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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

परिच्छेद ] सामान्य-लक्षण का खण्डन ४४३ नापि द्वितीयः; सामान्यस्य समवायस्य च नित्यत्वाभावप्रसङ्गात् । आत्म- त्वादौ व्यक्त्यभावायत्तस्यापि विशिष्टाभावस्यासम्भवात् । तस्य च कदाचिदसत्त्वानङ्गीकारे तदनित्यत्वस्यैव वक्तुमशक्यत्वात् । तद्ग्राहिणश्च प्रत्ययस्यैककालिकस्य च मिथ्यात्वेऽविशेषात् सार्वकालिकस्य च मिथ्यात्वप्रसङ्गेन सर्वथा तदसत्त्वापत्तेः । एकस्य च सत्यत्वेऽविशेषात् सर्वसत्य- तायां कदाचिदपि तदसत्त्वं नास्तीति । एकदा तत्सम्बन्धेनोपलक्षितस्य अन्यदाऽपि विद्यमानत्वात् तथात्व- मिति चेन्न । तादृशोपलक्ष्यासम्भवात्, व्यक्तीनां भेदादनित्यत्वानुपपत्तिरेवेति । एतेन नित्यत्वमन्यत्रापि प्रतिवचनीयमिति । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण लक्षण में प्रविष्ट समवाय तथा लक्ष्य सामान्य भी अनित्य मानने पड़ेंगे, तभी लक्षण अनित्य होगा । यदि कहें कि लक्षणघटक व्यक्ति के अनित्य होने से लक्षण भी अनित्य है, तो जहाँ आत्मत्वादि-स्थल में आत्मारूप व्यक्ति भी नित्य है, वहाँ लक्षण अनित्य कैसे होगा ? किञ्च—लक्ष्य में कदाचित् भी लक्षण का असत्त्व न हो, तो लक्षण को अनित्य नहीं कह सकते । फिर यदि लक्षण का कदाचित् असत्त्व मान लें और उस समय लक्षण- विशिष्ट लक्ष्यग्रह भी मानें, तो उसके भ्रम होने से सर्वत्र भ्रम ही होगा । फलतः लक्षण का सर्वदा असत्त्व ही पर्यवसित हो जायगा । यदि कहें कि 'जिस समय लक्षण वस्तुसत् रहेगा, उस समय लक्षणविशिष्ट लक्ष्य-प्रतीति सत्य ही है। एवञ्च उसके सार्वकालिक असत्त्व की आपत्ति नहीं आ सकती', तो वह भी ठीक नहीं । कारण एक को सत्य मानें, तो अविशेषात् (विषय का बाध न होने से) सभी ज्ञान यथार्थ होंगे । फलतः कभी भी लक्षण का असत्त्व बन नहीं पायेगा । यदि कहें कि लक्षण अपने असत्त्व-काल में भी लक्ष्य-सामान्य का उपलक्षण करता है, अतः असत्त्वकाल में भी लक्षण से उपलक्षित लक्ष्य का ज्ञान भ्रम नहीं है, तो सामान्य- रूप व्यक्ति भिन्न-भिन्न होने और सबमें वृत्ति एक कोई उपलक्ष्यतावच्छेदक धर्म न होने से लक्षण उपलक्षण नहीं हो सकता । अतः इससे लक्षण में अनित्यत्व अनुपपन्न है ! इसी प्रकार अन्यत्र भी नित्यत्व का खण्डन जानना चाहिए । जैसे—आकाशादि का नित्यत्व यदि नित्य है, तो आत्माश्रय होगा और यदि अनित्य है, तो आकाशादि भी अनित्य हो जायेंगे । इसी प्रकार नित्यत्वघटित लक्षणान्तरों का भी खण्डन करना चाहिए ।

४४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ विशेष-लक्षण-खण्डनम् के चानेन लक्षणेन व्यवच्छिद्यन्ते । विशेषादय इति चेत्; विशेषा एव केऽभिधीयन्ते ? तत्र ‘नित्येष्वेव द्रव्येष्वेव वर्तन्त एव ये ते विशेषाः’ इत्यलक्षणम्; आत्मत्वा- दिना व्यभिचारात् । नित्यान्तरेऽसत्त्वात् न तत्सर्वत्र नित्ये वर्तते; विशेषास्तु नैवम्, वर्तन्त एवेति नियमादिति चेन्न । प्रतिविशेषमव्याप्त्याऽलक्षणत्वात् । यज्जातीय एवमिति लक्षणार्थ इति चेन्न । जातेरनङ्गीकारात् । जातीयेत्यस्या- पदत्वात् उपाधिरेव तथा विवक्षित इति चेन्न । तस्येतरव्यावृत्तस्यावगतौ व्यर्थ- मिदं तदुपजीवि लक्षणम्, अत एव विजातीयव्यावृत्तिप्रतीतेः । इतरव्यावृत्तस्य वा अनधिगतौ लक्षणस्य दुरवधारणत्वापत्तेः, इतरव्यावृत्ततया तज्जातीयत्वस्याप्रतीतेः । विशेष-लक्षण का खंडन सामान्य के इस लक्षण में प्रविष्ट 'अनेक' विशेषण का व्यवच्छेद्य क्या है ? यदि कहें विशेष ही, तो वे विशेष क्या हैं ? लक्षण न होने से वे अनिर्वचनीय हैं। समर्थन— जो नित्य में ही और द्रव्य में ही रहें, वे विशेष हैं। खंडन— आत्मत्व भी नित्य में ही और द्रव्य में ही रहता है। अतः आत्मत्व में अतिव्याप्ति होने से यह लक्षण असङ्गत है । समर्थन— आत्मत्व सब नित्यद्रव्यों में नहीं रहता । 'सभी नित्यद्रव्यों में जो रहे वह विशेष है,' ऐसा लक्षण करेंगे । एवञ्च आत्मत्व में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन— विशेष भी तत्तद्-व्यक्ति-विश्रान्त होने से सब नित्यों में नहीं रहते, अतः असंभव हो जायगा । समर्थन— जिससे समान जातिवाला सब नित्यों में रहता हो, वह विशेष है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन— विशेष में जाति न होने से जातिघटित उक्त लक्षण अयुक्त है। यदि जाति से उपाधि का ग्रहण करें, तो भी युक्त नहीं। कारण यदि विशेष में वृत्ति इतर- व्यावृत्तत्व उपाधि प्रथम से ज्ञात है, तो उसीसे इतरव्यावृत्तत्वरूप से विशेष का ज्ञान हो जाने से उस उपाधि का उपजीवी यह लक्षण व्यर्थ है। यदि इतरव्यावृत्तत्व रूप से उपाधि का ज्ञान नहीं है, तो इस लक्षण का ज्ञान अशक्य है । कारण इतरव्यावृत्तत्व रूप तज्जातीयत्व की प्रतीति ही नहीं है ।

परिच्छेद ] सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन ४४५ भवतु स एवोपाधिर्लक्षणमिति चेन्न । तस्यानिरुक्तेः । यतो नित्यद्रव्यव्यक्तिषु विश्वव्यावृत्तधीर्योगिनां स विशेष इति चेन्न । स्वरूपधर्मव्यक्तिभेदेष्वपि प्रसङ्गात् । अन्यथा कार्यद्रव्यगुणादिव्यक्तिषु सा तेषां कुतः स्यात् । तास्विव वैधर्म्यान्तरस्य नित्येष्वपि सम्भवात् , विशेषवत् विशेषासम्भवेन लक्ष्यासिद्धिरिति । सम्बन्ध-लक्षण-खण्डनम् अपिच—विशेषादिभ्यो विशेषलक्षणादेर्भेदात् कथं तत्र तत्रैव तैर्विशेषादि- समर्थन—वह उपाधि ही लक्षण हो । खण्डन—यह भी नहीं कह सकते; कारण अद्यावधि उस उपाधि की निरुक्ति ही नहीं हुई । समर्थन—‘नित्य-द्रव्य व्यक्तियों में योगियों को जिससे विश्व-व्यावृत्तत्व-बुद्धि हो, वह विशेष है,’ ऐसा कहेंगे । खण्डन—अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यों तथा गुणों में योगियों को जिस स्वरूपभेद या धर्मभेद से व्यावृत्तत्व-बुद्धि होती है, वे तो विशेष नहीं हैं, अतः उनमें लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अन्यथा ( यदि स्वरूप-भेदादि को व्यावृत्तत्व- बुद्धि का हेतु न मानें, तो ) अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यादि में उन योगियों को व्यावृत्तत्व-बुद्धि कैसे होगी ? यदि कहें, कि ‘विशेष के लक्षण में ही ‘नित्य-द्रव्य में व्यावृत्तत्व-बुद्धि जिससे हो’ ऐसा निवेश है, अतः अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यों में व्यावृत्त-बुद्धि के हेतु स्वरूप-भेदादि में अतिव्याप्ति नहीं होगी,’ तो जैसे अतीन्द्रिय कार्य-द्रव्यों में स्वरूपभेदादि से व्यावृत्तत्व- बुद्धि होती है, वैसे ही नित्य-द्रव्यों में भी व्यावृत्तत्व-बुद्धि हो जायगी । एवञ्च नित्य-द्रव्य में भी विशेष का स्वीकार व्यर्थ है । किञ्च---विशेष में भी बिना विशेष के जैसे स्वरूप- भेद से ही व्यावृत्तत्व-बुद्धि होती है, वैसे ही नित्य-द्रव्यों में भी वह हो जायगी । इसलिए भी विशेष का स्वीकार व्यर्थ ही है । सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन किञ्च—यदि विशेषादि लक्ष्यों से विशेषादि के लक्षणों का भेद है, तो उन विशेषादि लक्ष्यों में ही उन-उन लक्षणों से व्यवहार क्यों होता है, अन्यत्र क्यों नहीं होता ? यदि कहें कि लक्ष्य में लक्षण का सम्बन्ध व्यवहार का नियामक है, तो उस

४४६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ व्यवहारः क्रियताम् , नान्यत्र ? सम्बन्धो नियामक इति चेन्न । सम्बन्धस्यापि सम्बन्धान्तरेण नियामकत्वेऽनवस्थापातात् । अन्यथा त्वनियमात् । तदनिरुक्तेश्च । तथाहि—कः सम्बन्धशब्दार्थः ? समवायादय इति चेत् , सत्यम्; किन्तु केन निमित्तेनेति हि प्रश्नवाक्यतात्पर्यम् —प्रतिस्वं व्यावृत्तेन संयोगत्वादिना, अन्येन वा ? आद्ये अनुगतव्यवहारानुपपत्तिप्रसङ्गः । अस्ति चासौ इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नादि प्रत्यक्षम्, नित्या प्राप्तिः समवाय' इत्यादि । न द्वितीयः ; तस्यैकस्यासम्भवात् । नियामकत्वं तदिति चेन्न । स्वभावस्यापि भवता नियामकत्वाङ्गीकारात् । तथाविधः सोऽपि सम्बन्ध एवेति चेन्न । त्वया सर्वस्वभावनियन्तृताया अवश्यमभ्युपगन्तव्यत्वेन नियामकनिरुक्तिलभ्यसत्त्वादधिकांशासामर्थ्यापत्तेः । सम्बन्ध का भी नियामक यदि अन्य सम्बन्ध मानें, तो अनवस्था हो जायगी । यदि अन्य सम्बन्ध को सम्बन्ध का नियामक न मानें, तो सम्बन्ध का नियम ही नहीं रहेगा । किञ्च—सम्बन्ध की निरुक्ति भी नहीं हो सकती । कहिये—सम्बन्ध शब्द का क्या अर्थ है ? अर्थात् निरुक्ति न होने से वह अनिर्वचनीय है । यदि कहें कि समवाय आदि सम्बन्ध हैं, तो ठीक है; किन्तु 'किस रूप से' यह प्रश्न-वाक्य का तात्पर्य है—क्या प्रतिसम्बन्ध में व्यावृत्त संयोगत्वादि रूप से या सम्बन्धमात्र में विद्यमान किसी अन्य रूप से ? इनमें प्रथम पक्ष मानें, तो सम्बन्धमात्र में अनुगत सम्बन्ध-व्यवहार की उपपत्ति नहीं होगी; ‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानं प्रत्यक्षम्’ इस सूत्र में सम्बन्धवाचक सन्निकर्ष शब्द से संयोग और समवाय दोनों का ग्रहण होता है तथा ‘नित्या प्राप्तिः समवायः’ यहाँ भी सम्बन्धार्थक प्राप्ति-पद से सम्बन्धमात्र का अभिधान होने से अनुगत-व्यवहार देखा जाता है । द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं; कारण सम्बन्धमात्र में अनुगत एकरूपत्व सम्भव नहीं है । समर्थन—नियम का जनक अर्थात् ‘अतिप्रसङ्ग की निवृत्ति का जनक सम्बन्ध है’ ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—अभाव, समवाय आदि की विशिष्ट-बुद्धि में आप स्वरूप को भी नियामक मानते ही हैं । किन्तु वह सम्बन्ध है नहीं, अतः वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—स्वरूप नियम का जनक भी है, अतः वहाँ सम्बन्ध का लक्षण जाना

परिच्छेद ] सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन ४५७ नियम्यस्य च स्वस्यानतिप्रसङ्गेन नियामकत्ववाचोयुक्त्यनुपपत्तेः । अति- प्रसक्तत्वे च तस्यैव नियामकत्वादतिप्रसक्तेन नियमायोगात् । भूत्वा नियमकरणे च प्रागनियतत्वापत्तेः । एवमन्येनापि जन्यनियम्ये । अन्यदपि हि यदि पूर्वं घटादिरूपेणानियतमेव घटादि करोति, तदा पटाद्यपि तथा कुर्यात् । न घटादित्वे नियन्तृत्वमन्यस्य, किन्तु घटादेः कालविशेषयोग इति चेन्न । भूषण ही है, दूषण नहीं । खण्डन—आप स्वरूपमात्र को सम्बन्ध अवश्य मानेंगे; अतः नियामक पदार्थ की नियतपूर्वसत्त्वरूप निरुक्ति का घटक 'सत्त्व' ही सम्बन्ध का लक्षण मानिये, सत्त्व से अधिक अंश व्यर्थ है । किञ्च--स्वरूप अनतिप्रसक्त नियम्य का नियामक नहीं हो सकता, कारण वह स्वतः ही अनतिप्रसक्त है । उसको अतिप्रसक्ति-निवारकरूप नियामक कहना अनुपपन्न है । यदि नियम्य अतिप्रसक्त है तो नियामक भी वही है । अतः अतिप्रसक्त स्वरूप नियमन नहीं कर सकता, कारण अतिप्रसङ्ग का निवारण ही नियमन है । किञ्च—नियम्याकार कार्य है, इसलिए यदि नियामक को उससे अभिन्न मानते हैं तो वह भी कार्य हो गया । एवञ्च यह भी प्रश्न होगा कि वह नियामक उत्पन्न होकर नियमन करता है या अनुत्पन्न ही ? यदि उत्पन्न होकर नियामक है, तो वह आप ही नियम्य है और नियामक भी । अतः वह उत्पत्ति से पूर्व अनियत हो जायगा । यदि उसे उत्पत्ति से पूर्व अनियत मानें, तो उत्पत्ति से उत्तर भी वह अनियत हो जायगा । इसी प्रकार अन्य कारणादि से अन्य कार्यों के नियमन में भी दोष जानने चाहिए । देखिये—यदि अन्य दण्डादि कारण घटादिरूप कार्य से पूर्वकाल में असत् घटादि का नियमन करते हैं, तो वे पटादि का भी नियमन क्यों न करें ? समर्थन—दण्डादि कारण घटादि कार्यों के नियामक नहीं हैं, क्योंकि वे तो सदा नियत ही हैं । किन्तु कालविशेष के सम्बन्ध के नियामक हैं, कारण वह अनियत है । खण्डन—यदि दण्डादि घटादिसम्बन्धी काल के सम्बन्ध का नियमन करते हों, तो घटादि का ही नियमन अर्थात् लब्ध हुआ । अतः पूर्वोक्त दोष हो जायगा ।

परिच्छेद ] सम्बन्ध-लक्षण का खण्डन ४४६ अभूत्वा च करणे व्याघातात् । सम्बन्धिनश्चाऽऽधारत्वात् सम्बन्धस्याऽऽधेयत्वात् तस्यैव तदाधारत्वानुपपत्तेः । नहि सुशिक्षितोऽपि नटबटुः स्वस्कन्धमारुह्य नृत्यति । नाप्यन्यस्यासौ सम्बन्धः ; त्वयैव तथाऽनभ्युपगमात् । स्वभावादेवायमीदृश इति हि स्वभाववादः तत्र परस्य नियमनाभावात् कथं परः सम्बन्धी सङ्गच्छेत । यच्च किञ्चित्सम्बन्धत्वमभिधीयते, तत्समवायेऽपि स्वीकार्यम् । न च समवाया- धारत्वं द्रव्यादिषट्कस्य संभवति । न चोपाधिभावात् स्यात्; संयोगसमवाया- सम्भवात् । स्वभावसम्बन्धस्य च निरस्तत्वात् । न चासावभावोऽपि, प्रतिषेध्यप्रतियोगिभावभेदाभिधानप्रसङ्गात् । सप्तपदार्थी- परिसमाप्तश्च जगत् , परस्परविरोधेन तल्लक्षणव्यवस्थापनादिति । यदि कहें कि असत् कारण नियामक है, तो व्याघात हो जायगा, क्योंकि आप नियम से पूर्व सत् को ही नियामक कहते हैं । किञ्च—सम्बन्धी आधार होता है और सम्बन्ध आधेय । एवञ्च यदि स्वरूप को सम्बन्ध मानें, तो स्व को स्व का आधार मानना पड़ेगा । वह अयुक्त है, कारण सुशिक्षित भी नट का बालक अपने कंधे पर आरूढ़ होकर नृत्य नहीं कर सकता । फिर, अन्य का स्वरूप अन्य का सम्बन्ध नहीं है, कारण आप ऐसा नहीं मानते । स्वरूपतः ही अभावादि नियमित हैं, यह आपका स्वभाववाद है । उस वाद में पर का नियमन न होने से पर सम्बन्धी कैसे होगा ? किञ्च—आप सम्बन्ध का जो भी लक्षण करेंगे, उसका सत्त्व समवाय में भी अवश्य मानना होगा । किन्तु द्रव्यादिकों में से कोई भी समवाय में नहीं रहता । यदि कहें कि प्रमेयत्व के तुल्य उपाधि ही सम्बन्ध का लक्षण है और वह समवाय में रहती है, तो उस लक्षण का भी संयोग या समवायरूप सम्बन्ध समवाय में अवश्य मानना पड़ेगा । किन्तु वह समवाय में नहीं है । इसके अतिरिक्त स्वरूप के सम्बन्धत्व का निरास कर ही चुके हैं । सम्बन्ध का लक्षण अभावरूप भी नहीं है, कारण यदि लक्षण को अभावरूप मानें, तो प्रतिषेध्य भावरूप प्रतियोगी का कथन करना पड़ेगा । अर्थात् भूतल में तादृश ५७

५५० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ आधार-लक्षण-खण्डनम् यदपि नियम्यात् भिन्नं नियामकं तदपि कथं तदेव नियमयति, नान्य- दिति। तदाधारत्वादिति चेत्, कः पुनराधारार्थः ? यत्र स्थीयते तदिति चेन्न । यत्रेति सप्तम्यर्थस्यापि विवेचनीयत्वात् । इहेति प्रत्ययविषय इति चेन्न । तत्रेति प्रत्ययविषयस्यानाधारत्वप्रसङ्गात् । किञ्च प्रत्ययविशेषावगमो विषयविशेषावगमात् । विषयविशेषावगमश्च प्रत्ययविशेषावगमादिति व्यक्तमन्योन्याश्रयः । समवायीति चेत् ; 'शशे शृङ्गाभावः', 'कुण्डे बदरम्' इत्याद्यव्याप्तेः। गौणस्तत्र प्रतियोगी का अभाव रहते हुए भी सम्बन्धत्व-व्यवहार नहीं होता, वह होने लगेगा। यदि कहें कि उस सम्बन्ध को सप्त पदार्थ से अन्य ही मानें, तो वह भी ठीक नहीं। कारण सारा जगत् सात पदार्थों में ही अन्तर्भूत है, क्योंकि तुम्हारे मत से परस्पर विरुद्ध धर्मों के बीच एक का निषेध होने पर अपर का विधान नियत मानकर ही सप्त- पदार्थों के लक्षण किये गये हैं। आधार-लक्षण का खण्डन नियम्य से भिन्न जो नियामक सम्बन्ध है, वह भी उसीका कैसे नियमन करता है, अन्य का नियमन क्यों नहीं करता ? यदि कहें कि उसका आधार होने से उसी- का नियमन करता है, तो आधार क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से आधार अनिर्वचनीय है, फिर उससे अन्य का नियम कैसे होगा ? समर्थन—'जिसमें वस्तु स्थित होती है, वह आधार है' यह आधार का लक्षण हो ही सकता है । खंडन—'यत्र' इस सप्तमी का क्या अर्थ है, इसका विवेचन करना होगा। समर्थन—'इह' इत्याकारक ज्ञान का विषय सप्तम्यर्थ है । खण्डन—तब तो 'तत्र' इस ज्ञान का विषय सप्तम्यर्थ ( आधार ) नहीं कहलायेगा । किञ्च—ज्ञान-विशेष का ज्ञान अर्थात् 'यह ज्ञान भ्रम है, यह प्रमा है' ऐसा निश्चय विषय-विशेष के निश्चय से होता है और आपके मत में विषय-विशेष ( आधार ) का निश्चय होगा ज्ञान विशेष ( प्रमा ) से, अतः अन्योन्याश्रय स्पष्ट ही है। समर्थन—'समवायी ( समवाययुक्त ) आधार है' ऐसा कहेंगे । खंडन—'शशे शृङ्गाभावः, कुण्डे बदरम्' इत्यादि स्थलों में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें

परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५१ प्रयोग इति चेत् ; नैतावन्मात्रम्, 'प्रत्ययश्च भ्रान्तः' इत्यपि वक्तव्यमवशिष्यते भवतः। ओमिति चेत् ; अथ विपरीतमेव कुतो न स्यात् । 'शशे विषाणं नास्ती'ति च यदि विशेषणाभावाधिकरणत्वप्रतीतिर्भ्रान्ता, शृङ्गस्य तर्हि शशोऽधिकरणं स्यात् । भावाभावयोरन्यतरनिषेधस्य अन्यतरविधिपर्यवसायित्वेनाभ्युपगमात् । पतनप्रतिबन्धकमधिकरणमिति चेन्न। अवयविनं गुणादिकञ्च प्रति तदभावात् । अव्यवहिताधःस्थितमिति चेन्न । गुणाद्यपेक्षया गुणवदादेरधःस्थितत्वे प्रमाणाभावात् । अविशेषेण वाऽवयविगुणादीनामवयवाधारत्वप्रसङ्गात् । ऊर्ध्व- स्थितस्य संयोगिनः संयोगं प्रति च तदभावात् । सूत्रावलम्बितद्रव्यादौ बहुलं व्यभिचारात् । यद्येकोऽधिकरणार्थो नोपपद्यते, तर्हि अक्षशब्दार्थवद्भिन्न एवास्त्विति चेत्; कि यह प्रयोग गौण है, तो इतना ही नहीं, यह भी कहिये कि 'यह ज्ञान भी भ्रम है। यदि ऐसा भी (उक्त प्रतीति को भ्रम) मान लें, तो हम पूछते हैं कि विपरीत ही क्यों न मानें ? अर्थात् 'घटे घटत्वम्' इस प्रतीति को भ्रम तथा 'शशे शृङ्गाभावः' इस प्रतीति को प्रमा क्यों न मानें ? किञ्च—यदि 'शशे शृङ्गाभावः' इस प्रतीति को भ्रम मानें, तो 'शशे शृङ्गम्' यह प्रमा हो जायगी । कारण भाव-अभाव दोनों के बीच एक का निषेध अन्य की विधि में पर्यवसित होता है ! समर्थन—'पतन का प्रतिबन्धक अधिकरण है' ऐसा लक्षण करेंगे। खंडन —अव- यवी के पतन का प्रतिबन्धक अवयव तथा गुण के पतन का प्रतिबन्धक गुणी नहीं होता । अतः उनके वे अधिकरण नहीं होंगे, अर्थात् उनमें अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'अव्यवहित ( व्यवधान से रहित ) जो अधःस्थित हो, वह आधार है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—गुण तथा अवयवी की अपेक्षां गुणी तथा अवयव अधःस्थित हैं, इसमें कोई प्रमाण नहीं । किञ्च—विशेष न होने से अवयवी के गुणों के आधार अवयव हो जायेंगे । किञ्च—ऊर्ध्वस्थित घटादि भूतल-घटसंयोग के आधार न कह- लायेंगे । किञ्च—सूत्र आदि में अवलम्बित कन्दुक ( गेंद ) आदि के सूत्रादि आधार नहीं कहलायेंगे । समर्थन—यदि 'अधिकरण' शब्द का एक अर्थ उपपन्न नहीं होता, तो 'अक्ष'-

आश्रयासिद्ध्यादिभेदप्रसङ्गात् । सोऽपि स्वीकार्य इति चेन्न । असिद्ध्यादिविधा- परिगणनस्य व्यवहारतोऽन्यथाभावप्रसङ्गात् । क्वचिदाश्रयस्य समवायित्वात् क्वचिच्चाभावं समवायञ्च हेतुं प्रति तदसम्भवात् । एकस्य च तेषामुपसङ्ग्राहकस्य वक्तुमशक्यत्वात् । बहव एवाऽऽश्रयशब्दार्थाः, आश्रयासिद्ध्यादयोऽपि पृथक् पृथगेव बहवः । असिद्धभेदपरिगणनग्रन्थोऽप्यन्यथाकारं बोद्धव्यो बाधदर्शनादिति चेन्न । तथापि 'इह कुण्डे बदरम्'त्यत्र क आधारार्थ इति वक्तव्यम् । न तावत्पतनप्रतिबन्धकत्वम् , सहैव कुण्डेन पतति बदरे तदसम्भवात् । नापि संयोगित्वम् ; वैपरीत्यस्यापि प्रसङ्गात् । शब्द की तरह उसे अनेकार्थ१ ही मानें तो क्या हानि है ? खण्डन—आश्रयासिद्धि, व्यभिचार आदि के परिगणित भेदों का व्यवहारतः अन्यथाभाव हो जायगा । अर्थात् उनके लक्षणों में आधार या अधिकरण शब्द प्रविष्ट होने से उसे नानार्थ मानने पर आश्रयासिद्धि, व्यभिचार आदि भी अनेक हो जायेंगे । यदि आश्रयासिद्धि आदि के अनेक भेद मानलें, तो न्यायशास्त्र में असिद्ध्यादि के तीन प्रकार से परिगणन का जो व्यवहार है, उससे विरोध हो जायगा । कारण 'इदं द्रव्यं कर्मणः' यहाँ आश्रय समवायीरूप है । 'शब्दो नित्यः अकृतकत्वात्' तथा 'पृथिवी इतरभिन्ना गुणसमवायात्' यहाँ आश्रय के ही अनेकरूप होने से एकरूप आश्रय न रहा—सब आधारों का उपसंग्राहक एकरूप नहीं रहा । समर्थन—'आश्रय शब्द के बहुत-से अर्थ हैं । आश्रयासिद्धि भी पृथक्-पृथक् अनेक ही हैं। असिद्धिभेदों की गणनापरक ग्रन्थ का भी रूपान्तर से व्याख्यान कर कर लेना चाहिए । अर्थात् आधार की निरुक्ति में उक्त बाध होने से लक्षणा द्वारा 'स्वरूपासिद्धि और व्याप्यत्वासिद्धि से अन्य असिद्धि आश्रयासिद्धि है' यही कहना चाहिए । खण्डन—तब भी 'इह कुण्डे बदरम्' यहाँ आधार शब्द का क्या अर्थ है, यह कहना होगा । किञ्च—जहाँ कुण्ड के साथ ही बदर गिरते हैं, वहाँ कुण्ड बदर का अधिकरण न कहलायेगा । संयोगित्व भी आधार नहीं है, कारण कुण्ड का संयोग बदर में भी है । अतः बदर भी कुण्ड का आधार हो जायगा । १. अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति या ज्ञप्ति ( ज्ञान ) के लिए जिसके द्वारा जो अपेक्षित होता है, वह आधार है, इस प्रकार नानार्थक ही 'आधार' शब्द मानेंगे ।

४. चतुर्थ परिच्छेद: उपमान, शब्द, अभाव, समवाय, भेद-खण्डन एवं अद्वैत उपसंहार

परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५३ संयोगित्वे सत्यधःस्थितत्वं तत्राधिकरणार्थ इति चेन्न। तस्मिन् सत्यप्यन्यत्र चरणतलमिलितधूलीपटलादौ अधिकरणप्रतीत्यनुपपत्त्या, प्रत्युत चरणतले धूलीत्येव प्रतीत्या आधारत्वप्रतीतौ व्यभिचारित्वेन प्रकृतेऽपि तथास्वीकारानुपपत्तेः । न सार्वत्रिकोऽयमाधारार्थः, किन्तु क्वाचित्को नानारूपाधारत्ववादिपक्ष इति चेन्न। भवत्वन्यत्र अन्यस्याऽऽधारार्थत्वम्; तस्य त्वाधारार्थत्वं नोपपद्यते, अनाधारप्रतीतिविषयेऽपि सत्त्वादित्युक्तेः। आधेयापेक्षया महत्परिमाणत्वे सतीति चेन्न । करतलस्थिततूलराश्यादौ तद- सम्भवात् , अन्यस्य च तत्राऽऽधारार्थस्य वक्तुमशक्यत्वात् । अधःशब्दार्थस्य च वक्तुमशक्यत्वात् । पतनाभिमुखदिगवस्थितत्वमिति चेन्न। पतनार्थस्य गमनाधिकस्याधःशब्दार्थ- समर्थन—'संयोगी होकर जो अधःस्थित हो, वह आधार है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर 'कुण्डे बदरम्' यहाँ निर्वाह होने पर भी चरणतल में मिलित धूलीपटल में अव्याप्ति हो जायगी । 'धूलीपटले चरणतलम्' ऐसा व्यवहार नहीं होता, इससे विपरीत 'चरणतले धूलिः' यही व्यवहार होता है। अतः यह लक्षण युक्त नहीं है । खण्डन—आधार को नानारूप माननेवालों के पक्ष में यह आधार का लक्षण सार्वत्रिक नहीं, किन्तु कादाचित्क ही है। प्रकृत में यही आधार पदार्थ हो । खंडन—भले ही अन्यत्र आधार का अन्य अर्थ हो, किन्तु वह आधार पद का शक्यतावच्छेदक नहीं हो सकता । कारण वह अनाधारप्रतीति-विषय धूलीपटल आदि में होने से अतिप्रसक्त है, यह हम कह ही चुके हैं। समर्थन—'आधेय की अपेक्षा जो महत्परिमाण होकर अधःस्थित संयोगी हो, वह आधार है' ऐसा कहेंगे । चरणतल-मिलित धूलि में महत्परिमाण न होने से अति- व्याप्ति नहीं है । खण्डन—करतलस्थित तूल-राशि में अव्याप्ति हो जायगी; कारण तूल- राशि की अपेक्षा करतल में महत्परिमाण नहीं है । फिर, तूल-राशि का करतल में अन्य प्रकार का आधारत्व भी हो नहीं सकता । किञ्च—'अधःस्थितत्व'घटक अधःशब्दार्थ का भी आप निर्वचन नहीं कर सकते । समर्थन—'पतन की अभिमुख दिशा में जो अवस्थित हो, वही अधःस्थित है ।'

आश्रयासिद्ध्यादेर्भेदप्रसङ्गात् । सोऽपि स्वीकार्य इति चेन्न । असिद्ध्यादिविधा- परिगणनस्य व्यवहारतोऽन्यथाभावप्रसङ्गात् । क्वचिदाश्रयस्य समवायित्वात् क्वचिच्चाभावं समवायञ्च हेतुं प्रति तदसम्भवात् । एकस्य च तेषामुपसङ्ग्राहकस्य वक्तुमशक्यत्वात् । बहव एवाऽऽश्रयशब्दार्थाः, आश्रयासिद्ध्यादयोऽपि पृथक् पृथगेव बहवः । असिद्धभेदपरिगणनग्रन्थोऽप्यन्यथाकारं बोद्धव्यो बाधदर्शनादिति चेन्न । तथापि 'इह कुण्डे बदरमि'त्यत्र क आधारार्थ इति वक्तव्यम् । न तावत्पतनप्रतिबन्धकत्वम् , सहैव कुण्डेन पतति बदरे तदसम्भवात् । नापि संयोगित्वम् ; वैपरीत्यस्यापि प्रसङ्गात् । शब्द की तरह उसे अनेकार्थ १ ही मानें तो क्या हानि है ? खण्डन—आश्रयासिद्धि, व्यभिचार आदि के परिगणित भेदों का व्यवहारतः अन्यथाभाव हो जायगा । अर्थात् उनके लक्षणों में आधार या अधिकरण शब्द प्रविष्ट होने से उसे नानार्थ मानने पर आश्रयासिद्धि, व्यभिचार आदि भी अनेक हो जायँगे । यदि आश्रयासिद्धि आदि के अनेक भेद मानलें, तो न्यायशास्त्र में असिद्ध्यादि के तीन प्रकार से परिगणन का जो व्यवहार है, उससे विरोध हो जायगा । कारण 'इदं द्रव्यं कर्मणः' यहाँ आश्रय समवायीरूप है । 'शब्दो नित्यः अकृतकत्वात्' तथा 'पृथिवी इतरभिन्ना गुणसमवायात्' यहाँ आश्रय के ही अनेकरूप होने से एकरूप आश्रय न रहा—सब आधारों का उपसंग्राहक एकरूप नहीं रहा । समर्थन—'आश्रय शब्द के बहुत-से अर्थ हैं । आश्रयासिद्धि भी पृथक्-पृथक् अनेक ही हैं। असिद्धिभेदों की गणनापरक ग्रन्थ का भी रूपान्तर से व्याख्यान कर कर लेना चाहिए । अर्थात् आधार की निरुक्ति में उक्त बाध होने से लक्षणा द्वारा 'स्वरूपासिद्धि और व्याप्यत्वासिद्धि से अन्य असिद्धि आश्रयासिद्धि है' यही कहना चाहिए । खण्डन—तब भी 'इह कुण्डे बदरम्' यहाँ आधार शब्द का क्या अर्थ है, यह कहना होगा । किञ्च—जहाँ कुण्ड के साथ ही बदर गिरते हैं, वहाँ कुण्ड बदर का अधिकरण न कहलायेगा । संयोगित्व भी आधार नहीं है, कारण कुण्ड का संयोग बदर में भी है । अतः बदर भी कुण्ड का आधार हो जायगा । १. अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति या ज्ञप्ति (ज्ञान) के लिए जिसके द्वारा जो अपेक्षित होत है, वह आधार है, इस प्रकार नानार्थक ही 'आधार' शब्द मानेंगे ।

परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५३ संयोगित्वे सत्यधःस्थितत्वं तत्राधिकरणार्थ इति चेन्न । तस्मिन् सत्यप्यन्यत्र चरणतलमिलितधूलीपटलादौ अधिकरणप्रतीत्यनुपपत्त्या, प्रत्युत चरणतले धूलीत्येव प्रतीत्या आधारत्वप्रतीतौ व्यभिचारित्वेन प्रकृतेऽपि तथास्वीकारानुपपत्तेः । न सार्वत्रिकोऽयमाधारार्थः, किन्तु क्वाचित्को नानारूपाधारत्ववादिपक्ष इति चेन्न । भवत्वन्यत्र अन्यस्याऽऽधारार्थत्वम्; तस्य त्वाधारार्थत्वं नोपपद्यते, अनाधारप्रतीतिविषयेऽपि सत्त्वादित्युक्तेः । आधेयापेक्षया महत्परिमाणत्वे सतीति चेन्न । करतलस्थिततूलराश्यादौ तद्- सम्भवात् , अन्यस्य च तत्राऽऽधारार्थस्य वक्तुमशक्यत्वात् । अधःशब्दार्थस्य च वक्तुमशक्यत्वात् । पतनाभिमुखदिगवस्थितत्वमिति चेन्न । पतनार्थस्य गमनाधिकस्याधःशब्दार्थ- समर्थन—‘संयोगी होकर जो अधःस्थित हो, वह आधार है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—ऐसा लक्षण करने पर 'कुण्डे बदरम्' यहाँ निर्वाह होने पर भी चरणतल में मिलित धूलीपटल में अव्याप्ति हो जायगी । 'धूलीपटले चरणतलम्' ऐसा व्यवहार नहीं होता, इससे विपरीत 'चरणतले धूलिः' यही व्यवहार होता है । अतः यह लक्षण युक्त नहीं है । खण्डन—आधार को नानारूप माननेवालों के पक्ष में यह आधार का लक्षण सार्वत्रिक नहीं, किन्तु कादाचित्क ही है । प्रकृत में यही आधार पदार्थ हो । खंडन—भले ही अन्यत्र आधार का अन्य अर्थ हो, किन्तु वह आधार पद का शक्यतावच्छेदक नहीं हो सकता । कारण वह अनाधारप्रतीति-विषय धूलीपटल आदि में होने से अतिप्रसक्त है, यह हम कह ही चुके हैं । समर्थन—‘आधेय की अपेक्षा जो महत्परिणाम होकर अधःस्थित संयोगी हो, वह आधार है' ऐसा कहेंगे । चरणतल-मिलित धूलि में महत्परिणाम न होने से अति- व्याप्ति नहीं है । खण्डन—करतलस्थित तूल-राशि में अव्याप्ति हो जायगी; कारण तूल- राशि की अपेक्षा करतल में महत्परिमाण नहीं है । फिर, तूल-राशि का करतल में अन्य प्रकार का आधारत्व भी हो नहीं सकता । किञ्च—'अधःस्थितत्व'घटक अधःशब्दार्थ का भी आप निर्वचन नहीं कर सकते । समर्थन—'पतन की अभिमुख दिशा में जो अवस्थित हो, वही अधःस्थित है ।'

५५४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ व्यतिरेकेण निर्वक्तुमशक्यत्वात् । अत एवाधःशब्दार्थस्य दुर्वचत्वमधिगम्य अद्वैतवादिना गुरुणा शिष्याय खण्डनमुपाचक्षाणेन भगवता पराशरेणाभिहितम्— ‘अधःशब्दनिगद्यं किं किञ्चोर्ध्वमभिधीयते ।’ पृथिव्यभिमुखी दिगधःशब्दार्थ इति चेन्न । ऊर्ध्वशब्दार्थस्यापि पृथिव्यभि- मुख्यत्वसम्भवात् । यदपेक्षया पृथिव्यभिमुखी या दिक् तदपेक्षया साऽध इति चेन्न । यदपेक्ष- येति किं यमवधीकृत्येति विवक्षितम्, उत यदीयाभिमुख्यव्यवस्थितेति ? आद्ये पृथिव्यूर्ध्वस्थितं पदार्थमवधीकृत्य योर्ध्वा दिगिति भवद्भिर्व्यवह्रियते, साऽपि पृथि- व्यभिमुखी भवतीति साऽप्यधः स्यात् । अत एव न द्वितीयोऽपि । खण्डन—गमन से अधिक पतन-पदार्थ का अधःशब्द के निर्वचन के बिना निर्वचन ही नहीं हो सकता । अर्थात् अधःसंयोगानुकूल व्यापार ही पतन-पदार्थ होने से जबतक अधःशब्द के अर्थ का निर्वचन न हो, तबतक पतनार्थ का निर्वचन नहीं हो सकता । फलतः अन्योन्याश्रय हो जायगा । अधःशब्दार्थ को दुर्वच जान- कर ही अद्वैतवादी गुरु ऋभु ने शिष्य निदाघ को जो खण्डन का उपदेश किया था, उसी- का अनुवाद करते हुए पराशर मुनि ने कहा है कि ‘अधःशब्द का क्या अर्थ है और ऊर्ध्व शब्द का क्या अर्थ है ? कुछ नहीं, अर्थात् अधः-ऊर्ध्वशब्दार्थ अनिर्वचनीय हैं ।’ समर्थन—‘उपरिस्थित पदार्थ की अपेक्षा पृथिवी की अभिमुख दिशा अधःशब्द का अर्थ है ।’ खण्डन—‘ऊर्ध्व’ शब्द का अर्थ भी पृथिवी की अभिमुख दिशा ही है, अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । अर्थात् एक-एक ऊर्ध्वदेश से दूसरा ऊर्ध्वदेश पर होता ही है । एवञ्च ऊर्ध्वदेश भी ऊर्ध्वदेशान्तर की अपेक्षा पृथिवी के अभिमुख है ही, अतः वहाँ अतिव्याप्ति है । समर्थन—‘जिन मार्तण्ड-मण्डलादि की अपेक्षा पृथिवी की अभिमुख जो दिशा हो, उसकी अपेक्षा वह दिशा अधःशब्द का अर्थ है ।’ एवञ्च अतिव्याप्ति नहीं है, पूर्व पूर्व दिशा को उत्तरोत्तर की अपेक्षा अधोरूप हम मानते ही हैं । खंडन—यहाँ ‘अपेक्षा’ शब्द का क्या अर्थ है, अवधिमात्र अर्थ है या अभिमुख ? प्रथम पक्ष में पृथिवी के ऊपर स्थित जो घटादि पदार्थ हैं, तदवधिक अभिमुखत्व ऊर्ध्वस्थित मार्तण्ड- मण्डल को भी है । अतः उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । द्वितीय पक्ष में भी मार्तण्ड-मण्डल से ऊर्ध्वदेश भी अधः कहा जायगा । कारण उसमें पृथिवी का जैसा आभिमुख्य है, वैसे ही मार्तण्ड-मण्डल का भी आभिमुख्य है ।

परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५५ यस्यां दिशि क्रियया पृथ्‍वी सन्निहिता भवति, सा दिगध इति चेन्न । कूपादौ मध्यगतस्य तिर्यग्दोलायमानस्य क्रिया पतनं स्यात्, तद्गत्याक्रान्ता च तिर्यग्- दिगधः स्यात् । पृथिवीमवधीकृत्य यं चान्यं पदार्थमवधीकृत्य यो मध्य इति देशो व्यवहि- यते, स पृथिव्यतिरिक्ततदवध्यपेक्षयाऽध इति चेन्न। पृथिव्यामेव तद्व्यवहारापत्तेः। पृथिवीं पदार्थान्तरञ्चापेक्ष्य मध्यत्वस्य विवक्षितस्याधःशब्दार्थप्रदर्शनमन्त- रेण निर्वक्तुमशक्यत्वात् । पृथिव्यपेक्षयोर्ध्वं परापेक्षया चाधः, तत्र तयोर्मध्य- मित्येवं निरुच्यते मध्यत्वम्; अन्यथा तिर्यगपि प्रसङ्गात् । तथथा—पृथिव्यपेक्षया पूर्वमपरापेक्षया च पश्चिमं तयोर्मध्यमुच्यते, प्रतीपदिगवस्थितयोः परस्परापेक्षया प्रतीपदिक्सङ्करे मध्यव्यवहारात् । समर्थन—'जिस दिशा में क्रिया से पृथ्वी सन्निहित हो, वह दिशा अधःशब्दार्थ है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—कूपादि के मध्यगत टेढ़े दोलायमान जो घण्टादि हैं, उनकी क्रिया भी पतन हो जायगी और उस क्रिया से सन्निहित तिर्यग् अधः हो जायगा । समर्थन—'पृथ्वी को अवधि कर तथा अन्य पदार्थ को अवधि कर जो मध्य प्रदेश कहा जाता है, वह देश पृथ्वी से इतर अवधि की अपेक्षा अधःशब्द का अर्थ है।' खण्डन—पृथ्वी में मध्य-व्यवहार नहीं होगा, कारण पृथ्वी और इतर अवधि की अपेक्षा पृथ्वी मध्यदेश नहीं है । अतः पृथ्वी उस अवधि की अपेक्षा अधः नहीं कहलायेगी । किञ्च—पृथ्वी और पदार्थन्तर की अपेक्षा विवक्षित मध्यत्व का लक्षण अधःशब्द के निर्वचन के बिना हो नहीं सकता । 'पृथ्वी की अपेक्षा ऊर्ध्व और अन्य अवधि से अधः दोनों की अपेक्षा मध्य है' यही मध्यत्व का लक्षण कहना होगा । एवञ्च मध्य से अधः का और अधः से मध्य का लक्षण होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । यदि अधः- शब्द से घटित विवक्षित मध्य का लक्षण न करें, तो तिर्यग् देश भी मध्य कहा जाने लगेगा । देखिये—ऊर्ध्व पृथ्वी देश की अपेक्षा पूर्व और इतर अवधि की अपेक्षा पश्चिम उन दोनों की अपेक्षा मध्य है, कारण विरुद्ध दो दिशाओं में स्थित दो पदार्थों के परस्पर की अपेक्षा विरुद्ध दिशाओं का सङ्कर (पूर्व-पश्चिमरूप) ही मध्य है। यदि इसीको विवक्षित मध्य कहें, तो इतर अवधि की अपेक्षा तिर्यग्-देशरूप जो मध्य- देश है, वह भी अधः कहा जाने लगेगा । एवञ्च अधस्त्व का निरूपण न हो सकने से 'अधःस्थितत्वे सति संयोगित्व'रूप आधारत्व का लक्षण नहीं बन सकता ।

४५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ अथान्यः कश्चिदाधारार्थोऽस्तु प्रतीतिसिद्धत्वात्, प्रतीतेश्चैवमनन्योपपाद्यत्वात् । मैवम्; तदनित्यं वा स्यात् नित्यं वा ? नाद्यः; तदभावे आधारप्रतीत्यभाव- प्रसङ्गात्, गोत्वादिनित्यत्वन्यायसाम्येऽपि अस्यानित्यत्वे तेषामप्यनित्यत्वापाताच्च । नापि द्वितीयः; तादृशमप्यनुगतमननुगतं वा स्यात् ? द्वितीये अनुगताधारप्रतीत्य- सम्भवः, सङ्केतग्रहाशक्यत्वञ्च । प्रथमे सामान्यवदाश्रयापरित्यागि वा स्यात् तत्त्यागि वा ? आद्ये यदेव तदाधारतया प्रतीत तत्दाधेयं न स्यात् । द्वितीयेऽपि च यदि नियामक मन्तरेण तत्स्वाश्रयं भजति त्यजति च, तदा नियमानुपपत्त्या सर्वदा तद्भजनत्यजनोचितप्रत्ययव्यवहारप्रसङ्गः । अथ तस्याऽऽश्रयभजनत्यजनयोर्नियामकोऽस्ति; तर्हि स वक्तव्यः । सोऽपि समर्थन—सर्वानुभव सिद्ध 'इह' इत्याकारक प्रतीति आधार की कल्पना के बिना अनुपपन्न होगी । अतः उक्त प्रतीति की अन्यथानुपपत्ति से ही आधार की कल्पना करेंगे । वह आधार किम्-रूप है, इसके निर्णय से हमें कुछ प्रयोजन नहीं। खंडन— उस आधारत्व को अनित्य मानेंगे या नित्य ? प्रथम कल्प युक्त नहीं; कारण यदि अनित्य मानें, तो कदाचित् उसका अभाव भी अवश्य मानना पड़ेगा । एवञ्च आधारत्व के अभाव-काल में आधार की प्रतीति नहीं होगी । किन्तु आधार की प्रतीति सर्वदा होती है। किञ्च—गोत्वादि जाति के नित्यत्व की साधक युक्तियों ( अनुगतप्रतीतिविषयत्व, अनौपाधिकत्व या सर्वदा प्रतीयमानत्वरूप ) की तरह यहाँ भी तुल्य युक्ति होने पर भी यदि आधारत्व को अनित्य मानें, तो गोत्वादि जातियाँ भी अनित्य हो जायँगी । द्वितीय कल्प में भी आधारत्व अनुगत है या अननुगत है ? यदि अननुगत है, तो आधारमात्र में अनुगत एक धर्म न होने से अनुगत आधार की प्रतीति नहीं होगी । सिवा संकेत ( शब्दार्थ-सम्बन्ध ) का ज्ञान भी नहीं होगा । यदि अनुगत मानें, तो वह ( आधारत्व ) सामान्य की तरह आश्रय का अपरित्यागी है या परित्यागी ? आद्य पक्ष में जो जिस काल में आधारत्वरूप से प्रतीत होता है, वही उसी काल में आधेयत्वरूप से प्रतीत नहीं होगा । द्वितीय पक्ष में यदि नियामक के बिना ही वह आधारत्व आधार को त्यागता और ग्रहण भी करता है, तो सर्वदा प्राप्ति-त्याग के उचित प्रतीति या व्यवहार होना चाहिए । अर्थात् सर्वदा 'आधारः, न आधारः' दोनों व्यवहार या प्रतीतियाँ होने लगेंगी । समर्थन—उस आधारत्व के आश्रय के प्राप्ति-त्याग में नियामक है। खण्डन—तो उन नियामक को कहिये । यदि कहें कि आधारत्व की प्रतीति की अन्यथानुपपत्ति से

परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५७ कल्पयिष्यते, अन्यथा आधारप्रतीत्यनुपपत्तिरिति चेन्न । तत्परिकल्पने यदेव भजने नियामकं स एवाऽऽधारार्थोऽस्तु, कृतं पूर्वपरिकल्पितेनेति । अस्त्वेवमेवेति चेन्न । तस्यापि स्वाश्रयभजनत्यजननियामकस्यावश्य- वाच्यत्वे तस्यापि चैवं वैयर्थ्यमित्यधिकापरिकल्पने नियमानुपपत्तिः । अधिक- परिकल्पने च पूर्वपूर्ववैयर्थ्यप्रसङ्ग इति दुरुत्तरं व्यसनमापद्येत । परस्परेण परस्परस्य नियामकत्वमिति चेत्; अन्योन्याश्रयिणावर्थावपि परस्पराकर्षकभावव्यवस्थया सुस्थीकुरु, ततो दास्यामस्त्वोत्तरम् । जात्यादयोऽपि तर्ह्येवमनुपपन्ना इति चेत् । न उच्चैर्वक्तव्यं यदि कोऽपि शृणोति, तदा महदनिष्टमस्माकं प्रकाशीकृतं स्यात् । उस नियामक की कल्पना करेंगे, तो जो प्राप्ति-त्याग में नियामक है, वही आधारत्व रहे । पूर्वकल्पित आधारत्व व्यर्थ है । यदि कहें कि ऐसा ही रहे, तो उसके भी आश्रय के प्राप्ति-त्याग में नियामक अवश्य वक्तव्य होने पर पूर्वोक्त प्रकार से पूर्व नियामक व्यर्थ है। इस प्रकार अधिका- धिक नियामक की कल्पना न करें, तो नियम नहीं होगा । यदि करे; तो पूर्व-पूर्व नियामक व्यर्थ हो जायगा । इस प्रकार अनिवार्य दुःख-परम्परा प्राप्त हो जायगी । समर्थन — पूर्व नियामक से उत्तर का और उत्तर नियामक से पूर्व का नियमन होगा । अतः न तो अनियमन है और न उत्तरोत्तर से पूर्व-पूर्व का वैयर्थ्य । खंडन — जब उत्तर स्वयं पूर्व से नियमित हो ले, तब पूर्व का नियम करेगा और पूर्व भी उत्तर से स्वयम् नियमित हो ले, तो उत्तर का नियमन करेगा, इस प्रकार अन्योन्याश्रय हो जायगा । पहले आप इस अन्योन्याश्रय का निवारणकर आधारत्व को सुस्थिर करें, फिर हम आपको उत्तर देंगे । समर्थन — तब तो जाति आदि के भी आश्रयों के प्राप्ति-त्याग में किसी नियामक की कल्पना करनी होगी, फलतः उक्त प्रकार से जाति आदि भी व्यर्थ हो जायेंगे । यदि नियामक की कल्पना न करें, तो उस व्यक्ति से अन्यत्र भी उस जाति का व्यवहार होने लगेगा । खंडन — जोर से (उच्च स्वर से) न कहिये । यदि कोई अन्य मतवाला यह सुन लेगा, तो हम वैदिकों का महान् उपहास होगा । अर्थात् पदार्थमात्र के अनिर्वचनीयत्व- वादी हमारे मत में जाति का खण्डन भी इष्ट ही है। अतः इसी युक्ति से जाति का भी खण्डन समझ लें । ५८

४५८ आधार-लक्षण का खण्डन [ चतुर्थ किञ्च—यत्तदाधारत्वं तत् साधारमनाधारं वा ? अन्त्ये क्व स्वविशिष्ट- प्रत्ययं कुर्यात्, विशेषाभावात् । आद्ये तदाधारत्वं वाच्यम् । स्वरूपमेव तादृशं तस्य, येन स्वयं सत्ता स्वात्मनि सत्ताप्रत्ययकारिणी सत्तान्तरमन्तरेण यथा तथेदमपि विनैव आधारान्तरमाधारप्रत्ययकारीति चेन्न । भ्रान्तित्वप्रसङ्गात् । यथा विना रजतत्वं तत्प्रत्ययो भ्रान्तिस्तथैव स्यात् । उपपाद्य- श्चायमर्थो भेदखण्डनप्रस्ताव इत्युपरम्यते । विनाऽप्याधाराधेयभावं स्वभावसम्बन्धेन नियामकत्वं भविष्यति, यथा विषयविषयिभावेनार्थज्ञानयोरिति चेन्न । स्वभावसम्बन्धस्य निरस्तत्वात् । विषय-विषयिभाव-लक्षणखण्डनम् यमुदाहरसि च विषयविषयिभावं सोऽपि वक्तुं न शक्यते । तथाहि—कः पुनर्ज्ञानादेर्घटादिना विषयविषयिभावः ? किञ्च—जो वह आधारत्व है, वह साधार है अथवा आधाररहित ? यदि उसे आधाररहित मान, तो आधारत्व की प्रतीति कहाँ होगी; कारण आधारत्व विशिष्टरूप- विशेष नहीं है । यदि आधारत्व का भी आधार मानें, तो आधारत्वरूप जो आधेय है, उसके आधारत्व का निर्वचन करना चाहिए । अर्थात् आधारत्व का आधारत्व, उसका आधारत्व, इस तरह अनवस्था होने से आधारत्व को साधार भी नहीं मान सकते । समर्थन—आधारत्व का स्वरूप ही ऐसा है कि जैसे सत्ता अन्य सत्ता के बिना ही स्व में सत्ता-प्रतीति का कारण है, वैसे ही आधारत्व भी अन्य आधारत्व के बिना ही स्व में आधारत्व-व्यवहार का कारण होगा । खण्डन—तब तो आधार-प्रतीति भ्रान्ति हो जायगी । अर्थात् जैसे बिना रजतत्व के रजत का ज्ञान भ्रम है, वैसे ही आधारत्व के बिना आधार का ज्ञान भ्रम होगा । इसका उपपादन हम भेद-खण्डन के प्रसंग में करेंगे । समर्थन—आधारत्व के साथ आधाराधेयभाव न होने पर भी स्वरूप पर- सम्बन्ध से वह नियामक होगा, जैसे कि अर्थ ज्ञान का विषय विषयिभाव से नियमन करता है । खण्डन—स्वरूपसम्बन्ध का खण्डन हो ही चुका है । विषय-विषयिभाव-लक्षण का खण्डन फिर, जिस विषय-विषयिभाव का कथन करते हैं, उसका भी उपपादन आप नहीं

परिच्छेद ] विषय विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४५६ प्रकाशस्य सतस्तदीयतामात्ररूपः स्वभावविशेष इति चेन्न । इच्छादिविषया- व्यापनात् । विषयिण इति चेन्न । तत्त्वस्यैव निरूप्यमाणत्वात् । किञ्च स्वभावः स्वधर्मो वा स्वात्मा वा तस्य विवक्षितः ? आद्ये ज्ञानत्वादिकं वा साधारणमसौ, तत्तद्धटज्ञाननियतो वा कश्चित् ? आद्ये साधारणान्न विशेषतस्त- दीयतामात्ररूपत्वसम्भवः । द्वितीये तु प्रतिविषयं व्यावृत्तज्ञानधर्मस्वीकारे वचन- भङ्गिभेदेन साकारवादस्वीकारः । किञ्च¹—नाऽसौ धर्म उपधेयान्तराधीनः, विषयभूतघटाद्यतिरिक्तोपाधिप्रतीत्य- पेक्षाप्रसङ्गात् । कर सकते । कहिये, ज्ञानादि का घटादि के साथ विषय-विषयिभाव क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से अनिर्वचनीय है । निर्वचन—'विद्यमान प्रकाश ( ज्ञान ) का केवल तदीयतारूप ( घटादिमात्र- सम्बन्धितारूप ) स्वभाव-विशेष विषय-विषयिभाव है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—इच्छा, कृति तो प्रकाशरूप नहीं हैं, अतः उनके साथ विषय के सम्बन्ध में अव्याप्ति हो जायगी । 'प्रकाश' के स्थान पर 'विषयी' का निवेश भी नहीं कर सकते; कारण विषय-विषयि- भाव का ही यह लक्षण होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च—'स्व' शब्द आत्मा और आत्मीय का वाचक होने से यहाँ 'स्वभाव'पद से उसका धर्म विवक्षित है या आत्मा ? प्रथम पक्ष में वह ज्ञानत्व आदि साधारण धर्म है या घटादि-ज्ञानादिमें ही वृत्ति कोई धर्मविशेष ( घट-ज्ञानत्व, पटज्ञानत्व आदि ) है ? प्रथम पक्ष में ज्ञानत्वरूप विषयविषयिभाव सर्वसाधारण होने से 'यह घटविषयक ज्ञान है, यह पट-विषयक ज्ञान है' ऐसा विशेषरूप से नियम नहीं होगा । द्वितीय पक्ष अर्थात् विषय-विषय की प्रतीति से व्यावृत्त भिन्न-भिन्न ज्ञानों में वृत्ति ज्ञानधर्मरूप मानें, तो वचन-रचना के भेद से साकारवाद का स्वीकार हो जायगा । अर्थात् घटादि बाह्य पदार्थ भी ज्ञान के धर्म में प्रविष्ट होने से 'ज्ञेयाकारं ज्ञानम्' इस योगाचार-मत का अंगीकार हो जायगा । फलतः बाह्य पदार्थों का अपलाप हो जायगा । किञ्च—वह धर्म जातिरूप है या उपाधिरूप ? उपाधिरूप में भी उपाधि का निमित्त अन्य है या घटादि ही ? यदि अन्य निमित्त मानें, तो 'अयं घटः' इस ज्ञान को अपने विषयभूत घटादि से इतर की अपेक्षा हो जायगी, किन्तु वह होती नहीं है । १. यदि कहें कि ज्ञानगत असाधारण धर्म को ही बाह्यार्थ का निमित्त मानेंगे । एवञ्च विज्ञानवादमें प्रवेश नहीं होगा, तो दूसरा दोष देते हैं—'किञ्च' से ।

४६० सानुवादखण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ न च घटादिरेव तथा; असम्बन्धात् । तथापि तथात्वे चातिप्रसङ्गात् । नापि जातिरूपः; कचिद्घटमात्रपटमात्रज्ञानगततया पृथग्व्यवस्थितौ सत्यां घटपटविषयैकज्ञाने सहावस्थित्या जातिसङ्करप्रसङ्गात् । प्रतिविषयं ज्ञानभेदनियमे विशिष्टज्ञानानुपपत्तेः, एवम्भूतविचित्रजात्यभ्यु- पगमे प्रत्येकोचितव्यवहारस्या-प्यभावप्रसङ्गात् । अथ जातिसङ्करोऽपीष्यते; तथापि स एव विशेषो घटज्ञानत्वादिरस्त्विति विषयासिद्धिः । अथ विषयेणापि सम्बन्धप्रतिभासनात् सोऽपीष्यते । न; तस्यैव सम्बन्धस्य विचार्यमाणत्वात् । 'घटज्ञानत्वादिरूप उपाधि में घटादि निमित्त हैं', ऐसा नहीं कह सकते, कारण घटादि से कोई सम्बन्ध नहीं है । यदि सम्बन्ध के बिना भी घटादि को निमित्त मानें, तो पटादि-ज्ञानत्व में भी घट निमित्त हो जायगा । घटादिज्ञानत्वादि जातिरूप भी नहीं हैं। कारण घटविषयक ज्ञान में घटज्ञानत्व और पटविषयक ज्ञान में पटज्ञानत्व और उभयविषयक समूहालम्बन ज्ञान में घटज्ञानत्व, पटज्ञानत्व दोनों के होने से साङ्कर्य हो जायगा । समर्थन—प्रतिविषय ज्ञान-व्यक्ति भिन्न-भिन्न होने से समूहालम्बन ज्ञान होता ही नहीं, तो फिर संकर कहाँ होगा ? खण्डन—यह भी युक्त नहीं, कारण ऐसा मानने पर विशिष्ट ज्ञान भी नहीं होगा। यदि कहें कि जैसे रूपत्वव्याप्य चित्रत्वजाति है, वैसे ही घटपट-समूहालम्बन-ज्ञान में घटपटज्ञानत्व से विलक्षण एक जाति मानेंगे। अतः समूहालम्बन में दोनों का समावेश न होने से सङ्कर नहीं है, तो वह भी ठीक नहीं। कारण कोई भी ज्ञान केवल एकविषयक नहीं होता। निर्विकल्पक भी अनेकविषयक होता है । एवञ्च घटज्ञानत्व, पटज्ञानत्वरूप एक-एक विषयक व्यवहार का लोप हो जायगा । समर्थन—गुण की जाति में सङ्कर-दोष नहीं होता, अतः घटज्ञानत्व पटज्ञानत्व, दोनों जातियाँ समूहालम्बन ज्ञान में रहती ही हैं । खंडन—यदि विषय-भेद से ज्ञान में जातिभेद मान लें, तो उन्हीं जातियों से प्रतीतियों में वैलक्षण्य सिद्ध ही है । फिर घटादि विषयों की असिद्धि हो जायगी । समर्थन—घट-ज्ञानत्वादि को विषय का ही तो सम्बन्ध मानते हैं, अतः सम्बन्ध की अन्यथानुपपत्ति से विषय की सिद्धि होगी ही । खण्डन—विषय तथा ज्ञान के उसी

परिच्छेद ] विषय विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४६१ स एवासाविति चेन्न । तदैक्यात् ज्ञानार्थसाधारणविषयप्रतीत्या- पत्तेः संयोगप्रतिपत्तिवत् । विषयित्वं तत्र, अर्थे तु विषयत्वमन्यदिति चेन्न । सैव हि ज्ञातता स्यात्, सा च निराकरिष्यते । द्वितीये च स्वात्मा घटपटव्यक्तीनामिव घटपटज्ञानव्यक्तीनां व्यावृत्त इति तत्तद्विषयविषयितागोचरानुगतबुद्धिव्यवहारभङ्गप्रसङ्गः । किञ्च—तदीयता ज्ञानस्य स्वभाव इति वचनं विचारमर्हति । तदिति तावद्विषय- परामर्शः, सम्बन्धितया छप्रत्ययस्यार्थः । तदेतद्न्योन्यविशिष्टमुभयं ज्ञानस्य स्वभाव इति ब्रुवाणेन विषयो विज्ञानस्य स्वभाव इत्युक्तं भवतीति साधु विज्ञानवादिनिरा- करणप्रकरणोपसंहारमकारि । सम्बन्ध का विचार कर रहे हैं कि वह सम्बन्ध किंरूप है ? अर्थात् उस सम्बन्ध को यदि घटज्ञानत्वादिरूप मानें, तो उसीसे प्रतीति का वैलक्षण्य की सिद्ध हो जाने से विषय की असिद्धि हो जायगी । अतः घटज्ञानत्वादिरूप वह सम्बन्ध नहीं है । समर्थन—घट तथा ज्ञान का विषयविषयिभाव ही सम्बन्ध रहे, तो हानि क्या है ? खण्डन—विषय-विषयिभावरूप सम्बन्ध एक है, अतः संयोग-प्रतिपत्ति के तुल्य ज्ञान और विषय दोनों परस्पर विषयी और विषय हो जायेंगे । समर्थन—अनुभव के अनुसार ज्ञान में विषयित्व और अर्थ में विषयत्व अन्य ही है । खंडन—अर्थगत जो अनुगत विषयत्व है, वही मीमांसकों की 'ज्ञातता' है । उसका आगे ही निराकरण करेंगे । द्वितीय पक्ष मानें, अर्थात् 'स्वमेव भावः स्वभावः' इस व्युत्पत्ति से 'स्वभाव' पद का स्वात्मा अर्थ कहें, तो घट-पट-व्यक्तियों के तुल्य घटज्ञान, पटज्ञान व्यक्तियों के भी होने त भिन्न-भिन्न संपूर्ण घटज्ञांन में एकाकार अनुगत प्रतीति नहीं होगी । किञ्च—'तदीयता ज्ञान का स्वभाव है' यह कथन भी विचारणीय है । यहाँ तद्- शब्द से विषय का परामर्श है और सम्बन्धिता ( सम्बन्ध ) छप्रत्यय का अर्थ है । 'ये दोनों परस्पर मिलकर अर्थात् विषय-सम्बन्ध ज्ञान के स्वभाव हैं' यह जो कहते हैं, उससे 'विषय विज्ञान का स्वभाव है' यह भी उक्त हो जाता है । एवञ्च इस तरह विज्ञानवाद का समर्थन हो जाने से [ 'आत्म-तत्त्व-विवेक' में किये गये ] विज्ञान- वाद के खण्डन-प्रकरण का आपने खूब ही उपसंहार किया !