भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

उसके बाद भी दुःखसे दुःखी देवव्रतने पिताके सारथिको बुलाया। राजकुमारकी आज्ञा पाकर कुरुराज शान्तनुका सारथि उनके पास आया। तब महाप्राज्ञ भीष्मने पिताके सारथिसे पूछा।

भीष्म उवाच

त्वं सारथे पितुर्मह्यं सखासि रथयुग् यतः ।
अपि जानासि यदि वै कस्यां भावो नृपस्य तु ॥
यथा वक्ष्यसि मे पृष्टः करिष्ये न तदन्यथा ।
**भीष्म बोले—**सारथे! तुम मेरे पिताके सखा हो, क्योंकि उनका रथ जोतनेवाले हो। क्या तुम जानते हो कि महाराजका अनुराग किस स्त्रीमें है? मेरे पूछनेपर तुम जैसा कहोगे, वैसा ही करूँगा, उसके विपरीत नहीं करूँगा।

सूत उवाच

दाशकन्या नरश्रेष्ठ तत्र भावः पितुर्गतः ।
वृतः स नरदेवेन तदा वचनमब्रवीत् ॥
योऽस्यां पुमान् भवेद् गर्भः स राजा त्वदनन्तरम् ।
नाकामयत तं दातुं पिता तव वरं तदा ॥
स चापि निश्चयस्तस्य न च दद्यामतोऽन्यथा ।
एवं ते कथितं वीर कुरुष्व यदनन्तरम् ॥)
**सूत बोला—**नरश्रेष्ठ! एक धीवरकी कन्या है, उसीके प्रति आपके पिताका अनुराग हो गया है। महाराजने धीवरसे उस कन्याको माँगा भी था, परंतु उस समय उसने यह शर्त रखी कि 'इसके गर्भसे जो पुत्र हो, वही आपके बाद राजा होना चाहिये।' आपके पिताजीके मनमें धीवरको ऐसा वर देनेकी इच्छा नहीं हुई। इधर उसका भी पक्का निश्चय है कि यह शर्त स्वीकार किये बिना मैं अपनी कन्या नहीं दूँगा। वीर! यही वृत्तान्त है, जो मैंने आपसे निवेदन कर दिया। इसके बाद आप जैसा उचित समझें, वैसा करें।

ततो देवव्रतो वृद्धैः क्षत्रियैः सहितस्तदा ।
अभिगम्य दाशराजं कन्यां वव्रे पितुः स्वयम् ॥ ७५ ॥
यह सुनकर कुमार देवव्रतने उस समय बूढ़े क्षत्रियोंके साथ निषादराजके पास जाकर स्वयं अपने पिताके लिये उसकी कन्या माँगी ॥ ७५ ॥

तं दाशः प्रतिजग्राह विधिवत् प्रतिपूज्य च ।
अब्रवीच्चैनमासीनं राजसंसदि भारत ॥ ७६ ॥
भारत! उस समय निषादने उनका बड़ा सत्कार किया और विधिपूर्वक पूजा करके आसनपर बैठनेके पश्चात् साथ आये हुए क्षत्रियोंकी मण्डलीमें दाशराजने उनसे कहा ॥ ७६ ॥

दाश उवाच

(राज्यशुल्का प्रदातव्या कन्येयं याचतां वर ।
अपत्यं यद् भवेत् तस्याः स राजास्तु पितुः परम् ॥)
दाशराज बोला—याचकोंमें श्रेष्ठ राजकुमार! इस कन्याको देनेमें मैंने राज्यको ही शुल्क रखा है। इसके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न हो, वही पिताके बाद राजा हो।
त्वमेव नाथः पर्याप्तः शान्तनोर्भरतर्षभ ।
पुत्रः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः किं तु वक्ष्यामि ते वचः ॥ ७७ ॥
भरतर्षभ! राजा शान्तनुके पुत्र अकेले आप ही सबकी रक्षाके लिये पर्याप्त हैं। शस्त्रधारियोंमें आप सबसे श्रेष्ठ समझे जाते हैं; परंतु तो भी मैं अपनी बात आपके सामने रखूँगा ॥ ७७ ॥
को हि सम्बन्धकं श्लाघ्यमीप्सितं यौनमीदृशम् ।
अतिक्रामन्न तप्येत साक्षादपि शतक्रतुः ॥ ७८ ॥
ऐसे मनोऽनुकूल और स्पृहणीय उत्तम विवाह-सम्बन्धको ठुकराकर कौन ऐसा मनुष्य होगा जिसके मनमें संताप न हो? भले ही वह साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो ॥ ७८ ॥
अपत्यं चैतदार्यस्य यो युष्माकं समो गुणैः ।
यस्य शुक्रात् सत्यवती सम्भूता वरवर्णिनी ॥ ७९ ॥
यह कन्या एक आर्य पुरुषकी संतान है, जो गुणोंमें आपलोगोंके ही समान हैं और जिनके वीर्यसे इस सुन्दरी सत्यवतीका जन्म हुआ है ॥ ७९ ॥
तेन मे बहुशस्तात पिता ते परिकीर्तितः ।
अर्हः सत्यवतीं वोढुं धर्मज्ञः स नराधिपः ॥ ८० ॥
तात! उन्होंने अनेक बार मुझसे आपके पिताके विषयमें चर्चा की थी। वे कहते थे, सत्यवतीको ब्याहनेयोग्य तो केवल धर्मज्ञ राजा शान्तनु ही हैं ॥ ८० ॥
अर्थितश्चापि राजर्षिः प्रत्याख्यातः पुरा मया ।
स चाप्यासीत् सत्यवत्या भृशमर्थी महायशाः ॥ ८१ ॥
कन्यापितृत्वात् किंचित् तु वक्ष्यामि त्वां नराधिप ।
बलवत्सपत्नतामत्र दोषं पश्यामि केवलम् ॥ ८२ ॥
महान् कीर्तिवाले राजर्षि शान्तनु सत्यवतीको पहले भी बहुत आग्रहपूर्वक माँग चुके हैं; किंतु उनके माँगनेपर भी मैंने उनकी बात अस्वीकार कर दी थी। युवराज! मैं कन्याका पिता होनेके कारण कुछ आपसे भी कहूँगा ही। आपके यहाँ जो सम्बन्ध हो रहा है, उसमें मुझे केवल एक दोष दिखायी देता है, बलवान्‌के साथ शत्रुता ॥ ८१-८२ ॥
यस्य हि त्वं सपत्नः स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वा ।
न स जातु चिरं जीवेत् त्वयि क्रुद्धे परंतप ॥ ८३ ॥

परंतप! आप जिसके शत्रु होंगे, वह गन्धर्व हो या असुर, आपके कुपित होनेपर कभी चिरजीवी नहीं हो सकता ।। ८३ ।। एतावानत्र दोषो हि नान्यः कश्चन् पार्थिव । एतज्जानीहि भद्रं ते दानादाने परंतप ।। ८४ ।। पृथ्वीनाथ! बस, इस विवाहमें इतना ही दोष है, दूसरा कोई नहीं। परंतप! आपका कल्याण हो, कन्याको देने या न देनेमें केवल यही दोष विचारणीय है; इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें ।। ८४ ।।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु गाङ्गेयस्तद्युक्तं प्रत्यभाषत । शृण्वतां भूमिपालानां पितुरर्थाय भारत ।। ८५ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! निषादके ऐसा कहनेपर गंगानन्दन देवव्रतने पिताके मनोरथको पूर्ण करनेके लिये सब राजाओंके सुनते-सुनते यह उचित उत्तर दिया— ।। ८५ ।। इदं मे व्रतमादत्स्व सत्यं सत्यवतां वर । नैव जातो न वाजात ईदृशं वक्तुमुत्सहेत् ।। ८६ ।। ‘सत्यवानोंमें श्रेष्ठ निषादराज! मेरी यह सच्ची प्रतिज्ञा सुनो और ग्रहण करो। ऐसी बात कह सकनेवाला कोई मनुष्य न अबतक पैदा हुआ है और न आगे पैदा होगा ।। ८६ ।। एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वमनुभाषसे । योऽस्यां जनिष्यते पुत्रः स नो राजा भविष्यति ।। ८७ ।। ‘लो, तुम जो कुछ चाहते या कहते हो, वैसा ही करूँगा। इस सत्यवतीके गर्भसे जो पुत्र पैदा होगा, वही हमारा राजा बनेगा’ ।। ८७ ।।

इत्युक्तः पुनरेवाथ तं दाशः प्रत्यभाषत ।
चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म राज्यार्थे भरतर्षभ ॥ ८८ ॥
भरतवंशावतंस जनमेजय! देवव्रतके ऐसा कहनेपर निषाद उनसे फिर बोला। वह राज्यके लिये उनसे कोई दुष्कर प्रतिज्ञा कराना चाहता था ॥ ८८ ॥
त्वमेव नाथः सम्प्राप्तः शान्तनोरमितद्युते ।
कन्यायाश्चैव धर्मात्मन् प्रभुर्दानाय चेश्वरः ॥ ८९ ॥
उसने कहा—‘अमित तेजस्वी युवराज! आप ही महाराज शान्तनुकी ओरसे मालिक बनकर यहाँ आये हैं। धर्मात्मन्! इस कन्यापर भी आपका पूरा अधिकार है। आप जिसे चाहें, इसे दे सकते हैं। आप सब कुछ करनेमें समर्थ हैं ॥ ८९ ॥
इदं तु वचनं सौम्य कार्यं चैव निबोध मे ।
कौमारिकाणां शीलेन वक्ष्याम्यहमरिन्दम ॥ ९० ॥
‘परंतु सौम्य! इस विषयमें मुझे आपसे कुछ और कहना है और वह आवश्यक कार्य है; अतः आप मेरे इस कथनको सुनिये। शत्रुदमन! कन्याओंके प्रति स्नेह रखनेवाले सगे-सम्बन्धियोंका जैसा स्वभाव होता है, उसीसे प्रेरित होकर मैं आपसे कुछ निवेदन करूँगा ॥ ९० ॥
यत् त्वया सत्यवत्यर्थे सत्यधर्मपरायण ।
राजमध्ये प्रतिज्ञातमनुरूपं तवैव तत् ॥ ९१ ॥

‘सत्यधर्मपरायण राजकुमार! आपने सत्यवतीके हितके लिये इन राजाओंके बीचमें जो प्रतिज्ञा की है, वह आपके ही योग्य है ॥ ९१ ॥ नान्यथा तन्महाबाहो संशयोऽत्र न कश्चन । तवापत्यं भवेद् यत् तु तत्र नः संशयो महान् ॥ ९२ ॥ ‘महाबाहो! वह टल नहीं सकती; उसके विषयमें मुझे कोई संदेह नहीं है, परंतु आपका जो पुत्र होगा, वह शायद इस प्रतिज्ञापर दृढ़ न रहे, यही हमारे मनमें बड़ा भारी संशय है’ ॥ ९२ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्यैतन्मतमाज्ञाय सत्यधर्मपरायणः । प्रत्यजानात् तदा राजन् पितुः प्रियचिकीर्षया ॥ ९३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! निषादराजके इस अभिप्रायको समझकर सत्यधर्ममें तत्पर रहनेवाले कुमार देवव्रतने उस समय पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे यह कठोर प्रतिज्ञा की ॥ ९३ ॥

गाङ्गेय उवाच

दाशराज निबोधेदं वचनं मे नरोत्तम । (ऋषयो वाथवा देवा भूतान्यन्तर्हितानि च । यानि यानीह शृण्वन्तु नास्ति वक्ता हि मत्समः ॥ इदं वचनमादत्स्व सत्येन मम जल्पतः ।) शृण्वतां भूमिपालानां यद् ब्रवीमि पितुः कृते ॥ ९४ ॥ भीष्मने कहा— नरश्रेष्ठ निषादराज! मेरी यह बात सुनो। जो-जो ऋषि, देवता एवं अन्तरिक्षके प्राणी यहाँ हों, वे सब भी सुनें। मेरे समान वचन देनेवाला दूसरा नहीं है। निषाद! मैं सत्य कहता हूँ, पिताके हितके लिये सब भूमिपालोंके सुनते हुए मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरी इस बातको समझो ॥ ९४ ॥ राज्यं तावत् पूर्वमेव मया त्यक्तं नराधिपाः । अपत्यहेतोरपि च करिष्येऽद्य विनिश्चयम् ॥ ९५ ॥ राजाओ! राज्य तो मैंने पहले ही छोड़ दिया है; अब संतानके लिये भी अटल निश्चय कर रहा हूँ ॥ ९५ ॥ अद्यप्रभृति मे दाश ब्रह्मचर्यं भविष्यति । अपुत्रस्यापि मे लोका भविष्यन्त्यक्षया दिवि ॥ ९६ ॥ निषादराज! आजसे मेरा आजीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत चलता रहेगा। मेरे पुत्र न होनेपर भी स्वर्गमें मुझे अक्षय लोक प्राप्त होंगे ॥ ९६ ॥ (न हि जन्मप्रभृत्युक्तं मम किंचिदिहानृतम् ।

यावत् प्राणा ध्रियन्ते वै मम देहं समाश्रिताः ॥
तावन्न जनयिष्यामि पित्रे कन्यां प्रयच्छ मे ।
परित्यजाम्यहं राज्यं मैथुनं चापि सर्वशः ॥
ऊर्ध्वरेता भविष्यामि दाश सत्यं ब्रवीमि ते ।)
मैंने जन्मसे लेकर अबतक कोई झूठ बात नहीं कही है। जबतक मेरे शरीरमें प्राण रहेंगे, तबतक मैं संतान नहीं उत्पन्न करूँगा। तुम पिताजीके लिये अपनी कन्या दे दो। दाश! मैं राज्य तथा मैथुनका सर्वथा परित्याग करूँगा और ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) होकर रहूँगा—यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।

वैशम्पायन उवाच

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा सम्प्रहृष्टतनूरूहः ।
ददानीत्येव तं दाशो धर्मात्मा प्रत्यभाषत ॥ ९७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**देवव्रतका यह वचन सुनकर धर्मात्मा निषादराजके रोंगटे खड़े हो गये। उसने तुरंत उत्तर दिया—'मैं यह कन्या आपके पिताके लिये अवश्य देता हूँ' ॥ ९७ ॥

ततोऽन्तरिक्षेऽप्सरसो देवाः सर्षिगणास्तदा ।
अभ्यवर्षन्त कुसुमैर्भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ॥ ९८ ॥
उस समय अन्तरिक्षमें अप्सरा, देवता तथा ऋषिगण फूलोंकी वर्षा करने लगे और बोल उठे—'ये भयंकर प्रतिज्ञा करनेवाले राजकुमार भीष्म हैं (अर्थात् भीष्मके नामसे इनकी ख्याति होगी)' ॥ ९८ ॥

ततः स पितुरर्थाय तामुवाच यशस्विनीम् ।
अधिरोह रथं मातर्गच्छावः स्वगृहानिति ॥ ९९ ॥
तत्पश्चात् भीष्म पिताके मनोरथकी सिद्धिके लिये उस यशस्विनी निषादकन्यासे बोले—'माताजी! इस रथपर बैठिये। अब हमलोग अपने घर चलें' ॥ ९९ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा तु भीष्मस्तां रथमारोप्य भाविनीम् ।
आगम्य हास्तिनपुरं शान्तनोः संन्यवेदयत् ॥ १०० ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर भीष्मने उस भामिनीको रथपर बैठा लिया और हस्तिनापुर आकर उसे महाराज शान्तनुको सौंप दिया ॥ १०० ॥

तस्य तद् दुष्करं कर्म प्रशशंसुर्नराधिपाः ।
समेताश्च पृथक् चैव भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन् ॥ १०१ ॥
उनके इस दुष्कर कर्मकी सब राजालोग एकत्र होकर और अलग-अलग भी प्रशंसा करने लगे। सबने एक स्वरसे कहा, 'यह राजकुमार वास्तवमें भीष्म है' ॥ १०१ ॥

नच्छ्रुत्वा दुष्करं कर्म कृतं भीष्मेण शान्तनुः । स्वच्छन्दमरणं तुष्टो ददौ तस्मै महात्मने ॥ १०२ ॥ भीष्मके द्वारा किये हुए उस दुष्कर कर्मकी बात सुनकर राजा शान्तनु बहुत संतुष्ट हुए और उन्होंने उन महात्मा भीष्मको स्वच्छन्द मृत्युका वरदान दिया ॥ १०२ ॥

अध्याय (पृष्ठ 755)

⬅ विषय-सूची (TOC)

देवव्रत (भीष्म)-की भीषण प्रतिज्ञा

न ते मृत्युः प्रभविता यावज्जीवितुमिच्छसि । त्वत्तो ह्यनुज्ञां सम्प्राप्य मृत्युः प्रभवितानघ ॥ १०३ ॥ वे बोले—'मेरे निष्पाप पुत्र! तुम जबतक यहाँ जीवित रहना चाहोगे, तबतक मृत्यु तुम्हारे ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। तुमसे आज्ञा लेकर ही मृत्यु तुमपर अपना प्रभाव प्रकट कर सकती है' ॥ १०३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि सत्यवतीलाभोपाख्याने शततमोऽध्यायः ॥ १०० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें सत्यवतीलाभोपाख्यानविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०० ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ११६ १/३ श्लोक हैं)

१०१-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकाधिकशततमोऽध्यायः

सत्यवतीके गर्भसे चित्रांगद और विचित्रवीर्यकी उत्पत्ति, शान्तनु और चित्रांगदका निधन तथा विचित्रवीर्यका राज्याभिषेक

वैशम्पायन उवाच

(चेदिराजसुतां ज्ञात्वा दाशराजेन वर्धिताम् ।
विवाहं कारयामास शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥)
ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा शान्तनुर्नृपः ।
तां कन्यां रूपसम्पन्नां स्वगृहे संन्यवेशयत् ॥ १ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**सत्यवती चेदिराज वसुकी पुत्री है और निषादराजने इसका पालन-पोषण किया है—यह जानकर राजा शान्तनुने उसके साथ शास्त्रीय विधिसे विवाह किया। तदनन्तर विवाह सम्पन्न हो जानेपर राजा शान्तनुने उस रूपवती कन्याको अपने महलमें रखा ॥ १ ॥

ततः शान्तनवो धीमान् सत्यवत्यामजायत ।
वीरश्चित्राङ्गदो नाम वीर्यवान् पुरुषेश्वरः ॥ २ ॥

कुछ कालके पश्चात् सत्यवतीके गर्भसे शान्तनुका बुद्धिमान् पुत्र वीर चित्रांगद उत्पन्न हुआ, जो बड़ा ही पराक्रमी तथा समस्त पुरुषोंमें श्रेष्ठ था ॥ २ ॥

अथापरं महेष्वासं सत्यवत्यां सुतं प्रभुः ।
विचित्रवीर्यं राजानं जनयामास वीर्यवान् ॥ ३ ॥

इसके बाद महापराक्रमी और शक्तिशाली राजा शान्तनुने दूसरे पुत्र महान् धनुर्धर राजा विचित्रवीर्यको जन्म दिया ॥ ३ ॥

अप्राप्तवति तस्मिंस्तु यौवनं पुरुषर्षभे ।
स राजा शान्तनुर्धीमान् कालधर्ममुपेयिवान् ॥ ४ ॥

नरश्रेष्ठ विचित्रवीर्य अभी यौवनको प्राप्त भी नहीं हुए थे कि बुद्धिमान् महाराज शान्तनुकी मृत्यु हो गयी ॥ ४ ॥

स्वर्गते शान्तनौ भीष्मश्चित्राङ्गमरिंदमम् ।
स्थापयामास वै राज्ये सत्यवत्या मते स्थितः ॥ ५ ॥

शान्तनुके स्वर्गवासी हो जानेपर भीष्मने सत्यवतीकी सम्मतिसे शत्रुओंका दमन करनेवाले वीर चित्रांगदको राज्यपर बिठाया ॥ ५ ॥

स तु चित्राङ्गदः शौर्यात् सर्वांश्चिक्षेप पार्थिवान् ।

मनुष्यं न हि मेने स कञ्चित् सदृशमात्मनः ॥ ६ ॥ चित्रांगद अपने शौर्यके घमंडमें आकर सब राजाओंका तिरस्कार करने लगे। वे किसी भी मनुष्यको अपने समान नहीं मानते थे ॥ ६ ॥ तं क्षिपन्तं सुरांश्चैव मनुष्यानसुरांस्तथा । गन्धर्वराजो बलवांस्तुल्यनामाभ्ययात् तदा ॥ ७ ॥ मनुष्योंपर ही नहीं, वे देवताओं तथा असुरोंपर भी आक्षेप करते थे। तब एक दिन उन्हींके समान नामवाला महाबली गन्धर्वराज चित्रांगद उनके पास आया ॥ ७ ॥

(गन्धर्व उवाच त्वं वै सदृशनामासि युद्धं देहि नृपात्मज । नाम चान्यत् प्रगृणीष्व यदि युद्धं न दास्यसि ॥ त्वयाहं युद्धमिच्छामि त्वत्सकाशात् तु नामतः । आगतोऽस्मि वृथाभाष्यो न गच्छेन्नामतो यथा ॥) गन्धर्वने कहा— राजकुमार! तुम मेरे सदृश नाम धारण करते हो, अतः मुझे युद्धका अवसर दो और यदि यह न कर सको तो अपना दूसरा नाम रख लो। मैं तुमसे युद्ध करना चाहता हूँ। नामकी एकताके कारण ही मैं तुम्हारे निकट आया हूँ। मेरे नामद्वारा व्यर्थ पुकारा जानेवाला मनुष्य मेरे सामनेसे सकुशल नहीं जा सकता।

तेनास्य सुमहद् युद्धं कुरुक्षेत्रे बभूव ह । तयोर्बलवतोस्तत्र गन्धर्वकुरुमुख्ययोः । नद्यास्तीरे सरस्वत्याः समास्तिस्रोऽभवद् रणः ॥ ८ ॥ तस्मिन् विमर्दे तुमुले शस्त्रवर्षसमाकुले । मायाधिकोऽवधीद् वीरं गन्धर्वः कुरुसत्तमम् ॥ ९ ॥ तदनन्तर उसके साथ कुरुक्षेत्रमें राजा चित्रांगदका बड़ा भारी युद्ध हुआ। गन्धर्वराज और कुरुराज दोनों ही बड़े बलवान् थे। उनमें सरस्वती नदीके तटपर तीन वर्षोंतक युद्ध होता रहा। अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षासे व्याप्त उस घमासान युद्धमें मायामें बढ़े-चढ़े हुए गन्धर्वने कुरुश्रेष्ठ वीर चित्रांगदका वध कर डाला ॥ ८-९ ॥

स हत्वा तु नरश्रेष्ठं चित्राङ्गदमरिंदमम् । अन्ताय कृत्वा गन्धर्वो दिवमाचक्रमे ततः ॥ १० ॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले नरश्रेष्ठ चित्रांगदको मारकर युद्ध समाप्त करके वह गन्धर्व स्वर्गलोकमें चला गया ॥ १० ॥

तस्मिन् पुरुषशार्दूले निहते भूरितेजसि । भीष्मः शान्तनवो राजा प्रेतकार्याण्यकारयत् ॥ ११ ॥

उन महान् तेजस्वी पुरुषसिंह चित्रांगदके मारे जानेपर शान्तनुनन्दन भीष्मने उनके प्रेतकर्म करवाये ॥ ११ ॥ विचित्रवीर्यं च तदा बालमप्राप्तयौवनम् । कुरुराज्ये महाबाहुरभ्यषिञ्चदनन्तरम् ॥ १२ ॥ विचित्रवीर्य अभी बालक थे, युवावस्थामें नहीं पहुँचे थे तो भी महाबाहु भीष्मने उन्हें कुरुदेशके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ १२ ॥ विचित्रवीर्यः स तदा भीष्मस्य वचने स्थितः । अन्वशासन्महाराज पितृपैतामहं पदम् ॥ १३ ॥ महाराज जनमेजय! तब विचित्रवीर्य भीष्मजीकी आज्ञाके अधीन रहकर अपने बाप-दादोंके राज्यका शासन करने लगे ॥ १३ ॥ स धर्मशास्त्रकुशलं भीष्मं शान्तनवं नृपः । पूजयामास धर्मेण स चैनं प्रत्यपालयत् ॥ १४ ॥ शान्तनुनन्दन भीष्म धर्म एवं राजनीति आदि शास्त्रोंमें कुशल थे; अतः राजा विचित्रवीर्य धर्मपूर्वक उनका सम्मान करते थे और भीष्मजी भी इन अल्पवयस्क नरेशकी सब प्रकारसे रक्षा करते थे ॥ १४ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि चित्राङ्गदोपाख्याने एकाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें चित्रांगदोपाख्यानविषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०१ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल १७ श्लोक हैं)

१०२-

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्व्यधिकशततमोऽध्यायः

भीष्मके द्वारा स्वयंवरसे काशिराजकी कन्याओंका हरण, युद्धमें सब राजाओं तथा शाल्वकी पराजय, अम्बिका और अम्बालिकाके साथ विचित्रवीर्यका विवाह तथा निधन

वैशम्पायन उवाच

हते चित्राङ्गदे भीष्मो बाले भ्रातरि कौरव ।
पालयामास तद् राज्यं सत्यवत्या मते स्थितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! चित्रांगदके मारे जानेपर दूसरे भाई विचित्रवीर्य अभी बहुत छोटे थे, अतः सत्यवतीकी रायसे भीष्मजीने ही उस राज्यका पालन किया ॥ १ ॥

सम्प्राप्तयौवनं दृष्ट्वा भ्रातरं धीमतां वरः ।
भीष्मो विचित्रवीर्यस्य विवाहायाकरोन्मतिम् ॥ २ ॥
जब विचित्रवीर्य धीरे-धीरे युवावस्थामें पहुँचे, तब बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भीष्मजीने उनकी वह अवस्था देख विचित्रवीर्यके विवाहका विचार किया ॥ २ ॥

अथ काशिपतेर्भीष्मः कन्यास्तिस्रोऽप्सरोपमाः ।
शुश्राव सहिता राजन् वृण्वाना वै स्वयंवरम् ॥ ३ ॥
राजन्! उन दिनों काशिराजकी तीन कन्याएँ थीं, जो अप्सराओंके समान सुन्दर थीं। भीष्मजीने सुना, वे तीनों कन्याएँ साथ ही स्वयंवर-सभामें पतिका वरण करनेवाली हैं ॥ ३ ॥

ततः स रथिनां श्रेष्ठो रथेनैकेन शत्रुजित् ।
जगामानुमते मातुः पुरीं वाराणसीं प्रभुः ॥ ४ ॥
तब माता सत्यवतीकी आज्ञा ले रथियोंमें श्रेष्ठ शत्रुविजयी भीष्म एकमात्र रथके साथ वाराणसीपुरीको गये ॥ ४ ॥

तत्र राज्ञः समुदितान् सर्वतः समुपागतान् ।
ददर्श कन्यास्तांश्चैव भीष्मः शान्तनुनन्दनः ॥ ५ ॥
वहाँ शान्तनुनन्दन भीष्मने देखा, सब ओरसे आये हुए राजाओंका समुदाय स्वयंवर-सभामें जुटा हुआ है और वे कन्याएँ भी स्वयंवरमें उपस्थित हैं ॥ ५ ॥

कीर्त्यमानेषु राज्ञां तु तदा नामसु सर्वशः ।
एकाकिनं तदा भीष्मं वृद्धं शान्तनुनन्दनम् ॥ ६ ॥
सोद्वेगा इव तं दृष्ट्वा कन्याः परमशोभनाः ।

अपाक्रामन्त ताः सर्वा वृद्ध इत्येव चिन्तया ॥ ७ ॥ उस समय सब ओर राजाओंके नाम ले-लेकर उन सबका परिचय दिया जा रहा था। इतनेमें ही शान्तनुनन्दन भीष्म, जो अब वृद्ध हो चले थे, वहाँ अकेले ही आ पहुँचे। उन्हें देखकर वे सब परम सुन्दरी कन्याएँ उद्विग्न-सी होकर, ये बूढ़े हैं, ऐसा सोचती हुई वहाँसे दूर भाग गयीं ॥ ६-७ ॥ वृद्धः परमधर्मात्मा वलीपलितधारणः । किं कारणमिहायातो निर्लज्जो भरतर्षभः ॥ ८ ॥ मिथ्याप्रतिज्ञो लोकेषु किं वदिष्यति भारत । ब्रह्मचारीति भीष्मो हि वृथैव प्रथितो भुवि ॥ ९ ॥ इत्येवं प्रब्रुवन्तस्ते हसन्ति स्म नृपाधमाः । वहाँ जो नीच स्वभावके नरेश एकत्र थे, वे आपसमें ये बातें कहते हुए उनकी हँसी उड़ाने लगे—'भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ भीष्म तो बड़े धर्मात्मा सुने जाते थे। ये बूढ़े हो गये हैं, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, सिरके बाल सफेद हो चुके हैं; फिर क्या कारण है कि यहाँ आये हैं? ये तो बड़े निर्लज्ज जान पड़ते हैं। अपनी प्रतिज्ञा झूठी करके ये लोगोंमें क्या कहेंगे—कैसे मुँह दिखायेंगे? भूमण्डलमें व्यर्थ ही यह बात फैल गयी है कि भीष्मजी ब्रह्मचारी हैं' ॥ ८-९ ½ ॥

वैशम्पायन उवाच

क्षत्रियाणां वचः श्रुत्वा भीष्मश्चुक्रोध भारत ॥ १० ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! क्षत्रियोंकी ये बातें सुनकर भीष्म अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ १० ॥ भीष्मस्तदा स्वयं कन्या वरयामास ताः प्रभुः । उवाच च महीपालान् राजञ्जलदनिःस्वनः ॥ ११ ॥ रथमारोप्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः । आहूय दानं कन्यानां गुणवद्भ्यः स्मृतं बुधैः ॥ १२ ॥ अलंकृत्य यथाशक्ति प्रदाय च धनान्यपि । प्रयच्छन्त्यपरे कन्या मिथुनेन गवामपि ॥ १३ ॥ राजन्! वे शक्तिशाली तो थे ही, उन्होंने उस समय स्वयं ही समस्त कन्याओंका वरण किया। इतना ही नहीं, प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ वीरवर भीष्मने उन कन्याओंको उठाकर रथपर चढ़ा लिया और समस्त राजाओंको ललकारते हुए मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा—'विद्वानोंने कन्याको यथाशक्ति वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके गुणवान् वरको बुलाकर उसे कुछ धन देनेके साथ ही कन्यादान करना उत्तम (ब्राह्म विवाह) बताया है। कुछ लोग एक जोड़ा गाय और बैल लेकर कन्यादान करते हैं (यह आर्ष विवाह है) ॥ ११—१३ ॥

वित्तेन कथितेनान्ये बलेनान्येऽनुमान्य च ।
प्रमत्तामुपयन्त्यन्ये स्वयमन्ये च विन्दते ॥ १४ ॥
‘कितने ही मनुष्य नियत धन लेकर कन्यादान करते हैं (यह आसुर विवाह है)। कुछ लोग बलसे कन्याका हरण करते हैं (यह राक्षस विवाह है)। दूसरे लोग वर और कन्याकी परस्पर अनुमति होनेपर विवाह करते हैं (यह गान्धर्व विवाह है)। कुछ लोग अचेत अवस्थामें पड़ी हुई कन्याको उठा ले जाते हैं (यह पैशाच विवाह है)। कुछ लोग वर और कन्याको एकत्र करके स्वयं ही उनसे प्रतिज्ञा कराते हैं कि हम दोनों गार्हस्थ्य धर्मका पालन करेंगे; फिर कन्यापिता दोनोंकी पूजा करके अलंकारयुक्त कन्याका वरके लिये दान करता है; इस प्रकार विवाहित होनेवाले (प्राजापत्य विवाहकी रीतिसे) पत्नीकी उपलब्धि करते हैं ॥ १४ ॥

आर्षं विधिं पुरस्कृत्य दारान् विन्दन्ति चापरे ।
अष्टमं तमथो वित्त विवाहं कविभिर्वृतम् ॥ १५ ॥
‘कुछ लोग आर्ष विधि (यज्ञ) करके ऋत्विजको कन्या देते हैं। इस प्रकार विवाहित होनेवाले (दैव विवाहकी रीतिसे) पत्नी प्राप्त करते हैं। इस तरह विद्वानोंने यह विवाहका आठवाँ प्रकार माना है। इन सबको तुमलोग समझो ॥ १५ ॥

स्वयंवरं तु राजन्याः प्रशंसन्त्युपयान्ति च ।
प्रमथ्य तु हृतामाहुर्ज्यायसीं धर्मवादिनः ॥ १६ ॥
‘क्षत्रिय स्वयंवरकी प्रशंसा करते और उसमें जाते हैं; परंतु उसमें भी समस्त राजाओंको परास्त करके जिस कन्याका अपहरण किया जाता है, धर्मवादी विद्वान् क्षत्रियके लिये उसे सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ॥ १६ ॥

ता इमाः पृथिवीपाला जिहीर्षामि बलादितः ।
ते यतध्वं परं शक्त्या विजयायेतराय वा ॥ १७ ॥
‘अतः भूमिपालो! मैं इन कन्याओंको यहाँसे बलपूर्वक हर ले जाना चाहता हूँ। तुमलोग अपनी सारी शक्ति लगाकर विजय अथवा पराजयके लिये मुझे रोकनेका प्रयत्न करो ॥ १७ ॥

स्थितोऽहं पृथिवीपाला युद्धाय कृतनिश्चयः ।
एवमुक्त्वा महीपालान् काशिराजं च वीर्यवान् ॥ १८ ॥
सर्वाः कन्याः स कौरव्यो रथमारोप्य च स्वकम् ।
आमन्त्र्य च स तान् प्रायाच्छीघ्रं कन्याः प्रगृह्य ताः ॥ १९ ॥
‘राजाओ! मैं युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके यहाँ डटा हुआ हूँ।’ परम पराक्रमी कुरुकुलश्रेष्ठ भीष्मजी उन महीपालों तथा काशिराजसे उपर्युक्त बातें कहकर उन समस्त कन्याओंको, जिन्हें वे उठाकर अपने रथपर बिठा चुके थे, साथ लेकर सबको ललकारते हुए वहाँसे शीघ्रतापूर्वक चल दिये ॥ १८-१९ ॥

ततस्ते पार्थिवाः सर्वे समुत्पेतुरमर्षिताः ।
संस्पृशन्तः स्वकान् बाहून् दशन्तो दशनच्छदान् ॥ २० ॥

फिर तो समस्त राजा इस अपमानको न सह सके; वे अपनी भुजाओंका स्पर्श करते (ताल ठोकते) और दाँतोंसे ओठ चबाते हुए अपनी जगहसे उछल पड़े ॥ २० ॥
तेषामाभरणान्याशु त्वरितानां विमुञ्चताम् ।
आमुञ्चतां च वर्माणि सम्भ्रमः सुमहानभूत् ॥ २१ ॥

सब लोग जल्दी-जल्दी अपने आभूषण उतारकर कवच पहनने लगे। उस समय बड़ा भारी कोलाहल मच गया ॥ २१ ॥
ताराणामिव सम्पातो बभूव जनमेजय ।
भूषणानां च सर्वेषां कवचानां च सर्वशः ॥ २२ ॥
सवर्मभिर्भूषणैश्च प्रकीर्यद्भिरितस्ततः ।
सक्रोधामर्षजिह्मभ्रूकषायीकृतलोचनाः ॥ २३ ॥
सूतोपक्लृप्तान् रुचिरान् सदश्वैरुपकल्पितान् ।
रथानास्थाय ते वीराः सर्वप्रहरणान्विताः ॥ २४ ॥
प्रयान्तमथ कौरव्यमनुसस्रुरुदायुधाः ।
ततः समभवद् युद्धं तेषां तस्य च भारत ।

एकस्य च बहूनां च तुमुलं लोमहर्षणम् ॥ २५ ॥ जनमेजय! जल्दबाजीके कारण उन सबके आभूषण और कवच इधर-उधर गिर पड़ते थे। उस समय ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशमण्डलसे तारे टूट-टूटकर गिर रहे हों। कितने ही योद्धाओंके कवच और गहने इधर-उधर बिखर गये। क्रोध और अमर्षके कारण उनकी भौंहें टेढ़ी और आँखें लाल हो गयी थीं। सारथियोंने सुन्दर रथ सजाकर उनमें सुन्दर अश्व जोत दिये थे। उन रथोंपर बैठकर सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो हथियार उठाये हुए उन वीरोंने जाते हुए कुरुनन्दन भीष्मजीका पीछा किया। जनमेजय! तदनन्तर उन राजाओं और भीष्मजीका घोर संग्राम हुआ। भीष्मजी अकेले थे और राजालोग बहुत। उनमें रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयंकर संग्राम छिड़ गया ॥ २२—२५ ॥ ते त्विषून् साहस्त्रांस्तस्मिन् युगपदाक्षिपन् । अप्राप्तांश्चैव तानाशु भीष्मः सर्वांस्तथान्तरा ॥ २६ ॥ अच्छिन्दच्छरवर्षेण महता लोमवाहिना । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे सर्वतः परिवार्य तम् ॥ २७ ॥ ववृषुः शरवर्षेण वर्षेणेवाद्रिमम्बुदाः । स तं बाणमयं वर्षं शरैरावार्य सर्वतः ॥ २८ ॥ ततः सर्वान् महीपालान् पर्यविध्यत् त्रिभिस्त्रिभिः । एकैकस्तु ततो भीष्मं राजन् विव्याध पञ्चभिः ॥ २९ ॥ राजन्! उन नरेशोंने भीष्मजीपर एक ही साथ दस हजार बाण चलाये; परंतु भीष्मजीने उन सबको अपने ऊपर आनेसे पहले बीचमें ही विशाल पंखयुक्त बाणोंकी बौछार करके शीघ्रतापूर्वक काट गिराया। तब वे सब राजा उन्हें चारों ओरसे घेरकर उनके ऊपर उसी प्रकार बाणोंकी झड़ी लगाने लगे, जैसे बादल पर्वतपर पानीकी धारा बरसाते हैं। भीष्मजीने सब ओरसे उस बाण-वर्षाको रोककर उन सभी राजाओंको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया। तब उनमेंसे प्रत्येकने भीष्मजीको पाँच-पाँच बाण मारे ॥ २६—२९ ॥ स च तान् प्रतिविव्याध द्वाभ्यां द्वाभ्यां पराक्रमन् । तद् युद्धमासीत् तुमुलं घोरं देवासुरोपमम् ॥ ३० ॥ पश्यतां लोकवीराणां शरशक्तिसमाकुलम् । स धनूंषि ध्वजाग्राणि वर्माणि च शिरांसि च ॥ ३१ ॥ चिच्छेद समरे भीष्मः शतशोऽथ सहस्रशः । तस्याति पुरुषानन्याँल्लाघवं रथचारिणः ॥ ३२ ॥ रक्षणं चात्मनः संख्ये शत्रवोऽप्यभ्यपूजयन् । तान् विनिर्जित्य तु रणे सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ३३ ॥ कन्याभिः सहितः प्रायाद् भारत्तो भारतान प्रति । ततस्तं पृष्ठतो राजञ्छाल्वराजो महारथः ॥ ३४ ॥

अभ्यगच्छदमेयात्मा भीष्मं शान्तनवं रणे । वारणं जघने भिन्दन् दन्ताभ्यामपरो यथा ।। ३५ ।। वासितामनुसम्प्राप्तो यूथपो बलिनां वरः । स्त्रीकामस्तिष्ठ तिष्ठेति भीष्ममाह स पार्थिवः ।। ३६ ।। शाल्वराजो महाबाहुरमर्षेण प्रचोदितः । ततः सः पुरुषव्याघ्रो भीष्मः परबलार्दनः ।। ३७ ।। तद्वाक्याकुलितः क्रोधाद् विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् । विततेषुधनुष्पाणिर्विकुञ्चितललाटभृत् ।। ३८ ।। फिर भीष्मजीने भी अपना पराक्रम प्रकट करते हुए प्रत्येक योद्धाको दो-दो बाणोंसे बींध डाला। बाणों और शक्तियोंसे व्याप्त उनका वह तुमुल युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था। उस समरांगणमें भीष्मने लोकविख्यात वीरोंके देखते-देखते उनके धनुष, ध्वजाके अग्रभाग, कवच और मस्तक सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें काट गिराये। युद्धमें रथसे विचरनेवाले भीष्मजीकी दूसरे वीरोंसे बढ़कर हाथकी फुर्ती और आत्मरक्षा आदिकी शत्रुओंने भी सराहना की। सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भरतकुलभूषण भीष्मजीने उन सब योद्धाओंको जीतकर कन्याओंको साथ ले भरतवंशियोंकी राजधानी हस्तिनापुरको प्रस्थान किया। राजन्! तब महारथी शाल्वराजने पीछेसे आकर युद्धके लिये शान्तनुनन्दन भीष्मपर आक्रमण किया। शाल्वके शारीरिक बलकी कोई सीमा नहीं थी। जैसे हथिनीके पीछे लगे हुए एक गजराजके पृष्ठभागमें उसीका पीछा करनेवाला दूसरा यूथपति दाँतोंसे प्रहार करके उसे विदीर्ण करना चाहता है, उसी प्रकार बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु शाल्वराज स्त्रीको पानेकी इच्छासे ईर्ष्या और क्रोधके वशीभूत हो भीष्मका पीछा करते हुए उनसे बोला—‘अरे ओ! खड़ा रह, खड़ा रह।' तब शत्रुसेनाका संहार करनेवाले पुरुषसिंह भीष्म उसके वचनोंको सुनकर क्रोधसे व्याकुल हो धूमरहित अग्निके समान जलने लगे और हाथमें धनुष-बाण लेकर खड़े हो गये। उनके ललाटमें सिकुड़न आ गयी ।। ३०—३८ ।।

क्षत्रधर्मं समास्थाय व्यपेतभयसम्भ्रमः । निवर्तयामास रथं शाल्वं प्रति महारथः ।। ३९ ।। महारथी भीष्मने क्षत्रिय-धर्मका आश्रय ले भय और घबराहट छोड़कर शाल्वकी ओर अपना रथ लौटाया ।। ३९ ।।

निवर्तमानं तं दृष्ट्वा राजानः सर्व एव ते । प्रेक्षकाः समपद्यन्त भीष्मशाल्वसमागमे ।। ४० ।। उन्हें लौटते देख सब राजा भीष्म और शाल्वके युद्धमें कुछ भाग न लेकर केवल दर्शक बन गये ।। ४० ।।

तौ वृषाविव नर्दन्तौ बलिनौ वासितान्तरे । अन्योन्यमभ्यवर्तेतां बलविक्रमशालिनौ ।। ४१ ।।

ये दोनों बलवान् वीर मैथुनकी इच्छावाली गौके लिये आपसमें लड़नेवाले दो साँड़ोंकी तरह हुंकार करते हुए एक-दूसरेसे भिड़ गये। दोनों ही बल और पराक्रमसे सुशोभित थे ॥ ४१ ॥

ततो भीष्मं शान्तनवं शरैः शतसहस्रशः ।
शाल्वराजो नरश्रेष्ठः समवाकिरदाशुगैः ॥ ४२ ॥
तदनन्तर मनुष्योंमें श्रेष्ठ राजा शाल्व शान्तनुनन्दन भीष्मपर सैकड़ों और हजारों शीघ्रगामी बाणोंकी बौछार करने लगा ॥ ४२ ॥

पूर्वमभ्यर्दितं दृष्ट्वा भीष्मं शाल्वेन ते नृपाः ।
विस्मिताः समपद्यन्त साधु साध्विति चाब्रुवन् ॥ ४३ ॥
शाल्वने पहले ही भीष्मको पीड़ित कर दिया। यह देखकर सभी राजा आश्चर्यचकित हो गये और ‘वाह-वाह’ करने लगे ॥ ४३ ॥

लाघवं तस्य ते दृष्ट्वा समरे सर्वपार्थिवाः ।
अपूजयन्त संहृष्टा वाग्भिः शाल्वं नराधिपम् ॥ ४४ ॥
युद्धमें उसकी फुर्ती देख सब राजा बड़े प्रसन्न हुए और अपनी वाणीद्वारा शाल्वनरेशकी प्रशंसा करने लगे ॥ ४४ ॥

क्षत्रियाणां ततो वाचः श्रुत्वा परपुरंजयः ।
क्रुद्धः शान्तनवो भीष्मस्तिष्ठ तिष्ठेत्यभाषत ॥ ४५ ॥
शत्रुओंकी राजधानीको जीतनेवाले शान्तनुनन्दन भीष्मने क्षत्रियोंकी वे बातें सुनकर कुपित हो शाल्वसे कहा—‘खड़ा रह, खड़ा रह’ ॥ ४५ ॥

सारथिं चाब्रवीत् क्रुद्धो याहि यत्रैष पार्थिवः ।
यावदेनं निहन्म्यद्य भुजङ्गमिव पक्षिराट् ॥ ४६ ॥
फिर सारथिसे कहा—‘जहाँ यह राजा शाल्व है, उधर ही रथ ले चलो। जैसे पक्षिराज गरुड सर्पको दबोच लेते हैं, उसी प्रकार मैं इसे अभी मार डालता हूँ’ ॥ ४६ ॥

ततोऽस्त्रं वारुणं सम्यग् योजयामास कौरवः ।
तेनाश्वांश्चतुरोऽमृद्नाच्छाल्वराजस्य भूपते ॥ ४७ ॥
जनमेजय! तदनन्तर कुरुनन्दन भीष्मने धनुषपर उचित रीतिसे वारुणास्त्रका संधान किया और उसके द्वारा शाल्वराजके चारों घोड़ोंको रौंद डाला ॥ ४७ ॥

अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य शाल्वराजस्य कौरवः ।
भीष्मो नृपतिशार्दूल न्यवधीत् तस्य सारथिम् ॥ ४८ ॥
नृपश्रेष्ठ! फिर अपने अस्त्रोंसे राजा शाल्वके अस्त्रोंका निवारण करके कुरुवंशी भीष्मने उसके सारथिको भी मार डाला ॥ ४८ ॥

अस्त्रेण चास्याथैन्द्रेण न्यवधीत् तुरगोत्तमान् ।
कन्याहेतोर्नरश्रेष्ठ भीष्मः शान्तनवस्तदा ॥ ४९ ॥

जित्वा विसर्जयामास जीवन्तं नृपसत्तमम् ।
ततः शाल्वः स्वनगरं प्रययौ भरतर्षभ ॥ ५० ॥
स्वराज्यमन्वशाच्चैव धर्मेण नृपतिस्तदा ।
राजानो ये च तत्रासन् स्वयंवरदिदृक्षवः ॥ ५१ ॥
स्वान्येव तेऽपि राष्ट्राणि जग्मुः परपुरंजयाः ।
एवं विजित्य ताः कन्या भीष्मः प्रहरतां वरः ॥ ५२ ॥
प्रययौ हास्तिनपुरं यत्र राजा स कौरवः ।
विचित्रवीर्यो धर्मात्मा प्रशास्ति वसुधामिमाम् ॥ ५३ ॥
तत्पश्चात् ऐन्द्रास्त्रद्वारा उसके उत्तम अश्वोंको यमलोक पहुँचा दिया। नरश्रेष्ठ! उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने कन्याओंके लिये युद्ध करके शाल्वको जीत लिया और नृपश्रेष्ठ शाल्वका भी केवल प्राणमात्र छोड़ दिया। जनमेजय! उस समय शाल्व अपनी राजधानीको लौट गया और धर्मपूर्वक राज्यका पालन करने लगा। इसी प्रकार शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले जो-जो राजा वहाँ स्वयंवर देखनेकी इच्छासे आये थे, वे भी अपने-अपने देशको चले गये। प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म उन कन्याओंको जीतकर हस्तिनापुरको चल दिये; जहाँ रहकर धर्मात्मा कुरुवंशी राजा विचित्रवीर्य इस पृथ्वीका शासन करते थे ॥ ४९—५३ ॥

यथा पितास्य कौरव्यः शान्तनुर्नृपसत्तमः ।
सोऽचिरेणैव कालेन अत्यक्रामन्नराधिप ॥ ५४ ॥
वनानि सरितश्चैव शैलांश्च विविधान् द्रुमान् ।
अक्षतः क्षपयित्वारीन् संख्येऽसंख्येयविक्रमः ॥ ५५ ॥
उनके पिता कुरुश्रेष्ठ नृपशिरोमणि शान्तनु जिस प्रकार राज्य करते थे, वैसा ही वे भी करते थे। जनमेजय! भीष्मजी थोड़े ही समयमें वन, नदी, पर्वतोंको लाँघते और नाना प्रकारके वृक्षोंको लाँघते और पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ गये। युद्धमें उनका पराक्रम अवर्णनीय था। उन्होंने स्वयं अक्षत रहकर शत्रुओंको ही क्षति पहुँचायी थी ॥ ५४-५५ ॥

आनयामास काश्यस्य सुताः सागरगासुतः ।
स्नुषा इव स धर्मात्मा भगिनीरिव चानुजाः ॥ ५६ ॥
यथा दुहितरश्चैव परिगृह्य ययौ कुरून् ।
आनिन्ये स महाबाहुर्भ्रातुः प्रियचिकीर्षया ॥ ५७ ॥
धर्मात्मा गङ्गानन्दन भीष्म काशिराजकी कन्याओंको पुत्रवधू, छोटी बहिन एवं पुत्रीकी भाँति साथ रखकर कुरुदेशमें ले आये। वे महाबाहु अपने भाई विचित्रवीर्यका प्रिय करनेकी इच्छासे उन सबको लाये थे ॥ ५६-५७ ॥

ताः सर्वगुणसम्पन्ना भ्राता भ्रात्रे यवीयसे ।
भीष्मो विचित्रवीर्याय प्रददौ विक्रमाहृताः ॥ ५८ ॥