महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कर्णने कहा— विकर्ण! इस जगत्में बहुत-सी वस्तुएँ विपरीत परिणाम उत्पन्न करनेवाली देखी जाती हैं। जैसे अरणिसे उत्पन्न हुई अग्नि उसीको जला देती है, उसी प्रकार कोई-कोई मनुष्य जिस कुलमें उत्पन्न होता है, उसीका विनाश करनेवाला बन जाता है।। २७ ।।
(व्याधिर्बलं नाशयते शरीरस्थोऽपि सम्भृतः ।
तृणानि पशवो घ्नन्ति स्वपक्षं चैव कौरवः ।।
द्रोणो भीष्मः कृपो द्रौणिर्विदुरश्च महामतिः ।
धृतराष्ट्रश्च गान्धारी भवतः प्राज्ञवत्तराः ।।)
रोग यद्यपि शरीरमें ही पलता है, तथापि वह शरीरके ही बलका नाश करता है। पशु घासको ही चरते हैं, फिर भी उसे पैरोंसे कुचल डालते हैं। उसी प्रकार कुरुकुलमें उत्पन्न होकर भी तुम अपने ही पक्षको हानि पहुँचाना चाहते हो। विकर्ण! द्रोण, भीष्म, कृप, अश्वत्थामा, महाबुद्धिमान् विदुर, धृतराष्ट्र तथा गान्धारी—ये तुमसे अधिक बुद्धिमान् हैं।
एते न किंचिदप्याहुश्चोदिता ह्यपि कृष्णया ।
धर्मेण विजितामेतां मन्यन्ते द्रुपदात्मजाम् ।। २८ ।।
द्रौपदीने बार-बार प्रेरित किया है, तो भी ये सभासद कुछ भी नहीं बोलते हैं; क्योंकि ये सब लोग द्रुपदकुमारीको धर्मके अनुसार जीती हुई समझते हैं ।।
त्वं तु केवलबाल्येन धार्तराष्ट्र विदीर्यसे ।
यद् ब्रवीषि सभामध्ये बालः स्थविरभाषितम् ।। २९ ।।
धृतराष्ट्रकुमार! तुम केवल अपनी मूर्खताके कारण आप ही अपने पैरोंमें कुल्हाड़ी मार रहे हो; क्योंकि तुम बालक होकर भी भरी सभामें वृद्धोंकी-सी बातें करते हो ।।
न च धर्मं यथावत् त्वं वेत्सि दुर्योधनावर ।
यद् ब्रवीषि जितां कृष्णां न जितेति सुमन्दधीः ।। ३० ।।
दुर्योधनके छोटे भाई! तुम्हें धर्मके विषयमें यथार्थ ज्ञान नहीं है। तुम जो जीती हुई द्रौपदीको नहीं जीती हुई बता रहे हो, इससे तुम्हारे मन्दबुद्धि होनेका परिचय मिलता है ।।
कथं ह्यविजितां कृष्णां मन्यसे धृतराष्ट्रज ।
यदा सभायां सर्वस्वं न्यस्तवान् पाण्डवाग्रजः ।। ३१ ।।
धृतराष्ट्रकुमार! तुम कृष्णाको नहीं जीती हुई कैसे मानते हो? जब कि पाण्डवोंके बड़े भाई युधिष्ठिरने द्यूतसभाके बीच अपना सर्वस्व दाँवपर लगा दिया है ।।
अभ्यन्तरा च सर्वस्वे द्रौपदी भरतर्षभ ।
एवं धर्मजितां कृष्णां मन्यसे न जितां कथम् ।। ३२ ।।
भरतश्रेष्ठ! द्रौपदी भी तो सर्वस्वके भीतर ही है। इस प्रकार जब कृष्णाको धर्मपूर्वक जीत लिया गया है, तब तुम उसे नहीं जीती हुई क्यों समझते हो? ।। ३२ ।।
कीर्तिता द्रौपदी वाचा अनुज्ञाता च पाण्डवैः ।
भवत्यविजिता केन हेतुनैषा मता तव ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिरने अपनी वाणीद्वारा कहकर द्रौपदीको दाँवपर रखा और शेष पाण्डवोंने मौन रहकर उसका अनुमोदन किया। फिर किस कारणसे तुम उसे नहीं जीती हुई मानते हो? ।।
मन्यसे वा सभामेतामानीतामेकवाससम् ।
अधर्मेणेति तत्रापि शृणु मे वाक्यमुत्तमम् ॥ ३४ ॥
अथवा यदि तुम्हारी यह राय हो कि एकवस्त्रा द्रौपदीको इस सभामें अधर्मपूर्वक लाया गया है तो इसके उत्तरमें भी मेरी उत्तम बात सुनो ।। ३४ ।।
एको भर्ता स्त्रिया देवैर्विहितः कुरुनन्दन ।
इयं त्वनेकवशगा बन्धकीति विनिश्चिता ॥ ३५ ॥
अस्याः सभामानयनं न चित्रमिति मे मतिः ।
एकाम्बरधरत्वं वाप्यथ वापि विवस्त्रता ॥ ३६ ॥
कुरुनन्दन! देवताओंने स्त्रीके लिये एक ही पतिका विधान किया है; परंतु यह द्रौपदी अनेक पतियोंके अधीन है, अतः यह निश्चय ही वेश्या है। इसका सभामें लाया जाना कोई अनोखी बात नहीं है। यह एकवस्त्रा अथवा नंगी हो तो भी यहाँ लायी जा सकती है, यह मेरा स्पष्ट मत है ।। ३५-३६ ।।
यच्चैषां द्रविणं किंचिद् या चैषा ये च पाण्डवाः ।
सौबलेनेह तत् सर्वं धर्मेण विजितं वसु ॥ ३७ ॥
इन पाण्डवोंके पास जो कुछ धन है, जो यह द्रौपदी है तथा जो ये पाण्डव हैं, इन सबको सुबलपुत्र शकुनिने यहाँ जूएके धनके रूपमें धर्मपूर्वक जीता है ।। ३७ ।।
दुःशासन सुबालोऽयं विकर्णः प्राज्ञवादिकः ।
पाण्डवानां च वासांसि द्रौपद्याश्चाप्युपाहर ॥ ३८ ॥
दुःशासन! यह विकर्ण अत्यन्त मूढ़ है, तथापि विद्वानोंकी-सी बातें बनाता है। तुम पाण्डवोंके और द्रौपदीके भी वस्त्र उतार लो ।। ३८ ।।
तच्छ्रुत्वा पाण्डवाः सर्वे स्वानि वासांसि भारत ।
अवकीर्योत्तरीयाणि सभायां समुपाविशन् ॥ ३९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! कर्णकी बात सुनकर समस्त पाण्डव अपने-अपने उत्तरीय वस्त्र उतारकर सभामें बैठ गये ।। ३९ ।।
ततो दुःशासनो राजन् द्रौपद्या वसनं बलात् ।
सभामध्ये समाक्षिप्य व्यपाक्रष्टुं प्रचक्रमे ॥ ४० ॥
राजन्! तब दुःशासनने उस भरी सभामें द्रौपदीका वस्त्र बलपूर्वक पकड़कर खींचना प्रारम्भ किया ।। ४० ।।
वैशम्पायन उवाच
आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्याश्चिन्तितो हरिः । वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! जब वस्त्र खींचा जाने लगा, तब द्रौपदीने भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण किया ।।
(द्रौपद्युवाच
ज्ञातं मया वसिष्ठेन पुरा गीतं महात्मना । महत्यापदि सम्प्राप्ते स्मर्तव्यो भगवान् हरिः ।। द्रौपदीने मन-ही-मन कहा— मैंने पूर्वकालमें महात्मा वसिष्ठजीकी बतायी हुई इस बातको अच्छी तरह समझा है कि भारी विपत्ति पड़नेपर भगवान् श्रीहरिका स्मरण करना चाहिये।
वैशम्पायन उवाच
गोविन्देति समाभाष्य कृष्णेति च पुनः पुनः । मनसा चिन्तयामास देवं नारायणं प्रभुम् ।। आपत्स्वभयदं कृष्णं लोकानां प्रपितामहम् ।) वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा विचारकर द्रौपदीने बारंबार 'गोविन्द' और 'कृष्ण' का नाम लेकर पुकारा और आपत्तिकालमें अभय देनेवाले लोकप्रपितामह नारायण-स्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका मन-ही-मन चिन्तन किया।
गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय ।। ४१ ।। कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव । हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन । कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन ।। ४२ ।। 'हे गोविन्द! हे द्वारकावासी श्रीकृष्ण! हे गोपांगनाओंके प्राणवल्लभ केशव! कौरव मेरा अपमान कर रहे हैं, क्या आप नहीं जानते? हे नाथ! हे रमानाथ! हे व्रजनाथ! हे संकटनाशन जनार्दन! मैं कौरवरूप समुद्रमें डूबी जा रही हूँ, मेरा उद्धार कीजिये ।। ४१-४२ ।।
कृष्ण कृष्ण महायोगिन् विश्वात्मन् विश्वभावन । प्रपन्नां पाहि गोविन्द कुरुमध्येऽवसीदतीम् ।। ४३ ।। 'सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! महायोगिन्! विश्वात्मन्! विश्वभावन! गोविन्द! कौरवोंके बीचमें कष्ट पाती हुई मुझ शरणागत अबलाकी रक्षा कीजिये' ।। ४३ ।।
इत्यनुस्मृत्य कृष्णं सा हरिं त्रिभुवनेश्वरम् । प्रारुदद् दुःखिता राजन् मुखमाच्छाद्य भामिनी ।। ४४ ।। राजन्! इस प्रकार तीनों लोकोंके स्वामी श्यामसुन्दर श्रीकृष्णका बार-बार चिन्तन करके मानिनी द्रौपदी दुःखी हो अंचलसे मुँह ढककर जोर-जोरसे रोने लगी ।। ४४ ।।
याज्ञसेन्या वचः श्रुत्वा कृष्णो गह्वरितोऽभवत् । त्यक्त्वा शय्याऽऽसनं पद्भ्यां कृपालुः कृपयाभ्यगात् ॥ ४५ ॥ कृष्णं च विष्णुं च हरिं नरं च त्राणाय विक्रोशति याज्ञसेनी । ततस्तु धर्मोऽन्तरितो महात्मा समावृणोद् वै विविधैः सुवस्त्रैः ॥ ४६ ॥ द्रुपदनन्दिनीकी वह करुण पुकार सुनकर कृपालु श्रीकृष्ण गद्गद हो गये तथा शय्या और आसन छोड़कर दयासे द्रवित हो पैदल ही दौड़ पड़े। यज्ञसेनकुमारी कृष्णा अपनी रक्षाके लिये श्रीकृष्ण, विष्णु हरि और नर आदि भगवन्नामोंको जोर-जोरसे पुकार रही थी। इसी समय धर्मस्वरूप महात्मा श्रीकृष्णने अव्यक्तरूपसे उसके वस्त्रमें प्रवेश करके भाँति-भाँतिके सुन्दर वस्त्रोंद्वारा द्रौपदीको आच्छादित कर लिया ॥ ४५-४६ ॥ आकृष्यमाणे वसने द्रौपद्यास्तु विशाम्पते । तद्रूपमपरं वस्त्रं प्रादुरासीदनेकशः ॥ ४७ ॥ जनमेजय! द्रौपदीके वस्त्र खींचे जाते समय उसी तरहके दूसरे-दूसरे अनेक वस्त्र प्रकट होने लगे ॥ ४७ ॥ नानारागविरागाणि वसनान्यथ वै प्रभो । प्रादुर्भवन्ति शतशो धर्मस्य परिपालनात् ॥ ४८ ॥ राजन्! धर्मपालनके प्रभावसे वहाँ भाँति-भाँतिके सैकड़ों रंग-बिरंगे वस्त्र प्रकट होते रहे ॥ ४८ ॥ ततो हलहलाशब्दस्तत्रासीद् घोरदर्शनः । तदद्भुततमं लोको वीक्ष्य सर्वे महीभृतः । शशंसुर्द्रौपदीं तत्र कुत्सन्तो धृतराष्ट्रजम् ॥ ४९ ॥ शशाप तत्र भीमस्तु राजमध्ये बृहत्स्वनः । क्रोधाद् विस्फुरमाणौष्ठो विनिष्पिष्य करे करम् ॥ ५० ॥ उस समय वहाँ बड़ा भयंकर कोलाहल मच गया। जगत्में यह अद्भुत दृश्य देखकर सब राजा द्रौपदीकी प्रशंसा और दुःशासनकी निन्दा करने लगे। उस समय वहाँ समस्त राजाओंके बीच हाथ-पर-हाथ मलते हुए भीमसेनने क्रोधसे फड़कते हुए ओठोंद्वारा भयंकर गर्जनाके साथ यह शाप दिया (प्रतिज्ञा की) ॥ ४९-५० ॥
भीम उवाच
इदं मे वाक्यमादध्वं क्षत्रिया लोकवासिनः । नोक्तपूर्वं नरैरन्यैर्न चान्यो यद् वदिष्यति ॥ ५१ ॥
**भीमसेनने कहा—**देश-देशान्तरके निवासी क्षत्रियो! आपलोग मेरी इस बातपर ध्यान दें। ऐसी बात आजसे पहले न तो किसीने कही होगी और न दूसरा कोई कहेगा ही ।।
यद्येतदेवमुक्त्वाहं न कुर्यां पृथिवीश्वराः । पितामहानां पूर्वेषां नाहं गतिमवाप्नुयाम् ।। ५२ ।। अस्य पापस्य दुर्बुद्धेर्भारतापसदस्य च । न पिबेयं बलाद् वक्षो भित्त्वा चेद् रुधिरं युधि ।। ५३ ।। भूमिपालो! यह खोटी बुद्धिवाला दुःशासन भरतवंशके लिये कलंक है। मैं युद्धमें बलपूर्वक इस पापीकी छाती फाड़कर इसका रक्त पीऊँगा। यदि न पीऊँ अर्थात्—अपनी कही हुई उस बातको पूरा न करूँ, तो मुझे अपने पूर्वज बाप-दादोंकी श्रेष्ठ गति न मिले ।। ५२-५३ ।।
वैशम्पायन उवाच
तस्य ते तद् वचः श्रुत्वा रौद्रं लोमप्रहर्षणम् । प्रचक्रुर्बहुलां पूजां कुत्सन्तो धृतराष्ट्रजम् ।। ५४ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीमसेनकी यह रोंगटे खड़े कर देनेवाली भयंकर बात सुनकर वहाँ बैठे हुए राजाओंने धृतराष्ट्रपुत्र दुःशासनकी निन्दा करते हुए भीमसेनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। ५४ ।। यदा तु वाससां राशिः सभामध्ये समाचितः । ततो दुःशासनः श्रान्तो व्रीडितः समुपाविशत् ।। ५५ ।।
जब सभामें वस्त्रोंका ढेर लग गया, तब दुःशासन थककर लज्जित हो चुपचाप बैठ गया ।। ५५ ।। धिक्शब्दस्तु ततस्तत्र समभूल्लोमहर्षणः । सभ्यानां नरदेवानां दृष्ट्वा कुन्तीसुतांस्तथा ॥ ५६ ॥ उस समय कुन्तीपुत्रोंकी ओर देखकर सभामें उपस्थित नरेशोंकी ओरसे दुःशासनपर रोमांचकारी शब्दोंमें धिक्कारकी बौछार होने लगी ।। ५६ ।। न विब्रुवन्ति कौरव्याः प्रश्नमेतमिति स्म ह । स जनः क्रोशति स्मात्र धृतराष्ट्रं विगर्हयन् ॥ ५७ ॥ कौरव द्रौपदीके पूर्वोक्त प्रश्नपर स्पष्ट विवेचन नहीं कर रहे थे, अतः वहाँ बैठे हुए लोग राजा धृतराष्ट्रकी निन्दा करते हुए उन्हें कोसने लगे ।। ५७ ।। ततो बाहू समुच्छ्रित्य निवार्य च सभासदः । विदुरः सर्वधर्मज्ञ इदं वचनमब्रवीत् ॥ ५८ ॥ तब सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता विदुरजीने अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर सभासदोंको चुप कराया और इस प्रकार कहा ।।
विदुर उवाच
द्रौपदी प्रश्नमुक्त्वैवं रोरवीति ह्यनाथवत् । न च विब्रूत तं प्रश्नं सभ्या धर्मोऽत्र पीड्यते ॥ ५९ ॥ विदुरजी बोले— इस सभामें पधारे हुए भूपालगण! द्रुपदकुमारी कृष्णा यहाँ अपना प्रश्न उपस्थित करके इस तरह अनाथकी भाँति रो रही है; परंतु आपलोग उसका विवेचन नहीं करते, अतः यहाँ धर्मकी हानि हो रही है ।। सभां प्रपद्यते ह्यार्तः प्रज्वलन्निव हव्यवाट् । तं वै सत्येन धर्मेण सभ्याः प्रशमयन्त्युत ॥ ६० ॥ संकटमें पड़ा हुआ मनुष्य अग्निकी भाँति चिन्तासे प्रज्वलित हुआ सभाकी शरण लेता है, उस समय सभासद्गण धर्म और सत्यका आश्रय लेकर अपने वचनोंद्वारा उसे शान्त करते हैं ।। धर्मप्रश्नमतो ब्रूयादार्यः सत्येन मानवः । विब्रूयुस्तत्र तं प्रश्नं कामक्रोधबलातिगाः ॥ ६१ ॥ अतः श्रेष्ठ मनुष्यको उचित है कि वह धर्मानुकूल प्रश्नको सच्चाईके साथ उपस्थित करे और सभासदोंको चाहिये कि वे काम-क्रोधके वेगसे ऊपर उठकर उस प्रश्नका ठीक-ठीक विवेचन करें ।। ६१ ।। विकर्णेन यथाप्रज्ञमुक्तः प्रश्नो नराधिपाः । भवन्तोऽपि हि तं प्रश्नं विब्रुवन्तु यथामति ॥ ६२ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2162)
द्रौपदी-चीर-हरण
राजाओ! विकर्णने अपनी बुद्धिके अनुसार इस प्रश्नका उत्तर दिया है, अब आपलोग भी अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार उस प्रश्नका निर्णय करें ॥ ६२ ॥ यो हि प्रश्नं न विब्रूयाद् धर्मदर्शी सभां गतः । अनृते या फलावाप्तिस्तस्याः सोऽर्धं समश्नुते ॥ ६३ ॥ जो धर्मज्ञ पुरुष सभामें जाकर वहाँ उपस्थित हुए प्रश्नका उत्तर नहीं देता, वह झूठ बोलनेके आधे फलका भागी होता है ॥ ६३ ॥ यः पुनर्वितथं ब्रूयाद् धर्मदर्शी सभां गतः । अनृतस्य फलं कृत्स्नं सम्प्राप्नोतीति निश्चयः ॥ ६४ ॥ इसी प्रकार जो धर्मज्ञ मानव सभामें जाकर किसी प्रश्नपर झूठा निर्णय देता है, वह निश्चय ही असत्यभाषण-का पूरा फल (दण्ड) पाता है ॥ ६४ ॥ अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । प्रह्लादस्य च संवादं मुनेराङ्गिरसस्य च ॥ ६५ ॥ इस विषयमें विज्ञपुरुष प्रह्लाद और अंगिराकुमार मुनि सुधन्वाके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ६५ ॥ प्रह्लादो नाम दैत्येन्द्रस्तस्य पुत्रो विरोचनः । कन्याहेतोराङ्गिरसं सुधन्वानमुपाद्रवत् ॥ ६६ ॥ दैत्यराज प्रह्लादके एक पुत्र था विरोचन। उसका केशिनी नामवाली एक कन्याकी प्राप्तिके लिये अंगिराके पुत्र सुधन्वाके साथ विवाद हो गया ॥ ६६ ॥ अहं ज्यायानहं ज्यायानिति कन्येप्सया तदा । तयोर्देवनमत्रासीत् प्राणयोरिति नः श्रुतम् ॥ ६७ ॥ दोनों ही उस कन्याको पानेकी इच्छासे 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' ऐसा कहने लगे। मेरे सुननेमें आया है कि उन दोनोंने अपनी बात सत्य करनेके लिये प्राणोंकी बाजी लगा दी ॥ ६७ ॥ तयोः प्रश्नविवादोऽभूत् प्रह्लादं तावपृच्छताम् । ज्यायान् क आवयोरेकः प्रश्नं प्रब्रूहि मा मृषा ॥ ६८ ॥ श्रेष्ठताके प्रश्नको लेकर जब उनका विवाद बहुत बढ़ गया, तब उन्होंने दैत्यराज प्रह्लादसे जाकर पूछा—'हम दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है? आप इस प्रश्नका ठीक-ठीक उत्तर दीजिये, झूठ न बोलियेगा' ॥ ६८ ॥ स वै विवदनाद् भीतः सुधन्वानं विलोकयन् । तं सुधन्वाब्रवीत् क्रुद्धो ब्रह्मदण्ड इव ज्वलन् ॥ ६९ ॥ प्रह्लाद उस विवादसे भयभीत हो सुधन्वाकी ओर देखने लगे, तब सुधन्वाने प्रज्वलित ब्रह्मदण्डके समान कुपित होकर कहा— ॥ ६९ ॥ यदि वै वक्ष्यसि मृषा प्रह्लादाथ न वक्ष्यसि । शतधा ते शिरो वज्री वज्रेण प्रहरिष्यति ॥ ७० ॥
'प्रह्लाद! यदि तुम इस प्रश्नके उत्तरमें झूठ बोलोगे अथवा मौन रह जाओगे तो वज्रधारी इन्द्र अपने वज्रद्वारा तुम्हारे सिरके सैकड़ों टुकड़े कर देगा' ।। ७० ।।
सुधन्वना तथोक्तः सन् व्यथितोऽश्वत्थपर्णवत् ।
जगाम कश्यपं दैत्यः परिप्रष्टुं महौजसम् ।। ७१ ।।
सुधन्वाके ऐसा कहनेपर प्रह्लाद व्यथित हो पीपलके पत्तेकी तरह काँपने लगे और इसके विषयमें कुछ पूछनेके लिये वे महातेजस्वी कश्यपजीके पास गये ।। ७१ ।।
प्रह्लाद उवाच
त्वं वै धर्मस्य विज्ञाता दैवस्येहासुरस्य च ।
ब्राह्मणस्य महाभाग धर्मकृच्छ्रमिदं शृणु ।। ७२ ।।
प्रह्लाद बोले—महाभाग! आप देवताओं, असुरों तथा ब्राह्मणके भी धर्मको जानते हैं। मुझपर एक धर्मसंकट उपस्थित हुआ है, उसे सुनिये ।। ७२ ।।
यो वै प्रश्नं न विब्रूयाद् वितथं चैव निर्दिशेत् ।
के वै तस्य परे लोकास्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ।। ७३ ।।
मैं पूछता हूँ कि जो प्रश्नका उत्तर ही न दे अथवा असत्य उत्तर दे दे, उसे परलोकमें कौन-से लोक प्राप्त होते हैं? यह मुझे बताइये ।। ७३ ।।
कश्यप उवाच
जानन्नविब्रुवन् प्रश्नान् कामात् क्रोधाद् भयात् तथा ।
सहस्रं वारुणान् पाशानात्मनि प्रतिमुञ्चति ।। ७४ ।।
कश्यपजीने कहा—जो जानते हुए भी काम, क्रोध तथा भयसे प्रश्नोंका उत्तर नहीं देता, वह अपने ऊपर वरुणदेवताके सहस्रों पाश डाल लेता है ।। ७४ ।।
साक्षी वा विब्रुवन् साक्ष्यं गोकर्णशिथिलश्चरन् ।
सहस्रं वारुणान् पाशानात्मनि प्रतिमुञ्चति ।। ७५ ।।
जो गवाह गाय-बैलके ढीले-ढाले कानोंकी तरह शिथिल हो दोनों पक्षोंसे सम्बन्ध बनाये रखकर गवाही नहीं देता, वह भी अपनेको वरुणदेवताके सहस्रों पाशोंसे बाँध लेता है ।। ७५ ।।
तस्य संवत्सरे पूर्णे पाश एकः प्रमुच्यते ।
तस्मात् सत्यं तु वक्तव्यं जानता सत्यमञ्जसा ।। ७६ ।।
एक वर्ष पूरा होनेपर उसका एक पाश खुलता है, अतः सच्ची बात जाननेवाले पुरुषको यथार्थरूपसे सत्य ही बोलना चाहिये ।। ७६ ।।
विद्धो धर्मो ह्यधर्मेण सभां यत्रोपपद्यते ।
न चास्य शल्यं कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः ।। ७७ ।।
जहाँ धर्म अधर्मसे विद्ध होकर सभामें उपस्थित होता है, उसके काँटेको उससे बिंधे हुए सभासदलोग नहीं काट पाते (अर्थात् उनको पापका फल भोगना ही पड़ता है) ।।
अर्धं हरति वै श्रेष्ठः पादो भवति कर्तृषु ।
पादश्चैव सभासत्सु ये न निन्दन्ति निन्दितम् ॥ ७८ ॥
सभामें जो अधर्म होता है, उसका आधा भाग स्वयं सभापति ले लेता है, एक चौथाई भाग करनेवालोंको मिलता है और एक चतुर्थांश उन सभासदोंको प्राप्त होता है जो निन्दनीय पुरुषकी निन्दा नहीं करते ।। ७८ ।।
अनेना भवति श्रेष्ठो मुच्यन्ते च सभासदः ।
एनो गच्छति कर्तारं निन्दार्हो यत्र निन्द्यते ॥ ७९ ॥
जिस सभामें निन्दाके योग्य मनुष्यकी निन्दा की जाती है, वहाँ सभापति निष्पाप हो जाता है, सभासद भी पापसे मुक्त हो जाते हैं और सारा पाप करनेवालेको ही लगता है ।।
वितथं तु वदेयुर्ये धर्मं प्रह्लाद पृच्छते ।
इष्टापूर्तं च ते घ्नन्ति सप्त सप्त परावरान् ॥ ८० ॥
प्रह्लाद! जो लोग धर्मविषयक प्रश्न पूछनेवालेको झूठा उत्तर देते हैं, वे अपने इष्टापूर्त धर्मका नाश तो करते ही हैं आगे-पीछेकी सात-सात पीढ़ियोंके भी पुण्योंका वे हनन करते हैं ।। ८० ।।
हृतस्वस्य हि यद् दुःखं हतपुत्रस्य चैव यत् ।
ऋणिनः प्रति यच्चैव स्वार्थाद् भ्रष्टस्य चैव यत् ॥ ८१ ॥
स्त्रियाः पत्या विहीनाया राज्ञा ग्रस्तस्य चैव यत् ।
अपुत्रायाश्च यद् दुःखं व्याघ्राघ्रातस्य चैव यत् ॥ ८२ ॥
अध्यूढायाश्च यद् दुःखं साक्षिभिर्विहतस्य च ।
एतानि वै समान्याहुर्दुःखानि त्रिदिवेश्वराः ॥ ८३ ॥
जिसका सर्वस्व छीन लिया गया हो, उसे जो दुःख होता है, जिसका पुत्र मर गया हो, उसे जो शोक होता है, ऋणग्रस्त और स्वार्थसे वंचित मनुष्यको जो क्लेश होता है, पतिसे विहीन होनेपर स्त्रीको तथा राजाके कोपभाजन मनुष्यको जो कष्ट उठाना पड़ता है, पुत्रहीना नारीको जो संताप होता है, शेरके चंगुलमें फँसे हुए प्राणीको जो व्याकुलता होती है, सौतवाली स्त्रीको जो दुःख होता है, साक्षियोंने जिसे धोखा दिया हो, उस मनुष्यको जो महान् क्लेश होता है—इन सभी प्रकारके दुःखोंको देवताओंने समान बतलाया है ।। ८१—८३ ।।
तानि सर्वाणि दुःखानि प्राप्नोति वितथं ब्रुवन् ।
समक्षदर्शनात् साक्षी श्रवणाच्चेति धारणात् ॥ ८४ ॥
तस्मात् सत्यं ब्रुवन् साक्षी धर्मार्थाभ्यां न हीयते ।
झूठ बोलनेवाला मनुष्य उन सभी दुःखोंका भागी होता है। समक्ष दर्शन, श्रवण और धारणसे साक्षी संज्ञा होती है, अतः सत्य बोलनेवाला साक्षी कभी धर्म और अर्थसे वंचित नहीं होता ।। ८४ १/२ ।।
कश्यपस्य वचः श्रुत्वा प्रह्लादः पुत्रमब्रवीत् ।। ८५ ।। कश्यपजीकी यह बात सुनकर प्रह्लादने अपने पुत्रसे कहा— ।। ८५ ।।
श्रेयान् सुधन्वा त्वत्तो वै मत्तः श्रेयांस्तथाङ्गिराः ।
माता सुधन्वनश्चापि मातृतः श्रेयसी तव ।
विरोचन सुधन्वायं प्राणानामीश्वरस्तव ।। ८६ ।।
‘विरोचन! सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है, उसके पिता अंगिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं और सुधन्वाकी माता तुम्हारी मातासे श्रेष्ठ है। अब यह सुधन्वा ही तुम्हारे प्राणोंका स्वामी है’ ।। ८६ ।।
सुधन्वोवाच
पुत्रस्नेहं परित्यज्य यस्त्वं धर्मे व्यवस्थितः ।
अनुजानामि ते पुत्रं जीवत्वेष शतं समाः ।। ८७ ।।
**सुधन्वाने कहा—**दैत्यराज! तुम पुत्रस्नेहकी परवा न करके जो धर्मपर डटे रह गये, इससे प्रसन्न होकर मैं तुम्हारे पुत्रको यह आज्ञा देता हूँ कि यह सौ वर्षोंतक जीवित रहे ।।
विदुर उवाच
एवं वै परमं धर्मं श्रुत्वा सर्वे सभासदः ।
यथाप्रश्नं तु कृष्णाया मन्यध्वं तत्र किं परम् ।। ८८ ।।
**विदुरजी कहते हैं—**सभासदो! इस प्रकार इस उत्तम धर्ममय प्रसंगको सुनकर आप सब लोग द्रौपदीके प्रश्नके अनुसार यह बतावें कि उसके सम्बन्धमें आपकी क्या मान्यता है? ।। ८८ ।।
वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य वचः श्रुत्वा नोचुः किंचन पार्थिवाः ।
कर्णो दुःशासनं त्वाह कृष्णां दासीं गृहान् नय ।। ८९ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! विदुरकी यह बात सुनकर भी सब राजालोग कुछ न बोले। उस समय कर्णने दुःशासनसे कहा—‘इस दासी द्रौपदीको अपने घर ले जाओ’ ।। ८९ ।।
तां वेपमानां सब्रीडां प्रलपन्तीं स्म पाण्डवान् ।
दुःशासनः सभामध्ये विचकर्ष तपस्विनीम् ।। ९० ।।
द्रौपदी लज्जामें डूबी हुई थर-थर काँपती और पाण्डवोंको पुकारती थी। उस दशामें दुःशासनने उस भरी सभाके बीच उस बेचारी दुःखिया तपस्विनीको घसीटना आरम्भ
किया ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि द्रौपद्याकर्षणेऽष्टषष्टितमोऽध्यायः ।। ६८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें 'द्रौपदीको भरी सभामें खींचना' इस विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ९४ १/२ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 2168)
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
द्रौपदीका चेतावनीयुक्त विलाप एवं भीष्मका वचन
द्रौपद्युवाच
पुरस्तात् करणीयं मे न कृतं कार्यमुत्तरम् ।
विह्वलास्मि कृतानेन कर्षता बलिना बलात् ॥ १ ॥
द्रौपदी बोली— हाय! मेरा जो कार्य सबसे पहले करनेका था, वह अभीतक नहीं हुआ। मुझे अब वह कार्य कर लेना चाहिये। इस बलवान् दुरात्मा दुःशासनने मुझे बलपूर्वक घसीटकर व्याकुल कर दिया है ॥ १ ॥
अभिवादं करोम्येषां कुरूणां कुरुसंसदि ।
न मे स्यादपराधोऽयं यदिदं न कृतं मया ॥ २ ॥
कौरवोंकी सभामें मैं समस्त कुरुवंशी महात्माओंको प्रणाम करती हूँ। मैंने घबराहटके कारण पहले प्रणाम नहीं किया; अतः यह मेरा अपराध न माना जाय ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
सा तेन च समाधूता दुःखेन च तपस्विनी ।
पतिता विललापेदं सभायामतथोचिता ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! दुःशासनके बार-बार खींचनेसे तपस्विनी द्रौपदी पृथ्वीपर गिर पड़ी और उस सभामें अत्यन्त दुःखित हो विलाप करने लगी। वह जिस दुरवस्थामें पड़ी थी, उसके योग्य कदापि न थी ॥ ३ ॥
द्रौपद्युवाच
स्वयंवरे यास्मि नृपैर्दृष्टा रङ्गे समागतैः ।
न दृष्टपूर्वा चान्यत्र साह्मद्य सभां गता ॥ ४ ॥
द्रौपदीने कहा— हा! मैं स्वयंवरके समय सभामें आयी थी और उस समय रंगभूमिमें पधारे हुए राजाओंने मुझे देखा था। उसके सिवा, अन्य अवसरोंपर कहीं भी आजसे पहले किसीने मुझे नहीं देखा। वही मैं आज सभामें बलपूर्वक लायी गयी हूँ ॥ ४ ॥
यां न वायुर्न चादित्यो दृष्टवन्तौ पुरा गृहे ।
साहमद्य सभामध्ये दृश्यास्मि जनसंसदि ॥ ५ ॥
पहले राजभवनमें रहते हुए जिसे वायु तथा सूर्य भी नहीं देख पाते थे, वही मैं आज इस सभाके भीतर महान् जनसमुदायमें आकर सबके नेत्रोंकी लक्ष्य बन गयी हूँ ॥
यां न मृष्यन्ति वातेन स्पृश्यमानां गृहे पुरा ।
स्पृश्यमानां सहन्तेऽद्य पाण्डवास्तां दुरात्मना ॥ ६ ॥
पहले अपने महलमें रहते समय जिसका वायुद्वारा स्पर्श भी पाण्डवोंको सहन नहीं होता था, उसी मुझ द्रौपदीका यह दुरात्मा दुःशासन भरी सभामें स्पर्श कर रहा है, तो भी आज ये पाण्डुकुमार सह रहे हैं ।। ६ ।।
मृष्यन्ति कुरवश्चेमे मन्ये कालस्य पर्ययम् ।
स्नुषां दुहितरं चैव क्लिश्यमानाममर्हतीम् ।। ७ ।।
मैं कुरुकुलकी पुत्रवधू एवं पुत्रीतुल्य हूँ। सताये जानेके योग्य नहीं हूँ, फिर भी मुझे यह दारुण क्लेश दिया जा रहा है और ये समस्त कुरुवंशी इसे सहन करते हैं। मैं समझती हूँ, बड़ा विपरीत समय आ गया है ।। ७ ।।
किं न्वतः कृपणं भूयो यदहं स्त्री सती शुभा ।
सभामध्यं विगाहेऽद्य क्व नु धर्मो महीक्षिताम् ।। ८ ।।
इससे बढ़कर दयनीय दशा और क्या हो सकती है कि मुझ-जैसी शुभकर्मपरायणा सती-साध्वी स्त्री भरी सभामें विवश करके लायी गयी है। आज राजाओंका धर्म कहाँ चला गया? ।। ८ ।।
धर्म्यां स्त्रियं सभां पूर्वे न नयन्तीति नः श्रुतम् ।
स नष्टः कौरवेयेषु पूर्वो धर्मः सनातनः ।। ९ ।।
मैंने सुना है, पहले लोग धर्मपरायणा स्त्रीको कभी सभामें नहीं लाते थे, किंतु इन कौरवोंके समाजमें वह प्राचीन सनातनधर्म नष्ट हो गया है ।। ९ ।।
कथं हि भार्या पाण्डूनां पार्षतस्य स्वसा सती ।
वासुदेवस्य च सखी पार्थिवानां सभामियाम् ।। १० ।।
अन्यथा मैं पाण्डवोंकी पत्नी, धृष्टद्युम्नकी सुशीला बहन और भगवान् श्रीकृष्णकी सखी होकर राजाओंकी इस सभामें कैसे लायी जा सकती थी? ।। १० ।।
तामिमां धर्मराजस्य भार्यां सदृशवर्णजाम् ।
ब्रूत दासीमदासीं वा तत् करिष्यामि कौरवाः ।। ११ ।।
कौरवो! मैं धर्मराज युधिष्ठिरकी धर्मपत्नी तथा उनके समान वर्णकी कन्या हूँ। आपलोग बतावें, मैं दासी हूँ या अदासी? आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूँगी ।। ११ ।।
अयं मां सुदृढं क्षुद्रः कौरवाणां यशोहरः ।
क्लिश्राति नाहं तत् सोढुं चिरं शक्ष्यामि कौरवाः ।। १२ ।।
कुरुवंशी क्षत्रियो! यह कुरुकुलकी कीर्तिमें कलंक लगानेवाला नीच दुःशासन मुझे बहुत कष्ट दे रहा है। मैं इस क्लेशको देरतक नहीं सह सकूँगी ।। १२ ।।
जितां वाप्यजितां वापि मन्यध्वं मां यथा नृपाः ।
तथा प्रत्युक्तमिच्छामि तत् करिष्यामि कौरवाः ।। १३ ।।
कुरुवंशियो! आप क्या मानते हैं? मैं जीती गयी हूँ या नहीं। मैं आपके मुँहसे इसका ठीक-ठीक उत्तर सुनना चाहती हूँ। फिर उसीके अनुसार कार्य करूँगी ।। १३ ।।
भीष्म उवाच
उक्तवानस्मि कल्याणि धर्मस्य परमा गतिः । लोके न शक्यते ज्ञातुमपि विज्ञैर्महात्मभिः ॥ १४ ॥ भीष्मजीने कहा— कल्याणि! मैं पहले ही कह चुका हूँ कि धर्मकी गति बड़ी सूक्ष्म है। लोकमें विज्ञ महात्मा भी उसे ठीक-ठीक नहीं जान सकते ॥ १४ ॥
बलवांश्च यथा धर्मं लोके पश्यति पूरुषः । स धर्मो धर्मवेलायां भवत्यभिहतः परः ॥ १५ ॥ संसारमें बलवान् मनुष्य जिसको धर्म समझता है, धर्मविचारके समय लोग उसीको धर्म मान लेते हैं और बलहीन पुरुष जो धर्म बतलाता है, वह बलवान् पुरुषके बताये धर्मसे दब जाता है (अतः इस समय कर्ण और दुर्योधनका बताया हुआ धर्म ही सर्वोपरि हो रहा है) ॥ १५ ॥
न विवेक्तुं च ते प्रश्नमिमं शक्नोमि निश्चयात् । सूक्ष्मत्वाद गहनत्वाच्च कार्यस्यास्य च गौरवात् ॥ १६ ॥ मैं तो धर्मका स्वरूप सूक्ष्म और गहन होनेके कारण तथा इस धर्मनिर्णयके कार्यके अत्यन्त गुरुतर होनेसे तुम्हारे इस प्रश्नका निश्चितरूपसे यथार्थ विवेचन नहीं कर सकता ॥
नूनमन्तः कुलस्यायं भविता नचिरादिव । तथा हि कुरवः सर्वे लोभमोहपरायणाः ॥ १७ ॥ अवश्य ही बहुत शीघ्र इस कुलका नाश होनेवाला है; क्योंकि समस्त कौरव लोभ और मोहके वशीभूत हो गये हैं ॥ १७ ॥
कुलेषु जाताः कल्याणि व्यसनैराहता भृशम् । धर्म्यान्मार्गान्न च्यवन्ते येषां नस्त्वं वधूः स्थिता ॥ १८ ॥ कल्याणि! तुम जिनकी पत्नी हो, वे पाण्डव हमारे उत्तम कुलमें उत्पन्न हैं और भारी-से-भारी संकटमें पड़कर भी धर्मके मार्गसे विचलित नहीं होते हैं ॥ १८ ॥
उपपन्नं च पाञ्चालि तवेदं वृत्तमीदृशम् । यत् कृच्छ्रमपि सम्प्राप्ता धर्ममेवान्ववेक्षसे ॥ १९ ॥ पांचालराजकुमारी! तुम्हारा यह आचार-व्यवहार तुम्हारे योग्य ही है; क्योंकि भारी संकटमें पड़कर भी तुम धर्मकी ओर ही देख रही हो ॥ १९ ॥
एते द्रोणादयश्चैव वृद्धा धर्मविदो जनाः । शून्यैः शरीरैस्तिष्ठन्ति गतासव इवानताः ॥ २० ॥ युधिष्ठिरस्तु प्रश्नेऽस्मिन् प्रमाणमिति मे मतिः । अजितां वा जितां वेति स्वयं व्याहर्तुमर्हति ॥ २१ ॥ ये द्रोणाचार्य आदि वृद्ध एवं धर्मज्ञ पुरुष भी सिर लटकाये शून्य शरीरसे इस प्रकार बैठे हैं; मानो निष्प्राण हो गये हों। मेरी राय यह है कि इस प्रश्नका निर्णय करनेके लिये धर्मराज
युधिष्ठिर ही सबसे प्रामाणिक व्यक्ति हैं। तुम जीती गयी हो या नहीं? यह बात स्वयं इन्हें बतलानी चाहिये ।। २०-२१ ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि भीष्मवाक्ये एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ।। ६९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें भीष्मवाक्यविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६९ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2172)
सप्ततितमोऽध्यायः
दुर्योधनके छल-कपटयुक्त वचन और भीमसेनका रोषपूर्ण उद्गार
वैशम्पायन उवाच
तथा तु दृष्ट्वा बहु तत्र देवीं
रोरूयमाणां कुररीमिवार्ताम् ।
नोचुर्वचः साध्वथ वाप्यसाधु
महीक्षितो धार्तराष्ट्रस्य भीताः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! महारानी द्रौपदीको वहाँ आर्त होकर कुररीकी भाँति बहुत विलाप करती देखकर भी सभामें बैठे हुए राजालोग दुर्योधनके भयसे भला या बुरा कुछ भी नहीं कह सके ॥ १ ॥
दृष्ट्वा तथा पार्थिवपुत्रपौत्रां-
स्तूष्णींभूतान् धृतराष्ट्रस्य पुत्रः ।
स्मयन्निवेदं वचनं बभाषे
पाञ्चालराजस्य सुतां तदानीम् ॥ २ ॥
राजाओंके बेटों और पोतोंको मौन देखकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने उस समय मुसकराते हुए पांचालराजकुमारी द्रौपदीसे यह बात कही ॥ २ ॥
दुर्योधन उवाच
तिष्ठत्वयं प्रश्न उदारसत्त्वे
भीमेऽर्जुने सहदेवे तथैव ।
पत्यौ च ते नकुले याज्ञसेनि
वदन्त्वेते वचनं त्वत्प्रसूतम् ॥ ३ ॥
दुर्योधन बोला—द्रौपदी! तुम्हारा यह प्रश्न तुम्हारे ही पति महाबली भीम, अर्जुन, सहदेव और नकुलपर छोड़ दिया जाता है। ये ही तुम्हारी पूछी हुई बातका उत्तर दें ॥
अनीश्वरं विब्रुवन्त्वार्यमध्ये
युधिष्ठिरं तव पाञ्चालि हेतोः ।
कुर्वन्तु सर्वे चानृतं धर्मराजं
पाञ्चालि त्वं मोक्ष्यसे दासभावात् ॥ ४ ॥
पांचालि! इन श्रेष्ठ राजाओंके बीच ये लोग यह स्पष्ट कह दें कि युधिष्ठिरको तुम्हें दाँवपर रखनेका कोई अधिकार नहीं था। सभी पाण्डव मिलकर धर्मराज युधिष्ठिरको झूठा
ठहरा दें। फिर पांचालि! तुम दास्यभावसे मुक्त कर दी जाओगी ॥ ४ ॥ धर्मे स्थितो धर्मसुतो महात्मा स्वयं चेदं कथयत्विन्द्रकल्पः । ईशो वा ते ह्यनीशोऽथ वैष वाक्यादस्य क्षिप्रमेकं भजस्व ॥ ५ ॥ ये धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिर इन्द्रके समान तेजस्वी तथा सदा धर्ममें स्थित रहनेवाले हैं। तुमको दाँवपर रखनेका इन्हें अधिकार था या नहीं? ये स्वयं ही कह दें; फिर इन्हींके कथनानुसार तुम शीघ्र दासीपन या अदासीपन किसी एकका आश्रय लो ॥ ५ ॥ सर्वे हीमे कौरवेयाः सभायां दुःखान्तरे वर्तमानास्तवैव । न विब्रुवन्त्यार्यसत्त्वा यथावत् पतींश्च ते समवेक्ष्याल्पभाग्यान् ॥ ६ ॥ द्रौपदी! ये सभी उत्तम स्वभाववाले कुरुवंशी इस सभामें तुम्हारे लिये ही दुःखी हैं और तुम्हारे मन्दभाग्य पतियोंको देखकर तुम्हारे प्रश्नका ठीक-ठीक उत्तर नहीं दे पाते हैं ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः सभ्याः कुरुराजस्य तस्य वाक्यं सर्वे प्रशंसुस्तथोच्चैः । चेलावेधांश्चापि चक्रुर्नदन्तो हाहेत्यासीदपि चैवार्तनादः ॥ ७ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर एक ओर सभी सभासदोंने कुरुराज दुर्योधनके उस कथनकी उच्च स्वरसे भूरि-भूरि प्रशंसा की और गर्जना करते हुए वे वस्त्र हिलाने लगे तथा वहीं दूसरी ओर हाहाकार और आर्तनाद होने लगा ॥ ७ ॥ श्रुत्वा तु वाक्यं सुमनोहरं त- द्धर्षश्चासीत् कौरवाणां सभायाम् । सर्वे चासन् पार्थिवाः प्रीतिमन्तः कुरुश्रेष्ठं धार्मिकं पूजयन्तः ॥ ८ ॥ दुर्योधनका वह मनोहर वचन सुनकर उस समय सभामें कौरवोंको बड़ा हर्ष हुआ। अन्य सब राजा भी बड़े प्रसन्न हुए तथा दुर्योधनको कौरवोंमें श्रेष्ठ और धार्मिक कहते हुए उसका आदर करने लगे ॥ ८ ॥ युधिष्ठिरं च ते सर्वे समुदैक्षन्त पार्थिवाः । किं नु वक्ष्यति धर्मज्ञ इति साचीकृताननाः ॥ ९ ॥
फिर वे सब नरेश मुँह घुमाकर राजा युधिष्ठिरकी ओर इस आशासे देखने लगे कि देखें, ये धर्मज्ञ पाण्डुकुमार क्या कहते हैं? ।। ९ ।। किं नु वक्ष्यति बीभत्सुरजितो युधि पाण्डवः । भीमसेनो यमौ चोभौ भृशं कौतूहलान्विताः ।। १० ।। युद्धमें कभी पराजित न होनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुन किस प्रकार अपना मत व्यक्त करते हैं? भीमसेन, नकुल तथा सहदेव भी क्या कहते हैं? इसके लिये उन राजाओंके मनमें बड़ी उत्कण्ठा थी ।। १० ।। तस्मिन्नुपरते शब्दे भीमसेनोऽब्रवीदिदम् । प्रगृह्य रुचिरं दिव्यं भुजं चन्दनचर्चितम् ।। ११ ।। वह कोलाहल शान्त होनेपर भीमसेन अपनी चन्दनचर्चित सुन्दर दिव्य भुजा उठाकर इस प्रकार बोले ।। ११ ।।
भीमसेन उवाच
यद्येष गुरुरस्माकं धर्मराजो महामनाः । न प्रभुः स्यात् कुलस्यास्य न वयं मर्षयेमहि ।। १२ ।। भीमसेनने कहा— यदि ये महामना धर्मराज युधिष्ठिर हमारे पितृतुल्य तथा इस पाण्डुकुलके स्वामी न होते तो हम कौरवोंका यह अत्याचार कदापि सहन नहीं करते ।। ईशो नः पुण्यतपसां प्राणानामपि चेश्वरः । मन्यतेऽजितमात्मानं यद्येष विजिता वयम् ।। १३ ।। न हि मुच्येत मे जीवन् पदा भूमिमुपस्पृशन् । मर्त्यधर्मा परामृश्य पाञ्चाल्या मूर्धजानिमान् ।। १४ ।। पश्यध्वं ह्यायतौ वृत्तौ भुजौ मे परिघाविव । नैतयोरन्तरं प्राप्य मुच्येतापि शतक्रतुः ।। १५ ।। ये हमारे पुण्य, तप और प्राणोंके भी प्रभु हैं। यदि ये द्रौपदीको दाँवपर लगानेसे पूर्व अपनेको हारा हुआ नहीं मानते हैं तो हम सब लोग इनके द्वारा दाँवपर रखे जानेके कारण हारे जा चुके हैं। यदि मैं हारा गया न होता तो अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श करनेवाला कोई भी मरणधर्मा मनुष्य द्रौपदीके इन केशोंको छू लेनेपर मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकता था। राजाओ! परिघके समान मोटी और गोलाकार मेरी इन विशाल भुजाओंकी ओर तो देखो। इनके बीचमें आकर इन्द्र भी जीवित नहीं बच सकता ।। १३-१५ ।। धर्मपाशसितस्त्वेवं नाधिगच्छामि संकटम् । गौरवेण विरुद्धश्च निग्रहादर्जुनस्य च ।। १६ ।। मैं धर्मके बन्धनमें बँधा हूँ, बड़े भाईके गौरवने मुझे रोक रखा है और अर्जुन भी मना कर रहा है, इसीलिये मैं इस संकटसे पार नहीं हो पाता ।। १६ ।।
धर्मराजनिसृष्टस्तु सिंहः क्षुद्रमृगानिव ।
धार्तराष्ट्रानिमान् पापान् निष्पिषेयं तलासिभिः ॥ १७ ॥
यदि धर्मराज मुझे आज्ञा दे दें तो जैसे सिंह छोटे मृगोंको दबोच लेता है, उसी प्रकार मैं धृतराष्ट्रके इन पापी पुत्रोंको तलवारकी जगह हाथोंके तलवोंसे ही मसल डालूँ ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
तमुवाच तदा भीष्मो द्रोणो विदुर एव च ।
क्षम्यतामिदमित्येवं सर्वं सम्भाव्यते त्वयि ॥ १८ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! तब भीष्म, द्रोण और विदुरने भीमसेनको शान्त करते हुए कहा—'भीम! क्षमा करो, तुम सब कुछ कर सकते हो' ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि भीमवाक्ये सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत द्यूतपर्वमें भीमवाक्यविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥