महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
भारत! राजा युधिष्ठिरने उस समय मयासुरका यथायोग्य सत्कार किया और मयासुरने भी बड़े आदरके साथ उनका वह सत्कार ग्रहण किया ॥ १६ ॥
स पूर्वदेवचरितं तदा तत्र विशाम्पते ।
कथयामास दैतेयः पाण्डुपुत्रेषु भारत ॥ १७ ॥
जनमेजय! दैत्यराज मयने उस समय वहाँ पाण्डवोंको दैत्योंके अद्भुत चरित्र सुनाये ॥ १७ ॥
स कालं कंचिदाश्वस्य विश्वकर्मा विचिन्त्य तु ।
सभां प्रचक्रे कर्तुं पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १८ ॥
कुछ दिनोंतक वहाँ आरामसे रहकर दैत्योंके विश्वकर्मा मयासुरने सोच-विचारकर महात्मा पाण्डवोंके लिये सभाभवन बनानेकी तैयारी की ॥ १८ ॥
अभिप्रायेण पार्थानां कृष्णस्य च महात्मनः ।
पुण्येऽहनि महातेजाः कृतकौतुकमङ्गलः ॥ १९ ॥
तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठान् पायसेन सहस्रशः ।
धनं बहुविधं दत्त्वा तेभ्य एव च वीर्यवान् ॥ २० ॥
सर्वर्तुगुणसम्पन्नां दिव्यरूपां मनोरमाम् ।
दशकिष्कुसहस्रां तां मापयामास सर्वतः ॥ २१ ॥
उसने कुन्तीपुत्रों तथा महात्मा श्रीकृष्णकी रुचिके अनुसार सभाभवन बनानेका निश्चय किया। किसी पवित्र तिथिको (शुभ मुहूर्तमें) मंगलानुष्ठान, स्वस्तिवाचन आदि करके महातेजस्वी और पराक्रमी मयने हजारों श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको खीर खिलाकर तृप्त किया तथा उन्हें अनेक प्रकारका धन दान किया। इसके बाद उसने सभाभवन बनानेके लिये समस्त ऋतुओंके गुणोंसे सम्पन्न दिव्य रूपवाली मनोरम सब ओरसे दस हजार हाथकी (अर्थात् दस हजार हाथ चौड़ी और दस हजार हाथ लम्बी) धरती नपवायी ॥ १९—२१ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभास्थाननिर्णये प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभास्थाननिर्णयविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 1608)
द्वितीयोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी द्वारकायात्रा
वैशम्पायन उवाच
उषित्वा खाण्डवप्रस्थे सुखवासं जनार्दनः ।
पार्थैः प्रीतिसमायुक्तैः पूजनार्होऽभिपूजितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! परम पूजनीय भगवान् श्रीकृष्ण खाण्डवप्रस्थमें सुखपूर्वक रहकर प्रेमी पाण्डवोंके द्वारा नित्य पूजित होते रहे ॥ १ ॥
गमनाय मतिं चक्रे पितुर्दर्शनलालसः ।
धर्मराजमथामन्त्र्य पृथां च पृथुलोचनः ॥ २ ॥
तदनन्तर पिताके दर्शनके लिये उत्सुक होकर विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिर और कुन्तीकी आज्ञा लेकर वहाँसे द्वारका जानेका विचार किया ॥ २ ॥
ववन्दे चरणौ मूर्ध्ना जगद्वन्द्यः पितृष्वसुः ।
स तया मूर्युपाघ्रातः परिष्वक्तश्च केशवः ॥ ३ ॥
जगद्वन्द्य केशवने अपनी बुआ कुन्तीके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और कुन्तीने उनका मस्तक सूँघकर उन्हें हृदयसे लगा लिया ॥ ३ ॥
ददर्शानन्तरं कृष्णो भगिनीं स्वां महायशाः ।
तामुपेत्य हृषीकेशः प्रीत्या बाष्पसमन्वितः ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् महायशस्वी हृषीकेश अपनी बहिन सुभद्रासे मिले। उसके पास जानेपर स्नेहवश उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये ॥ ४ ॥
अर्थ्यं तथ्यं हितं वाक्यं लघु युक्तमनुत्तरम् ।
उवाच भगवान् भद्रां सुभद्रां भद्रभाषिणीम् ॥ ५ ॥
भगवान्ने मङ्गलमय वचन बोलनेवाली कल्याणमयी सुभद्रासे बहुत थोड़े, सत्य, प्रयोजनपूर्ण, हितकारी, युक्तियुक्त एवं अकाट्य वचनोंद्वारा अपने जानेकी आवश्यकता बतायी (और उसे ढाढ़स बँधाया) ॥ ५ ॥
तया स्वजनगामीनि श्रावितो वचनानि सः ।
सम्पूजितश्चाप्यसकृच्छिरसा चाभिवादितः ॥ ६ ॥
सुभद्राने बार-बार भाईकी पूजा करके मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और माता-पिता आदि स्वजनोंसे कहनेके लिये संदेश दिये ॥ ६ ॥
तामनुज्ञाय वार्ष्णेयः प्रतिनन्द्य च भामिनीम् ।
ददर्शानन्तरं कृष्णां धौम्यं चापि जनार्दनः ॥ ७ ॥
भामिनी सुभद्राको प्रसन्न करके उससे जानेकी अनुमति लेकर वृष्णिकुलभूषण जनार्दन द्रौपदी तथा धौम्यमुनिसे मिले ।। ७ ।। ववन्दे च यथान्यायं धौम्यं पुरुषसत्तमः । द्रौपदीं सान्त्वयित्वा च आमन्त्र्य च जनार्दनः ॥ ८ ॥ भ्रातृनभ्यगमद् विद्वान् पार्थेन सहितो बली । भ्रातृभिः पञ्चभिः कृष्णो वृतः शक्र इवामरैः ॥ ९ ॥ पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने यथोचित रीतिसे धौम्यजीको प्रणाम किया और द्रौपदीको सान्त्वना दे उसकी अनुमति लेकर वे अर्जुनके साथ अन्य भाइयोंके पास गये। पाँचों भाई पाण्डवोंसे घिरे हुए विद्वान् एवं बलवान् श्रीकृष्ण देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति सुशोभित हुए ॥ ८-९ ॥ यात्राकालस्य योग्यानि कर्माणि गरुडध्वजः । कर्तुकामः शुचिर्भूत्वा स्नातवान् समलंकृतः ॥ १० ॥ तदनन्तर गरुडध्वज श्रीकृष्णने यात्राकालोचित कर्म करनेके लिये पवित्र हो स्नान करके अलंकार धारण किया ॥ १० ॥ अर्चयामास देवांश्च द्विजांश्च यदुपुङ्गवः । माल्यजाप्यनमस्कारैर्गन्धैरुच्चावचैरपि ॥ ११ ॥ फिर उन यदुश्रेष्ठने प्रचुर पुष्प-माला, जप, नमस्कार और चन्दन आदि अनेक प्रकारके सुगन्धित पदार्थोंद्वारा देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजा की ॥ ११ ॥ स कृत्वा सर्वकार्याणि प्रतस्थे तस्थुषां वरः । उपेत्य स यदुश्रेष्ठो बाह्यकक्षाद् विनिर्गतः ॥ १२ ॥ प्रतिष्ठित पुरुषोंमें श्रेष्ठ यदुप्रवर श्रीकृष्ण यात्राकालोचित सब कार्य पूर्ण करके प्रस्थित हुए और भीतरसे चलकर बाहरी ड्योढ़ीको पार करते हुए राजभवनसे बाहर निकले ॥ १२ ॥ स्वस्तिवाच्यार्हतो विप्रान् दधिपात्रफलाक्षतैः । वसु प्रदाय च ततः प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ १३ ॥ उस समय सुयोग्य ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन किया और भगवान्ने दहीसे भरे पात्र, अक्षत, फल आदिके साथ उन ब्राह्मणोंको धन देकर उन सबकी परिक्रमा की ॥ १३ ॥ काञ्चनं रथमास्थाय तार्क्ष्यकेतनमाशुगम् । गदाचक्रासिशाङ्गैर्द्यायुधैरावृतं शुभम् ॥ १४ ॥ तिथावप्यथ नक्षत्रे मुहूर्ते च गुणान्विते । प्रययौ पुण्डरीकाक्षः शैब्यसुग्रीववाहनः ॥ १५ ॥ इसके बाद गरुडचिह्नित ध्वजासे सुशोभित और गदा, चक्र, खड्ग एवं शार्ङ्गधनुष आदि आयुधोंसे सम्पन्न शैब्य, सुग्रीव आदि घोड़ोंसे युक्त शुभ सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो
कमलनयन श्रीकृष्णने उत्तम तिथि, शुभ नक्षत्र एवं गुणयुक्त मुहूर्तमें यात्रा आरम्भ की॥ १४-१५॥
अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः।
अपास्य चास्य यन्तारं दारुकं यन्तृसत्तमम्॥ १६॥
उस समय श्रीकृष्णका रथ हाँकनेवाले सारथियोंमें श्रेष्ठ दारुकको हटाकर उसके स्थानमें राजा युधिष्ठिर प्रेमपूर्वक भगवान्के साथ रथपर जा बैठे॥ १६॥
अभीषून् सम्प्रजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा।
उपारुह्यार्जुनश्चापि चामरव्यजनं सितम्॥ १७॥
रुक्मदण्डं बृहद्बाहुर्विधुधाव प्रदक्षिणम्।
कुरुराज युधिष्ठिरने घोड़ोंकी बागडोर स्वयं अपने हाथमें ले ली। फिर महाबाहु अर्जुन भी रथपर बैठ गये और सुवर्णमय दण्डसे विभूषित श्वेत चँवर और व्यजन लेकर दाहिनी ओरसे उनके ऊपर डुलाने लगे॥ १७ १/२॥
तथैव भीमसेनोऽपि यमाभ्यां सहितो बली॥ १८॥
पृष्ठतोऽनुययौ कृष्णमृत्विक्पौरजनैः सह।
(छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम्।
वैडूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम्॥
दधार तरसा भीमश्छत्रं तच्छाङ्गिधन्वने।
उपारुह्य रथं शीघ्रं चामरव्यजने सिते ।।
नकुलः सहदेवश्च धूयमानौ जनार्दनम् ।)
स तथा भ्रातृभिः सर्वैः केशवः परवीरहा ।। १९ ।।
अन्वीयमानः शुशुभे शिष्यैरिव गुरुः प्रियैः ।
इसी प्रकार नकुल-सहदेवसहित बलवान् भीमसेन भी ऋत्विजों और पुरवासियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्होंने वेगपूर्वक आगे बढ़कर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर दिव्य मालाओंसे सुशोभित एवं सौ शलाकाओं (तिल्लियों)-से युक्त स्वर्णविभूषित छत्र लगाया। उस छत्रमें वैदूर्य-मणिका डंडा लगा हुआ था। नकुल और सहदेव भी शीघ्रतापूर्वक रथपर आरूढ़ हो श्वेत चँवर और व्यजन डुलाते हुए जनार्दनकी सेवा करने लगे। उस समय अपने समस्त फुफेरे भाइयोंसे संयुक्त शत्रुदमन केशव ऐसी शोभा पाने लगे, मानो अपने प्रिय शिष्योंके साथ गुरु यात्रा कर रहे हों ।। १८-१९½ ।।
पार्थमामन्त्र्य गोविन्दः परिष्वज्य सुपीडितम् ।। २० ।।
युधिष्ठिरं पूजयित्वा भीमसेनं यमौ तथा ।
परिष्वक्तो भृशं तैस्तु यमाभ्यामभिवादितः ।। २१ ।।
श्रीकृष्णके बिछोहसे अर्जुनको बड़ी व्यथा हो रही थी। गोविन्दने उन्हें हृदयसे लगाकर उनसे जानेकी अनुमति ली। फिर उन्होंने युधिष्ठिर और भीमसेनका चरणस्पर्श किया। युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनने भगवान्को छातीसे लगा लिया और नकुल-सहदेवने उनके चरणोंमें प्रणाम किया (तब भगवान्ने भी उन दोनोंको छातीसे लगा लिया) ।। २०-२१ ।।
योजनार्धमथो गत्वा कृष्णः परपुरंजयः ।
युधिष्ठिरं समामन्त्र्य निवर्तस्वेति भारत ।। २२ ।।
भारत! शत्रुविजयी श्रीकृष्णने दो कोस दूर चले जानेपर युधिष्ठिरसे जानेकी अनुमति ले यह अनुरोध किया कि ‘अब आप लौट जाइये’ ।। २२ ।।
ततोऽभिवाद्य गोविन्दः पादौ जग्राह धर्मवित् ।
उत्थाप्य धर्मराजस्तु मूर्त्युपाघ्राय केशवम् ।। २३ ।।
पाण्डवो यादवश्रेष्ठं कृष्णं कमलोचनम् ।
गम्यतामित्यनुज्ञाप्य धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। २४ ।।
तदनन्तर धर्मज्ञ गोविन्दने प्रणाम करके युधिष्ठिरके पैर पकड़ लिये। फिर पाण्डुकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने यादवश्रेष्ठ कमलनयन केशवको दोनों हाथोंसे उठाकर उनका मस्तक सूँघा और ‘जाओ’ कहकर उन्हें जानेकी आज्ञा दी ।। २३-२४ ।।
ततस्तैः संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदनः ।
निवर्त्य च तथा कृच्छ्रात् पाण्डवान् सपदानुगान् ।। २५ ।।
स्वां पुरीं प्रययौ हृष्टो यथा शक्रोऽमरावतीम् ।
लोचनैरनुजग्मुस्ते तमादृष्टिपथात् तदा ॥ २६ ॥ तत्पश्चात् उनके साथ पुनः आनेका निश्चित वादा करके भगवान् मधुसूदनने पैदल आये हुए नागरिकों-सहित पाण्डवोंको बड़ी कठिनाईसे लौटाया और प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुरी द्वारकाको गये, मानो इन्द्र अमरावतीको जा रहे हों। जबतक वे दिखायी दिये, तबतक पाण्डव अपने नेत्रोंद्वारा उनका अनुसरण करते रहे ॥ २५-२६ ॥ मनोभिरनुजग्मुस्ते कृष्णं प्रीतिसमन्वयात् । अतृप्तमनसामेव तेषां केशवदर्शने ॥ २७ ॥ क्षिप्रमन्तर्दधे शौरिश्चक्षुषां प्रियदर्शनः । अकामा एव पार्थास्ते गोविन्दगतमानसाः ॥ २८ ॥ अत्यन्त प्रेमके कारण उनका मन श्रीकृष्णके साथ ही चला गया। अभी केशवके दर्शनसे पाण्डवोंका मन तृप्त नहीं हुआ था, तभी नयनाभिराम भगवान् श्रीकृष्ण सहसा अदृश्य हो गये। पाण्डवोंकी श्रीकृष्णदर्शनविषयक कामना अधूरी ही रह गयी। उन सबका मन भगवान् गोविन्दके साथ ही चला गया ॥ २७-२८ ॥ निवृत्योपययुस्तूर्णं स्वं पुरं पुरुषर्षभाः । स्यन्दनेनाथ कृष्णोऽपि त्वरितं द्वारकामगात् ॥ २९ ॥ अब वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव मार्गसे लौटकर तुरंत अपने नगरकी ओर चल पड़े। उधर श्रीकृष्ण भी रथके द्वारा शीघ्र ही द्वारका जा पहुँचे ॥ २९ ॥ सात्वतेन च वीरेण पृष्ठतो यायिना तदा । दारुकेण च सूतेन सहितो देवकीसुतः । स गतो द्वारकां विष्णुर्गरुत्मवानिव वेगवान् ॥ ३० ॥ सात्वतवंशी वीर सात्यकि भगवान् श्रीकृष्णके पीछे बैठकर यात्रा कर रहे थे और सारथि दारुक आगे था। उन दोनोंके साथ देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण वेगशाली गरुड़की भाँति द्वारकामें पहुँच गये ॥ ३० ॥
वैशम्पायन उवाच
निवृत्य धर्मराजस्तु सह भ्रातृभिरच्युतः । सुहृत्परिवृतो राजा प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ ३१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर भाइयों-सहित मार्गसे लौटकर सुहृदोंके साथ अपने श्रेष्ठ नगरके भीतर प्रविष्ट हुए ॥ ३१ ॥ विसृज्य सुहृदः सर्वान् भ्रातृन् पुत्रांश्च धर्मराट् । मुमोद पुरुषव्याघ्रो द्रौपद्या सहितो नृप ॥ ३२ ॥
राजन्! वहाँ पुरुषसिंह धर्मराजने समस्त सुहृदों, भाइयों और पुत्रोंको विदा करके राजमहलमें द्रौपदीके साथ बैठकर प्रसन्नताका अनुभव किया ॥ ३२ ॥
केशवोऽपि मुदा युक्तः प्रविवेश पुरोत्तमम् ।
पूज्यमानो यदुश्रेष्ठैरुग्रसेनमुखैस्तथा ॥ ३३ ॥
इधर भगवान् केशव भी उग्रसेन आदि श्रेष्ठ यादवोंसे सम्मानित हो प्रसन्नतापूर्वक द्वारकापुरीके भीतर गये ॥ ३३ ॥
आहुकं पितरं वृद्धं मातरं च यशस्विनीम् ।
अभिवाद्य बलं चैव स्थितः कमललोचनः ॥ ३४ ॥
कमलनयन श्रीकृष्णने राजा उग्रसेन, बूढ़े पिता वसुदेव और यशस्विनी माता देवकीको प्रणाम करके बलरामजीके चरणोंमें मस्तक झुकाया ॥ ३४ ॥
प्रद्युम्नसाम्बनिशठांश्चारुदेष्णं गदं तथा ।
अनिरुद्धं च भानुं च परिष्वज्य जनार्दनः ॥ ३५ ॥
स वृद्धैरभ्यनुज्ञातो रुक्मिण्या भवनं ययौ ।
तत्पश्चात् जनार्दनने प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, चारुदेष्ण, गद, अनिरुद्ध तथा भानु आदिको स्नेहपूर्वक हृदयसे लगाया और बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञा लेकर रुक्मिणीजीके महलमें प्रवेश किया ॥ ३५ १/२ ॥
मयोऽपि स महाभागः सर्वरत्नविभूषिताम् ।
विधिवत् कल्पयामास सभां धर्मसुताय वै ॥ ३६ ॥
इधर महाभाग मयने भी धर्मपुत्र युधिष्ठिरके लिये विधिपूर्वक सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित सभामण्डप बनानेकी मन-ही-मन कल्पना की ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि भगवद्याने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें भगवान् श्रीकृष्णकी द्वारकायात्राविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1614)
तृतीयोऽध्यायः
मयासुरका भीमसेन और अर्जुनको गदा और शंख लाकर देना तथा उसके द्वारा अद्भुत सभाका निर्माण
वैशम्पायन उवाच
अथाब्रवीन्मयः पार्थमर्जुनं जयतां वरम् ।
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि पुनरेष्यामि चाप्यहम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर मयासुरने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनसे कहा—‘भारत! मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ। मैं एक जगह जाऊँगा और फिर शीघ्र ही लौट आऊँगा ॥ १ ॥
(विश्रुतां त्रिषु लोकेषु पार्थ दिव्यां सभां तव ।
प्राणिनां विस्मयकरीं तव प्रीतिविवर्धिनीम् ।
पाण्डवानां च सर्वेषां करिष्यामि धनंजय ॥)
‘कुन्तीकुमार धनंजय! मैं आपके लिये तीनों लोकोंमें विख्यात एक दिव्य सभाभवनका निर्माण करूँगा। जो समस्त प्राणियोंको आश्चर्यमें डालनेवाली तथा आपके साथ ही समस्त पाण्डवोंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाली होगी।
उत्तरेण तु कैलासं मैनाकं पर्वत प्रति ।
यियक्षमाणेषु पुरा दानवेषु मया कृतम् ॥ २ ॥
चित्रं मणिमयं भाण्डं रम्यं बिन्दुसरः प्रति ।
सभायां सत्यसंधस्य यदासीद् वृषपर्वणः ॥ ३ ॥
‘पूर्वकालमें जब दैत्यलोग कैलास पर्वतसे उत्तर दिशामें स्थित मैनाक पर्वतपर यज्ञ करना चाहते थे, उस समय मैंने एक विचित्र एवं रमणीय मणिमय भाण्ड तैयार किया था, जो बिन्दुसरके समीप सत्यप्रतिज्ञ राजा वृषपर्वाकी सभामें रखा गया था ॥ २-३ ॥
आगमिष्यामि तद् गृह्य यदि तिष्ठति भारत ।
ततः सभां करिष्यामि पाण्डवस्य यशस्विनीम् ॥ ४ ॥
‘भारत! यदि वह अबतक वहीं होगा तो उसे लेकर पुनः लौट आऊँगा। फिर उसीसे पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यशको बढ़ानेवाली सभा तैयार करूँगा ॥ ४ ॥
मनःप्रह्लादिनीं चित्रां सर्वरत्नविभूषिताम् ।
अस्ति बिन्दुसरस्युग्रा गदा च कुरुनन्दन ॥ ५ ॥
‘जो सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित, विचित्र एवं मनको आह्लाद प्रदान करनेवाली होगी। कुरुनन्दन! बिन्दुसरमें एक भयंकर गदा भी है ॥ ५ ॥
निहिता भावयाम्येवं राज्ञा हत्वा रणे रिपून् । सुवर्णबिन्दुभिश्चित्रा गुर्वी भारसहा दृढा ॥ ६ ॥ 'मैं समझता हूँ, राजा वृषपर्वाने युद्धमें शत्रुओंका संहार करके वह गदा वहीं रख दी थी। वह गदा बड़ी भारी है, विशेष भार या आघात सहन करनेमें समर्थ एवं सुदृढ़ है। उसमें सोनेकी फूलियाँ लगी हुई हैं, जिनसे वह बड़ी विचित्र दिखायी देती है ॥ ६ ॥ सा वै शतसहस्रस्य सम्मिता शत्रुघातिनी । अनुरूपा च भीमस्य गाण्डीवं भवतो यथा ॥ ७ ॥ 'शत्रुओंका संहार करनेवाली वह गदा अकेली ही एक लाख गदाओंके बराबर है। जैसे गाण्डीव धनुष आपके योग्य है, वैसे ही वह गदा भीमसेनके योग्य होगी ॥ ७ ॥ वारुणश्च महाशङ्खो देवदत्तः सुघोषवान् । सर्वमेतत् प्रदास्यामि भवते नात्र संशयः ॥ ८ ॥ 'वहाँ वरुणदेवका देवदत्त नामक महान् शंख भी है, जो बड़ी भारी आवाज करनेवाला है। ये सब वस्तुएँ लाकर मैं आपको भेंट करूँगा, इसमें संशय नहीं है' ॥ ८ ॥ इत्युक्त्वा सोऽसुरः पार्थ प्रागुदीचीं दिशं गतः । अथोत्तरेण कैलासान्मैनाकं पर्वत प्रति ॥ ९ ॥ अर्जुनसे ऐसा कहकर मयासुर पूर्वोत्तर दिशा (ईशानकोण)-में कैलाससे उत्तर मैनाक पर्वतके पास गया ॥ ९ ॥ हिरण्यशृङ्गः सुमहान् महामणिमयो गिरिः । रम्यं बिन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथः ॥ १० ॥ द्रष्टुं भागीरथीं गङ्गामुवास बहुलाः समाः । 'वहीं हिरण्यशृंग नामक महामणिमय विशाल पर्वत है, जहाँ रमणीय बिन्दुसर नामक तीर्थ है। वहीं राजा भगीरथने भागीरथी गंगाका दर्शन करनेके लिये बहुत वर्षोंतक (तपस्या करते हुए) निवास किया था ॥ १० १/२ ॥ यत्रेष्टं सर्वभूतानामीश्वरेण महात्मना ॥ ११ ॥ आहृताः क्रतवो मुख्याः शतं भरतसत्तम । यत्र यूपा मणिमयाश्चैत्याश्चापि हिरण्मयाः ॥ १२ ॥ भरतश्रेष्ठ! वहीं सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी महात्मा प्रजापतिने मुख्य-मुख्य सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, जिनमें सोनेकी वेदियाँ और मणियोंके खंभे बने थे ॥ ११-१२ ॥ शोभार्थं विहितास्तत्र न तु दृष्टान्ततः कृताः । अत्रेष्ट्वा स गतः सिद्धिं सहस्राक्षः शचीपतिः ॥ १३ ॥ यह सब शोभाके लिये बनाया गया था, शास्त्रीय विधि अथवा सिद्धान्तके अनुसार नहीं। सहस्र नेत्रोंवाले शचीपति इन्द्रने भी वहीं यज्ञ करके सिद्धि प्राप्त की थी ॥ १३ ॥ यत्र भूतपतिः सृष्ट्वा सर्वान् लोकान् सनातनः ।
उपास्यते तिग्मतेजाः स्थितो भूतैः सहस्रशः ॥ १४ ॥ सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और समस्त प्राणियोंके अधिपति उग्रतेजस्वी सनातन देवता महादेवजी वहीं रहकर सहस्रों भूतोंसे सेवित होते हैं ॥ १४ ॥ नरनारायणौ ब्रह्मा यमः स्थाणुश्च पञ्चमः । उपासते यत्र सत्रं सहस्रयुगपर्यये ॥ १५ ॥ एक हजार युग बीतनेपर वहीं नर-नारायण ऋषि, ब्रह्मा, यमराज और पाँचवें महादेवजी यज्ञका अनुष्ठान करते हैं ॥ १५ ॥ यत्रेष्टं वासुदेवेन सत्रैर्वर्षगणान् बहून् । श्रद्दधानेन सततं धर्मसम्प्रतिपत्तये ॥ १६ ॥ यह वही स्थान है, जहाँ भगवान् वासुदेवने धर्मपरम्पराकी रक्षाके लिये बहुत वर्षोंतक निरंतर श्रद्धापूर्वक यज्ञ किया था ॥ १६ ॥ सुवर्णमालिनो यूपाश्चैत्याश्चाप्यतिभास्वराः । ददौ यत्र सहस्राणि प्रयुतानि च केशवः ॥ १७ ॥ उस यज्ञमें स्वर्णमालाओंसे मण्डित खंभे और अत्यन्त चमकीली वेदियाँ बनी थीं। भगवान् केशवने उस यज्ञमें सहस्रों-लाखों वस्तुएँ दानमें दी थीं ॥ १७ ॥ तत्र गत्वा स जग्राह गदां शङ्खं च भारत । स्फाटिकं च सभाद्रव्यं यदासीद् वृषपर्वणः ॥ १८ ॥ भारत! तदनन्तर मयासुरने वहाँ जाकर वह गदा, शंख और सभाभवन बनानेके लिये स्फटिक मणिमय द्रव्य ले लिया, जो पहले वृषपर्वाके अधिकारमें था ॥ १८ ॥ किंकरैः सह रक्षोभिर्यदरक्षन्महद् धनम् । तद्गृह्णान्मयस्तत्र गत्वा सर्वं महासुरः ॥ १९ ॥ बहुत-से किंकर तथा राक्षस जिस महान् धनकी रक्षा करते थे, वहाँ जाकर महान् असुर मयने वह सब ले लिया ॥ १९ ॥ तदाहृत्य च तां चक्रे सोऽसुरोऽप्रतिमां सभाम् । विश्रुतां त्रिषु लोकेषु दिव्यां मणिमयीं शुभाम् ॥ २० ॥ वे सब वस्तुएँ लाकर उस असुरने वह अनुपम सभाभवन तैयार की, जो तीनों लोकोंमें विख्यात, दिव्य, मणिमयी और शुभ एवं सुन्दर थी ॥ २० ॥ गदां च भीमसेनाय प्रवरां प्रददौ तदा । देवदत्तं चार्जुनाय शङ्खप्रवरमुत्तमम् ॥ २१ ॥ उसने उस समय वह श्रेष्ठ गदा भीमसेनको और देवदत्त नामक उत्तम शंख अर्जुनको भेंट कर दिया ॥ २१ ॥ यस्य शङ्खस्य नादेन भूतानि प्रचकम्पिरे । सभा च सा महाराज शातकुम्भमयद्रुमा ॥ २२ ॥
उस शंखकी आवाज सुनकर समस्त प्राणी काँप उठते थे। महाराज! उस सभामें सुवर्णमय वृक्ष शोभा पाते थे ॥ २२ ॥
दशकिष्कुसहस्राणि समन्तादायताभवत् ।
यथा वह्नेर्यथार्कस्य सोमस्य च यथा सभा ॥ २३ ॥
भ्राजमाना तथात्यर्थं दधार परमं वपुः ।
वह सब ओरसे दस हजार हाथ विस्तृत थी (अर्थात् उसकी लंबाई और चौड़ाई भी दस-दस हजार हाथ थी)। जैसे अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाकी सभाभवन प्रकाशित होती है, उसी प्रकार अत्यन्त उद्भासित होनेवाली उस सभाने बड़ा मनोहर रूप धारण किया ॥ २३ १/२ ॥
अभिघ्नतीव प्रभया प्रभामर्कस्य भास्वराम् ॥ २४ ॥
वह अपनी प्रभाद्वारा सूर्यदेवकी तेजोमयी प्रभासे टक्कर लेती थी ॥ २४ ॥
प्रबभौ ज्वलमानेव दिव्या दिव्येन वर्चसा ।
नवमेघप्रतीकाशा दिवमावृत्य विष्ठिता ।
आयता विपुला रम्या विपाप्मा विगतक्लमा ॥ २५ ॥
वह दिव्य सभाभवन अपने अलौकिक तेजसे निरंतर प्रदीप्त-सी जान पड़ती थी। उसकी ऊँचाई इतनी अधिक थी कि नूतन मेघोंकी घटाके समान वह आकाशको घेरकर खड़ी थी। उसका विस्तार भी बहुत था। वह रमणीय सभाभवन पाप-तापका नाश करनेवाली थी ॥ २५ ॥
उत्तमद्रव्यसम्पन्ना रत्नप्राकारतोरणा ।
बहुचित्रा बहुधना सुकृता विश्वकर्मणा ॥ २६ ॥
उत्तमोत्तम द्रव्योंसे उसका निर्माण किया गया था। उसके परकोटे और फाटक रत्नोंसे बने हुए थे। उसमें अनेक प्रकारके अद्भुत चित्र अंकित थे। वह बहुत धनसे पूर्ण थी। दानवोंके विश्वकर्मा मयासुरने उस सभाभवनको बहुत सुन्दरतासे बनाया था ॥ २६ ॥
न दाशार्ही सुधर्मा वा ब्रह्मणो वाथ तादृशी ।
सभा रूपेण सम्पन्ना यां चक्रे मतिमान् मयः ॥ २७ ॥
बुद्धिमान् मयने जिस सभाका निर्माण किया था, उसके समान सुन्दर यादवोंकी सुधर्मा सभा अथवा ब्रह्माजीकी सभा भी नहीं थी ॥ २७ ॥
तां स्म तत्र मयेनोक्ता रक्षन्ति च वहन्ति च ।
सभाष्टौ सहस्राणि किंकरा नाम राक्षसाः ॥ २८ ॥
मयासुरकी आज्ञाके अनुसार आठ हजार किंकर नामक राक्षस उस सभाकी रक्षा करते और उसे एक स्थानसे दूसरे स्थानपर उठाकर ले जाते थे ॥ २८ ॥
अन्तरिक्षचरा घोरा महाकाया महाबलाः ।
रक्ताक्षाः पिङ्गलाक्षाश्च शुक्तिकर्णाः प्रहारिणः ॥ २९ ॥
वे राक्षस भयंकर आकृतिवाले, आकाशमें विचरने-वाले, विशालकाय और महाबली थे। उनकी आँखें लाल और पिंगलवर्णकी थीं तथा कान सीपीके समान जान पड़ते थे। वे सब-के-सब प्रहार करनेमें कुशल थे॥ २९॥
तस्यां सभायां नलिनीं चकाराप्रतिमां मयः।
वैदूर्यपत्रविततां मणिनालमयाम्बुजाम्॥ ३०॥
मयासुरने उस सभाभवनके भीतर एक बड़ी सुन्दर पुष्करिणी बना रखी थी, जिसकी कहीं तुलना नहीं थी। उसमें इन्द्रनीलमणिमय कमलके पत्ते फैले हुए थे। उन कमलोंके मृणाल मणियोंके बने थे॥ ३०॥
पद्मसौगन्धिकवतीं नानाद्विजगणायुताम्।
पुष्पितैः पङ्कजैश्चित्रां कूर्मैर्मत्स्यैश्च काञ्चनैः।
चित्रस्फटिकसोपानां निष्पङ्कसलिलां शुभाम्॥ ३१॥
उसमें पद्मरागमणिमय कमलोंकी मनोहर सुगंध छा रही थी। अनेक प्रकारके पक्षी उसमें रहते थे। खिले हुए कमलों और सुनहली मछलियों तथा कछुओंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उस पोखरीमें उतरनेके लिये स्फटिकमणिकी विचित्र सीढ़ियाँ बनी थीं। उसमें पंकरहित स्वच्छ जल भरा हुआ था। वह देखनेमें बड़ी सुन्दर थी॥ ३१॥
मन्दानिलसमुद्धूतां मुक्ताबिन्दुभिराचिताम्।
महामणिशिलापट्टबद्धपर्यन्तवेदिकाम्॥ ३२॥
मन्द वायुसे उद्वेलित हो जब जलकी बूँदें उछलकर कमलके पत्तोंपर बिखर जाती थीं, उस समय वह सारी पुष्करिणी मौक्तिकबिन्दुओंसे व्याप्त जान पड़ती थी। उसके चारों ओरके घाटोंपर बड़ी-बड़ी मणियोंकी चौकोर शिलाखण्डोंसे पक्की वेदियाँ बनायी गयी थीं ॥ ३२ ॥
मणिरत्नचितां तां तु केचिदभ्येत्य पार्थिवाः ।
दृष्ट्वापि नाभ्यजानन्त तेऽज्ञानात् प्रपतन्त्युत ॥ ३३ ॥
मणियों तथा रत्नोंसे व्याप्त होनेके कारण कुछ राजालोग उस पुष्करिणीके पास आकर और उसे देखकर भी उसकी यथार्थतापर विश्वास नहीं करते थे और भ्रमसे उसे स्थल समझकर उसमें गिर पड़ते थे ॥ ३३ ॥
तां सभामभितो नित्यं पुष्पवन्तो महाद्रुमाः ।
आसन् नानाविधा लोलाः शीतच्छाया मनोरमाः ॥ ३४ ॥
उस सभाभवनके सब ओर अनेक प्रकारके बड़े-बड़े वृक्ष लहलहा रहे थे, जो सदा फूलोंसे भरे रहते थे। उनकी छाया बड़ी शीतल थी। वे मनोरम वृक्ष सदा हवाके झोंकोंसे हिलते रहते थे ॥ ३४ ॥
काननानि सुगन्धीनि पुष्करिण्यश्च सर्वशः ।
हंसकारण्डवोपताश्चक्रवाकोपशोभिताः ॥ ३५ ॥
केवल वृक्ष ही नहीं; उस भवनके चारों ओर अनेक सुगन्धित वन, उपवन और बावलियाँ भी थीं, जो हंस, कारण्डव तथा चक्रवाक आदि पक्षियोंसे युक्त होनेके कारण बड़ी शोभा पा रही थीं ॥ ३५ ॥
जलजानां च पद्मानां स्थलजानां च सर्वशः ।
मारुतो गन्धमादाय पाण्डवान् स्म निषेवते ॥ ३६ ॥
वहाँ जल और स्थलमें होनेवाले कमलोंकी सुगन्ध लेकर वायु सदा पाण्डवोंकी सेवा किया करती थी ॥ ३६ ॥
ईदृशीं तां सभां कृत्वा मासैः परिचतुर्दशैः ।
निष्ठितां धर्मराजाय मयो राजन् न्यवेदयत् ॥ ३७ ॥
मयासुरने पूरे चौदह महीनोंमें इस प्रकारकी उस अद्भुत सभाभवनका निर्माण किया था। राजन्! जब वह बनकर तैयार हो गयी, तब उसने धर्मराजको इस बातकी सूचना दी ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभानिर्माणे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभानिर्माणविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३८ १/३ श्लोक हैं)
मयद्वारा निर्मित सभाभवनमें धर्मराज युधिष्ठिरका प्रवेश तथा सभामें स्थित महर्षियों और राजाओं आदिका वर्णन
चतुर्थोऽध्यायः
मयद्वारा निर्मित सभाभवनमें धर्मराज युधिष्ठिरका प्रवेश तथा सभामें स्थित महर्षियों और राजाओं आदिका वर्णन
(वैशम्पायन उवाच
तां तु कृत्वा सभां श्रेष्ठां मयश्चार्जुनमब्रवीत् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उस श्रेष्ठ सभाभवनका निर्माण करके मयासुरने अर्जुनसे कहा।
मय उवाच
एषा सभा सव्यसाचिन् ध्वजो ह्यत्र भविष्यति ।।
मयासुर बोला— सव्यसाचिन्! यह है आपकी सभा, इसमें एक ध्वजा होगी।
भूतानां च महावीर्यो ध्वजाग्रे किङ्करो गणः ।
तव विस्फारघोषेण मेघवन्निनादिष्यति ।।
उसके अग्रभागमें भूतोंका महापराक्रमी किंकर नामक गण निवास करेगा। जिस समय तुम्हारे धनुषकी टंकारध्वनि होगी, उस समय उस ध्वनिके साथ ये भूत भी मेघोंके समान गर्जना करेंगे।
अयं हि सूर्यसंकाशो ज्वलनस्य रथोत्तमः ।
इमे च दिविजाः श्वेता वीर्यवन्तो हयोत्तमाः ।।
मायामयः कृतो ह्येष ध्वजो वानरलक्षणः ।
असज्जमानो वृक्षेषु धूमकेतुरिवोच्छ्रितः ।।
यह जो सूर्यके समान तेजस्वी अग्निदेवका उत्तम रथ है और ये जो श्वेत वर्णवाले दिव्य एवं बलवान् अश्वरत्न हैं तथा यह जो वानरचिह्नसे उपलक्षित ध्वज है, इन सबका निर्माण मायासे ही हुआ है। यह ध्वज वृक्षोंमें कहीं अटकता नहीं है तथा अग्निकी लपटोंके समान सदा ऊपरकी ओर ही उठा रहता है।
बहुवर्णं हि लक्ष्येत ध्वजं वानरलक्षणम् ।
ध्वजोत्कटं ह्यनवं युद्धे द्रक्ष्यसि विष्ठितम् ।।
आपका यह वानरचिह्नित ध्वज अनेक रंगका दिखायी देता है। आप युद्धमें इस उत्कट एवं स्थिर ध्वजको कभी झुकता नहीं देखेंगे।
इत्युक्त्वाऽऽलिङ्ग्य बीभत्सुं विसृष्टः प्रययौ मयः ।)
ऐसा कहकर मयासुरने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उनसे विदा लेकर (अभीष्ट स्थानको) चला गया।
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रवेशं तस्यां चक्रे राजा युधिष्ठिरः । अयुतं भोजयित्वा तु ब्राह्मणानां नराधिपः ॥ १ ॥ साज्येन पायसेनैव मधुना मिश्रितेन च । कृसरेणाथ जीवन्त्या हविष्येण च सर्वशः ॥ २ ॥ भक्ष्यप्रकारैर्विविधैः फलैश्चापि तथा नृप । चोष्यैश्च विविधै राजन् पेयैश्च बहुविस्तरैः ॥ ३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने घी और मधु मिलायी हुई खीर, खिचड़ी, जीवन्तिकाके साग, सब प्रकारके हविष्य, भाँति-भाँतिके भक्ष्य तथा फल, ईख आदि नाना प्रकारके चोष्य और बहुत अधिक पेय (शर्बत) आदि सामग्रियों-द्वारा दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उस सभा-भवनमें प्रवेश किया ॥ १—३ ॥
अहतैश्चैव वासोभिर्माल्यैरुच्चावचैरपि । तर्पयामास विप्रेन्द्रान् नानादिग्भ्यः समागतान् ॥ ४ ॥ उन्होंने नये-नये वस्त्र और छोटे-बड़े अनेक प्रकारके हार आदिके उपहार देकर अनेक दिशाओंसे आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त किया ॥ ४ ॥
ददौ तेभ्यः सहस्राणि गवां प्रत्येकशः पुनः । पुण्याहघोषस्तत्रासीद् दिवस्पृगिव भारत ॥ ५ ॥ भारत! तत्पश्चात् उन्होंने प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक हजार गौएँ दीं। उस समय वहाँ ब्राह्मणोंके पुण्याह-वाचनका गम्भीर घोष मानो स्वर्गलोकतक गूँज उठा ॥ ५ ॥
वादित्रैर्विविधैर्दिव्यैर्गन्धैरुच्चावचैरपि । पूजयित्वा कुरुश्रेष्ठो दैवतानि निवेश्य च ॥ ६ ॥ कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने अनेक प्रकारके बाजे तथा भाँति-भाँतिके दिव्य सुगन्धित पदार्थोंद्वारा उस भवनमें देवताओंकी स्थापना एवं पूजा की। इसके बाद वे उस भवनमें प्रविष्ट हुए ॥ ६ ॥
तत्र मल्ला नटा झल्लाः सूता वैतालिकास्तथा । उपतस्थुर्महात्मानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ७ ॥ वहाँ धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिरकी सेवामें कितने ही मल्ल (बाहुयुद्ध करनेवाले), नट, झल्ल (लकुटियोंसे युद्ध करनेवाले), सूत और वैतालिक उपस्थित हुए ॥ ७ ॥
तथा स कृत्वा पूजां तां भ्रातृभिः सह पाण्डवः । तस्यां सभायां रम्यायां रेमे शक्रो यथा दिवि ॥ ८ ॥ इस प्रकार पूजनका कार्य सम्पन्न करके भाइयोंसहित पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर स्वर्गमें इन्द्रकी भाँति उस रमणीय सभामें आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ ८ ॥
सभायामृषयस्तस्यां पाण्डवैः सह आसते ।
आसांचक्रुरनरिन्द्राश्च नानादेशसमागताः ॥ ९ ॥
उस सभामें ऋषि तथा विभिन्न देशोंसे आये हुए नरेश पाण्डवोंके साथ बैठा करते थे ॥ ९ ॥
असितो देवलः सत्यः सर्पिर्माली महाशिराः ।
अर्वावसुः सुमित्रश्च मैत्रेयः शुनको बलिः ॥ १० ॥
बको दाल्भ्यः स्थूलशिराः कृष्णद्वैपायनः शुकः ।
सुमन्तुर्जैमिनिः पैलो व्यासशिष्यास्तथा वयम् ॥ ११ ॥
तित्तिरिर्याज्ञवल्क्यश्च ससुतो लोमहर्षणः ।
अप्सुहोम्यश्च धौम्यश्च अणीमाण्डव्यकौशिकौ ॥ १२ ॥
दामोष्णीषस्त्रैबलिश्च पर्णादो घटजानुकः ।
मौञ्जायनो वायुभक्षः पाराशर्यश्च सारिकः ॥ १३ ॥
बलिवाकः सिनीवाकः सत्यपालः कृतश्रमः ।
जातूकणः शिखावांश्च आलम्बः पारिजातकः ॥ १४ ॥
पर्वतश्च महाभागो मार्कण्डेयो महामुनिः ।
पवित्रपाणिः सावर्णो भालुकिर्गालवस्तथा ॥ १५ ॥
जङ्घाबन्धुश्च रैभ्यश्च कोपवेगस्तथा भृगुः ।
हरिबभ्रुश्च कौण्डिन्यो बभ्रुमाली सनातनः ॥ १६ ॥
काक्षीवानौशिजश्चैव नाचिकेतोऽथ गौतमः ।
पैङ्ग्यो वराहः शुनकः शाण्डिल्यश्च महातपाः ॥ १७ ॥
कुक्कुरो वेणुजङ्घोऽथ कालापः कठ एव च ।
मुनयो धर्मविद्वांसो धृतात्मानो जितेन्द्रियाः ॥ १८ ॥
असित, देवल, सत्य, सर्पिर्माली, महाशिरा, अर्वावसु, सुमित्र, मैत्रेय, शुनक, बलि, बक, दाल्भ्य, स्थूलशिरा, कृष्णद्वैपायन, शुकदेव, व्यासजीके शिष्य सुमन्तु, जैमिनि, पैल तथा हमलोग, तित्तिरि, याज्ञवल्क्य, पुत्रसहित लोमहर्षण, अप्सुहोम्य, धौम्य, अणीमाण्डव्य, कौशिक, दामोष्णीष, त्रैबलि, पर्णाद, घटजानुक, मौंजायन, वायुभक्ष, पाराशर्य, सारिक, बलिवाक, सिनीवाक, सत्यपाल, कृतश्रम, जातूकर्ण, शिखावान्, आलम्ब, पारिजातक, महाभाग पर्वत, महामुनि मार्कण्डेय, पवित्रपाणि, सावर्ण, भालुकि, गालव, जंघाबन्धु, रैभ्य, कोपवेग, भृगु, हरिबभ्रु, कौण्डिन्य, बभ्रुमाली, सनातन, काक्षीवान्, औशिज, नाचिकेत, गौतम, पैंग्य, वराह, शुनक (द्वितीय), महातपस्वी शाण्डिल्य, कुक्कुर, वेणुजंघ, कालाप तथा कठ आदि धर्मज्ञ, जितात्मा और जितेन्द्रिय मुनि उस सभामें विराजते थे ॥ १०—१८ ॥
एते चान्ये च बहवो वेदवेदाङ्गपारगाः ।
उपासते महात्मानं सभायामृषिसत्तमाः ॥ १९ ॥
ये तथा और भी वेद-वेदांगोंके पारंगत बहुत-से मुनिश्रेष्ठ उस सभामें महात्मा युधिष्ठिरके पास बैठा करते थे ॥ १९ ॥ कथयन्तः कथाः पुण्या धर्मज्ञाः शुचयोऽमलाः । तथैव क्षत्रियश्रेष्ठा धर्मराजमुपासते ॥ २० ॥ वे धर्मज्ञ, पवित्रात्मा और निर्मल महर्षि राजा युधिष्ठिरको पवित्र कथाएँ सुनाया करते थे। इसी प्रकार क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ नरेश भी वहाँ धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते थे ॥ २० ॥ श्रीमान् महात्मा धर्मात्मा मुञ्जकेतुर्विवर्धनः । संग्रामजिद् दुर्मुखश्च उग्रसेनश्च वीर्यवान् ॥ २१ ॥ कक्षसेनः क्षितिपतिः क्षेमकश्चापराजितः । कम्बोजराजः कमठः कम्पनश्च महाबलः ॥ २२ ॥ सततं कम्पयामास यवनानेक एव यः । बलपौरुषसम्पन्नान् कृतास्त्रानमितौजसः । यथासुरान् कालकेयान् देवो वज्रधरस्तथा ॥ २३ ॥ श्रीमान् महामना धर्मात्मा मुंजकेतु, विवर्धन, संग्रामजित्, दुर्मुख, पराक्रमी उग्रसेन, राजा कक्षसेन, अपराजित क्षेमक, कम्बोजराज कमठ और महाबली कम्पन, जो अकेले ही बल-पौरुषसम्पन्न, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा अमिततेजस्वी यवनोंको सदा उसी प्रकार कँपाते रहते थे, जैसे वज्रधारी इन्द्रने कालकेय नामक असुरोंको कम्पित किया था। (ये सभी नरेश धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते रहते थे) ॥ २१—२३ ॥ जटासुरो मद्रकाणां च राजा कुन्तिः पुलिन्दश्च किरातराजः । तथाऽऽङ्गवाङ्गौ सह पुण्ड्रकेण पाण्ड्योड्रराजौ च सहान्ध्रकेण ॥ २४ ॥ अङ्गो वङ्गः सुमित्रश्च शैब्यश्चामित्रकर्शनः । किरातराजः सुमना यवनाधिपतिस्तथा ॥ २५ ॥ चाणूरो देवरातश्च भोजो भीमरथश्च यः । श्रुतायुधश्च कालिङ्गो जयसेनश्च मागधः ॥ २६ ॥ सुकर्मा चेकितानश्च पुरुश्चामित्रकर्शनः । केतुमान् वसुदानश्च वैदेहोऽथ कृतक्षणः ॥ २७ ॥ सुधर्मा चानिरुद्धश्च श्रुतायुश्च महाबलः । अनूपराजो दुर्धर्षः क्रमजिच्च सुदर्शनः ॥ २८ ॥ शिशुपालः सहसुतः करूषाधिपतिस्तथा । वृष्णीनां चैव दुर्धर्षाः कुमारा देवरूपिणः ॥ २९ ॥
आहुको विपृथुश्चैव गदः सारण एव च । अक्रूरः कृतवर्मा च सत्यकश्च शिनेः सुतः ॥ ३० ॥ भीष्मकोऽथाकृतिश्चैव द्युमत्सेनश्च वीर्यवान् । केकयाश्च महेष्वासा यज्ञसेनश्च सौमकिः ॥ ३१ ॥ केतुमान् वसुमांश्चैव कृतास्त्रश्च महाबलः । एते चान्ये च बहवः क्षत्रिया मुख्यसम्मताः ॥ ३२ ॥ उपासते सभायां स्म कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
इनके सिवा जटासुर, मद्राज शल्य, राजा कुन्तिभोज, किरातराज पुलिन्द, अंगराज, वंगराज, पुण्ड्रक, पाण्ड्य, उड्रराज, आन्ध्रनरेश, अंग, वंग, सुमित्र, शत्रुसूदन शैब्य, किरातराज सुमना, यवननरेश, चाणूर, देवरात, भोज, भीमरथ, कलिंगराज श्रुतायुध, मगधदेशीय जयसेन, सुकर्मा, चेकितान, शत्रुसंहारक पुरु, केतुमान्, वसुदान, विदेहराज कृतक्षण, सुधर्मा, अनिरुद्ध, महाबली श्रुतायु, दुर्धर्ष वीर अनूपराज, क्रमजित्, सुदर्शन, पुत्रसहित शिशुपाल, करूषराज दन्तवक्त्र, वृष्णिवंशियोंके देवस्वरूप दुर्धर्ष राजकुमार, आहुक, विपृथु, गद, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, शिनिपुत्र सत्यक, भीष्मक, आकृति, पराक्रमी द्युमत्सेन, महान् धनुर्धर केकयराजकुमार, सोमक-पौत्र द्रुपद, केतुमान् (द्वितीय) तथा अस्त्रविद्यामें निपुण महाबली वसुमान्—ये तथा और भी बहुत-से प्रधान क्षत्रिय उस सभामें कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी सेवामें बैठते थे ॥ २४—३२ १/२ ॥
अर्जुनं ये च संश्रित्य राजपुत्रा महाबलाः ॥ ३३ ॥ अशिक्षन्त धनुर्वेदं रौरवाजिनवाससः । तत्रैव शिक्षिता राजन् कुमारा वृष्णिनन्दनाः ॥ ३४ ॥
जो महाबली राजकुमार अर्जुनके पास रहकर कृष्णमृगचर्म धारण किये धनुर्वेदकी शिक्षा लेते थे (वे भी उस सभाभवनमें बैठकर राजा युधिष्ठिरकी उपासना करते थे)। राजन्! वृष्णिवंशको आनन्दित करनेवाले राजकुमारोंको वहीं शिक्षा मिली थी ॥ ३३-३४ ॥
रौक्मिणेयश्च साम्बश्च युयुधानश्च सात्यकिः । सुधर्मा चानिरुद्धश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ॥ ३५ ॥ एते चान्ये च बहवो राजानः पृथिवीपते । धनंजयसखा चात्र नित्यमास्ते स्म तुम्बुरुः ॥ ३६ ॥
रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, जाम्बवतीकुमार साम्ब, सत्यकपुत्र (सात्यकि) युयुधान, सुधर्मा, अनिरुद्ध, नरश्रेष्ठ शैब्य—ये और दूसरे भी बहुत-से राजा उस सभामें बैठते थे। पृथिवीपते! अर्जुनके सखा तुम्बुरु गन्धर्व भी उस सभामें नित्य विराजमान होते थे ॥ ३५-३६ ॥
उपासते महात्मानमासीनं सप्तविंशतिः । चित्रसेनः सहामात्यो गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ३७ ॥
मन्त्रीसहित चित्रसेन आदि सत्ताईस गन्धर्व और अप्सराएँ सभामें बैठे हुए महात्मा युधिष्ठिरकी उपासना करती थीं ।। ३७ ।।
गीतवादित्रकुशलाः साम्यतालविशारदाः ।
प्रमाणेऽथ लये स्थाने किन्नराः कृतनिश्रमाः ।। ३८ ।।
संचोदितास्तुम्बुरुणा गन्धर्वसहितास्तदा ।
गायन्ति दिव्यतानैस्ते यथान्यायं मनस्विनः ।
पाण्डुपुत्रानृषींश्चैव रमयन्त उपासते ।। ३९ ।।
गाने-बजानेमें कुशल, साम्य<sup>१</sup> और तालके<sup>२</sup> विशेषज्ञ तथा प्रमाण, लय और स्थानकी जानकारीके लिये विशेष परिश्रम किये हुए मनस्वी किन्नर तुम्बुरुकी आज्ञासे वहाँ अन्य गन्धर्वोंके साथ दिव्य तान छेड़ते हुए यथोचित रीतिसे गाते और पाण्डवों तथा महर्षियोंका मनोरंजन करते हुए धर्मराजकी उपासना करते थे ।। ३८-३९ ।।
तस्यां सभायामासीनाः सुव्रताः सत्यसंगराः ।
दिवीव देवा ब्रह्माणं युधिष्ठिरमुपासते ।। ४० ।।
जैसे देवतालोग दिव्यलोककी सभामें ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं, उसी प्रकार कितने ही सत्यप्रतिज्ञ और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महापुरुष उस सभामें बैठकर महाराज युधिष्ठिरकी आराधना करते थे ।। ४० ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभाप्रवेशो नाम चतुर्थोऽध्यायः ।। ४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभाप्रवेश नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ ।। ४ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ४५ १/३ श्लोक हैं)
१. संगीतमें नृत्य, गीत और वाद्यकी समताको लय अथवा साम्य कहते हैं; जैसा कि अमरकोषका वाक्य है—'लयः साम्यम्'।
२. नृत्य या गीतमें उसके काल और क्रियाका परिमाण, जिसे बीच-बीचमें हाथपर हाथ मारकर सूचित करते जाते हैं, ताल कहलाता है; जैसा कि अमरकोषका वचन है—'तालः कालक्रियामानम्'।