कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
४२ हिन्दी कुलार्णव छठवें 'उन्मना' उल्लास से युक्त होने पर बारम्बार मूर्छा, गिर-गिर कर उठना आदि क्रियायें होती हैं। बाह्य दृष्टि निमेष और उन्मेष से रहित होकर लक्ष्य अन्तर्मुख हो जाता है। यही शिव की कामदायिनी शाम्भवी मुद्रा है। लोभ-रहित होकर उल्लास-युक्त होनेवाले वीर साक्षात् शिव ही हैं, इसमें संदेह नहीं। अपने अनुष्ठान में तल्लीन होकर वे और सब कुछ भूल जाते हैं। इस अवस्था में वे मन- वचन से परे परम सुख को प्राप्त करते हैं। यह सुख शर्करा और दुग्ध के स्वाद के समान स्वयं ही अनुभव द्वारा ज्ञेय है। वह सुख किस प्रकार का होता है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। पुलक आदि के द्वारा जो सुखपूर्ण अवस्था दिखाई देती है, वह 'ब्रह्मध्यान' कहलाती है। यह सुखपूर्ण अवस्था सातवें 'मनोल्लास' से युक्त महात्माओं की होती है। भैरवी चक्र में सभी वर्ण द्विजातिवत् माननीय होते हैं। जाति-भेद नहीं रहता। चक्र के समाप्त होने पर सामाजिक अनुशासन पुनः लागू हो जाता है। चक्र में चाहे स्त्रियों को अलग बैठावे या पुरुषों के साथ दम्पति के रूप में पंक्ति अथवा चक्राकार स्थान दे। शिव-शक्ति के रूप में उन सबकी चक्र में पूजा करे। जिस समय शिव-शक्ति का समायोग होता है, वही-कुल साधकों की समाधिस्था सन्ध्या है। इस प्रकार मैंने तत्त्वत्रयोल्लास और पान-भेदादि का वर्णन संक्षेप में किया। अब हे कुलेशानि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ?
नवाँ उल्लास योग-योगीश-लक्षण और कौलपूजा देवीबोली — हे कुलेश ! योग-योगीश का लक्षण और कुल- भक्त की पूजा का फल बताइए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! ध्यान दो प्रकार का है—१ स्थूल, २ सूक्ष्म । साकार ध्यान स्थूल और निराकार ध्यान सूक्ष्म कहा जाता है। स्थूल से बुद्धि निश्चित होती है और सूक्ष्म से सुस्थिति । हाथ-पैर, पेटादि अंग और अस्थि से रहित, सर्वतेजोमय, सच्चिदानन्द परमेश्वर का ध्यान करे । न उसका उदय होता है, न अस्त । न बढ़ता है, न घटता । वह अवस्था- रहित और स्वयं-प्रकाश है। सत्तामात्र उस अदृश्य तत्त्व का वाणी द्वारा आत्मा में जो सायुज्य प्राप्त होता है, उस ज्ञान को 'ब्रह्मज्ञान' कहा जाता है। वायु-संचार को रोककर पत्थर के समान स्थिर हो परजीव के एक धाम को जाननेवाला 'योगी' कहलाता है। जिस ध्यानावस्था में पदार्थ मात्र भासित हो और रूप का अभाव हो जाय, वह 'समाधि' कही जाती है। हे देवि ! किसी भी चिन्तन से स्वयं तत्त्व का प्रकाश नहीं होता और स्वयं तत्त्व का प्रकाश होने पर साधक तत्क्षण तन्मय हो जाता है। स्वप्न-जाग्रदवस्था में जो स्वप्नवत् निश्वास- श्वासहीन रहता है वह निश्चय ही 'मुक्त' है। इन्द्रिय-समूह को निष्क्रिय रखकर आत्मा से निश्चय हो जो मृतवत् रहता है, वह साक्षात् 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है। न सुनता है, न देखता है, न बैठता है, न जाता है, न सुख-दुःख को जानता है, न मन उनमें लिप्त होता है—इस प्रकार संसार से विरक्त हो जो
४४ हिन्दी कुलार्णव 'शिव' में अपनी आत्मा को लय रखता है, उसे 'समाधिस्थ' कहते हैं। जिस प्रकार जल में जल, दूध में दूध और घी में घी डालने से कोई अन्तर नहीं पड़ता, उसी प्रकार जीव-आत्मा- परमात्मा के सम्बन्ध में समझे। जिस प्रकार ध्यानशक्ति से कीड़ा भौंरे का रूप ले लेता है, उसी प्रकार ध्यान के द्वारा मनुष्य ब्रह्मभूत हो जाता है। दूध से निकाला हुआ घी जैसे पुनः उसमें फेंकने से पहले जैसा मिश्रित नहीं होता, वैसे ही गुणों के द्वारा पृथक् किया हुआ आत्मा यहाँ कहा जाता है। जिस प्रकार अंधेरे कारागार में बन्दी व्यक्ति कुछ नहीं देख पाता, उसी प्रकार अलक्ष्य योगी प्रपंच को नहीं देखता। जैसे आँख बन्द रहने पर प्रपंच नहीं दिखाई देता, उसी प्रकार आँख खुली होने पर भी वह दृष्टिगत न हो—यही 'ध्यान' का लक्षण है। जीव और आत्मा के ऐक्य को 'योग' कहते हैं। जो एक क्षण के लिए 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार आत्म- चिन्तन करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। सहजा- वस्था उत्तम है, ध्यान-धारणा मध्यम है, जप-स्तुति अधम है और होम-पूजा अधमाधम है; तत्त्वचिन्ता उत्तम, जपचिन्ता मध्यम, शास्त्रचिन्ता अधम और लोकचिन्ता अधमाधम है। कोटिपूजा के समान स्तोत्र, कोटिस्तोत्र के समान जप, कोटि- जप के समान ध्यान और कोटिध्यान के समान लय है। नाद से परे मन्त्र नहीं, आत्मा से परे देवता नहीं, अनुसन्धि से परे पूजा नहीं और तृप्ति से परे फल नहीं है। हे देवि ! देह देवालय है और जीव सदाशिव है। अज्ञानरूपी निर्माल्य को छोड़कर 'सोऽहं'-भाव से पूजन करे। जीव शिव है, शिव जीव है— वह जीव केवल शिव है। पाशों से बँधा हुआ 'जीव' है और पाशों से मुक्त 'सदाशिव' कहलाता है। जिस प्रकार भूसी से युक्त धान होता है और भूसी के दूर हो जाने पर चावल कहलाता
साधनमाला ४५ है, उसी प्रकार कर्मों से बँधा हुआ 'जीव' और कर्मों से छूटा हुआ जीव 'सदाशिव' माना जाता है। विप्रों का वेद (ज्ञान) अग्नि में, मनीषियों का हृदय में, अल्पबुद्धि लोगों का मूर्ति में और आत्मज्ञानी का सर्वत्र रहता है। जो निन्दा-स्तु त, सुख-दुःख, शत्रु-मित्र में समान भाव रखता है, वही 'योगीन्द्र' है । निःस्पृह, नित्य सन्तुष्ट, समदर्शी, जितेन्द्रिय, स्वर्गहीन और उसके लिए प्रयत्न न करनेवाला परम तत्व का ज्ञाता योगी है। पञ्च मुद्राओं से उत्पन्न परमा- नन्द में मग्न रहनेवाला योगीन्द्र सर्वत्र आत्मा में अपने को देखता रहता है। अलि, मांस और अंगना-सङ्ग में जो सुख मिलता है, वह विद्वानों के लिए तो पुण्य है किन्तु अधमों के लिए पाप है। हे देवि ! 'मैं', 'तुम' और 'वह' में ऐक्य भाव का चिन्तन करता हुआ संशयरहित हो वह मद्यपायी मांसाहारी हो स्वेच्छाचार-परायण रहता है। मांसाहार की सुरभि से हीन को सुख नहीं है, उसे प्रायश्चित्ती जानना चाहिए। वह पशु ही है, इसमें संदेह नहीं। जब तक आसव-गन्ध है, तब तक पशु भी साक्षात् पशुपति है और अलि-मांस की गन्ध के बिना साक्षात् पशुपति भी पशु के समान हैं। संसार में निकृष्ट को उत्कृष्ट और उत्कृष्ट को निकृष्ट मानना—महात्मा भैरव ने इसी को 'कुलमार्ग' निर्दिष्ट किया है। हे कुलेश्वरि ! कुलयोगीश्वर कौलिकों के लिए न विधि है, न निषेध । न पुण्य है, न पातक । न स्वर्ग है, न नरक । योगी लोकहित के लिए भोगों का भोग करता है, आकांक्षा से नहीं। सभी कुलों से भोजन ग्रहण करता हुआ वह पृथिवी पर क्रीड़ा करता है। सूर्यवत् वह सब कुछ पीता है, अग्निवत् सब कुछ खाता है। सभी भोगों का भोग करके भी योगी पापों से लिप्त नहीं होता ।
४६ हिन्दी कुलार्णव दुःखों से निवृत्त, सन्तुष्ट, निर्द्वन्द्व और मत्सरहीन होकर जो कुलज्ञान में तन्मय, शान्त और सक्त होते हैं, वे कौलिक हैं। मद, क्रोध, दम्भ, आशा, अहङ्कार से हीन सत्यवादी कौलि- केन्द्र जितेन्द्रिय होते हैं। कुल की प्रशंसा होने पर वे रोमांचित हो उठते हैं, उनका स्वर गद्गद् हो जाता है। संसार में शिवोक्त कुलधर्म सब धर्मों से श्रेष्ठ है, ऐसे निश्चय से युक्त बुद्धिवाले उत्तम कौलिक कहे जाते हैं। हे देवि ! शुभ दिन पर कौलिकों को देवता समझ कर सहर्ष उन्हें निमन्त्रण दे और गन्धपुष्पाक्षत आदि से उनकी पूजा कर पञ्चमकार एवं मुद्राओं से सभक्ति उनको सन्तुष्ट करे। उनके सन्तुष्ट होने से मैं प्रसन्न होता हूँ और समस्त देवता प्रसन्न होते हैं। ज्ञानी हो; चाहे अज्ञानी—यदि किसी भी प्रकार की मुक्ति चाहिए तो जब तक शरीर की स्थिति है, तब तक अपने-अपने वर्ण और आश्रम के आचार का पालन अवश्य करना चाहिए। कर्म के द्वारा अज्ञान का उन्मूलन होने पर ज्ञान के द्वारा 'शिवत्व' की प्राप्ति होती है। शिव से ऐक्य स्थापित करने वाले की ही मुक्ति होती है। अतः कर्म समाप्त करे। कर्मनिष्ठ ही सुखी होता है। देहधारी सभी कर्मों का त्याग नहीं कर सकता। जो कर्म के फल का त्याग करता है, वही त्यागी कहा जाता है। इन्द्रियादि 'करण' अपने कार्य में तत्पर रहते ही हैं, ऐसा विचार कर जो अहंभाव को छोड़ कर्मनिष्ठ रहता है, वह ज्ञान- प्राप्ति के बाद क्रियमाण कर्मों में लिप्त नहीं होता। इस प्रकार योग और योगियों के कुछ लक्षण तुमसे संक्षेप में कहे। अब हे कुलेशानि ! तुम और क्या सुनना चाहती हो ?
दसवां उल्लास विशेष दिवसों के पूजन देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं विशेष दिनों की पूजा के विषय में सुनना चाहती हूँ। साथ ही उस पूजा का फल भी मुझे बताइए। ईश्वर ने कहा—हे देवि ! नित्यपूजा उत्तम है, पर्वपूजा मध्यम है, मासपूजा अधम है और एक मास से अधिक समय हो जाने पर साधक भ्रष्ट हो जाता है। कृष्णाष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा और संक्रान्ति —ये पाँच पर्व हैं। गुरु, परम गुरु, परापरगुरु के और अपने जन्मदिवस पर आचार्य के द्वारा या स्वयं चक्रपूजा करे। प्रति मास, हर दूसरे मास या छठे मास या वर्ष में श्रीगुरुपूजा भक्तिपूर्वक करे। गुरु के अभाव में किसी कौल या उसके शिष्य का पूजन करे और कुलपूजन-पूर्वक कुलद्रव्यों से उन्हें सन्तुष्ट करे। नवरात्रों में प्रथमा तिथि में एक वर्ष की सुललक्षणा कन्या को स्नान करा कर पूजास्थान में लाकर देवता के पास बैठावे। फिर गन्धपुष्पधूपदीप और कुलदीपकों से उसका पूजन कर खीर, मधु-मांस, केला, नारियल आदि फलों से उसे संतुष्ट करे। तब इष्टदेवता का ध्यान कर यथाशक्ति जप करे और अन्त में देवता समझकर उस कन्या को नमस्कार कर विदा करे। द्वितीया तिथि में दो वर्ष की और पूर्व तिथि में पूजिता एक वर्ष की सुललक्षणा कन्या का पूजन पूर्ववत् करे। इसी क्रम
४८ हिन्दी कुलार्णव से नवमी को एक वर्ष से नौ वर्ष तक की कन्याओं की पूजा करे । ये नौ हैं—१ सरस्वती, २ रमा, ३ गौरी, ४ दुर्गा, ५ चन्द्रमुखी, ६ हरप्रिया, ७ उमा, ८ भीमा और ६ शान्ता । ‘ॐ ॐ ॐ सरस्वत्यै देवतायै नमः’ आदि क्रम से यथाशक्ति गन्ध, पुष्प, वस्त्रादि से इनकी अलग-अलग पूजा करे । देवता समझते हुए विविध पदार्थों से इन्हें सन्तुष्ट करे । ताम्बूल और दक्षिणा देकर इन्हें विदा करे । ऐसा करनेवाला साधक पुण्यात्मा होकर देवी का प्रीतिभाजन होता है । हे पार्वति ! यदि युवा स्त्रियाँ सुलभ हों तो नवरात्रों में साधक भक्तिपूर्वक उन्हें निमंत्रित कर पूर्ववत् १ हृल्लेखा, २ गगना, ३ रक्ता, ४ महच्चण्डा, ५ करालिका, ६ इच्छा, ७ ज्ञाना, ८ क्रिया और ६ दुर्गा के रूप में उनकी पूजा करे । साथ ही वटुक और गणेश-रूप में बालकों का भी पूजन विधिवत् करे । इस प्रकार हे देवि ! जो वर्ष में या छठे मास में या तीसरे मास में या प्रति मास व्रतपूर्वक पूजन करता है, वह सभी ऐश्वर्यों को प्राप्त कर हमारा प्रिय होता है । भृगुवार को हे कुलेशानि ! सर्वलक्षणा, मन्दहासा, पुष्पिणी युवा स्त्री को स्नान कराकर सादर निमन्त्रित कर आसन पर बैठावे । गन्ध, पुष्प, वस्त्रादि से उसे सजावे । अपने को भी हे कुलेश्वरि ! गन्धपुष्पादि से अलंकृत करे । फिर देवता का आवाहन कर सविधि पूजन करे । अत्यन्त भक्तिपूर्वक मांसादि पदार्थों से उसे सन्तुष्ट करे । फिर प्रौढान्तोल्लास से युक्त उसका दर्शन करता हुआ मन्त्र का जप करे । स्वयं यौवनोल्लास से युक्त रहे और उसका ध्यान करता रहे । इस प्रकार निर्विकार चित्त से १०८ सहस्र जप कर जपफल समर्पित कर विहार करे । तीन, पाँच, सात, नौ भृगुवारा में जो इस विधि से पूजन करता
साधनमाला ४६ है, उसे असीम पुण्य मिलता है और जो भी उसकी मनोकामना हो, वह पूर्ण होती है । सभी संक्रान्ति-पर्वों में १ गौरी-शिव, २ रमा-विष्णु ३ वाणी- ब्रह्मा, ४ शची-इन्द्र, ५ रोहिणी-चन्द्र, ६ स्वाहा-अग्नि, ७ प्रभा-रवि, ८ भद्रकाली-वीरभद्र और ९ भैरवी-भैरव इन नौ युगलों की पूर्वोक्त विधि से पूजा करे । 'ॐ ॐ ॐ गौरीशिवेभ्यः नमः' आदि नाम- मन्त्रों से उक्त मिथुनों का गन्ध-पुष्पादि से पूजन कर उन्हें प्रौढ़ान्तोल्लास से युक्त ध्यान करे । इस प्रकार पूजन करने से ये मिथुनदेवता प्रसन्न होकर साधक के मनोरथ को पूर्ण करते हैं । प्रतिवर्ष जो यह पूजन करता है, वह सभी ऐश्वर्यों से युक्त होकर उक्त मिथुनलोकों में निवास करता है । वैशाख मास की शुक्ल प्रतिपदा के दिन ब्राह्ममुहूर्त में उठकर स्नान-सन्ध्यादि से निवृत्त हो मनोरम एकान्त स्थान में पूर्व की ओर मुख करके बैठे । फिर विधिपूर्वक अपने आपको गन्ध-पुष्पों से अलंकृत कर पूर्वोक्त न्यास कर देवताभाव को प्राप्त करे । सूर्य- मण्डल के कुछ उदित होने पर इष्टदेवता का आवरणों के सहित ध्यान कर षोडशोपचारों से चक्रपूजा-युक्त पूजन करे । इसके बाद कुलदीपों से नीराजन कर गुरुरूप शिव को भक्ष्य-भोज्यादि-सहित अर्घ्य निवेदित करे और उनके प्रसाद को शक्ति के साथ यौवनोल्लास से युक्त होकर निर्विकार चित्त से पान करे । देवी के उक्त मण्डल का ध्यान करते हुए १०८ बार जप करे । फिर जपफल समर्पित कर पूजा और देवता का विसर्जन करे । इस प्रकार शुक्ल प्रति- पदा के शुभ दिन से प्रारम्भ कर कृष्ण चतुर्दशी के दिन तक जप- पूजा करे और अमावास्या के दिन कृपणता छोड़कर यथाशक्ति तीन, पाँच या सात शक्तियों तथा कौलिकों का पूजन करे । एक मास तक जो यह सूर्योदय का अर्चन करता है, उससे देवता फा० ४
५० हिन्दी कुलार्णव सन्तुष्ट होता है और उसके अभीष्ट पद को प्रदान करता है। इसी क्रम से मध्याह्न या सायाह्न में भी पूजा की जा सकती है। उसका भी वही माहात्म्य है। जो साधक तीनों सन्ध्याओं में एक मास तक यह पूजा करता है, वह सिद्ध होकर पृथ्वी पर देववत् विहार करता है। माघ शुक्ल की प्रतिपदा के दिन निराहार रहकर स्नानपूर्वक श्वेत वस्त्र पहन सायं सन्ध्या करे। फिर पूर्वोक्त विधि से सभी द्रव्यों से युक्त होकर चिद्रूपा देवता का ध्यान करते हुए चन्द्रमा के अस्त होने के समय तक एकाग्रचित्त से जप करे। इस प्रकार शुक्ल चतुर्दशी तक प्रतिदिन पूजन करे। पूर्णिमा के दिन यथा- शक्ति शक्तियों और कौलिकों की पूजा करे। भक्तिपूर्वक शुक्लपक्ष का यह पूजन जो साधक करता है, वह सभी ऐश्वर्यों से युक्त होकर सब लोगों से पूजित होता है और शिव-सान्निध्य को प्राप्त करता है। शुक्लपक्ष के ही समान कृष्णपक्ष का पूजन भी वैसा ही फलप्रद है। इस संसार में देववत् सभी सुखों का उपभोग कर वह परमपद को पाता है, इसमें सन्देह नहीं। कार्तिक मास की शुक्ल प्रतिपदा को स्नान-उपासना के द्वारा विशुद्धात्मा हो पूर्वोक्त न्यासों को करे। फिर जीवलोक के सो जाने पर आनन्दपूर्वक महानिशा में पूर्वोक्त विधि से सभी द्रव्यों से युक्त होकर पाँच रङ्गों के चूर्ण से चित्रित अष्टदलकमल बनावे। उस पर कांसे का सुन्दर कलश मधु से भरकर स्थापित करे। कलश पर घृत का दीपक जलाकर स्थापित करे। दीपक की बत्ती अनामिका के समान मोटी हो। उत्तर की ओर मुखकर साधक कलश के सामने बैठे और उक्त दीपक की ज्योति में आवरण- सहित देवी का ध्यान कर विधिवत् उसकी पूजा करे। फिर यौवनोल्लास से युक्त होकर दीपस्थ देवता का स्मरण करते हुए एकाग्र मन से १०८ बार जप करे। इस प्रकार कृष्ण चतुर्दशी
साधनमाला ५१ के दिन तक पूजा करे । अमावास्या के दिन भक्ति-पूर्वक कुलशक्तियों का पूजन करे । ऐसा करने से साधक देवता का प्रीतिपात्र होता है और सब प्रकार के ऐश्वर्य से युक्त होकर सबसे सम्मानित होता है । आगमोक्त विधि से विशेष दिवसों में जो पूजन करता है, वह हम दोनों का प्रियपात्र होता है और सद्गति को प्राप्त करता है । अतः प्रयत्नपूर्वक सब दशाओं में कुलपूजा करनी चाहिये क्योंकि कुलपूजा से अभीष्ट फल मिलता है । विशेष दिवसों में साधकों को देखकर सभी लोग हर्षित होते हैं और सोचते हैं कि क्या ही अच्छा होता, यदि वे स्वयं भी पूजा कर सकते । इसलिये चाहे अपने कल्याण के लिये या दूसरे के हित के लिए पवित्र द्रव्यों से युक्त होकर चक्रपूजा-पूर्वक विशेष दिवसों का अर्चन किया करे । इस प्रकार हे कुलेशानि ! विशेष दिवसों का कुछ अर्चन-विधान मैंने संक्षेप में कहा । अब तुम क्या सुनना चाहती हो ?
ग्यारहवां उल्लास कुलाचार-कथन देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं कुलाचार-क्रम को सुनना चाहती हूँ । कृपया उसे कहिए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो। स्नान किये बिना या गन्ध, पुष्प, वस्त्रादि से अलंकृत हुए बिना या शरीर में न्यास किये बिना कुलपूजा नहीं करनी चाहिये । मांस के बिना पूजा, मद्य के बिना तर्पण और शक्ति के बिना जो पान किया जाता है, वह निष्फल होता है । चक्रपूजा अकेले न करे और न एक पात्र में पूजन करे । न एक हाथ से पूजा करे और न एक हाथ से पान करे । पशु के निकट मत्स्य-मांस और आसव के द्वारा पूजन न करे । प्रणाम कर चक्र में प्रवेश करे और प्रणाम करके ही उससे बाहर जाय । हे देवि ! श्रीचक्र का दर्शन करने से नेत्रों के पाप नष्ट होते हैं । कुलाचारी के गृह में पहुँचने पर माँग कर अमृतान्न ग्रहण करे । उसके अभाव में जल पिये । कुलाचारी के द्वारा दिये हुए पात्र को नमस्कार कर ग्रहण करे । यदि गुरुदेव या उनके पुत्र या अपने से ज्येष्ठ कौलिक उसी ग्राम या नगर में निवास करते हैं, जहाँ कि साधक रहता है, तो उनकी अनुमति से ही कुलद्रव्यों का सेवन करना चाहिये । अन्यथा पाप होता है । चक्र के मध्य में शुद्ध होने के विचार से जो हाथ आदि धोता है, वह मूर्ख आपत्ति में पड़ता है। जो इस अवसर पर मल-मूत्र- अधोवायु का विसर्जन करता है, उसे पातक लगता है। चक्र के बीच में घट के टूट जाने या पात्र के गिर जाने या दीपक के बुझ जाने से जो दोष होता है, उसकी शान्ति के लिए पुनः श्रीचक्र-
उल्लास-युक्त होकर कोई कौलिक यदि पशु का साथ करता
साधनमाला ५३ पूजा करनी चाहिये। परिहास, प्रलाप, अति वार्तालाप, उदासीनता, भय, क्रोध आदि से चक्र के समय में बचना चाहिये। हाथ में पात्र लेकर चक्र में घूमना-फिरना नहीं चाहिये। पूर्णपात्र ग्रहण कर अधिक देर तक न बैठे। हाथ में पात्र हो, तो बातचीत न करे। एक हाथ से बिना मुद्रा के पात्र न दे। न उसे स्थान से हटावे और न अन्य पात्रों में उसे मिलने दे। शब्द करते हुए द्रव्य का पान न करे और न ही पात्र को पूर्ण करते समय शब्द करे। एक दूसरे के पात्रों को टकराना नहीं चाहिये। आधार के सहित पात्र को न उठाये और न आधार से वह गिरने पाये। पात्र को सर्वथा खाली न करे। उसे धोकर छिपाकर रखे। उल्लास-युक्त होकर कोई कौलिक यदि पशु का साथ करता है या पश्वाचार-परायण होता है, तो उसके धर्म, अर्थ, आयु, यश, पुण्य, ज्ञान, सुख आदि नष्ट हो जाते हैं। श्रीचक्र-स्थित कुलद्रव्य को जो अपनी इच्छा से या लोभ से या भय से पशुओं को देता है, वह योगिनियों के द्वारा मारा जाता है। चक्र के बीच में शत्रु के भी साथ वाद-विवाद न करे। उसके कठोर वचनों को भी सह ले। अपने कुटुम्बी या प्यारे मित्र को देखकर जैसी प्रसन्नता होती है, वैसी ही प्रसन्नता कौलिक को देखकर जिसे होती है, वह योगिनी का प्रियपात्र होता है। श्री गुरुदेव, कुलशास्त्र और पूज्य स्थानों को भक्तिपूर्वक प्रणाम कर उनका माहात्म्य-वर्णन करना चाहिये। जपकाल को छोड़कर गुरुदेव के नाम का उच्चारण न करे। ‘श्रीनाथदेव स्वामी’ इस नाम से उनका उल्लेख करे। श्रीगुरु- पादुका, मूलमन्त्र और अपनी पादुका शिष्य को छोड़कर अन्य किसी को न बताये। मन्त्रादि गुरुमुख से प्राप्त होने पर ही सफल होते हैं। अपनी पत्नी के समान कुलशास्त्रों का सेवन करे, पशु- शास्त्रों को पराई स्त्री के समान समझे।
५४ हिन्दी कुलार्णव कृष्णांशुका, कृष्णवर्णा, मनोहरा, युवती कुमारी की देवता- रूप में पूजा करे । स्त्रियों का समूह, रक्तवस्त्रा नारी, गुरुदेव की शक्ति, गुरुपुत्र, ज्येष्ठ या कनिष्ठ कौल साधक यदि दिखाई पड़ें, तो उन्हें नमस्कार करे । नग्न या पागल स्त्री का कभी उपहास न करे । अप्रिय और असत्य बात न कहे । दिन में स्त्री-सङ्ग कभी न करे । सौ अपराध करने पर भी स्त्री को पुष्प तक से न मारे । स्त्रियों के दोषों का कभी वर्णन न करे, अपितु उनके गुणों के प्रति ही सदा ध्यान दे । कुलवृक्षों में कुलयोगिनियों का निवास रहता है। अतः उनके पत्तों में विशेषतः अर्कपत्र में भोजन नहीं करना चाहिये । कुलवृक्ष के नीचे न तो सोये और न कोई उपद्रव करे, अपितु उसे देख या सुनकर नमस्कार करे । कभी भी उसे काटे या तोड़े नहीं । श्लेष्मान्तक, करञ्ज, निम्ब, अश्वत्थ, कदम्ब, विल्व, वट, उडुम्बुर- ये कुलवृक्ष माने गये हैं । एकाक्षर के देनेवाले गुरुदेव की जो अवमानना करता है, वह सौ योनियों में घूमता-फिरता हुआ चाण्डाल होता है । श्रीचक्र के वृत्तान्त को, चाहे वह शुभ हो या अशुभ, कभी प्रकट नहीं करना चाहिए । गुरुदेव का नाम तो प्रकट करे किन्तु अपना मन्त्र कभी किसी को न बताना चाहिये । सभी पापों का प्रायश्चित्त श्री गुरुदेव के नाम का जप करने से हो जाता है । हे कुलेश्वरि ! गुरु को तीन बार आचार का वर्णन करना चाहिये । उस पर भी यदि शिष्य उसका पालन नहीं करता, तो गुरु को पाप नहीं होता । इस प्रकार संक्षेप में मैंने कुलाचार की विधि कही । अब तुम क्या सुनना चाहती हो ?
बारहवां उल्लास पादुका-कथन देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं पादुका की भक्ति के लक्षण और उससे सम्बन्धित आचार के विषय में सुनना चाहती हूँ। ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो। असंख्य महादानों, महाव्रतों और महाज्ञानों से अधिक फलदायिका श्रीपादुका है। कोटि मन्त्रजप से, पुण्यतीर्थों के स्नान से और कोटि देवपूजन से बढ़कर पुण्यदा श्रीपादुका है। विषम रोग, विकट उपद्रव, महान् भय और बड़ी से बड़ी आपत्ति में स्मरण करने से श्रीपादुका रक्षा करती है। श्रीनाथ के चरणकमल जिस दिशा में विराजते हों, उस दिशा को प्रतिदिन नमस्कार करे। ध्यान का मूल श्री गुरुदेव का स्वरूप है, पूजा का मूल श्रीगुरुदेव के चरण हैं, मन्त्र का मूल श्रीगुरुदेव के वचन हैं और मोक्ष का मूल श्रीगुरुदेव की कृपा है। हे कुलनायिके ! इस संसार में सभी क्रियाओं के मूलाधार श्रीगुरु- देव ही हैं। अतः उनकी नित्य भक्तिपूर्वक सेवा करे। गुरु को मनुष्य, मन्त्र को अक्षर और प्रतिमा को पत्थर जो समझता है, वह नरक को प्राप्त करता है। गुरु को मरणशील समझनेवाला कभी मन्त्रसाधना या देवार्चन में सफल मनोरथ नहीं हो सकता। जन्म देने के कारण माता-पिता पूज्य होते हैं और श्रीगुरुदेव धर्माधर्म के प्रदर्शक होने से और भी अधिक पूज्य हैं। शिव के रुष्ट होने पर गुरु रक्षा कर सकते हैं किन्तु गुरु
५६ हिन्दी कुलार्णव के रुष्ट होने पर कोई भी नहीं बचा सकता। अतः मनसा, वाचा, कर्मणा गुरु को जो प्रिय हो, वैसा ही आचरण करना चाहिये। गुरु यदि निकट हों, तो उन्हें मन ही में नमस्कार न करे, अपितु यदि गुरु-शिष्य एक ही स्थान में निवास करते हों, तो शिष्य को तीनों सन्ध्याओं में प्रतिदिन गुरु को प्रणाम करना चाहिये। आधे योजन की दूरी पर रहनेवाला शिष्य पाँचों पर्वों में आकर गुरु को प्रणाम करे। एक योजन से बारह योजन तक की दूरी पर रहनेवाला शिष्य अपनी इच्छानुसार आकर उन्हें प्रणाम करे। खाली हाथ राजा, देवता और गुरु के पास न जाये। यथा- शक्ति फल, फूल, वस्त्रादि से उनका अभिनन्दन करे। गुरुशक्ति, गुरुपुत्र और गुरु के ज्येष्ठभ्राता का गुरुवत् आदर करे। छोटों को अपने पुत्रवत् समझे। इस प्रकार संक्षेप में मैंने तुमसे पादुका-भक्ति के लक्षण और आचार बताये। अब क्या सुनना चाहती हो ?
तेरहवां उल्लास गुरु-शिष्य-लक्षण देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं गुरु-शिष्य दोनों के लक्षण सुनना चाहती हूँ । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो । परशिष्य, पाखण्डी, घमण्डी, विकृताङ्ग, मलिन, रोगी, आलसी, द्यूतादिव्यसनी, देश- द्रोही, नीरस, धूर्त, छिद्रान्वेषी, कृतघ्न, विश्वासघाती, आततायी, मिथ्यावादी, गँवार, बहुभाषी, कुतर्की, झगड़ालू, मूर्ख, आत्म- प्रशंसक आदि दोषयुक्त व्यक्ति को 'शिष्य' न बनाये । कुलधर्मप्रेमी, कुलार्चनकारी, जपध्यानादिकर्ता और कुलशास्त्र के जिज्ञासु आदि गुणयुक्त व्यक्ति को 'शिष्य' बनाये । शुद्धवेशधारी, मनोहर, आगमज्ञाता, तन्त्रशास्त्रज्ञ, भ्रम- संशयनाशक, अन्तर्मुखी होते हुए भी बहिर्दृष्टि रखनेवाले, सर्वज्ञ, निग्रह-अनुग्रह में समर्थ, शान्तस्वभाववाले, दयालु, जितेन्द्रिय, अग्रगण्य, गम्भीर, सन्तुष्ट, धैर्यवान्, प्रसन्नमुख, नित्य-नैमित्तिक- काम्य कर्मों में तत्पर रहनेवाले, स्त्रीधनादि में अनासक्त आदि गुणयुक्त महानुभाव को 'गुरु' बनाये । घृणा, लज्जा, भय, शोक, जुगुप्सा, कुलशील और जाति— ये आठ पाश कहे गये हैं । इनसे बँधा हुआ व्यक्ति 'पशु' माना जाता है । इन पाशों से छूटकर वह महेश्वरवत् हो जाता है । अतः उक्त पाशों को जो दूर करता है, वही गुरु है । जो सच्चिदानन्द को जानता है और इन्द्रियजन्य सुख से जो छुटकारा दिलाता है, वह गुरु है । ऐसे ही गुरु की शिष्यों को सेवा करनी चाहिये ।
५८ हिन्दी कुलार्णव वेद और शास्त्रादि के जाननेवाले गुरु तो बहुत हैं किन्तु परम- तत्त्व के ज्ञाता गुरु कठिनाई से मिलते हैं। निगम और आगम शास्त्रों में कथित मन्त्रों को जो जानते हैं, ऐसे गुरु दुर्लभ हैं। शिष्य से धन लेनेवाले गुरु बहुत मिलते हैं, किन्तु शिष्य के दुःख को दूर करनेवाले गुरु कम मिलते हैं। गुरु वही है, जिसके स्पर्श- मात्र से परम आनन्द की प्राप्ति होती है। ऐसे ही महापुरुष को गुरु बनाना चाहिए। प्रेरक, सूचक, वाचक, दर्शक, शिक्षक और बोधक—ये छहः प्रकार के गुरु कहे गये हैं। इनमें से पाँच तो कार्यभूत होते हैं, छठा 'बोधक' गुरु कारण होता है। जो गुरु पूर्णाभिषेक करता है, उसी की पादुका हे महेशानि ! पूजनीया है। संशय को दूर करने- वाले, ज्ञानदायक सद्गुरु को पाकर दूसरे गुरु का आश्रय नहीं लेना चाहिये। यदि गुरु अनभिज्ञ हो, उसके द्वारा संशय का निरा- करण न होता हो, तो दूसरे गुरु के पास जाने में दोष नहीं है। जिस प्रकार शहद का लोभी भौंरा एक फूल से दूसरे फूल को जाता रहता है, उसी प्रकार ज्ञान के लोभी शिष्य को एक गुरु से दूसरे गुरु के पास जाना चाहिये। इस प्रकार संक्षेप में मैंने तुमसे गुरु-शिष्य के लक्षण कहे। अब हे कुलेशानि ! क्या सुनना चाहती हो ?
चौदहवां उल्लास गुरु-शिष्य-परीक्षा देवी ने कहा—हे कुलेश ! मैं गुरु और शिष्य की परीक्षा के सम्बन्ध में सुनना चाहती हूँ। साथ ही उपदेश का क्रम और दीक्षा के भेद भी बताइये। ईश्वर ने कहा—हे देवि ! शिष्य की विधिवत् परीक्षा लेने के बाद ही गुरु को उसे मन्त्रोपदेश करना चाहिये, अन्यथा वह निष्फल होता है। इसी प्रकार गुरु के सम्बन्ध में समुचित रूप से जानकारी प्राप्त कर जब सन्तुष्ट हो जाय, तभी उनसे शिष्य को मन्त्रोपदेश ग्रहण करना चाहिये। यदि कोई गुरु और शिष्य मोहवश एक दूसरे की परीक्षा किये बिना ही उपदेश देते और लेते हैं, तो वे दोनों ही अनेक वर्षों तक नरक में वास करते हैं। शिष्य के ज्ञान और क्रिया दोनों की परीक्षा एक वर्ष तक या छः मास तक या तीन मास तक लेनी चाहिये। जो आकृष्ट करने से या प्रताड़ित करने से दुःखी न होकर सदा यही सोचे कि यह गुरु की कृपा ही है और श्रीगुरु का स्मरण, कीर्तन, दर्शन, वन्दन, आज्ञापालनादि करने में जिसे आनन्द अनुभव हो, वह शिष्य बनाये जाने योग्य है। जिस विज्ञ पुरुष को जप, स्तोत्र, ध्यान, होमार्चनादि के करने में आनन्द मिलता हो; जो ज्ञानोपदेश करने में निपुण हो और जो मन्त्र में सिद्धिप्राप्त हो—ऐसे महापुरुष को 'उद्बोधक' जानकर गुरुरूप में स्वीकार करे।
६० हिन्दी कुलार्णव कर्मकाण्ड से रहित दीक्षा-विधि तीन प्रकार की कही गई है—१ स्पर्शदीक्षा, २ दृग्दीक्षा, ३ वेधदीक्षा। मोक्षदायिनी दीक्षा के सात प्रकार बताए गये हैं—१ समया, २ साधिका, ३ पुत्रिका, ४ वेधिका, ५ पूर्णा, ६ चर्या, ७ निर्वाण। कलश, मण्डपादि से युक्त क्रियादीक्षा गुरुदेव को बाह्य विधानानुसार करनी चाहिए। यह क्रियादीक्षा आठ प्रकार की मानी गई है। पापहरी वर्णदीक्षा बयालीस, पचास या बासठ अक्षरों के न्यास के भेद से तीन प्रकार की है। इसमें शिष्य के शरीर में वर्णों का न्यास कर उसमें देवत्व का भाव जाग्रत् किया जाता है। कलादीक्षा में पैरों के तलवे से लेकर घुटनों तक निवृत्ति, घुटनों से नाभि तक प्रतिष्ठा, नाभि से कण्ठ तक विद्या, कण्ठ से ललाट तक शान्ति और ललाट से शिर तक शान्त्यतीता इन पाँच कलाओं का, फिर पुनः संहारक्रम से इन्हीं कलाओं का एक स्थान से दूसरे स्थान तक न्यास किया जाता है, जिससे शिष्य को दिव्यभाव प्राप्त होता है। श्रीगुरुदेव अपने हाथ में शिव का ध्यान कर मूल अङ्गमालिनी का जप कर अपने शिष्य को छुयें। इस प्रकार 'स्पर्शदीक्षा' होती है। अपने चित्त को तत्त्व में स्थित कर परतत्त्व से उत्प्रेरित होकर मन्त्रज्ञाता गुरु मन्त्रोपदेश करें। इसे 'वाग्दीक्षा' कहते हैं। आँखों को बन्द कर परतत्त्व का ध्यान करते हुए प्रसन्न-बुद्धि से यदि गुरुदेव शिष्य को देखें, तो इससे 'दृग्दीक्षा' होती है। गुरु के दर्शन, भाषण, स्पर्शमात्र से जब तुरन्त ज्ञान होता है, तो वह 'शाम्भवी' दीक्षा कहलाती है। 'मनोदीक्षा' तीव्रा और तीव्रतमा दो प्रकार की है। शिष्य के देह में छः अध्वानों का स्मरण करते हुए गुरुदेव जब वेध करते हैं, तब शिष्य पापों से मुक्त और छिन्नपाश होकर बाह्य क्रिया-व्यापार से शून्य होकर पृथ्वी पर गिर पड़ता है। दिव्यभाव
साधनमाला ६१ को प्राप्त होकर वह सर्वज्ञ हो जाता है। यही भवबन्धमोचिनी और शिवभावप्रदायिनी तीव्रतरा दीक्षा है। वेध की छः अवस्थायें मानी गई हैं—१ आनन्द, २ कम्प, ३ उद्भव, ४ घूर्णा, ५ निद्रा और ६ मूर्च्छा। वेधदीक्षा होने पर शिष्य में ये छः गुण दिखाई पड़ते हैं। कुलद्रव्यों से सविधि पूजन कर शिष्य को उनका दर्शन कराये, यह 'कौलिकी दीक्षा' है। मुख में पञ्चगव्यामृत से युक्त शिवद्रव्य को भरकर गुरुदेव शिष्य का गण्डूष के द्वारा अभिषेक करें। तब सजीव मीन से युक्त और सुरा अथवा पञ्चामृत से पूर्ण शंख या कलश के द्वारा बाह्य अभिषेक करें। इस प्रकार 'पूर्णाभिषेक' से जो पवित्र होते हैं, वे शिव के सायुज्य को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार दीक्षा के दो मुख्य भेद हैं—१ बाह्य और २ आभ्यन्तर। क्रियादीक्षा बाह्य है और वेध आभ्यन्तरी। शरीर का न तो संस्कार होता है, न उसकी कोई जाति है और न कोई कर्म। 'आत्मा' की ही दीक्षा होती है, जो अनादि कुलकुण्डली है। हे देवि ! मन्त्रौषधि के द्वारा जिस प्रकार विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मन्त्रज्ञ गुरु दीक्षा के द्वारा शिष्य के पशुपश को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। सविधि दीक्षा के होने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और ज्ञान की प्राप्ति होकर शिष्य शिवरूप हो जाता है। दीक्षा होने से आत्मा शिवत्व को प्राप्त करती है। शूद्र की शूद्रता चली जाती है और विप्र की विप्रता। दीक्षा संस्कार से युक्त होने पर जाति की भिन्नता नहीं रह जाती। दीक्षा के बिना जो भी जपपूजादि क्रिया की जाती है, वह निष्फल होती है। अतः प्रयत्न करके गुरु से दीक्षा प्राप्त करे। —:❀:—