ध में भी समझने चाहिएँ, जो मुर्गा, तीतर, भेड़ आदि की लड़ाई में बाजी लगाते हैं; किन्तु विद्या और शिल्प की बाजी लगाने वाले जुआरियों के लिए ये नियम नहीं हैं ।
( ३ ) प्रकीर्णक : इस प्रसंग में जिन विषयों के सम्बन्ध में कहना शेष रह गया है उन विषयों को प्रकीर्णक कहते हैं । यदि कोई पुरुष उधार ली हुई ( याचितक ), किराये पर ली हुई ( अवक्रीतक ) और धरोहर के तौर पर रखी हुई ( आहितक ) वस्तु एवं जेवर बनाने के लिए सुवर्ण आदि को ठीक स्थान तथा ठीक समय पर वापिस न करे; निश्चित समय एवं स्थान का वायदा कर फिर न मिले; बेड़ा आदि के द्वारा पार कराके ब्राह्मण से किराया माँगे; पड़ोसी श्रोत्रिय को छोड़कर बाहरी श्रोत्रिय को निमंत्रण दे; तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय ।
( ४ ) वायदा किए धन को न देने वाले; भौजाई का हाथ पकड़कर झटका देने वाले; दूसरे की रखेल वेश्या के यहाँ जाने वाले; दूसरे के हाथ बिके पदार्थ को खरीदने वाले; सरकारी चिह्नों से युक्त मकान को गिराने वाले और सामन्तों के चालीस कुलों तक बाधा पहुँचाने वाले; व्यक्ति पर अड़तालीस पण दण्ड किया जाय ।
( ५ ) जो व्यक्ति वंशानुक्रम से भोगी जाने वाली सर्वसाधारण सम्पत्ति का
प्र० ७४-७५ : अ० २० ] द्यूतसमाह्वय और प्रकीर्णक ३४१
चरतः, चण्डालस्यार्यां स्पृशतः, प्रत्यासन्नमापद्यनमभिधावतो, निष्कारणमभिधावनं कुर्वतः, शाक्यजीवकादीन् वृषलप्रव्रजितान् देवपितृकार्येषु भोजयतः शत्यो दण्डः । (१) शपथवाक्यानुयोगमनिसृष्टं कुर्वतो, युक्तकर्म चायुक्तस्य, क्षुद्रपशुवृषाणां पुंस्त्वोपघातिनो, दास्या गर्भमौषधेन पातयतश्च पूर्वः साहसदण्डः । (२) पितापुत्रयोर्दम्पत्योर्भ्रातृभगिन्योर्मातुलभागिनेययोः शिष्याचार्ययोर्वा परस्परमपतितं त्यजतः सार्थाभिप्रयातं ग्राममध्ये वा त्यजतः पूर्वः साहसदण्डः । कान्तारे मध्यमः । तन्निमित्तं भ्रेषयत उत्तमः । सहप्रस्थायिष्वन्येष्वर्धदण्डः । (३) पुरुषमबन्धनीयं बध्नतो बन्धयतो बन्धं वा मोक्षयतो बालमप्राप्तव्यवहारं बध्नतो बन्धयतो वा सहस्रदण्डः । पुरुषापराधविशेषेण दण्डविशेषः कार्यः । (४) तीर्थकरस्तपस्वी व्याधितः क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तस्तिरोजनपदो दण्डखेदी निष्किञ्चनश्चानुग्राह्याः ।
अपव्यय करे; स्वतन्त्र रहनेवाली विधवा के साथ बलात्कार करे; चाण्डाल होकर आर्या स्त्री को छूए; पड़ोसी की आपत्ति पर सहायता न करे; बिना कारण पड़ोसी के यहाँ जाये आये और बौद्ध भिक्षुओं तथा शूद्रा संन्यासियों को यज्ञादि देवकर्मों तथा श्राद्धादि पितृकर्मों में भोजन कराये; उस पर सौ पण दण्ड दिया जाय ।
( १ ) न्यायाधीश ( धर्मस्थ ) की आज्ञा के बिना ही साक्षी के तौर पर शपथ खाने वाले; अनधिकारी को अधिकार देने वाले; छोटे-छोटे पशुओं को बधिया बना देने वाले और दवा देकर दासी के गर्भ को गिरा देने वाले; व्यक्ति को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
( २ ) पिता-पुत्र, भाई-बहिन, मामा-भांजा और गुरु-शिष्य आदि में से कोई भी किसी को बिना पतित हुए त्याग दे; या किसी व्यापारी काफिले का मुखिया अपने साथ के किसी बीमार व्यक्ति को रास्ते के किसी गाँव में ही छोड़ दे; उनको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । यदि किसी बीहड़ वन में छोड़ दे तो मध्यम साहस दण्ड दिया जाय और यदि मार डाले तो उस व्यापारी को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय तथा उसके साथ जितने लोग हों, उन पर इसी अपराध में आधा दण्ड किया जाय ।
( ३ ) जो व्यक्ति किसी बेगुनाह व्यक्ति को बाँधे या बँधवाये, अथवा किसी कैदी को छोड़ दे या किसी नाबालिग बच्चे को बांधे, बँधवाये उस पर हजार पण दण्ड किया जाय । निष्कर्ष यह है कि किसी भी व्यक्ति को अपराध के अनुसार ही दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ४ ) दानी, तपस्वी, बीमार, भूखा, प्यासा, रास्ते का थका, परदेशी, अनेक बार दण्ड पाने से दुःखी और निर्बल-निर्धन व्यक्तियों पर सदा अनुग्रह रखना चाहिए ।
| ३४२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ तीसरा अधिकरण |
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(१) देवब्राह्मणतपस्विस्त्रीबालवृद्धव्याधितानामनाथानामनभिसरतां धर्मस्थाः कार्याणि कुर्युः । न च देशकालभोगच्छलेनातिहरेयुः । (२) पूज्या विद्याबुद्धिपौरुषाभिजनकर्मतिशयतश्च पुरुषाः । (३) एवं कार्याणि धर्मस्थाः कुर्युरच्छलदर्शिनः । समाः सर्वेषु भावेषु विश्वास्या लोकसम्प्रियाः ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे द्यूत-समाह्वय-प्रकीर्णकं नाम विंशोऽध्यायः; आदितः षट्सप्ततितमः । समाप्तमिदं धर्मस्थीयं तृतीयमधिकरणम् ।
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(१) धर्मस्थ अधिकारियों को चाहिए कि वे देव, ब्राह्मण, तपस्वी, स्त्री, बालक, बूढ़ा, बीमार और अपने दुःखों को कहने के लिए न जाने वाले अनाथों का कार्य खुद ही कर दिया करें। स्थान तथा समय का बहाना लगाकर उनके धन का अपहरण न किया जाय; अथवा देश, काल के बहाने उनको तंग न किया जाय ।
(२) जो व्यक्ति विद्या, बुद्धि, पौरुष, कुल और सत्कार्यों के कारण आदरयोग्य हों, उनकी सदा प्रतिष्ठा की जाय ।
(३) इस प्रकार धर्मस्थ अधिकारियों को चाहिए कि छल-कपट से विलग होकर वे अपने कार्यों को सम्पन्न करें और सबको एक समान निगाह में रखकर एवं जनता के विश्वासपात्र बनकर लोकप्रियता प्राप्त करें ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में द्यूतसमाह्वयप्रकीर्णक नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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चौथा अधिकरण
चौथा अधिकरण
कण्टकशोधन
प्रकरण ७६
अध्याय १
कारुकरक्षणम्
(१) प्रदेष्टारस्त्रयस्त्रयोऽमात्याः कण्टकशोधनं कुर्युः ।
(२) अर्थ्यप्रकाराः कारुशासितारः सन्निक्षेप्तारः स्ववित्तकारवः श्रेणीप्रमाणा निक्षेपं गृह्णीयुः । विपत्तौ श्रेणी निक्षेपं भजेत । निर्दिष्टदेशकालकार्यं च कर्म कुर्युः । अनिर्दिष्टदेशकालकार्यापदेशम् ।
(३) कालातिपातने पादहीनं वेतनं तद्द्विगुणश्च दण्डः । अन्यत्र भ्रेशोपनिपाताभ्यां नष्टं विनष्टं वाभ्यावहेयुः । कार्यस्यान्यथाकरणे वेतननाशस्तद्द्विगुणश्च दण्डः ।
शिल्पियों से प्रजा की रक्षा
( १ ) सामान्य कारीगर : तीन कमिश्नर ( प्रदेष्टा ) या तीन मंत्री प्रजा-पीड़क व्यक्तियों से प्रजा की रक्षा ( कंटक शोधन ) करें ।
( २ ) अच्छे स्वभाववाले शिल्पियों के मुखिया; सबके सामने लेन-देन का कार्य करने वाले; अपने ही धन से गहने आदि बनाने वाले और साझीदारों में विश्वसनीय, शिल्पी लोग ही किसी के धन को गिरवी ( निक्षेप ) रख सकते हैं । गिरवी रखने वाला यदि मर जाय या विदेश चला जाय तो उसके साझीदार मिल-जुल कर उस गिरवी रखे हुए धन को अदा करें । कारीगर लोग स्थान, समय और कार्य आदि का निश्चय करके ही किसी कार्य को आरम्भ करें । कोई बहाना बनाकर समय और कार्य आदि का निश्चय न करके किसी कार्य को आरंभ न करें ।
( ३ ) जो शिल्पी ठीक समय पर काम पर हाजिर न हों उनका चौथाई वेतन काट लिया जाय और उन पर उससे दुगुना जरमाना किया जाय । किन्तु किसी हिंसक प्राणी द्वारा बाधा उत्पन्न हो जाने या किसी आकस्मिक आपत्ति के आ जाने के कारण यदि वह ठीक समय से काम पर हाजिर न हो सका हो तो उसे अपराधी न समझा जाय । यदि कारीगर से कोई कार्य बिगड़ जाय तो वह उसके नुकसान को भरे; किन्तु किसी विपत्ति के कारण यदि ऐसा हुआ हो तो उसको अपराधी न समझा जाय । यदि कारीगर काम बिगाड़ दें तो उनको मजदूरी न दी जाय; बल्कि उन पर वेतन का दुगुना जरमाना किया जाय ।
| ३४६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ चौथा अधिकरण |
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(१) तन्तुवाया दशैकादशिकं सूत्रं वर्धयेयुः। वृद्धिच्छेदे छेदद्विगुणो दण्डः।
(२) सूत्रमूल्यं वानवेतनम्। क्षौमकौशेयानामध्यर्धगुणम्। पत्रोर्णा-कम्बलदुकूलानां द्विगुणम्।
(३) मानहीने हीनावहीनं वेतनं तद्द्विगुणश्च दण्डः। तुलाहीने हीन-चतुर्गुणो दण्डः। सूत्रपरिवर्तने मूल्यद्विगुणः। तेन द्विपटवानं व्याख्यातम्।
(४) ऊर्णातुलायाः पञ्चपलिको विहननच्छेदो रोमच्छेदश्च।
(५) रजकाः काष्ठफलकश्लक्ष्णशिलासु वस्त्राणि नेनिज्युः। अन्यत्र नेनिजतो वस्त्रोपघातं षट्पणं च दण्डं दद्युः।
(६) मुद्गराङ्कादन्यद् वासः परिदधानास्त्रिपणं दण्डं दद्युः। परवस्त्र-विक्रयावक्रयाधानेषु च द्वादशपणो दण्डः। परिवर्तने मूल्यद्विगुणो वस्त्र-दानं च।
( १ ) जुलाहा : जुलाहा (तंतुवाय) को चाहिए कि वह प्रति दस पल पर एक पल अधिक सूत, कपड़ा बुनने के लिए ले। यदि वह इस से अधिक छीजन निकाले तो उस पर छीजन का दुगुना जुरमाना किया जाय।
( २ ) जितने कीमत का सूत हो उतनी ही उसकी बुनाई भी देनी चाहिए; जूट और रेशमी कपड़ों की बुनाई सूत से ड्योढ़ी दी जाय। धुले हुए रेशमी कपड़ों (पत्रोर्ण), ऊनी कंबलों और दुशालों की बुनाई सूती कपड़े से दुगुनी देनी चाहिए।
( ३ ) जितने नाप का कपड़ा बुनने को दिया गया हो यदि बुनकर उतना न निकले तो उसी हिसाब से जुलाहे की मजदूरी काटी जाय और उस पर उस कम बुनाई का दुगुना जुरमाना किया जाय। यदि सूत तौलकर दिया गया हो तो बुने हुए कपड़े में जितनी कमी निकले उसका चौगुना दण्ड जुलाहे को दिया जाय। यदि वह सूत को ही बदल दे तो उस पर मूल्य से दुगुना दण्ड किया जाय। इसी आधार पर दुसूती कपड़ों की बुनाई भी समझ लेनी चाहिए।
( ४ ) सौ पल वजनी ऊन में से पाँच पल ऊन पिंजाई-धुनाई में कम हो जाता है और पाँच पल ऊन बुनाई के समय रूओं के रूप में उड़ जाती है; अर्थात् धुनाई-बुनाई के समय प्रति सैकड़ा दस पल ऊन कम हो जाती है, इससे अधिक नहीं।
( ५ ) धोबी और दर्जी : धोबियों (रजकों) को चाहिए कि वे लकड़ी के फटे पर या साफ पत्थर पर ही कपड़ों को साफ करें। दूसरी जगह धोने पर यदि कपड़ा फट जाय तो वे उसका नुकसान भरें और दण्ड रूप में छह पण भी अदा करें।
( ६ ) धोबियों के अपने पहिनने के कपड़ों पर मुद्गर का निशान होना चाहिए; जिस धोबी के कपड़ों पर यह निशान न रहे उस पर तीन पण दण्ड किया जाय। जो
प्र० ७६ : अ० १ ] शिल्पियों सम्बन्धी नियम ३४७
(१) मुकुलावदातं शिलापट्टशुद्धं धौतसूत्रवर्णं प्रमृष्टश्वेतं चैकरात्रोत्तरं दद्युः । (२) पञ्चरात्रिकं तनुरागं, षड्रात्रिकं नीलं, पुष्पलाक्षामञ्जिष्ठारक्तं, गुरुपरिकर्म यत्नोपचार्यं जात्यं वासः सप्तरात्रिकम् । ततः परं वेतनहानिं प्राप्नुयुः । (३) श्रद्धेया रागविवादेषु वेतनं कुशलाः कल्पयेयुः । (४) पराध्यानां पणो वेतनं मध्यमानामर्धपणः, प्रत्यवराणां पादः । (५) स्थूलकानां माषद्विमाषकं द्विगुणं रक्तकानाम् । प्रथमनेजने चतुर्भागः क्षयः । द्वितीये पञ्चभागः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् । (६) रजकैस्तुन्नवाया व्याख्याताः । (७) सुवर्णकाराणामशुचिहस्ताद्रूप्यं सुवर्णमनाख्याय सरूपं क्रीणतां
धोबी धुलाई के कपड़ों को बेचे, किराये पर दे या गिरवी रखे उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । कपड़ा बदल जाने पर वह कपड़े के मूल्य का दुगुना दण्ड और कपड़ा भी वापस दे ।
( १ ) धोबी को चाहिए कि वह अधखिली पुष्पकली के समान स्वच्छ-श्वेत कपड़े को धोकर एक दिन में ही वापस करे, शिलापट्ट के समान स्वच्छ कपड़े को दो दिन में, धुले हुए सूत की तरह श्वेत कपड़े को तीन दिन में और अत्यंत श्वेत कपड़े को चार दिन में धोकर वापस करे ।
( २ ) इसी प्रकार हलके रंग वाले कपड़े को पांच दिन में, नीले, गाढ़े रंग के, हरसिंगार, लाख तथा मजीठ आदि में रंगे कपड़े को छह दिन में, रेशम, पशम, वेल-बूटेदार जैसे कठिनाई से धुले जाने योग्य उत्तम कपड़ों को सात दिन में धोकर वापस करे । इसके बाद वापस करने पर उसकी धुलाई न दी जाय ।
( ३ ) यदि रंगीन कपड़ों की धुलाई देने में झगड़ा हो जाय तो उसका फैसला रंगों को ठीक-ठीक समझने वाले कुशल व्यक्ति करें ।
( ४ ) बढ़िया रंगीन कपड़ों की धुलाई एक पण, मध्यम दर्जे के रंगीन कपड़ों की धुलाई आधा पण और मामूली रंगीन कपड़ों की धुलाई चौथाई पण दी जानी चाहिए ।
( ५ ) इसी प्रकार मोटे कपड़ों की धुलाई एक या दो माष और रंगे हुए कपड़ों की धुलाई इससे दुगुनी देनी चाहिए । कपड़े की पहिली धुलाई में उसकी चौथाई कीमत कम हो जाती है । दूसरी धुलाई में शेष मूल्य का पांचवां हिस्सा कम हो जाता है; और तीसरी धुलाई में उस शेष मूल्य का छठा हिस्सा कम हो जाता है ।
( ६ ) धोबियों के समान दर्जियों (तुन्नवाय) के नियम भी समझ लेना चाहिए ।
( ७ ) सुनार : यदि सुनार निम्नकोटि के नौकर-चाकरों (अशुचिहस्त) के हाथ
३४८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
द्वादशपणो दण्डः, विरूपं चतुर्विंशतिपणः, चोरहस्तादष्टचत्वारिंशत्पणः । प्रच्छन्नविरूपमूल्यहीनक्रयेषु स्तेयदण्डः । कृतभाण्डोपधौ च । (१) सुवर्णान्माषकमपहरतो द्विशतो दण्डः । रूप्यधरणान्माषकमपहरतो द्वादशपणः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् । (२) वर्णोत्कर्षमसारणां योगं वा साधयतः पञ्चशतो दण्डः । तयोरपचरणे रागस्यापहारं विद्यात् । (३) माषको वेतनं रूप्यधरणस्य । सुवर्णस्याष्टभागः । शिक्षाविशेषेण द्विगुणा वेतनवृद्धिः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् । (४) ताम्रवृत्तकंसवैकृन्तकारकूटानां पञ्चकं शतं वेतनम् । ताम्रपिण्डो दशभागक्षयः । पलहीने हीनद्विगुणो दण्डः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् ।
से, सोने-चाँदी के बने हुए जेवर ( सरूप ); सुवर्णाध्यक्ष को सूचित किए बिना ही खरीद ले तो उस पर बारह पण दण्ड किया जाय; यदि बिना गहने की सोना-चाँदी खरीदे तो चौबीस पण; चोर के हाथ से खरीदे तो अठतालीस पण और दूसरों से छिपाकर गहने आदि को तोड़-मरोड़ कर थोड़ी कीमत में खरीदे तो उसको चोरी का दण्ड दिया जाय । बनाये हुए माल को बदल देने वाले सुनार को भी चोरी का दण्ड दिया जाय ।
( १ ) यदि सुनार सोने में से एक माष सोना चुरा ले तो उस पर दो-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि एक धरण चाँदी में से एक माष चाँदी चुरा ले तो उस पर बारहपण दण्ड किया जाय । इसी प्रकार अधिकाधिक चोरी के अनुसार अधिकाधिक दण्ड की व्यवस्था समझ लेनी चाहिए ।
( २ ) यदि कोई सुनार खोटे सोने-चाँदी पर नकली रंग चढ़ा दे या शुद्ध सोना-चाँदी में नकली धातु मिला दे तो उस पर पाँच सौ पण दण्ड किया जाय । सोने-चाँदी के खरे-खोटे की जाँच आग में तपाकर करनी चाहिए ।
( ३ ) एक धरण मान चाँदी के गहने आदि की बनवाई एक माषक दी जानी चाहिए । जितने तौल की सोने की चीज बनवायी जाय उसका आठवां हिस्सा बनवाई देनी चाहिए । विशेष कारीगरी के लिए दुगुनी बनवाई देनी चाहिए । इसी के अनुसार अधिक कार्य करवाने की मजदूरी समझनी चाहिए ।
( ४ ) ताँबा, सीसा, काँसा, लोहा, रांगा और पीतल इनकी बनवाई पांच प्रति सैकड़ा दी जानी चाहिए । ताँबे का दसवाँ हिस्सा, बनाते समय छीजन के लिए छोड़ देना चाहिए । इससे एक पल भी कम हो जाने पर नुकसान का दण्ड देना चाहिए । इसी प्रकार अधिक हानि के अनुपात से दण्ड का विधान समझना चाहिए ।
प्र० ७६ : अ० १ ] शिल्पियों सम्बन्धी नियम ३४९
(१) सीसत्रपुपिण्डो विंशतिभागक्षयः । काकणी चास्य पलवेतनम् । (२) कालायसपिण्डः पञ्चभागक्षयः । काकणीद्वयं चास्य पलवेतनम् । तेनोत्तरं व्याख्यातम् । (३) रूपदर्शकस्य स्थितां पणयात्रामकोप्यां कोपयतः कोप्यामकोपयतो द्वादशपणो दण्डः । (४) व्याजीपरिशुद्धा पणयात्रा । पणान्माषकमुपजीवतो द्वादशपणो दण्डः । तेनोत्तरं व्याख्यातम् । (५) कूटरूपं कारयतः प्रतिगृह्णतो निर्यातयतो वा सहस्रं दण्डः । कोशे प्रक्षिपतो वधः । (६) सरकपांसुधावकाः सारत्रिभागं लभेरन् । द्वौ राजा रत्नं च । रत्नापहार उत्तमो दण्डः । (७) खनिरत्ननिधिनिवेदनेषु षष्ठमंशं निवेत्ता लभेत । द्वादशमंशं भृतकः ।
( १ ) सीसे और रांगे की चीजों में बीसवाँ हिस्सा छीजन में निकल जाता है। इनके एक पल की बनवाई का एक कांकड़ी वेतन देना चाहिए।
( २ ) कलायस ( काला लोहा ) की चीजों में पाँचवाँ हिस्सा छीजन में निकल जाता है। उसकी बनवाई दो काँकड़ी वेतन देना चाहिए। इसी अनुपात से बनवाई देनी चाहिए।
( ३ ) यदि सिक्कों का पारखी ( रुपदर्शक ) चलते हुए खरे पण खोटा और खोटे पण को खरा बताये तो उस पर बारह पण जुर्माना किया जाय।
( ४ ) पाँच प्रति सैकड़ा टैक्स ( व्याजी ) सरकार को देकर पण चलाया जा सकता है। एक पण के चलाने के लिए माषक रिश्वत लेने वाले लक्षणाध्यक्ष को बारह पण दंड किया जाय। इसी क्रम से इसका दण्ड-विधान समझना चाहिए।
( ५ ) यदि छिपकर कोई जाली सिक्के बनवाये या जाली सिक्कों को स्वीकार करे अथवा उनका निर्यात करे, उस पर एक हजार पण दण्ड किया जाय। खजाने में अच्छे सिक्कों की जगह जाली सिक्के रखने वाले को मृत्यु दण्ड दिया जाय।
( ६ ) खान से निकले हुए रत्नों को साफ करने वाले कर्मचारी, टूटे-फूटे सारभूत माल का तीसरा हिस्सा ले लें। बाकी दो हिस्से तथा रत्नों को राजकोष के लिए रखा जाय। रत्न चुराने वाले कर्मचारी को उत्तम साहस दण्ड दिया जाय।
( ७ ) जो व्यक्ति राजा को रत्नों की खान तथा गड़े हुए खजाने का पता दे उस व्यक्ति को उसमें से छठा हिस्सा दिया जाय। यदि वह इसी कार्य के लिए राजा की ओर से नियुक्त हो तब उसे बारहवां हिस्सा दिया जाय।
३५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ चौथा अधिकरण
(१) शतसहस्रादूर्ध्वं राजगामी निधिः । ऊने षष्ठमंशं दद्यात् । (२) पूर्वपौरुषिकं निधिं जानपदः शुचिः स्वकरणेन समग्रं लभेत । स्वकरणाभावे पंचशतो दण्डः । प्रच्छन्नादाने सहस्रम् । (३) भिषजः प्राणाबाधिकमनाख्यायोपक्रममाणस्य विपत्तौ पूर्वः साहसदण्डः । कर्मापराधेन विपत्तौ मध्यमः । मर्मवेधवैगुण्यकरणे दण्डपारुष्यं विद्यात् । (४) कुशीलवा वर्षारात्रिमेकस्था वसेयुः । कामदानमतिमात्रमेकस्यातिवादं च वर्जयेयुः । तस्यातिक्रमे द्वादशपणो दण्डः । कामं देशजातिगोत्रचरणमैथुनापहाने नर्मयेयुः ।
( १ ) गड़ा हुआ खजाना यदि एक लाख पण से अधिक निकले तब उसका स्वामी राजा होता है । अन्यथा वह पता देने वाले व्यक्ति को ही दिया जाय; किन्तु उनमें से छठा हिस्सा वह राजा को अवश्य दे ।
( २ ) साक्षी और लेख आदि के प्रमाण से यदि यह साबित हो जाय कि खजाना पाने वाले व्यक्ति के पूर्वजों का है; यदि वह व्यक्ति सदाचारी है तो उस खजाने का स्वामी वही समझा जाय । यदि वह साक्षी और लेख आदि के बिना ही उस खजाने पर अधिकार जमाने लगे तो उसपर पाँच-सौ पण दण्ड किया जाय । यदि कोई छिपकर चुपचाप ही अपना कब्जा कर ले तो उस पर एक हजार पण दण्ड किया जाय ।
( ३ ) वैद्य : राजा को बिना सूचित किये यदि कोई वैद्य किसी ऐसे रोगी का इलाज करे, जिसके मरने की संभावना है, और दवा देने के दौरान में ही उसकी मृत्यु हो जाय तो उस वैद्य को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । यदि इलाज में भूल हो जाने के कारण मृत्यु हुई हो तो माध्यम साहस दण्ड दिया जाय । शरीर के किसी विशेष अङ्ग का गलत ऑपरेशन होने के कारण यदि रोगी का वह अंग जाता रहे, या दूसरी तरह की हानि हो जाय तो वैद्य को दण्ड-पारुष्य प्रकरण के अनुसार यथोचित दण्ड दिया जाय ।
( ४ ) नट-नर्त्तक : वर्षा ऋतु में नट नर्त्तक आदि एक ही स्थान पर निवास करें । उनकी कला से प्रसन्न होकर यदि कोई व्यक्ति उन्हें उचित मात्रा से अधिक पुरस्कार दे तो वे उसे स्वीकार न करें, अपनी अधिक तारीफ को भी वे पसन्द न करें । इस नियम का उल्लंघन करने पर बारह पण दण्ड दिया जाय । किसी खास देश, जाति, गोत्र या चरण के मजाक या निन्दा को छोड़कर तथा मैथुन संबन्धी कर्तव्यों को छोड़कर नट लोग जो चाहें अपने इच्छानुसार खेल दिखाकर दर्शकों को खुश कर सकते हैं ।
प्र० ७६ : अ० १ ] शिल्पियों सम्बन्धी नियम ३५१
(१) कुशीलवैश्चारण भिक्षुकाश्च व्याख्याताः । तेषामयश्शूलेन यावतः पणानभिवदेयुः, तावन्तः शिफाप्रहारा दण्डाः । (२) शेषाणां कर्मणां निष्पत्तिवेतनं शिल्पिनां कल्पयेत् । (३) एवं चोरानचोराख्यान् वणिक्कारुकुशीलवान् । भिक्षुकान् कुहकांश्चान्यान् वारयेद्देशपीडनात् ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे कारुकरक्षणं नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितः सप्तसप्ततितमः ।
—: ० :—
(१) नटों के ही अनुसार नाचने-गाने वालों और भिक्षुकों के नियम समझने चाहिए । दूसरों के मर्म को पीड़ा पहुँचाने पर इन लोगों को अपराध के अनुसार जितना पण दण्ड दिया जाय, यदि वे उसको अदा न कर सकें तो उनपर उतने ही कोड़े लगवाये जाँय ।
(२) जो कार्य पहिले बताये गये हैं, उनके अतिरिक्त कार्यों की मजदूरी, अन्दाज से लगा लेनी चाहिए ।
(३) इस प्रकार वनावटी साधु, बनिये, कारीगर, नट, भिखारी और ऐंद्रजालिक आदि चोरों को तथा इसी प्रकार के अन्य पुरुषों को देश में पीड़ा, पहुँचाने से रोका जाय ।
कंटकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में कारुक रक्षण नामक पहला अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
प्रकरण ७७ | वैदेहकरक्षणम् अध्याय २ |
(१) संस्थाध्यक्षः पण्यसंस्थायां पुराणभाण्डानां स्वकरणविशुद्धानामा-धानं विक्रयं वा स्थापयेत् । तुलामानभाण्डानि चावेक्षेत, पौतवापचारात् । (२) परिमाणीद्रोणयोरर्धपलहीनातिरिक्तमदोषः । पलहीनातिरिक्ते द्वादशपणो दण्डः । तेन पलोत्तरा दण्डवृद्धिर्व्याख्याता । (३) तुलायाः कर्षहीनातिरिक्तमदोषः । द्विकर्षहीनातिरिक्ते षट्पणो दण्डः । तेन कर्षोत्तरा दण्डवृद्धिर्व्याख्याता । (४) आढकस्यार्धकर्षहीनातिरिक्तमदोषः । कर्षहीनातिरिक्ते त्रिपणो दण्डः । तेन कर्षोत्तरा दण्डवृद्धिर्व्याख्याता । (५) तुलामानविशेषाणामतोऽन्येषामनुमानं कुर्यात् ।
व्यापारियों से प्रजा की रक्षा
( १ ) बाजार के अध्यक्ष ( संस्थाध्यक्ष ) को चाहिए कि वह, पुराने अन्न आदि के तथा दुकानदारों के स्वाधिकृत ( स्वकरण विशुद्ध ) माल के आयातनिर्यात का यथोचित प्रबन्ध करे । उसका यह भी कर्त्तव्य है कि तराजू, बाट और माप के वर्त्तनों का भी वह अच्छी तरह निरीक्षण करे, जिससे माप-तौल में कोई गड़बड़ी न होने पावे ।
( २ ) परिमाणी और द्रोण में यदि आधा पल कम-ज्यादा हो जाय तो कोई बात नहीं; किन्तु एक पल कम-ज्यादा होने पर बारह पण दण्ड दिया जाय । पल की कमी-ज्यादा के अनुसार ही दण्ड की व्यवस्था की जानी चाहिए ।
( ३ ) तराजू में यदि एक कर्ष कम-ज्यादा हो तो कोई हर्ज नहीं । यदि दो कर्ष कम-ज्यादा निकले तो छह पण दण्ड दिया जाय । इसी प्रकार कर्ष के अनुपात से दण्ड वृद्धि समझनी चाहिए ।
( ४ ) आढक में यदि आधे कर्ष की कमी-वेशी हो तो कोई बात नहीं । यदि कमीवेशी एक कर्ष की तो तीन पण दण्ड दिया जाय । इसी अनुपात से दण्ड बढाया जाय ।
( ५ ) जिस तुला तथा माप की कमी-वेशी के संबन्ध में नहीं कहा गया है उनकी भी यही दण्ड-व्यवस्था समझनी चाहिए ।