महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सर्वत्र हाहाकार छा रहा था, भयका आर्तनाद सुनायी पड़ता था। बाजारोंमें खरीद-बिक्रीका नाम नहीं था। देवकार्य बंद हो गये। पुण्य और विवाहादि कर्म छूट गये थे॥ २३ ॥
निवृत्तकृषिगोरक्षा विध्वस्तनगराश्रमा । अस्थिकङ्कालसंकीर्णा भूर्बभूवोग्रदर्शना ॥ २४ ॥ कृषि और गोरक्षाका नाम नहीं था, नगर और आश्रम उजड़कर खण्डहर हो गये थे। चारों ओर हड्डियाँ और कंकाल भरे पड़े थे। इस प्रकार पृथ्वीकी ओर देखना भी भयानक प्रतीत होता था ॥ २४ ॥
निवृत्तपितृकार्यं च निर्वषट्कारमङ्गलम् । जगत् प्रतिभयाकारं दुष्प्रेक्ष्यमभवत् तदा ॥ २५ ॥ श्राद्धकर्म लुप्त हो गया। वषट्कार और मंगलका कहीं नाम नहीं रह गया। सारा जगत् भयानक प्रतीत होता था। इसकी ओर देखनातक कठिन हो गया था ॥ २५ ॥
चन्द्रादित्यौ ग्रहास्तारा नक्षत्राणि दिवौकसः । जग्मुर्विषादं तत् कर्म दृष्ट्वा सुन्दोपसुन्दयोः ॥ २६ ॥ सुन्द और उपसुन्दका वह भयानक कर्म देखकर चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, तारे, नक्षत्र और देवता सभी अत्यन्त खिन्न हो उठे ॥ २६ ॥
एवं सर्वा दिशो दैत्यौ जित्वा क्रूरेण कर्मणा । निःसपत्नौ कुरुक्षेत्रे निवेशमभिचक्रतुः ॥ २७ ॥ इस प्रकार वे दोनों दैत्य अपने क्रूर कर्मद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको जीतकर शत्रुओंसे रहित हो कुरुक्षेत्रमें निवास करने लगे ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपसुन्दोपाख्याने नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें सुन्दोपसुन्दोपाख्यानविषयक दो सौ नौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०९ ॥
२१०-
दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
तिलोत्तमाकी उत्पत्ति, उसके रूपका आकर्षण तथा सुन्दोप-सुन्दको मोहित करनेके लिये उसका प्रस्थान
नारद उवाच
ततो देवर्षयः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः ।
जग्मुस्तदा परामार्तिं दृष्ट्वा तत् कदनं महत् ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर सम्पूर्ण देवर्षि और सिद्ध-महर्षि वह महान् हत्याकाण्ड देखकर बहुत दुःखी हुए ॥ १ ॥
तेऽभिजग्मुर्जितक्रोधा जितात्मानो जितेन्द्रियाः ।
पितामहस्य भवनं जगतः कृपया तदा ॥ २ ॥
उन्होंने अपने मन, इन्द्रियसमुदाय तथा क्रोधको जीत लिया था। फिर भी सम्पूर्ण जगत्पर दया करके वे ब्रह्माजीके धाममें गये ॥ २ ॥
ततो ददृशुरासीनं सह देवैः पितामहम् ।
सिद्धैर्ब्रह्मर्षिभिश्चैव समन्तात् परिवारितम् ॥ ३ ॥
वहाँ पहुँचकर उन्होंने ब्रह्माजीको देवताओं, सिद्धों और महर्षियोंसे सब ओर घिरे हुए बैठे देखा ॥ ३ ॥
तत्र देवो महादेवस्तत्राग्निर्वायुना सह ।
चन्द्रादित्यौ च शक्रश्च पारमेष्ठ्यास्तथर्षयः ॥ ४ ॥
वैखानसा बालखिल्या वानप्रस्था मरीचिपाः ।
अजाश्चैवाविमूढाश्च तेजोगर्भास्तपस्विनः ॥ ५ ॥
ऋषयः सर्व एवैते पितामहमुपागमन् ।
ततोऽभिगम्य ते दीनाः सर्व एव महर्षयः ॥ ६ ॥
सुन्दोपसुन्दयो कर्म सर्वमेव शशंसिरे ।
यथा हृतं यथा चैव कृतं येन क्रमेण च ॥ ७ ॥
न्यवेदयंस्ततः सर्वमखिलेन पितामहे ।
ततो देवगणाः सर्वे ते चैव परमर्षयः ॥ ८ ॥
तमेवार्थं पुरस्कृत्य पितामहमचोदयन् ।
ततः पितामहः श्रुत्वा सर्वेषां तद् वचस्तदा ॥ ९ ॥
मुहूर्तमिव संचिन्त्य कर्तव्यस्य च निश्चयम् ।
तयोर्वधं समुद्दिश्य विश्वकर्माणमाह्वयत् ॥ १० ॥
वहाँ भगवान् महादेव, वायुसहित अग्निदेव, चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र, ब्रह्मपुत्र महर्षि, वैखानस (वनवासी), बालखिल्य, वानप्रस्थ, मरीचिप, अजन्मा, अविमूढ़ तथा तेजोगर्भ आदि नाना प्रकारके तपस्वी मुनि ब्रह्माजीके पास आये थे। उन सभी महर्षियोंने निकट जाकर दीनभावसे ब्रह्माजीसे सुन्द-उपसुन्दके सारे क्रूर कर्मोंका वृत्तान्त कह सुनाया। दैत्योंने जिस प्रकार लूट-पाट की, जैसे-जैसे और जिस क्रमसे लोगोंकी हत्याएँ कीं, वह सब समाचार पूर्णरूपसे ब्रह्माजीको बताया। तब सम्पूर्ण देवताओं और महर्षियोंने भी इस बातको लेकर ब्रह्माजीको प्रेरणा की। ब्रह्माजीने उन सबकी बातें सुनकर दो घड़ीतक कुछ विचार किया। फिर उन दोनोंके वधके लिये कर्तव्यका निश्चय करके विश्वकर्माको बुलाया ॥ ४—१० ॥
दृष्ट्वा च विश्वकर्माणं व्यादिदेश पितामहः ।
सृज्यतां प्रार्थनीयैका प्रमदेति महातपाः ॥ ११ ॥
उनको आया देखकर महातपस्वी ब्रह्माजीने यह आज्ञा दी कि तुम एक तरुणी स्त्रीके शरीरकी रचना करो, जो सबका मन लुभा लेनेवाली हो ॥ ११ ॥
पितामहं नमस्कृत्य तद्वाक्यमभिनन्द्य च ।
निर्ममे योषितं दिव्यां चिन्तयित्वा पुनः पुनः ॥ १२ ॥
ब्रह्माजीकी आज्ञाको शिरोधार्य करके विश्वकर्माने उन्हें प्रणाम किया और खूब सोच-विचारकर एक दिव्य युवतीका निर्माण किया ॥ १२ ॥
त्रिषु लोकेषु यत् किंचिद् भूतं स्थावरजङ्गमम् ।
समानयद् दर्शनीयं तत् तदत्र स विश्ववित् ॥ १३ ॥
तीनों लोकोंमें जो कुछ भी चर और अचर दर्शनीय पदार्थ था, सर्वज्ञ विश्वकर्माने उन सबके सारांशका उस सुन्दरीके शरीरमें संग्रह किया ॥ १३ ॥
कोटिशश्चैव रत्नानि तस्या गात्रे न्यवेशयत् ।
तां रत्नसंघातमयीमसृजद् देवरूपिणीम् ॥ १४ ॥
उन्होंने उस युवतीके अंगोंमें करोड़ों रत्नोंका समावेश किया और इस प्रकार रत्नराशिमयी उस देवरूपिणी रमणीका निर्माण किया ॥ १४ ॥
सा प्रयत्नेन महता निर्मिता विश्वकर्मणा ।
त्रिषु लोकेषु नारीणां रूपेणाप्रतिमाभवत् ॥ १५ ॥
विश्वकर्माद्वारा बड़े प्रयत्नसे बनायी हुई वह दिव्य युवती अपने रूप-सौन्दर्यके कारण तीनों लोकोंकी स्त्रियोंमें अनुपम थी ॥ १५ ॥
न तस्याः सूक्ष्ममप्यस्ति यद् गात्रे रूपसम्पदा ।
नियुक्ता यत्र वा दृष्टिर्न सज्जति निरीक्षताम् ॥ १६ ॥
उसके शरीरमें कहीं तिलभर भी ऐसी जगह नहीं थी, जहाँकी रूपसम्पत्तिको देखनेके लिये लगी हुई दर्शकोंकी दृष्टि जम न जाती हो ॥ १६ ॥
सा विग्रहवतीव श्रीः कामरूपा वपुष्मती ।
जहार सर्वभूतानां चक्षूंषि च मनांसि च ॥ १७ ॥
वह मूर्तिमती कामरूपिणी लक्ष्मीकी भाँति समस्त प्राणियोंके नेत्रों और मनको हर लेती थी ॥ १७ ॥
तिलं तिलं समानीय रत्नानां यद् विनिर्मिता ।
तिलोत्तमेति तत् तस्या नाम चक्रे पितामहः ॥ १८ ॥
उत्तम रत्नोंका तिल-तिलभर अंश लेकर उसके अंगोंका निर्माण हुआ था, इसलिये ब्रह्माजीने उसका नाम 'तिलोत्तमा' रख दिया ॥ १८ ॥
ब्रह्माणं सा नमस्कृत्य प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।
किं कार्यं मयि भूतेश येनास्म्यद्येह निर्मिता ॥ १९ ॥
तदनन्तर तिलोत्तमा ब्रह्माजीको नमस्कार करके हाथ जोड़कर बोली—'प्रजापते! मुझपर किस कार्यका भार रखा गया है? जिसके लिये आज मेरे शरीरका निर्माण किया गया है' ॥ १९ ॥
पितामह उवाच
गच्छ सुन्दोपसुन्दाभ्यामसुराभ्यां तिलोत्तमे ।
प्रार्थनीयेन रूपेण कुरु भद्रे प्रलोभनम् ॥ २० ॥
ब्रह्माजीने कहा— भद्रे तिलोत्तमे! तू सुन्द और उपसुन्द नामक असुरोंके पास जा और अपने अत्यन्त कमनीय रूपके द्वारा उनको लुभा ॥ २० ॥
त्वत्कृते दर्शनादेव रूपसम्पत्कृतेन वै ।
विरोधः स्याद् यथा ताभ्यामन्योन्येन तथा कुरु ॥ २१ ॥
तुझे देखते ही तेरे लिये—तेरी रूपसम्पत्तिके लिये उन दोनों दैत्योंमें परस्पर विरोध हो जाय, ऐसा प्रयत्न कर ॥ २१ ॥
नारद उवाच
सा तथेति प्रतिज्ञाय नमस्कृत्य पितामहम् ।
चकार मण्डलं तत्र विबुधानां प्रदक्षिणम् ॥ २२ ॥
नारदजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तब तिलोत्तमाने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा करके ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर वह देवमण्डलीकी परिक्रमा करने लगी ॥ २२ ॥
प्राङ्मुखो भगवानास्ते दक्षिणेन महेश्वरः ।
देवाश्चैवोत्तरेणासन् सर्वतस्त्वृषयोऽभवन् ॥ २३ ॥
ब्रह्माजीके दक्षिणभागमें भगवान् महेश्वर पूर्वाभिमुख होकर बैठे थे, उत्तरभागमें देवतालोग थे तथा ऋषि-मुनि ब्रह्माजीके चारों ओर बैठे थे ॥ २३ ॥
कुर्वत्या तु तदा तत्र मण्डलं तत् प्रदक्षिणम् ।
इन्द्रः स्थाणुश्च भगवान् धैर्येण प्रत्यवस्थितौ ॥ २४ ॥ वहाँ तिलोत्तमाने जब देवमण्डलीकी प्रदक्षिणा आरम्भ की, तब इन्द्र और भगवान् शंकर दोनों धैर्यपूर्वक अपने स्थानपर ही बैठे रहे ॥ २४ ॥
द्रष्टुकामस्य चात्यर्थं गतया पार्श्वतस्तया । अन्यदञ्चितपद्माक्षं दक्षिणं निःसृतं मुखम् ॥ २५ ॥ जब वह दक्षिण पार्श्वकी ओर गयी, तब उसे देखनेकी इच्छासे भगवान् शंकरके दक्षिणभागमें एक और मुख प्रकट हो गया, जो कमलसदृश नेत्रोंसे सुशोभित था ॥ २५ ॥
पृष्ठतः परिवर्तन्त्या पश्चिमं निःसृतं मुखम् । गतया चोत्तरं पार्श्वमुत्तरं निःसृतं मुखम् ॥ २६ ॥ जब वह पीछेकी ओर गयी, तब उनका पश्चिम मुख प्रकट हुआ और उत्तर पार्श्वकी ओर उसके जानेपर भगवान् शिवके उत्तरवर्ती मुखका प्राकट्य हुआ ॥ २६ ॥
महेन्द्रस्यापि नेत्राणां पृष्ठतः पार्श्वतोऽग्रतः । रक्तान्तानां विशालानां सहस्रं सर्वतोऽभवत् ॥ २७ ॥ इसी प्रकार इन्द्रके भी आगे, पीछे और पार्श्व-भागमें सब ओर लाल कोनेवाले सहस्रों विशाल नेत्र प्रकट हो गये ॥ २७ ॥
एवं चतुर्मुखः स्थाणुर्महादेवोऽभवत् पुरा । तथा सहस्रनेत्रश्च बभूव बलसूदनः ॥ २८ ॥ इस प्रकार पूर्वकालमें अविनाशी भगवान् महादेवजीके चार मुख प्रकट हुए और बलहन्ता इन्द्रके हजार नेत्र हुए ॥ २८ ॥
तथा देवनिकायानां महर्षीणां च सर्वशः । मुखानि चाभ्यवर्तन्त येन याति तिलोत्तमा ॥ २९ ॥ दूसरे-दूसरे देवताओं और महर्षियोंके मुख भी जिस ओर तिलोत्तमा जाती थी, उसी ओर घूम जाते थे ॥ २९ ॥
तस्या गात्रे निपतिता दृष्टिस्तेषां महात्मनाम् । सर्वेषामेव भूयिष्ठमृते देवं पितामहम् ॥ ३० ॥ उस समय देवाधिदेव ब्रह्माजीको छोड़कर शेष सभी महानुभावोंकी दृष्टि तिलोत्तमाके शरीरपर बार-बार पड़ने लगी ॥ ३० ॥
गच्छन्त्या तु तया सर्वे देवाश्च परमर्षयः । कृतमित्येव तत् कार्यं मेनिरे रूपसम्पदा ॥ ३१ ॥ जब वह जाने लगी, तब सभी देवताओं और महर्षियोंको उसकी रूपसम्पत्ति देखकर यह विश्वास हो गया कि अब वह सारा कार्य सिद्ध ही है ॥ ३१ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1467)
सुन्द और उपसुन्दका अत्याचार
तिलोत्तमाके लिये सुन्द और उपसुन्दका युद्ध
तिलोत्तमायां तस्यां तु गतायां लोकभावनः ।
सर्वान् विसर्जयामास देवानृषिगणांश्च तान् ॥ ३२ ॥
तिलोत्तमाके चले जानेपर लोकस्रष्टा ब्रह्माजीने उन सम्पूर्ण देवताओं और महर्षियोंको विदा किया ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपसुन्दोपाख्याने
तिलोत्तमाप्रस्थापने दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें
सुन्दोपसुन्दोपाख्यानके प्रसंगमें तिलोत्तमाप्रस्थापनविषयक दो सौ दसवाँ अध्याय पूरा
हुआ ॥ २१० ॥
२११-
एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
तिलोत्तमापर मोहित होकर सुन्द-उपसुन्दका आपसमें लड़ना और मारा जाना एवं तिलोत्तमाको ब्रह्माजीद्वारा वरप्राप्ति तथा पाण्डवोंका द्रौपदीके विषयमें नियम-निर्धारण
नारद उवाच
जित्वा तु पृथिवीं दैत्यौ निःसपत्नौ गतव्यथौ ।
कृत्वा त्रैलोक्यमव्यग्रं कृतकृत्यौ बभूवतुः ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! वे दोनों दैत्य सुन्द और उपसुन्द सारी पृथ्वीको जीतकर शत्रुओंसे रहित एवं व्यथारहित हो तीनों लोकोंको पूर्णतः अपने वशमें करके कृतकृत्य हो गये ॥ १ ॥
देवगन्धर्वयक्षाणां नागपार्थिवरक्षसाम् ।
आदाय सर्वरत्नानि परां तुष्टिमुपागतौ ॥ २ ॥
देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, मनुष्य तथा राक्षसोंके सभी रत्नोंको छीनकर उन दोनों दैत्योंको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ ॥ २ ॥
यदा न प्रतिषेद्धारस्तयोः सन्तीह केचन ।
निरुद्योगौ तदा भूत्वा विजह्रातेऽमराविव ॥ ३ ॥
जब त्रिलोकीमें उनका सामना करनेवाले कोई नहीं रह गये, तब वे देवताओंके समान अकर्मण्य होकर भोग-विलासमें लग गये ॥ ३ ॥
स्त्रीभिर्माल्यैश्च गन्धैश्च भक्ष्यभोज्यैः सुपुष्कलैः ।
पानैश्च विविधैर्हृद्यैः परां प्रीतिमवापतुः ॥ ४ ॥
सुन्दरी स्त्रियों, मनोहर मालाओं, भाँति-भाँतिके सुगन्ध-द्रव्यों, पर्याप्त भोजन-सामग्रियों तथा मनको प्रिय लगनेवाले अनेक प्रकारके पेय रसोंका सेवन करके वे बड़े आनन्दसे दिन बिताने लगे ॥ ४ ॥
अन्तःपुरवनोद्याने पर्वतेषु वनेषु च ।
यथेप्सितेषु देशेषु विजह्रातेऽमराविव ॥ ५ ॥
अन्तःपुरके उपवन और उद्यानमें, पर्वतोंपर, वनोंमें तथा अन्य मनोवांछित प्रदेशोंमें भी वे देवताओंकी भाँति विहार करने लगे ॥ ५ ॥
ततः कदाचिद् विन्ध्यस्य प्रस्थे समशिलातले ।
पुष्पिताग्रेषु शालेषु विहारमभिजग्मतुः ॥ ६ ॥
तदनन्तर एक दिन विन्ध्यपर्वतके शिखरपर जहाँकी शिलामयी भूमि समतल थी और जहाँ ऊँचे शाल-वृक्षोंकी शाखाएँ फूलोंसे भरी हुई थीं, वहाँ वे दोनों दैत्य विहार करनेके लिये गये ।। ६ ।।
दिव्येषु सर्वकामेषु समानीतेषु तावुभौ ।
वरासनेषु संहृष्टौ सह स्त्रीभिर्निषीदतुः ।। ७ ।।
वहाँ उनके लिये सम्पूर्ण दिव्य भोग प्रस्तुत किये गये, तदनन्तर वे दोनों भाई श्रेष्ठ आसनोंपर सुन्दरी स्त्रियोंके साथ आनन्दमग्न होकर बैठे ।। ७ ।।
ततो वादित्रनृत्याभ्यामुपतिष्ठन्त तौ स्त्रियः ।
गीतैश्च स्तुतिसंयुक्तैः प्रीत्या समुपजग्मिरे ।। ८ ।।
तदनन्तर बहुत-सी स्त्रियाँ प्रेमपूर्वक उनके पास आयीं और वाद्य, नृत्य, गीत एवं स्तुति-प्रशंसा आदिके द्वारा उन दोनोंका मनोरंजन करने लगीं ।। ८ ।।
ततस्तिलोत्तमा तत्र वने पुष्पाणि चिन्वती ।
वेशं साऽऽक्षिप्तमाधाय रक्तेनैकेन वाससा ।। ९ ।।
इसी समय तिलोत्तमा वहाँ वनमें फूल चुनती हुई आयी। उसके शरीरपर एक ही लाल रंगकी महीन साड़ी थी। उसने ऐसा वेश धारण कर रखा था, जो किसी भी पुरुषको उन्मत्त बना सकता था ।। ९ ।।
नदीतीरेषु जातान् सा कर्णिकारान् प्रचिन्वती ।
शनैर्जगाम तं देशं यत्रास्तां तौ महासुरौ ।। १० ।।
नदीके किनारे उगे हुए कनेरके फूलोंका संग्रह करती हुई वह धीरे-धीरे उसी स्थानकी ओर गयी, जहाँ वे दोनों महादैत्य बैठे थे ।। १० ।।
तौ तु पीत्वा वरं पानं मदरक्तान्तलोचनौ ।
दृष्ट्वैव तां वरारोहां व्यथितौ सम्बभूवतुः ।। ११ ।।
उन दोनोंने बहुत अच्छा मादक रस पी लिया था, जिससे उनके नेत्र नशेके कारण कुछ लाल हो गये थे। उस सुन्दर अंगोंवाली तिलोत्तमाको देखते ही वे दोनों दैत्य कामवेदनासे व्यथित हो उठे ।। ११ ।।
तावुत्थायासनं हित्वा जग्मतुर्यत्र सा स्थिता ।
उभौ च कामसम्मत्तावुभौ प्रार्थयतश्च ताम् ।। १२ ।।
और अपना आसन छोड़कर खड़े हो उसी स्थानपर गये, जहाँ वह खड़ी थी। दोनों ही कामसे उन्मत्त हो रहे थे, इसलिये दोनों ही उसे अपनी स्त्री बनानेके लिये उससे प्रेमकी याचना करने लगे ।। १२ ।।
दक्षिणे तां करे सुभ्रूं सुन्दो जग्राह पाणिना ।
उपसुन्दोऽपि जग्राह वामे पाणौ तिलोत्तमाम् ।। १३ ।।
सुन्दने सुन्दर भौंहोंवाली तिलोत्तमाका दाहिना हाथ पकड़ा और उपसुन्दने उसका बायाँ हाथ पकड़ लिया ।। १३ ।।
वरप्रदानमत्तौ तावौरसेन बलेन च ।
धनरत्नमदाभ्यां च सुरापानमदेन च ।। १४ ।।
एक तो वे दुर्लभ वरदानके मदसे उन्मत्त थे, दूसरे उनपर अपने स्वाभाविक बलका नशा सवार था। इसके सिवा धनमद, रत्नमद और सुरापानके मदसे भी वे उन्मत्त हो रहे थे ।। १४ ।।
सर्वैरेतैर्मदैर्मत्तावन्योन्यं भ्रुकुटीकृतौ ।
(तौ कटाक्षेण दैत्येन्द्रावाकर्षति मुहुर्मुहुः ।
दक्षिणेन कटाक्षेण सुन्दं जग्राह कामिनी ।।
वामेनैव कटाक्षेण उपसुन्दं जिघृक्षती ।
गन्धाभरणरूपैस्तौ व्यामोहं जग्मतुस्तदा ।।)
मदकामसमाविष्टौ परस्परमथोचतुः ।। १५ ।।
इन सभी मदोंसे उन्मत्त होनेके कारण आपसमें ही एक-दूसरेपर उनकी भौंहें तन गयीं। तिलोत्तमा कटाक्षद्वारा उन दोनों दैत्यराजोंको बार-बार अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी। उस कामिनीने अपने दाहिने कटाक्षसे सुन्दको आकृष्ट कर लिया और बायें कटाक्षसे वह उपसुन्दको वशमें करनेकी चेष्टा करने लगी। उसकी दिव्य सुगन्ध, आभूषणराशि तथा रूपसम्पत्तिसे वे दोनों दैत्य तत्काल मोहित हो गये। उनमें मद और कामका आवेश हो गया; अतः वे एक-दूसरेसे इस प्रकार बोले— ।। १५ ।।
मम भार्या तव गुरुरिति सुन्दोऽभ्यभाषत ।
मम भार्या तव वधूरुपसुन्दोऽभ्यभाषत ।। १६ ।।
सुन्दने कहा—'अरे! यह मेरी पत्नी है, तुम्हारे लिये माताके समान है।' यह सुनकर उपसुन्द बोल उठा—'नहीं-नहीं, यह मेरी भार्या है, तुम्हारे लिये तो पुत्रवधूके समान है' ।। १६ ।।
नैषा तव ममैषेति ततस्तौ मन्युराविशत् ।
तस्या रूपेण सम्मत्तौ विगतस्नेहसौहृदौ ।। १७ ।।
'यह तुम्हारी नहीं है, मेरी है', यही कहते-कहते उन दोनोंको क्रोध चढ़ आया। तिलोत्तमाके रूपसे मतवाले होकर वे दोनों स्नेह और सौहार्दसे शून्य हो गये ।। १७ ।।
तस्या हेतोर्गदे भीमे संगृहीतावुभौ तदा ।
प्रगृह्य च गदे भीमे तस्यां तौ काममोहितौ ।। १८ ।।
उस सुन्दरीको पानेके लिये दोनों भाइयोंने उस समय हाथमें भयंकर गदाएँ ले लीं। दोनों ही उसके प्रति कामसे मोहित हो रहे थे ।। १८ ।।
अहं पूर्वमहं पूर्वमित्यन्योन्यं निजघ्नतुः ।
तौ गदाभिहतौ भीमौ पेततुर्धरणीतले ॥ १९ ॥ 'पहले मैं इसे प्राप्त करूँगा', 'नहीं, पहले मैं'; ऐसा कहते हुए दोनों एक-दूसरेको मारने लगे। इस प्रकार गदाओंकी चोट खाकर वे दोनों भयानक दैत्य धरतीपर गिर पड़े ॥ १९ ॥ रुधिरेणावसिक्ताङ्गौ द्वाविवाकौ नभश्च्युतौ । ततस्ता विद्रुता नार्यः स च दैत्यगणस्तथा ॥ २० ॥ पातालमगमत् सर्वो विषादभयकम्पितः । ततः पितामहस्तत्र सह देवैर्महर्षिभिः ॥ २१ ॥ आजगाम विशुद्धात्मा पूजयंश्च तिलोत्तमाम् । वरेणच्छन्दयामास भगवान् प्रपितामहः ॥ २२ ॥ उनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो रहे थे। ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशसे दो सूर्य पृथ्वीपर गिर गये हों। उनके मारे जानेपर वे सब स्त्रियाँ वहाँसे भाग गयीं और दैत्योंका वह सारा समुदाय विषाद और भयसे कम्पित होकर पातालमें चला गया। तत्पश्चात् विशुद्ध अन्तःकरणवाले भगवान् ब्रह्माजी देवताओं और महर्षियोंके साथ तिलोत्तमाकी प्रशंसा करते हुए वहाँ आये और भगवान् पितामहने उसे वरके द्वारा प्रसन्न किया ॥ २०—२२ ॥ वरं दित्सुः स तत्रैनां प्रीतः प्राह पितामहः । आदित्यचरिताँल्लोकान् विचरिष्यसि भाविनि ॥ २३ ॥ तेजसा च सुदृष्टां त्वां न करिष्यति कश्चन । एवं तस्यै वरं दत्त्वा सर्वलोकपितामहः ॥ २४ ॥ इन्द्रे त्रैलोक्यमाधाय ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः । वर देनेके लिये उत्सुक हुए ब्रह्माजी स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक बोले—'भामिनि! जहाँतक सूर्यकी गति है, उन सभी लोकोंमें तू इच्छानुसार विचर सकेगी। तुझमें इतना तेज होगा कि कोई आँख भरकर तुझे अच्छी तरह देख भी न सकेगा।' इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजी तिलोत्तमाको वरदान देकर तथा त्रिलोकीकी रक्षाका भार इन्द्रको सौंपकर पुनः ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २३-२४ १/२ ॥
नारद उवाच एवं तौ सहितौ भूत्वा सर्वार्थेष्वेकनिश्चयौ ॥ २५ ॥ तिलोत्तमार्थं संक्रुद्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः । तस्माद् ब्रवीमि वः स्नेहात् सर्वान् भरतसत्तमाः ॥ २६ ॥ यथा वो नात्र भेदः स्यात् सर्वेषां द्रौपदीकृते । तथा कुरुत भद्रं वो मम चेत् प्रियमिच्छथ ॥ २७ ॥ नारदजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस प्रकार सुन्द और उपसुन्दने परस्पर संगठित और सभी बातोंमें एकमत रहकर भी तिलोत्तमाके लिये कुपित हो एक-दूसरेको मार डाला। अतः
भरतवंशशिरोमणियो! मैं तुम सब लोगोंसे स्नेहवश कहता हूँ कि यदि मेरा प्रिय चाहते हो, तो ऐसा कुछ नियम बना लो, जिससे द्रौपदीके लिये तुम सब लोगोंमें फूट न होने पावे। तुम्हारा कल्याण हो॥ २५–२७॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता महात्मानो नारदेन महर्षिणा ।
समयं चक्रिरे राजंस्तेऽन्योन्यवशमागताः ।
समक्षं तस्य देवर्षेर्नारदस्यामितौजसः ॥ २८ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! देवर्षि नारदके ऐसा कहनेपर एक-दूसरेके अधीन रहनेवाले उन अमिततेजस्वी महात्मा पाण्डवोंने देवर्षिके सामने ही यह नियम बनाया—॥ २८ ॥
(एकैकस्य गृहे कृष्णा वसेद् वर्षमकल्मषा ।)
द्रौपद्या नः सहासीनानान्योन्यं योऽभिदर्शयेत् ।
स नो द्वादश वर्षाणि ब्रह्मचारी वने वसेत् ॥ २९ ॥
‘हममेंसे प्रत्येकके घरमें पापरहित द्रौपदी एक-एक वर्ष निवास करे। द्रौपदीके साथ एकान्तमें बैठे हुए हममेंसे एक भाईको यदि दूसरा देख ले, तो वह बारह वर्षोंतक ब्रह्मचर्यपूर्वक वनमें निवास करे’॥ २९ ॥
कृते तु समये तस्मिन् पाण्डवैर्धर्मचारिभिः ।
नारदोऽप्यगमत् प्रीत इष्टं देशं महामुनिः ॥ ३० ॥
धर्मका आचरण करनेवाले पाण्डवोंद्वारा यह नियम स्वीकार कर लिये जानेपर महामुनि नारदजी प्रसन्न हो अभीष्ट स्थानको चले गये॥ ३० ॥
एवं तैः समयः पूर्वं कृतो नारदचोदितैः ।
न चाभिद्यन्त ते सर्वे तदान्योन्येन भारत ॥ ३१ ॥
भारत! इस प्रकार नारदजीकी प्रेरणासे पाण्डवोंने पहले ही नियम बना लिया था। इसीलिये वे सब आपसमें कभी एक-दूसरेके विरोधी नहीं हुए॥ ३१ ॥
(एतद् विस्तरशः सर्वमाख्यातं ते नरेश्वर ।
काले च तस्मिन् सम्पन्नं यथावज्जनमेजय ॥)
नरेश्वर जनमेजय! उस समय जो बातें जिस प्रकार घटित हुई थीं, वे सब मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक बतायी हैं।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपसुन्दोपाख्याने एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यम्भपर्वमें सुन्दोपसुन्दोपाख्यानविषयक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २११ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३४ १/२ श्लोक हैं)
(अर्जुनवनवासपर्व)
(अर्जुनवनवासपर्व)
द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
एवं ते समयं कृत्वा न्यवसंस्तत्र पाण्डवाः ।
वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान् महीक्षितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार नियम बनाकर पाण्डवलोग वहाँ रहने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रोंके प्रतापसे दूसरे राजाओंको अधीन करते रहते थे ॥ १ ॥
तेषां मनुजसिंहानां पञ्चानाममितौजसाम् ।
बभूव कृष्णा सर्वेषां पार्थानां वशवर्तिनी ॥ २ ॥
कृष्णा मनुष्योंमें सिंहके समान वीर और अमित तेजस्वी उन पाँचों पाण्डवोंकी आज्ञाके अधीन रहती थी ॥ २ ॥
ते तया तैश्च सा वीरैः पतिभिः सह पञ्चभिः ।
बभूव परमप्रीता नागैर्भोगवती यथा ॥ ३ ॥
पाण्डव द्रौपदीके साथ और द्रौपदी उन पाँचों वीर पतियोंके साथ ठीक उसी तरह अत्यन्त प्रसन्न रहती थी जैसे नागोंके रहनेसे भोगवतीपुरी परम शोभायुक्त होती है ॥ ३ ॥
वर्तमानेषु धर्मेण पाण्डवेषु महात्मसु ।
व्यवर्धन् कुरवः सर्वे हीनदोषाः सुखान्विताः ॥ ४ ॥
महात्मा पाण्डवोंके धर्मानुसार बर्ताव करनेके कारण समस्त कुरुवंशी निर्दोष एवं सुखी रहकर निरन्तर उन्नति करने लगे ॥ ४ ॥
अथ दीर्घेण कालेन ब्राह्मणस्य विशाम्पते ।
कस्यचित् तस्करा जह्रुः केचिद् गा नृपसत्तम ॥ ५ ॥
महाराज! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् एक दिन कुछ चोरोंने किसी ब्राह्मणकी गौएँ चुरा लीं ॥ ५ ॥
ह्रियमाणे धने तस्मिन् ब्राह्मणः क्रोधमूर्च्छितः ।
आगम्य खाण्डवप्रस्थमुदक्रोशत् स पाण्डवान् ॥ ६ ॥
अपने गोधनका अपहरण होता देख ब्राह्मण अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और खाण्डवप्रस्थमें आकर उसने उच्चस्वरसे पाण्डवोंको पुकारा— ।। ६ ।।
ह्रियते गोधनं क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः ।
प्रसह्य चास्मद्विषयादभ्यधावत पाण्डवाः ।। ७ ।।
‘पाण्डवो! हमारे गाँवसे कुछ नीच, क्रूर और पापात्मा चोर जबरदस्ती गोधन चुराकर लिये जा रहे हैं। उसकी रक्षाके लिये दौड़ो ।। ७ ।।
ब्राह्मणस्य प्रशान्तस्य हविर्ध्वाङ्क्षैः प्रलुप्यते ।
शार्दूलस्य गुहां शून्यां नीचः क्रोष्टाभिमर्दति ।। ८ ।।
‘आज एक शान्तस्वभाव ब्राह्मणका हविष्य कौए लूटकर खा रहे हैं। नीच सियार सिंहकी सूनी गुफाको रौंद रहा है ।। ८ ।।
अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम् ।
तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रं पापचारिणम् ।। ९ ।।
‘जो राजा प्रजाकी आयका छठा भाग करके रूपमें वसूल करता है, किंतु प्रजाकी रक्षाकी कोई व्यवस्था नहीं करता, उसे सम्पूर्ण लोकोंमें पूर्ण पापाचारी कहा गया है ।। ९ ।।
ब्राह्मणस्वे हृते चौरैर्धर्मार्थे च विलोपिते ।
रोरूयमाणे च मयि क्रियतामस्त्रधारणम् ।। १० ।।
‘मुझ ब्राह्मणका धन चोर लिये जा रहे हैं, मेरे गौके न रहनेपर दुग्ध आदि हविष्यके अभावसे धर्म और अर्थका लोप हो रहा है तथा मैं यहाँ आकर रो रहा हूँ। पाण्डवो! (चोरोंको दण्ड देनेके लिये) अस्त्र धारण करो’ ।। १० ।।
वैशम्पायन उवाच
रोरूयमाणस्याभ्याशे भृशं विप्रस्य पाण्डवः ।
तानि वाक्यानि शुश्राव कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।। ११ ।।
श्रुत्वैव च महाबाहुर्मा भैरित्याह तं द्विजम् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वह ब्राह्मण निकट आकर बहुत रो रहा था। पाण्डुपुत्र कुन्तीनन्दन धनंजयने उसकी कही हुई सारी बातें सुनीं और सुनकर उन महाबाहुने उस ब्राह्मणसे कहा—‘डरो मत’ ।। ११ ½ ।।
आयुधानि च यत्रासन् पाण्डवानां महात्मनाम् ।। १२ ।।
कृष्णया सह तत्रास्ते धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
सम्प्रवेशाय चाशक्तो गमनाय च पाण्डवः ।। १३ ।।
महात्मा पाण्डवोंके अस्त्र-शस्त्र जहाँ रखे गये थे, वहीं धर्मराज युधिष्ठिर कृष्णाके साथ एकान्तमें बैठे थे। अतः पाण्डुपुत्र अर्जुन न तो घरके भीतर प्रवेश कर सकते थे और न खाली हाथ चोरोंका ही पीछा कर सकते थे ।। १२-१३ ।।
तस्य चार्थस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमानः पुनः पुनः । आक्रन्दे तत्र कौन्तेयश्चिन्तयामास दुःखितः ॥ १४ ॥ इधर उस आर्त ब्राह्मणकी बातें उन्हें बार-बार शस्त्र ले आनेको प्रेरित कर रही थीं। जब वह अधिक रोने-चिल्लाने लगा, तब अर्जुनने दुःखी होकर सोचा— ॥ १४ ॥
ह्रियमाणे धने तस्मिन् ब्राह्मणस्य तपस्विनः । अश्रुप्रमार्जनं तस्य कर्तव्यमिति निश्चयः ॥ १५ ॥ 'इस तपस्वी ब्राह्मणके गोधनका अपहरण हो रहा है; अतः ऐसे समयमें इसके आँसू पोंछना मेरा कर्तव्य है। यही मेरा निश्चय है ॥ १५ ॥
उपक्षेपणजोऽधर्मः सुमहान् स्यान्महीपतेः । यद्यस्य रुदतो द्वारि न करोम्यद्य रक्षणम् ॥ १६ ॥ 'यदि मैं राजद्वारपर रोते हुए इस ब्राह्मणकी रक्षा आज नहीं करूँगा, तो महाराज युधिष्ठिरको उपेक्षाजनित महान् अधर्मका भागी होना पड़ेगा ॥ १६ ॥
अनास्तिक्यं च सर्वेषामस्माकमपि रक्षणे । प्रतितिष्ठेत लोकेऽस्मिन्नधर्मश्चैव नो भवेत् ॥ १७ ॥ 'इसके सिवा लोकमें यह बात फैल जायगी कि हम सब लोग किसी आर्तकी रक्षारूप धर्मके पालनमें श्रद्धा नहीं रखते। साथ ही हमें अधर्म भी प्राप्तहोगा ॥ १७ ॥
अनादृत्य तु राजानं गते मयि न संशयः । अजातशत्रोर्नृपतेर्मम चैवानृतं भवेत् ॥ १८ ॥ 'यदि राजाका अनादर करके मैं घरके भीतर चला जाऊँ, तो महाराज अजातशत्रुके प्रति मेरी प्रतिज्ञा मिथ्या होगी ॥ १८ ॥
अनुप्रवेशे राज्ञस्तु वनवासो भवेन्मम । सर्वमन्यत् परिहृतं धर्षणात् तु महीपतेः ॥ १९ ॥ 'राजाकी उपस्थितिमें घरके भीतर प्रवेश करनेपर मुझको वनमें निवास करना होगा। इसमें महाराजके तिरस्कारके सिवा और सारी बातें तुच्छ होनेके कारण उपेक्षणीय हैं ॥ १९ ॥
अधर्मो वै महानस्तु वने वा मरणं मम । शरीरस्य विनाशेन धर्म एव विशिष्यते ॥ २० ॥ 'चाहे राजाके तिरस्कारसे मुझे नियमभंगका महान् दोष प्राप्त हो अथवा वनमें ही मेरी मृत्यु हो जाय तथापि शरीरको नष्ट करके भी गौ-ब्राह्मण-रक्षारूप धर्मका पालन ही श्रेष्ठ है' ॥ २० ॥
एवं विनिश्चित्य ततः कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अनुप्रविश्य राजानमापृच्छ्य च विशाम्पते ॥ २१ ॥ धनुरादाय संहृष्टो ब्राह्मणं प्रत्यभाषत । जनमेजय! ऐसा निश्चय करके कुन्तीकुमार धनंजयने राजासे पूछकर घरके भीतर प्रवेश करके धनुष ले लिया और (बाहर आकर) प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणसे कहा— ॥ २१ १/२ ॥
ब्राह्मणागम्यतां शीघ्रं यावत् परधनैषिणः ॥ २२ ॥ न दूरे ते गताः क्षुद्रास्तावद् गच्छावहे सह । यावन्निवर्तयाम्यद्य चौरहस्ताद् धनं तव ॥ २३ ॥ ‘विप्रवर! शीघ्र आइये। जबतक दूसरोंके धन हड़पनेकी इच्छावाले वे क्षुद्र चोर दूर नहीं चले जाते, तभीतक हम दोनों एक साथ वहाँ पहुँच जायँ। मैं अभी आपका गोधन चोरोंके हाथसे छीनकर आपको लौटा देता हूँ’ ॥ २२-२३ ॥
सोऽनुसृत्य महाबाहुर्धन्वी वर्मी रथी ध्वजी । शरैर्विध्वस्य तांश्चौरानवजित्य च तद् धनम् ॥ २४ ॥ ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने धनुष और कवच धारण करके ध्वजायुक्त रथपर आरूढ़ हो उन चोरोंका पीछा किया और बाणोंसे चोरोंका विनाश करके सारा गोधन जीत
लिया ।। २४ ।। ब्राह्मणं समुपाकृत्य यशः प्राप्य च पाण्डवः । ततस्तद् गोधनं पार्थो दत्त्वा तस्मै द्विजातये ॥ २५ ॥ आजगाम पुरं वीरः सव्यसाची धनंजयः । सोऽभिवाद्य गुरून् सर्वान् सर्वैश्चाप्यभिनन्दितः ॥ २६ ॥
फिर ब्राह्मणको वह सारा गोधन देकर प्रसन्न करके अनुपम यशके भागी हो पाण्डुपुत्र सव्यसाची वीर धनंजय पुनः अपने नगरमें लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने समस्त गुरुजनोंको प्रणाम किया और उन सभी गुरुजनोंने उनकी बड़ी प्रशंसा एवं अभिनन्दन किया ॥ २५-२६ ॥
धर्मराजमुवाचेदं व्रतमादिश मे प्रभो । समयः समतिक्रान्तो भवत्संदर्शने मया ॥ २७ ॥ वनवासो गमिष्यामि समयो ह्येष नः कृतः ।
इसके बाद अर्जुनने धर्मराजसे कहा—'प्रभो! मैंने आपको द्रौपदीके साथ देखकर पहलेके निश्चित नियमको भंग किया है; अतः आप इसके लिये मुझे प्रायश्चित्त करनेकी आज्ञा दीजिये। मैं वनवासके लिये जाऊँगा; क्योंकि हमलोगोंमें यह शर्त हो चुकी है' ॥ २७ ॥
इत्युक्तो धर्मराजस्तु सहसा वाक्यमप्रियम् ॥ २८ ॥ कथमित्यब्रवीद् वाचा शोकार्तः सज्जमानया । युधिष्ठिरो गुडाकेशं भ्राता भ्रातरमच्युतम् ॥ २९ ॥ उवाच दीनो राजा च धनंजयमिदं वचः । प्रमाणमस्मि यदि ते मत्तः शृणु वचोऽनघ ॥ ३० ॥
अर्जुनके मुखसे सहसा यह अप्रिय वचन सुनकर धर्मराज शोकातुर होकर लड़खड़ाती हुई वाणीमें बोले—'ऐसा क्यों करते हो?' इसके बाद राजा युधिष्ठिर धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले अपने भाई गुडाकेश धनंजयसे फिर दीन होकर बोले—'अनघ! यदि तुम मुझको प्रमाण मानते हो, तो मेरी यह बात सुनो— ॥ २८—३० ॥
अनुप्रवेशे यद् वीर कृतवांस्त्वं मम प्रियम् । सर्वं तदनुजानामि व्यलीकं न च मे हृदि ॥ ३१ ॥
'वीरवर! तुमने घरके भीतर प्रवेश करके तो मेरा प्रिय कार्य किया है, अतः उसके लिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ; क्योंकि मेरे हृदयमें वह अप्रिय नहीं है ॥ ३१ ॥
गुरोरनुप्रवेशो हि नोपघातो यवीयसः । यवीयसोऽनुप्रवेशो ज्येष्ठस्य विधिलोपकाः ॥ ३२ ॥
'यदि बड़ा भाई घरमें स्त्रीके साथ बैठा हो, तो छोटे भाईका वहाँ जाना दोषकी बात नहीं है; परंतु छोटा भाई घरमें हो, तो बड़े भाईका वहाँ जाना उसके धर्मका नाश करनेवाला
है ॥ ३२ ॥ निवर्तस्व महाबाहो कुरुष्व वचनं मम । न हि ते धर्मलोपोऽस्ति न च ते धर्षणा कृता ॥ ३३ ॥ ‘अतः महाबाहो! मेरी बात मानो; वनवासका विचार छोड़ दो। न तो तुम्हारे धर्मका लोप हुआ है और न तुम्हारे द्वारा मेरा तिरस्कार ही किया गया है’ ॥ ३३ ॥
अर्जुन उवाच
न व्याजेन चरेद् धर्ममिति मे भवतः श्रुतम् । न सत्याद् विचलिष्यामि सत्येनायुधमालभे ॥ ३४ ॥ अर्जुन बोले— प्रभो! मैंने आपके ही मुखसे सुना है कि धर्माचरणमें कभी बहानेबाजी नहीं करनी चाहिये। अतः मैं सत्यकी शपथ खाकर और शस्त्र छूकर कहता हूँ कि सत्यसे विचलित नहीं होऊँगा ॥ ३४ ॥ (आज्ञा तु मम दातव्या भवता कीर्तिवर्धन । भवदाज्ञामृते किंचिन्न कार्यमिति निश्चितम् ॥) यशोवर्धन! मुझे आप वनवासके लिये आज्ञा दें, मेरा यह निश्चय है कि मैं आपकी आज्ञाके बिना कोई कार्य नहीं करूँगा ॥
वैशम्पायन उवाच
सोऽभ्यनुज्ञाय राजानं वनचर्याय दीक्षितः । वने द्वादश वर्षाणि वासायानुजगाम ह ॥ ३५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजाकी आज्ञा लेकर अर्जुनने वनवासकी दीक्षा ली और वनमें बारह वर्षोंतक रहनेके लिये वे वहाँसे चल पड़े ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि अर्जुनतीर्थयात्रायां द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनतीर्थयात्राविषयक दो सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१२ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलकर कुल ३६ श्लोक हैं)
२१३-
त्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
अर्जुनका गङ्गाद्वारमें ठहरना और वहाँ उनका उलूपीके साथ मिलन
वैशम्पायन उवाच
तं प्रयान्तं महाबाहुं कौरवाणां यशस्करम् ।
अनुजग्मुर्महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कौरववंशका यश बढ़ानेवाले महाबाहु अर्जुन जब जाने लगे, उस समय बहुत-से वेदज्ञ महात्मा ब्राह्मण उनके साथ हो लिये ॥ १ ॥
वेदवेदाङ्गविद्वांसस्तथैवाध्यात्मचिन्तकाः ।
भैक्षाश्च भगवद्भक्ताः सूताः पौराणिकाश्च ये ॥ २ ॥
कथकाश्चापरे राजन् श्रमणाश्च वनौकसः ।
दिव्याख्यानानि ये चापि पठन्ति मधुरं द्विजाः ॥ ३ ॥
वेद-वेदाङ्गोंके विद्वान्, अध्यात्मचिन्तन करनेवाले, भिक्षाजीवी ब्रह्मचारी, भगवद्भक्त, पुराणोंके ज्ञाता सूत, अन्य कथावाचक, संन्यासी, वानप्रस्थ तथा जो ब्राह्मण मधुर स्वरसे दिव्य कथाओंका पाठ करते हैं, वे सब अर्जुनके साथ गये ॥ २-३ ॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिः सहायैः पाण्डुनन्दनः ।
वृतः श्लक्ष्णकथैः प्रायान्मरुद्भिरिव वासवः ॥ ४ ॥
जैसे इन्द्र देवताओंके साथ चलते हैं, उसी प्रकार पाण्डुनन्दन अर्जुन पूर्वोक्त पुरुषों तथा अन्य बहुत-से मधुरभाषी सहायकोंके साथ यात्रा कर रहे थे ॥ ४ ॥
रमणीयानि चित्राणि वनानि च सरांसि च ।
सरितः सागरांश्चैव देशानपि च भारत ॥ ५ ॥
पुण्यान्यपि च तीर्थानि ददर्श भरतर्षभः ।
स गङ्गाद्वारमाश्रित्य निवेशमकरोत् प्रभुः ॥ ६ ॥
भारत! नरश्रेष्ठ अर्जुनने मार्गमें अनेक रमणीय एवं विचित्र वन, सरोवर, नदी, सागर, देश और पुण्यतीर्थ देखे। धीरे-धीरे गङ्गाद्वार (हरद्वार)-में पहुँचकर शक्तिशाली पार्थने वहीं डेरा डाल दिया ॥ ५-६ ॥
तत्र तस्याद्भुतं कर्म शृणु त्वं जनमेजय ।
कृतवान् यद् विशुद्धात्मा पाण्डूनां प्रवरो हि सः ॥ ७ ॥
जनमेजय! गङ्गाद्वारमें अर्जुनका एक अद्भुत कार्य सुनो, जो पाण्डवोंमें श्रेष्ठ विशुद्धचित्त धनंजयने किया था ॥ ७ ॥