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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

( ९२ ) लीलावती । माणिक एक १ नीलमणि सतानवे ९७ मुक्ता एक १ हीरा है. चौथेके पास एक १ माणिक एक १ नीलमणि एक १ मोती दो २ हीरा है सबका उपरोक्त मूल्यके अनु- सार जोडनेसे समधन २३३ दोसौ तैंतीस होता है जैसा कि आगे यंत्रमें लिखा है

व्यौपारी. | पहला | दूसरा | तीसरा | चौथा माणिक. | ५ | १ | १ | १ नीलमणि. | १ | ७ | १ | १ मुक्ताफल. | १ | १ | ९७ | १ हीरा. | १ | १ | १ | २

| | पहला | दूसरा | तीसरा | चौथा | माणिक. एकका मू० २४ | संख्या. मूल्य. ५ १२० | संख्या. मूल्य. १ २४ | संख्या. मूल्य. १ २४ | संख्या. मूल्य. १ २४ | नीलमणि. एकका मू० १६ | सं० मू० १ १६ | सं० मू० ७ ११२ | सं० मू० १ १६ | सं० मू० १ १६ | मुक्ताफल. एकका मू० १ | सं० मू० १ १ | सं० मू० १ १ | सं० मू० ९७ ९७ | सं० मू० १ १ | हीरा. एकका मू० ९६ | सं० मू० ९६ | सं० मू० १ ९६ | सं० मू० १ ९६ | सं० मू० २ १९२ | सबका जोड. | २३३ | २३३ | २३३ | २३३ |

इस उदाहरणमें इष्ट कल्पना करना अपनी बुद्धिके अनुसार लिखा है. उसकी रीति यह है कि, रत्नोंमें मनुष्य संख्यासे गुणा करी हुई दोकी संख्या घटाकर जो रत्न शेष रहें उनमेंसे पहली दो राशियोंमें किसी अंकका परिवर्तन लगे तो दे ले. परिवर्तन देनेसे जो अंक आवे उनको परस्पर घात कर ले. घात करनेसे जो अंक आवें उनको जिस अंकका परिवर्तन दिया हो उससे गुणा करे. फिर जो अंक हो उसका एक राशि शोषित रत्नोंमेंकी दोनोंको किसी अंकका परिवर्तन लग सके तो दे, परिवर्तन देनेसे जो अंक आवे उनका परस्पर घात करे और जिस अंकका परिवर्तन दिया हो, उससे गुणा करे, इसी प्रकार जितनी राशि हों, सबसे इसी

रीतिसे क्रिया करे. यदि किसीका परिवर्तन न लग सकता हो तो दोनों राशियोंका ही परस्पर घात कर ले और उसीको एक राशि मान ले जैसा कि इसी उदा- हरणोंमें मनुष्योंकी संख्या ४ से गुणित रत्नोंकी संख्या ४ को रत्नोंमें घटानेसे ४, ६, १, ९६ यह राशियें होती हैं. यहां पहली दो २ राशियें ४, ६ में दो २ का परि- वर्तन दिया तब २, ३ ऐसा स्वरूप हुआ. इन दोनों अंकोंका परस्पर घात किया तब ६ छ हुआ, इसको परिवर्तन अंक २ दोसे गुणा किया तब १२ बारह हुए. अब १२ को एक राशि माना और एकराशि शेषत रत्नोंमें १ क ली, तब १२, १ एक ऐसा स्वरूप हुआ. यहां किसीका परिवर्तन नहीं लग सकता. इस कारण दोनों राशियोंके घात १२ को ही एक राशि माना और एक शेषत रत्नोंमेंकी ९६ ली. तब १२, ९६ ऐसा स्वरूप हुआ. यहां १२ बारहका परिवर्तन दिया तब १, ८ ऐसा स्वरूप हुआ. यहां दोनों राशियोंका घात ८ आठ हुआ, इसको परिवर्तक अङ्क १२ से गुणा किया तब ९६ छियानवे हुआ. अब वोही शेषत राशि नहीं रही इस कारण यही ९६ इष्ट है इसी पर उपरोक्त क्रिया करनेसे उत्तर मिलेगा ॥ अथवा-शेष अङ्कों ४ । ६ । १ । ९६ का घात करके उसको इष्ट माना २३०४ इसमें अलग २ शेषोंका भाग लिया तब भी प्रतिरत्नका मूल्य मिला. ५७६ । ३८४। २४ । २३०४ । इस रीतिसे सबका समान धन अलग २ पाँच हजार पांचसौ बानवे ५५९२ होता है ॥ अथ सुवर्णगणिते करणसूत्रं वृत्तम्- अब सुवर्णके विषयमें मिश्रगणित करनेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं. सुवर्णवर्णाहतियोगराशौ स्वर्णैक्यभक्ते कनकैक्यवर्णः ॥ वर्णो भवेच्छोधितहेमभक्ते वर्णोद्धृते शोधितहेमसंख्या ॥ २६ ॥ अन्वयः-सुवर्णवर्णाहतियोगराशौ स्वर्णैक्यभक्ते कनकैक्यवर्णः स्यात्। शोधितहेमभक्ते वर्णः स्यात् । वर्णोद्धृते शोधितहेमसंख्या भवेत् ॥ २६ ॥ अर्थः-सुवर्णकी तोलको अपने २ वर्ण ( प्रमाण जितनेका हो उस धनसे ) गुणा करे. फिर गुणा करनेसे जो गुणनफल हो उनको जोड ले उसमें सब सुवर्णोंकी तोलके योगका भाग दे तब जो लब्धि हो, वह सब मिले हुए सुवर्णका एक भाव होता है और यदि उसी वर्ण और तोलके घातयोगमें शोधे हुए सुवर्णका भाग दे तब पहले वर्णकी संख्या मालूम होती है और यदि वर्णका भाग ले तब शोधे हुए (जिसको शोधा है उसकी ) सुवर्णकी तोल मालूम होती है ॥

(९४) लीलावती। उदाहरणानि- विश्वार्कुरुद्रदशवर्णसुवर्णमाषा दिग्वेदलोचनयुगप्रमिताः क्रमेण ॥ आवर्णितेषु वद तेषु सुवर्णवर्णं तूर्णं सुवर्णगणि- तज्ञ वणिग्भवेत्कः ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सुवर्णगणितज्ञ ! वणिक् ! विश्वार्कुरुद्रदशवर्णसुवर्णमाषाः क्रमेण दिग्वेदलोचनयुगप्रमिताः संति तेषु आवर्तितेषु सुवर्णवर्णं तूर्णं वदकः भवेत् ? ॥१॥ अर्थः-हे सुवर्णके गणितमें प्रवीण वैश्य ! १३ तेरह १२ बारह ११ ग्यारह दश १० के वर्ण ( भाव ) के सुवर्णके क्रमसे १० दश ४ चार दो २ चार ४ मासे हैं अर्थात् तेरहके भावका सुवर्ण दश १० मासे हैं, बारह १२ के भावका चार ४ मासे हैं ग्यारह ११ के भावका २ दो मासे हैं दश १० के भावका चार ४ मासे हैं इन सब सुवर्णोंको मिलाकर गला लिया तब क्या भावका होगा ? यह शीघ्र कहो ॥ १ ॥ ते शोधने यदि च विंशतिरुक्तमाषाः स्युः षोडशाशु वद वर्ण- मितिस्तदा का॥ चेच्छोधितं भवति षोडशवर्णहेम ते विंशतिः कति भवन्ति तदा तु माषाः ॥२ ॥ अन्वयः-ते विंशतिः उक्तमाषाः शोधने यदि षोडश स्युः तदा का वर्णमितिः स्यात् इति आशु वद । चेत् ते विंशतिः शोधितं षोडशवर्णहेम भवति तदा कति माषाः भवन्ति ? ॥ २ ॥ अर्थः-वही पहले कहे हुए बीस २० मासे यदि शोधनेसे सोलह १६ मासे रह गया तो सुवर्ण किस वर्ण ( भाव ) का होगा ? यह शीघ्र कहो और यदि वही बीस २० मासे सुवर्ण गलानेसे सोलह १६ के भावका हो जाय तो कितने मांसे रहेगा ? ॥ २ ॥ न्यासः-- १३/१० १२/४ ११/२ १०/४ जाता आवर्तिते सुवर्णवर्णमितिः १२ ॥ एत एव यदि शोधिताः सन्तः षोडश माषाः भवन्ति तदा वर्णः १५ । यदि तदेव शोधितं षोडशवर्णं स्वर्णं भवति तदा पञ्चदश १५ माषा भवन्ति ॥

फैलाव-यहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार सुवर्णकी तोलको अपने २ वर्ण (भाव) से गुणा किया तब क्रमसे गुणनफल १३०, ४८, २२, ४० यह हुआ, इनका योग (जोड) किया तब दोसौ चालीस २४० हुआ, इसमें सुवर्णके तोलका योग २० का भाग लिया तब १२ बारह लब्धि हुआ यही सब सुवर्णको गलाकर सबको एक भाव होगा. और जहाँ वही बीस २० मासे सुवर्ण गलानस १६ सोलह मासे रहा. वहाँ ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार उसी सुवर्णके तोल और वर्णके घात योग २४० में शोधनेसे जो सुवर्णके तोल १६ रही है उसका भाग दिया तब १५ लब्धि हुआ यही शुद्ध हुए सुवर्णका भाव होगा ॥ और जहाँ वही बीस २० मासे सुवर्ण गलानेस १६सोलहके भावका हो जाता है वहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार उसी सुवर्णके तोल और वर्णके घातयोग २४० म शुद्ध करनेपर जो वर्ण (भाव) हुआ. १६ उसका भाग लिया तब १५ पन्द्रह लब्धि हुआ. यही शुद्ध सुवर्णकी तोल रहेगी ॥ अथ वर्णज्ञानाय करणसूत्र वृत्तम्- जिन वर्णोंके मिलानेसे एक वर्ण हुआ है उनमेंसे जिस वर्णको नहीं जानते हैं उसके जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- स्वर्णैक्यनिघ्नाद्युतिजातवर्णात्सुवर्णतद्वर्ण वधैक्यहीनात् ॥ अज्ञातवर्णाभ्रिजसंख्ययाप्तमज्ञातवर्णस्य भवेत्प्रमाणम् ॥२७॥ अन्वयः-द्युतिजातवर्णात् स्वर्णैक्यनिघ्नात् सुवर्णतद्वर्णवधैक्यहीनात् अज्ञातवर्णा- भिजसंख्यया यत् आप्तं तत् अज्ञातवर्णस्य प्रमाणं भवेत् ॥ २७ ॥ अथः-अनेक प्रकारके सुवर्ण मिलानेसे जो वर्ण (भाव) होता है वह युतिजात वर्ण कहा जाता है, उस युतिजात वर्णको सोनेकी तोलके योग (जोड) से गुणा करके उसमें सोनेकी तोल और वर्ग इनके घात योगको घटा दे जो शेष रहे उसमें उस सुवर्णकी तोलका भाग दे जिसका वर्ण नहीं जानते हैं उसका भाग देनेसे जो लब्धि हो वही उसी वर्णकी संख्या है. जिसकी संख्या नहीं जानते हैं ॥ २७ ॥ उदाहरणम्- दशेशवर्णा वसुनेत्रमाषा अज्ञातवर्णस्य षडेतदैक्ये ॥ जातं सखे द्वादशकं सुवर्णमज्ञातवर्णस्य वद प्रमाणम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! वसुनेत्रमाषाः दशेशवर्णाः सन्ति । अज्ञातवर्णस्य षट् माषाः सन्ति । एतदैक्ये द्वादशकं सुवर्णं जातम् तर्हि अज्ञातवर्णस्य प्रमाणं वद ? ॥ १ ॥

( ९६ ) लीलावती । अर्थः-हे मित्र ! आठ ८ और दो २ मासे सुवर्ण दश १० और ग्यारह ११ के वर्ण ( भाव ) का है और जिसका भाव नहीं जानते वह सुवर्ण ६ छ मासे है और सबको मिलाकर गलानेसे एक भाव १२ बारह होता है तो जिसका वर्ण ( भाव ) नहीं जानते हैं उसका क्या भाव होगा ? सो कहो ॥ १ ॥ न्यासः- $\begin{matrix} १० & ११ & ० ८ & २ & ६ \end{matrix}$ लब्धमज्ञातवर्णमानम् १५ ॥ फैलाव-यहां युतिजातवर्ण ( सब सुवर्णोंको मिलाकर गलानेसे जो भाव हुआ ) बारह १२ हैं, उसको सुवर्णकी तोलके योग ( जोड ) १६ सोलह १६ से गुणा किया तब १९२ एक सौ बानवे हुए. इसमें १९२ सुवर्णकी तोलको अपने २ वर्णसे गुणा करके ८० । २२ जो योग ( जोड ) १०२ हुआ उसको घटाया तब नव्वे ९० बचे इसमें अज्ञात वर्ण सुवर्णकी तोल ६ का भाग दिया तब १५ पन्द्रह लब्धि हुआ, यही उस सुवर्णका वर्ण ( भाव) है. जिसका वर्ण नहीं जानते थे. क्योंकि पहले कही हुई रीति के अनुसार अब सुवर्णकी तोलोंको अपने २ वर्णसे गुणा किया तब क्रमसे ८०, २२, ९० यह गुणनफल हुए. इनका योग किया तब १९२ एकसौ बानवे हुए, इसमें सुवर्णकी तोल ८, २, ६ के जोड. १६ का भाग देनेसे वही १२ बारह लब्धि युतिजातवर्ण मालूम हो जाता है ॥ सुवर्णज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- जिन वर्णोंके मिलानेसे एक वर्ण हुआ है; उनमेंसे जिसकी तोल नहीं जानते हैं उसकी तोल जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- स्वर्णैक्यनिघ्नो युतिजातवर्णः स्वर्णघ्नवर्णैक्यवियोजितं च ॥ अहेमवर्णाङ्घ्रिजयोगवर्णविश्लेषभक्तोऽविदिताङ्घ्रिजं स्यात्॥२८॥ अन्वयः-युतिजातवर्णः स्वर्णैक्यनिघ्नः स्वर्णघ्नवर्णैक्यवियोजितं च अहेमवर्णाङ्घ्रि जयोगवर्णविश्लेषभक्तः अविदिताङ्घ्रिजं स्यात् ॥ २८ ॥ अर्थः-युतिजातवर्ण ( सब सुवर्णोंको मिलाकर गलानेसे जो भाव हुआ है ) को सब सुवर्णकी योगसे गुणा करे. फिर जो गुणनफल हो उसमें जिन सुवर्णोंका वर्ण मालूम है उन सुवर्णोंकी तोलको अपने २ भावसे गुणा करके जो योग हो उसको घटा दे जो शेष रहे उसमें जिस सुवर्णका तोल नहीं मालूम है उसका वर्ण और युतिजातवर्ण इनका अन्तर करनेसे जो शेष रहे, उसका भाग देनेसे जो लब्धि हो वही उस तोलकी संख्या है, जिस तोलको नहीं जानते थे ॥ २८ ॥

,सुवर्णगणितमिश्रप्रकारः। (९७) उदाहरणम्- उदाहरण कहते हैं.- दशेन्द्रवर्णा गुणचन्द्रमाषाः किंचित्तथा षोडशकस्य तेषाम्॥ जातं युतौ द्वादशकं सुवर्णं कतीह ते षोडशवर्णमाषाः ॥ १ ॥ अन्वयः-गुणचंद्रमाषाः दशेंद्रवर्णाः सन्ति । तथा षोडशकस्य किञ्चित् सन्ति । तेषां युतौ द्वादशकं सुवर्णं जातम् तर्हि इह ते षोडशवर्णमाषाः कति सन्ति? ॥ १॥ अर्थः-सुवर्ण ३ तीन और १ एक मासे क्रमसे दश १० और १४ चौदहके वर्णका है और जिसकी तोल नहीं जानते वह सोलह वर्णका है और सबको मिलाकर गलानेसे बारह १२ के भावका सुवर्ण होता है तो कहो वह सोलह १६ के भावका सुवर्ण कितना है ? ॥ १ ॥ न्यासः- १०/३ १४/१ १६/० लब्धं माषमानम् १ ॥ फैलाव-यहाँ युतिजातवर्ण १२ बारह है, उसको तोलके योग ४ चारसे गुणा किया तब ४८ अडतालीस हुआ. इसमें जिनकी तोल मालूम है उन सुवर्णोंको अपने २ वर्णसे गुणा करके ३०, १४, योग किया तब ४४ चौवालीस हुआ, इसको घटाया तब ४ चार शेष रहा. इसमें जिस सुवर्णकी तोल नहीं जानते हैं उसका १६ और युतिजातवर्ण १२ का अन्तर करनेसे जो शेष ४ रहा उसका भाग दिया तब १ एक लब्धि हुआ. यही उस सुवर्णकी तोल है. जिसका वर्ण जानकर भी तोल नहीं जानते थे. क्योंकि, ऐसा होनेपर सुवर्णकी तोलोंको अपने वर्णसे गुणा किया तब ३०, १४, १६ ऐसा हुआ. इसके योग ६० में तोलके योग | ३ | पांच ५ का भाग लिया तब लब्धि १२ बारह वही युति जात वर्ण होता है॥ | १ | | १ | | ५ | सुवर्णज्ञानायाऽन्यकरणसूत्रं वृत्तम्- जहाँ किसी भी वर्णकी तोल बिना जाने दोनोंकी तोल जाननेकी रीति और लिखते हैं एक श्लोकमें. साध्येनोनोऽनल्पवर्णो विधेयः साध्यो वर्णः स्वल्पवर्णोनितश्च॥ इष्टक्षुण्णे शेषके स्वर्णमाने स्यातां स्वल्पानल्पयोर्वर्णयोस्ते २९॥ अन्वयः-अनल्पवर्णः साध्येन ऊनः विधेयः । साध्यः वर्णः च स्वल्पवर्णोनितः विधेयः । ततः स्वल्पानल्पयोः वर्णयोः शेषके इष्टक्षुण्णे स्वर्णमाने स्याताम् ॥ २९ ॥ ७

( ९८ ) लीलावती । अर्थ:-योगजवर्ण ( युतिजातवर्ण ) को बड़ी संख्यावाले वर्णमें घटावै और युतिजातवर्णमें थोड़ी संख्यावाले वर्णको घटावै, फिर जो दोनोंमें शेष रहें उनको अलग २ कोई इष्ट कल्पना कर उससे गुण दे तब क्रमसे सुवर्णकी तोल मालूम होती है ॥ २९ ॥ उदाहरणम्- हाटकगुटिके षोडशदशवर्णे तद्युतौ सखे जातम् ॥ द्वादशवर्णसुवर्णं ब्रूहि तयोः स्वर्णमाने मे ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! षोडशदशवर्णे हाटकगुटिके स्तः तद्युतौ द्वादशवर्णं जातम् तर्हि तयोः स्वर्णमाने मे ब्रूहि ! ॥ १ ॥ अर्थ:-हे मित्र ! १६ सोलह और १० दशके वर्ण ( भाव ) की सुवर्णकी दो गोली हैं और उनको मिलाकर गलानेसे बारह १२ के वर्णका सुवर्ण होता है तो कहो वह दोनों सुवर्णकी गोली कितनी २ तोलकी हैं ? ॥ १ ॥ न्यासः- १६/० १०/० साध्यो वर्णः १२ कल्पितमिष्टं १ लब्धे सुवर्णमाने १६/२ १०/४ अथवा द्विकेनेष्टेन १६/४ १०/८ अर्द्धगुणितेन वा १६/१ १०/२ फैलाव-यहाँ साध्य ( युतिजातवर्ण. ) बारह १२ को बड़ी संख्यावाले वर्ण १६ सोलहमें घटाया तब ३ चार शेष रहा और युतिजातवर्ण १२ में थोड़ी संख्यावाले वर्ण १० को घटाया तब २ शेष रहे. इन दोनों शेष राशियों ४, २ को कल्पना किये हुये इष्ट १ एकसे गुणा किया तब क्रमसे थोड़ी और बहुत संख्यावाले वर्णके सुवर्णके तोल ४, २ हुई. अर्थात् दशवर्ण वालेकी तोल ४ चार सोलह १६ वर्णवालेकी तोल २ दो हुई. क्योंकि ऐसा होनेपर सुवर्णके वर्ण और तोलके घातयोग ७२ बहत्तरमें तोलके योग ६छ का भाग देने से लब्धि १२ बारह हुई वही युतिजातवर्ण मिलता है. इसी प्रकार जब २ दोको इष्ट माना तब सोलह १६ वर्णवालेकी तोल चार ४और दशवर्णवालेकी आठ ८होती है और १/२ आधेको इष्ट माना तब सोलह वर्णवालेकी तोल १ एक और दश १० वर्णवालेकी तोल २ दो होती है इस प्रकार जैसा इष्ट मानोगे वैसी ही तोल मिलेगी ॥

छन्दश्चितिगणितप्रकारः । ( ९९ ) अथ छन्दश्चित्यादौ करणसूत्रं श्लोकत्रयम्- अब छन्दका प्रकार इत्यादि जाननेकी रीति तीन श्लोकमें लिखते हैं. एकाद्येकोत्तरा अङ्का व्यस्ता भाज्याः क्रमस्थितैः ॥ परः पूर्वेण संगुण्यस्तत्परस्तेन तेन च ॥ १ ॥ ३० ॥ एकद्वित्र्यादिभेदाः स्युरिदं साधारणं स्मृतम् ॥ छन्दश्चित्युत्तरे छन्दस्युपयोगोऽस्य तद्विदाम् ॥ २ ॥३१॥ मूषावहनभेदादौ खण्डमेरौ च शिल्पके ॥ वैद्यके रसभेदीये तन्नोक्तं विस्तृतेर्भयात् ॥ ३ ॥ ३२ ॥ अन्वयः-एकाद्येकोत्तराः व्यस्ताः अङ्काः क्रमस्थितैः भाज्याः परः पूर्वेण संगुण्यः तत्परः तेन तेन इति अङ्कान्तं क्रिया कार्या ॥ १ ॥ एवम् एकद्वित्र्यादिभेदा स्युः । इदं साधारणं स्मृतम् । छन्दश्चित्युत्तरे छन्दसि तद्विदाम् अस्य उपयोगो भवति ॥२॥ मूषावहनभेदादौ खण्डमेरौ शिल्पके रसभेदीये वैद्यके च अस्य उपयोगो भवति तत् अत्र विस्तृतेः भयात् न उक्तम् ॥ ३ ॥ अर्थः-जितने अङ्क हों, उनको एक २ बढाकर उलटा लिखे और उनके नीचे एक २ बढाकर एक आदिक्रमसे अङ्क लिखे यह दो पंक्ति हुई, इसमें ऊपरकी पंक्तिको भाज्य और नीचेकी पंक्तिको भाजक माने. अर्थात् आदि अङ्कके नीचे एकको हर जाने इस प्रकार क्रमसे एक २ के नीचे एक २ को हर माने और सबको जुदा २ लिखे. सब अङ्कोंमें पहले अंकको सिद्ध अंक जानें, इस सिद्ध अंकसे अगले भाज्य अंकसे गुणा करे फिर उसी भाज्यके नीचेके अंकका भाग दे, फिर जो लब्धि हो उसको सिद्ध अंक जानें, इस सिद्ध अंकको आगेकें भाज्य अंकसे गुणा करे और उसके नीचेके भाजकका भाग दे इस प्रकार जहाँ तक अंक हों तहाँ तक क्रिया करे. इस प्रकार क्रमसे एक, दो, तीन आदिक भेद होते हैं. अथवा-जितने भाज्य भाजक अङ्क हों, सबको पहलेके अंकसे आगेको गुणा कर ले, फिर जो अंक गुणनसे निष्पन्न हों उसमें नीचे लिखे हुए भाजक अंकोंका अलग २ भाग देनेसे जो लब्धि आवे वह भी क्रमसे एक, दो, तीन आदिक भेद होंगे. यह रीति यहाँ साधारण रीतिसे लिखी है ॥ छन्दोंका प्रस्तार जाननेके विषयमें छन्दःशास्त्रमें छन्दःशास्त्र जाननेवालोंको इसका उपयोग होता है (काम पडता है) और द्वारोंकी वायुके भेद जाननेमें छन्दःशास्त्रान्तर्गत खण्डमेरूमें तथा शिल्पशास्त्रमें, रसभेदविषयक वैद्यकमें भी इसका उपयोग होता है यहां ज्यादा विस्तार होगा इस कारण नहीं लिखा है ॥१॥२॥३॥

( १०० ) लीलावती । तत्र छन्दश्चित्युत्तरे किंचिदुदाहरणम्- तहां पहले प्रस्तारके विषयमें कुछ उदाहरण दिखलाते हैं- प्रस्तारे मित्र गायत्र्याः स्युः पादे व्यक्तयः कति ॥ एकादिगुरुवश्चाशु कथ्यतां तत्पृथक्पृथक् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे मित्र ! गायत्र्याः पादे प्रस्तारे कृते सति कति व्यक्तयः स्युः । एका दिगुरवः च कति व्यक्तयः स्युः तत् पृथक्पृथक् आशु कथ्यताम् ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे मित्र ! गायत्री छन्दके चौथे ( छ अक्षरके ) पादमें प्रस्तार करनेसे कितनी व्यक्ति ( भेद ) होंगी, एक, दो, तीन इत्यादि गुरुवाली कितनी व्यक्तियाँ होंगी ? सो अलग २ शीघ्र कहो ॥ १ ॥ न्यासः- ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ १/६ यथोक्तकरणेन लब्धा एकगुरुव्यक्तयः ६ द्विगुरवः १५ त्रिगुरवः २० । चतुर्गुरवः १५ । पञ्चगुरवः ६ । षड्गुरवः १ । तथैकः सर्वलघुः १ एवमासामैक्यम् पाद- व्यक्तिमितिः ६४ ॥ एवं चतुश्चरणाक्षरसंख्यकानङ्गान्यु- थोक्तम् विन्यस्य एकादिगुरुभेदानानीयैतान् सैकान् एकीकृत्य जाता गायत्रीवृत्तव्यक्तिसंख्या १६७७७२१६ एवमुक्ताद्युत्कृतिपर्यन्तं छन्दसां व्यक्तिमितिर्ज्ञातव्या ॥ फैलाव-यहाँ पूर्वोक्त रीतिके अनुसार छ ६ अक्षरका गायत्रीका चरण है, इस कारण छ से लेकर एक पर्य्यंत उलटे अंक लिखकर उसके नीचे क्रमसे एक, दो इत्यादि अंक ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ १/६ लिखे, फिर यहां उपरोक्त रीतिके अनुसार कोई सिद्ध अंक तो है ही नहीं. इस कारण पहले ६/१ में हरका भाग देकर लब्धि ६ छ हुआ, इसको सिद्ध अंक माना, इस सिद्ध अंकसे आगेके अंकमें ५/२ जो भाज्यः पांच ५ है उससे सिद्ध अंकको गुणा किया तब ३० तीस हुआ फिर भाजक २ दोस भाग लिया तब १५ पन्द्रह दूसरा अंक हुआ फिर इस सिद्ध अंकसे आगेके अंक ४/३ के भाज्यसे इस सिद्ध अंक १५ को गुणा किया तब ६० साठ हुआ, इसमें भाजक ३ का भाग लिया तब २० बीस तीसरा सिद्ध अङ्क हुआ. इसको इसके आगेके अङ्क ३/४ के भाज्य ३ से गुणा किया तब ६० साठ हुआ, इसमें भाजक ४ चारका भाग लिया तब लब्धि १५ पन्द्रह, चौथा सिद्ध अङ्क हुआ, फिर इसके आगेके

मिश्रकव्यवहारः । (१०१) अङ्क $\frac{२}{५}$ के भाज्य २ से गुणा किया तब ३० तीस हुआ, इसमें भाजक ५ पांचका भाग लिया तब ६ ६ लब्धि पाँचवाँ सिद्ध अङ्क हुआ. फिर इसके आगेके अङ्क $\frac{१}{६}$ के भाज्यसे गुणा किया तब ६ ६ हुआ. भाजकका इसमें भाग दिया तब १ एक छठा सिद्ध अङ्क लब्धि हुआ. इस प्रकार सिद्ध अङ्क (एक आदि गुरुके भेद) यह ६ । १५ । २० । १५ । ६ । १ हुए, इनमें सर्व लघुका भेदमें एक और मिला दिया तब गायत्रीके पादमें प्रस्तार करनेसे ६४ चौंसठ भेद हुए ॥ अथवा $\frac{\xi}{१}\ \frac{\varphi}{२}\ \frac{\gamma}{३}\ \frac{३}{\gamma}\ \frac{२}{\varphi}\ \frac{१}{\xi}$ यहाँ ऊपरके भाज्य सब अंकोंको पहले २ से आगे २ को गुणा किया तब अपने ऊपरके गुणित अंकमें अपने २ नीचेके अङ्कोंको भी पहले २ आगेके अङ्कको गुणा करके नीचे रखता जाय, फिर नीचेके अङ्कका भाग दे अर्थात् पहला अङ्क तो छ $\frac{\xi}{१}$ है इससे दूसरे अङ्क ५ को गुणा किया और नीचेकी पंक्तिमें पहले १ से दूसरे २ को गुणा किया तब $\frac{३०}{२}$ ऐसा हुआ. फिर तीसरे आगेके अङ्क चारको गुणा किया तब तब तीसरा अङ्क $\frac{१२०}{\xi}$ हुआ इस प्रकार अन्ततक किया तब $\frac{\xi}{१}\ \frac{३०}{२}\ \frac{१२०}{\xi}\ \frac{३६०}{२४}\ \frac{७२०}{१२०}\ \frac{७२०}{७२०}$ ऐसा हुआ फिर नीचेके अंकका ऊपरकेमें सब जगह भाग दिया तब क्रमसे वही ६।१५।२०।१५।६।१ आदि गुरुके भेद हुए एक सहित सर्व लघुको जोडा तब वही सब इकट्ठे ६४ चौंसठ भेद हुए. इसी प्रकार जब चारों पादोंको मिलाके भेद निकाले तब सम्पूर्ण गायत्री छन्दके १६७७७२१६ इतने भेद हुए. इसी प्रकार और छन्दोंके प्रस्तारमें भी जानना ॥ खण्डमेरुके विषयमें जो काम इस रीतिका पडता है सो दिखाते हैं.

${c} | ० |

\hline | १ | १ |

\hline | १ | २ | १ |

\hline | १ | ३ | ३ | १ |

\hline | १ | ४ | ६ | ४ | १ |

\hline | १ | ५ | १० | १० | ५ | १ |

\hline | १ | ६ | १५ | २० | १५ | ६ | १ | $

( १०२ ) लीलावती । इस खण्डमेरुमें छन्दःशास्त्रोक्त क्रिया करनेसे अन्तमें जो अङ्क आते हैं वह एक दो तीन इत्यादि गुरु वर्णोंके क्रमसे भेद होते हैं, इस गणितके करनेसे यह मालूम होता है कि, यह छन्दःशास्त्रोक्त रीतिसे निकाले हुए भेदहीका है या नहीं ॥ प्रस्तार बनानेकी यह रीति है कि, जितने अक्षरोंका प्रस्तार करना हो, पहले उतने ही गुरु लिखे, फिर आदिके गुरुके नीचे लघु लिखे. जैसे- $\begin{matrix} SSSSSS ISSSSS \end{matrix}$ फिर अगाडीके जैसे ऊपर हों वैसा ही लिखे जैसा कि $\begin{matrix} SSSSSS I SSSSS \end{matrix}$ यहां पहले गुरुके नीचे लघु लिखा है और बाकी जो आगे रहे वह जैसे ऊपर लिखे हैं, वैसे ही नीचे भी लिखे और पहले कमती रहजाय तो गुरु अक्षरोंसे पूरा करे. जैसा $\begin{matrix} I S S S S S I S S S S \end{matrix}$ यहां पहले गुरुके नीचे लघु लिखा है आगे सब ऊपरके अनुसार लिखे हैं और यहां आदि (पहले) में एक कमती रहा इस- कारण उसके गुरुसे पूरा किया तब ऐसा I S S S S S हुआ इसी प्रकार जबतक सब लघु हो जाँय तबतक क्रिया करे. S I S S S S इस प्रकार गायत्रीके चौथे पादके अक्षरोंका प्रस्तार करनेसे ६४ चौंसठ भेद होते हैं. उदाहरणं शिल्पे- शिल्पके विषयका उदाहरण- एकद्वित्र्यादिमूषावहनमितिमहो ब्रूहि मे भूमिभर्तु- र्हर्म्ये रम्येऽष्टमूषे चतुरविरचिते श्लक्ष्णशालाविशाले ॥ एकद्वित्र्यादियुक्ता मधुरकटुकषायाम्लकक्षारतिक्तै- रेकस्मिन्षड्रसैः स्युर्गणक कति वद व्यञ्जने व्यक्तिभेदाः ॥१॥ अन्वयः- अहो गणक ! चतुरंविरचिते श्लक्ष्णशालाविशाले अष्टमूषे रम्ये भूमिभर्तुः हर्म्ये एकद्वित्र्यादिमूषावहनमिति मे ब्रूहि । तथा एकास्मिन् व्यञ्जने मधुरकटुकषायाम्लकक्षारतिक्तैः षड्रसैः एकद्वित्र्यादियुक्ताः व्यक्तिभेदाः कति स्युः इति वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे गणितप्रवीण ! चतुरपुरुषके बनाये हुए रमणीय चौडे दालानोंसे सुशोभित आठ ८ खिडकीवाले अतिसुन्दर राजाके महलमें एक एक, दो दो, तीन तीन, चार चार, पांच पांच, छ :छ, सात सात, आठ आठ, खिडकी अलग २ खोलनेसे वायुके कितने भेद होंगे ? सो कहो तथा एक ही रसोईमें मीठा, कडुवा, कसीला, वकसा, खारा, चरपरा इन छ रसोंसे एक एक, दो, दो,

मिश्रकव्यवहारः । ( १०३ ) तीन तीन, चार चार, पांच पांच, छ छ, रसोंके अलग २ स्वादके भोजन बनाये जाँय तो कितनी तरहके व्यञ्जन बनेंगे ? सो कहो ॥ १ ॥ मूषान्यासः--८ ७ ६ ५ ४ ३ २ १ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ लब्धा एकद्वित्र्यादिमूषावहनसंख्याः । ८ २८ ५६ ७० ५६ २८ ८ १ १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ एवमष्टमूषे राजगृहे मूषावहनभेदाः २५५ । अथ द्वितीयोदाहरणम्- न्यासः- ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ - लब्धा एकादिरससंयोगेन पृथग्व्यक्तयः । ६ १५ २० १५ ६ १ १ २ ३ ४ ५ ६ एतासामैक्यम् ६३ । इति मिश्रकव्यवहारः । फैलाव-पहले उदाहरणमें आठ खिडकियोंके वायुके भेद निकालने हैं इस कारण आठसे लेकर अङ्क एकस्थान बढाकर व्यत्यय ( उलटे ) लिखें- ८/१ ७/२ ६/३ ५/४ ४/५ ३/६ २/७ १/८ फिर उसके नीचे क्रमसे एक, दो इत्यादि अङ्क लिखें, फिर यहां ऊपर कही हुई रीति के अनुसार कोई अङ्क है नहीं, जिसको पहली पहल आठसे गुणा किया जाँय इस कारण आठहीमें नीचेके लिखे हुए एकका भाग दिया तब आठ ८ ही लब्धि हुए. फिर इस अङ्कको एक जगह अलग लिखा फिर दूसरा अङ्क ७ सात है उससे आठ ८ को गुणा किया तब ५६ हुए, इसमें उसी ७ सातके नचे लिखे हुए २ दोका भाग लिया तब २८ अट्ठाईस लब्धि हुए. इसको भी पहले आठके धोरे लिखा फिर इन २८ को ऊपरकी पंक्तिमें तीसरा अङ्क जो ६ छ है, उससे गुणा किया और छके नीचे अङ्क ३ तीनका भाग लिया तब ५६ छप्पन्न मिला, इसको पहले लिखे हुए अट्ठाईसके आगे लिखा इसी प्रकार अन्ततक विधि करी तो अलग २ एक एक खिडकीके ८ आठ भेद दोदोके २८ अट्ठाईस, तीन तीनके ५६, चार चारके ७० सत्तर, पांच पांचके ५६,

( १०४ ) लीलावती । छ ६के २८, सात सातके ८, आठ आठका १ एक भेद होंगे सबको जोडा तब सब भेद मिलकर २५५ दोसौ पचपन हुए. दूसरा उदाहरण-६ छ रसके भेद जानते हैं इस कारण छहसे लेकर एक २ स्थान बढाकर उलटे अंक लिखे और उनके नीचे एक दो इत्यादि क्रमसे लिखे- ६/१ ५/२ ४/३ ३/४ २/५ १/६ फिर उसी रीतिसे पहले ऊपरकी पंक्तिके पहले अंक छ ६ में उसीके नीचे लिखे हुए एकका भाग लिया तब छ लब्धि हुए, इनको एक स्थानमें अलग लिखा फिर छके आगे जो ऊपरकी पंक्तिमें ५ पांचका अंक है उससे छको गुणा किया और पांचके नीचे जो दो २ का अंक है उसका भाग लिया तब पन्द्रह १५ लब्धि हुए. इनको पहले अलग लिखे हुए छ ६ के आगे लिखा. फिर ऊपरकी पंक्तिमें तीसरा अङ्क जो चार ४ है उससे १५को गुणा किया और चार ४ के नीचेका जो तीनका अङ्क है उसका भाग लिया तब २० बीस लब्धि हुए इनको पहले अलग लिखे हुए १५ पन्द्रहके धोरे लिखा. इस प्रकार जहाँतक अङ्क हैं वहाँतक क्रिया करनेसे क्रमसे एक एक रसके छ ६, दो दोके १५ पन्द्रह, तीन तीनके २० बीस, चार चारके १५ पन्द्रह, पांच पांचके छ ६,छ के १ एक होंगे सबको जोडा तब मिलकर सब ६३ तिरसठ हुए. इति मिश्रकव्यवहारः । अथ श्रेढीव्यवहारः । अब श्रेढीव्यवहारका गणित लिखते हैं, इसका नाम श्रेढी इस कारण है कि, इसका सीढी (सोपान) की तरह गणित है. तत्र संकलितैक्ये करणसूत्रं वृत्तम्-- तहाँ पहले जोडे हुए अङ्कोंके जोडनेकी रीति (जैसे दश जगह विजातीय २ अङ्कोंको जोडा है, तहाँ उन दशों जगहका जो जोड है उसको शीघ्र जोडनेकी रीति) लिखते हैं. एक श्लोकमें- सैकपदघ्नपदार्द्धमथैकाद्यंकयुतिः किल संकलिताख्या ॥ सा द्वियुतेन पदेन विनिघ्नी स्यान्त्रिहृता खलु संकलितैक्यम् ३३॥ अन्वयः-किल सैकपदघ्नपदार्द्धं सङ्कलिताख्या एकाद्यङ्कयुतिः भवति । अथ सा द्वियुतेन पदेन विनिघ्नी त्रिहृता खलु सङ्कलितैक्यं स्यात् ॥ ६३ ॥ अर्थः-(जो अन्तका अङ्क होता है उसको पद कहते हैं) पदमें एक जोडे फिर पदके आधेसे गुणा करे तब जो लब्धि होगी वह निश्चय करके एक आदि अंकोंका

जोडा होगा, वही लब्धिमें दो युक्त पदसे गुणा करके तीनका भाग दे तब निश्चय करके जोडे हुए अंकोंका जोड हो जाता है ॥ ३३ ॥ उदाहरणम्- एकादीनां नवान्तानां पृथक्संकलितानि मे ॥ तेषां संकलितैक्यानि प्रचक्ष्व गणक द्रुतम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे गणक! एकादीनां नवान्तानां सङ्कलितानि मे पृथक् वद । तेषां सङ्कलि- तैक्यानि च पृथक् द्रुतं प्रचक्ष्व ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे ज्योतिषिक ! एकसे लेकर नौ ९ तक अलग २ लिखे हुए अंकोंका जोड मुझसे कहो और उन्हीं एकसे लेकर नौ ९ तक अंकोंके जोडका जोड (अर्थात् एकतकका जोड, दोतकका जोड, तीनतकका जोड, चारतकका जोड, पाँचतकका जोड, छतकका जोड, साततकका जोड, आठतकका जोड, नौ ९ तकका जोड इन सब जोडोंका इकट्ठा अलग २ जोड) कहो ? ॥१॥ न्यासः-१ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ संकलितानि १ ३ ६ १० १५ २१ २८ ३६ ४५ एषामैक्यानि १ ४ १० २० ३५ ५६ ८४ १२० १६५ फैलाव-यहाँ अन्तका अंक नौ ९ है इस कारण उसका नाम पद है. पद ९ नौमें एक १ जोडा तब १० दश हुए, इनको पदके आधे ९/२ से गुणा किया तब ९०/२ ऐसा हुआ. यहाँ अंशमें हरका भाग दिया तब ४५ पैंतालीस लब्धि हुए, यही एकसे लेकर नौतक अंकोंका जोड हुआ. इसी प्रकार एकतकका, दोतकका, तीनत- कका, चारतकका, पांचतकका, छतकका, साततकका, आठतकका, नौतकका, जोड क्रमसे १ ३ ६ १० १५ २१ २८ ३६ ४५ हुआ. फिर इन जोडोंका भी अलग २ एक राशितकका, दोतकका, तीनतकका, चारतकका, पांचतकका, छतकका साततकका, आठतकका नौतकका जोड जानना है, इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार लब्धि (जोड) ४५ को दो २ से युक्त पद ९ नौसे अर्थात् ग्यारह ११ से गुणा किया तब ४९५ इतने हुए, इनमें तीन ३ का भाग लिया तब एकसौ पैंसठ १६५ हुए, यह नौतकके जोडोंका जोड हुआ. इसी रीतिके करनेसे पहले जोडकी राशियोंमें एकतकका दोतकका, तीनतकका, चारतकका, पांचतकका, छतकका, साततकका, आठतकका, नौतकका क्रमसे १ ४ १० २० ३५ ५६ ८४ १२० १६५ जोड हुआ. इसी प्रकार जितने अङ्क हों सबक' संकलन मालूम हो सकता है ॥

( १०६ ) लीलावती । कृत्यादियोगे करणसूत्रं वृत्तम्- एक आदि क्रमसे अंकोंके वर्गोंको तथा घन आदिको जोडनेकी सरल रीति एक श्लोकमें- द्विघ्नपदं कुयुतं त्रिविभक्तं सङ्कलितेन हतं कृतियोगः ॥ सङ्कलितस्य कृतेः सममेकाद्ये कघनै क्यमुदीरितमाद्यैः ॥ ३४ ॥ अन्वयः-द्विघ्नपदं कुयुतं त्रिविभक्तं संकलितेन हतं कृतियोगः स्यात् । सङ्कलितस्य कृतेः समम् आद्यैः एकाद्यङ्कघनै क्यम् उदीरितम् ॥ ३४ ॥ अर्थः-पदको दूना कर एक जोडनेसे जो अंक हो उसमें तीनका भाग देनेसे जो अङ्क मिले उससे पदतकके संकलितको गुणा करे तब एक आदि अङ्कोंके घनोंका जोड होगा ॥ ३४ ॥ उदाहरणम्- तेषामेव च वर्गैक्यं घनैक्यं च वद् द्रुतम् ॥ कृतिसंकलनामार्गे नाकुला यदि ते मतिः ॥ १॥ अन्वयः-तेषाम् एव वर्गैक्यं घनैक्यं च द्रुतं वद? यदि कृतिसंकलनामार्गे ते मतिः आकुला न अस्ति ॥ १ ॥ अर्थः- तिनहीं एकसे लेकर नौतक अंकोंके वर्गके जोडको तथा घनोंके जोडको शीघ्र कहो ? यदि तुम्हारी बुद्धि जोडनेमें व्याकुल न हो तो ॥ १ ॥ न्यासः- १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ वर्गैक्यम् १ ५ १४ ३० ५५ ९१ १४० २०४ २८५ घनैक्यम् १, ९, ३६, १००, २२५, ४४१, ७८४, १२९६, २०२५ फैलाव-इनका वर्ग तो परिकर्म्माष्टकमें कही हुई रीतिसे जानना फिर ऊपर कही हुई रीति के अनुसार वर्गोंका जोड मिलेगा, जैसा कि, यहां नौतकको वर्गका जोड जानना है. इस कारण उपरोक्त रीति के अनुसार पद नौको दूना किया तब अठारह हुए, इसमें एक जोड दिया तब १९ उन्नीस हुए, इनमें ३ तीनका भाग लिया तब १९/३ हुए इससे पदके सङ्कलित ४५ को गुणा किया तब २८५ दोसौ पचासी हुए यही एकसे लेकर ९ नौतकके अङ्कोंके वर्गका जोड हुआ ॥ अब उन्हीं अङ्कोंका घनयोग करना है, इस कारण ऊपर कहीहुई रीति के अनुसार पद ९ नौके संकलन ४५ पैंतालीसका वर्ग किया तब २०२५ दोहजार पचीस हुए CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

श्रेढीव्यवहारः । (१०७) यही एकसे ९ नौतक अंकोंके घनोंका योग है. इसी प्रकार जितने चाहे उतने अंकोंका वर्गैक्य घनैक्य जान सकता है ॥ यथोत्तरचयेऽन्त्यादिधनज्ञानाय करणसूत्रम्- जहाँ पहले दिन कुछ धन दे, फिर प्रतिदिन कुछ बढ़ती दे तहाँ मध्यधन, अन्त्यधन, सर्व धन (अर्थात् जितने दिनों तक दिया उसके मध्यमें कितना दिया और अन्तके दिन कितना दिया, तथा सब दिनोंमें कितना धन दिया.) इसके जान- नेके वास्ते रीति एक श्लोकमें लिखते हैं ॥ व्येकपदघ्नचयो मुखयुक्स्यादन्त्यधनं मुखयुग्दलितं तत् ॥ मध्यधनं पदसंगुणितं तत्सर्वधनं गणितञ्च तदुक्तम् ॥ ३५ ॥ अन्वयः-व्येकपदघ्नचयः मुखयुक् अंत्यधनं स्यात्। तत् सुखयुक् दलितं मध्य धनं स्यात् । तत् पदसंगुणितं सर्वधनं स्यात् । तत् गणितं च उक्तम् ॥ ३५ ॥ अर्थः-(जो धन बढाकर दिया जाता है उसको चय कहते हैं.) एक करके हीन पदसे चय धनको गुणा करे, फिर उसमें पहले दिनके धन (मुख) को जोड दे तब अन्तके दिनका दिया हुआ धन मालूम हो जाता है, उस मालूम हुए अन्तके धनमें मुख (आदिदिन) का धन जोड दे. फिर आधा कर ले तब जो रहेगा वह मध्यके दिनका दिया हुआ धन होगा और इसी मध्यधनको पदसे गुणा कर दे. तब जो कुछ धन सब दिनोंमें दिया है सो मालूम होता है. इस रीतिको गणितके जाननेवाले गणितशब्दसे व्यवहार करते हैं ॥ ३५ ॥ उदाहरणम्-- आद्ये दिने द्रम्मचतुष्टयं यो दत्त्वा द्विजेभ्योऽनुदिनं प्रवृत्तः ॥ दातुं सखे पञ्चचयेन पक्षे द्रम्मा वद द्राक्कति तेन दत्ताः ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यः आद्ये दिने द्विजेभ्यः द्रम्मचतुष्टयं दत्त्वा अनुदिनम् पञ्चच- येन दातुम् प्रवृत्तः तेन पक्षे कति द्रम्माः दत्ताः इति द्राक् वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जो पुरुष पहले दिन ब्राह्मणोंको ४ चार द्रम्म देकर प्रतिदिन पांच पांच बढाकर देनेको प्रवृत्त हुआ तो उस पुरुषने पक्षभर (१५ दिन) में कितने द्रम्म दिये ? यह शीघ्र कहो ॥ १ ॥ न्यासः--आ ० ४। च ० ५। ग ० १५. मध्यधनम् ३९

( १०८ ) लीलावती । अन्त्यधनम् ७४ सर्वधनम् ५८५ फैलाव-जो पहले दिन दिया जाता है उसको आदिधन कहते हैं और जिस धनकी बढतीसे दिया जाय वह चय कहाता है और जितने दिन दिया जाता है वह दिन गच्छ कहाते हैं. इस प्रकार इस उदाहरणमें आदि धन ४ चार है क्योंकि पहले दिन ४ चार दिया है और पांच चय है क्योंकि पांचकी वृद्धिसे दिया है और पन्द्रह १५ गच्छ है. क्योंकि पन्द्रह १५ दिन दिया है. अब यहां मध्यधन जाननेके वास्ते ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार पद १५ पन्द्रहमें एक १ कम किया तब १४ चौदह रहे. इनसे चय ५ पांचको गुणा किया तब ७० सत्तर हुए. इनमें मुख ४ चारको जोडा तब ७४ चौहत्तर हुए, यह अंत्यधन हुआ अर्थात् अन्तके पन्द्रहवें दिन ७४ चौहत्तर दिया, फिर इसी अंत्यधन ७४में मुख ४ जोडा तब ७८ अठहत्तर हुए आधा किया तब ३९ उनतालीस हुए यह मध्य धन हुआ. इस मध्य धन ३९ को पद १५ पन्द्रहसे गुणा किय तब ५८५ पांचसौ पचासी हुए. यह सर्वधन हुआ. अर्थात् पन्द्रह दिनमें सब ५८५ इतना दिया इस प्रकार मध्यधन ३९ अन्त्यधन ७४ सर्वधन ५८५ हुआ. उदाहरणान्तरम्- दूसरा उदाहरण- आदिः सप्त चयः पञ्च गच्छोऽष्टौ यत्र तत्र मे ॥ मध्यान्त्यधनसंख्ये के वद् सर्वधनञ्च किम् ॥ २ ॥ अन्वयः-यत्र आदिः सप्त चयः पञ्च गच्छः अष्टौ तत्र मध्यान्त्यधन संख्ये के सर्वधनं च किम् ? इति मे वद ॥ २ ॥ अर्थः-जहां आदिधन सात है, चयधन पांच ५ है और गच्छ ८ आठ है, वहां मध्यधन और अन्त्यधनकी क्या संख्या होगी और सर्वधन क्या होगा ? यह मुझसे कहो ॥ २ ॥ न्यासः--आदि ० ७ । च ० ५ । ग ० ८ । मध्यधनम् ४९/२ अन्त्यधनम् ४२ सर्वधनम् १९६ ॥

श्रेढीव्यवहारः । ( १०९ ) समदिने गच्छे मध्यदिनाभावान्मध्यात्प्रागपरदिनधनयो- र्योगाद्धं मध्यदिनधनं भवितुमर्हतीति प्रतीतिरुत्पाद्या ॥ फैलाव-यहां मुख सात ७ है, चय ५ पांच है, गच्छ ८ आठ है, ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार पद आठमें एक १ घटाया तब ७ रहे; इन ७ से चय ५ पांचको गुणा किया तब ३५ हुए; इसमें मुख ७ को जोडा तब ४२ बयालीस हुए; यही अन्त्यके दिन जो धन दिया वह अन्त्यधन है. अब इसी अन्त्यधन ४२ में मुख ७ सात जोडा, तब ४९ उनचास हुए; इनको आधा किया तब ४९/२ हुए; यही मध्यके दिन दिया हुआ मध्यधन है. इसी मध्यधन ४९/२ को गच्छ ८ से गुणा किया तब १९६ एक सौ छियानवे हुए. यही सर्वधन अर्थात् आठ ८ दिनमें जो सब धन दिया सो है. यद्यपि आठ दिन सम है इसमें कोई दिन मध्यका ठीक नहीं हो सकता है; तथापि मध्यके आदिके और मध्यके अन्त्यके दिनके योगका जो धन है उसका जो आधा होगा; उसीको मध्यधन मानकर प्रतीतिकी उत्पत्ति करना ॥ मुखज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तार्द्धम् ॥ जहां मध्यधन जानते हैं और अन्त्यधन जानते हैं तथा सर्व धन जानते ह परंतु आदिधन नहीं जानते हैं; तहां आदि धन जाननेकी रीति आधे श्लोकमें लिखते हैं- गच्छहृते गणिते वदनं स्याद्वेकपदघ्नचयार्द्धविहीने ॥ अन्वयः-गणित गच्छहृते व्येकपदघ्नचयार्द्धविहीने च वदनं स्यात् ॥ अर्थः-गणित ( श्रेढीव्यवहार अर्थात् सर्वधन ) में गच्छका भाग ले; जो लब्धि आवे उसमें एक करके हीन पदसे गुणा किये हुए चयके आधेको घटावे जो शेष रहे वही मुख ( आदिधन ) जानना ॥ उदाहरणम्- पञ्चाधिकं शतं श्रेढीफलं सप्तपदं किल ॥ चयं त्रयं वयं विद्मो वदनं वद नन्दन ॥ १ ॥ अन्वयः-हे नन्दन ! किल पञ्चाधिकं शतं श्रेढीफलं सप्तपदं त्रयं चयं वयं विद्मः तत्र वदनं वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे अतिआनन्द देनेवाले मित्र ! निश्चय करके हम १०५ एकसौ पाँच सर्वधन और ७ सात पद ( गच्छ ) ३ तीन चय हम जानते हैं तो तहां आदि धन क्या होगा ? सो कहो ॥ १ ॥

( ११० ) लीलावती। न्यासः-आ० । च ० ३ ग० ७ सर्वधनं १०५ लब्धमादिधनम् ६ फैलाव-इस उदाहरणमें चय ३ तीन गच्छ ७ सात सर्वधन १०५ एकसौ पाँच है केवल आदि धन नहीं जानते हैं उसके जाननेके वास्ते ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार सर्वधन १०५ में गच्छ ७ सातका भाग लिया तब १५ पन्द्रह लब्धि हुए. इनमें एक १ करके हीन जो पद अर्थात् ६ इससे चय ३तीनको गुणा किया तब १८ अठारह हुए इसका आधा किया तब ९ नौ हुए इनको १५ में घटाया तब ६ छ शेष रहे यही आदिधन है क्यों कि आदि धन जानकर सर्वधन निकालते हैं तो वही १०५ आता है. चयज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- आदिधन सर्वधन और गच्छ जानकर चय जाननेकी रीति आधे श्लोकम लिखते हैं. गच्छहृतं धनमादिविहीनं व्येकपदार्द्धहृतं च चयः स्यात् ॥ ३६॥ अन्वयः-धनं गच्छहृतम् आदिविहीनं व्येकपदार्द्धहृतं च चयः स्यात् ॥ ३६ ॥ अर्थः-सर्वधनमें गच्छका भाग दे, जो लब्धि आवे उसमें आदि धनको घटा दे जो शेष रहे उसमें एक करके हीन पदका भाग दे तब जो लब्धि आव उसको चय जानना ॥ ३६ ॥ उदाहरणम्- प्रथममगदह्ना योजने यो जनेशस्तदनु ननु कयाऽसौ ब्रूहि यातोऽध्ववृद्ध्या ॥ अरिकरिहरणार्थं योजनानाम- शीत्या रिपुनगरमवाप्तः सप्तरात्रेण धीमन् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे धीमन् ! यः जनेशः योजनानाम् अशीत्या अरिकरिहरणार्थं सप्तरा- त्रेण रिपुनगरम् अवाप्तः असौ प्रथमम् अह्ना योजने अगमत् तदनु ननु कया अध्ववृद्ध्या प्रयातः इति त्वम् ब्रूहि ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे चातुरीधुरीणमित्र ! जो राजा ८० योजनपर अपने शत्रुरूप हस्तीके मारनेके वास्ते सात दिनमें शत्रुके नगरको पहुँच गया. यहां राजा पहले दिन दो २ योजन मार्ग चला था; तो यह निश्चय करके कहो कि उसके बाद वह कितना रास्ता प्रतिदिन ज्यादा चला ? ॥ १ ॥ न्यासः-आ० २ । च० । गच्छ ७ धन ८० । लब्धमुत्तरम् २२ फैलाव- इस उदाहरणमें आदि धन २ दो है; क्योंकि पहले दिन दो योजन चला है और सात गच्छ है, क्योंकि सात ७ दिनमें पहुँचा है. सर्व धन ८० अस्सी

है. क्योंकि बिलकुल अस्सी योजन चला यहाँ चय नहीं मालूम है. इसके जाननेके वास्ते ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार सर्वधन ८० में गच्छ ७ सातका भाग दिया तब ८०/७ यह हुआ इसमें आदिधन २ दोको घटाया अर्थात समच्छेदसे घटाया तब ६६/७ इतना रहा इसमें एक करके हीन पद ६ छह के आधे ३ का भाग दिया तब २२/७ यह लब्धि हुआ; यही चय हुआ; अर्थात् २२/७ इतने मार्गकी वृद्धिसे वह राजा प्रतिदिन चला था ॥ गच्छज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- जहां आदिधन, मध्यधन, सर्वधन, चय यह तो जानते हैं और गच्छ नहीं जानते हैं तहां गच्छ जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- श्रेढीफलादुत्तरलोचनघ्नाच्चयार्द्धवक्रान्तरवर्गयुक्तात् ॥ मूलं मुखोनं चयखण्डयुक्तं चयोद्धृतं गच्छमुदाहरन्ति ॥ ३७ ॥ अन्वयः-आचार्याः उत्तरलोचनघ्नात् चयार्द्धवक्रान्तरवर्गयुक्तात् श्रेढीफलात् मूलम् मुखोनं चयखण्डयुक्तं चयोद्धृतं गच्छम् उदाहरन्ति ॥ ३७ ॥ अर्थः-सर्वधनको दो २ से गुणा किये हुए चयसे गुणा करे, फिर चयका आधा और आदिधन इनका अन्तर करनेसे जो मिले उसको द्विगुणित चयसे गुणा किये हुए सर्वधनमें जोड दे तब जो राशि सिद्ध हो उसका मूल ले, उस मूलमें आदि धन घटा दे और चयका आधा जोड दे, फिर चयका भाग दे जो लब्धि हो उसको गणितके आचार्य्य लोग गच्छ कहते हैं ॥ ३७ ॥ उदाहरणम्- द्रम्मतत्रयं यः प्रथमेऽह्नि दत्त्वा दातुं प्रवृत्तो द्विचयेन तेन ॥ शतत्रयं षष्ट्यधिकं द्विजेभ्यो दत्तं कियद्भिर्दिवसैर्वदाशु ॥ १ ॥ अन्वयः-हे मित्र ! यः द्विजेभ्यः प्रथमेऽह्नि द्रम्मतत्रयं दत्त्वा द्विचयेन दातुम् प्रवृत्तः तर्हि तेन षष्ट्यधिकं शतत्रयं कियद्भिः दिवसैः दत्तम् इति त्वम् आशु वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे प्रियसखे ! जो दानी पहले दिन ब्राह्मणोंको तीन द्रम्म देकर फिर प्रतिदिन २ द्रम्म बढाकर देने लगा, तो उसने ३६० तीनसौ साठ द्रम्म कितने दिनमें दिये यह तुम शीघ्र कहो ? ॥ १ ॥ न्यासः-आ० ३ । च० २ । ग० । ध० ३६० । लब्धो गच्छः १८ फैलाव-इस उदाहरणमें आदि ३ तीन हैं; चय दो हैं; सर्वधन ३६० हैं; यह सब जानते हैं परन्तु गच्छ नहीं जानते हैं, इस कारण गच्छ जाननेके वास्ते ऊपर कहे हुए नियमके अनुसार चय २ दोको दो २ से गुणा किया तब चार ४ हुए. इससे