महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
रखा गया था अर्थात् यह शर्त थी कि जो अधिक बलवान् हो, वही उसके साथ विवाह कर सकता है। भीमसेनने उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न किया, जिसका नाम सर्वग था॥ ७६-७७॥
अर्जुनः खलु द्वारवतीं गत्वा भगिनीं वासुदेवस्य सुभद्रां भद्रभाषिणीं भार्यामुदावहत् । स्वविषयं चाभ्याजगाम कुशली । तस्यां पुत्रमभिमन्युमतीव गुणसम्पन्नं दयितं वासुदेवस्याजनयत् ॥ ७८ ॥
अर्जुनने द्वारकामें जाकर मङ्गलमय वचन बोलनेवाली वासुदेवकी बहिन सुभद्राको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसे लेकर कुशलपूर्वक अपनी राजधानीमें चले आये वहाँ उसके गर्भसे अत्यन्त गुणसम्पन्न अभिमन्यु नामक पुत्रको उत्पन्न किया; जो वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको बहुत प्रिय था॥ ७८॥
नकुलस्तु चैद्यां करेणुमतीं नाम भार्यामुदावहत् । तस्यां पुत्रं निरमित्रं नामाजनयत् ॥ ७९ ॥
नकुलने चेदिनरेशकी पुत्री करेणुमतीको पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसके गर्भसे निरमित्र नामक पुत्रको जन्म दिया॥ ७९॥
सहदेवोऽपि माद्रीमेव स्वयंवरे विजयां नामोपयेमे मद्रराजस्य द्युतिमतो दुहितरम् । तस्यां पुत्रमजनयत् सुहोत्रं नाम ॥ ८० ॥
सहदेवने भी मद्रदेशकी राजकुमारी विजयाको स्वयंवरमें प्राप्त किया। वह मद्रराज द्युतिमान्की पुत्री थी। उसके गर्भसे उन्होंने सुहोत्र नामक पुत्रको जन्म दिया॥ ८०॥
भीमसेनस्तु पूर्वमेव हिडिम्बायां राक्षसं घटोत्कचं पुत्रमुत्पादयामास ॥ ८१ ॥
भीमसेनने पहले ही हिडिम्बाके गर्भसे घटोत्कच नामक राक्षसजातीय पुत्रको उत्पन्न किया॥ ८१॥
इत्येत एकादश पाण्डवानां पुत्राः । तेषां वंशकरोऽभिमन्युः ॥ ८२ ॥
इस प्रकार ये पाण्डवोंके ग्यारह पुत्र हुए। इनमेंसे अभिमन्युका ही वंश चला॥ ८२॥
स विराटस्य दुहितरमुपयेमे उत्तरां नाम । तस्यामस्य परासुर्गर्भोऽभवत् । तमुत्सङ्गेन प्रतिजग्राह पृथा नियोगात् पुरुषोत्तमस्य वासुदेवस्य, षाण्मासिकं गर्भमहमेनं जीवयिष्यामीति ॥ ८३ ॥
अभिमन्युने विराटकी पुत्री उत्तराके साथ विवाह किया था। उसके गर्भसे अभिमन्युके एक पुत्र हुआ; जो मरा हुआ था। पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके आदेशसे कुन्तीने उसे अपनी गोदमें ले लिया। उन्होंने यह आश्वासन दिया कि छः महीनेके इस मरे हुए बालकको मैं जीवित कर दूँगा॥ ८३॥
स भगवता वासुदेवेनासञ्जातबलवीर्य-पराक्रमोऽकालजातोऽस्त्राग्निना दग्धस्तेजसा स्वेन संजीवितः । जीवयित्वा चैनमुवाच—परिक्षीणे कुले जातो भवत्वयं परिक्षिन्नामेति ॥ ८४ ॥
परिक्षित् खलु माद्रवतीं नामोपयेमे तन्मातरम्। तस्यां भवान् जनमेजयः।। ८५ ।।
अश्वत्थामाके अस्त्रकी अग्निसे झुलसकर वह असमयमें (समयसे पहले) ही पैदा हो गया था। उसमें बल, वीर्य और पराक्रम नहीं था। परंतु भगवान् श्रीकृष्णने उसे अपने तेजसे जीवित कर दिया। इसको जीवित करके वे इस प्रकार बोले—‘इस कुलके परिक्षीण (नष्ट) होनेपर इसका जन्म हुआ है; अतः यह बालक परिक्षित् नामसे विख्यात हो’। परिक्षित्ने तुम्हारी माता माद्रवतीके साथ विवाह किया, जिसके गर्भसे तुम जनमेजय नामक पुत्र उत्पन्न हुए।। ८४-८५।।
भवतो वपुष्टमायां द्वौ पुत्रौ जज्ञाते; शतानीकः शङ्कुकर्णश्च। शतानीकस्य वैदेह्यां पुत्र उत्पन्नोऽश्व-मेधदत्त इति।। ८६।।
तुम्हारी पत्नी वपुष्टमाके गर्भसे दो पुत्र उत्पन्न हुए हैं—शतानीक और शंकुकर्ण। शतानीककी पत्नी विदेहराजकुमारीके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्रका नाम है अश्वमेधदत्त।। ८६।।
एष पूरोर्वंशः पाण्डवानां च कीर्तितः; धन्यः पुण्यः परमपवित्रः सततं श्रोतव्यो ब्राह्मणैर्नियम-वद्भिरनन्तरं क्षत्रियैः स्वधर्मनिरतैः प्रजापालन-तत्परैर्वैश्यैरपि च श्रोतव्योऽधिगम्यश्च तथा शूद्रैरपि त्रिवर्णशुश्रूषुभिः श्रद्दधानैरिति।। ८७।।
यह पूरु तथा पाण्डवोंके वंशका वर्णन किया गया; जो धन और पुण्यकी प्राप्ति करानेवाला एवं परम पवित्र है, नियमपरायण ब्राह्मणों, अपने धर्ममें स्थित प्रजापालक क्षत्रियों, वैश्यों तथा तीनों वर्णोंकी सेवा करनेवाले श्रद्धालु शूद्रोंको भी सदा इसका श्रवण एवं स्वाध्याय करना चाहिये।। ८७।।
इतिहासमिमं पुण्यमशेषतः श्रावयिष्यन्ति ये नराः श्रोष्यन्ति वा नियतात्मानो विमत्सरा मैत्रा वेद-परास्तेऽपि स्वर्गजितः पुण्यलोका भवन्ति सततं देवब्राह्मणमनुष्याणां मान्याः सम्पूज्याश्च।। ८८।।
जो पुण्यात्मा मनुष्य मनको वशमें करके ईर्ष्या छोड़कर सबके प्रति मैत्रीभावको रखते हुए वेदपरायण हो इस सम्पूर्ण पुण्यमय इतिहासको सुनावेंगे अथवा सुनेंगे वे स्वर्गलोकके अधिकारी होंगे और देवता, ब्राह्मण तथा मनुष्योंके लिये सदैव आदरणीय तथा पूजनीय होंगे।। ८८।।
परं हीदं भारतं भगवता व्यासेन प्रोक्तं पावनं ये ब्राह्मणादयो वर्णाः श्रद्दधाना अमत्सरा मैत्रा वेदसम्पन्नाः श्रोष्यन्ति, तेऽपि स्वर्गजितः सुकृतिनोऽशोच्याः कृताकृते भवन्ति।। ८९।।
जो ब्राह्मण आदि वर्णोंके लोग मात्सर्यरहित, मैत्रीभावसे संयुक्त और वेदाध्ययनसे सम्पन्न हो श्रद्धापूर्वक भगवान् व्यासके द्वारा कहे हुए इस परम पावन महाभारत ग्रन्थको
सुनेंगे, वे भी स्वर्गके अधिकारी और पुण्यात्मा होंगे तथा उनके लिये इस बातका शोक नहीं रह जायगा कि उन्होंने अमुक कर्म क्यों किया और अमुक कर्म क्यों नहीं किया ।। ८९ ।।
भवति चात्र श्लोकः—
इदं हि वेदैः संमितं पवित्रमपि चोत्तमम् ।
धन्यं यशस्यमायुष्यं श्रोतव्यं नियतात्मभिः ।। ९० ।।
इस विषयमें यह श्लोक प्रसिद्ध है—
‘यह महाभारत वेदोंके समान पवित्र, उत्तम तथा धन, यश और आयुकी प्राप्ति करानेवाला है। मनको वशमें रखनेवाले साधु पुरुषोंको सदैव इसका श्रवण करना चाहिये’ ।। ९० ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पूरुवंशानुकीर्तने
पञ्चनवतितमोऽध्यायः ।। ९५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पूरुवंशानुवर्णनविषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९५ ।।
अध्याय (पृष्ठ 714)
षण्णवतितमोऽध्यायः
महाभिषको ब्रह्माजीका शाप तथा शापग्रस्त वसुओंके साथ गंगाकी बातचीत
वैशम्पायन उवाच
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो राजाऽऽसीत् पृथिवीपतिः ।
महाभिष इति ख्यातः सत्यवाक् सत्यविक्रमः ॥ १ ॥
सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च ।
तोषयामास देवेशं स्वर्गं लेभे ततः प्रभुः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इक्ष्वाकु-वंशमें उत्पन्न महाभिष नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो सत्यवादी होनेके साथ ही सत्यपराक्रमी भी थे। उन्होंने एक हजार अश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञोंद्वारा देवेश्वर इन्द्रको संतुष्ट किया और उन यज्ञोंके पुण्यसे उन शक्तिशाली नरेशने स्वर्गलोग प्राप्त कर लिया ॥ १-२ ॥
ततः कदाचिद् ब्रह्माणमुपासांचक्रिरे सुराः ।
तत्र राजर्षयो ह्यासन् स च राजा महाभिषः ॥ ३ ॥
तदनन्तर एक समय सब देवता ब्रह्माजीकी सेवामें उनके समीप बैठे हुए थे। वहाँ बहुत-से राजर्षि तथा पूर्वोक्त राजा महाभिष भी उपस्थित थे ॥ ३ ॥
अथ गङ्गा सरिच्छ्रेष्ठा समुपायात् पितामहम् ।
तस्या वासः समुद्धूतं मारुतेन शशिप्रभम् ॥ ४ ॥
इसी समय सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा ब्रह्माजीके समीप आयी। उस समय वायुके झोंकेसे उसके शरीरका चाँदनीके समान उज्ज्वल वस्त्र सहसा ऊपरकी ओर उठ गया ॥ ४ ॥
ततोऽभवन् सुरगणाः सहसावाङ्मुखास्तदा ।
महाभिषस्तु राजर्षिरशङ्को दृष्टवान् नदीम् ॥ ५ ॥
यह देख सब देवताओंने तुरंत अपना मुँह नीचेकी ओर कर लिया; किंतु राजर्षि महाभिष निःशंक होकर देवनदीकी ओर देखते ही रह गये ॥ ५ ॥
सोऽपध्यातो भगवता ब्रह्मणा तु महाभिषः ।
उक्तश्च जातो मर्त्येषु पुनर्लोकानवाप्स्यसि ॥ ६ ॥
ययाऽऽहृतमनाश्चासि गङ्गया त्वं हि दुर्मते ।
सा ते वै मानुषे लोके विप्रियाण्याचरिष्यति ॥ ७ ॥
तब भगवान् ब्रह्माने महाभिषको शाप देते हुए कहा—'दुर्मते! तुम मनुष्योंमें जन्म लेकर फिर पुण्यलोकोंमें आओगे। जिस गंगाने तुम्हारे चित्तको चुरा लिया है, वही
मनुष्यलोकमें तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करेगी ।। ६-७ ।। यदा ते भविता मन्युस्तदा शापाद् विमोक्ष्यसे । 'जब तुम्हें गंगापर क्रोध आ जायगा, तब तुम भी शापसे छूट जाओगे।'
वैशम्पायन उवाच
स चिन्तयित्वा नृपतिर्नृपानन्यांस्तपोधनान् ।। ८ ।। प्रतीपं रोचयामास पितरं भूरितेजसम् । महाभिषं तु तं दृष्ट्वा नदी धैर्याच्च्युतं नृपम् ।। ९ ।। तमेव मनसा ध्यायन्त्युपावर्तत् सरिद्वरा । सा तु विध्वस्तवपुषः कश्मलाभिहतान् नृप ।। १० ।। ददर्श पथि गच्छन्ती वसून् देवान् दिवौकसः । तथारूपांश्च तान् दृष्ट्वा पप्रच्छ सरितां वरा ।। ११ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब राजा महाभिषने अन्य बहुत-से तपस्वी राजाओंका चिन्तन करके महातेजस्वी राजा प्रतीपको ही अपना पिता बनानेके योग्य चुना—उन्हींको पसंद किया। महानदी गंगा राजा महाभिषको धैर्य खोते देख मन-ही-मन उन्हींका चिन्तन करती हुई लौटी। मार्गसे जाती हुई गंगाने वसुदेवताओंको देखा। उनका शरीर स्वर्गसे नीचे गिर रहा था। वे मोहाच्छन्न एवं मलिन दिखायी दे रहे थे। उन्हें इस रूपमें देखकर नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाने पूछा— ।। ८—११ ।।
किमिदं नष्टरूपाः स्थ कच्चित् क्षेमं दिवौकसाम् । तामूचुर्वसवो देवाः शप्ताः स्मो वै महानदि ।। १२ ।। अल्पेऽपराधे संरम्भाद् वसिष्ठेन महात्मना । विमूढा हि वयं सर्वे प्रच्छन्नमृषिसत्तमम् ।। १३ ।। संध्यां वसिष्ठमासीनं तमत्यभिस्रुताः पुरा । तेन कोपाद् वयं शप्ता योनौ सम्भवतेति ह ।। १४ ।।
तुमलोगोंका दिव्य रूप नष्ट कैसे हो गया? देवता सकुशल तो हैं न? तब वसुदेवताओंने गंगासे कहा—'महानदी! महात्मा वसिष्ठने थोड़े-से अपराधपर क्रोधमें आकर हमें शाप दे दिया है। पहलेकी बात है एक दिन जब वसिष्ठजी पेड़ोंकी आड़में संध्योपासना कर रहे थे, हम सब मोहवश उनका उल्लंघन करके चले गये (और उनकी धेनुका अपहरण कर लिया)। इससे कुपित होकर उन्होंने हमें शाप दिया कि 'तुमलोग मनुष्ययोनिमें जन्म लो' ।। १२—१४ ।।
न निवर्तयितुं शक्यं यदुक्तं ब्रह्मवादिना । त्वमस्मान् मानुषी भूत्वा सृज पुत्रान्-वसून् भुवि ।। १५ ।।
‘उन ब्रह्मवादी महर्षिने जो बात कह दी है, वह टाली नहीं जा सकती; अतः हमारी प्रार्थना है कि तुम पृथ्वीपर मानवपत्नी होकर हम वसुओंको अपने पुत्ररूपसे उत्पन्न करो ।। १५ ।।
न मानुषीणां जठरं प्रविशेम वयं शुभे ।
इत्युक्ता तैश्च वसुभिस्तथेत्युक्त्वाब्रवीदिदम् ।। १६ ।।
‘शुभे! हमें मानुषी स्त्रियोंके उदरमें प्रवेश न करना पड़े, इसीलिये हमने यह अनुरोध किया है।' वसुओंके ऐसा कहनेपर गंगाजी 'तथास्तु' कहकर यों बोलीं ।। १६ ।।
गङ्गोवाच
मर्त्येषु पुरुषश्रेष्ठः को वः कर्ता भविष्यति ।
**गंगाजीने कहा—**वसुओ! मर्त्यलोकमें ऐसे श्रेष्ठ पुरुष कौन हैं; जो तुमलोगोंके पिता होंगे।
वसव ऊचुः
प्रतीपस्य सुतो राजा शान्तनुर्लोकविश्रुतः ।
भविता मानुषे लोके स नः कर्ता भविष्यति ।। १७ ।।
**वसुगण बोले—**प्रतीपके पुत्र राजा शान्तनु लोकविख्यात साधु पुरुष होंगे। मनुष्यलोकमें वे ही मारे जनक होंगे ।। १७ ।।
गङ्गोवाच
ममाप्येवं मतं देवा यथा मां वदतानघाः ।
प्रियं तस्य करिष्यामि युष्माकं चैतदीप्सितम् ।। १८ ।।
**गंगाजीने कहा—**निष्पाप देवताओ! तुमलोग जैसा कहते हो, वैसा ही मेरा भी विचार है। मैं राजा शान्तनुका प्रिय करूँगी और तुम्हारे इस अभीष्ट कार्यको भी सिद्ध करूँगी ।। १८ ।।
वसव ऊचुः
जातान् कुमारान् स्वानप्सु प्रक्षेप्तुं वै त्वमर्हसि ।
यथा न चिरकालं नो निष्कृतिः स्यात् त्रिलोकगे ।। १९ ।।
**वसुगण बोले—**तीनों लोकोंमें प्रवाहित होनेवाली गंगे! हमलोग जब तुम्हारे गर्भसे जन्म लें, तब तुम पैदा होते ही हमें अपने जलमें फेंक देना; जिससे शीघ्र ही हमारा मर्त्यलोकसे छुटकारा हो जाय ।। १९ ।।
गङ्गोवाच
एवमेतत् करिष्यामि पुत्रस्तस्य विधीयताम् ।
नास्य मोघः संगमः स्यात् पुत्रहेतोर्मया सह ॥ २० ॥ **गंगाजीने कहा—**ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगी; परंतु उस राजाका मेरे साथ पुत्रके लिये किया हुआ सम्बन्ध व्यर्थ न हो जाय, इसलिये उनके लिये एक पुत्रकी भी व्यवस्था होनी चाहिये ॥ २० ॥
वसव ऊचुः तुरीयार्धं प्रदास्यामो वीर्यस्यैकैकशो वयम् । तेन वीर्येण पुत्रस्ते भविता तस्य चेप्सितः ॥ २१ ॥ **वसुगण बोले—**हम सब लोग अपने तेजका एक-एक अष्टमांश देंगे। उस तेजसे जो तुम्हारा एक पुत्र होगा, वह उस राजाकी इच्छाके अनुरूप होगा ॥ २१ ॥ न सम्पत्स्यति मर्त्येषु पुनस्तस्य तु संततिः । तस्मादपुत्रः पुत्रस्ते भविष्यति स वीर्यवान् ॥ २२ ॥ किंतु मर्त्यलोकमें उसकी कोई संतान न होगी। अतः तुम्हारा वह पुत्र संतानहीन होनेके साथ ही अत्यन्त पराक्रमी होगा ॥ २२ ॥ एवं ते समयं कृत्वा गङ्गया वसवः सह । जग्मुः संहृष्टमनसो यथासंकल्पमञ्जसा ॥ २३ ॥ इस प्रकार गंगाजीके साथ शर्त करके वसुगण प्रसन्नतापूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार चले गये ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि महाभिषोपाख्याने षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें महाभिषोपाख्यानविषयक छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 718)
सप्तनवतितमोऽध्यायः
राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रतीपो राजाऽऽसीत् सर्वभूतहितः सदा ।
निषसाद समा बह्वीर्गङ्गाद्वारगतो जपन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— तदनन्तर इस पृथ्वीपर राजा प्रतीप राज्य करने लगे। वे सदा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते थे। एक समय महाराज प्रतीप गंगाद्वार (हरिद्वार)-में गये और बहुत वर्षोंतक जप करते हुए एक आसनपर बैठे रहे ॥ १ ॥
तस्य रूपगुणोपेता गङ्गा स्त्रीरूपधारिणी ।
उत्तीर्य सलिलात् तस्माल्लोभनीयतमाकृतिः ॥ २ ॥
अधीयानस्य राजर्षेर्दिव्यररूपा मनस्विनी ।
दक्षिणं शालसंकाशमूरूं भेजे शुभानना ॥ ३ ॥
उस समय मनस्विनी गंगा सुन्दर रूप और उत्तम गुणोंसे युक्त युवती स्त्रीका रूप धारण करके जलसे निकलीं और स्वाध्यायमें लगे हुए राजर्षि प्रतीपके शाल-जैसे विशाल दाहिने ऊरु (जाँघ)-पर जा बैठीं। उस समय उनकी आकृति बड़ी लुभावनी थी; रूप देवांगनाओंके समान था और मुख अत्यन्त मनोहर था ॥ २-३ ॥
प्रतीपस्तु महीपालस्तामुवाच यशस्विनीम् ।
करोमि किं ते कल्याणि प्रियं यत् तेऽभिकाङ्क्षितम् ॥ ४ ॥
अपनी जाँघपर बैठी हुई उस यशस्विनी नारीसे राजा प्रतीपने पूछा—‘कल्याणि! मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? तुम्हारी क्या इच्छा है?’ ॥ ४ ॥
रूयुवाच
त्वामहं कामये राजन् भजमानां भजस्व माम् ।
त्यागः कामवतीनां हि स्त्रीणां सद्भिर्विगर्हितः ॥ ५ ॥
स्त्री बोली— राजन्! मैं आपको ही चाहती हूँ। आपके प्रति मेरा अनुराग है, अतः आप मुझे स्वीकार करें; क्योंकि कामके अधीन होकर अपने पास आयी हुई स्त्रियोंका परित्याग साधु पुरुषोंने निन्दित माना है ॥ ५ ॥
प्रतीप उवाच
नाहं परस्त्रियं कामाद् गच्छेयं वरवर्णिनि ।
न चासवर्णों कल्याणि धर्म्यमेतद्धि मे व्रतम् ॥ ६ ॥
**प्रतीपने कहा—**सुन्दरी! मैं कामवश परायी स्त्रीके साथ समागम नहीं कर सकता। जो अपने वर्णकी न हो, उससे भी मैं सम्बन्ध नहीं रख सकता। कल्याणि! यह मेरा धर्मानुकूल व्रत है ।। ६ ।।
स्त्र्युवाच
नाश्रेयस्यस्मि नागम्या न वक्तव्या च कर्हिचित् ।
भजन्तीं भज मां राजन् दिव्यां कन्यां वरस्त्रियम् ।। ७ ।।
**स्त्री बोली—**राजन्! मैं अशुभ या अमंगल करनेवाली नहीं हूँ, समागमके अयोग्य भी नहीं हूँ और ऐसी भी नहीं हूँ कि कभी कोई मुझपर कलंक लगावे। मैं आपके प्रति अनुरक्त होकर आयी हुई दिव्य कन्या एवं सुन्दरी स्त्री हूँ। अतः आप मुझे स्वीकार करें ।। ७ ।।
प्रतीप उवाच
त्वया निवृत्तमेतत् तु यन्मां चोदयसि प्रियम् ।
अन्यथा प्रतिपन्नं मां नाशयेद् धर्मविप्लवः ।। ८ ।।
**प्रतीपने कहा—**सुन्दरी! तुम जिस प्रिय मनोरथकी पूर्तिके लिये मुझे प्रेरित कर रही हो, उसका निराकरण भी तुम्हारे द्वारा ही हो गया। यदि मैं धर्मके विपरीत तुम्हारा यह प्रस्ताव स्वीकार कर लूँ तो धर्मका यह विनाश मेरा भी नाश कर डालेगा ।। ८ ।।
प्राप्य दक्षिणमूरूं मे त्वमाश्लिष्टा वराङ्गने ।
अपत्यानां स्नुषाणां च भीरु विद्ध्येतदासनम् ।। ९ ।।
वरांगने! तुम मेरी दाहिनी जाँघपर आकर बैठी हो। भीरु! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि यह पुत्र, पुत्री तथा पुत्रवधूका आसन है ।। ९ ।।
सव्योरुः कामिनीभोग्यस्त्वया स च विवर्जितः ।
तस्मादहं नाचरिष्ये त्वयि कामं वराङ्गने ।। १० ।।
पुरुषकी बायीं जाँघ ही कामिनीके उपभोगके योग्य है; किंतु तुमने उसका त्याग कर दिया है। अतः वरांगने! मैं तुम्हारे प्रति कामयुक्त आचरण नहीं करूँगा ।। १० ।।
स्नुषा मे भव सुश्रोणि पुत्रार्थं त्वां वृणोम्यहम् ।
स्नुषापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता ।। ११ ।।
सुश्रोणि! तुम मेरी पुत्रवधू हो जाओ। मैं अपने पुत्रके लिये तुम्हारा वरण करता हूँ; क्योंकि वामोरु! तुमने यहाँ आकर मेरी उसी जाँघका आश्रय लिया है, जो पुत्रवधूके पक्षकी है ।। ११ ।।
स्त्र्युवाच
एवमप्यस्तु धर्मज्ञ संयुज्येयं सुतेन ते ।
त्वद्भक्त्या तु भजिष्यामि प्रख्यातं भारतं कुलम् ।। १२ ।।
स्त्री बोली—धर्मज्ञ नरेश! आप जैसा कहते हैं, वैसा भी हो सकता है। मैं आपके पुत्रके साथ संयुक्त होऊँगी। आपके प्रति जो मेरी भक्ति है, उसके कारण मैं विख्यात भरतवंशका सेवन करूँगी॥ १२॥
पृथिव्यां पार्थिवा ये च तेषां यूयं परायणम्।
गुणा न हि मया शक्या वक्तुं वर्षशतैरपि॥ १३॥
पृथ्वीपर जितने राजा हैं, उन सबके आपलोग उत्तम आश्रय हैं। सौ वर्षोंमें भी आपलोगोंके गुणोंका वर्णन मैं नहीं कर सकती॥ १३॥
कुलस्य ये वः प्रथितास्तत्साधुत्वमथोत्तमम्।
समयेनेह धर्मज्ञ आचरेयं च यद् विभो॥ १४॥
तत् सर्वमेव पुत्रस्ते न मीमांसेत कर्हिचित्।
एवं वसन्ती पुत्रे ते वर्धयिष्याम्यहं रतिम्॥ १५॥
पुत्रैः पुण्यैः प्रियैश्चैव स्वर्गं प्राप्स्यति ते सुतः।
आपके कुलमें जो विख्यात राजा हो गये हैं, उनकी साधुता सर्वोपरि है। धर्मज्ञ! मैं एक शर्तके साथ आपके पुत्रसे विवाह करूँगी। प्रभो! मैं जो कुछ भी आचरण करूँ, वह सब आपके पुत्रको स्वीकार होना चाहिये। वे उसके विषयमें कभी कुछ विचार न करें। इस शर्तपर रहती हुई मैं आपके पुत्रके प्रति अपना प्रेम बढ़ाऊँगी। मुझसे जो पुण्यात्मा एवं प्रिय पुत्र उत्पन्न होंगे, उनके द्वारा आपके पुत्रको स्वर्गलोककी प्राप्ति होगी॥ १४-१५ १/२॥
वैशम्पायन उवाच
तथेत्युक्ता तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीयत॥ १६॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! राजा प्रतीपने ‘तथास्तु’ कहकर उसकी शर्त स्वीकार कर ली। तत्पश्चात् वह वहीं अन्तर्धान हो गयी॥ १६॥
पुत्रजन्म प्रतीक्षन् वै स राजा तदधारयत्।
एतस्मिन्नेव काले तु प्रतीपः क्षत्रियर्षभः॥ १७॥
तपस्तेपे सुतस्यार्थे सभार्यः कुरुनन्दन।
इसके बाद पुत्रके जन्मकी प्रतीक्षा करते हुए राजा प्रतीपने उसकी बात याद रखी। कुरुनन्दन! इन्हीं दिनों क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ प्रतीप अपनी पत्नीको साथ लेकर पुत्रके लिये तपस्या करने लगे॥ १७ १/२॥
(प्रतीपस्य तु भार्यायां गर्भः श्रीमानवर्धत।
श्रिया परमया युक्तः शरच्छुक्ले यथा शशी॥
ततस्तु दशमे मासि प्राजायत रविप्रभम्।
कुमारं देवगर्भाभं प्रतीपमहिषी तदा॥)
तयोः समभवत् पुत्रो वृद्धयोः स महाभिषः॥ १८॥
प्रतीपकी पत्नीकी कुक्षिमें एक तेजस्वी गर्भका आविर्भाव हुआ, जो शरद्-ऋतुके शुक्ल पक्षमें परम कान्तिमान् चन्द्रमाकी भाँति प्रतिदिन बढ़ने लगा। तदनन्तर दसवाँ मास प्राप्त होनेपर प्रतीपकी महारानीने एक देवोपम पुत्रको जन्म दिया, जो सूर्यके समान प्रकाशमान था। उन बूढ़े राजदम्पतिके यहाँ पूर्वोक्त राजा महाभिष ही पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥
शान्तस्य जज्ञे संतानस्तस्मादासीत् स शान्तनुः ।
शान्त पिताकी संतान होनेसे वे शान्तनु कहलाये।
(तस्य जातस्य कृत्यानि प्रतीपोऽकारयत् प्रभुः ।
जातकर्मादि विप्रेण वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा ॥
शक्तिशाली राजा प्रतीपने उस बालकके आवश्यक कृत्य (संस्कार) करवाये। ब्राह्मण पुरोहितने वेदोक्त क्रियाओंव्दारा उसके जात-कर्म आदि सम्पन्न किये।
नामकर्म च विप्रास्तु चक्रुः परमसत्कृतम् ।
शान्तनोरवनीपाल वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा ॥
जनमेजय! तदनन्तर बहुत-से ब्राह्मणोंने मिलकर वेदोक्त विधियोंके अनुसार शान्तनुका नामकरण-संस्कार भी किया।
ततः संवर्धितो राजा शान्तनुर्लोकपालकः ।
स तु लेभे परां निष्ठां प्राप्य धर्मविदां वरः ॥
धनुर्वेदे च वेदे च गतिं स परमां गतः ।
यौवनं चापि सम्प्राप्तः कुमारो वदतां वरः ॥)
तत्पश्चात् बड़े होनेपर राजकुमार शान्तनु लोकरक्षाका कार्य करने लगे। वे धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ थे। उन्होंने धनुर्वेदमें उत्तम योग्यता प्राप्त करके वेदाध्ययनमें भी ऊँची स्थिति प्राप्त की। वक्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ वे राजकुमार धीरे-धीरे युवावस्थामें पहुँच गये।
संस्मरंश्चाक्षयाँल्लोकान् विजातान् स्वेन कर्मणा ॥ १९ ॥
पुण्यकर्मकृदेवासीच्छान्तनुः कुरुसत्तमः ।
प्रतीपः शान्तनुं पुत्रं यौवनस्थं ततोऽन्वशात् ॥ २० ॥
अपने सत्कर्मोंव्दारा उपार्जित अक्षय पुण्यलोकोंका स्मरण करके कुरुश्रेष्ठ शान्तनु सदा पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानमें ही लगे रहते थे। युवावस्थामें पहुँचे हुए राजकुमार शान्तनुको राजा प्रतीपने आदेश दिया— ॥ १९-२० ॥
पुरा स्त्री मां समभ्यागाच्छान्तनो भूतये तव ।
त्वामाव्रजेद् यदि रहः सा पुत्र वरवर्णिनी ॥ २१ ॥
कामयानाभिरूपाढ्या दिव्या स्त्री पुत्रकाम्यया ।
सा त्वया नानुयोक्तव्या कासि कस्यासि चाङ्गने ॥ २२ ॥
‘शान्तनो! पूर्वकालमें मेरे समीप एक दिव्य नारी आयी थी। उसका आगमन तुम्हारे कल्याणके लिये ही हुआ था। बेटा! यदि वह सुन्दरी कभी एकान्तमें तुम्हारे पास आवे, तुम्हारे प्रति कामभावसे युक्त हो और तुमसे पुत्र पानेकी इच्छा रखती हो, तो तुम उत्तम रूपसे सुशोभित उस दिव्य नारीसे ‘अंगने! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? इत्यादि प्रश्न न करना ।। २१-२२ ।। यच्च कुर्यान्न तत् कर्म सा प्रष्टव्या त्वयानघ । मन्नियोगाद् भजन्तीं तां भजेथा इत्युवाच तम् ।। २३ ।। ‘अनघ! वह जो कार्य करे, उसके विषयमें भी तुम्हें कुछ पूछताछ नहीं करनी चाहिये। यदि वह तुम्हें चाहे, तो मेरी आज्ञासे उसे अपनी पत्नी बना लेना।’ ये बातें राजा प्रतीपने अपने पुत्रसे कहीं ।। २३ ।।
वैशम्पायन उवाच
एवं संदिश्य तनयं प्रतीपः शान्तनुं तदा । स्वे च राज्येऽभिषिच्यैनं वनं राजा विवेश ह ।। २४ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**अपने पुत्र शान्तनुको ऐसा आदेश देकर राजा प्रतीपने उसी समय उन्हें अपने राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं वनमें प्रवेश किया ।। २४ ।। स राजा शान्तनुर्धीमान् देवराजसमद्युतिः । बभूव मृगयाशीलः शान्तनुर्वनगोचरः ।। २५ ।। बुद्धिमान् राजा शान्तनु देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी थे। वे हिंसक पशुओंको मारनेके उद्देश्यसे वनमें घूमते रहते थे ।। २५ ।। स मृगान् महिषांश्चैव विनिघ्नन् राजसत्तमः । गङ्गामनुचचारैकः सिद्धचारणसेविताम् ।। २६ ।। राजाओंमें श्रेष्ठ शान्तनु हिंसक पशुओं और जंगली भैंसोंको मारते हुए सिद्ध एवं चारणोंसे सेवित गंगाजीके तटपर अकेले ही विचरण करते थे ।। २६ ।। स कदाचिन्महाराज ददर्श परमां स्त्रियम् । जाज्वल्यमानां वपुषा साक्षाच्छ्रियमिवापराम् ।। २७ ।। महाराज जनमेजय! एक दिन उन्होंने एक परम सुन्दरी नारी देखी, जो अपने तेजस्वी शरीरसे ऐसी प्रकाशित हो रही थी, मानो साक्षात् लक्ष्मी ही दूसरा शरीर धारण करके आ गयी हो ।। २७ ।। सर्वानवद्यां सुदतीं दिव्याभरणभूषिताम् । सूक्ष्माम्बरधरामेकां पद्मोदरसमप्रभाम् ।। २८ ।। उसके सारे अंग परम सुन्दर और निर्दोष थे। दाँत तो और भी सुन्दर थे। वह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित थी। उसके शरीरपर महीन साड़ी शोभा पा रही थी और कमलके
भीतरी भागके समान उसकी कान्ति थी, वह अकेली थी ॥ २८ ॥
तां दृष्ट्वा हृष्टरोमाभूद् विस्मितो रूपसम्पदा ।
पिबन्निव च नेत्राभ्यां नातृप्यत नराधिपः ॥ २९ ॥
उसे देखते ही राजा शान्तनुके शरीरमें रोमांच हो आया, वे उसकी रूप-सम्पत्तिसे आश्चर्यचकित हो उठे और दोनों नेत्रोंद्वारा उसकी सौन्दर्य-सुधाका पान करते हुए-से तृप्त नहीं होते थे ॥ २९ ॥
सा च दृष्ट्वैव राजानं विचरन्तं महाद्युतिम् ।
स्नेहादागतसौहार्दा नातृप्यत विलासिनी ॥ ३० ॥
वह भी वहाँ विचरते हुए महातेजस्वी राजा शान्तनुको देखते ही मुग्ध हो गयी। स्नेहवश उसके हृदयमें सौहार्दका उदय हो आया। वह विलासिनी राजाको देखते-देखते तृप्त नहीं होती थी ॥ ३० ॥
तामुवाच ततो राजा सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा ।
देवी वा दानवी वा त्वं गन्धर्वी चाथ वाप्सराः ॥ ३१ ॥
यक्षी वा पन्नगी वापि मानुषी वा सुमध्यमे ।
याचे त्वां सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने ॥ ३२ ॥
तब राजा शान्तनु उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें बोले—'सुमध्यमे! तुम देवी, दानवी, गन्धर्वी, अप्सरा, यक्षी, नागकन्या अथवा मानवी, कुछ भी क्यों न होओ; देवकन्याके समान सुशोभित होनेवाली सुन्दरी! मैं तुमसे याचना करता हूँ कि मेरी पत्नी हो जाओ' ॥ ३१-३२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शान्तनूपाख्याने सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शान्तनूपाख्यानविषयक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 724)
अष्टनवतितमोऽध्यायः
शान्तनु और गंगाका कुछ शर्तोंके साथ सम्बन्ध, वसुओंका जन्म और शापसे उद्धार तथा भीष्मकी उत्पत्ति
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञः सस्मितं मृदु वल्गु च ।
(यशस्विनी च साऽऽगच्छच्छान्तनोर्भूतये तदा ।
सा च दृष्ट्वा नृपश्रेष्ठं चरन्तं तीरमाश्रितम् ॥)
वसूनां समयं स्मृत्वाथाभ्यगच्छदनिन्दिता ॥ १ ॥
(प्रजार्थिनी राजपुत्रं शान्तनुं पृथिवीपतिम् ।
प्रतीपवचनं चापि संस्मृत्यैव स्वयं नृप ॥
कालोऽयमिति मत्वा सा वसूनां शापचोदिता ।)
उवाच चैव राज्ञः सा ह्लादयन्ती मनो गिरा ।
भविष्यामि महीपाल महिषी ते वशानुगा ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा शान्तनुका मधुर मुस्कानयुक्त मनोहर वचन सुनकर यशस्विनी गंगा उनकी ऐश्वर्य-वृद्धिके लिये उनके पास आयीं। तटपर विचरते हुए उन नृपश्रेष्ठको देखकर सती साध्वी गंगाको वसुओंको दिये हुए वचनका स्मरण हो आया। साथ ही राजा प्रतीपकी बात भी याद आ गयी। तब यही उपयुक्त समय है, ऐसा मानकर वसुओंको मिले हुए शापसे प्रेरित हो वे स्वयं संतानोत्पादनकी इच्छासे पृथिवीपति महाराज शान्तनुके समीप चली आयीं और अपनी मधुर वाणीसे महाराजके मनको आनन्द प्रदान करती हुई बोलीं—‘भूपाल! मैं आपकी महारानी बनूँगी एवं आपके अधीन रहूँगी ॥ १-२ ॥
यत् तु कुर्यामहं राजञ्छुभं वा यदि वाशुभम् ।
न तद् वारयितव्यास्मि न वक्तव्या तथाप्रियम् ॥ ३ ॥
‘(परंतु एक शर्त है—) राजन्! मैं भला या बुरा जो कुछ भी करूँ, उसके लिये आपको मुझे नहीं रोकना चाहिये और मुझसे कभी अप्रिय वचन भी नहीं कहना चाहिये ॥ ३ ॥
एवं हि वर्तमानेऽहं त्वयि वत्स्यामि पार्थिव ।
वारिता विप्रियं चोक्ता त्यजेयं त्वामसंशयम् ॥ ४ ॥
‘पृथिवीपते! ऐसा बर्ताव करनेपर ही मैं आपके समीप रहूँगी। यदि आपने कभी मुझे किसी कार्यसे रोका या अप्रिय वचन कहा तो मैं निश्चय ही आपका साथ छोड़ दूँगी’ ॥ ४ ॥
तथेति सा यदा तूक्ता तदा भरतसत्तम ।
प्रहर्षमतुलं लेभे प्राप्य तं पार्थिवोत्तमम् ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय बहुत अच्छा कहकर राजाने जब उसकी शर्त मान ली, तब उन नृपश्रेष्ठको पतिरूपमें प्राप्त करके उस देवीको अनुपम आनन्द मिला ॥ ५ ॥
(रथमारोप्य तां देवीं जगाम स तया सह ।
सा च शान्तनुमभ्यागात् साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा ॥)
तब राजा शान्तनु देवी गंगाको रथपर बिठाकर उनके साथ अपनी राजधानीको चले गये। साक्षात् दूसरी लक्ष्मीके समान सुशोभित होनेवाली गंगादेवी शान्तनुके साथ गयीं।
आसाद्य शान्तनुस्तां च बुभुजे कामतो वशी ।
न प्रष्टव्येति मन्वानो न स तां किंचिदूचिवान् ॥ ६ ॥
इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले राजा शान्तनु उस देवीको पाकर उसका इच्छानुसार उपभोग करने लगे। पिताका यह आदेश था कि उससे कुछ पूछना मत; अतः उनकी आज्ञा मानकर राजाने उससे कोई बात नहीं पूछी ॥ ६ ॥
स तस्याः शीलवृत्तेन रूपौदार्यगुणेन च ।
उपचारेण च रहस्तुतोष जगतीपतिः ॥ ७ ॥
उसके उत्तम शील-स्वभाव, सदाचार, रूप, उदारता, सद्गुण तथा एकान्त सेवासे महाराज शान्तनु बहुत संतुष्ट रहते थे ॥ ७ ॥
दिव्यरूपा हि सा देवी गङ्गा त्रिपथगामिनी ।
मानुषं विग्रहं कृत्वा श्रीमन्तं वरवर्णिनी ॥ ८ ॥
भाग्योपनतकामस्य भार्या चोपनताभवत् ।
शान्तनोर्नृपसिंहस्य देवराजसमद्युतेः ॥ ९ ॥
त्रिपथगामिनी दिव्यरूपिणी देवी गंगा ही अत्यन्त सुन्दर मनुष्य-देह धारण करके देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी नृपशिरोमणि महाराज शान्तनुको, जिन्हें भाग्यसे इच्छानुसार सुख अपने-आप मिल रहा था, सुन्दरी पत्नीके रूपमें प्राप्त हुई थीं ॥ ८-९ ॥
सम्भोगस्नेहचातुर्यैर्हावभावसमन्वितैः ।
राजानं रमयामास यथा रेमे तथैव सः ॥ १० ॥
गंगादेवी हाव-भावसे युक्त सम्भोग-चातुरी और प्रणय-चातुरीसे राजाको जैसे-जैसे रमातीं, उसी-उसी प्रकार वे उनके साथ रमण करते थे ॥ १० ॥
स राजा रतिसक्तत्वादुत्तमस्त्रीगुणैर्हृतः ।
संवत्सरानृतून् मासान् बुबुधे न बहून् गतान् ॥ ११ ॥
उस दिव्य नारीके उत्तम गुणोंने उनके चित्तको चुरा लिया था; अतः वे राजा उसके साथ रति-भोगमें आसक्त हो गये। कितने ही वर्ष, ऋतु और मास व्यतीत हो गये, किंतु उसमें आसक्त होनेके कारण राजाको कुछ पता न चला ॥ ११ ॥
रममाणस्तया सार्धं यथाकामं नरेश्वरः ।
अष्टावजनयत् पुत्रांस्तस्याममरसंनिभान् ॥ १२ ॥ उसके साथ इच्छानुसार रमण करते हुए महाराज शान्तनुने उसके गर्भसे देवताओंके समान तेजस्वी आठ पुत्र उत्पन्न किये ॥ १२ ॥
जातं जातं च सा पुत्रं क्षिपत्यम्भसि भारत । प्रीणाम्यहं त्वामित्युक्त्वा गङ्गा स्रोतस्यमज्जयत् ॥ १३ ॥ भारत! जो-जो पुत्र उत्पन्न होता, उसे वह गंगाजीके जलमें फेंक देती और कहती—'(वत्स! इस प्रकार शापसे मुक्त करके) मैं तुम्हें प्रसन्न कर रही हूँ।' ऐसा कहकर गंगा प्रत्येक बालकको धारामें डुबो देती थी ॥ १३ ॥
तस्य तन्न प्रियं राज्ञः शान्तनोरभवत् तदा । न च तां किंचनोवाच त्यागाद् भीतो महीपतिः ॥ १४ ॥ पत्नीका यह व्यवहार राजा शान्तनुको अच्छा नहीं लगता था, तो भी वे उस समय उससे कुछ नहीं कहते थे। राजाको यह डर बना हुआ था कि कहीं यह मुझे छोड़कर चली न जाय ॥ १४ ॥
अथैनामष्टमे पुत्रे जाते प्रहसतीमिव । उवाच राजा दुःखार्तः परीप्सन् पुत्रमात्मनः ॥ १५ ॥ तदनन्तर जब आठवाँ पुत्र उत्पन्न हुआ, तब हँसती हुई-सी अपनी स्त्रीसे राजाने अपने पुत्रका प्राण बचानेकी इच्छासे दुःखातुर होकर कहा— ॥ १५ ॥
मा वधीः कस्य कासीति किं हिनत्सि सुतानिति । पुत्रघ्नि सुमहत् पापं सम्प्राप्तं ते सुगर्हितम् ॥ १६ ॥ 'अरी! इस बालकका वध न कर, तू किसकी कन्या है? कौन है? क्यों अपने ही बेटोंको मारे डालती है। पुत्रघातिनि! तुझे पुत्रहत्याका यह अत्यन्त निन्दित और भारी पाप लगा है' ॥ १६ ॥
स्त्र्युवाच
पुत्रकाम न ते हन्मि पुत्रं पुत्रवतां वर । जीर्णस्तु मम वासोऽयं यथा स समयः कृतः ॥ १७ ॥ स्त्री बोली—पुत्रकी इच्छा रखनेवाले नरेश! तुम पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ हो। मैं तुम्हारे इस पुत्रको नहीं मारूँगी; परंतु यहाँ मेरे रहनेका समय अब समाप्त हो गया; जैसी कि पहले ही शर्त हो चुकी है ॥ १७ ॥
अहं गङ्गा जह्नुसुता महर्षिगणसेविता । देवकार्यार्थसिद्धयर्थमुषिताहं त्वया सह ॥ १८ ॥ मैं जह्नुकी पुत्री और महर्षियोंद्वारा सेवित गंगा हूँ। देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये तुम्हारे साथ रह रही थी ॥ १८ ॥
इमेऽष्टौ वसवो देवा महाभागा महौजसः । वसिष्ठशापदोषेण मानुषत्वमुपागताः ॥ १९ ॥ ये तुम्हारे आठ पुत्र महातेजस्वी महाभाग वसु देवता हैं। वसिष्ठजीके शाप-दोषसे ये मनुष्य-योनिमें आये थे ॥ १९ ॥
तेषां जनयिता नान्यस्त्वदृते भुवि विद्यते । मद्विधा मानुषी धात्री लोके नास्तीह काचन ॥ २० ॥ तुम्हारे सिवा दूसरा कोई राजा इस पृथ्वीपर ऐसा नहीं था, जो उन वसुओंका जनक हो सके। इसी प्रकार इस जगत्में मेरी-जैसी दूसरी कोई मानवी नहीं है, जो उन्हें गर्भमें धारण कर सके ॥ २० ॥
तस्मात् तज्जननीहेतोर्मानुषत्वमुपागता । जनयित्वा वसूनष्टौ जिता लोकास्त्वयाक्षयाः ॥ २१ ॥ अतः इन वसुओंकी जननी होनेके लिये मैं मानवशरीर धारण करके आयी थी। राजन्! तुमने आठ वसुओंको जन्म देकर अक्षय लोक जीत लिये हैं ॥ २१ ॥
देवानां समयस्त्वेष वसूनां संश्रुतो मया । जातं जातं मोक्षयिष्ये जन्मतो मानुषादिति ॥ २२ ॥ वसु देवताओंकी यह शर्त थी और मैंने उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली थी कि जो-जो वसु जन्म लेगा, उसे मैं जन्मते ही मनुष्य-योनिसे छुटकारा दिला दूँगी ॥ २२ ॥
तत् ते शापाद् विनिर्मुक्ता आपवस्य महात्मनः । स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि पुत्रं पाहि महाव्रतम् ॥ २३ ॥ इसलिये अब वे वसु महात्मा आपव (वसिष्ठ)-के शापसे मुक्त हो चुके हैं। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाऊँगी। तुम इस महान् व्रतधारी पुत्रका पालन करो ॥ २३ ॥
(अयं तव सुतस्तेषां वीर्येण कुलनन्दनः । सम्भूतोऽति जनानन्यान भविष्यति न संशयः ॥) यह तुम्हारा पुत्र सब वसुओंके पराक्रमसे सम्पन्न होकर अपने कुलका आनन्द बढ़ानेके लिये प्रकट हुआ है। इसमें संदेह नहीं कि यह बालक बल और पराक्रममें दूसरे सब लोगोंसे बढ़कर होगा।
एष पर्यायवासो मे वसूनां संनिधौ कृतः । मत्प्रसूतिं विजानीहि गङ्गादत्तमिमं सुतम् ॥ २४ ॥ यह बालक वसुओंमेंसे प्रत्येकके एक-एक अंशका आश्रय है—सम्पूर्ण वसुओंके अंशसे इसकी उत्पत्ति हुई है। मैंने तुम्हारे लिये वसुओंके समीप प्रार्थना की थी कि ‘राजाका एक पुत्र जीवित रहे’। इसे मेरा बालक समझना और इसका नाम ‘गंगादत्त’ रखना ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि भीष्मोत्पत्तावष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें भीष्मोत्पत्तिविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल २८ १/३ श्लोक हैं)
महर्षि वसिष्ठद्वारा वसुओंको शाप प्राप्त होनेकी कथा
नवनवतितमोऽध्यायः
महर्षि वसिष्ठद्वारा वसुओंको शाप प्राप्त होनेकी कथा
शान्तनुरुवाच
आपवो नाम को न्वेष वसूनां किं च दुष्कृतम् ।
यस्याभिशापात् ते सर्वे मानुषीं योनिमागताः ॥ १ ॥
**शान्तनुने पूछा—**देवि! ये आपव नामके महात्मा कौन हैं? और वसुओंका क्या अपराध था, जिससे आपके शापसे उन सबको मनुष्य-योनिमें आना पड़ा ॥ १ ॥
अनेन च कुमारेण त्वया दत्तेन किं कृतम् ।
यस्य चैव कृतेनायं मानुषेषु निवत्स्यति ॥ २ ॥
और तुम्हारे दिये हुए इस पुत्रने कौन-सा कर्म किया है, जिसके कारण यह मनुष्यलोकमें निवास करेगा ॥ २ ॥
ईशा वै सर्वलोकस्य वसवस्ते च वै कथम् ।
मानुषेषूदपद्यन्त तन्ममाचक्ष्व जाह्नवि ॥ ३ ॥
जाह्नवि! वसु तो समस्त लोकोंके अधीश्वर हैं, वे कैसे मनुष्यलोकमें उत्पन्न हुए? यह सब बात मुझे बताओ ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता तदा गङ्गा राजानमिदमब्रवीत् ।
भर्तारं जाह्नवी देवी शान्तनुं पुरुषर्षभ ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**नरश्रेष्ठ जनमेजय! अपने पति राजा शान्तनुके इस प्रकार पूछनेपर जह्नुपुत्री गङ्गादेवीने उनसे इस प्रकार कहा ॥ ४ ॥
गङ्गोवाच
यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भरतसत्तम ।
वसिष्ठनामा स मुनिः ख्यात आपव इत्युत ॥ ५ ॥
**गङ्गा बोलीं—**भरतश्रेष्ठ! पूर्वकालमें वरुणने जिन्हें पुत्ररूपमें प्राप्त किया था, वे वसिष्ठ नामक मुनि ही 'आपव' नामसे विख्यात हैं ॥ ५ ॥
तस्याश्रमपदं पुण्यं मृगपक्षिसमन्वितम् ।
मेरोः पार्श्वे नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम् ॥ ६ ॥
गिरिराज मेरुके पार्श्वभागमें उनका पवित्र आश्रम है; जो मृग और पक्षियोंसे भरा रहता है। सभी ऋतुओंमें विकसित होनेवाले फूल उस आश्रमकी शोभा बढ़ाते हैं ॥ ६ ॥
स वारुणिस्तपस्तेपे तस्मिन् भरतसत्तम ।
वने पुण्यकृतां श्रेष्ठः स्वादुमूलफलोदके ॥ ७ ॥ भरतवंशशिरोमणे! उस वनमें स्वादिष्ट फल, मूल और जलकी सुविधा थी, पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ वरुणनन्दन महर्षि वसिष्ठ उसीमें तपस्या करते थे ॥ ७ ॥ दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यभिशब्दिता । गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपाद् भरतर्षभ ॥ ८ ॥ महाराज! दक्ष प्रजापतिकी पुत्रीने, जो देवी सुरभि नामसे विख्यात है, कश्यपजीके सहवाससे एक गौको जन्म दिया ॥ ८ ॥ अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुहां वरा । तां लेभे गां तु धर्मात्मा होमधेनुं स वारुणिः ॥ ९ ॥ वह गौ सम्पूर्ण जगत्पर अनुग्रह करनेके लिये प्रकट हुई थी तथा समस्त कामनाओंको देनेवालोंमें श्रेष्ठ थी। वरुणपुत्र धर्मात्मा वसिष्ठने उस गौको अपनी होमधेनुके रूपमें प्राप्त किया ॥ ९ ॥ सा तस्मिंस्तापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते । चचार पुण्ये रम्ये च गौरपेतभया तदा ॥ १० ॥ वह गौ मुनियोंद्वारा सेवित उस पवित्र एवं रमणीय तापसवनमें रहती हुई सब ओर निर्भय होकर चरती थी ॥ १० ॥ अथ तद् वनमाजग्मुः कदाचिद् भरतर्षभ । पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवा देवर्षिसेवितम् ॥ ११ ॥ भरतश्रेष्ठ! एक दिन उस देवर्षिसेवित वनमें पृथु आदि वसु तथा सम्पूर्ण देवता पधारे ॥ ११ ॥ ते सदारा वनं तच्च व्यचरन्त समन्ततः । रेमिरे रमणीयेषु पर्वतेषु वनेषु च ॥ १२ ॥ वे अपनी स्त्रियोंके साथ उस वनमें चारों ओर विचरने तथा रमणीय पर्वतों और वनोंमें रमण करने लगे ॥ १२ ॥ तत्रैकस्याथ भार्या तु वसोर्वासवविक्रम । संचरन्ती वने तस्मिन् गां ददर्श सुमध्यमा ॥ १३ ॥ इन्द्रके समान पराक्रमी महीपाल! उन वसुओंमेंसे एककी सुन्दरी पत्नीने उस वनमें घूमते समय उस गौको देखा ॥ १३ ॥ नन्दिनीं नाम राजेन्द्र सर्वकामधुगुत्तमाम् । सा विस्मयसमाविष्टा शीलद्रविणसम्पदा ॥ १४ ॥ राजेन्द्र! सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवालोंमें उत्तम नन्दिनी नामवाली उस गायको देखकर उसकी शीलसम्पत्तिसे वह वसुपत्नी आश्चर्यचकित हो उठी ॥ १४ ॥ द्यवे वै दर्शयामास तां गां गोवृषभेक्षण ।