महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१. सीमावर्ती गाँवका अधिपति अपने यहाँका राजकीय कर एकत्र करके ग्रामाधिपतिको दे, ग्रामाधिपति नगराधिपतिको, वह देशाधिपतिको और देशाधिपति साक्षात् राजाको वह धन अर्पित करे।
२. नाड़ी, मल, मूत्र, जिह्वा, नेत्र, रूप, शब्द तथा स्पर्श—ये आठ चिकित्साके प्रकार कहे जाते हैं।
३. लोहेकी बनी हुई उन मशीनोंको, जिनके द्वारा बारूदके बलसे शीशे, काँसे और पत्थरकी गोलियाँ चलायी जाती हैं—यन्त्र कहते हैं। उन यन्त्रोंके प्रयोगकी विधिके प्रतिपादक संक्षिप्त वाक्य ही यन्त्रसूत्र हैं।
३. नगरकी रक्षा तथा उन्नतिके साधनोंको बतानेवाले संक्षिप्त वाक्योंको ही यहाँ नागरिक सूत्र कहा गया है।
अध्याय (पृष्ठ 1651)
षष्ठोऽध्यायः
युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासा
वैशम्पायन उवाच
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सम्पूज्याथाभ्यनुज्ञातो महर्षेर्वचनात् परम् ।
प्रत्युवाचानुपूर्व्येण धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! देवर्षि नारदका यह उपदेश पूर्ण होनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने भलीभाँति उनकी पूजा की; तदनन्तर उनसे आज्ञा लेकर उनके प्रश्नका उत्तर दिया ॥ १ ॥
युधिष्ठिर उवाच
भगवन् न्याय्यमाहैतं यथावद् धर्मनिश्चयम् ।
यथाशक्ति यथान्यायं क्रियतेऽयं विधिर्मया ॥ २ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भगवन्! आपने जो यह राजधर्मका यथार्थ सिद्धान्त बताया है, वह सर्वथा न्यायोचित है। मैं आपके इस न्यायानुकूल आदेशका यथाशक्ति पालन करता हूँ ॥ २ ॥
राजभिर्यद् यथा कार्यं पुरा वै तन्न संशयः ।
यथान्यायोपनीतार्थं कृतं हेतुमदर्थवत् ॥ ३ ॥
इसमें संदेह नहीं कि प्राचीन कालके राजाओंने जो कार्य जैसे सम्पन्न किया, वह प्रत्येक न्यायोचित, सकारण और किसी विशेष प्रयोजनसे युक्त होता था ॥ ३ ॥
वयं तु सत्पथं तेषां यातुमिच्छामहे प्रभो ।
न तु शक्यं तथा गन्तुं यथा तैर्नियतात्मभिः ॥ ४ ॥
प्रभो! हम भी उन्हींके उत्तम मार्गसे चलना चाहते हैं, परंतु उस प्रकार (सर्वथा) चल नहीं पाते; जैसे वे नियतात्मा महापुरुष चला करते थे ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा वाक्यं तदभिपूज्य च ।
मुहूर्तात् प्राप्तकालं च दृष्ट्वा लोकचरं मुनिम् ॥ ५ ॥
नारदं सुस्थमासीनमुपासीनो युधिष्ठिरः ।
अपृच्छत् पाण्डवस्तत्र राजमध्ये महाद्युतिः ॥ ६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिरने नारदजीके पूर्वोक्त प्रवचनकी बड़ी प्रशंसा की। फिर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले नारद मुनि जब शान्तिपूर्वक बैठ गये, तब दो घड़ीके बाद ठीक अवसर जानकर महातेजस्वी पाण्डुपुत्र राजा
युधिष्ठिर भी उनके निकट आ बैठे और सम्पूर्ण राजाओंके बीच वहाँ उनसे इस प्रकार पूछने लगे ।। ५-६ ।।
युधिष्ठिर उवाच
भवान् संचरते लोकान् सदा नानाविधान् बहून् ।
ब्रह्मणा निर्मितान् पूर्वं प्रेक्षमाणो मनोजवः ।। ७ ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**मुनिवर! आप मनके समान वेगशाली हैं, अतः ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिनका निर्माण किया है, उन अनेक प्रकारके बहुत-से लोकोंका दर्शन करते हुए आप उनमें सदा बेरोक-टोक विचरते रहते हैं ।। ७ ।।
ईदृशी भवता काचिद् दृष्टपूर्वा सभा क्वचित् ।
इतो वा श्रेयसी ब्रह्मंस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ।। ८ ।।
ब्रह्मन्! क्या आपने पहले कहीं ऐसी या इससे भी अच्छी कोई सभा देखी है? मैं जानना चाहता हूँ, अतः आप मुझसे यह बात बतावें ।। ८ ।।
वैशम्पायन उवाच
तच्छ्रुत्वा नारदस्तस्य धर्मराजस्य भाषितम् ।
पाण्डवं प्रत्युवाचेदं स्मयन् मधुरया गिरा ।। ९ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरका यह प्रश्न सुनकर देवर्षि नारदजी मुसकराने लगे और उन पाण्डुकुमारको इसका उत्तर देते हुए मधुर वाणीमें बोले ।। ९ ।।
नारद उवाच
मानुषेषु न मे तात दृष्टपूर्वा न च श्रुता ।
सभा मणिमयी राजन् यथेयं तव भारत ।। १० ।।
**नारदजीने कहा—**तात! भरतवंशी नरेश! मणि एवं रत्नोंकी बनी हुई जैसी तुम्हारी यह सभा है, ऐसी सभा मैंने मनुष्यलोकमें न तो पहले कभी देखी है और न कानोंसे ही सुनी है ।। १० ।।
सभां तु पितृराजस्य वरुणस्य च धीमतः ।
कथयिष्ये तथैन्द्रस्य कैलासनिलयस्य च ।। ११ ।।
ब्रह्मणश्च सभां दिव्यां कथयिष्ये गतक्लमाम् ।
दिव्यादिव्यैरभिप्रायैरुपैतां विश्वरूपिणीम् ।। १२ ।।
देवैः पितृगणैः साध्यैर्यज्वभिर्नियतात्मभिः ।
जुष्टां मुनिगणैः शान्तैर्वेदैर्यज्ञैः सदक्षिणैः ।
यदि ते श्रवणे बुद्धिर्वर्तते भरतर्षभ ।। १३ ।।
भरतश्रेष्ठ! यदि तुम्हारा मन दिव्य सभाओंका वर्णन सुननेको उत्सुक हो तो मैं तुम्हें पितृराज यम, बुद्धिमान् वरुण, स्वर्गवासी इन्द्र, कैलासनिवासी कुबेर तथा ब्रह्माजीकी दिव्य सभाका वर्णन सुनाऊँगा, जहाँ किसी प्रकारका क्लेश नहीं है एवं जो दिव्य और अदिव्य भोगोंसे सम्पन्न तथा संसारके अनेक रूपोंसे अलंकृत है। वह देवता, पितृगण, साध्यगण, याजक तथा मनको वशमें रखनेवाले शान्त मुनिगणोंसे सेवित है। वहाँ उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त वैदिक यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहता है॥ ११—१३॥ नारदेनैवमुक्तस्तु धर्मराजो युधिष्ठिरः। प्राञ्जलिर्भ्रातृभिः सार्धं तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमैः॥ १४॥ नारदं प्रत्युवाचेदं धर्मराजो महामनाः। सभाः कथय ताः सर्वाः श्रोतुमिच्छामहे वयम्॥ १५॥ नारदजीके ऐसा कहनेपर भाइयों तथा सम्पूर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ महामनस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा—‘महर्षे! हम सभी दिव्य सभाओंका वर्णन सुनना चाहते हैं। आप उनके विषयमें सब बातें बताइये॥ १४-१५॥ किंद्रव्यास्ताः सभा ब्रह्मन् किंविस्ताराः किमायताः। पितामहं च के तस्यां सभायां पर्युपासते॥ १६॥ ‘ब्रह्मन्! उन सभाओंका निर्माण किस द्रव्यसे हुआ है? उनकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है? ब्रह्माजीकी उस दिव्य-सभामें कौन-कौन सभासद् उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठते हैं?॥ १६॥ वासवं देवराजं च यमं वैवस्वतं च के। वरुणं च कुबेरं च सभायां पर्युपासते॥ १७॥ ‘इसी प्रकार देवराज इन्द्र, वैवस्वत यम, वरुण तथा कुबेरकी सभामें कौन-कौन लोग उनकी उपासना करते हैं?॥ १७॥ एतत् सर्वं यथान्यायं ब्रह्मर्षे वदतस्तव। श्रोतुमिच्छाम सहिताः परं कौतूहलं हि नः॥ १८॥ ‘ब्रह्मर्षे! हम सब लोग आपके मुखसे ये सब बातें यथोचित रीतिसे सुनना चाहते हैं। हमारे मनमें उसके लिये बड़ा कौतूहल है’॥ १८॥ एवमुक्तः पाण्डवेन नारदः प्रत्यभाषत। क्रमेण राजन् दिव्यास्ताः श्रूयन्तामिह नः सभाः॥ १९॥ पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर नारदजीने उत्तर दिया—‘राजन्! तुम हमसे यहाँ उन सभी दिव्य सभाओंका क्रमशः वर्णन सुनो’॥ १९॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि युधिष्ठिरसभाजिज्ञासायां षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासाविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥
इन्द्रसभाका वर्णन
सप्तमोऽध्यायः
इन्द्रसभाका वर्णन
नारद उवाच
शक्रस्य तु सभा दिव्या भास्वरा कर्मनिर्मिता ।
स्वयं शक्रेण कौरव्य निर्जितार्कसमप्रभा ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं— कुरुनन्दन! इन्द्रकी तेजोमयी दिव्य सभा सूर्यके समान प्रकाशित होती है। (विश्वकर्माके) प्रयत्नोंसे उसका निर्माण हुआ है। स्वयं इन्द्रने (सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके) उसपर विजय पायी है ॥ १ ॥
विस्तीर्णा योजनशतं शतमध्यर्धमायता ।
वैहायसी कामगमा पञ्चयोजनमुच्छ्रिता ॥ २ ॥
उसकी लंबाई डेढ़ सौ और चौड़ाई सौ योजनकी है। वह आकाशमें विचरनेवाली और इच्छाके अनुसार तीव्र या मन्द गतिसे चलनेवाली है। उसकी ऊँचाई भी पाँच योजनकी है ॥ २ ॥
जराशोकक्लमापेता निरातङ्का शिवा शुभा ।
वेश्मासनवती रम्या दिव्यपादपशोभिता ॥ ३ ॥
उसमें जीर्णता, शोक और थकावट आदिका प्रवेश नहीं है। वहाँ भय नहीं है, वह मंगलमयी और शोभासम्पन्न है। उसमें ठहरनेके लिये सुन्दर-सुन्दर महल और बैठनेके लिये उत्तमोत्तम सिंहासन बने हुए हैं। वह रमणीय सभा दिव्य वृक्षोंसे सुशोभित होती है ॥ ३ ॥
तस्यां देवेश्वरः पार्थ सभायां परमासने ।
आस्ते शच्या महेन्द्राण्या श्रिया लक्ष्म्या च भारत ॥ ४ ॥
भारत! कुन्तीनन्दन! उस सभामें सर्वश्रेष्ठ सिंहासनपर देवराज इन्द्र शोभामें लक्ष्मीके समान प्रतीत होनेवाली इन्द्राणी शचीके साथ विराजते हैं ॥ ४ ॥
बिभ्रद् वपुरनिर्देश्यं किरीटी लोहिताङ्गदः ।
विरजोऽम्बरश्चित्रमाल्यो ह्रीकीर्तिद्युतिभिः सह ॥ ५ ॥
उस समय वे अवर्णनीय रूप धारण करते हैं। उनके मस्तकपर किरीट रहता है और दोनों भुजाओंमें लाल रंगके बाजूबंद शोभा पाते हैं। उनके शरीरपर स्वच्छ वस्त्र और कण्ठमें विचित्र माला सुशोभित होती है। वे लज्जा, कीर्ति और कान्ति—इन देवियोंके साथ उस दिव्य सभामें विराजमान होते हैं ॥ ५ ॥
तस्यामुपासते नित्यं महात्मानं शतक्रतुम् ।
मरुतः सर्वशो राजन् सर्वे च गृहमेधिनः ॥ ६ ॥
राजन्! उस दिव्य सभामें सभी मरुद्गण और गृहवासी देवता सौ यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण कर लेनेवाले महात्मा इन्द्रकी प्रतिदिन सेवा करते हैं॥ ६॥ सिद्धा देवर्षयश्चैव साध्या देवगणास्तथा । मरुत्वन्तश्च सहिता भास्वन्तो हेममालिनः ॥ ७ ॥ एते सानुचराः सर्वे दिव्यररूपाः स्वलंकृताः । उपासते महात्मानं देवराजमरिंदमम् ॥ ८ ॥ सिद्ध, देवर्षि, साध्यदेवगण तथा मरुत्वान्—ये सभी सुवर्णमालाओंसे सुशोभित हो तेजस्वी रूप धारण किये एक साथ उस दिव्य सभामें बैठकर शत्रुदमन महामना देवराज इन्द्रकी उपासना करते हैं। वे सभी देवता अपने अनुचरों (सेवकों)-के साथ वहाँ विराजमान होते हैं। वे दिव्यरूपधारी होनेके साथ ही उत्तमोत्तम अलंकारोंसे अलंकृत रहते हैं॥ ७-८॥ तथा देवर्षयः सर्वे पार्थ शक्रमुपासते । अमला धूतपाप्मानो दीप्यमाना इवाग्नयः ॥ ९ ॥ कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार जिनके पाप धुल गये हैं, वे अग्निके समान उद्दीप्त होनेवाले सभी निर्मल देवर्षि वहाँ इन्द्रकी उपासना करते हैं॥ ९॥ तेजस्विनः सोमसुतो विशोका विगतज्वराः । वे देवर्षिगण तेजस्वी, सोमयाग करनेवाले तथा शोक और चिन्तासे शून्य हैं॥ ९ १/२ ॥ पराशरः पर्वतश्च तथा सावर्णिगालवौ ॥ १० ॥ शङ्खश्च लिखितश्चैव तथा गौरशिरा मुनिः । दुर्वासाः क्रोधनः श्येनस्तथा दीर्घतमा मुनिः ॥ ११ ॥ पवित्रपाणिः सावर्णिर्याज्ञवल्क्योऽथ भालुकिः । उद्दालकः श्वेतकेतुस्ताण्ड्यो भाण्डायनिस्तथा ॥ १२ ॥ हविष्मांश्च गरिष्ठश्च हरिश्चन्द्रश्च पार्थिवः । हृद्यश्चोदरशाण्डिल्यः पाराशर्यः कृषीवलः ॥ १३ ॥ वातस्कन्धो विशाखश्च विधाता काल एव च । करालदन्तस्त्वष्टा च विश्वकर्मा च तुम्बुरुः ॥ १४ ॥ अयोनिजा योनिजाश्च वायुभक्षा हुताशिनः । ईशानं सर्वलोकस्य वज्रिणं समुपासते ॥ १५ ॥ पराशर, पर्वत, सावर्णि, गालव, शंख, लिखित, गौरशिरा मुनि, दुर्वासा, क्रोधन, श्येन, दीर्घतमा मुनि, पवित्रपाणि, सावर्णि (द्वितीय), याज्ञवल्क्य, भालुकि, उद्दालक, श्वेतकेतु, ताण्ड्य, भाण्डायनि, हविष्मान्, गरिष्ठ, राजा हरिश्चन्द्र, हृद्य, उदरशाण्डिल्य, पराशरनन्दन व्यास, कृषीवल, वातस्कन्ध, विशाख, विधाता, काल, करालदन्त, त्वष्टा, विश्वकर्मा तथा तुम्बुरु—ये और दूसरे अयोनिज या योनिज मुनि एवं वायु पीकर रहनेवाले तथा हविष्य-
पदार्थोंको खानेवाले महर्षि सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर वज्रधारी इन्द्रकी उपासना करते हैं ॥ १०—१५ ॥ सहदेवः सुनीथश्च वाल्मीकिश्च महातपाः । शमीकः सत्यवाक् चैव प्रचेताः सत्यसंगरः ॥ १६ ॥ मेधातिथिर्वामदेवः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । मरुत्तश्च मरीचिश्च स्थाणुश्चात्र महातपाः ॥ १७ ॥ कक्षीवान् गौतमस्तार्क्ष्यस्तथा वैश्वानरो मुनिः । (षडर्तुः कवषो धूम्रो रैभ्यो नलपरावसू । स्वस्त्यात्रेयो जरत्कारुः कहोलः काश्यपस्तथा । विभाण्डकर्ष्यशृङ्गौ च उन्मुखो विमुखस्तथा ॥) मुनिः कालकवृक्षीय आश्राव्योऽथ हिरण्मयः ॥ १८ ॥ संवर्तो देवहव्यश्च विष्वक्सेनश्च वीर्यवान् । (कण्वः कात्यायनो राजन् गार्ग्यः कौशिक एव च ।) दिव्या आपस्तथौषध्यः श्रद्धा मेधा सरस्वती ॥ १९ ॥ अर्थो धर्मश्च कामश्च विद्युतश्चैव पाण्डव । जलवाहस्तथा मेघा वायवः स्तनयित्नवः ॥ २० ॥ प्राची दिग् यज्ञवाहाश्च पावकाः सप्तविंशतिः । अग्नीषोमौ तथेन्द्राग्नी मित्रश्च सवितार्यमा ॥ २१ ॥ भगो विश्वे च साध्याश्च गुरुः शुक्रस्तथैव च । विश्वावसुश्चित्रसेनः सुमनस्तरुणस्तथा ॥ २२ ॥ यज्ञाश्च दक्षिणाश्चैवं ग्रहास्ताराश्च भारत । यज्ञवाहश्च ये मन्त्राः सर्वे तत्र समासते ॥ २३ ॥ भरतवंशी नरेश पाण्डुनन्दन! सहदेव, सुनीथ, महातपस्वी वाल्मीकि, सत्यवादी शमीक, सत्यप्रतिज्ञ प्रचेता, मेधातिथि, वामदेव, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, मरुत्त, मरीचि, महातपस्वी स्थाणु, कक्षीवान्, गौतम, तार्क्ष्य, वैश्वानर मुनि, षडर्तु, कवष, धूम्र, रैभ्य, नल, परावसु, स्वस्त्यात्रेय, जरत्कारु, कहोल, काश्यप, विभाण्डक, ऋष्यशृंग, उन्मुख, विमुख, कालकवृक्षीय मुनि, आश्राव्य, हिरण्मय, संवर्त, देवहव्य, पराक्रमी विष्वक्सेन, कण्व, कात्यायन, गार्ग्य, कौशिक, दिव्य जल, ओषधियाँ, श्रद्धा, मेधा, सरस्वती, अर्थ, धर्म, काम, विद्युत्, जलधर मेघ, वायु, गर्जना करनेवाले बादल, प्राची दिशा, यज्ञके हविष्यको वहन करनेवाले सत्ताईस पावक,* सम्मिलित अग्नि और सोम, संयुक्त इन्द्र और अग्नि, मित्र, सविता, अर्यमा, भग, विश्वेदेव, साध्य, बृहस्पति, शुक्र, विश्वावसु, चित्रसेन, सुमन, तरुण, विविध यज्ञ, दक्षिणा, ग्रह, तारा और यज्ञनिर्वाहक मन्त्र—ये सभी वहाँ इन्द्रसभामें बैठते हैं ॥ १६—२३ ॥
तथैवाप्सरसो राजन् गन्धर्वाश्च मनोरमाः । नृत्यवादित्रगीतैश्च हास्यैश्च विविधैरपि ॥ २४ ॥ रमयन्ति स्म नृपते देवराजं शतक्रतुम् । राजन्! इसी प्रकार मनोहर अप्सराएँ तथा सुन्दर गन्धर्व नृत्य, वाद्य, गीत एवं नाना प्रकारके हास्योंद्वारा देवराज इन्द्रका मनोरंजन करते हैं ॥ २४ १/२ ॥
स्तुतिभिर्मङ्गलैश्चैव स्तुवन्तः कर्मभिस्तथा ॥ २५ ॥ विक्रमैश्च महात्मानं बलवृत्रनिषूदनम् । इतना ही नहीं, वे स्तुति, मंगलपाठ और पराक्रम-सूचक कर्मोंके गायनद्वारा बल और वृत्रनामक असुरोंके नाशक महात्मा इन्द्रका स्तवन करते हैं ॥ २५ १/२ ॥
ब्रह्मराजर्षयश्चैव सर्वे देवर्षयस्तथा ॥ २६ ॥ विमानैर्विविधैर्दिव्यैर्दीप्यमाना इवाग्नयः । स्रग्विणो भूषिताः सर्वे यान्ति चायान्ति चापरे ॥ २७ ॥ ब्रह्मर्षि, राजर्षि तथा सम्पूर्ण देवर्षि माला पहने एवं वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो, नाना प्रकारके दिव्य विमानोंद्वारा अग्निके समान देदीप्यमान होते हुए वहाँ आते-जाते रहते हैं ॥ २६-२७ ॥
बृहस्पतिश्च शुक्रश्च नित्यमास्तां हि तत्र वै । एते चान्ये च बहवो महात्मानो यतव्रताः ॥ २८ ॥ विमानैश्चन्द्रसंकाशैः सोमवत्प्रियदर्शनाः । ब्रह्मणः सदृशा राजन् भृगुः सप्तर्षयस्तथा ॥ २९ ॥ बृहस्पति और शुक्र वहाँ नित्य विराजते हैं। ये तथा और भी बहुत-से संयमी महात्मा जिनका दर्शन चन्द्रमाके समान प्रिय है, चन्द्रमाकी भाँति चमकीले विमानोंद्वारा वहाँ उपस्थित होते हैं। राजन्! भृगु और सप्तर्षि, जो साक्षात् ब्रह्माजीके समान प्रभावशाली हैं, ये भी इन्द्र-सभाकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ २८-२९ ॥
एषा सभा मया राजन् दृष्टा पुष्करमालिनी । शतक्रतोर्महाबाहो याम्यामपि सभां शृणु ॥ ३० ॥ महाबाहु नरेश! शतक्रतु इन्द्रकी यह कमल-मालाओंसे सुशोभित सभा मैंने अपनी आँखों देखी है। अब यमराजकी सभाका वर्णन सुनो ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकसभाख्यानपर्वणि इन्द्रसभावर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें इन्द्रसभा-वर्णन नामक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३२ श्लोक हैं)
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यमराजकी सभाका वर्णन
अष्टमोऽध्यायः
यमराजकी सभाका वर्णन
नारद उवाच
कथयिष्ये सभां याम्यां युधिष्ठिर निबोध ताम् ।
वैवस्वतस्य यां पार्थ विश्वकर्मा चकार ह ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं—कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! अब मैं सूर्यपुत्र यमकी सभाका वर्णन करता हूँ, सुनो। उसकी रचना भी विश्वकर्माने ही की है ॥ १ ॥
तैजसी सा सभा राजन् बभूव शतयोजना ।
विस्तारायामसम्पन्ना भूयसी चापि पाण्डव ॥ २ ॥
राजन्! वह तेजोमयी विशाल सभा लम्बाई और चौड़ाईमें भी सौ योजन है तथा पाण्डुनन्दन! सम्भव है, इससे भी कुछ बड़ी हो ॥ २ ॥
अर्कप्रकाशा भ्राजिष्णुः सर्वतः कामरूपिणी ।
नातिशीता न चात्युष्णा मनसश्च प्रहर्षिणी ॥ ३ ॥
उसका प्रकाश सूर्यके समान है। इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली वह सभा सब ओरसे प्रकाशित होती है। वह न तो अधिक शीतल है, न अधिक गर्म। मनको अत्यन्त आनन्द देनेवाली है ॥ ३ ॥
न शोको न जरा तस्यां क्षुत्पिपासे न चाप्रियम् ।
न च दैन्यं क्लमो वापि प्रतिकूलं न चाप्युत ॥ ४ ॥
उसके भीतर न शोक है, न जीर्णता; न भूख लगती है, न प्यास। वहाँ कोई भी अप्रिय घटना नहीं घटित होती। दीनता, थकावट अथवा प्रतिकूलताका तो वहाँ नाम भी नहीं है ॥ ४ ॥
सर्वे कामाः स्थितास्तस्यां ये दिव्या ये च मानुषाः ।
सारवच्च प्रभूतं च भक्ष्यं भोज्यमरिंदम ॥ ५ ॥
शत्रुदमन! वहाँ दिव्य और मानुष, सभी प्रकारके भोग उपस्थित रहते हैं। सरस एवं स्वादिष्ट भक्ष्य-भोज्य पदार्थ प्रचुर मात्रामें संचित रहते हैं ॥ ५ ॥
लेह्यं चोष्यं च पेयं च हृद्यं स्वादु मनोहरम् ।
पुण्यगन्धाः स्रजस्तस्य नित्यं कामफला द्रुमाः ॥ ६ ॥
इसके सिवा चाटनेयोग्य, चूसनेयोग्य, पीनेयोग्य तथा हृदयको प्रिय लगनेवाली और भी स्वादिष्ट एवं मनोहर वस्तुएँ वहाँ सदा प्रस्तुत रहती हैं। उस सभामें पवित्र सुगन्ध फैलानेवाली पुष्प-मालाएँ और सदा इच्छानुसार फल देनेवाले वृक्ष लहलहाते रहते हैं ॥ ६ ॥
रसवन्ति च तोयानि शीतान्युष्णानि चैव हि ।
तस्यां राजर्षयः पुण्यास्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥ ७ ॥
यमं वैवस्वतं तात प्रहृष्टाः पर्युपासते ।
वहाँ ठंडे और गर्म स्वादिष्ट जल नित्य उपलब्ध होते हैं। तात! वहाँ बहुत-से पुण्यात्मा राजर्षि और निर्मल हृदयवाले ब्रह्मर्षि प्रसन्नतापूर्वक बैठकर सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ॥ ७ १/२ ॥
ययातिर्नहुषः पूरुर्मान्धाता सोमको नृगः ॥ ८ ॥
त्रसद्दस्युश्च राजर्षिः कृतवीर्यः श्रुतश्रवाः ।
अरिष्टनेमिः सिद्धश्च कृतवेगः कृतिर्निमिः ॥ ९ ॥
प्रतर्दनः शिबिर्मत्स्यः पृथुलाक्षो बृहद्रथः ।
वार्तो मरुत्तः कुशिकः सांकाश्यः सांकृतिर्ध्रुव ॥ १० ॥
चतुरश्वः सदश्वोर्मिः कार्तवीर्यश्च पार्थिवः ।
भरतः सुरथश्चैव सुनीथो निशठो नलः ॥ ११ ॥
दिवोदासश्च सुमना अम्बरीषो भगीरथः ।
व्यश्वः सदश्वो वध्यश्वः पृथुवेगः पृथुश्रवाः ॥ १२ ॥
पृषदश्वो वसुमनाः क्षुपश्च सुमहाबलः ।
रुषदृग्वृषसेनश्च पुरुकुत्सो ध्वजी रथी ॥ १३ ॥
आर्ष्टिषेणो दिलीपश्च महात्मा चाप्युशीनरः ।
औशीनरिः पुण्डरीकः शर्यातिः शरभः शुचिः ॥ १४ ॥
अङ्गोऽरिष्टश्च वेनश्च दुष्यन्तः सृञ्जयो जयः ।
भाङ्गासुरिः सुनीथश्च निषधोऽथ वहीनरः ॥ १५ ॥
करन्धमो बाह्लिकश्च सुद्युम्नो बलवान् मधुः ।
ऐलो मरुत्तश्च तथा बलवान् पृथिवीपतिः ॥ १६ ॥
कपोतरोमा तृणकः सहदेवार्जुनौ तथा ।
व्यश्वः साश्वः कृशाश्वश्च शशबिन्दुश्च पार्थिवः ॥ १७ ॥
राजा दशरथश्चैव ककुत्स्थोऽथ प्रवर्धनः ।
अलर्कः कक्षसेनश्च गयो गौराश्व एव च ॥ १८ ॥
जामदग्न्यश्च रामश्च नाभागसगरौ तथा ।
भूरिद्युम्नो महाश्वश्च पृथाश्वो जनकस्तथा ॥ १९ ॥
राजा वैन्यो वारिसेनः पुरुजिज्जनमेजयः ।
ब्रह्मदत्तस्त्रिगर्तश्च राजोपरिचरस्तथा ॥ २० ॥
इन्द्रद्युम्नो भीमजानुर्गौरपृष्ठोऽनघो लयः ।
पद्मोऽथ मुचुकुन्दश्च भूरिद्युम्नः प्रसेनजित् ॥ २१ ॥
अरिष्टनेमिः सुद्युम्नः पृथुलाश्वोऽष्टकस्तथा । शतं मत्स्या नृपतयः शतं नीपाः शतं गयाः ॥ २२ ॥ धृतराष्ट्राश्चैकशतमशीतिर्जनमेजयाः । शतं च ब्रह्मदत्तानां वीरिणामीरिणां शतम् ॥ २३ ॥ भीष्माणां द्वे शतेऽप्यत्र भीमानां तु तथा शतम् । शतं च प्रतिविन्ध्यानां शतं नागाः शतं हयाः ॥ २४ ॥ पलाशानां शतं ज्ञेयं शतं काशकुशादयः । शान्तनुश्चैव राजेन्द्र पाण्डुश्चैव पिता तव ॥ २५ ॥ उशङ्गवः शतरथो देवराजो जयद्रथः । वृषदर्भश्च राजर्षिर्बुद्धिमान् सह मन्त्रिभिः ॥ २६ ॥ अथापरे सहस्राणि ये गताः शशबिन्दवः । इष्ट्वाश्वमेधैर्बहुभिर्महद्भिर्भूरिदक्षिणैः ॥ २७ ॥ एते राजर्षयः पुण्याः कीर्तिमन्तो बहुश्रुताः । तस्यां सभायां राजेन्द्र वैवस्वतमुपासते ॥ २८ ॥
ययाति, नहुष, पूरु, मान्धाता, सोमक, नृग, त्रसद्स्यु, राजर्षि कृतवीर्य, श्रुतश्रवा, अरिष्टनेमि, सिद्ध, कृतवेग, कृति, निमि, प्रतर्दन, शिबि, मत्स्य, पृथुलाक्ष, बृहद्रथ, वार्त, मरुत्त, कुशिक, सांकाश्य, सांकृति, ध्रुव, चतुरश्व, सदश्वोर्मि, राजा कार्तवीर्य अर्जुन, भरत, सुरथ, सुनीथ, निशठ, नल, दिवोदास, सुमना, अम्बरीष, भगीरथ, व्यश्व, सदश्व, वध्यश्व, पृथुवेग, पृथुश्रवा, पृषदश्व, वसुमना, महाबली क्षुप, रुषद्रु, वृषसेन, रथ और ध्वजासे युक्त पुरुकुत्स, आर्ष्टिषेण, दिलीप, महात्मा उशीनर, औशीनरि, पुण्डरीक, शर्याति, शरभ, शुचि, अंग, अरिष्ट, वेन, दुष्यन्त, सृंजय, जय, भांगासुरि, सुनीथ, निषध, वहीनर, करन्धम, बाह्निक, सुद्युम्न, बलवान् मधु, इला-नन्दन पुरूरवा, बलवान् राजा मरुत्त, कपोतरामा, तृणक, सहदेव, अर्जुन, व्यश्व, साश्व, कृशाश्व, राजा शशबिन्दु, महाराज दशरथ, ककुत्स्थ, प्रवर्धन, अलर्क, कक्षसेन, गय, गौराश्व, जमदग्निनन्दन परशुराम, नाभाग, सगर, भूरिद्युम्न, महाश्व, पृथाश्व, जनक, राजा पृथु, वारिसेन, पुरुजित्, जनमेजय, ब्रह्मदत्त, त्रिगर्त, राजा उपरिचर, इन्द्रद्युम्न, भीमजानु, गौरपृष्ठ, अनघ, लय, पद्म, मुचुकुन्द, भूरिद्युम्न, प्रसेनजित्, अरिष्टनेमि, सुद्युम्न, पृथुलाश्व, अष्टक, एक सौ मत्स्य, एक सौ नीप, एक सौ गय, एक सौ धृतराष्ट्र, अस्सी जनमेजय, सौ ब्रह्मदत्त, सौ वीरी, सौ ईरी, दो सौ भीष्म, एक सौ भीम, एक सौ प्रतिविन्ध्य, एक सौ नाग तथा एक सौ हय, सौ पलाश, सौ काश और सौ कुश राजा एवं शान्तनु, तुम्हारे पिता पाण्डु, उशंगव, शतरथ, देवराज, जयद्रथ, मन्त्रियोंसहित बुद्धिमान् राजर्षि वृषदर्भ तथा इनके सिवा सहस्रों शशबिन्दु नामक राजा, जो अधिक दक्षिणावाले अनेक महान् अश्वमेधयज्ञोंद्वारा यजन करके धर्मराजके लोकमें गये हुए हैं। राजेन्द्र! ये सभी
पुण्यात्मा, कीर्तिमान् और बहुश्रुत राजर्षि उस सभामें सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ॥ ८—२८ ॥
अगस्त्योऽथ मतङ्गश्च कालो मृत्युस्तथैव च । यज्वानश्चैव सिद्धाश्च ये च योगशरीरिणः ॥ २९ ॥ अग्निष्वात्ताश्च पितरः फेनपाश्चोष्मपाश्च ये । स्वधावन्तो बर्हिषदो मूर्तिमन्तस्तथापरे ॥ ३० ॥ कालचक्रं च साक्षाच्च भगवान् हव्यवाहनः । नरा दुष्कृतकर्माणो दक्षिणायनमृत्यवः ॥ ३१ ॥ कालस्य नयने युक्ता यमस्य पुरुषाश्च ये । तस्यां शिंशपपालाशास्तथा काशकुशादयः । उपासते धर्मराजं मूर्तिमन्तो जनाधिप ॥ ३२ ॥
अगस्त्य, मतंग, काल, मृत्यु, यज्ञकर्ता, सिद्ध, योगशरीरधारी, अग्निष्वात्त पितर, फेनप, ऊष्मप, स्वधावान्, बर्हिषद् तथा दूसरे मूर्तिमान् पितर, साक्षात् कालचक्र (संवत्सर आदि कालविभागके अभिमानी देवता), भगवान् हव्यवाहन (अग्नि), दक्षिणायनमें मरनेवाले तथा सकामभावसे दुष्कर (श्रमसाध्य) कर्म करनेवाले मनुष्य, जनेश्वर कालकी आज्ञामें तत्पर यमदूत, शिंशप एवं पलाश, काश और कुश आदिके अभिमानी देवता मूर्तिमान् होकर उस सभामें धर्मराजकी उपासना करते हैं ॥ २९—३२ ॥
एते चान्ये च बहवः पितृराजसभासदः । न शक्याः परिसंख्यातुं नामभिः कर्मभिस्तथा ॥ ३३ ॥
ये तथा और भी बहुत-से लोग पितृराज यमकी सभाके सदस्य हैं, जिनके नामों और कर्मोंकी गणना नहीं की जा सकती ॥ ३३ ॥
असम्बाधा हि सा पार्थ रम्या कामगमा सभा । दीर्घकालं तपस्तप्त्वा निर्मिता विश्वकर्मणा ॥ ३४ ॥
कुन्तीनन्दन! वह सभा बाधारहित है। वह रमणीय तथा इच्छानुसार गमन करनेवाली है। विश्वकर्माने दीर्घ-कालतक तपस्या करके उसका निर्माण किया है ॥ ३४ ॥
ज्वलन्ती भासमाना च तेजसा स्वेन भारत । तामुग्रतपसो यान्ति सुव्रताः सत्यवादिनः ॥ ३५ ॥ शान्ताः संन्यासिनः शुद्धाः पूताः पुण्येन कर्मणा । सर्वे भास्वरदेहाश्च सर्वे च विरजोऽम्बराः ॥ ३६ ॥
भारत! वह सभा अपने तेजसे प्रज्वलित तथा उद्भासित होती रहती है। कठोर तपस्या और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सत्यवादी, शान्त, संन्यासी तथा अपने पुण्यकर्मसे शुद्ध एवं पवित्र हुए पुरुष उस सभामें जाते हैं। उन सबके शरीर तेजसे प्रकाशित होते रहते हैं। सभी निर्मल वस्त्र धारण करते हैं ॥ ३५-३६ ॥
चित्राङ्गदाश्चित्रमाल्याः सर्वे ज्वलितकुण्डलाः । सुकृतैः कर्मभिः पुण्यैः पारिबर्हेश्च भूषिताः ॥ ३७ ॥ सभी अद्भुत बाजूबंद, विचित्र हार और जगमगाते हुए कुण्डल धारण करते हैं। वे अपने पवित्र शुभ कर्मों तथा वस्त्राभूषणोंसे भी विभूषित होते हैं ॥ ३७ ॥
गन्धर्वाश्च महात्मानः सङ्घशश्चाप्सरोगणाः । वादित्रं नृत्यगीतं च हास्यं लास्यं च सर्वशः ॥ ३८ ॥ कितने ही महामना गन्धर्व और झुंड-की-झुंड अप्सराएँ उस सभामें उपस्थित हो सब प्रकारके वाद्य, नृत्य, गीत, हास्य और लास्यकी उत्तम कलाका प्रदर्शन करती हैं ॥ ३८ ॥
पुण्याश्च गन्धाः शब्दाश्च तस्यां पार्थ समन्ततः । दिव्यानि चैव माल्यानि उपतिष्ठन्ति नित्यशः ॥ ३९ ॥ कुन्तीकुमार! उस सभामें सदा सब ओर पवित्र गन्ध, मधुर शब्द और दिव्य मालाओंके सुखद स्पर्श प्राप्त होते रहते हैं ॥ ३९ ॥
शतं शतसहस्राणि धर्मिणां तं प्रजेश्वरम् । उपासते महात्मानं रूपयुक्ता मनस्विनः ॥ ४० ॥ सुन्दर रूप धारण करनेवाले एक करोड़ धर्मात्मा एवं मनस्वी पुरुष महात्मा यमकी उपासना करते हैं ॥ ४० ॥
ईदृशी सा सभा राजन् पितृराज्ञो महात्मनः । वरुणस्यापि वक्ष्यामि सभां पुष्करमालिनीम् ॥ ४१ ॥ राजन्! पितृराज महात्मा यमकी सभा ऐसी ही है। अब मैं वरुणकी मूर्तिमान् पुष्कर आदि तीर्थमालाओंसे सुशोभित सभाका भी वर्णन करूँगा ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि यमसभावर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें यमसभा-वर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
* नीलकण्ठने अपनी टीकामें इन सत्ताईस पावकोंके नाम इस प्रकार बताये हैं—अंगिरा, दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि, आहवनीयाग्नि, निर्मन्ध्य, वैद्युत, शूर, संवर्त, लौकिक, जठराग्नि, विषग, क्रव्यात्, क्षेमवान्, वैष्णव, दस्युमान्, बलद, शान्त, पुष्ट, विभावसु, ज्योतिष्मान्, भरत, भद्र, स्विष्टकृत्, वसुमान्, क्रतु, सोम और पितृमान्।
वरुणकी सभाका वर्णन
नवमोऽध्यायः
वरुणकी सभाका वर्णन
नारद उवाच
युधिष्ठिर सभा दिव्या वरुणस्यामितप्रभा ।
प्रमाणेन यथा याम्या शुभप्राकारतोरणा ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! वरुणदेवकी दिव्य सभा अपनी अनन्त कान्तिसे प्रकाशित होती रहती है। उसकी भी लंबाई-चौड़ाईका मान वही है, जो यम-राजकी सभाका है। उसके परकोटे और फाटक बड़े सुन्दर हैं ॥ १ ॥
अन्तःसलिलमास्थाय विहिता विश्वकर्मणा ।
दिव्यै रत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युता ॥ २ ॥
विश्वकर्माने उस सभाको जलके भीतर रहकर बनाया है। वह फल-फूल देनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे सुशोभित होती है ॥ २ ॥
नीलपीतासितश्यामैः सितैर्लोहितकैरपि ।
अवतानैस्तथा गुल्मैर्मञ्जरीजालधारिभिः ॥ ३ ॥
उस सभाके भिन्न-भिन्न प्रदेश नीले-पीले, काले, सफेद और लाल रंगके लतागुल्मोंसे आच्छादित हैं। उन लताओंने मनोहर मंजरीपुंज धारण कर रखे हैं ॥ ३ ॥
तथा शकुनयस्तस्यां विचित्रा मधुरस्वराः ।
अनिर्देश्या वपुष्मन्तः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४ ॥
सभाभवनके भीतर विचित्र और मधुर स्वरसे बोलनेवाले सैकड़ों-हजारों पक्षी चहकते रहते हैं। उनके विलक्षण रूप-सौन्दर्यका वर्णन नहीं हो सकता। उनकी आकृति बड़ी सुन्दर है ॥ ४ ॥
सा सभा सुखसंस्पर्शा न शीता न च घर्मदा ।
वेश्मासनवती रम्या सिता वरुणपालिता ॥ ५ ॥
वरुणकी सभाका स्पर्श बड़ा ही सुखद है, वहाँ न सर्दी है, न गर्मी। उसका रंग श्वेत है, उसमें कितने ही कमरे और आसन (दिव्य मंच आदि) सजाये गये हैं। वरुणजीके द्वारा सुरक्षित वह सभा बड़ी रमणीय जान पड़ती है ॥ ५ ॥
यस्यामास्ते स वरुणो वारुण्या च समन्वितः ।
दिव्यरत्नाम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः ॥ ६ ॥
उसमें दिव्य रत्नों और वस्त्रोंको धारण करनेवाले तथा दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत वरुणदेव वारुणी देवीके साथ विराजमान होते हैं ॥ ६ ॥
स्रग्विणो दिव्यगन्धाश्च दिव्यगन्धानुलेपनाः ।
आदित्यास्तत्र वरुणं जलेश्वरमुपासते ।। ७ ।। उस सभामें दिव्य हार, दिव्य सुगन्ध तथा दिव्य चन्दनका अंगराग धारण करनेवाले आदित्यगण जलके स्वामी वरुणकी उपासना करते हैं ।। ७ ।। वासुकिस्तक्षकश्चैव नागश्चैरावतस्तथा । कृष्णश्च लोहितश्चैव पद्मश्चित्रश्च वीर्यवान् ।। ८ ।। वासुकि नाग, तक्षक, ऐरावतनाग, कृष्ण, लोहित, पद्म और पराक्रमी चित्र, ।। ८ ।। कम्बलाश्वतरौ नागौ धृतराष्ट्रबलाहकौ । (मणिनागश्च नागश्च मणिः शङ्खनखस्तथा । कौरव्यः स्वस्तिकश्चैव एलापत्रश्च वामनः ।। अपराजितश्च दोषश्च नन्दकः पूरणस्तथा । अभीकः शिभिकः श्वेतो भद्रो भद्रेश्वरस्तथा ।।) मणिमान् कुण्डधारश्च कर्कोटकधनंजयौ ।। ९ ।। कम्बल, अश्वतर, धृतराष्ट्र, बलाहक, मणिनाग, नाग, मणि, शंखनख, कौरव्य, स्वस्तिक, एलापत्र, वामन, अपराजित, दोष, नन्दक, पूरण, अभीक, शिभिक, श्वेत, भद्र, भद्रेश्वर, मणिमान्, कुण्डधार, कर्कोटक, धनंजय, ।। ९ ।। पाणिमान् कुण्डधारश्च बलवान् पृथिवीपते । प्रह्लादो मूषिकादश्च तथैव जनमेजयः ।। १० ।। पताकिनो मण्डलिनः फणावन्तश्च सर्वशः । (अनन्तश्च महानागो यं स दृष्ट्वा जलेश्वरः । अभ्यर्चयति सत्कारैरासनेन च तं विभुम् ।। वासुकिप्रमुखाश्चैव सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः । अनुज्ञाताश्च शेषेण यथार्हमुपविश्य च ।।) एते चान्ये च बहवः सर्पास्तस्यां युधिष्ठिर । उपासते महात्मानं वरुणं विगतक्लमाः ।। ११ ।। पाणिमान्, बलवान् कुण्डधार, प्रह्लाद, मूषिकाद, जनमेजय आदि नाग जो पताका, मण्डल और फणोंसे सुशोभित वहाँ उपस्थित होते हैं, महानाग भगवान् अनन्त भी वहाँ स्थित होते हैं, जिन्हें देखते ही जलके स्वामी वरुण आसन आदि देते और सत्कारपूर्वक उनका पूजन करते हैं। वासुकि आदि सभी नाग हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े होते और भगवान् शेषकी आज्ञा पाकर यथायोग्य आसनोंपर बैठकर वहाँकी शोभा बढ़ाते हैं। युधिष्ठिर! ये तथा और भी बहुतसे नाग उस सभामें क्लेशरहित हो महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं ।। १०-११ ।। बलिवैरोचनो राजा नरकः पृथिवींजयः । प्रह्लादो विप्रचित्तिश्च कालखञ्जाश्च दानवाः ।। १२ ।।
सुहनुर्दुर्मुखः शङ्खः सुमनाः सुमतिस्ततः । घटोदरो महापार्श्वः क्रथनः पिठरस्तथा ॥ १३ ॥ विश्वरूपः स्वरूपश्च विरूपोऽथ महाशिराः । दशग्रीवश्च वाली च मेघवासा दशावरः ॥ १४ ॥ टिट्टिभो विटभूतश्च संह्लादश्चेन्द्रतापनः । दैत्यदानवसङ्घाश्च सर्वे रुचिरकुण्डलाः ॥ १५ ॥ स्रग्विणो मौलिनश्चैव तथा दिव्यपरिच्छदाः । सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्यवः ॥ १६ ॥ ते तस्यां वरुणं देवं धर्मपाशधरं सदा । उपासते महात्मानं सर्वे सुचरितव्रताः ॥ १७ ॥ विरोचनपुत्र राजा बलि, पृथ्विविजयी नरकासुर, प्रह्लाद, विप्रचित्ति, कालखंज दानव, सुहनु, दुर्मुख, शंख, सुमना, सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, स्वरूप, विरूप, महाशिरा, दशमुख रावण, वाली, मेघवासा, दशावर, टिट्टिभ, विटभूत, संह्लाद तथा इन्द्रतापन आदि सभी दैत्यों और दानवोंके समुदाय मनोहर कुण्डल, सुन्दर हार, किरीट तथा दिव्य वस्त्राभूषण धारण किये उस सभामें धर्मपाशधारी महात्मा वरुणदेवकी सदा उपासना करते हैं। वे सभी दैत्य वरदान पाकर शौर्यसम्पन्न हो मृत्युरहित हो गये हैं। उनका चरित्र एवं व्रत बहुत उत्तम है ॥ १२—१७ ॥ तथा समुद्राश्चत्वारो नदी भागीरथी च सा । कालिन्दी विदिशा वेणा नर्मदा वेगवाहिनी ॥ १८ ॥ चारों समुद्र, भागीरथी नदी, कालिन्दी, विदिशा, वेणा, नर्मदा, वेगवाहिनी, ॥ १८ ॥ विपाशा च शतद्रुश्च चन्द्रभागा सरस्वती । इरावती वितस्ता च सिन्धुर्देवनदी तथा ॥ १९ ॥ विपाशा, शतद्रु, चन्द्रभागा, सरस्वती, इरावती, वितस्ता, सिन्धु, देवनदी, ॥ १९ ॥ गोदावरी कृष्णवेणा कावेरी च सरिद्वरा । किम्पुना च विशल्या च तथा वैतरणी नदी ॥ २० ॥ गोदावरी, कृष्णवेणा, सरिताओंमें श्रेष्ठ कावेरी, किम्पुना, विशल्या, वैतरणी नदी, ॥ २० ॥ तृतीया ज्येष्ठीला चैव शोणश्चापि महानदः । चर्मण्वती तथा चैव पर्णाशा च महानदी ॥ २१ ॥ तृतीया, ज्येष्ठीला, महानद शोण, चर्मण्वती, पर्णाशा, महानदी, ॥ २१ ॥ सरयूर्वारवत्याथ लाङ्गली च सरिद्वरा । करतोया तथात्रेयी लौहित्यश्च महानदः ॥ २२ ॥
सरयू, वारवत्या, सरिताओंमें श्रेष्ठ लांगली, करतोया, आत्रेयी, महानद लौहित्य, ।। २२ ।।
लङ्घती गोमती चैव संध्या त्रिःस्रोतसी तथा ।
एताश्चान्याश्च राजेन्द्र सुतीर्था लोकविश्रुताः ।। २३ ।।
भरतवंशी राजेन्द्र युधिष्ठिर! लंघती, गोमती, संध्या और त्रिस्रोतसी, ये तथा दूसरे लोकविख्यात उत्तम तीर्थ (वहाँ वरुणकी उपासना करते हैं), ।। २३ ।।
सरितः सर्वतश्चान्यास्तीर्थानि च सरांसि च ।
कूपाश्च सप्रस्रवणा देहवन्तो युधिष्ठिर ।। २४ ।।
पल्वलानि तडागानि देहवन्त्यथ भारत ।
दिशस्तथा मही चैव तथा सर्वे महीधराः ।। २५ ।।
उपासते महात्मानं सर्वे जलचरास्तथा ।
समस्त सरिताएँ, जलाशय, सरोवर, कूप, झरने, पोखरे और तालाब, सम्पूर्ण दिशाएँ, पृथ्वी, पर्वत तथा सम्पूर्ण जलचर जीव अपने-अपने स्वरूप धारण करके महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं ।। २४-२५ १/२ ।।
गीतवादित्रवन्तश्च गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।। २६ ।।
स्तुवन्तो वरुणं तस्यां सर्व एव समासते ।
सभी गन्धर्व और अप्सराओंके समुदाय भी गीत गाते और बाजे बजाते हुए उस सभामें वरुणदेवताकी स्तुति एवं उपासना करते हैं ।। २६ १/२ ।।
महीधरा रत्नवन्तो रसा ये च प्रतिष्ठिताः ।। २७ ।।
कथयन्तः सुमधुराः कथास्तत्र समासते ।
रत्नयुक्त पर्वत और प्रतिष्ठित रस (मूर्तिमान् होकर) अत्यन्त मधुर कथाएँ कहते हुए वहाँ निवास करते हैं ।। २७ १/२ ।।
वारुणश्च तथा मन्त्री सुनाभः पर्युपासते ।। २८ ।।
पुत्रपौत्रैः परिवृतो गोनाम्ना पुष्करेण च ।
वरुणका मन्त्री सुनाभ अपने पुत्र-पौत्रोंसे घिरा हुआ गौ तथा पुष्कर नामवाले तीर्थके साथ वरुणदेवकी उपासना करता है ।। २८ १/२ ।।
सर्वे विग्रहवन्तस्ते तमीश्वरमुपासते ।। २९ ।।
ये सभी शरीर धारण करके लोकेश्वर वरुणकी उपासना करते रहते हैं ।। २९ ।।
एषा मया सम्पत्तता वारुणी भरतर्षभ ।
दृष्टपूर्वा सभा रम्या कुबेरस्य सभां शृणु ।। ३० ।।
भरतश्रेष्ठ! पहले सब ओर घूमते हुए मैंने वरुणजीकी इस रमणीय सभाका भी दर्शन किया है। अब तुम कुबेरकी सभाका वर्णन सुनो ।। ३० ।।
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि वरुणसभावर्णने नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें वरुणसभा- वर्णनविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं)