महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अरुणश्च यथैवास्य सारथ्यमकरोत् प्रभुः ।
भूय एवापरं प्रश्नं शृणु पूर्वमुदाहृतम् ॥ २० ॥
शक्तिशाली अरुणने सूर्यके सारथिका कार्य क्यों किया, यह बात भी इस प्रसंगमें स्पष्ट हो गयी है। अब अपने पूर्वकथित दूसरे प्रश्नका पुनः उत्तर सुनो ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 247)
पञ्चविंशोऽध्यायः
सूर्यके तापसे मूर्च्छित हुए सर्पोंकी रक्षाके लिये कद्रूद्वारा इन्द्रदेवकी स्तुति
सौतिरुवाच
ततः कामगमः पक्षी महावीर्यो महाबलः ।
मातुरन्तिकमागच्छत् परं पारं महोदधेः ॥ १ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**शौनकादि महर्षियो! तदनन्तर इच्छानुसार गमन करनेवाले महान् पराक्रमी तथा महाबली गरुड समुद्रके दूसरे पार अपनी माताके समीप आये ॥ १ ॥
यत्र सा विनता तस्मिन् पणितेन पराजिता ।
अतीव दुःखसंतप्ता दासीभावमुपागता ॥ २ ॥
जहाँ उनकी माता विनता बाजी हार जानेसे दासी-भावको प्राप्त हो अत्यन्त दुःखसे संतप्त रहती थीं ॥ २ ॥
ततः कदाचिद् विनतां प्रणतां पुत्रसंनिधौ ।
काले चाहूय वचनं कद्रूरिदमभाषत ॥ ३ ॥
एक दिन अपने पुत्रके समीप बैठी हुई विनय-शील विनताको किसी समय बुलाकर कद्रूने यह बात कही— ॥ ३ ॥
नागानामालयं भद्रे सुरम्यं चारुदर्शनम् ।
समुद्रकुक्षावेकान्ते तत्र मां विनते नय ॥ ४ ॥
‘कल्याणी विनते! समुद्रके भीतर निर्जन प्रदेशमें एक बहुत रमणीय तथा देखनेमें अत्यन्त मनोहर नागोंका निवासस्थान है। तू वहाँ मुझे ले चल’ ॥ ४ ॥
ततः सुपर्णमाता तामवहत् सर्पमातरम् ।
पन्नगान् गरुडश्चापि मातुर्वचनचोदितः ॥ ५ ॥
तब गरुडकी माता विनता सर्पोंकी माता कद्रूको अपनी पीठपर ढोने लगी। इधर माताकी आज्ञासे गरुड भी सर्पोंको अपनी पीठपर चढ़ाकर ले चले ॥ ५ ॥
स सूर्यमभितो याति वैनतेयो विहंगमः ।
सूर्यरश्मिप्रतप्ताश्च मूर्च्छिताः पन्नगाभवन् ॥ ६ ॥
पक्षिराज गरुड आकाशमें सूर्यके निकट होकर चलने लगे। अतः सर्प सूर्यकी किरणोंसे संतप्त हो मूर्च्छित हो गये ॥ ६ ॥
तदवस्थान् सुतान् दृष्ट्वा कद्रूः शक्रमथास्तुवत् ।
नमस्ते सर्वदेवेश नमस्ते बलसूदन ॥ ७ ॥
अपने पुत्रोंको इस दशामें देखकर कद्रू इन्द्रकी स्तुति करने लगी—'सम्पूर्ण देवताओंके ईश्वर! तुम्हें नमस्कार है। बलसूदन! तुम्हें नमस्कार है ॥ ७ ॥ नमुचिघ्न नमस्तेऽस्तु सहस्राक्ष शचीपते । सर्पाणां सूर्यतप्तानां वारिणा त्वं प्लवो भव ॥ ८ ॥ 'सहस्र नेत्रोंवाले नमुचिनाशन! शचीपते! तुम्हें नमस्कार है। तुम सूर्यके तापसे संतप्त हुए सर्पोंको जलसे नहलाकर नौकाकी भाँति उनके रक्षक हो जाओ ॥ ८ ॥ त्वमेव परमं त्राणमस्माकममरोत्तम । ईशो ह्यसि पयः स्रष्टुं त्वमनल्पं पुरन्दर ॥ ९ ॥ 'अमरोत्तम! तुम्हीं हमारे सबसे बड़े रक्षक हो । पुरन्दर! तुम अधिक-से-अधिक जल बरसानेकी शक्ति रखते हो ॥ ९ ॥ त्वमेव मेघस्त्वं वायुस्त्वमग्निर्विद्युतोऽम्बरे । त्वमभ्रगणविक्षेप्ता त्वामेवाहुर्महाघनम् ॥ १० ॥ 'तुम्हीं मेघ हो, तुम्हीं वायु हो और तुम्हीं आकाशमें बिजली बनकर प्रकाशित होते हो। तुम्हीं बादलोंको छिन्न-भिन्न करनेवाले हो और विद्वान् पुरुष तुम्हें ही महामेघ कहते हैं ॥ १० ॥ त्वं वज्रमतुलं घोरं घोषवांस्त्वं बलाहकः । स्रष्टा त्वमेव लोकानां संहर्ता चापराजितः ॥ ११ ॥ 'संसारमें जिसकी कहीं तुलना नहीं है, वह भयानक वज्र तुम्हीं हो, तुम्हीं भयंकर गर्जना करनेवाले बलाहक (प्रलयकालीन मेघ) हो। तुम्हीं सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि और संहार करनेवाले हो। तुम कभी परास्त नहीं होते ॥ ११ ॥ त्वं ज्योतिः सर्वभूतानां त्वमादित्यो विभावसुः । त्वं महद्भूतमाश्चर्यं त्वं राजा त्वं सुरोत्तमः ॥ १२ ॥ 'तुम्हीं समस्त प्राणियोंकी ज्योति हो। सूर्य और अग्नि भी तुम्हीं हो। तुम आश्चर्यमय महान् भूत हो, तुम राजा हो और तुम देवताओंमें सबसे श्रेष्ठ हो ॥ १२ ॥ त्वं विष्णुस्त्वं सहस्राक्षस्त्वं देवस्त्वं परायणम् । त्वं सर्वममृतं देव त्वं सोमः परमार्चितः ॥ १३ ॥ 'तुम्हीं सर्वव्यापी विष्णु, सहस्रलोचन इन्द्र, द्युतिमान् देवता और सबके परम आश्रय हो। देव! तुम्हीं सब कुछ हो। तुम्हीं अमृत हो और तुम्हीं परम पूजित सोम हो ॥ १३ ॥ त्वं मुहूर्तस्तिथिस्त्वं च त्वं लवस्त्वं पुनः क्षणः । शुक्लस्त्वं बहुलस्त्वं च कला काष्ठा त्रुटिस्तथा । संवत्सरर्तवो मासा रजन्यश्च दिनानि च ॥ १४ ॥ 'तुम मुहूर्त हो, तुम्हीं तिथि हो, तुम्हीं लव तथा तुम्हीं क्षण हो। शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष भी तुमसे भिन्न नहीं हैं। कला, काष्ठा और त्रुटि सब तुम्हारे ही स्वरूप हैं। संवत्सर, ऋतु,
मास, रात्रि तथा दिन भी तुम्हीं हो ।। १४ ।। त्वमुत्तमा सगिरिवना वसुन्धरा सभास्करं वितिमिरमम्बरं तथा । महोदधिः सतिमितिमिंगिलस्तथा महोर्मिमान् बहुमकरो झषाकुलः ।। १५ ।। 'तुम्हीं पर्वत और वनोंसहित उत्तम वसुन्धरा हो और तुम्हीं अन्धकाररहित एवं सूर्यसहित आकाश हो। तिमि और तिमिंगिलोंसे भरपूर, बहुतेरे मगरों और मत्स्योंसे व्याप्त तथा उत्ताल तरंगोंसे सुशोभित महासागर भी तुम्हीं हो ।। १५ ।।
महाशास्त्वमिति सदाभिपूज्यसे मनीषिभिर्मुदितमना महर्षिभिः । अभिष्टुतः पिबसि च सोममध्वरे वषट्कृतान्यपि च हवींषि भूतये ।। १६ ।। 'तुम महान् यशस्वी हो। ऐसा समझकर मनीषी पुरुष सदा तुम्हारी पूजा करते हैं। महर्षिगण निरन्तर तुम्हारा स्तवन करते हैं। तुम यजमानकी अभीष्टसिद्धि करनेके लिये यज्ञमें मुदित मनसे सोमरस पीते हो और वषट्कारपूर्वक समर्पित किये हुए हविष्य भी ग्रहण करते हो ।। १६ ।।
त्वं विप्रैः सततमितीज्यसे फलार्थ वेदाङ्गेष्वतुलबलौघ गीयसे च । त्वद्धेतोर्यजनपरायणा द्विजेन्द्रा वेदाङ्गान्याभिगमयन्ति सर्वयत्नैः ।। १७ ।। 'इस जगत्में अभीष्ट फलकी प्राप्तिके लिये विप्रगण तुम्हारी पूजा करते हैं। अतुलित बलके भण्डार इन्द्र! वेदांगोंमें भी तुम्हारी ही महिमाका गान किया गया है। यज्ञपरायण श्रेष्ठ द्विज तुम्हारी प्राप्तिके लिये ही सर्वथा प्रयत्न करके वेदांगोंका ज्ञान प्राप्त करते हैं (यहाँ कद्रूके द्वारा ईश्वररूपसे इन्द्रकी स्तुति की गयी है)' ।। १७ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे पञ्चविंशोऽध्यायः ।। २५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २५ ।।
अध्याय (पृष्ठ 250)
षड्विंशोऽध्यायः
इन्द्रद्वारा की हुई वर्षासे सर्पोंकी प्रसन्नता
सौतिरुवाच
एवं स्तुतस्तदा कद्रुवा भगवान् हरिवाहनः ।
नीलजीमूतसंघातैः सर्वमम्बरमावृणोत् ॥ १ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**नागमाता कद्रूके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् इन्द्रने मेघोंकी काली घटाओंद्वारा सम्पूर्ण आकाशको आच्छादित कर दिया ॥ १ ॥
मेघानाज्ञापयामास वर्षध्वममृतं शुभम् ।
ते मेघा मुमुचुस्तोयं प्रभूतं विद्युदुज्ज्वलाः ॥ २ ॥
साथ ही मेघोंको आज्ञा दी—'तुम सब शीतल जलकी वर्षा करो।' आज्ञा पाकर बिजलियोंसे प्रकाशित होनेवाले उन मेघोंने प्रचुर जलकी वृष्टि की ॥ २ ॥
परस्परमिवात्यर्थं गर्जन्तः सततं दिवि ।
संवर्तितमिवाकाशं जलदैः सुमहाद्भुतैः ॥ ३ ॥
सृजद्भिरतुलं तोयमजस्रं सुमहारवैः ।
सम्प्रनृत्तमिवाकाशं धारोर्मिभिरनेकशः ॥ ४ ॥
वे परस्पर अत्यन्त गर्जना करते हुए आकाशसे निरन्तर पानी बरसाते रहे। जोर-जोरसे गर्जने और लगातार असीम जलकी वर्षा करनेवाले अत्यन्त अद्भुत जलधरोंने सारे आकाशको घेर-सा लिया था। असंख्य धारारूप लहरोंसे युक्त वह व्योमसमुद्र मानो नृत्य-सा कर रहा था ॥ ३-४ ॥
मेघस्तनितनिर्घोषैर्विद्युत्पवनकम्पितैः ।
तैर्मेघैः सततासारं वर्षद्भिरनिशं तदा ॥ ५ ॥
नष्टचन्द्रार्ककिरणमम्बरं समपद्यत ।
नागानामुत्तमो हर्षस्तथा वर्षति वासवे ॥ ६ ॥
भयंकर गर्जन-तर्जन करनेवाले वे मेघ बिजली और वायुसे प्रकम्पित हो उस समय निरन्तर मूसलाधार पानी गिरा रहे थे। उनके द्वारा आच्छादित आकाशमें चन्द्रमा और सूर्यकी किरणें भी अदृश्य हो गयी थीं। इन्द्रदेवके इस प्रकार वर्षा करनेपर नागोंको बड़ा हर्ष हुआ ॥ ५-६ ॥
आपूर्यत मही चापि सलिलेन समन्ततः ।
रसातलमनुप्राप्तं शीतलं विमलं जलम् ॥ ७ ॥
पृथ्वीपर सब ओर पानी-ही-पानी भर गया। वह शीतल और निर्मल जल रसातलतक पहुँच गया ॥ ७ ॥
तदा भूरभवच्छन्ना जलोर्मिभिरनेकशः । रामणीयकमागच्छन् मात्रा सह भुजङ्गमाः ॥ ८ ॥ उस समय सारा भूतल जलकी असंख्य तरंगोंसे आच्छादित हो गया था। इस प्रकार वर्षासे संतुष्ट हुए सर्प अपनी माताके साथ रामणीयक द्वीपमें आ गये ॥ ८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
रमणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुड़का दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना
सप्तविंशोऽध्यायः
रमणीयक द्वीपके मनोरम वनका वर्णन तथा गरुड़का दास्यभावसे छूटनेके लिये सर्पोंसे उपाय पूछना
सौतिरुवाच
सम्प्रहृष्टास्ततो नागा जलधाराप्लुतास्तदा ।
सुपर्णनोह्यमानास्ते जग्मुस्तं द्वीपमाशु वै ॥ १ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**गरुडपर सवार होकर यात्रा करनेवाले वे नाग उस समय जलधारासे नहाकर अत्यन्त प्रसन्न हो शीघ्र ही रमणीयक द्वीपमें जा पहुँचे ॥ १ ॥
तं द्वीपं मकरावासं विहितं विश्वकर्मणा ।
तत्र ते लवणं घोरं ददृशुः पूर्वमागताः ॥ २ ॥
विश्वकर्माजीके बनाये हुए उस द्वीपमें, जहाँ अब मगर निवास करते थे, जब पहली बार नाग आये थे तो उन्हें वहाँ भयंकर लवणासुरका दर्शन हुआ था ॥ २ ॥
सुपर्णसहिताः सर्पाः काननं च मनोरमम् ।
सागराम्बुपरिक्षिप्तं पक्षिसङ्घनिनादितम् ॥ ३ ॥
सर्प गरुडके साथ उस द्वीपके मनोरम वनमें आये, जो चारों ओरसे समुद्रद्वारा घिरकर उसके जलसे अभिषिक्त हो रहा था। वहाँ झुंड-के-झुंड पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ ३ ॥
विचित्रफलपुष्पाभिर्वनराजिभिरावृतम् ।
भवनैरावृतं रम्यैस्तथा पद्माकरैरपि ॥ ४ ॥
विचित्र फूलों और फलोंसे भरी हुई वनश्रेणियाँ उस दिव्य वनको घेरे हुए थीं। वह वन बहुत-से रमणीय भवनों और कमलयुक्त सरोवरोंसे आवृत था ॥ ४ ॥
प्रसन्नसलिलैश्चापि ह्रदैर्दिव्यैर्विभूषितम् ।
दिव्यगन्धवहैः पुण्यैर्मारुतैरुपवीजितम् ॥ ५ ॥
स्वच्छ जलवाले कितने ही दिव्य सरोवर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। दिव्य सुगन्धका भार वहन करनेवाली पावन वायु मानो वहाँ चँवर डुला रही थी ॥ ५ ॥
उत्पतद्भिरिवाकाशं वृक्षैर्मलयजैरपि ।
शोभितं पुष्पवर्षाणि मुञ्चद्भिर्मारुतोद्धतैः ॥ ६ ॥
वहाँ ऊँचे-ऊँचे मलयज वृक्ष ऐसे प्रतीत होते थे, मानो आकाशमें उड़े जा रहे हों। वे वायुके वेगसे विकम्पित हो फूलोंकी वर्षा करते हुए उस प्रदेशकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ६ ॥
वायुविक्षिप्तकुसुमैस्तथान्यैरपि पादपैः ।
किरद्भिरिव तत्रस्थान् नागान् पुष्पाम्बुवृष्टिभिः ॥ ७ ॥
हवाके झोंकेसे दूसरे-दूसरे वृक्षोंके भी फूल झड़ रहे थे, मानो वहाँके वृक्षसमूह वहाँ उपस्थित हुए नागोंपर फूलोंकी वर्षा करते हुए उनके लिये अर्घ्य दे रहे हों ।। ७ ।। मनःसंहर्षजं दिव्यं गन्धर्वाप्सरसां प्रियम् । मत्तभ्रमरसंघुष्टं मनोज्ञाकृतिदर्शनम् ।। ८ ।। वह दिव्य वन हृदयके हर्षको बढ़ानेवाला था। गन्धर्व और अप्सराएँ उसे अधिक पसंद करती थीं। मतवाले भ्रमर वहाँ सब ओर गूँज रहे थे। अपनी मनोहर छटाके द्वारा वह अत्यन्त दर्शनीय जान पड़ता था ।। ८ ।। रमणीयं शिवं पुण्यं सर्वैर्जनमनोहरैः । नानापक्षिरुतं रम्यं कद्रुपुत्रप्रहर्षणम् ।। ९ ।। वह वन रमणीय, मंगलकारी और पवित्र होनेके साथ ही लोगोंके मनको मोहनेवाले सभी उत्तम गुणोंसे युक्त था। भाँति भाँतिके पक्षियोंके कलरवोंसे व्याप्त एवं परम सुन्दर होनेके कारण वह कद्रूके पुत्रोंका आनन्द बढ़ा रहा था ।। ९ ।। तत् ते वनं समासाद्य विजहुः पन्नगास्तदा । अब्रुवंश्च महावीर्यं सुपर्णं पतगेश्वरम् ।। १० ।। उस वनमें पहुँचकर वे सर्प उस समय सब ओर विहार करने लगे और महापराक्रमी पक्षिराज गरुडसे इस प्रकार बोले— ।। १० ।। वहास्मानपरं द्वीपं सुरम्यं विमलोदकम् । त्वं हि देशान् बहून् रम्यान् व्रजन् पश्यसि खेचर ।। ११ ।। 'खेचर! तुम आकाशमें उड़ते समय बहुत-से रमणीय प्रदेश देखा करते हो; अतः हमें निर्मल जलवाले किसी दूसरे रमणीय द्वीपमें ले चलो' ।। ११ ।। स विचिन्त्याब्रवीत् पक्षी मातरं विनतां तदा । किं कारणं मया मातः कर्तव्यं सर्पभाषितम् ।। १२ ।। गरुडने कुछ सोचकर अपनी माता विनतासे पूछा—'माँ! क्या कारण है कि मुझे सर्पोंकी आज्ञाका पालन करना पड़ता है?' ।। १२ ।।
विनतोवाच
दासीभूतास्मि दुर्भोगात् सपत्न्याः पतगोत्तम । पणं वितथमास्थाय सर्पैरुपधिना कृतम् ।। १३ ।। विनता बोली— बेटा पक्षिराज! मैं दुर्भाग्यवश सौतकी दासी हूँ, इन सर्पोंने छल करके मेरी जीती हुई बाजीको पलट दिया था ।। १३ ।। तस्मिंस्तु कथिते मात्रा कारणे गगनेचरः । उवाच वचनं सर्पांस्तेन दुःखेन दुःखितः ।। १४ ।।
माताके यह कारण बतानेपर आकाशचारी गरुडने उस दुःखसे दुःखी होकर सर्पोंसे कहा— ॥ १४ ॥
किमाहृत्य विदित्वा वा किं वा कृत्वेह पौरुषम् ।
दास्याद् वो विप्रमुच्येयं तथ्यं वदत लेलिहाः ॥ १५ ॥
‘जीभ लपलपानेवाले सर्पो! तुमलोग सच-सच बताओ मैं तुम्हें क्या लाकर दे दूँ? किस विद्याका लाभ करा दूँ अथवा यहाँ कौन-सा पुरुषार्थ करके दिखा दूँ; जिससे मुझे तथा मेरी माताको तुम्हारी दासतासे छुटकारा मिल जाय’ ॥ १५ ॥
सौतिरुवाच
श्रुत्वा तमब्रुवन् सर्पा आहरामृतमोजसा ।
ततो दास्याद् विप्रमोक्षो भविता तव खेचर ॥ १६ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**गरुडकी बात सुनकर सर्पोंने कहा—‘गरुड! तुम पराक्रम करके हमारे लिये अमृत ला दो। इससे तुम्हें दास्यभावसे छुटकारा मिल जायगा’ ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥
अध्याय (पृष्ठ 255)
अष्टाविंशोऽध्यायः
गरुडका अमृतके लिये जाना और अपनी माताकी आज्ञाके अनुसार निषादोंका भक्षण करना
सौतिरुवाच
इत्युक्तो गरुडः सर्पैस्ततो मातरमब्रवीत् ।
गच्छाम्यमृतमाहर्तुं भक्ष्यमिच्छामि वेदितुम् ॥ १ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— सर्पोंकी यह बात सुनकर गरुड अपनी मातासे बोले—‘माँ! मैं अमृत लानेके लिये जा रहा हूँ, किंतु मेरे लिये भोजन-सामग्री क्या होगी? यह मैं जानना चाहता हूँ’ ॥ १ ॥
विनतोवाच
समुद्रकुक्षावेकान्ते निषादालयमुत्तमम् ।
निषादानां सहस्राणि तान् भुक्त्वामृतमानय ॥ २ ॥
विनताने कहा— समुद्रके बीचमें एक टापू है, जिसके एकान्त प्रदेशमें निषादों (जीवहिंसकों)-का निवास है। वहाँ सहस्रों निषाद रहते हैं। उन्हींको मारकर खा लो और अमृत ले आओ ॥ २ ॥
न च ते ब्राह्मणं हन्तुं कार्या बुद्धिः कथंचन ।
अवध्यः सर्वभूतानां ब्राह्मणो ह्यनलोपमः ॥ ३ ॥
किंतु तुम्हें किसी प्रकार ब्राह्मणको मारनेका विचार नहीं करना चाहिये; क्योंकि ब्राह्मण समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य है। वह अग्निके समान दाहक होता है ॥ ३ ॥
अग्निरर्को विषं शस्त्रं विप्रो भवति कोपितः ।
गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मणः परिकीर्तितः ॥ ४ ॥
कुपित किया हुआ ब्राह्मण अग्नि, सूर्य, विष एवं शस्त्रके समान भयंकर होता है। ब्राह्मणको समस्त प्राणियोंका गुरु कहा गया है ॥ ४ ॥
एवमादिस्वरूपैस्तु सतां वै ब्राह्मणो मतः ।
स ते तात न हन्तव्यः संक्रुद्धेनापि सर्वथा ॥ ५ ॥
इन्हीं रूपोंमें सत्पुरुषोंके लिये ब्राह्मण आदरणीय माना गया है। तात! तुम्हें क्रोध आ जाय तो भी ब्राह्मणकी हत्यासे सर्वथा दूर रहना चाहिये ॥ ५ ॥
ब्राह्मणानामभिद्रोहो न कर्तव्यः कथंचन ।
न ह्येवमग्निर्नादित्यो भस्म कुर्यात् तथानघ ॥ ६ ॥
यथा कुर्यादभिक्रुद्धो ब्राह्मणः संशितव्रतः ।
तदेतैर्विविधैर्लिङ्गैस्त्वं विद्यास्तं द्विजोत्तमम् ।। ७ ।। भूतानामग्रभूर्विप्रो वर्णश्रेष्ठः पिता गुरुः । ब्राह्मणोंके साथ किसी प्रकार द्रोह नहीं करना चाहिये। अनघ! कठोर व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण क्रोधमें आनेपर अपराधीको जिस प्रकार जलाकर भस्म कर देता है, उस तरह अग्नि और सूर्य भी नहीं जला सकते। इस प्रकार विविध चिह्नोंके द्वारा तुम्हें ब्राह्मणको पहचान लेना चाहिये। ब्राह्मण समस्त प्राणियोंका अग्रज, सब वर्णोंमें श्रेष्ठ, पिता और गुरु है ।। ६-७ १/२ ।।
गरुड उवाच
किंरूपो ब्राह्मणो मातः किंशीलः किंवाक्रमः ।। ८ ।। गरुडने पूछा—माँ! ब्राह्मणका रूप कैसा होता है? उसका शील-स्वभाव कैसा है? तथा उसमें कौन-सा पराक्रम है ।। ८ ।। किंस्विदग्निनिभो भाति किंस्वित् सौम्यप्रदर्शनः । यथाहमभिजानीयां ब्राह्मणं लक्षणैः शुभैः ।। ९ ।। तन्मे कारणतो मातः पृच्छतो वक्तुमर्हसि । वह देखनेमें अग्नि-जैसा जान पड़ता है? अथवा सौम्य दिखायी देता है? माँ! जिस प्रकार शुभ लक्षणोंद्वारा मैं ब्राह्मणको पहचान सकूँ, वह सब उपाय मुझे बताओ ।। ९ १/२ ।।
विनतोवाच
यस्ते कण्ठमनुप्राप्तो निगीर्णं बडिशं यथा ।। १० ।। दहेदङ्गारवत् पुत्र तं विद्या ब्राह्मणर्षभम् । विप्रस्त्वया न हन्तव्यः संक्रुद्धेनापि सर्वदा ।। ११ ।। विनता बोली—बेटा! जो तुम्हारे कण्ठमें पड़नेपर अंगारकी तरह जलाने लगे और मानो बंसीका काँटा निगल लिया गया हो, इस प्रकार कष्ट देने लगे, उसे वर्णोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण समझना। क्रोधमें भरे होनेपर भी तुम्हें ब्रह्महत्या नहीं करनी चाहिये ।। १०-११ ।। प्रोवाच चैनं विनता पुत्रहार्दादिदं वचः । जठरे न च जीर्येद् यस्तं जानीहि द्विजोत्तमम् ।। १२ ।। विनताने पुत्रके प्रति स्नेह होनेके कारण पुनः इस प्रकार कहा—‘बेटा! जो तुम्हारे पेटमें पच न सके, उसे ब्राह्मण जानना’ ।। १२ ।। पुनः प्रोवाच विनता पुत्रहार्दादिदं वचः । जानन्त्यप्यतुलं वीर्यमाशीर्वादपरायणा ।। १३ ।। प्रीता परमदुःखार्ता नागैर्विप्रकृता सती ।
पुत्रके प्रति स्नेह होनेके कारण विनताने पुनः इस प्रकार कहा—वह पुत्रके अनुपम बलको जानती थी तो भी नागोंद्वारा ठगी जानेके कारण बड़े भारी दुःखसे आतुर हो गयी थी। अतः अपने पुत्रको प्रेमपूर्वक आशीर्वाद देने लगी ॥ १३१/२ ॥
विनतोवाच
पक्षौ ते मारुतः पातु चन्द्रसूर्यौ च पृष्ठतः ॥ १४ ॥ विनताने कहा— बेटा! वायु तुम्हारे दोनों पंखोंकी रक्षा करें, चन्द्रमा और सूर्य पृष्ठभागका संरक्षण करें ॥ १४ ॥
शिरश्च पातु वह्निस्ते वसवः सर्वतस्तनुम् ।
अहं च ते सदा पुत्र शान्तिस्वस्तिपरायणा ॥ १५ ॥
इहासीना भविष्यामि स्वस्तिकारे रता सदा ।
अरिष्टं व्रज पन्थानं पुत्र कार्यार्थसिद्धये ॥ १६ ॥
अग्निदेव तुम्हारे सिरकी और वसुगण तुम्हारे सम्पूर्ण शरीरकी सब ओरसे रक्षा करें। पुत्र! मैं भी तुम्हारे लिये शान्ति एवं कल्याणसाधक कर्ममें संलग्न हो यहाँ निरन्तर कुशल मनाती रहूँगी। वत्स! तुम्हारा मार्ग विघ्नरहित हो, तुम अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये यात्रा करो ॥ १५-१६ ॥
सौतिरुवाच
ततः स मातुर्वचनं निशम्य
वितत्य पक्षौ नभ उत्पपात ।
ततो निषादान् बलवानुपागतो
बुभुक्षितः काल इवान्तकोऽपरः ॥ १७ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनकादि महर्षियो! माताकी बात सुनकर महाबली गरुड पंख पसारकर आकाशमें उड़ गये तथा क्षुधातुर काल या दूसरे यमराजकी भाँति उन निषादोंके पास जा पहुँचे ॥ १७ ॥
स तान् निषादानुपसंहरंस्तदा
रजः समुद्धूय नभःस्पृशं महत् ।
समुद्रकुक्षौ च विशोषयन् पयः
समीपजान् भूधरजान् विचालयन् ॥ १८ ॥
उन निषादोंका संहार करनेके लिये उन्होंने उस समय इतनी अधिक धूल उड़ायी, जो पृथ्वीसे आकाशतक छा गयी। वहाँ समुद्रकी कुक्षिमें जो जल था, उसका शोषण करके उन्होंने समीपवर्ती पर्वतीय वृक्षोंको भी विकम्पित कर दिया ॥ १८ ॥
ततः स चक्रे महदाननं तदा
निषादमार्गं प्रतिरुध्य पक्षिराट् ।
ततो निषादास्त्वरिताः प्रवव्रजुः
यतो मुखं तस्य भुजङ्गभोजिनः ॥ १९ ॥
इसके बाद पक्षिराजने अपना मुख बहुत बड़ा कर लिया और निषादोंका मार्ग रोककर खड़े हो गये। तदनन्तर वे निषाद उतावलीमें पड़कर उसी ओर भागे, जिधर सर्पभोजी गरुडका मुख था ॥ १९ ॥
तदाननं विवृतमतिप्रमाणवत्
समभ्ययुर्गगनमिवार्दिताः खगाः ।
सहस्रशः पवनरजोविमोहिता
यथानिलप्रचलितपादपे वने ॥ २० ॥
जैसे आँधीसे कम्पित वृक्षवाले वनमें पवन और धूलसे विमोहित एवं पीड़ित सहस्रों पक्षी उन्मुक्त आकाशमें उड़ने लगते हैं, उसी प्रकार हवा और धूलकी वर्षासे बेसुध हुए हजारों निषाद गरुडके खुले हुए अत्यन्त विशाल मुखमें समा गये ॥ २० ॥
ततः खगो वदनममित्रतापनः
समाहरत् परिचपलो महाबलः ।
निष्पीडयन् बहुविधमत्स्यजीविनो
बुभुक्षितो गगनचरेश्वरस्तदा ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले, अत्यन्त चपल, महाबली और क्षुधातुर पक्षिराज गरुडने मछली मारकर जीविका चलानेवाले उन अनेकानेक निषादोंका विनाश करनेके लिये अपने मुखको संकुचित कर लिया ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्रविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना
सौतिरुवाच
तस्य कण्ठमनुप्राप्तो ब्राह्मणः सह भार्यया ।
दहन् दीप्त इवाङ्गारस्तमुवाचान्तरिक्षगः ॥ १ ॥
द्विजोत्तम विनिर्गच्छ तूर्णमास्यादपावृतात् ।
न हि मे ब्राह्मणो वध्यः पापेष्वपि रतः सदा ॥ २ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**निषादोंके साथ एक ब्राह्मण भी भार्यासहित गरुडके कण्ठमें चला गया था। वह दहकते हुए अंगारकी भाँति जलन पैदा करने लगा। तब आकाशचारी गरुडने उस ब्राह्मणसे कहा—'द्विजश्रेष्ठ! तुम मेरे खुले हुए मुखसे जल्दी निकल जाओ। ब्राह्मण पापपरायण ही क्यों न हो मेरे लिये सदा अवध्य है' ॥ १-२ ॥
ब्रुवाणमेवं गरुडं ब्राह्मणः प्रत्यभाषत ।
निषादी मम भार्येयं निर्गच्छतु मया सह ॥ ३ ॥
ऐसी बात कहनेवाले गरुडसे वह ब्राह्मण बोला—'यह निषाद-जातिकी कन्या मेरी भार्या है; अतः मेरे साथ यह भी निकले (तभी मैं निकल सकता हूँ)' ॥ ३ ॥
गरुड उवाच
एतामपि निषादीं त्वं परिगृह्याशु निष्पत ।
तूर्णं सम्भावयात्मानमजीर्णं मम तेजसा ॥ ४ ॥
**गरुडने कहा—**ब्राह्मण! तुम इस निषादीको भी लेकर जल्दी निकल जाओ। तुम अभीतक मेरी जठराग्निके तेजसे पचे नहीं हो; अतः शीघ्र अपने जीवनकी रक्षा करो ॥ ४ ॥
सौतिरुवाच
ततः स विप्रो निष्क्रान्तो निषादीसहितस्तदा ।
वर्धयित्वा च गरुडमिष्टं देशं जगाम ह ॥ ५ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**उनके ऐसा कहनेपर वह ब्राह्मण निषादीसहित गरुडके मुखसे निकल आया और उन्हें आशीर्वाद देकर अभीष्ट देशको चला गया ॥ ५ ॥
सहभार्ये विनिष्क्रान्ते तस्मिन् विप्रे च पक्षिराट् ।
वितत्य पक्षावाकाशमुत्पपात मनोजवः ॥ ६ ॥
भार्यासहित उस ब्राह्मणके निकल जानेपर पक्षिराज गरुड पंख फैलाकर मनके समान तीव्र वेगसे आकाशमें उड़े ॥ ६ ॥
ततोऽपश्यत् स पितरं पृष्टश्चाख्यातवान् पितुः ।
यथान्यायममेयात्मा तं चोवाच महर्षिः ॥ ७ ॥
तदनन्तर उन्हें अपने पिता कश्यपजीका दर्शन हुआ। उनके पूछनेपर अमेयात्मा गरुडने पितासे यथोचित कुशल-समाचार कहा। महर्षि कश्यप उनसे इस प्रकार बोले ॥ ७ ॥
कश्यप उवाच
कच्चिद् वः कुशलं नित्यं भोजने बहुलं सुत ।
कच्चिच्च मानुषे लोके तवान्नं विद्यते बहु ॥ ८ ॥
**कश्यपजीने पूछा—**बेटा! तुमलोग कुशलसे तो हो न? विशेषतः प्रतिदिन भोजनके सम्बन्धमें तुम्हें विशेष सुविधा है न? क्या मनुष्यलोकमें तुम्हारे लिये पर्याप्त अन्न मिल जाता है ॥ ८ ॥
गरुड उवाच
माता मे कुशला शाश्वत् तथा भ्राता तथा ह्यहम् ।
न हि मे कुशलं तात भोजने बहुले सदा ॥ ९ ॥
**गरुडने कहा—**मेरी माता सदा कुशलसे रहती हैं। मेरे भाई तथा मैं दोनों सकुशल हैं। परंतु पिताजी! पर्याप्त भोजनके विषयमें तो सदा मेरे लिये कुशलका अभाव ही है ॥ ९ ॥
अहं हि सर्पैः प्रहितः सोममाहर्तुमुत्तमम् ।
मातुर्दास्यविमोक्षार्थमाहरिष्ये तमद्य वै ॥ १० ॥
मुझे सर्पोंने उत्तम अमृत लानेके लिये भेजा है। माताको दासीपनसे छुटकारा दिलानेके लिये आज मैं निश्चय ही उस अमृतको लाऊँगा ॥ १० ॥
मात्रा चात्र समादिष्टो निषादान् भक्षयेति ह ।
न च मे तृप्तिरभवद् भक्षयित्वा सहस्रशः ॥ ११ ॥
भोजनके विषयमें पूछनेपर माताने कहा—‘निषादोंका भक्षण करो’, परंतु हजारों निषादोंको खा लेनेपर भी मुझे तृप्ति नहीं हुई है ॥ ११ ॥
तस्माद् भक्ष्यं त्वमपरं भगवन् प्रदिशस्व मे ।
यद् भुक्त्वामृतमाहर्तुं समर्थः स्यामहं प्रभो ॥ १२ ॥
क्षुत्पिपासाविघातार्थं भक्ष्यमाख्यातु मे भवान् ।
अतः भगवन्! आप मेरे लिये कोई दूसरा भोजन बताइये। प्रभो! वह भोजन ऐसा हो जिसे खाकर मैं अमृत लानेमें समर्थ हो सकूँ। मेरी भूख-प्यासको मिटा देनेके लिये आप पर्याप्त भोजन बताइये ॥ १२ १/२ ॥
कश्यप उवाच
इदं सरो महापुण्यं देवलोकेऽपि विश्रुतम् ॥ १३ ॥
**कश्यपजी बोले—**बेटा! यह महान् पुण्यदायक सरोवर है, जो देवलोकमें भी विख्यात है॥ १३ ॥
यत्र कूर्माग्रजं हस्ती सदा कर्षत्यवाङ्मुखः ।
तयोर्जन्मान्तरे वैरं सम्प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १४ ॥
तन्मे तत्त्वं निबोधत्व यत्प्रमाणौ च तावुभौ ।
उसमें एक हाथी नीचेको मुँह किये सदा सूँड़से पकड़कर एक कछुएको खींचता रहता है। वह कछुआ पूर्वजन्ममें उसका बड़ा भाई था। दोनोंमें पूर्वजन्मका वैर चला आ रहा है। उनमें यह वैर क्यों और कैसे हुआ तथा उन दोनोंके शरीरकी लम्बाई-चौड़ाई और ऊँचाई कितनी है, ये सारी बातें मैं ठीक-ठीक बता रहा हूँ। तुम ध्यान देकर सुनो ॥ १४ १/२ ॥
आसीद् विभावसुर्नाम महर्षिः कोपनो भृशम् ॥ १५ ॥
भ्राता तस्यानुजश्चासीत् सुप्रतीको महातपाः ।
स नेच्छति धनं भ्राता सहैकस्थं महामुनिः ॥ १६ ॥
पूर्वकालमें विभावसु नामसे प्रसिद्ध एक महर्षि थे। वे स्वभावके बड़े क्रोधी थे। उनके छोटे भाईका नाम था सुप्रतीक। वे भी बड़े तपस्वी थे। महामुनि सुप्रतीक अपने धनको बड़े भाईके साथ एक जगह नहीं रखना चाहते थे ॥ १५-१६ ॥
विभागं कीर्तयत्येव सुप्रतीको हि नित्यशः ।
अथाब्रवीच्च तं भ्राता सुप्रतीकं विभावसुः ॥ १७ ॥
सुप्रतीक प्रतिदिन बँटवारेके लिये आग्रह करते ही रहते थे। तब एक दिन बड़े भाई विभावसुने सुप्रतीकसे कहा— ॥ १७ ॥
विभागं बहवो मोहात् कर्तुमिच्छन्ति नित्यशः ।
ततो विभक्तास्त्वन्योन्यं विक्रुध्यन्तेऽर्थमोहिताः ॥ १८ ॥
‘भाई! बहुत-से मनुष्य मोहवश सदा धनका बँटवारा कर लेनेकी इच्छा रखते हैं। तदनन्तर बँटवारा हो जानेपर धनके मोहमें फँसकर वे एक-दूसरेके विरोधी हो परस्पर क्रोध करने लगते हैं ॥ १८ ॥
ततः स्वार्थपरान् मूढान् पृथग्भूतान् स्वकैर्धनैः ।
विदित्वा भेदयन्त्येतानमित्रा मित्ररूपिणः ॥ १९ ॥
‘वे स्वार्थपरायण मूढ़ मनुष्य अपने धनके साथ जब अलग-अलग हो जाते हैं, तब उनकी यह अवस्था जानकर शत्रु भी मित्ररूपमें आकर मिलते और उनमें भेद डालते रहते हैं ॥ १९ ॥
विदित्वा चापरे भिन्नानन्तरेषु पतन्त्यथ ।
भिन्नानामतुलो नाशः क्षिप्रमेव प्रवर्तते ॥ २० ॥ ‘दूसरे लोग, उनमें फूट हो गयी है, यह जानकर उनके छिद्र देखा करते हैं एवं छिद्र मिल जानेपर उनमें परस्पर वैर बढ़ानेके लिये स्वयं बीचमें आ पड़ते हैं। इसलिये जो लोग अलग-अलग होकर आपसमें फूट पैदा कर लेते हैं, उनका शीघ्र ही ऐसा विनाश हो जाता है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है’ ॥ २० ॥
तस्माद् विभागं भ्रातॄणां न प्रशंसन्ति साधवः । गुरुशास्त्रे निबद्धानामन्योन्येनाभिशङ्किनाम् ॥ २१ ॥ ‘अतः साधु पुरुष भाइयोंके बिलगाव या बँटवारेकी प्रशंसा नहीं करते; क्योंकि इस प्रकार बँट जानेवाले भाई गुरुस्वरूप शास्त्रकी अलंघनीय आज्ञाके अधीन नहीं रह जाते और एक-दूसरेको संदेहकी दृष्टिसे देखने लगते हैं’ ॥ २१ ॥*
नियन्तुं न हि शक्यस्त्वं भेदतो धनमिच्छसि । यस्मात् तस्मात् सुप्रतीक हस्तित्वं समवाप्स्यसि ॥ २२ ॥ ‘सुप्रतीक! तुम्हें वशमें करना असम्भव हो रहा है और तुम भेदभावके कारण ही बँटवारा करके धन लेना चाहते हो, इसलिये तुम्हें हाथीकी योनिमें जन्म लेना पड़ेगा’ ॥ २२ ॥
शप्तस्त्वेवं सुप्रतीको विभावसुमथाब्रवीत् । त्वमप्यन्तर्जलचरः कच्छपः सम्भविष्यसि ॥ २३ ॥ इस प्रकार शाप मिलनेपर सुप्रतीकने विभावसुसे कहा—‘तुम भी पानीके भीतर विचरनेवाले कछुए होओगे’ ॥ २३ ॥
एवमन्योन्यशापात् तौ सुप्रतीकविभावसू । गजकच्छपतां प्राप्तावर्थार्थं मूढचेतसौ ॥ २४ ॥ इस प्रकार सुप्रतीक और विभावसु मुनि एक-दूसरेके शापसे हाथी और कछुएकी योनिमें पड़े हैं। धनके लिये उनके मनमें मोह छा गया था ॥ २४ ॥
रोषदोषानुषङ्गेण तिर्यग्योनिगतावुभौ । परस्परद्वेषरतौ प्रमाणबलदर्पितौ ॥ २५ ॥ सरस्यस्मिन् महाकायौ पूर्ववैरानुसारिणौ । तयोरन्यतरः श्रीमान् समुपैति महागजः ॥ २६ ॥ यस्य बृंहितशब्देन कूर्मोऽप्यन्तर्जलेशयः । उत्थितोऽसौ महाकायः कृत्स्नं विक्षोभयन् सरः ॥ २७ ॥ रोष और लोभरूपी दोषके सम्बन्धसे उन दोनोंको तिर्यक्-योनिमें जाना पड़ा है। वे दोनों विशालकाय जन्तु पूर्व जन्मके वैरका अनुसरण करके अपनी विशालता और बलके घमण्डमें चूर हो एक-दूसरेसे द्वेष रखते हुए इस सरोवरमें रहते हैं। इन दोनोंमें एक जो सुन्दर महान् गजराज है, वह जब सरोवरके तटपर आता है, तब उसके चिग्घाड़नेकी आवाज
सुनकर जलके भीतर शयन करनेवाला विशालकाय कछुआ भी पानीसे ऊपर उठता है। उस समय वह सारे सरोवरको मथ डालता है ॥ २५—२७ ॥ यं दृष्ट्वा वेष्टितकरः पतत्येष गजो जलम् । दन्तहस्ताग्रलाङ्गूलपादवेगेन वीर्यवान् ॥ २८ ॥ विक्षोभयंस्ततो नागः सरो बहुझषाकुलम् । कूर्मोऽप्यभ्युद्यतशिरा युद्धायाभ्येति वीर्यवान् ॥ २९ ॥ उसे देखते ही यह पराक्रमी हाथी अपनी सूँड़ लपेटे हुए जलमें टूट पड़ता है तथा दाँत, सूँड़, पूँछ और पैरोंके वेगसे असंख्य मछलियोंसे भरे हुए समूचे सरोवरमें हलचल मचा देता है। उस समय पराक्रमी कच्छप भी सिर उठाकर युद्धके लिये निकट आ जाता है ॥ २८-२९ ॥ षडुच्छ्रितो योजनानि गजस्तद्द्विगुणायतः । कूर्मस्त्रियोजनोत्सेधो दशयोजनमण्डलः ॥ ३० ॥ हाथीका शरीर छः योजन ऊँचा और बारह योजन लंबा है। कछुआ तीन योजन ऊँचा और दस योजन गोल है ॥ ३० ॥ तावुभौ युद्धसम्मत्तौ परस्परवधैषिणौ । उपयुज्याशु कर्मेदं साधयेप्सितमात्मनः ॥ ३१ ॥ वे दोनों एक-दूसरेको मारनेकी इच्छासे युद्धके लिये मतवाले बने रहते हैं। तुम शीघ्र जाकर उन्हीं दोनोंको भोजनके उपयोगमें लाओ और अपने इस अभीष्ट कार्यका साधन करो ॥ ३१ ॥ महाभ्रघनसंकाशं तं भुक्त्वामृतमानय । महागिरिसमप्रख्यं घोररूपं च हस्तिनम् ॥ ३२ ॥ कछुआ महान् मेघ-खण्डके समान है और हाथी भी महान् पर्वतके समान भयंकर है। उन्हीं दोनोंको खाकर अमृत ले आओ ॥ ३२ ॥
सौतिरुवाच
इत्युक्त्वा गरुडं सोऽथ माङ्गल्यमकरोत् तदा । युध्यतः सह देवैस्ते युद्धे भवतु मङ्गलम् ॥ ३३ ॥ उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनकजी! कश्यपजी गरुडसे ऐसा कहकर उस समय उनके लिये मंगल मनाते हुए बोले—'गरुड! युद्धमें देवताओंके साथ लड़ते हुए तुम्हारा मंगल हो ॥ ३३ ॥ पूर्णकुम्भो द्विजा गावो यच्चान्यत् किंचिदुत्तमम् । शुभं स्वस्त्ययनं चापि भविष्यति तवाण्डज ॥ ३४ ॥
'पक्षिप्रवर! भरा हुआ कलश, ब्राह्मण, गौएँ तथा और जो कुछ भी मांगलिक वस्तुएँ हैं, वे तुम्हारे लिये कल्याणकारी होंगी ।। ३४ ।। युध्यमानस्य संग्रामे देवैः सार्धं महाबल । ऋचो यजूंषि सामानि पवित्राणि हवींषि च ।। ३५ ।। रहस्यानि च सर्वाणि सर्वे वेदाश्च ते बलम् । इत्युक्तो गरुडः पित्रा गतस्तं हृदमन्तिकात् ।। ३६ ।। 'महाबली पक्षिराज! संग्राममें देवताओंके साथ युद्ध करते समय ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, पवित्र हविष्य, सम्पूर्ण रहस्य तथा सभी वेद तुम्हें बल प्रदान करें।' पिताके ऐसा कहनेपर गरुड उस सरोवरके निकट गये ।। ३५-३६ ।। अपश्यन्निर्मलजलं नानापक्षिसमाकुलम् । स तत् स्मृत्वा पितुर्वाक्यं भीमवेगोऽन्तरिक्षगः ।। ३७ ।। नखेन गजमेकेन कूर्ममेकेन चाक्षिपत् । समुत्पपात चाकाशं तत उच्चैर्विहंगमः ।। ३८ ।। उन्होंने देखा, सरोवरका जल अत्यन्त निर्मल है और नाना प्रकारके पक्षी इसमें सब ओर चहचहा रहे हैं। तदनन्तर भयंकर वेगशाली अन्तरिक्षगामी गरुडने पिताके वचनका स्मरण करके एक पंजेसे हाथीको और दूसरेसे कछुएको पकड़ लिया। फिर वे पक्षिराज आकाशमें ऊँचे उड़ गये ।। ३७-३८ ।। सोऽलम्बं तीर्थमासाद्य देववृक्षानुपागमत् । ते भीताः समकम्पन्त तस्य पक्षानिलाहताः ।। ३९ ।। न नो भञ्ज्यादिति तदा दिव्याः कनकशाखिनः । प्रचलाङ्गान् स तान् दृष्ट्वा मनोरथफलद्रुमान् ।। ४० ।। अन्यानतुलरूपाङ्गानुपचक्राम खेचरः । काञ्चनै राजतैश्चैव फलैर्वैदूर्यशाखिनः । सागराम्बुपरिक्षिप्तान् भ्राजमानान् महाद्रुमान् ।। ४१ ।। उड़कर वे फिर अलम्बतीर्थमें जा पहुँचे। वहाँ (मेरुगिरिपर) बहुत-से दिव्य वृक्ष अपनी सुवर्णमय शाखा-प्रशाखाओंके साथ लहलहा रहे थे। जब गरुड उनके पास गये, तब उनके पंखोंकी वायुसे आहत होकर वे सभी दिव्य वृक्ष इस भयसे कम्पित हो उठे कि कहीं ये हमें तोड़ न डालें। गरुड रुचिके अनुसार फल देनेवाले उन कल्पवृक्षोंको काँपते देख अनुपम रूप-रंग तथा अंगोंवाले दूसरे-दूसरे महावृक्षोंकी ओर चल दिये। उनकी शाखाएँ वैदूर्य मणिकी थीं और वे सुवर्ण तथा रजतमय फलोंसे सुशोभित हो रहे थे। वे सभी महावृक्ष समुद्रके जलसे अभिषिक्त होते रहते थे ।। ३९—४१ ।। तमुवाच खगश्रेष्ठं तत्र रौहिणपादपः । अतिप्रवृद्धः सुमहानापतन्तं मनोजवम् ।। ४२ ।।
वहीं एक बहुत बड़ा विशाल वटवृक्ष था। उसने मनके समान तीव्र-वेगसे आते हुए पक्षियोंके सरदार गरुडसे कहा ।। ४२ ।।
रौहिण उवाच
यैषा मम महाशाखा शतयोजनमायता ।
एतामास्थाय शाखां त्वं खादेमौ गजकच्छपौ ।। ४३ ।।
**वटवृक्ष बोला—**पक्षिराज! यह जो मेरी सौ योजनतक फैली हुई सबसे बड़ी शाखा है, इसीपर बैठकर तुम इस हाथी और कछुएको खा लो ।। ४३ ।।
ततो द्रुमं पतगसहस्रसेवितं
महीधरप्रतिमवपुः प्रकम्पयन् ।
खगोत्तमो द्रुतमभिपत्य वेगवान्
बभञ्ज तामविरलपत्रसंचयाम् ।। ४४ ।।
तब पर्वतके समान विशाल शरीरवाले, पक्षियोंमें श्रेष्ठ, वेगशाली गरुड सहस्रों विहंगमोंसे सेवित उस महान् वृक्षको कम्पित करते हुए तुरंत उसपर जा बैठे। बैठते ही अपने असह्य वेगसे उन्होंने सघन पल्लवोंसे सुशोभित उस विशाल शाखाको तोड़ डाला ।। ४४ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सौपर्णे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ।। २९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें गरुडचरित्र-विषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २९ ।।
* 'कनिष्ठान् पुत्रवत् पश्येज्ज्येष्ठो भ्राता पितुः समः' अर्थात् 'बड़ा भाई पिताके समान होता है। वह अपने छोटे भाइयोंको पुत्रके समान देखे।' यह शास्त्रकी आज्ञा है। जिनमें फूट हो जाती है, वे पीछे इस आज्ञाका पालन नहीं कर पाते।