संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- अध्याय २ * २९
| योऽधीत्य विधिवद्वेदान् गृहस्थाश्रममाव्रजेत्।<br>उपकुर्वाणको ज्ञेयो नैष्ठिको मरणान्तिकः ॥ ७५ ॥ | जो ब्रह्मचारी विधिवत् वेदोंका अध्ययन कर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करता है, उसे उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी समझना चाहिये और जो यावज्जीवन गुरुके पास रहकर ब्रह्मविद्याका अभ्यास करता है, वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहलाता है ॥ ७५ ॥ |
| उदासीनः साधकश्च गृहस्थो द्विविधो भवेत्।<br>कुटुम्बभरणे यत्तः साधकोऽसौ गृही भवेत् ॥ ७६ ॥ | (इसी प्रकार) गृहस्थाश्रमी भी दो प्रकारका होता है—(१) उदासीन और (२) साधक। जो कुटुम्बके भरण-पोषणमें लगा रहता है, वह गृहस्थ साधक कहलाता है और जो देवऋण, पितृऋण एवं ऋषिऋण—इन तीन ऋणोंसे उऋण होकर स्त्री, धन आदिका परित्याग कर देता है तथा एकाकी विचरण करता है, वह मोक्ष-प्राप्तिकी इच्छावाला गृहस्थ उदासीन कहलाता है ॥ ७६-७७ ॥ |
| ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य त्यक्त्वा भार्याधनादिकम्।<br>एकाकी यस्तु विचरेदुदासीनः स मौक्षिकः ॥ ७७ ॥<br>तपस्तप्यति योऽरण्ये यजेद् देवान् जुहोति च।<br>स्वाध्याये चैव निरतो वनस्थस्तापसो मतः ॥ ७८ ॥ | जो वनमें अनुष्ठान करता है, देवताओंकी पूजा करता है, हवन करता है और स्वाध्यायमें निरत रहता है, वह वनमें रहनेवाला 'तापस' नामक वानप्रस्थ कहलाता है और जो अत्यन्त तपसे अपने शरीरको कृश कर लेता है तथा निरन्तर ध्यानपरायण रहता है, वह वानप्रस्थ-आश्रममें रहनेवाला सांन्यासिक वानप्रस्थी कहलाता है ॥ ७८-७९ ॥ |
| तपसा कर्शितोऽत्यर्थं यस्तु ध्यानपरो भवेत्।<br>सांन्यासिकः स विज्ञेयो वानप्रस्थाश्रमे स्थितः ॥ ७९ ॥<br>योगाभ्यासरतो नित्यमारुरुक्षुर्जितेन्द्रियः।<br>ज्ञानाय वर्तते भिक्षुः प्रोच्यते पारमेष्ठिकः ॥ ८० ॥ | नित्य योगाभ्यासमें रत रहनेवाला, मोक्षमार्गमें आरूढ़ होनेकी इच्छावाला, जितेन्द्रिय तथा ज्ञानप्राप्तिके लिये प्रयत्नशील संन्यासीको 'पारमेष्ठिक' संन्यासी कहा जाता है और जो केवल आत्मामें ही रमण करनेवाला है, नित्य-तृप्त महामुनि है, सम्यक्-दर्शन-सम्पन्न है वह संन्यासी 'योगी' कहलाता है ॥ ८०-८१ ॥ |
| यस्वात्मरतिरेव स्यान्नित्यतृप्तो महामुनिः।<br>सम्यग् दर्शनसम्पन्नः स योगी भिक्षुरुच्यते ॥ ८१ ॥<br>ज्ञानसंन्यासिनः केचिद् वेदसंन्यासिनोऽपरे।<br>कर्मसंन्यासिनः केचित् त्रिविधाः पारमेष्ठिकाः ॥ ८२ ॥ | पारमेष्ठिक (संन्यासी)-के तीन भेद होते हैं—(१) कोई ज्ञानसंन्यासी होते हैं, (२) कोई वेदसंन्यासी होते हैं और (३) कोई कर्मसंन्यासी होते हैं। (इसी प्रकार) योगी भी तीन प्रकारका समझना चाहिये—पहला भौतिक, दूसरा सांख्य और तीसरे प्रकारका योगी अत्याश्रमी कहा गया है, जो श्रेष्ठ योगमें ही नित्य स्थित रहता है। पहले भौतिक योगीमें प्रथम भावना, (दूसरे) सांख्ययोगीमें अक्षर-भावना और तीसरे अत्याश्रमी नामक योगीमें जो अन्तिम भावना रहती है, वह पारमेश्वरी भावना कहलाती है ॥ ८२–८४ ॥ |
| योगी च त्रिविधो ज्ञेयो भौतिकः सांख्य एव च।<br>तृतीयोऽत्याश्रमी प्रोक्तो योगमुत्तममास्थितः ॥ ८३ ॥<br><br>प्रथमा भावना पूर्वे सांख्ये त्वक्षरभावना।<br>तृतीये चान्तिमा प्रोक्ता भावना पारमेश्वरी ॥ ८४ ॥ | |
| तस्मादेतद् विजानीध्वमाश्रमाणां चतुष्टयम्।<br>सर्वेषु वेदशास्त्रेषु पञ्चमो नोपपद्यते ॥ ८५ ॥ | इसलिये (हे ऋषियो!) सभी वेदशास्त्रोंमें चार ही आश्रम निश्चित किये गये हैं, ऐसा जानना चाहिये। पाँचवाँ कोई आश्रम नहीं है ॥ ८५ ॥ |
३० * कूर्मपुराण *
| एवं वर्णाश्रमान् सृष्ट्वा देवदेवो निरञ्जनः ।<br>दक्षादीन् प्राह विश्वात्मा सृजध्वं विविधाः प्रजाः ॥ ८६ ॥<br><br>ब्रह्मणो वचनात् पुत्रा दक्षाद्या मुनिसत्तमाः ।<br>असृजन्त प्रजाः सर्वा देवमानुषपूर्विकाः ॥ ८७ ॥ | इस प्रकार (चार) वर्ण तथा (चार) आश्रमोंकी सृष्टि करके देवाधिदेव निरञ्जन विश्वात्मा (ब्रह्माजी)-ने दक्ष आदि (प्रजापतियों)-से कहा—'अनेक प्रकारकी सृष्टि करो'। हे मुनिश्रेष्ठो! ब्रह्माजीके कहनेपर उनके दक्ष आदि (मानस) पुत्रोंने देवताओं एवं मनुष्योंके साथ ही अन्य भी सभी प्रजाओं (प्राणियों)-की सृष्टि की ॥ ८६-८७॥ |
|---|---|
| इत्येष भगवान् ब्रह्मा स्रष्टृत्वे स व्यवस्थितः ।<br>अहं वै पालयामीदं संहरिष्यति शूलभृत् ॥ ८८ ॥ | इस प्रकार ये भगवान् ब्रह्मा सृष्टिके कार्यमें नियत हैं। मैं इस (सृष्टि)-का पालन-पोषण करता हूँ और शूलधारी भगवान् शंकर इसका संहार करेंगे ॥ ८८ ॥ |
| तिस्रस्तु मूर्तयः प्रोक्ता ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।<br>रजःसत्त्वतमयोगात् परस्य परमात्मनः ॥ ८९ ॥<br><br>अन्योन्यमनुरक्तास्ते ह्यन्योन्यमुपजीविनः ।<br>अन्योन्यं प्रणताश्चैव लीलया परमेश्वराः ॥ ९० ॥ | परात्पर परमात्माकी रज, सत्त्व एवं तमोगुणके योगसे (क्रमशः) ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर नामक तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं। ये तीनों विग्रह परस्पर एक-दूसरेमें अनुरक्त तथा एक-दूसरेके उपजीवी (आश्रित) हैं। ये तीनों परमेश्वर हैं और लीलावश एक-दूसरेको प्रणाम करते रहते हैं ॥ ८९-९० ॥ |
| ब्राह्मी माहेश्वरी चैव तथैवाक्षरभावना ।<br>तिस्रस्तु भावना रुद्रे वर्तन्ते सततं द्विजाः ॥ ९१ ॥<br><br>प्रवर्तते मय्यजस्रमाद्या चाक्षरभावना ।<br>द्वितीया ब्रह्मणः प्रोक्ता देवस्याक्षरभावना ॥ ९२ ॥ | हे ब्राह्मणो! रुद्रमें ब्राह्मी, माहेश्वरी तथा अक्षर (वैष्णवी) नामक तीन प्रकारकी भावनाएँ सर्वदा विद्यमान रहती हैं। मुझमें प्रथम अक्षरभावना निरन्तर प्रवाहित होती रहती है। भगवान् ब्रह्माजीकी द्वितीय अक्षरभावना कही गयी है ॥ ९१-९२ ॥ |
| अहं चैव महादेवो न भिन्नौ परमार्थतः ।<br>विभज्य स्वेच्छयात्मानं सोऽन्तर्यामीश्वरः स्थितः ॥ ९३ ॥<br><br>त्रैलोक्यमखिलं स्रष्टुं सदेवासुरमानुषम् ।<br>पुरुषः परतोऽव्यक्ताद् ब्रह्मत्वं समुपागमत् ॥ ९४ ॥ | पारमार्थिक दृष्टिसे मुझमें और महादेवमें कोई भिन्नता नहीं है। वही अन्तर्यामी ईश्वर अपनी इच्छासे अपनेको विभाजित कर (मेरे तथा महादेवके रूपमें) स्थित है। देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंके साथ ही सम्पूर्ण त्रैलोक्यकी सृष्टि करनेके लिये (इसी परम) पुरुषने अपने परात्पर अव्यक्त स्वरूपद्वारा ब्रह्मत्वको स्वीकार किया अर्थात् वे ही अव्यक्त परमात्मा सृष्टि करनेके लिये ब्रह्माके रूपमें व्यक्त हुए ॥ ९३-९४॥ |
| तस्माद् ब्रह्मा महादेवो विष्णुर्विश्वेश्वरः परः ।<br>एकस्यैव स्मृतास्तिस्रस्तनूः कार्यवशात् प्रभोः ॥ ९५ ॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन वन्द्याः पूज्याः प्रयत्नतः ।<br>यदिच्छेदचिरात् स्थानं यत्तन्मोक्षाख्यमव्ययम् ॥ ९६ ॥<br><br>वर्णाश्रमप्रयुक्तेन धर्मेण प्रीतिसंयुतः ।<br>पूजयेद् भावयुक्तेन यावज्जीवं प्रतिज्ञया ॥ ९७ ॥ | अतः ब्रह्मा, महादेव एवं परात्पर विश्वेश्वर भगवान् विष्णु (ये तीनों ही) पृथक्-पृथक् कार्यकी दृष्टिसे एक ही प्रभुकी तीन मूर्तियाँ कही गयी हैं। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे विशेषतः (ये तीनों ही) वन्दनीय हैं, पूजनीय हैं। मोक्ष नामसे कहे जानेवाले उस अविनाशी स्थानको यदि शीघ्र ही प्राप्त करनेकी इच्छा हो तो वर्णाश्रम-धर्मके नियमोंका अत्यन्त प्रीतिपूर्वक पालन करते हुए प्रतिज्ञापूर्वक बड़े श्रद्धाभावसे जीवनपर्यन्त इन (त्रिदेवों)-का पूजन करना चाहिये ॥ ९५—९७॥ |
- अध्याय २ * ३१
चतुर्णामाश्रमाणां तु प्रोक्तोऽयं विधिवद्विजाः।
आश्रमो वैष्णवो ब्राह्मो हराश्रम इति त्रयः॥ ९८ ॥
तल्लिङ्गधारी सततं तद्भक्तजनवत्सलः।
ध्यायेदथार्चयेदेतान् ब्रह्मविद्यापरायणः॥ ९९ ॥
सर्वेषामेव भक्तानां शाम्भोर्लिङ्गमनुत्तमम्।
सितेन भस्मना कार्यं ललाटे तु त्रिपुण्ड्रकम्॥ १००॥
यस्तु नारायणं देवं प्रपन्नः परमं पदम्।
धारयेत् सर्वदा शूलं ललाटे गन्धवारिभिः॥ १०१॥
प्रपन्ना ये जगद्बीजं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।
तेषां ललाटे तिलकं धारणीयं तु सर्वदा॥ १०२॥
योऽसावनादिर्भूतादिः कालात्मासौ धृतो भवेत्।
उपर्यधो भावयोगात् त्रिपुण्ड्रस्य तु धारणात्॥ १०३॥
यत्तत् प्रधानं त्रिगुणं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम्।
धृतं त्रिशूलधारणाद् भवत्येव न संशयः॥ १०४॥
ब्रह्मतेजोमयं शुक्लं यदेतन्मण्डलं रवेः।
भवत्येव धृतं स्थानमैश्वरं तिलके कृते॥ १०५॥
तस्मात् कार्यं त्रिशूलाङ्कं तथा च तिलकं शुभम्।
त्रियायुषं च भक्तानां त्रयाणां विधिपूर्वकम्॥ १०६॥
यजेत जुहुयादग्नौ जपेद् दद्याज्जितेन्द्रियः।
शान्तो दान्तो जितक्रोधो वर्णाश्रमविधानवित्॥ १०७॥
एवं परिचरेद् देवान् यावज्जीवं समाहितः।
तेषां संस्थानमचलं सोऽचिरादधिगच्छति॥ १०८॥
हे ब्राह्मणो ! विधिपूर्वक इस प्रकार चारों आश्रमोंका वर्णन किया गया। (इनमें) वैष्णव, ब्राह्म तथा हर (शैव) नामक तीन आश्रम (सम्प्रदाय) होते हैं। उन (शैव, वैष्णव तथा ब्राह्म आश्रमों)-का लिङ्ग (चिह्न) धारणकर उस (देवता)-के भक्तजनोंके प्रति प्रेम रखते हुए ब्रह्मविद्यापरायण व्यक्तिको चाहिये कि वह इन देवोंका निरन्तर ध्यान करे, पूजन करे॥ ९८-९९॥
शिवके सभी भक्तोंके लिये (चिह्न-रूपमें) शिवलिङ्ग धारण करना श्रेष्ठ है। शैवोंको चाहिये कि वे श्वेत भस्मसे ललाटमें त्रिपुण्ड्र धारण करें। जो परम पद (-स्वरूप) भगवान् नारायणके शरणागत (भक्त) हो उसे ललाटपर (कस्तूरी आदिके) सुगन्धित जलसे त्रिशूल (-की आकृति)-का तिलक सर्वदा धारण करना चाहिये। जो संसारके बीज परमेष्ठी ब्रह्माके भक्त हैं, उन्हें ललाटपर सर्वदा तिलक धारण करना चाहिये॥ १००-१०२॥
ऊपर-नीचे भावपूर्वक त्रिपुण्ड्रके धारण करनेसे अनादि (होते हुए भी) जो प्राणियोंका आदि है, कालात्मा है उसका धारण करना हो जाता है। त्रिशूल (चिह्न)-के धारण करनेसे जो वह त्रिगुणात्मक प्रधान ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवस्वरूप है निश्चयरूपसे उसका धारण हो जाता है। तिलक लगानेसे जो आदित्यमण्डलका प्रकाशमान ब्रह्मतेजोमय ऐश्वर्ययुक्त स्थान है उसका धारण हो जाता है॥ १०३-१०५॥
इसलिये (शैव, वैष्णव तथा ब्राह्म) तीनों प्रकारके भक्तोंको विधिपूर्वक मङ्गलमय तथा दीर्घ आयु प्रदान करनेवाले त्रिशूलके चिह्न तथा तिलकको धारण करना चाहिये॥ १०६॥
वर्ण तथा आश्रमके विधि-विधानको जाननेवाले शान्त, दान्त, जितेन्द्रिय तथा क्रोधजयीको यज्ञ, अग्निमें हवन, जप तथा दान करना चाहिये। इस प्रकार यावज्जीवन समाहित-मन होकर देवोंकी आराधना करनी चाहिये। ऐसा करनेसे उसे शीघ्र ही अचल स्थानकी प्राप्ति होती है॥ १०७-१०८॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें दूसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ २॥
३२ * कूर्मपुराण *
तीसरा अध्याय
आश्रमधर्मका वर्णन, संन्यास ग्रहण करनेका क्रम, ब्रह्मार्पणका लक्षण तथा निष्कामकर्मयोगकी महिमा
| ऋषय ऊचुः<br>वर्णा भगवतोद्दिष्टाश्चत्वारोऽप्याश्रमास्तथा।<br>इदानीं क्रममस्माकमाश्रमाणां वद प्रभो॥ १॥ | **ऋषियोंने कहा—**प्रभो! आपने चारों वर्णों तथा चारों आश्रमोंका वर्णन किया। अब हमें आश्रमोंका क्रम बतलायें॥ १॥ |
| श्रीकूर्म उवाच<br>ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा।<br>क्रमेणैवाश्रमाः प्रोक्ताः कारणादन्यथा भवेत्॥ २॥ | **श्रीकूर्म बोले—**ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास—ये क्रमसे आश्रम कहे गये हैं। किसी कारणसे (इस क्रममें) परिवर्तन भी होता है॥ २॥ |
| उत्पन्नज्ञानविज्ञानो वैराग्यं परमं गतः।<br>प्रव्रजेद् ब्रह्मचर्यात् तु यदीच्छेत् परमां गतिम्॥ ३॥ | जो ज्ञान-विज्ञान-सम्पन्न हो तथा परम वैराग्यको प्राप्त हो गया हो ऐसा ब्रह्मचारी यदि परमगतिको प्राप्त करना चाहे तो वह ब्रह्मचर्य-आश्रमसे (सीधे) संन्यास ग्रहण कर ले। इसके विपरीत (अर्थात् ब्रह्मचर्य-आश्रमसे सीधे संन्यास न ग्रहण कर) विधिपूर्वक स्त्रीसे विवाह कर विविध यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए पुत्रोंको उत्पन्न करे और विरक्त होनेपर संन्यास ग्रहण करे॥ ३-४॥ |
| दारानाहृत्य विधिवदन्यथा विविधैर्मखैः।<br>यजेदुत्पादयेत् पुत्रान् विरक्तो यदि संन्यसेत्॥ ४॥ | |
| अनिष्ट्वा विधिवद् यज्ञैरनुत्पाद्य तथात्मजम्।<br>न गार्हस्थ्यं गृही त्यक्त्वा संन्यसेद् बुद्धिमान् द्विजः॥ ५॥ | बुद्धिमान् गृहस्थ द्विजको चाहिये कि वह विधिपूर्वक यज्ञोंका अनुष्ठान तथा पुत्रोंको उत्पन्न किये बिना गृहस्थ-आश्रमका परित्यागकर संन्यास ग्रहण न करे। श्रेष्ठ विद्वान् द्विज यदि तीव्र वैराग्यके वेगके कारण गृहस्थाश्रममें रहनेके लिये उत्सुक न हो तो यज्ञ किये बिना भी वहीं संन्यास ग्रहण कर ले॥ ५-६॥ |
| अथ वैराग्यवेगेन स्थातुं नोत्सहते गृहे।<br>तत्रैव संन्यसेद् विद्वाननिष्ट्वापि द्विजोत्तमः॥ ६॥ | |
| अन्यथा विविधैर्यज्ञैरिष्ट्वा वनमथाश्रयेत्।<br>तपस्तप्त्वा तपोयोगाद् विरक्तः संन्यसेद् यदि॥ ७॥ | अन्यथा विविध यज्ञोंका सम्पादन कर वनका आश्रय लेना चाहिये एवं तपोयोगद्वारा तप करनेके बाद यदि विराग हो जाय तो संन्यास लेना चाहिये। वानप्रस्थ-आश्रम ग्रहण कर फिर गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश नहीं करना चाहिये, न संन्यासी वानप्रस्थ-आश्रममें वापस आये और न साधक गृहस्थ ब्रह्मचर्याश्रममें वापस लौटे॥ ७-८॥ |
| वानप्रस्थाश्रमं गत्वा न गृहं प्रविशेत् पुनः।<br>न संन्यासी वनं चाथ ब्रह्मचर्यं न साधकः॥ ८॥ | |
| प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमाग्नेयीमथवा द्विजः।<br>प्रव्रजेत गृही विद्वान् वनाद् वा श्रुतिचोदनात्॥ ९॥ | विद्वान् गृहस्थ द्विज प्राजापत्य इष्टि अथवा आग्नेयी इष्टिका सम्पादन कर संन्यास ग्रहण करे या वैदिक विधानसे वानप्रस्थसे (संन्यास-आश्रममें) प्रवेश करे। हवन तथा यज्ञ-सम्बन्धी क्रियाओंको करनेमें असमर्थ होनेपर भी अन्धा, लँगड़ा अथवा दरिद्र द्विज वैराग्य होनेपर संन्यास ग्रहण करे। सभीके लिये संन्यासके निमित्त वैराग्यका विधान किया गया है। जो आसक्तियुक्त पुरुष संन्यास-आश्रम ग्रहण करना चाहता है वह अवश्य ही पतित हो जाता है॥ ९-११॥ |
| प्रकर्तुमसमर्थोऽपि जुहोतियजतिक्रियाः।<br>अन्धः पंगुर्दरिद्रो वा विरक्तः संन्यसेद् द्विजः॥ १०॥ | |
| सर्वेषामेव वैराग्यं संन्यासाय विधीयते।<br>पतत्येवाविरक्तो यः संन्यासं कर्तुमिच्छति॥ ११॥ |
श्रीशिव-पार्वतीद्वारा श्रीकृष्णको वरदान
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान्
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् शिव-पार्वती
भगवान्
गीताप्रेस, गोरखपुर
उमा हैमवतीदेवी
[चित्र: भगवान् वराहद्वारा भूदेवीका उद्धार]
जगन्नाथ प्रसाद
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् वराहद्वारा भूदेवीका उद्धार
बी.के. मिश्र
गीताप्रेस, गोरखपुर
आचार्य उपमन्यु और भगवान् श्रीकृष्ण
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् मायावामनका यज्ञवाटमें पूजन
गीताप्रेस, गोरखपुर
सप्ताश्व-वाहन भगवान् सूर्य
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान्—कूर्मरूपमें
| * अध्याय ३ * | ३३ |
|---|---|
| एकस्मिन्नथवा सम्यग् वर्तेतामरणं द्विजः।<br>श्रद्धावानाश्रमे युक्तः सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ १२॥ | अथवा निष्ठावान् द्विजको चाहिये कि किसी भी एक आश्रममें वह यावज्जीवन ठीक-ठीक व्यवहार करता रहे तो मोक्ष प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है। |
| न्यायागतधनः शान्तो ब्रह्मविद्यापरायणः।<br>स्वधर्मपालको नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ १३॥ | न्यायमार्ग (ईमानदारी)-से धन प्राप्त करनेवाला, शान्त, ब्रह्म-विद्यापरायण तथा नित्य अपने धर्मका पालन करनेवाला व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। |
| ब्रह्मण्याधाय कर्माणि निःसंगः कामवर्जितः।<br>प्रसन्नेनैव मनसा कुर्वाणो याति तत्पदम्॥ १४॥ | अपने समस्त कर्मोंको ब्रह्ममें अर्पित कर आसक्तिरहित तथा निष्काम व्यक्ति प्रसन्न-मनसे कर्मोंको करते हुए उस पद (मोक्ष)-को प्राप्त करता है॥ १२-१४॥ |
| ब्रह्मणा दीयते देयं ब्रह्मणे सम्प्रदीयते।<br>ब्रह्मैव दीयते चेति ब्रह्मार्पणमिदं परम्॥ १५॥ | देने योग्य पदार्थ ब्रह्मके द्वारा ही प्राप्त होता है, ब्रह्मको ही दिया जाता है और ब्रह्म ही दिया भी जाता है—यही श्रेष्ठ ब्रह्मार्पण (-की भावना) है। |
| नाहं कर्ता सर्वमेतद् ब्रह्मैव कुरुते तथा।<br>एतद् ब्रह्मार्पणं प्रोक्तमृषिभिः तत्त्वदर्शिभिः॥ १६॥ | मैं कर्ता अर्थात् करनेवाला नहीं हूँ और जो कुछ भी किया जाता है वह ब्रह्म ही करता है—इसे तत्त्वद्रष्टा ऋषियोंने 'ब्रह्मार्पण' नामसे कहा है। |
| प्रीणातु भगवानीशः कर्मणानेन शाश्वतः।<br>करोति सततं बुद्ध्या ब्रह्मार्पणमिदं परम्॥ १७॥ | 'मेरे इस कर्मसे सनातन भगवान् ईश्वर प्रसन्न हों' इस प्रकारकी बुद्धिसे निरन्तर किया गया कर्म श्रेष्ठ ब्रह्मार्पण है। |
| यद्वा फलानां संन्यासं प्रकुर्यात् परमेश्वरे।<br>कर्मणामेतदप्याहुः ब्रह्मार्पणमनुत्तमम्॥ १८॥ | अथवा परमेश्वरमें सभी कर्मोंके फलोंका संन्यास करे—यह भी श्रेष्ठ ब्रह्मार्पण कहा गया है॥ १५-१८॥ |
| कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं संगवर्जितम्।<br>क्रियते विदुषा कर्म तद्भवेदपि मोक्षदम्॥ १९॥ | विद्वान् व्यक्तिके द्वारा आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-बुद्धिसे जो कर्म नियमतः किया जाता है, उसका वह कर्म भी मोक्ष देनेवाला होता है। |
| अन्यथा यदि कर्माणि कुर्यान्नित्यमपि द्विजः।<br>अकृत्वा फलसंन्यासं बध्यते तत्फलेन तु॥ २०॥ | इसके विपरीत यदि द्विज नित्य कर्मोंको करता भी रहे तो कर्मफलका संन्यास न करनेके कारण वह उस कर्मफलके बन्धनसे बँधा रहता है। |
| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन त्यक्त्वा कर्माश्रितं फलम्।<br>अविद्वानपि कुर्वीत कर्माज्योत्यचिरात् पदम्॥ २१॥ | इसलिये अविद्वान् व्यक्तिको भी चाहिये कि सभी प्रकारके प्रयत्नसे कर्मके आश्रित फलका त्यागकर कर्म करता रहे, इससे उसे शीघ्र ही (परम) पद प्राप्त होता है। |
| कर्मणा क्षीयते पापमैहिकं पौर्विकं तथा।<br>मनः प्रसादमन्वेति ब्रह्म विज्ञायते ततः॥ २२॥ | (निष्काम) कर्मसे व्यक्तिके इस जन्म तथा पूर्व-जन्मका पाप नष्ट हो जाता है, तदनन्तर चित्तकी प्रसन्नता प्राप्त होती है और फिर (उसे) ब्रह्मका परिज्ञान हो जाता है॥ १९-२२॥ |
| कर्मणा सहिताज्ज्ञानात् सम्यग् योगोऽभिजायते।<br>ज्ञानं च कर्मसहितं जायते दोषवर्जितम्॥ २३॥ | कर्मयुक्त ज्ञानसे सम्यक् योगकी प्राप्ति होती है और कर्मयुक्त ज्ञान दोषरहित होता है। |
| तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत्र तत्राश्रमे रतः।<br>कर्माणीश्वरतुष्ट्यर्थं कुर्यान्नैष्कर्म्यमाप्नुयात्॥ २४॥ | इसलिये किसी भी आश्रममें रहते हुए सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे भगवान्की प्रसन्नताके लिये कर्मोंको करता रहे। (इससे) नैष्कर्म्यकी प्राप्ति हो जाती है। |
| सम्प्राप्य परमं ज्ञानं नैष्कर्म्यं तत्प्रसादतः।<br>एकाकी निर्ममः शान्तो जीवन्नेव विमुच्यते॥ २५॥ | परम ज्ञानको प्राप्त करनेके अनन्तर उसके प्रभावसे नैष्कर्म्यकी सिद्धि कर वह एकाकी, ममताशून्य तथा शान्त (व्यक्ति) जीवनकालमें ही मुक्तिको प्राप्त कर लेता है अर्थात् जीवन्मुक्त हो जाता है॥ २३-२५॥ |
| ३४ | * कूर्मपुराण * |
|---|
| वीक्षते परमात्मानं परं ब्रह्म महेश्वरम्।<br>नित्यानन्दं निराभासं तस्मिन्नेव लयं व्रजेत्॥ २६॥<br><br>तस्मात् सेवेत सततं कर्मयोगं प्रसन्नधीः।<br>तृप्तये परमेशस्य तत् पदं याति शाश्वतम्॥ २७॥ | (ऐसा व्यक्ति) नित्यानन्दस्वरूप, निराभास (स्वतः-प्रकाश), महेश्वर, परम ब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार कर उसीमें लीन हो जाता है। इसलिये प्रसन्नचित्त होकर परमेश्वरकी संतुष्टिके लिये निरन्तर कर्मयोगका आश्रय ग्रहण करना चाहिये। (इससे वह परमेश्वरके) उस सनातन पदको प्राप्त करता है॥ २६-२७॥ |
| एतद् वः कथितं सर्वं चातुराश्रम्यमुत्तमम्।<br>न ह्येतत् समतिक्रम्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ २८॥ | इस प्रकार आप लोगोंको यह चारों आश्रमोंका सम्पूर्ण श्रेष्ठ क्रम बतलाया। इस क्रमका अतिक्रमण करके कोई भी मनुष्य सिद्धिको प्राप्त नहीं कर सकता॥ २८॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें तीसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ ३॥
चौथा अध्याय
सांख्य-सिद्धान्तके अनुसार ब्रह्माण्डकी सृष्टिका क्रम, पञ्चीकरण-प्रक्रिया तथा परमेश्वरके विविध नामोंका निरूपण
| सूत उवाच | सूतजीने कहा—आश्रमोंके सम्बन्धमें पूरे विधिविधानको सुनकर प्रसन्न मनवाले ऋषियोंने भगवान् हृषीकेशको नमस्कार करके पुनः इस प्रकारका वचन कहा—॥ १॥ |
|---|---|
| श्रुत्वाश्रमविधिं कृत्स्नमृषयो हृष्टमानसाः।<br>नमस्कृत्य हृषीकेशं पुनर्वचनमब्रुवन्॥ १॥ | |
| मुनय ऊचुः | मुनिजन बोले—(भगवन्!) आपने श्रेष्ठ चारों आश्रमोंके विषयमें सब कुछ बतलाया, अब इस समय हमें यह सुननेकी इच्छा है कि इस जगत्की सृष्टि कैसे होती है। हे पुरुषोत्तम! यह सब (संसार) कहाँसे उत्पन्न हुआ, किसमें विलीन होगा और इन सबका नियामक कौन है? यह सब आप बतलायें। ऋषियोंका वचन सुनकर कूर्मरूप धारण करनेवाले तथा सभी भूत-प्राणियोंके उत्पत्ति और विनाशके स्थान भगवान् नारायण गम्भीर वाणीमें बोले—॥ २–४॥ |
| भाषितं भवता सर्वं चातुराश्रम्यमुत्तमम्।<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामो यथा सम्भवते जगत्॥ २॥ | |
| कुतः सर्वमिदं जातं कस्मिंश्च लयमेष्यति।<br>नियन्ता कश्च सर्वेषां वदस्व पुरुषोत्तम॥ ३॥ | |
| श्रुत्वा नारायणो वाक्यमृषीणां कूर्मरूपधृक्।<br>प्राह गम्भीरया वाचा भूतानां प्रभवाप्ययौ॥ ४॥ | |
| श्रीकूर्म उवाच | **श्रीकूर्मने कहा—**सर्वत्र (चारों ओर) मुखवाले महेश्वर (प्रकृतिसे) पर, अव्यक्त, चतुर्व्यूह, सनातन, अनन्त, अप्रमेय तथा (समस्त जगत्के) नियन्ता हैं। तत्त्वचिन्तक जिसे प्रधान और प्रकृति कहते हैं और जो सत्-असत्-रूप हैं, वही अव्यक्त नित्य कारण है॥ ५-६॥ |
| महेश्वरः परोऽव्यक्तश्चतुर्व्यूहः सनातनः।<br>अनन्तश्चाप्रमेयश्च नियन्ता विश्वतोमुखः॥ ५॥ | |
| अव्यक्तं कारणं यत्तन्नित्यं सदसदात्मकम्।<br>प्रधानं प्रकृतिश्चेति यदाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥ ६॥ | |
| गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।<br>अजरं ध्रुवमक्षय्यं नित्यं स्वात्मन्यवस्थितम्॥ ७॥ | गन्ध, वर्ण और रससे हीन, शब्द-स्पर्शसे रहित, अजर, ध्रुव, अक्षय्य (कभी नाश न होनेवाला), नित्य |
| * अध्याय ४ * | ३५ |
|---|---|
| जगद्योन्निर्महाभूतं परं ब्रह्म सनातनम्।<br>विग्रहः सर्वभूतानामात्मनाधिष्ठितं महत्॥ ८ ॥<br><br>अनाद्यन्तमजं सूक्ष्मं त्रिगुणं प्रभवाप्ययम्।<br>असाम्प्रतमविज्ञेयं ब्रह्माग्ने समवर्तत॥ ९ ॥<br>गुणसाम्ये तदा तस्मिन् पुरुषे चात्मनि स्थिते।<br>प्राकृतः प्रलयो ज्ञेयो यावद् विश्वसमुद्भवः॥ १० ॥<br><br>ब्राह्मी रात्रिरियं प्रोक्ता अहः सृष्टिरुदाहृता।<br>अहर्न विद्यते तस्य न रात्रिर्ह्युपचारतः॥ ११ ॥<br>निशान्ते प्रतिबुद्धोऽसौ जगदादिरनादिमान्।<br>सर्वभूतमयोऽव्यक्त्तो ह्यन्तर्यामीश्वरः परः॥ १२ ॥<br><br>प्रकृतिं पुरुषं चैव प्रविश्याशु महेश्वरः।<br>क्षोभयामास योगेन परेण परमेश्वरः॥ १३ ॥<br>यथा मदो नरस्त्रीणां यथा वा माधवोऽनिलः।<br>अनुप्रविष्टः क्षोभाय तथासौ योगमूर्तिमान्॥ १४ ॥<br><br>स एव क्षोभको विप्राः क्षोभ्यश्च परमेश्वरः।<br>स संकोचविकासाभ्यां प्रधानत्वेऽपि च स्थितः॥ १५ ॥<br><br>प्रधानात् क्षोभ्यमाणाच्च तथा पुंसः पुरातनात्।<br>प्रादुरासीन्महद् बीजं प्रधानपुरुषात्मकम्॥ १६ ॥<br><br>महानात्मा मतिर्ब्रह्मा प्रबुद्धिः ख्यातिरीश्वरः।<br>प्रज्ञा धृतिः स्मृतिः संविदेतस्मादिति तत् स्मृतम्॥ १७ ॥<br><br>वैकारिकस्तैजसश्च भूतादिश्चैव तामसः।<br>त्रिविधोऽयमहंकारो महतः सम्बभूव ह॥ १८ ॥<br><br>अहंकारोऽभिमानश्च कर्ता मन्ता च स स्मृतः।<br>आत्मा च पुद्गलो जीवो यतः सर्वाः प्रवृत्तयः॥ १९ ॥<br><br>पञ्चभूतान्यहंकारात् तन्मात्राणि च जज्ञिरे।<br>इन्द्रियाणि तथा देवाः सर्वं तस्यात्मजं जगत्॥ २० ॥ | अपनी आत्मामें स्थित संसारका बीजरूप, महाभूत, सनातन, परब्रह्म, सभी प्राणियोंकी मूर्तिरूप, आत्मासे अधिष्ठित, महत्तत्त्व, अनादि, अनन्त, अजन्मा, सूक्ष्म, त्रिगुण, उत्पत्ति और प्रलयका स्थान, शाश्वत तथा अविज्ञेय ब्रह्म ही आदिमें विद्यमान था॥ ७—९॥<br>उस समय गुणोंकी साम्यावस्थारूप उस पुरुषके आत्मस्वरूपमें स्थित होनेपर जबतक विश्वकी सृष्टि नहीं हो जाती, प्राकृत प्रलय (-का समय) जानना चाहिये। यह ब्रह्माकी रात्रि कही गयी है और सृष्टिको ब्रह्माका दिन कहा गया है, (वास्तवमें) उसका न दिन होता है और न रात होती है॥ १०-११॥<br>आदिसे रहित वह जगत्का आदि कारण, सर्वभूतमय, अव्यक्त, अन्तर्यामी परात्पर ईश्वर रात्रि व्यतीत होनेपर जाग्रत् हुआ। परमेश्वर महेश्वरने प्रकृति एवं पुरुषमें शीघ्र ही प्रविष्ट होकर परम योगके द्वारा (उनमें) क्षोभ (गति) उत्पन्न किया॥ १२-१३॥<br>जैसे वसन्त ऋतुकी वायु अथवा मद पुरुष एवं स्त्रियोंको (क्षुब्ध करता है) वैसे ही वह योगविग्रह (योगबलसे विविध शरीर-धारणमें समर्थ ईश्वर) प्रकृति एवं पुरुषमें अनुप्रविष्ट होकर क्षोभका कारण बनता है। हे ब्राह्मणो! वही परमेश्वर क्षोभ उत्पन्न करनेवाला है एवं स्वयं क्षुब्ध होनेवाला है, वह प्रलय एवं सृष्टि करनेके कारण प्रधान भी कहलाता है। प्रधान पुरातनपुरुषके क्षुब्ध होनेसे प्रधान (प्रकृति) पुरुषात्मक महद् बीजका आविर्भाव हुआ॥ १४-१६॥<br>इसी कारणसे (वह महद्बीज) महान् आत्मा, मति, ब्रह्मा, प्रबुद्धि, ख्याति, ईश्वर, प्रज्ञा, धृति, स्मृति तथा संवित् कहलाता है॥ १७॥<br>महत्तत्त्वसे समस्त प्राणियोंकी सृष्टिका आदि कारण—वैकारिक, तैजस तथा तामस—यह तीन प्रकारका अहंकार उत्पन्न हुआ॥ १८॥<br>वह अहंकार अभिमान, कर्ता, मन्ता, आत्मा, पुद्गल तथा जीव (नामों)-से कहा गया है। उसी अहंकारसे सभी प्रवृत्तियाँ होती हैं। अहंकारसे पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश), पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध), सभी इन्द्रियाँ तथा उन इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ देवता उत्पन्न हुए। यह सम्पूर्ण जगत् उससे ही उत्पन्न हुआ है॥ १९-२०॥ |
३६
- कूर्मपुराण *
| मनस्त्वव्यक्तजं प्रोक्तं विकारः प्रथमः स्मृतः ।<br>येनासौ जायते कर्ता भूतादींश्चानुपश्यति ॥ २१ ॥ | अव्यक्तसे उत्पन्न मनको प्रथम विकार माना गया है। इस कारण यह कर्ता एवं भूतादिकोंको देखनेवाला है। वैकारिक अहंकारसे वैकारिक सृष्टि उत्पन्न हुई। इन्द्रियाँ तैजस हैं और (उन इन्द्रियोंके अधिष्ठाता) दस देवता वैकारिक हैं ॥ २१-२२ ॥ |
| वैकारिकादहंकारात् सर्गो वैकारिकोऽभवत् ।<br>तैजसानीन्द्रियाणि स्युर्देवा वैकारिका दश ॥ २२ ॥<br>एकादशं मनस्तत्र स्वगुणेनोभयात्मकम् ।<br>भूततन्मात्रसर्गोऽयं भूतादेरभवन् प्रजाः ॥ २३ ॥ | उनमें (ग्यारहवाँ) इन्द्रिय मन अपने गुणके कारण उभयात्मक* है। यह भूततन्मात्राओंकी सृष्टि है। भूतादिकोंसे ही प्रजा उत्पन्न हुई। विकारप्राप्त भूतोंने शब्दतन्मात्राको उत्पन्न किया। उस (शब्द तन्मात्रा)-से शब्द लक्षण-वाले तथा अवकाशस्वरूप आकाशकी उत्पत्ति हुई। वैकारिक आकाशने स्पर्श तन्मात्राको उत्पन्न किया। उससे वायु उत्पन्न हुआ और वायुका गुण स्पर्श कहा गया है ॥ २३-२५ ॥ |
| भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दमात्रं ससर्ज ह ।<br>आकाशं शुषिरं तस्मादुत्पन्नं शब्दलक्षणम् ॥ २४ ॥ | |
| आकाशस्तु विकुर्वाणः स्पर्शमात्रं ससर्ज ह ।<br>वायुरुत्पद्यते तस्मात् तस्य स्पर्शो गुणो मतः ॥ २५ ॥ | |
| वायुश्चापि विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह ।<br>ज्योतिरुपद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते ॥ २६ ॥ | विकारप्राप्त वायुने रूप तन्मात्राको उत्पन्न किया, वायुसे तेज उत्पन्न हुआ और इसका 'रूप' गुण कहा जाता है। विकारको प्राप्त हुए तेजने भी रस तन्मात्राकी सृष्टि की और उससे फिर जलकी उत्पत्ति हुई, वह जल इस 'रस' गुणका आधार है। विकारको प्राप्त हो रहे जलने गन्ध तन्मात्राको उत्पन्न किया, उससे संघात (पृथ्वीतत्त्व) उत्पन्न हुआ और उसका गुण 'गन्ध' माना गया है ॥ २६-२८ ॥ |
| ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह ।<br>सम्भवन्ति ततोऽम्भांसि रसाधाराणि तानि तु ॥ २७ ॥ | |
| आपश्चापि विकुर्वन्त्यो गन्धमात्रं ससर्जरे ।<br>संघातो जायते तस्मात् तस्य गन्धो गुणो मतः ॥ २८ ॥ | |
| आकाशं शब्दमात्रं यत् स्पर्शमात्रं समावृणोत् ।<br>द्विगुणस्तु ततो वायुः शब्दस्पर्शात्मकोऽभवत् ॥ २९ ॥ | आकाशकी शब्द नामक तन्मात्रा है, उसने स्पर्श नामक तन्मात्राको आवृत किया है, इसलिये वायु शब्द तथा स्पर्श—इन दो गुणोंवाला है। उसी प्रकार रूप (नामक) गुण, शब्द एवं स्पर्श दो गुणोंसे आविष्ट है, अतः तेज या अग्नि—शब्द, स्पर्श तथा रूप—इन तीन गुणोंवाला है। शब्द, स्पर्श तथा रूप एवं रस तन्मात्रामें प्रविष्ट हुए, इसलिये रसात्मक जल-तत्त्वको चार गुणों (शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस)-से युक्त समझना चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस—ये चार गुण गन्ध तन्मात्रामें प्रविष्ट हुए, इसलिये पञ्च स्थूल महाभूतसे युक्त पृथ्वी तत्त्व पाँच गुणोंवाला कहा गया है ॥ २९-३२ ॥ |
| रूपं तथैवाविशतः शब्दस्पर्शौ गुणावुभौ ।<br>त्रिगुणः स्यात् ततो वह्निः स शब्दस्पर्शरूपवान् ॥ ३० ॥ | |
| शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसमात्रं समाविशन् ।<br>तस्माच्चतुर्गुणा आपो विज्ञेयास्तु रसात्मिकाः ॥ ३१ ॥ | |
| शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धं समाविशन् ।<br>तस्मात् पञ्चगुणा भूमिः स्थूला भूतेषु शब्द्यते ॥ ३२ ॥ | |
| शान्ता घोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः ।<br>परस्परानुप्रवेशाद् धारयन्ति परस्परम् ॥ ३३ ॥ | इसी कारण ये शान्त, घोर, मूढ तथा विशेष कहलाते हैं। ये परस्पर एक-दूसरेमें प्रविष्ट होनेके कारण आपसमें एक दूसरेको धारण किये रहते हैं ॥ ३३ ॥ |
* हस्त आदि पाँच कर्मेन्द्रिय हैं तथा चक्षु आदि पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं। 'मन' उभयात्मक है अर्थात् संकल्प-विकल्प-रूप कर्म भी करता है तथा उसे सुख-दुःखका ज्ञान भी होता है।
| * अध्याय ४ * | ३७ |
|---|
| एते सप्त महात्मानो ह्यन्योन्यस्य समाश्रयात्।<br>नाशक्नुवन् प्रजाः स्रष्टुमसमागम्य कृत्स्नशः ॥ ३४ ॥<br><br>पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च अव्यक्तानुग्रहेण च।<br>महदादयो विशेषान्ता ह्यण्डमुत्पादयन्ति ते ॥ ३५ ॥<br>एककालसमुत्पन्नं जलबुद्बुदवच्च तत्।<br>विशेषेभ्योऽण्डमभवद् बृहत् तदुदकेशयम् ॥ ३६ ॥<br><br>तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धिः परमेष्ठिनः।<br>प्राकृतेऽण्डे विवृत्तः स क्षेत्रज्ञो ब्रह्मसंज्ञितः ॥ ३७ ॥<br><br>स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते।<br>आदिकर्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्तत ॥ ३८ ॥<br><br>यमाहुः पुरुषं हंसं प्रधानात् परतः स्थितम्।<br>हिरण्यगर्भं कपिलं छन्दोमूर्त्तिं सनातनम् ॥ ३९ ॥<br>मेरुरुल्बमभूत् तस्य जरायुश्चापि पर्वताः।<br>गर्भोदकं समुद्राश्च तस्यासन् परमात्मनः ॥ ४० ॥<br><br>तस्मिन्नण्डेऽभवद् विश्वं सदेवासुरमानुषम्।<br>चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ सग्रहौ सह वायुना ॥ ४१ ॥<br>अद्भिर्दशगुणाभिश्च बाह्यतोऽण्डं समावृतम्।<br>आपो दशगुणेनैव तेजसा बाह्यतो वृताः ॥ ४२ ॥<br><br>तेजो दशगुणेनैव बाह्यतो वायुनावृतम्।<br>आकाशेनावृतो वायुः खं तु भूतादिनावृतम् ॥ ४३ ॥<br><br>भूतादिर्महता तद्वदव्यक्तेनावृतो महान्।<br>एते लोका महात्मानः सर्वतत्त्वाभिमानिनः ॥ ४४ ॥<br>वसन्ति तत्र पुरुषास्तदात्मानो व्यवस्थिताः।<br>ईश्वरा योगधर्माणो ये चान्ये तत्त्वचिन्तकाः ॥ ४५ ॥<br><br>सर्वज्ञाः शान्तरजसो नित्यं मुदितमानसाः।<br>एतैरावरणैरण्डं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम् ॥ ४६ ॥ | ये सातों महात्मा (महत्, अहंकार आदि तत्त्व) एक-दूसरेके आश्रित होनेके कारण बिना सम्पूर्ण रूपसे मिले सृष्टि करनेमें समर्थ नहीं हो सके ॥ ३४ ॥ पुरुषसे अधिष्ठित और अव्यक्तसे अनुगृहीत होनेके कारण महत्तत्त्वसे लेकर विशेष (पञ्चभूत)-पर्यन्त वे सभी (तत्त्व) अण्डको उत्पन्न करते हैं ॥ ३४-३५ ॥<br>विशेषों (महाभूतों)-से एक बारमें ही जलके बुलबुलेके समान तथा जलमें स्थित वह बृहत् अण्ड उत्पन्न हुआ। उसी (बृहत् अण्ड)-में परमेष्ठीके (सृष्टिस्वरूप) कार्यका करण सिद्ध (निष्पन्न) हुआ। प्राकृत अण्डमें क्षेत्रज्ञ आविर्भूत हुआ जो ब्रह्मा नामसे कहलाया। वे प्रथम शरीर धारण करनेवाले हैं। वे पुरुष कहलाते हैं और समस्त प्राणियोंके आदिकर्ता वे ब्रह्मा सर्वप्रथम उत्पन्न हुए। प्रधानसे परमें स्थित उस पुरुषको हंस, हिरण्यगर्भ, कपिल, छन्दोमूर्ति तथा सनातन कहा जाता है ॥ ३६-३९ ॥<br>उस परमात्माका गर्भवेष्टन था मेरु, पर्वत थे गर्भके आवरणरूप चर्म-जरायु तथा गर्भोदक थे सभी समुद्र। उस अण्डमें देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसहित सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ तथा ग्रहों, नक्षत्रोंसहित वायु, सूर्य एवं चन्द्रमा भी उत्पन्न हुए ॥ ४०-४१ ॥<br>अण्ड (ब्रह्माण्ड) बाहरकी ओर अपनेसे दस गुने अधिक जलसे घिरा हुआ है और जल बाहरसे अपनेसे दस गुने अधिक तेजसे आवृत है। तेज बाहरसे अपनेसे दस गुने अधिक वायुसे आवृत है। इसी प्रकार वायु आकाशसे आवृत है और आकाश भूतादि अर्थात् अहंकारसे घिरा हुआ है। जैसे अहंकार महत्तत्त्वसे आवृत है, वैसे ही महत्तत्त्व अव्यक्तसे आवृत है। ये लोक सर्वतत्त्वाभिमानी महान् स्वरूप-वाले हैं ॥ ४२-४४ ॥<br>उन (लोकों)-में उन्हींके आत्मरूप ऐश्वर्यसम्पन्न तथा योगधर्मा (योगधर्मसे युक्त) पुरुष निवास करते हैं और अन्य भी जो तत्त्वचिन्तक हैं, वे भी निवास करते हैं। (वे सभी पुरुष) सर्वज्ञ, शान्त रजोगुणवाले अर्थात् सत्त्वसम्पन्न तथा नित्य ही अत्यन्त प्रसन्न मनवाले हैं। ब्रह्माण्ड इन्हीं प्राकृत सात आवरणोंसे आवृत है ॥ ४५-४६ ॥ |
३८ * कूर्मपुराण *
| एतावच्छक्यते वक्तुं मायैषा गहना द्विजाः।<br>एतत् प्राधानिकं कार्यं यन्मया बीजमीरितम्।<br>प्रजापतेः परा मूर्तिरितीयं वैदिकी श्रुतिः॥ ४७॥ | ब्राह्मणो! (इस विषयमें) केवल इतना ही कहा जा सकता है कि 'यह माया बहुत ही गहन है'। बीजरूपसे मैंने जिसका वर्णन किया वह सब प्रधान अर्थात् प्रकृतिका कार्य (व्यापार) है। यह (प्रकृति या माया अन्य और कोई नहीं) प्रजापतिकी (ही) परा मूर्ति है—ऐसा वेदोंका अभिमत है॥ ४७॥ |
| ब्रह्माण्डमेतत् सकलं सप्तलोकतलान्वितम्।<br>द्वितीयं तस्य देवस्य शरीरं परमेष्ठिनः॥ ४८॥ | सात लोकोंके तलसे युक्त यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उन परमेष्ठी देवका दूसरा शरीर है। वेदोंके अर्थको ठीक-ठीक जाननेवाले बतलाते हैं कि सोनेके समान वर्णवाले पीत अण्डसे प्रादुर्भूत हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्मा भगवान्के तीसरे रूप (शरीर) हैं॥ ४८-४९॥ |
| हिरण्यगर्भो भगवान् ब्रह्मा वै कनकाण्डजः।<br>तृतीयं भगवद्रूपं प्राहुर्वेदार्थवेदिनः॥ ४९॥ | |
| रजोगुणमयं चान्यद् रूपं तस्यैव धीमतः।<br>चतुर्मुखः स भगवान् जगत्सृष्टौ प्रवर्तते॥ ५०॥ | उन्हीं धीमान्का जो रजोगुणयुक्त अन्य रूप है, वे ही चतुर्मुख भगवान् ब्रह्मा हैं तथा संसारकी सृष्टि करते हैं। स्वयं विश्वेश्वर विश्वतोमुख विश्वात्मा भगवान् विष्णु सत्त्वगुणका आश्रय ग्रहणकर उत्पन्न हुए सम्पूर्ण (संसार)-का पालन-पोषण करते हैं। अन्तकालमें स्वयं परमेश्वर सर्वात्मा रुद्रदेव तमोगुणका समाश्रयणकर संसारका संहार करते हैं॥ ५०—५२॥ |
| सृष्टं च पाति सकलं विश्वात्मा विश्वतोमुखः।<br>सत्त्वं गुणमुपाश्रित्य विष्णुर्विश्वेश्वरः स्वयम्॥ ५१॥ | |
| अन्तकाले स्वयं देवः सर्वात्मा परमेश्वरः।<br>तमोगुणं समाश्रित्य रुद्रः संहरते जगत्॥ ५२॥ | |
| एकोऽपि सन्महादेवस्त्रिधासौ समवस्थितः।<br>सर्गरक्षालयगुणैर्निर्गुणोऽपि निरञ्जनः।<br>एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः॥ ५३॥ | एक होनेपर भी वे निर्गुण-निरञ्जन महादेव सृष्टि, पालन और संहाररूपी तीन गुणोंके कारण तीन रूपोंमें स्थित हैं। वे कभी एक, कभी दो, कभी तीन तथा कभी अनन्त रूप धारण कर लेते हैं। वे योगेश्वर (परमात्मा) अपनी लीलासे अनेक आकार, क्रिया, रूप तथा नामवाले शरीरोंका निर्माण करते हैं और फिर संहार कर डालते हैं॥ ५३-५४॥ |
| योगेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च।<br>नानाकृतिक्रियारूपनामवन्ति स्वलीलया॥ ५४॥ | |
| हिताय चैव भक्तानां स एव ग्रसते पुनः।<br>त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैकाल्ये सम्प्रवर्तते।<br>सृजते ग्रसते चैव वीक्षते च विशेषतः॥ ५५॥ | भक्तोंके कल्याणके लिये ही वे पुनः संहार करते हैं। अपनेको तीन रूपोंमें विभक्तकर तीनों कालोंमें प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार (वे) विशेष रूपसे सृष्टि, संहार और पालनका कार्य करते हैं॥ ५५॥ |
| यस्मात् सृष्टाननुगृह्णाति ग्रसते च पुनः प्रजाः।<br>गुणात्मकत्वात् त्रैकाल्ये तस्मादेकः स उच्यते॥ ५६॥ | चूँकि वे (स्वयं ही) प्रजाकी सृष्टि करते हैं, उसका पालन करते हैं और (स्वयं उसका) पुनः संहार करते हैं, इसलिये तीनों कालोंमें (सत्त्व, रज तथा तमरूप) त्रिगुणात्मक होनेसे वे (परमात्मा) एक (अद्वैत) कहलाते हैं। प्रारम्भमें वे सनातन हिरण्यगर्भ प्रादुर्भूत हुए। आदिमें उत्पन्न होनेसे वे आदिदेव तथा अजन्मा होनेसे अज कहलाते हैं॥ ५६-५७॥ |
| अग्रे हिरण्यगर्भः स प्रादुर्भूतः सनातनः।<br>आदित्वादादिदेवोऽसौ अजातत्वादजः स्मृतः॥ ५७॥ |
- अध्याय ४ * | ३९ ---|---
पाति यस्मात् प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः।<br>देवेषु च महादेवो महादेव इति स्मृतः॥ ५८॥ | वे समस्त प्रजाओंका पालन करते हैं, इसलिये 'प्रजापति' इस नामसे कहे जाते हैं और देवताओंमें सबसे बड़े देव हैं, इसलिये 'महादेव' कहलाते हैं॥ ५८॥ बृहत्त्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा परत्वात् परमेश्वरः।<br>वशित्वादप्यवश्यत्वादीश्वरः परिभाषितः॥ ५९॥ | बृहत् होनेसे वे ब्रह्मा तथा परम (श्रेष्ठ) होनेके कारण परमेश्वर कहे जाते हैं। सबको अपने वशमें रखनेवाले, परंतु स्वयं किसीके वशमें न रहनेके कारण वे ईश्वर (नामसे) परिभाषित किये जाते हैं। ऋषिः सर्वत्रगत्वेन हरिः सर्वहरो यतः।<br>अनुत्पादाच्च पूर्वत्वात् स्वयम्भूरिति स स्मृतः॥ ६०॥ | उनकी सर्वत्र गति होनेके कारण वे ऋषि और (प्रलयकालमें) सब कुछ हरण करनेके कारण हरि कहलाते हैं। किसीके द्वारा उत्पन्न न होने तथा सर्वप्रथम होनेके कारण 'स्वयम्भू' इस नामसे कहे जाते हैं। सभी मनुष्योंके वे अयन (आश्रय-स्थान) हैं, इसलिये नराणामयनो यस्मात् तेन नारायणः स्मृतः।<br>हरः संसारहरणाद् विभुत्वाद् विष्णुरुच्यते॥ ६१॥<br>भगवान् सर्वविज्ञानादवनादोमिति स्मृतः।<br>सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात् सर्वः सर्वमयो यतः॥ ६२॥ | नारायण कहे जाते हैं, संसारका संहार करनेसे हर तथा सर्वत्र व्यापक होनेसे विष्णु कहलाते हैं॥ ५९-६१॥<br>(वे) सब कुछ जाननेके कारण भगवान् तथा रक्षा-कार्य करनेसे ॐ कहलाते हैं। सभीका विशिष्ट ज्ञान होनेसे सर्वज्ञ तथा सभीके आत्मस्वरूप होनेके कारण वे सर्व कहे जाते हैं। वे मलशून्य हैं, इसलिये शिव और सर्वत्र व्याप्त होनेसे विभु तथा शिवः स निर्मलो यस्माद् विभुः सर्वगतो यतः।<br>तारणात् सर्वदुःखानां तारकः परिगीयते॥ ६३॥ | सभी प्रकारके कष्टोंका निवारण करनेसे 'तारक' कहलाते हैं॥ ६२-६३॥ बहुनात्र किमुक्तेन सर्वं ब्रह्ममयं जगत्।<br>अनेकभेदभिन्नस्तु क्रीडते परमेश्वरः॥ ६४॥ | और अधिक कहनेसे क्या लाभ! यह सारा जगत् ब्रह्ममय ही है और वे परमेश्वर अनेक रूपोंमें विभक्त होकर अनेक क्रीड़ाएँ (लीलाएँ) करते रहते हैं॥ ६४॥ इत्येष प्राकृतः सर्गः संक्षेपात् कथितो मया।<br>अबुद्धिपूर्वको विप्रा ब्राह्मीं सृष्टिं निबोधत॥ ६५॥ | हे ब्राह्मणो! मैंने संक्षेपमें इस अबुद्धिपूर्वक हुए प्राकृत सर्ग (प्राकृत सृष्टि)-का वर्णन किया है। अब आप लोग ब्रह्माकी सृष्टिके सम्बन्धमें सुनें॥ ६५॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे चतुर्थोऽध्यायः॥ ४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें चौथा अध्याय समाप्त हुआ॥ ४॥
४० * कूर्मपुराण *
पाँचवाँ अध्याय
ब्रह्माजीकी आयुका वर्णन, युग, मन्वन्तर तथा कल्प आदि कालकी गणना, प्राकृत प्रलय तथा कालकी महिमाका वर्णन
| श्रीकूर्म उवाच | श्रीकूर्मने कहा— श्रेष्ठ ब्राह्मणो! स्वयम्भू-ब्रह्माके बीते हुए कालकी गणनाका वर्णन बहुत वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता। संक्षेपमें कालकी गणना दो परार्ध कही गयी है। वही परम काल है और उसके बीत जानेपर प्रलय होता है॥ १-२॥ |
|---|---|
| स्वयम्भुवो विवृत्तस्य कालसंख्या द्विजोत्तमाः।<br>न शक्यते समाख्यातुं बहुवर्षैरपि स्वयम्॥ १ ॥ | |
| कालसंख्या समासेन परार्धद्वयकल्पिता।<br>स एव स्यात् परः कालः तदन्ते प्रतिसृज्यते॥ २ ॥ | |
| निजेन तस्य मानेन आयुर्वर्षशतं स्मृतम्।<br>तत् पराख्यं तदर्धं च परार्धमभिधीयते॥ ३ ॥ | अपने मानसे ब्रह्माकी एक सौ वर्षकी आयु कही गयी है। उसी (ब्रह्माकी एक सौ वर्षकी आयु)-को 'पर' नामसे कहा जाता है और उस परका आधा 'परार्ध' कहलाता है॥ ३॥ |
| काष्ठा पञ्चदश ख्याता निमेषा द्विजसत्तमाः।<br>काष्ठास्त्रिंशत् कला त्रिंशत् कला मौहूर्तकी गतिः॥ ४ ॥ | द्विजोत्तमो! पंद्रह निमेषकी एक काष्ठा कही गयी है। तीस काष्ठाकी एक कला और तीस कलाका समय एक मुहूर्त-काल होता है। उतनी ही संख्या अर्थात् तीस मुहूर्तोंका एक मानवीय अहोरात्र (दिन-रात) होता है, उतने ही अर्थात् तीस अहोरात्रोंका एक मास होता है जो दो पक्षवाला है। छः मासोंका एक अयन तथा उत्तर एवं दक्षिण नामसे दो अयनोंका एक वर्ष होता है। दक्षिण अयन अर्थात् दक्षिणायन देवताओंकी रात्रि और उत्तर अयन अर्थात् उत्तरायण (देवताओंका) दिन होता है॥ ४–६॥ |
| तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम्।<br>अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः॥ ५ ॥ | |
| तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे।<br>अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्॥ ६ ॥ | |
| दिव्यैर्वर्षसहस्रैस्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम्।<br>चतुर्युगं द्वादशभिः तद्विभागं निबोधत॥ ७ ॥ | (श्रीकूर्मने ब्राह्मणोंसे कहा—) दिव्य बारह हजार वर्षोंका सत्य, त्रेता इत्यादि नामसे एक चतुर्युग होता है। उसके विभागोंका वर्णन सुनें॥ ७॥ |
| चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च कृतस्य तु॥ ८ ॥ | चार हजार दिव्य वर्षोंका सत्ययुग होता है। सत्ययुगकी उतने ही सौ वर्षोंकी अर्थात् चार सौ वर्षोंकी संध्या तथा संध्यांश (त्रेतायुगका संधिकाल) होता है। सत्ययुगके संध्यांशको छोड़कर क्रमशः तीन सौ, दो सौ तथा एक सौ—इस प्रकार कुल मिलाकर दिव्य छः सौ वर्षोंके द्वापर तथा कलियुगके संध्या तथा संध्यांश होते हैं॥ ८-९॥ |
| त्रिशती द्विशती संध्या तथा चैकशती क्रमात्।<br>अंशकं षट्शतं तस्मात् कृतसंध्यांशकं विना॥ ९ ॥ | |
| त्रिद्व्येकसाहस्रमतो विना संध्यांशकेन तु।<br>त्रेताद्वापरतिष्याणां कालज्ञाने प्रकीर्तितम्॥ १०॥ | कालका ज्ञान करनेके लिये संध्यांशोंसे रहित त्रेता, द्वापर तथा कलियुग क्रमशः तीन, दो तथा एक हजार (दिव्य) वर्षोंके कहे गये हैं। कुछ अधिकता लिये यही (दिव्य) बारह हजार वर्षोंका कालपरिमाण कहा गया है। इसके इकहत्तर गुना कालको एक मनुका अन्तर अर्थात् एक मन्वन्तरका समय कहा गया है॥ १०-११॥ |
| एतद् द्वादशसाहस्रं साधिकं परिकल्पितम्।<br>तदेकसप्ततिगुणं मनोरन्तरमुच्यते॥ ११ ॥ |