महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पाण्डवा धृतराष्ट्रेण प्रेषिता वारणावतम् । उत्सवे विहरिष्यन्ति धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥ ६ ॥ 'पिताजीने पाण्डवोंको वारणावत जानेकी आज्ञा दी है। वे उनके आदेशसे (कुछ दिनोंतक) वहाँ रहकर उत्सवमें भाग लेंगे—मेलेमें घूमे-फिरेंगे ॥ ६ ॥
स त्वं रासभयुक्तेन स्यन्दनेनाशुगामिना । वारणावतमद्यैव यथा यासि तथा कुरु ॥ ७ ॥ 'अतः तुम खच्चर जुते हुए शीघ्रगामी रथपर बैठकर आज ही वहाँ पहुँच जाओ, ऐसी चेष्टा करो ॥ ७ ॥
तत्र गत्वा चतुःशालं गृहं परमसंवृतम् । नगरोपान्तमाश्रित्य कारयेथा महाधनम् ॥ ८ ॥ 'वहाँ जाकर नगरके निकट ही एक ऐसा भवन तैयार कराओ जिसमें चारों ओर कमरे हों तथा जो सब ओरसे सुरक्षित हो। वह भवन बहुत धन खर्च करके सुन्दर-से-सुन्दर बनवाना चाहिये ॥ ८ ॥
शणसर्जरसादीनि यानि द्रव्याणि कानिचित् । आग्नेयान्युत सन्तीह तानि तत्र प्रदापय ॥ ९ ॥
‘सन तथा राल आदि, जो कोई भी आग भड़कानेवाले द्रव्य संसारमें हैं, उन सबको उस मकानकी दीवारोंमें लगवाना ॥ ९ ॥ सर्पिस्तैलवसाभिश्च लाक्षया चाप्यनल्पया । मृत्तिकां मिश्रयित्वा त्वं लेपं कुड्येषु दापय ॥ १० ॥ ‘घी, तेल, चर्बी तथा बहुत-सी लाह मिट्टीमें मिलवाकर उसीसे दीवारोंको लिपवाना ॥ १० ॥ शणं तैलं घृतं चैव जतु दारूणि चैव हि । तस्मिन् वेश्मनि सर्वाणि निक्षिपेथाः समन्ततः ॥ ११ ॥ यथा च तन्न पश्येरन् परीक्षन्तोऽपि पाण्डवाः । आग्नेयमिति तत् कार्यमपि चान्येऽपि मानवाः ॥ १२ ॥ वेश्मन्येवं कृते तत्र गत्वा तान् परमार्चितान् । वासयेथाः पाण्डवेयान् कुन्तीं च ससुहृज्जनाम् ॥ १३ ॥ ‘उस घरके चारों ओर सन, तेल, घी, लाह और लकड़ी आदि सब वस्तुएँ संग्रह करके रखना। अच्छी तरह देखभाल करनेपर भी पाण्डवों तथा दूसरे लोगोंको भी इस बातकी शंका न हो कि यह घर आग भड़कानेवाले पदार्थोंसे बना है, इस तरह पूरी सावधानीके साथ उस राजभवनका निर्माण कराना चाहिये। इस प्रकार महल बन जानेपर जब पाण्डव वहाँ जायँ, तब उन्हें तथा सुहृदोंसहित कुन्तीदेवीको भी बड़े आदर-सत्कारके साथ उसीमें रखना ॥ ११—१३ ॥ आसनानि च दिव्यानि यानानि शयनानि च । विधातव्यानि पाण्डूनां यथा तुष्येत वै पिता ॥ १४ ॥ यथा च तन्न जानन्ति नगरे वारणावते । तथा सर्वं विधातव्यं यावत् कालस्य पर्ययः ॥ १५ ॥ ‘वहाँ पाण्डवोंके लिये दिव्य आसन, सवारी और शय्या आदिकी ऐसी (सुन्दर) व्यवस्था कर देना, जिसे सुनकर मेरे पिताजी संतुष्ट हों। जबतक समय बदलनेके साथ ही अपने अभीष्ट कार्यकी सिद्धि न हो जाय, तबतक सब काम इस तरह करना चाहिये कि वारणावत नगरके लोगोंको इसके विषयमें कुछ भी ज्ञात न हो सके ॥ १४-१५ ॥ ज्ञात्वा च तान् सुविश्वस्ताञ्शयानानकुतोभयान् । अग्निस्त्वया ततो देयो द्वारतस्तस्य वेश्मनः ॥ १६ ॥ ‘जब तुम्हें यह भलीभाँति ज्ञात हो जाय कि पाण्डवलोग यहाँ विश्वस्त होकर रहने लगे हैं, इनके मनमें कहींसे कोई खटका नहीं रह गया है, तब उनके सो जानेपर घरके दरवाजेकी ओरसे आग लगा देना ॥ १६ ॥ दह्यमाने स्वके गेहे दग्धा इति ततो जनाः । न गर्हेयुरस्मान् वै पाण्डवार्थाय कर्हिचित् ॥ १७ ॥
'उस समय लोग यही समझेंगे कि अपने ही घरमें आग लगी थी, उसीमें पाण्डव जल गये। अतः वे पाण्डवोंकी मृत्युके लिये कभी हमारी निन्दा नहीं करेंगे' ।। १७ ।। स तथेति प्रतिज्ञाय कौरवाय पुरोचनः । प्रायाद् रासभयुक्तेन स्यन्दनेनाशुगामिना ।। १८ ।। पुरोचनने दुर्योधनके सामने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की एवं खच्चर जुते हुए शीघ्रगामी रथपर आरूढ़ हो वहाँसे वारणावत नगरके लिये प्रस्थान किया ।। १८ ।। स गत्वा त्वरितं राजन् दुर्योधनमते स्थितः । यथोक्तं राजपुत्रेण सर्वं चक्रे पुरोचनः ।। १९ ।। राजन्! पुरोचन दुर्योधनकी रायके अनुसार चलता था। वारणावतमें शीघ्र ही पहुँचकर उसने राजकुमार दुर्योधनके कथनानुसार सब काम पूरा कर लिया ।। १९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि पुरोचनोपदेशे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें पुरोचनके प्रति दुर्योधनकृत उपदेशविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४३ ।।
१४४-
चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंकी वारणावत-यात्रा तथा उनको विदुरका गुप्त-उपदेश
वैशम्पायन उवाच
पाण्डवास्तु रथान् युक्तान् सदश्वैरनिलोपमैः ।
आरोहमाणा भीष्मस्य पादौ जगृहुरातंवत् ॥ १ ॥
राज्ञश्च धृतराष्ट्रस्य द्रोणस्य च महात्मनः ।
अन्येषां चैव वृद्धानां कृपस्य विदुरस्य च ॥ २ ॥
एवं सर्वान् कुरून् वृद्धानभिवाद्य यतव्रताः ।
समालिङ्ग्य समानान् वै बालैश्चाप्यभिवादिताः ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए रथोंपर चढ़नेके लिये उद्यत हो उत्तम व्रतको धारण करनेवाले पाण्डवोंने अत्यन्त दुःखी-से होकर पितामह भीष्मके दोनों चरणोंका स्पर्श किया। तत्पश्चात् राजा धृतराष्ट्र, महात्मा द्रोण, कृपाचार्य, विदुर तथा दूसरे बड़े-बूढ़ोंको प्रणाम किया। इस प्रकार क्रमशः सभी वृद्ध कौरवोंको प्रणाम करके समान अवस्थावाले लोगोंको हृदयसे लगाया। फिर बालकोंने आकर पाण्डवोंको प्रणाम किया ॥ १—३ ॥
सर्वा मातृस्तथाऽऽपृच्छ्य कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् ।
सर्वाः प्रकृतयश्चैव प्रययुर्वारणावतम् ॥ ४ ॥
इसके बाद सब माताओंसे आज्ञा ले उनकी परिक्रमा करके तथा समस्त प्रजाओंसे भी विदा लेकर वे वारणावत नगरकी ओर प्रस्थित हुए ॥ ४ ॥
विदुरश्च महाप्राज्ञस्तथान्ये कुरुपुङ्गवाः ।
पौराश्च पुरुषव्याघ्रानन्वीयुः शोककर्शिताः ॥ ५ ॥
तत्र केचिद् ब्रुवन्ति स्म ब्राह्मणा निर्भयास्तदा ।
दीनान् दृष्ट्वा पाण्डुसुतानतीव भृशदुःखिताः ॥ ६ ॥
उस समय महाज्ञानी विदुर तथा कुरुकुलके अन्य श्रेष्ठ पुरुष एवं पुरवासी मनुष्य शोकसे कातर हो नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके पीछे-पीछे चलने लगे। तब कुछ निर्भय ब्राह्मण पाण्डवोंको अत्यन्त दीन-दशामें देखकर बहुत दुःखी हो इस प्रकार कहने लगे— ॥ ५-६ ॥
विषमं पश्यते राजा सर्वथा स सुमन्दधीः ।
कौरव्यो धृतराष्ट्रस्तु न च धर्मं प्रपश्यति ॥ ७ ॥
'अत्यन्त मन्दबुद्धि कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र पाण्डवोंको सर्वथा विषम दृष्टिसे देखते हैं। धर्मकी ओर उनकी दृष्टि नहीं है ॥ ७ ॥ न हि पापमपापात्मा रोचयिष्यति पाण्डवः । भीमो वा बलिनां श्रेष्ठः कौन्तेयो वा धनंजयः ॥ ८ ॥ 'निष्पाप अन्तःकरणवाले पाण्डुकुमार युधिष्ठिर, बलवानोंमें श्रेष्ठ भीमसेन अथवा कुन्तीनन्दन अर्जुन कभी पापसे प्रीति नहीं करेंगे ॥ ८ ॥ कुत एव महात्मानौ माद्रीपुत्रौ करिष्यतः । तान् राज्यं पितृतः प्राप्तान् धृतराष्ट्रो न मृष्यते ॥ ९ ॥ 'फिर महात्मा दोनों माद्रीकुमार कैसे पाप कर सकेंगे। पाण्डवोंको अपने पितासे जो राज्य प्राप्त हुआ था, धृतराष्ट्र उसे सहन नहीं कर रहे हैं ॥ ९ ॥ अधर्म्यमिदमत्यन्तं कथं भीष्मोऽनुमन्यते । विवास्यमानानस्थाने नगरे योऽभिमन्यते ॥ १० ॥ 'इस अत्यन्त अधर्मयुक्त कार्यके लिये भीष्मजी कैसे अनुमति दे रहे हैं? पाण्डवोंको अनुचितरूपसे यहाँसे निकालकर जो रहनेयोग्य स्थान नहीं, उस वारणावत नगरमें भेजा जा रहा है! फिर भी भीष्मजी चुपचाप क्यों इसे मान लेते हैं? ॥ १० ॥ पितेव हि नृपोऽस्माकमभूच्छांतनवः पुरा । विचित्रवीर्यो राजर्षिः पाण्डुश्च कुरुनन्दनः ॥ ११ ॥ 'पहले शांतनुकुमार राजर्षि विचित्रवीर्य तथा कुरुकुलको आनन्द देनेवाले महाराज पाण्डु हमारे राजा थे। केवल राजा ही नहीं, वे पिताके समान हमारा पालन-पोषण करते थे ॥ ११ ॥ स तस्मिन् पुरुषव्याघ्रे देवभावं गते सति । राजपुत्रानिमान् बालान् धृतराष्ट्रो न मृष्यते ॥ १२ ॥ 'नरश्रेष्ठ पाण्डु जब देवभाव (स्वर्ग)-को प्राप्त हो गये हैं, तब उनके इन छोटे-छोटे राजकुमारोंका भार धृतराष्ट्र नहीं सहन कर पा रहे हैं ॥ १२ ॥ वयमेतदनिच्छन्तः सर्व एव पुरोत्तमात् । गृहान् विहाय गच्छामो यत्र गन्ता युधिष्ठिरः ॥ १३ ॥ 'हमलोग यह नहीं चाहते, इसलिये हम सब घर-द्वार छोड़कर इस उत्तम नगरीसे वहीं चलेंगे, जहाँ युधिष्ठिर जा रहे हैं' ॥ १३ ॥ तांस्तथावादिनः पौरान् दुःखितान् दुःखकर्शितः । उवाच मनसा ध्यात्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १४ ॥ शोकसे दुर्बल धर्मराज युधिष्ठिर अपने लिये दुःखी उन पुरवासियोंको ऐसी बातें करते देख मन-ही-मन कुछ सोचकर उनसे बोले— ॥ १४ ॥ पिता मान्यो गुरुः श्रेष्ठो यदाह पृथिवीपतिः ।
अशङ्कमानैस्तत् कार्यमस्माभिरिति नो व्रतम् ॥ १५ ॥
‘बन्धुओ! राजा धृतराष्ट्र मेरे माननीय पिता, गुरु एवं श्रेष्ठ पुरुष हैं। वे जो आज्ञा दें, उसका हमें निःशंक होकर पालन करना चाहिये; यही हमारा व्रत है ॥ १५ ॥
भवन्तः सुहृदोऽस्माकमस्मान् कृत्या प्रदक्षिणम् ।
प्रतिनन्द्य तथाशीर्भिर्निवर्तध्वं यथा गृहम् ॥ १६ ॥
यदा तु कार्यमस्माकं भवद्भिरुपपत्स्यते ।
तदा करिष्यथास्माकं प्रियाणि च हितानि च ॥ १७ ॥
‘आपलोग हमारे हितचिन्तक हैं, अतः हमें अपने आशीर्वादसे संतुष्ट करें और हमें दाहिने करते हुए जैसे आये थे, वैसे ही अपने घरको लौट जायँ। जब आपलोगोंके द्वारा हमारा कोई कार्य सिद्ध होनेवाला होगा, उस समय आप हमारे प्रिय और हितकारी कार्य कीजियेगा’ ॥
एवमुक्तास्तदा पौराः कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
आशीर्भिश्वाभिनन्द्यैताञ्जग्मुर्नगरमेव हि ॥ १८ ॥
उनके यों कहनेपर पुरवासी उन्हें आशीर्वादसे प्रसन्न करते हुए दाहिने करके नगरको ही लौट गये ॥ १८ ॥
पौरेषु विनिवृत्तेषु विदुरः सत्यधर्मवित् ।
बोधयन् पाण्डवश्रेष्ठमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १९ ॥
पुरवासियोंके लौट जानेपर सत्यधर्मके ज्ञाता विदुरजी पाण्डवश्रेष्ठ युधिष्ठिरको दुर्योधनके कपटका बोध कराते हुए इस प्रकार बोले ॥ १९ ॥
प्राज्ञः प्राज्ञप्रलापज्ञः प्रलापज्ञमिदं वचः ।
प्राज्ञं प्राज्ञः प्रलापज्ञः प्रलापज्ञं वचोऽब्रवीत् ॥ २० ॥
विदुरजी बुद्धिमान् तथा मूढ़ म्लेच्छोंकी निरर्थक-सी प्रतीत होनेवाली भाषाके भी ज्ञाता थे। इसी प्रकार युधिष्ठिर भी उस म्लेच्छभाषाको समझ लेनेवाले तथा बुद्धिमान् थे। अतः उन्होंने युधिष्ठिरसे ऐसी कहनेयोग्य बात कही, जो म्लेच्छभाषाके जानकार एवं बुद्धिमान् पुरुषको उस भाषामें कहे हुए रहस्यका ज्ञान करा देनेवाली थी, किंतु जो उस भाषाके अनभिज्ञ पुरुषको वास्तविक अर्थका बोध नहीं कराती थी ॥ २० ॥
यो जानाति परप्रज्ञां नीतिशास्त्रानुसारिणीम् ।
विज्ञायेह तथा कुर्यादापदं निस्तरेद् यथा ॥ २१ ॥
‘जो शत्रु की नीति-शास्त्रका अनुसरण करनेवाली बुद्धिको समझ लेता है, वह उसे समझ लेनेपर कोई ऐसा उपाय करे, जिससे वह यहाँ शत्रुजनित संकटसे बच सके ॥
अलोहं निशितं शस्त्रं शरीरपरिकर्तनम् ।
यो वेत्ति न तु तं घ्नन्ति प्रतिघातविदं द्विषः ॥ २२ ॥
'एक ऐसा तीखा शस्त्र है, जो लोहेका बना तो नहीं है, परंतु शरीरको नष्ट कर देता है। जो उसे जानता है, ऐसे उस शस्त्रके आघातसे बचनेका उपाय जाननेवाले पुरुषको शत्रु नहीं मार सकते³। ।। २२ ।। कक्षघ्नः शिशिरघ्नश्च महाकक्षे बिलौकसः । न दहेदिति चात्मानं यो रक्षति स जीवति ।। २३ ।। 'घास-फूस तथा सूखे वृक्षोंवाले जंगलको जलाने और सर्दीको नष्ट कर देनेवाली आग विशाल वनमें फैल जानेपर भी बिलमें रहनेवाले चूहे आदि जन्तुओंको नहीं जला सकती—यों समझकर जो अपनी रक्षाका उपाय करता है, वही जीवित रहता है³। ।। २३ ।। नाचक्षुर्वेत्ति पन्थानं नाचक्षुर्विन्दते दिशः । नाधृतिर्बुद्धिमाप्नोति बुध्यस्वैवं प्रबोधितः ।। २४ ।। 'जिसके आँखें नहीं हैं, वह मार्ग नहीं जान पाता; अंधेको दिशाओंका ज्ञान नहीं होता और जो धैर्य खो देता है, उसे सद्बुद्धि नहीं प्राप्त होती। इस प्रकार मेरे समझानेपर तुम मेरी बातको भलीभाँति समझ लो³। ।। २४ ।। अनाप्तैर्दत्तमदत्ते नरः शस्त्रमलोहजम् । श्वाविच्छरणमासाद्य प्रमुच्येत हुताशनात् ।। २५ ।। 'शत्रुओंके दिये हुए बिना लोहेके बने शस्त्रको जो मनुष्य ग्रहण कर लेता है, वह साहीके बिलमें घुसकर आगसे बच जाता है४। ।। २५ ।। चरन् मार्गान् विजानाति नक्षत्रैर्विन्दते दिशः । आत्मना चात्मनः पञ्च पीडयन् नानुपीड़यते ।। २६ ।। 'मनुष्य घूम-फिरकर रास्तेका पता लगा लेता है, नक्षत्रोंसे दिशाओंको समझ लेता है तथा जो अपनी पाँचों इन्द्रियोंका स्वयं ही दमन करता है, वह शत्रुओंसे पीड़ित नहीं होता'५ ।। २६ ।। एवमुक्तः प्रत्युवाच धर्मराजो युधिष्ठिरः । विदुरं विदुषां श्रेष्ठं ज्ञातमित्येव पाण्डवः ।। २७ ।। इस प्रकार कहे जानेपर पाण्डुनन्दन धर्मराज युधिष्ठिरने विद्वानोंमें श्रेष्ठ विदुरजीसे कहा—'मैंने आपकी बात अच्छी तरह समझ ली' ।। २७ ।। अनुशिक्ष्यानुगम्यैतान् कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् । पाण्डवानभ्यनुज्ञाय विदुरः प्रययौ गृहान् ।। २८ ।। इस तरह पाण्डवोंको बारंबार कर्तव्यकी शिक्षा देते हुए कुछ दूरतक उनके पीछे-पीछे जाकर विदुरजी उनको जानेकी आज्ञा दे उन्हें अपने दाहिने करके पुनः अपने घरको लौट गये ।। २८ ।। निवृत्ते विदुरे चापि भीष्मे पौरजने तथा ।
अजातशत्रुमासाद्य कुन्ती वचनमब्रवीत् ॥ २९ ॥
विदुर, भीष्मजी तथा नगरनिवासियोंके लौट जानेपर कुन्ती अजातशत्रु युधिष्ठिरके पास जाकर बोली— ॥ २९ ॥
क्षत्ता यदब्रवीद् वाक्यं जनमध्येऽब्रुवन्निव ।
त्वया च स तथेत्युक्तो जानीमो न च तद् वयम् ॥ ३० ॥
‘बेटा! विदुरजीने सब लोगोंके बीचमें जो अस्पष्ट-सी बात कही थी, उसे सुनकर तुमने ‘बहुत अच्छा’ कहकर स्वीकार किया था; परंतु हमलोग वह बात अबतक नहीं समझ पा रहे हैं’ ॥ ३० ॥
यदीदं शक्यमस्माभिर्ज्ञातुं न च सदोषवत् ।
श्रोतुमिच्छामि तत् सर्वं संवादं तव तस्य च ॥ ३१ ॥
‘यदि उसे हम भी समझ सकें और हमारे जाननेसे कोई दोष न आता हो तो तुम्हारी और उनकी सारी बातचीतका रहस्य मैं सुनना चाहती हूँ’ ॥ ३१ ॥
युधिष्ठिर उवाच
गृहादग्निश्च बोद्धव्य इति मां विदुरोऽब्रवीत् ।
पन्थाश्च वो नाविदितः कश्चित् स्यादिति धर्मधीः ॥ ३२ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**माँ! जिनकी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहती है, उन विदुरजीने (सांकेतिक भाषामें) मुझसे कहा था, ‘तुम जिस घरमें ठहरोगे, वहाँसे आगका भय है, यह बात अच्छी तरह जान लेनी चाहिये। साथ ही वहाँका कोई भी मार्ग ऐसा न हो, जो तुमसे अपरिचित रहे ॥ ३२ ॥
जितेन्द्रियश्च वसुधां प्राप्स्यतीति च मेऽब्रवीत् ।
विज्ञातमिति तत् सर्वं प्रत्युक्तो विदुरो मया ॥ ३३ ॥
‘यदि तुम अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखोगे तो सारी पृथ्वीका राज्य प्राप्त कर लोगे, यह बात भी उन्होंने मुझसे बतायी थी और इन्हीं बातोंके लिये मैंने विदुरजीको उत्तर दिया था कि ‘मैं सब समझ गया’ ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
अष्टमेऽहनि रोहिण्यां प्रयाताः फाल्गुनस्य ते ।
वारणावतमासाद्य ददृशुर्नगरं जनम् ॥ ३४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! पाण्डवोंने फाल्गुन शुक्ला अष्टमीके दिन रोहिणी नक्षत्रमें यात्रा की थी। वे यथासमय वारणावत पहुँचकर वहाँके नागरिकोंसे मिले ॥ ३४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि वारणावतगमने चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें पाण्डवोंकी वारणावतयात्राविषयक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४४ ॥
१. यहाँ संकेतसे यह बात बतायी गयी है कि शत्रुओंने तुम्हारे लिये एक ऐसा भवन तैयार करवाया है, जो आगको भड़कानेवाले पदार्थोंसे बना है। शस्त्रका शुद्धरूप सस्त्र है, जिसका अर्थ घर होता है।
२. तात्पर्य यह है, वहाँ जो तुम्हारा पार्श्ववर्ती होगा, वह पुरोचन ही तुम्हें आगमें जलाकर नष्ट करना चाहता है। तुम उस आगसे बचनेके लिये एक सुरंग तैयार करा लेना। कक्षघ्नका शुद्ध रूप कुक्षिघ्न है, जिसका अर्थ है कुक्षिचर या पार्श्ववर्ती।
३. अर्थात् दिशा आदिका ठीक ज्ञान पहलेसे ही कर लेना, जिससे रातमें भटकना न पड़े।
४. तात्पर्य यह कि उस सुरंगसे यदि तुम बाहर निकल जाओगे तो लाक्षागृहमें लगी हुई आगसे बच सकोगे।
५. अर्थात् यदि तुम पाँचों भाई एकमत रहोगे तो शत्रु तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा।
१४५-
पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
वारणावतमें पाण्डवोंका स्वागत, पुरोचनका सत्कारपूर्वक उन्हें ठहराना, लाक्षागृहमें निवासकी व्यवस्था और युधिष्ठिर एवं भीमसेनकी बातचीत
वैशम्पायन उवाच
ततः सर्वाः प्रकृतयो नगराद् वारणावतात् ।
सर्वमङ्गलसंयुक्ता यथाशास्त्रमतन्द्रिताः ॥ १ ॥
श्रुत्वाऽऽगतान् पाण्डुपुत्रान् नानायानैः सहस्रशः ।
अभिजग्मुर्नरश्रेष्ठान् क्षुत्त्वैव परया मुदा ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नरश्रेष्ठ पाण्डवोंके शुभागमनका समाचार सुनकर वारणावत नगरसे वहाँके समस्त प्रजाजन अत्यन्त प्रसन्न हो आलस्य छोड़कर शास्त्रविधिके अनुसार सब तरहकी मांगलिक वस्तुओंकी भेंट लेकर हजारोंकी संख्यामें नाना प्रकारकी सवारियोंके द्वारा उनकी अगवानीके लिये आये ॥ १-२ ॥
ते समासाद्य कौन्तेयान् वारणावतका जनाः ।
कृत्वा जयाशिषः सर्वे परिवार्यावतस्थिरे ॥ ३ ॥
कुन्तीकुमारोंके निकट पहुँचकर वारणावतके सब लोग उनकी जय-जयकार करते और आशीर्वाद देते हुए उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ३ ॥
तैर्वृतः पुरुषव्याघ्रो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
विबभौ देवसंकाशो वज्रपाणिरिवामरैः ॥ ४ ॥
उनसे घिरे हुए पुरुषसिंह धर्मराज युधिष्ठिर, जो देवताओंके समान तेजस्वी थे, इस प्रकार शोभा पा रहे थे मानो देवमण्डलीके बीच साक्षात् वज्रपाणि इन्द्र हों ॥ ४ ॥
सत्कृताश्चैव पौरैस्ते पौरान् सत्कृत्य चानघ ।
अलंकृतं जनाकीर्णं विविशुर्वारणावतम् ॥ ५ ॥
निष्पाप जनमेजय! पुरवासियोंने पाण्डवोंका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। फिर पाण्डवोंने भी नागरिकोंको आदरपूर्वक अपनाकर जनसमुदायसे भरे हुए सजे-सजाये वारणावत नगरमें प्रवेश किया ॥ ५ ॥
ते प्रविश्य पुरीं वीरास्तूर्णं जग्मुरथो गृहान् ।
ब्राह्मणानां महीपाल रतानां स्वेषु कर्मसु ॥ ६ ॥
राजन्! नगरमें प्रवेश करके वीर पाण्डव सबसे पहले शीघ्रतापूर्वक स्वधर्मपरायण ब्राह्मणोंके घरोंमें गये ॥ ६ ॥
नगराधिकृतानां च गृहाणि रथिनां तदा । उपत्तस्थुर्नरश्रेष्ठा वैश्यशूद्रगृहाण्यपि ॥ ७ ॥ तत्पश्चात् वे नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार नगरके अधिकारी क्षत्रियोंके यहाँ गये। इसी प्रकार वे क्रमशः वैश्यों और शूद्रोंके घरोंपर भी उपस्थित हुए ॥ ७ ॥ अर्चिताश्च नरैः पौरैः पाण्डवा भरतर्षभ । जग्मुरावसथं पश्चात् पुरोचनपुरस्सराः ॥ ८ ॥ भरतश्रेष्ठ! नगरनिवासी मनुष्योंद्वारा पूजित एवं सम्मानित हो पाण्डवलोग पुरोचनको आगे करके डेरेपर गये ॥ ८ ॥ तेभ्यो भक्ष्याणि पानानि शयनानि शुभानि च । आसनानि च मुख्यानि प्रददौ स पुरोचनः ॥ ९ ॥ वहाँ पुरोचनने उनके लिये खाने-पीनेकी उत्तम वस्तुएँ, सुन्दर शय्याएँ और श्रेष्ठ आसन प्रस्तुत किये ॥ ९ ॥
तत्र ते सत्कृतास्तेन सुमहार्हपरिच्छदाः । उपास्यमानाः पुरुषैरूपैः पुरनिवासिभिः ॥ १० ॥ उस भवनमें पुरोचनद्वारा उनका बड़ा सत्कार हुआ। वे अत्यन्त बहुमूल्य सामग्रियोंका उपयोग करते थे और बहुत-से नगरनिवासी श्रेष्ठ पुरुष उनकी सेवामें उपस्थित रहते थे। इस
प्रकार वे (बड़े आनन्दसे) वहाँ रहने लगे ॥ १० ॥
दशरात्रोषितानां तु तत्र तेषां पुरोचनः ।
निवेदयामास गृहं शिवाख्यमशिवं तदा ॥ ११ ॥
दस दिनोंतक वहाँ रह लेनेके पश्चात् पुरोचनने पाण्डवोंसे उस नूतन गृहके सम्बन्धमें चर्चा की, जो कहनेको तो 'शिवभवन' था, परंतु वास्तवमें अशिव (अमंगलकारी) था ॥ ११ ॥
तत्र ते पुरुषव्याघ्रा विविशुः सपरिच्छदाः ।
पुरोचनस्य वचनात् कैलासमिव गुह्यकाः ॥ १२ ॥
पुरोचनके कहनेसे वे पुरुषसिंह पाण्डव अपनी सब सामग्रियों और सेवकोंके साथ उस नये भवनमें गये; मानो गुह्यकगण कैलास पर्वतपर जा रहे हों ॥ १२ ॥
तच्चागारमभिप्रेक्ष्य सर्वधर्मभृतां वरः ।
उवाचाग्नेयमित्येवं भीमसेनं युधिष्ठिरः ॥ १३ ॥
उस घरको अच्छी तरह देखकर समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने भीमसेनसे कहा—'भाई! यह भवन तो आग भड़कानेवाली वस्तुओंसे बना जान पड़ता है ॥ १३ ॥
जिघ्राणोऽस्य वसागन्धं सर्पिर्जतुविमिश्रितम् ।
कृतं हि व्यक्तमाग्नेयमिदं वेश्म परंतप ॥ १४ ॥
'शत्रुओंको संताप देनेवाले भीमसेन! मुझे इस घरकी दीवारोंसे घी और लाह मिली हुई चर्बीकी गन्ध आ रही है। अतः स्पष्ट जान पड़ता है कि इस घरका निर्माण अग्निदीपक पदार्थोंसे ही हुआ है ॥ १४ ॥
शणसर्जस्रसंव्यक्तमानीय गृहकर्मणि ।
मुञ्जबल्वजवंशादि द्रव्यं सर्वं घृतोक्षितम् ॥ १५ ॥
शिल्पिभिः सुकृतं ह्याप्तैर्विनीतैर्वेश्मकर्मणि ।
विश्वस्तं मामयं पापो दग्धुकामः पुरोचनः ॥ १६ ॥
तथा हि वर्तते मन्दः सुयोधनवशे स्थितः ।
इमां तु तां महाबुद्धिर्विदुरो दृष्टवांस्तथा ॥ १७ ॥
आपदं तेन मां पार्थ स सम्बोधितवान् पुरा ।
ते वयं बोधितास्तेन नित्यमस्मद्धितैषिणा ॥ १८ ॥
पित्रा कनीयसा स्नेहाद् बुद्धिमन्तोऽशिवं गृहम् ।
अनार्यैः सुकृतं गूढैर्दुर्योधनवशानुगैः ॥ १९ ॥
'गृहनिर्माणके कर्ममें सुशिक्षित एवं विश्वसनीय कारीगरोंने अवश्य ही घर बनाते समय सन, राल, मूँज, बल्वज (मोटे तिनकोंवाली घास) और बाँस आदि सब द्रव्योंको घीसे सींचकर बड़ी खूबीके साथ इन सबके द्वारा इस सुन्दर भवनकी रचना की है। यह मन्दबुद्धि पापी पुरोचन दुर्योधनकी आज्ञाके अधीन हो सदा इस घातमें लगा रहता है कि जब हमलोग
विश्वस्त होकर सोये हों, तब वह आग लगाकर (घरके साथ ही) हमें जला दे। यही उसकी इच्छा है। भीमसेन! परम बुद्धिमान् विदुरजीने हमारे ऊपर आनेवाली इस विपत्तिको यथार्थरूपमें समझ लिया था; इसीलिये उन्होंने पहले ही मुझे सचेत कर दिया। विदुरजी हमारे छोटे पिता और सदा हमलोगोंका हित चाहनेवाले हैं। अतः उन्होंने स्नेहवश हम बुद्धिमानोंको इस अशिव (अमंगलकारी) गृहके सम्बन्धमें, जिसे दुर्योधनके वशवर्ती दुष्ट कारीगरोंने छिपकर कौशलसे बनाया है, पहले ही सब कुछ समझा दिया' ।। १५—१९ ।।
भीमसेन उवाच
यदीदं गृहमाग्नेयं विहितं मन्यते भवान् ।
तथैव साधु गच्छामो यत्र पूर्वोषिता वयम् ॥ २० ॥
**भीमसेन बोले—**भैया! यदि आप यह मानते हों कि इस घरका निर्माण अग्निको उद्दीप्त करनेवाली वस्तुओंसे हुआ है तो हमलोग जहाँ पहले रहते थे, कुशलपूर्वक पुनः उसी घरमें क्यों न लौट चलें? ।। २० ।।
युधिष्ठिर उवाच
इह यत्नैर्निराकारैर्वस्तव्यमिति रोचये ।
अप्रमत्तैर्विचिन्वद्भिर्गतिमिष्टां ध्रुवामितः ॥ २१ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भाई! हमलोगोंको यहाँ अपनी बाह्य चेष्टाओंसे मनकी बात प्रकट न करते हुए और यहाँसे भाग छूटनेके लिये मनोऽनुकूल निश्चित मार्गका पता लगाते हुए पूरी सावधानीके साथ यहीं रहना चाहिये। मुझे ऐसा करना ही अच्छा लगता है ।। २१ ।।
यदि विन्देत चाकारमस्माकं स पुरोचनः ।
क्षिप्रकारी ततो भूत्वा प्रदह्यादपि हेतुतः ॥ २२ ॥
यदि पुरोचन हमारी किसी भी चेष्टासे हमारे भीतरी मनोभावको ताड़ लेगा तो वह शीघ्रतापूर्वक अपना काम बनानेके लिये उद्यत हो हमें किसी-न-किसी हेतुसे जला भी सकता है ।। २२ ।।
नायं बिभेत्युपक्रोशादधर्माद् वा पुरोचनः ।
तथा हि वर्तते मन्दः सुयोधनवशे स्थितः ॥ २३ ॥
यह मूढ़ पुरोचन निन्दा अथवा अधर्मसे नहीं डरता एवं दुर्योधनके वशमें होकर उसकी आज्ञाके अनुसार आचरण करता है ।। २३ ।।
अपि चेह प्रदग्धेषु भीष्मोऽस्मासु पितामहः ।
कोपं कुर्यात् किमर्थं वा कौरवान् कोपयीत सः ॥ २४ ॥
यदि यहाँ हमारे जल जानेपर पितामह भीष्म कौरवोंपर क्रोध भी करें तो वह अनावश्यक है; क्योंकि फिर किस प्रयोजनकी सिद्धिके लिये वे कौरवोंको कुपित करेंगे ।। २४ ।।
अथवापीह दग्धेषु भीष्मोऽस्माकं पितामहः । धर्म इत्येव कुप्येयुन् ये चान्ये कुरुपुङ्गवाः ॥ २५ ॥ अथवा सम्भव है कि यहाँ हमलोगोंके जल जानेपर हमारे पितामह भीष्म तथा कुरुकुलके दूसरे श्रेष्ठ पुरुष धर्म समझकर ही उन आततायियोंपर क्रोध करें (परंतु वह क्रोध हमारे किस कामका होगा?) ॥ २५ ॥ वयं तु यदि दाहस्य बिभ्यतः प्रद्रवेमहि । स्पशैर्निघातयेत् सर्वान् राज्यलुब्धः सुयोधनः ॥ २६ ॥ यदि हम जलनेके भयसे डरकर भाग चलें तो भी राज्यलोभी दुर्योधन हम सबको अपने गुप्तचरोंद्वारा मरवा सकता है ॥ २६ ॥ अपदस्थान् पदे तिष्ठन्नपक्षान् पक्षसंस्थितः । हीनकोशान् महाकोशः प्रयोगैर्घातयेद् ध्रुवम् ॥ २७ ॥ इस समय वह अधिकारपूर्ण पदपर प्रतिष्ठित है और हम उससे वंचित हैं। वह सहायकोंके साथ है और हम असहाय हैं। उसके पास बहुत बड़ा खजाना है और हमारे पास उसका सर्वथा अभाव है। अतः निश्चय ही वह अनेक प्रकारके उपायोंद्वारा हमारी हत्या कर सकता है ॥ २७ ॥ तदस्माभिरिमं पापं तं च पापं सुयोधनम् । वञ्चयद्भिर्निवस्तव्यं छन्नावासं क्वचित् क्वचित् ॥ २८ ॥ इसलिये इस पापात्मा पुरोचन तथा पापी दुर्योधनको भी धोखेमें रखते हुए हमें यहीं कहीं किसी गुप्त स्थानमें निवास करना चाहिये ॥ २८ ॥ ते वयं मृगयाशीलाश्चराम वसुधामिमाम् । तथा नो विदिता मार्गा भविष्यन्ति पलायताम् ॥ २९ ॥ हम सब मृगयामें रत रहकर यहाँकी भूमिपर सब ओर विचरें, इससे भाग निकलनेके लिये हमें बहुत-से मार्ग ज्ञात हो जायँगे ॥ २९ ॥ भौमं च बिलमद्यैव करवाम सुसंवृतम् । गूढश्वासान्न नस्तत्र हुताशः सम्प्रधक्ष्यति ॥ ३० ॥ इसके सिवा आजसे ही हम जमीनमें एक सुरंग तैयार करें, जो ऊपरसे अच्छी तरह ढकी हो। वहाँ हमारी साँसतक छिपी रहेगी (फिर हमारे कार्योंकी तो बात ही क्या है)। उस सुरंगमें घुस जानेपर आग हमें नहीं जला सकेगी ॥ ३० ॥ वसतोऽत्र यथा चास्मान्न बुध्येत पुरोचनः । पौरो वापि जनः कश्चित् तथा कार्यमतन्द्रितैः ॥ ३१ ॥ हमें आलस्य छोड़कर इस प्रकार कार्य करना चाहिये, जिससे यहाँ रहते हुए भी हमारे सम्बन्धमें पुरोचनको कुछ भी ज्ञात न हो सके और किसी पुरवासीको भी हमारी कानोंकान खबर न हो ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि भीमसेनयुधिष्ठिरसंवादे
पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें भीमसेन-युधिष्ठिर-संवादविषयक एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४५ ॥
१४६-
षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
विदुरके भेजे हुए खनकद्वारा लाक्षागृहमें सुरंगका निर्माण
वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य सुहृत् कश्चित् खनकः कुशलो नरः ।
विविक्ते पाण्डवान् राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! एक सुरंग खोदनेवाला मनुष्य विदुरजीका हितैषी एवं विश्वास-पात्र था। वह अपने काममें बड़ा चतुर था। एक दिन वह एकान्तमें पाण्डवोंसे मिला और इस प्रकार कहने लगा— ॥ १ ॥
प्रहितो विदुरेणास्मि खनकः कुशलो ह्यहम् ।
पाण्डवानां प्रियं कार्यमिति किं करवाणि वः ॥ २ ॥
प्रच्छन्नं विदुरेणोक्तः श्रेयस्त्वमिति पाण्डवान् ।
प्रतिपादय विश्वासादिति किं करवाणि वः ॥ ३ ॥
'मुझे विदुरजीने भेजा है। मैं सुरंग खोदनेके काममें बड़ा निपुण हूँ। मुझे आप पाण्डवोंका प्रिय कार्य करना है, अतः आपलोग बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? विदुरने गुप्तरूपसे मुझसे यह कहा है कि तुम वारणावतमें जाकर विश्वासपूर्वक पाण्डवोंका हित सम्पादन करो। अतः आप आज्ञा कीजिये कि मैं क्या करूँ? ।। २-३ ।।
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां रात्रावस्यां पुरोचनः ।
भवनस्य तव द्वारि प्रदास्यति हुताशनम् ॥ ४ ॥
‘इसी कृष्णपक्षकी चतुर्दशीकी रातको पुरोचन आपके घरके दरवाजेपर आग लगा देगा ॥ ४ ॥
मात्रा सह प्रदग्धव्याः पाण्डवाः पुरुषर्षभाः ।
इति व्यवसितं तस्य धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥ ५ ॥
‘दुर्बुद्धि दुर्योधनकी यह चेष्टा है कि नरश्रेष्ठ पाण्डव अपनी माताके साथ जला दिये जायँ ॥ ५ ॥
किंचिच्च विदुरेणोक्तो म्लेच्छवाचासि पाण्डव ।
त्वया च तत् तथेत्युक्तमेतद् विश्वासकारणम् ॥ ६ ॥
‘पाण्डुनन्दन! विदुरजीने म्लेच्छभाषामें आपको कुछ संकेत किया था और आपने ‘तथास्तु’ कहकर उसे स्वीकार किया था। यह बात मैं विश्वास दिलानेके लिये कहता हूँ' ॥ ६ ॥
उवाच तं सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
अभिजानामि सौम्य त्वां सुहृदं विदुरस्य वै ॥ ७ ॥
शुचिमाप्तं प्रियं चैव सदा च दृढभक्तिकम् ।
न विद्यते कवेः किंचिदविज्ञातं प्रयोजनम् ॥ ८ ॥ तब सत्यवादी कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने उससे कहा—'सौम्य! मैं तुम्हें पहचानता हूँ। तुम विदुरजीके हितैषी, ईमानदार, विश्वसनीय, प्रिय तथा उनके प्रति सदा अविचल भक्ति रखनेवाले हो। हमारा कोई भी ऐसा प्रयोजन नहीं है, जो परम ज्ञानी विदुरजीको ज्ञात न हो ॥ ७-८ ॥
यथा तस्य तथा नस्त्वं निर्विशेषा वयं त्वयि । भवतश्च यथा तस्य पालयास्मान् यथा कविः ॥ ९ ॥ 'तुम विदुरजीके लिये जैसे आदरणीय और विश्वसनीय हो, वैसे ही हमारे लिये भी हो। तुमसे हमारा कोई अन्तर नहीं है। हमलोग जिस प्रकार विदुरजीके पालनीय हैं, वैसे ही तुम्हारे भी हैं। जैसे वे हमारी रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम भी करो ॥ ९ ॥
इदं शरणमाग्नेयं मदर्थमिति मे मतिः । पुरोचनेन विहितं धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ॥ १० ॥ 'यह घर आग भड़कानेवाले पदार्थोंसे बना है। हमारा विश्वास है कि दुर्योधनके आदेशसे पुरोचनने हमारे लिये ही इसे बनवाया है ॥ १० ॥
स पापः कोषवांश्चैव ससहायश्च दुर्मतिः । अस्मानपि च पापात्मा नित्यकालं प्रबाधते ॥ ११ ॥ 'पापी दुर्योधनके पास खजाना है और उसके बहुत-से सहायक भी हैं; इसीलिये वह दुर्बुद्धि पापात्मा सदा हमें सताया करता है ॥ ११ ॥
स भवान् मोक्षयत्वस्मान् यत्नेनास्माद् हुताशनात् । अस्मास्विह हि दग्धेषु सकामः स्यात् सुयोधनः ॥ १२ ॥ 'तुम यत्न करके हमलोगोंको इस आगसे बचा लो; अन्यथा हमलोगोंके यहाँ दग्ध हो जानेपर दुर्योधनका मनोरथ सफल हो जायगा ॥ १२ ॥
समृद्धमायुधागारमिदं तस्य दुरात्मनः । वप्रान्तं निष्प्रतीकारमाश्रित्येदं कृतं महत् ॥ १३ ॥ इदं तदशुभं नूनं तस्य कर्म चिकीर्षितम् । प्रागेव विदुरो वेद तेनास्मानन्वबोधयत् ॥ १४ ॥ 'यह उस दुरात्माका अस्त्र-शस्त्रोंसे भरा हुआ आयुधागार है। इसीके सहारे इस महान् गृहका निर्माण किया गया है। इसमें चहारदीवारीके निकटतक कहीं कोई बाहर निकलनेका मार्ग नहीं है। अवश्य ही दुर्योधनका यह अशुभ कर्म, जिसे वह पूर्ण करना चाहता है, पहले ही विदुरजीको मालूम हो गया था। इसीलिये उन्होंने हमें इसकी जानकारी करा दी ॥ १३-१४ ॥
सेयमापदनुप्राप्ता क्षत्ता यां दृष्टवान् पुरा । पुरोचनस्याविदितानस्मांस्त्वं प्रतिमोचय ॥ १५ ॥
'विदुरजीकी दृष्टिमें जो बहुत पहले आ चुकी थी, वही यह विपत्ति आज हमलोगोंपर आयी-की-आयी है। तुम हमें इस संकटसे इस तरह मुक्त करो, जिससे पुरोचनको हमारे विषयमें कुछ भी पता न चले' ।। १५ ।।
स तथेति प्रतिश्रुत्य खनको यत्नमास्थितः ।
परिखामुत्किरन्नाम चकार च महाबिलम् ।। १६ ।।
तब उस सुरंग खोदनेवालेने 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा', यह प्रतिज्ञा की और कार्यसिद्धिके प्रयत्नमें लग गया। खाईकी सफाई करनेके व्याजसे उसने एक बहुत बड़ी सुरंग तैयार कर दी ।। १६ ।।
चक्रे च वेश्मनस्तस्य मध्येनातिमहद् बिलम् ।
कपाटयुक्तमज्ञातं समं भूम्याश्च भारत ।। १७ ।।
भारत! उसने उस भवनके ठीक बीचसे वह महान् सुरंग निकाली। उसके मुहानेपर किवाड़ लगे थे। वह भूमिके समान सतहमें ही बनी थी; अतः किसीको ज्ञात नहीं हो पाती थी ।। १७ ।।
पुरोचनभयादेव व्यदधात् संवृतं मुखम् ।
स तस्य तु गृहद्वारि वसत्यशुभधीः सदा ।
तत्र ते सायुधाः सर्वे वसन्ति स्म क्षपां नृप ।। १८ ।।
दिवा चरन्ति मृगयां पाण्डवेया वनाद् वनम् ।
विश्वस्तवदविश्वस्ता वञ्चयन्तः पुरोचनम् ।
अतुष्टा तुष्टवद् राजन्नूषुः परमविस्मिताः ।। १९ ।।
पुरोचनके भयसे उस सुरंग खोदनेवालेने उसके मुखको बंद कर दिया था। दुष्टबुद्धि पुरोचन सर्वदा मकानके द्वारपर ही निवास करता था और पाण्डवगण भी रात्रिके समय शस्त्र सँभाले सावधानीके साथ उस द्वारपर ही रहा करते थे। (इसलिये पुरोचनको आग लगानेका अवसर नहीं मिलता था।) वे दिनमें हिंस्र पशुओंके मारनेके बहाने एक वनसे दूसरे वनमें विचरते रहते थे। पाण्डव भीतरसे तो विश्वास न करनेके कारण सदा चौकन्ने रहते थे, परंतु ऊपरसे पुरोचनको ठगनेके लिये विश्वस्तकी भाँति व्यवहार करते थे। राजन्! वे संतुष्ट न होते हुए भी संतुष्टकी भाँति निवास करते और अत्यन्त विस्मययुक्त रहते थे ।। १८-१९ ।।
न चैनानन्वबुध्यन्त नरा नगरवासिनः ।
अन्यत्र विदुरामात्यात् तस्मात् खनकसत्तमात् ।। २० ।।
विदुरके मन्त्री और खोदाईके काममें श्रेष्ठ उस खनकको छोड़कर नगरके निवासी भी पाण्डवोंके विषयमें कुछ नहीं जान पाते थे ।। २० ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि जतुगृहवासे
षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें जतुगृहवासविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४६ ॥