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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अभ्येत्य सहिताः सर्वे शोकादश्रूण्यवर्तयन् ।।
अस्तं गतमिवादित्यं सुशुष्कमिव सागरम् ।
दृष्ट्वा पाण्डुं नरव्याघ्रं शोचन्ति स्म महर्षयः ।।
समानशोका ऋषयः पाण्डवाश्च बभूविरे ।
ते समाश्वासिते विप्रैः विलेपतुरनिन्दिते ।।

इस प्रकार मृत्यु-शय्यापर पड़े हुए पाण्डुके पास चारणोंसहित सभी ऋषि-मुनि जुट आये और शोकवश आँसू बहाने लगे। अस्ताचलको पहुँचे हुए सूर्य तथा एकदम सूखे हुए समुद्रकी भाँति नरश्रेष्ठ पाण्डुको देखकर सभी महर्षि शोकमग्न हो गये। उस समय ऋषियोंको तथा पाण्डुपुत्रोंको समानरूपसे शोकका अनुभव हो रहा था। ब्राह्मणोंने पाण्डुकी दोनों सती-साध्वी रानियोंको समझा-बुझाकर बहुत आश्वासन दिया, तो भी उनका विलाप बंद नहीं हुआ।

कुन्त्युवाच

हा राजन् कस्य नौ हित्वा गच्छसि त्रिदशालयम् ।।
हा राजन् मम मन्दायाः कथं माद्रीं समेत्य वै ।
निधनं प्राप्तवान् राजन् मद्भाग्यपरिसंक्षयात् ।।
युधिष्ठिरं भीमसेनमर्जुनं च यमावुभौ ।
कस्य हित्वा प्रियान् पुत्रान् प्रयातोऽसि विशाम्पते ।।
नूनं त्वां त्रिदशा देवाः प्रतिनन्दन्ति भारत ।
यथा हि तप उग्रं ते चरितं विप्रसंसदि ।।
आवाभ्यां सहितो राजन् गमिष्यसि दिवं शुभम् ।
आजमीढाजमीढानां कर्मणा चरितां गतिम् ।।

**कुन्ती बोली—**हा! महाराज! आप हम दोनोंको किसे सौंपकर स्वर्गलोकमें जा रहे हैं। हाय! मैं कितनी भाग्यहीना हूँ। मेरे राजा! आप किसलिये अकेली माद्रीसे मिलकर सहसा कालके गालमें चले गये। मेरा भाग्य नष्ट हो जानेके कारण ही आज यह दिन देखना पड़ा है। प्रजानाथ! युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल-सहदेव—इन प्यारे पुत्रोंको किसके जिम्मे छोड़कर आप चले गये? भारत! निश्चय ही देवता आपका अभिनन्दन करते होंगे; क्योंकि आपने ब्राह्मणोंकी मण्डलीमें रहकर कठोर तपस्या की है। अजमीढकुलनन्दन! आपके पूर्वजोंने पुण्य-कर्मोंद्वारा जिस गतिको प्राप्त किया है, उसी शुभ स्वर्गीय गतिको आप हम दोनों पत्नियोंके साथ प्राप्त करेंगे।

वैशम्पायन उवाच

(विलपित्वा भृशं त्वेवं निःसंज्ञे पतिते भुवि ।
युधिष्ठिरमुखाः सर्वे पाण्डवा वेदपारगाः ।

तेऽप्यागत्य पितुर्मूले निःसंज्ञाः पतिता भुवि ॥
पाण्डोः पादौ परिष्वज्य विलपन्ति स्म पाण्डवाः ॥)
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार अत्यन्त विलाप करके कुन्ती और माद्री दोनों अचेत हो पृथ्वीपर गिर पड़ीं। युधिष्ठिर आदि सभी पाण्डव वेदविद्यामें पारंगत हो चुके थे, वे भी पिताके समीप आकर संज्ञाशून्य हो पृथ्वीपर गिर पड़े। सभी पाण्डव पाण्डुके चरणोंको हृदयसे लगाकर विलाप करने लगे।

कुन्त्युवाच

अहं ज्येष्ठा धर्मपत्नी ज्येष्ठं धर्मफलं मम ।
अवश्यम्भाविनो भावान्मा मां माद्रि निवर्तय ॥ २३ ॥
अन्विष्यामीह भर्तारमहं प्रेतवशं गतम् ।
उत्तिष्ठ त्वं विसृज्यैनमिमान् पालय दारकान् ॥ २४ ॥
अवाप्य पुत्राँल्लब्धात्मा वीरपत्नीत्वमर्थये ।
कुन्तीने कहा— माद्री! मैं इनकी ज्येष्ठ धर्मपत्नी हूँ, अतः धर्मके ज्येष्ठ फलपर भी मेरा ही अधिकार है। जो अवश्यम्भावी बात है, उससे मुझे मत रोको। मैं मृत्युके वशमें पड़े हुए अपने स्वामीका अनुगमन करूँगी। अब तुम इन्हें छोड़कर उठो और इन बच्चोंका पालन करो। पुत्रोंको पाकर मेरा लौकिक मनोरथ पूर्ण हो चुका है; अब मैं पतिके साथ दग्ध होकर वीरपत्नीका पद पाना चाहती हूँ ॥ २३-२४ ॥

माद्र्युवाच

अहमेवानुयास्यामि भर्तारमपलायिनम् ।
न हि तृप्तास्मि कामानां ज्येष्ठा मामनुमन्यताम् ॥ २५ ॥
माद्री बोली— रणभूमिसे कभी पीठ न दिखानेवाले अपने पतिदेवके साथ मैं ही जाऊँगी; क्योंकि उनके साथ होनेवाले कामभोगसे मैं तृप्त नहीं हो सकी हूँ। आप बड़ी बहिन हैं, इसलिये मुझे आपको आज्ञा प्रदान करनी चाहिये ॥ २५ ॥

मां चाभिगम्य क्षीणोऽयं कामाद् भरतसत्तमः ।
तमुच्छिन्द्यामस्य कामं कथं नु यमसादने ॥ २६ ॥
ये भरतश्रेष्ठ मेरे प्रति आसक्त हो मुझसे समागम करके मृत्युको प्राप्त हुए हैं; अतः मुझे किसी प्रकार परलोकमें पहुँचकर उनकी उस कामवासनाकी निवृत्ति करनी चाहिये ॥ २६ ॥

न चाप्यहं वर्तयन्ती निर्विशेषं सुनेषु ते ।
वृत्तिमार्थे चरिष्यामि स्पृशेदेनस्तथा च माम् ॥ २७ ॥
आर्ये! मैं आपके पुत्रोंके साथ अपने सगे पुत्रोंकी भाँति बर्ताव नहीं कर सकूँगी। उस दशामें मुझे पाप लगेगा ॥ २७ ॥

तस्मान्मे सुतयोः कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रवत् । मां च कामयमानोऽयं राजा प्रेतवशं गतः ॥ २८ ॥ अतः आप ही जीवित रहकर मेरे पुत्रोंका भी अपने पुत्रोंके समान ही पालन कीजियेगा। इसके सिवा ये महाराज मेरी ही कामना रखकर मृत्युके अधीन हुए हैं ॥ २८ ॥

वैशम्पायन उवाच

(ऋषयस्तान् समाश्वास्य पाण्डवान् सत्यविक्रमान् । ऊचुः कुन्तीं च माद्रीं च समाश्वास्य तपस्विनः ॥ सुभगे बालपुत्रे तु न मर्तव्यं कथंचन । पाण्डवांश्चापि नेष्यामः कुरुराष्ट्रं परंतपान् ॥ अधर्मैश्वर्यजातेषु धृतराष्ट्रश्च लोभवान् । स कदाचिन्न वर्तेत पाण्डवेषु यथाविधि ॥ कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च । माद्र्याश्च बलिनां श्रेष्ठः शल्यो भ्राता महारथः ॥ भर्त्रा तु मरणं सार्धं फलवन्नात्र संशयः । युवाभ्यां दुष्करं चैतद् वदन्ति द्विजपुङ्गवाः ॥ मृते भर्तरि या साध्वी ब्रह्मचर्यव्रते स्थिता । यमैश्च नियमैः श्रान्ता मनोवाक्कायजैः शुभैः ॥ व्रतोपवासनियमैः कृच्छ्रैश्चान्द्रायणादिभिः । भूशय्यां क्षारलवणवर्जनं चैकभोजनम् ॥ येन केनापि विधिना देहशोषणतत्परा । देहपोषणसंयुक्ता विषयैर्हृतचेतना ॥ देहव्ययेन नरकं महदाप्नोत्यसंशयः । तस्मात्संशोषयेद् देहं विषया नाशमाप्नुयुः ॥ भर्तारं चिन्तयन्ती सा भर्तारं निस्तरेच्छुभा । तारितश्चापि भर्ता स्यादात्मा पुत्रस्तथैव च ॥ तस्माज्जीवितमेवैतद् युवयोर्विद्व शोभनम् ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—तदनन्तर तपस्वी ऋषियोंने सत्यपराक्रमी पाण्डवोंको धीरज बँधाकर कुन्ती और माद्रीको भी आश्वासन देते हुए कहा—'सुभगे! तुम दोनोंके पुत्र अभी बालक हैं, अतः तुम्हें किसी प्रकार देह-त्याग नहीं करना चाहिये। हमलोग शत्रुदमन पाण्डवोंको कौरव राष्ट्रकी राजधानीमें पहुँचा देंगे। राजा धृतराष्ट्र अधर्ममय धनके लिये लोभ रखता है, अतः वह कभी पाण्डवोंके साथ यथायोग्य बर्ताव नहीं कर सकता। कुन्तीके रक्षक एवं सहायक वृष्णिवंशी और राजा कुन्तिभोज हैं तथा माद्रीके बलवानोंमें श्रेष्ठ

महारथी शल्य उसके भाई हैं। इसमें संदेह नहीं कि पतिके साथ मृत्यु स्वीकार करना पत्नीके लिये महान् फलदायक होता है; तथापि तुम दोनोंके लिये यह कार्य अत्यन्त कठोर है, यह बात सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण कहते हैं। जो स्त्री साध्वी होती है, वह अपने पतिकी मृत्यु हो जानेके बाद ब्रह्मचर्यके पालनमें अविचलभावसे लगी रहती है, यम और नियमोंके पालनका क्लेश सहन करती है और मन, वाणी एवं शरीरद्वारा किये जानेवाले शुभ कर्मों तथा कृच्छ्रचान्द्रायणादि व्रत, उपवास और नियमोंका अनुष्ठान करती है। वह क्षार (पापड़ आदि) और लवणका त्याग करके एक बार ही भोजन करती और भूमिपर शयन करती है। वह जिस किसी प्रकारसे अपने शरीरको सुखानेके प्रयत्नमें लगी रहती है। किंतु विषयोंके द्वारा नष्ट हुई बुद्धिवाली जो नारी देहको पुष्ट करनेमें ही लगी रहती है, वह तो इस (दुर्लभ मनुष्य-) शरीरको व्यर्थ ही नष्ट करके निःसंदेह महान् नरकको प्राप्त होती है। अतः साध्वी स्त्रीको उचित है कि वह अपने शरीरको सुखाये, जिससे सम्पूर्ण विषय-कामनाएँ नष्ट हो जायँ। इस प्रकार उपर्युक्त धर्मका पालन करनेवाली जो शुभलक्षणा नारी अपने पतिदेवका चिन्तन करती रहती है, वह अपने पतिका भी उद्धार कर देती है। इस तरह वह स्वयं अपनेको, अपने पतिको एवं पुत्रको भी संसारसे तार देती है। अतः हमलोग तो यही अच्छा मानते हैं कि तुम दोनों जीवन धारण करो'।

कुन्त्युवाच

यथा पाण्डोश्च निर्देशस्तथा विप्रगणस्य च ।
आज्ञा शिरसि निक्षिप्ता करिष्यामि च तत् तथा ॥
यथाऽऽहुर्भगवन्तो हि तन्मन्ये शोभनं परम् ।
भर्तुश्च मम पुत्राणां मम चैव न संशयः ॥

**कुन्ती बोली—**महात्माओ! हमारे लिये महाराज पाण्डुकी आज्ञा जैसे शिरोधार्य है, उसी प्रकार आप सब ब्राह्मणोंकी भी है। आपका आदेश मैं सिर-माथे रखती हूँ। आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करूँगी। पूज्यपाद विप्रगण जैसा कहते हैं, उसीको मैं अपने पति, पुत्रों तथा अपने-आपके लिये भी परम कल्याणकारी समझती हूँ—इसमें तनिक भी संशय नहीं है।

माद्र्युवाच

कुन्ती समर्था पुत्राणां योगक्षेमस्य धारणे ।
अस्या हि न समा बुद्ध्या यद्यपि स्यादरुन्धती ॥
कुन्त्याश्च वृष्णयो नाथाः कुन्तिभोजस्तथैव च ।
नाहं त्वमिव पुत्राणां समर्था धारणे तथा ॥
साहं भर्तारमन्वेष्ये अतृप्ता नन्वहं तथा ।
भर्तृलोकस्य तु ज्येष्ठा देवी मामनुमन्यताम् ॥
धर्मज्ञस्य कृतज्ञस्य सत्यधर्मस्य धीमतः ।

पादौ परिचरिष्यामि तदार्ये ह्यनुमन्यताम् ॥

माद्रीने कहा— कुन्तीदेवी सभी पुत्रोंके योग-क्षेमके निर्वाहमें—पालन-पोषणमें समर्थ हैं। कोई भी स्त्री, चाहे वह अरुन्धती ही क्यों न हो, बुद्धिमें इनकी समानता नहीं कर सकती। वृष्णिवंशके लोग तथा महाराज कुन्तिभोज भी कुन्तीके रक्षक एवं सहायक हैं। बहिन! पुत्रोंके पालन-पोषणकी शक्ति जैसी आपमें है, वैसी मुझमें नहीं है। अतः मैं पतिका ही अनुगमन करना चाहती हूँ। पतिके संयोग-सुखसे मेरी तृप्ति भी नहीं हुई है। अतः आप बड़ी महारानीसे मेरी प्रार्थना है कि मुझे पतिलोकमें जानेकी आज्ञा दें। मैं वहीं धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ और बुद्धिमान् पतिके चरणोंकी सेवा करूँगी। आर्ये! आप मेरी इस इच्छाका अनुमोदन करें।

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा महाराज मद्रराजसुता शुभा ।
ददौ कुन्त्यै यमौ माद्री शिरसाभिप्रणम्य च ॥
अभिवाद्य ऋषीन् सर्वान् परिष्वज्य च पाण्डवान् ।
मूर्ध्न्युपाघ्राय बहुशः पार्थानात्मसुतौ तथा ॥
हस्ते युधिष्ठिरं गृह्य माद्री वाक्यमभाषत ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— महाराज! यों कहकर मद्रदेशकी राजकुमारी सती-साध्वी माद्रीने कुन्तीको प्रणाम करके अपने दोनों जुड़वें पुत्र उन्हींको सौंप दिये। तत्पश्चात् उसने महर्षियोंको मस्तक नवाकर पाण्डवोंको हृदयसे लगा लिया और बारंबार कुन्तीके तथा अपने पुत्रोंके मस्तक सूँघकर युधिष्ठिरका हाथ पकड़कर कहा।

माद्र्युवाच

कुन्ती माता अहं धात्री युष्माकं तु पिता मृतः ।
युधिष्ठिरः पिता ज्येष्ठश्चतुर्णां धर्मतः सदा ॥
वृद्धानुशासने सक्ताः सत्यधर्मपरायणाः ।
तादृशा न विनश्यन्ति नैव यान्ति पराभवम् ॥
तस्मात् सर्वे कुरुध्वं वै गुरुवृत्तिमतन्द्रिताः ॥

माद्री बोली— बच्चो! कुन्तीदेवी ही तुम सबोंकी असली माता हैं, मैं तो केवल दूध पिलानेवाली धाय थी। तुम्हारे पिता तो मर गये। अब बड़े भैया युधिष्ठिर ही धर्मतः तुम चारों भाइयोंके पिता हैं। तुम सब बड़े-बूढ़ों—गुरुजनोंकी सेवामें संलग्न रहना और सत्य एवं धर्मके पालनसे कभी मुँह न मोड़ना। ऐसा करनेवाले लोग कभी नष्ट नहीं होते और न कभी उनकी पराजय ही होती है। अतः तुम सब भाई आलस्य छोड़कर गुरुजनोंकी सेवामें तत्पर रहना।

वैशम्पायन उवाच

ऋषीणां च पृथायाश्च नमस्कृत्य पुनः पुनः । आयासकृपणा माद्री प्रत्युवाच पृथां तथा ॥ धन्या त्वमसि वार्ष्णेयि नास्ति स्त्री सदृशी त्वया । वीर्यं तेजश्च योगं च माहात्म्यं च यशस्विनाम् ॥ कुन्ति द्रक्ष्यसि पुत्राणां पञ्चानाममितौजसाम् । ऋषीणां संनिधावेषां मया वागभ्युदीरिता ॥ स्वर्गं दिदृक्षमाणाया ममैषा न वृथा भवेत् । आर्या चाप्यभिवाद्या च मम पूज्या च सर्वतः ॥ ज्येष्ठा वरिष्ठा त्वं देवि भूषिता स्वगुणैः शुभैः । अभ्यनुज्ञातुमिच्छामि त्वया यादवनन्दिनि ॥ धर्मं स्वर्गं च कीर्तिं च त्वत्कृतेऽहमवाप्नुयाम् । यथा तथा विधत्स्वेह मा च कार्षीर्विचारणाम् ॥ वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! तत्पश्चात् माद्रीने ऋषियों तथा कुन्तीको बारंबार नमस्कार करके, क्लेशसे क्लान्त होकर कुन्तीदेवीसे दीनतापूर्वक कहा—'वृष्णिकुलनन्दिनि! आप धन्य हैं। आपकी समानता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है; क्योंकि आपको इन अमिततेजस्वी तथा यशस्वी पाँचों पुत्रोंके बल, पराक्रम, तेज, योगबल तथा माहात्म्य देखनेका सौभाग्य प्राप्त होगा। मैंने स्वर्गलोकमें जानेकी इच्छा रखकर इन महर्षियोंके समीप जो यह बात कही है, वह कदापि मिथ्या न हो। देवि! आप मेरी गुरु, वन्दनीया तथा पूजनीया हैं; अवस्थामें बड़ी तथा गुणोंमें भी श्रेष्ठ हैं। समस्त नैसर्गिक सद्गुण आपकी शोभा बढ़ाते हैं। यादवनन्दिनि! अब मैं आपकी आज्ञा चाहती हूँ। आपके प्रयत्नद्वारा जैसे भी मुझे धर्म, स्वर्ग तथा कीर्तिकी प्राप्ति हो, वैसा सहयोग आप इस अवसरपर करें। मनमें किसी दूसरे विचारको स्थान न दें'। बाष्पसंदिग्धया वाचा कुन्त्युवाच यशस्विनी ॥ अनुज्ञातासि कल्याणि त्रिदिवे संगमोऽस्तु ते । भर्त्रा सह विशालाक्षि क्षिप्रमद्यैव भामिनि ॥ संगता स्वर्गलोके त्वं रमेथाः शाश्वतीः समाः ॥) राज्ञः शरीरेण सह ममापीदं कलेवरम् । दग्धव्यं सुप्रतिच्छन्नमेतदार्ये प्रियं कुरु ॥ २९ ॥ तब यशस्विनी कुन्तीने बाष्पगद्गद वाणीमें कहा—'कल्याणि! मैंने तुम्हें आज्ञा दे दी। विशाललोचने! तुम्हें आज ही स्वर्गलोकमें पतिका समागम प्राप्त हो। भामिनि! तुम स्वर्गमें पतिसे मिलकर अनन्त वर्षोंतक प्रसन्न रहो।' माद्री बोली—'मेरे इस शरीरको महाराजके शरीरके साथ ही अच्छी प्रकार ढँककर दग्ध कर देना चाहिये। बड़ी बहिन! आप मेरा यह प्रिय कार्य कर दें ॥ २९ ॥

दारकेष्वप्रमत्ता च भवेथाश्च हिता मम । अतोऽन्यन्न प्रपश्यामि संदेष्टव्यं हि किंचन ॥ ३० ॥ 'मेरे पुत्रोंका हित चाहती हुई सावधान रहकर उनका पालन-पोषण करें। इसके सिवा दूसरी कोई बात मुझे आपसे कहनेयोग्य नहीं जान पड़ती' ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा तं चिताग्निस्थं धर्मपत्नी नरर्षभम् । मद्रराजसुता तूर्णमन्वारोहद् यशस्विनी ॥ ३१ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! कुन्तीसे यह कहकर पाण्डुकी यशस्विनी धर्मपत्नी माद्री चिताकी आगपर रखे हुए नरश्रेष्ठ पाण्डुके शवके साथ स्वयं भी चितापर जा बैठी ॥ ३१ ॥

(ततः पुरोहितः स्नात्वा प्रेतकर्मणि पारगः । हिरण्यशकलान्याज्यं तिलान् दधि च तण्डुलान् ॥ उदकुम्भं सपरशुं समानीय तपस्विभिः । अश्वमेधाग्निमाहृत्य यथान्यायं समन्ततः ॥ काश्यपः कारयामास पाण्डोः प्रेतस्य तां क्रियाम् ॥ तदनन्तर प्रेतकर्मके पारंगत विद्वान् पुरोहित काश्यपने स्नान करके सुवर्णखण्ड, घृत, तिल, दही, चावल, जलसे भरा घड़ा और फरसा आदि वस्तुओंको एकत्र करके तपस्वी मुनियोंद्वारा अश्वमेधकी अग्नि मँगवायी और उसे चारों ओरसे चितासे छुलाकर यथायोग्य शास्त्रीय विधिसे पाण्डुका दाह-संस्कार करवाया।

अहताम्बरसंवीतो भ्रातृभिः सहितोऽनघः । उदकं कृतवांस्तत्र पुरोहितमते स्थितः ॥ अर्हतस्तस्य कृत्यानि शतशृङ्गनिवासिनः । तापसा विधिवच्चक्रुश्चारणा ऋषिभिः सह ॥) भाइयोंसहित निष्पाप युधिष्ठिरने नूतन वस्त्र धारण करके पुरोहितकी आज्ञाके अनुसार जलांजलि देनेका कार्य पूरा किया। शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनियों और चारणोंने आदरणीय राजा पाण्डुके परलोक-सम्बन्धी सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न किये।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डूपरमे चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुके परलोकगमनविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२४ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५० १/२ श्लोक मिलाकर कुल ८१ १/२ श्लोक हैं)

१२५-

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

ऋषियोंका कुन्ती और पाण्डवोंको लेकर हस्तिनापुर जाना और उन्हें भीष्म आदिके हाथों सौंपना

वैशम्पायन उवाच

पाण्डोरुपरमं दृष्ट्वा देवकल्पा महर्षयः।
ततो मन्त्रविदः सर्वे मन्त्रयांचक्रिरे मिथः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा पाण्डुकी मृत्यु हुई देख वहाँ रहनेवाले, देवताओंके समान तेजस्वी सम्पूर्ण मन्त्रज्ञ महर्षियोंने आपसमें सलाह की ॥ १ ॥

तापसा ऊचुः

हित्वा राज्यं च राष्ट्रं च स महात्मा महायशाः।
अस्मिन् स्थाने तपस्तप्त्वा तापसाञ्छरणं गतः ॥ २ ॥
**तपस्वी बोले—**महान् यशस्वी महात्मा राजा पाण्डु अपना राज्य तथा राष्ट्र छोड़कर इस स्थानपर तपस्या करते हुए तपस्वी मुनियोंकी शरणमें रहते थे ॥ २ ॥

स जातमात्रान् पुत्रांश्च दारांश्च भवतामिह।
प्रदायोपनिधिं राजा पाण्डुः स्वर्गमितो गतः ॥ ३ ॥
वे राजा पाण्डु अपनी पत्नी और नवजात पुत्रोंको आपलोगोंके पास धरोहर रखकर यहाँसे स्वर्गलोक चले गये ॥ ३ ॥

तस्येमानात्मजान् देहं भार्यां च सुमहात्मनः।
स्वराष्ट्रं गृह्य गच्छामो धर्म एष हि नः स्मृतः ॥ ४ ॥
उनके इन पुत्रोंको, पाण्डु और माद्रीके शरीरोंकी अस्थियोंको तथा उन महात्मा नरेशकी महारानी कुन्तीको लेकर हमलोग उनकी राजधानीमें चलें। इस समय हमारे लिये यही धर्म प्रतीत होता है ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

ते परस्परमामन्त्र्य देवकल्पा महर्षयः।
पाण्डोः पुत्रान् पुरस्कृत्य नगरं नागसाह्वयम् ॥ ५ ॥
उदारमनसः सिद्धा गमने चक्रिरे मनः।
भीष्माय पाण्डवान् दातुं धृतराष्ट्राय चैव हि ॥ ६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार परस्पर सलाह करके उन देवतुल्य उदारचेता सिद्ध महर्षियोंने पाण्डवोंको भीष्म एवं धृतराष्ट्रके हाथों सौंप देनेके लिये पाण्डुपुत्रोंको आगे करके हस्तिनापुर नगरमें जानेका विचार किया ॥ ५-६ ॥

तस्मिन्नेव क्षणे सर्वे तानादाय प्रतस्थिरे । पाण्डोर्दारांश्च पुत्रांश्च शरीरे ते च तापसाः ॥ ७ ॥ उन सब तपस्वी मुनियोंने पाण्डुपत्नी कुन्ती, पाँचों पाण्डवों तथा पाण्डु और माद्रीके शरीरकी अस्थियोंको साथ लेकर उसी क्षण वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ ७ ॥

सुखिनी सा पुरा भूत्वा सततं पुत्रवत्सला । प्रपन्ना दीर्घमध्वानं संक्षिप्तं तदमन्यत ॥ ८ ॥ पुत्रोंपर सदा स्नेह रखनेवाली कुन्ती पहले बहुत सुख भोग चुकी थी, परंतु अब विपत्तिमें पड़कर बहुत लंबे मार्गपर चल पड़ी; तो भी उसने स्वदेश जानेकी उत्कण्ठा अथवा महर्षियोंके योगजनित प्रभावसे उस मार्गको अल्प ही माना ॥ ८ ॥

सा त्वदीर्घेण कालेन सम्प्राप्ता कुरुजाङ्गलम् । वर्धमानपुरद्वारमाससाद यशस्विनी ॥ ९ ॥ यशस्विनी कुन्ती थोड़े ही समयमें कुरुजांगल देशमें जा पहुँची और नगरके वर्धमान नामक द्वारपर गयी ॥ ९ ॥

द्वारिणं तापसा ऊचु राजानं च प्रकाशय । ते तु गत्वा क्षणेनैव सभायां विनिवेदिताः ॥ १० ॥ तब तपस्वी मुनियोंने द्वारपालसे कहा—'राजाको हमारे आनेकी सूचना दो!' द्वारपालने सभामें जाकर क्षणभरमें समाचार दे दिया ॥ १० ॥

तं चारणसहस्राणां मुनीनामागमं तदा । श्रुत्वा नागपुरे नॄणां विस्मयः समजायत ॥ ११ ॥ सहस्रों चारणोंसहित मुनियोंका हस्तिनापुरमें आगमन सुनकर उस समय वहाँके लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ११ ॥

मुहूर्तोदित आदित्ये सर्वे बालपुरस्कृताः । सदारास्तापसान् द्रष्टुं निर्ययुः पुरवासिनः ॥ १२ ॥ दो घड़ी दिन चढ़ते-चढ़ते समस्त पुरवासी स्त्रियों और बालकोंको साथ लिये तपस्वी मुनियोंका दर्शन करनेके लिये नगरसे बाहर निकल आये ॥ १२ ॥

स्त्रीसङ्घाः क्षत्रसङ्घाश्च यानसङ्घसमाश्रिताः । ब्राह्मणैः सह निर्जग्मुर्ब्राह्मणानां च योषितः ॥ १३ ॥ झुंड-की-झुंड स्त्रियाँ और क्षत्रियोंके समुदाय अनेक सवारियोंपर बैठकर बाहर निकले। ब्राह्मणोंके साथ उनकी स्त्रियाँ भी नगरसे बाहर निकलीं ॥ १३ ॥

तथा विट्शूद्रसङ्घानां महान् व्यतिकरोऽभवत् । न कश्चिदकरोदीर्ष्यामभवन् धर्मबुद्धयः ॥ १४ ॥ शूद्रों और वैश्योंके समुदायका बहुत बड़ा मेला जुट गया। किसीके मनमें ईर्ष्याका भाव नहीं था। सबकी बुद्धि धर्ममें लगी हुई थी ॥ १४ ॥

तथा भीष्मः शान्तनवः सोमदत्तोऽथ बाह्लिकः । प्रज्ञाचक्षुश्च राजर्षिः क्षत्ता च विदुरः स्वयम् ॥ १५ ॥ इसी प्रकार शन्तनुन्दन भीष्म, सोमदत्त, बाह्लिक, प्रज्ञाचक्षु राजर्षि धृतराष्ट्र, संजय तथा स्वयं विदुरजी भी वहाँ आ गये ॥ १५ ॥ सा च सत्यवती देवी कौसल्या च यशस्विनी । राजदारैः परिवृता गान्धारी चापि निर्ययौ ॥ १६ ॥ देवी सत्यवती, काशिराजकुमारी यशस्विनी कौसल्या तथा राजघरानेकी स्त्रियोंसे घिरी हुई गान्धारी भी अन्तःपुरसे निकलकर वहाँ आयीं ॥ १६ ॥ धृतराष्ट्रस्य दायादा दुर्योधनपुरोगमाः । भूषिता भूषणैश्चित्रैः शतसंख्या विनिर्ययुः ॥ १७ ॥ धृतराष्ट्रके दुर्योधन आदि सौ पुत्र विचित्र आभूषणोंसे विभूषित हो नगरसे बाहर निकले ॥ १७ ॥ तान् महर्षिगणान् दृष्ट्वा शिरोभिरभिवाद्य च । उपोपविविशुः सर्वे कौरव्याः सपुरोहिताः ॥ १८ ॥ उन महर्षियोंका दर्शन करके सबने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। फिर सभी कौरव पुरोहितके साथ उनके समीप बैठ गये ॥ १८ ॥ तथैव शिरसा भूमावभिवाद्य प्रणम्य च । उपोपविविशुः सर्वे पौरा जानपदा अपि ॥ १९ ॥ इसी प्रकार नगर तथा जनपदके सब लोग भी धरतीपर माथा टेककर सबको अभिवादन और प्रणाम करके आसपास बैठ गये ॥ १९ ॥ तमकूजमभिज्ञाय जनौघं सर्वशस्तदा । पूजयित्वा यथान्यायं पाद्येनार्घ्येण च प्रभो ॥ २० ॥ भीष्मो राज्यं च राष्ट्रं च महर्षिभ्यो न्यवेदयत् । तेषामथो वृद्धतमः प्रत्युत्थाय जटाजिनी । ऋषीणां मतमाज्ञाय महर्षिरिदमब्रवीत् ॥ २१ ॥ राजन्! उस समय वहाँ आये हुए समस्त जनसमुदायको चुपचाप बैठे देख भीष्मजीने पाद्य-अर्घ्य आदिके द्वारा सब महर्षियोंकी यथोचित पूजा करके उन्हें अपने राज्य तथा राष्ट्रका कुशल-समाचार निवेदन किया। तब उन महर्षियोंमें जो सबसे अधिक वृद्ध थे, वे जटा और मृगचर्म धारण करनेवाले मुनि अन्य सब ऋषियोंकी अनुमति लेकर इस प्रकार बोले— ॥ २०-२१ ॥ यः स कौरव्य दायादः पाण्डुर्नाम नराधिपः । कामभोगान् परित्यज्य शतशृङ्गमतो गतः ॥ २२ ॥ (स यथोक्तं तपस्तेपे तत्र मूलफलाशनः ॥

पत्नीभ्यां सह धर्मात्मा कंचित् कालमतन्द्रितः ।
तेन वृत्तसमाचारैस्तपसा च तपस्विनः ।
तोषितास्तापसास्तत्र शतशृङ्गनिवासिनः ॥)
ब्रह्मचर्यव्रतस्थस्य तस्य दिव्येन हेतुना ।
साक्षाद् धर्मादयं पुत्रस्तत्र जातो युधिष्ठिरः ॥ २३ ॥
‘कुरुनन्दन भीष्मजी! वे जो आपके पुत्र महाराज पाण्डु विषयभोगोंका परित्याग करके यहाँसे शतशृंग पर्वतपर चले गये थे, उन धर्मात्माने वहाँ फल-मूल खाकर रहते हुए सावधान रहकर अपनी दोनों पत्नियोंके साथ कुछ कालतक शास्त्रोक्त विधिसे भारी तपस्या की। उन्होंने अपने उत्तम आचार-व्यवहार और तपस्यासे शतशृंगनिवासी तपस्वी मुनियोंको संतुष्ट कर लिया था। वहाँ नित्य ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए महाराज पाण्डुको किसी दिव्य हेतुसे साक्षात् धर्मराजद्वारा यह पुत्र प्राप्त हुआ है, जिसका नाम युधिष्ठिर है ॥ २२-२३ ॥

तथैनं बलिनां श्रेष्ठं तस्य राज्ञो महात्मनः ।
मातरिश्वा ददौ पुत्रं भीमं नाम महाबलम् ॥ २४ ॥
‘उसी प्रकार उन महात्मा राजाको साक्षात् वायु देवताने यह महाबली भीम नामक पुत्र प्रदान किया है, जो समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ है ॥ २४ ॥

पुरुहूतादयं जज्ञे कुन्त्यामेव धनंजयः ।
यस्य कीर्तिर्महेष्वासान् सर्वानभिभविष्यति ॥ २५ ॥
‘यह तीसरा पुत्र धनंजय है, जो इन्द्रके अंशसे कुन्तीके ही गर्भसे उत्पन्न हुआ है। इसकी कीर्ति समस्त बड़े-बड़े धनुर्धरोंको तिरस्कृत कर देगी ॥ २५ ॥

यौ तु माद्री महेष्वासावसूत पुरुषोत्तमौ ।
अश्विभ्यां पुरुषव्याघ्राविमौ तावपि पश्यत ॥ २६ ॥
‘माद्रीदेवीने अश्विनीकुमारोंसे जिन दो पुरुषरत्नोंको उत्पन्न किया है, वे ये ही दोनों महाधनुर्धर नरश्रेष्ठ हैं। इन्हें भी आपलोग देखें ॥ २६ ॥

(नकुलः सहदेवश्च तावप्यमिततेजसौ ।
पाण्डवौ नरशार्दूलाविमावप्यपराजितौ ॥)
चरता धर्मनित्येन वनवासं यशस्विना ।
नष्टः पैतामहो वंशः पाण्डुना पुनरुद्धृतः ॥ २७ ॥
‘इनके नाम हैं नकुल और सहदेव। ये दोनों भी अनन्त तेजसे सम्पन्न हैं। ये नरश्रेष्ठ पाण्डुकुमार भी किसीसे परास्त होनेवाले नहीं हैं। नित्य धर्ममें तत्पर रहनेवाले यशस्वी राजा पाण्डुने वनमें निवास करते हुए अपने पितामहके उच्छिन्न वंशका पुनः उद्धार किया है ॥ २७ ॥

पुत्राणां जन्मवृद्धिं च वैदिकाध्ययनानि च ।

पश्यन्तः सततं पाण्डोः परां प्रीतिमवाप्स्यथ ॥ २८ ॥
'पाण्डुपुत्रोंके जन्म, उनकी वृद्धि तथा वेदाध्ययन आदि देखकर आपलोग सदा अत्यन्त प्रसन्न होंगे ॥ २८ ॥
वर्तमानः सतां वृत्ते पुत्रलाभमवाप्य च ।
पितृलोकं गतः पाण्डुरितः सप्तदशेऽहनि ॥ २९ ॥
'साधु पुरुषोंके आचार-व्यवहारका पालन करते हुए राजा पाण्डु उत्तम पुत्रोंकी उपलब्धि करके आजसे सत्रह दिन पहले पितृलोकवासी हो गये ॥ २९ ॥
तं चितागतमाज्ञाय वैश्वानरमुखे हुतम् ।
प्रविष्टा पावकं माद्री हित्वा जीवितमात्मनः ॥ ३० ॥
'जब वे चितापर सुलाये गये और उन्हें अग्निके मुखमें होम दिया गया, उस समय देवी माद्री अपने जीवनका मोह छोड़कर उसी अग्निमें प्रविष्ट हो गयी ॥ ३० ॥
सा गता सह तेनैव पतिलोकमनुव्रता ।
तस्यास्तस्य च यत् कार्यं क्रियतां तदनन्तरम् ॥ ३१ ॥
'वह पतिव्रता देवी महाराज पाण्डुके साथ ही पतिलोकको चली गयी। अब आपलोग माद्री और पाण्डुके लिये जो कार्य आवश्यक समझें, वह करें ॥ ३१ ॥
(पृथां च शरणं प्राप्तां पाण्डवांश्च यशस्विनः ।
यथावदनुगृह्णन्तु धर्मो ह्येष सनातनः ॥)
इमे तयोः शरीरे द्वे पुत्राश्चेमे तयोर्वराः ।
क्रियाभिरनुगृह्यन्तां सह मात्रा परंतपाः ॥ ३२ ॥
'शरणमें आयी हुई कुन्ती तथा यशस्वी पाण्डवोंको आपलोग यथोचित रूपसे अपनाकर अनुगृहीत करें; क्योंकि यही सनातन धर्म है। ये पाण्डु और माद्री दोनोंके शरीरोंकी अस्थियाँ हैं और ये ही उनके श्रेष्ठ पुत्र हैं, जो शत्रुओंको संतप्त करनेकी शक्ति रखते हैं। आप माद्री और पाण्डुकी श्राद्ध-क्रिया करनेके साथ ही मातासहित इन पुत्रोंको भी अनुगृहीत करें ॥ ३२ ॥
प्रेतकार्ये निवृत्ते तु पितृमेधं महायशाः ।
लभतां सर्वधर्मज्ञः पाण्डुः कुरुकुलोद्वहः ॥ ३३ ॥
'सपिण्डीकरणपर्यन्त प्रेतकार्य निवृत्त हो जानेपर कुरुवंशके श्रेष्ठ पुरुष महायशस्वी एवं सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता पाण्डुको पितृमेध (यज्ञ)-का भी लाभ मिलना चाहिये' ॥ ३३ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा कुरून् सर्वान् कुरूणामेव पश्यताम् ।
क्षणेनान्तर्हिताः सर्वे तापसा गुह्यकैः सह ॥ ३४ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! समस्त कौरवोंसे ऐसी बात कहकर उनके देखते-देखते वे सभी तपस्वी मुनि गुह्यकोंके साथ क्षणभरमें वहाँसे अन्तर्धान हो गये ॥ ३४ ॥
गन्धर्वनगराकारं तथैवान्तर्हितं पुनः ।
ऋषिसिद्धगणं दृष्ट्वा विस्मयं ते परं ययुः ॥ ३५ ॥
(कौरवाः सहसोत्पत्य साधु साध्विति विस्मिताः ॥)
गन्धर्वनगरके समान उन महर्षियों और सिद्धोंके समुदायको इस प्रकार अन्तर्धान होते देख वे सभी कौरव सहसा उछलकर 'साधु-साधु' ऐसा कहते हुए बड़े विस्मित हुए ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि ऋषिसंवादे
पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें ऋषिसंवादविषयक एक सौ पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३९ १/३ श्लोक हैं)

१२६-

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षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डु और माद्रीकी अस्थियोंका दाह-संस्कार तथा भाई-बन्धुओंद्वारा उनके लिये जलांजलिदान

धृतराष्ट्र उवाच

पाण्डोर्विदुर सर्वाणि प्रेतकार्याणि कारय ।
राजवद् राजसिंहस्य माद्र्याश्चैव विशेषतः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले— विदुर! राजाओंमें श्रेष्ठ पाण्डुके तथा विशेषतः माद्रीके भी समस्त प्रेतकार्य राजोचित ढंगसे कराओ ॥ १ ॥

पशून् वासांसि रत्नानि धनानि विविधानि च ।
पाण्डोः प्रयच्छ माद्र्याश्च येभ्यो यावच्च वाञ्छितम् ॥ २ ॥
यथा च कुन्ती सत्कारं कुर्यान्माद्र्यास्तथा कुरु ।
यथा न वायुर्नादित्यः पश्येतां तां सुसंवृताम् ॥ ३ ॥
पाण्डु और माद्रीके लिये नाना प्रकारके पशु, वस्त्र, रत्न और धन दान करो। इस अवसरपर जिनको जितना चाहिये, उतना धन दो। कुन्तीदेवी माद्रीका जिस प्रकार सत्कार करना चाहें, वैसी व्यवस्था करो। माद्रीकी अस्थियोंको वस्त्रोंसे अच्छी प्रकार ढँक दो, जिससे उसे वायु तथा सूर्य भी न देख सकें ॥ २-३ ॥

न शोच्यः पाण्डुरनघः प्रशस्यः स नराधिपः ।
यस्य पञ्च सुता वीरा जाताः सुरसुतोपमाः ॥ ४ ॥
निष्पाप राजा पाण्डु शोचनीय नहीं, प्रशंसनीय हैं, जिन्हें देवकुमारोंके समान पाँच वीर पुत्र प्राप्त हुए हैं ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

विदुरस्तं तथेत्युक्त्वा भीष्मेण सह भारत ।
पाण्डुं संस्कारयामास देशे परमपूजिते ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! विदुरने धृतराष्ट्रसे ‘तथास्तु’ कहकर भीष्मजीके साथ परम पवित्र स्थानमें पाण्डुका अन्तिम-संस्कार कराया ॥ ५ ॥

ततस्तु नगरात् तूर्णमाज्यगन्धपुरस्कृताः ।
निहृताः पावका दीप्ताः पाण्डो राजन् पुरोहितैः ॥ ६ ॥
राजन्! तदनन्तर शीघ्र ही पाण्डुका दाह-संस्कार करनेके लिये पुरोहितगण घृत और सुगन्ध आदिके साथ प्रज्वलित अग्नि लिये नगरसे बाहर निकले ॥ ६ ॥

अथैनामार्तवैः पुष्पैर्गन्धैश्च विविधैर्वरैः ।

शिबिकां तामलंकृत्य वाससाऽऽच्छाद्य सर्वशः ॥ ७ ॥ इसके बाद वसन्त-ऋतुमें सुलभ नाना प्रकारके सुन्दर पुष्पों तथा श्रेष्ठ गन्धोंसे एक शिबिका (वैकुण्ठी)-को सजाकर उसे सब ओरसे वस्त्रद्वारा ढँक दिया गया ॥ ७ ॥

तां तथा शोभितां माल्यैर्वासोभिश्च महाधनैः । अमात्या ज्ञातयश्चैनं सुहृदश्चोपतस्थिरे ॥ ८ ॥ इस प्रकार बहुमूल्य वस्त्रों और पुष्पमालाओंसे सुशोभित उस शिबिकाके समीप मन्त्री, भाई-बन्धु और सुहृद्-सम्बन्धी—सब लोग उपस्थित हुए ॥ ८ ॥

नृसिंहं नरयुक्तेन परमालंकृतेन तम् । अवहन् यानमुख्येन सह माद्र्या सुसंयतम् ॥ ९ ॥ उसमें माद्रीके साथ पाण्डुकी अस्थियाँ भली-भाँति बाँधकर रखी गयी थीं। मनुष्योंद्वारा ढोई जानेवाली और अच्छी तरह सजायी हुई उस शिबिकाके द्वारा वे सभी बन्धु-बान्धव माद्रीसहित नरश्रेष्ठ पाण्डुकी अस्थियोंको ढोने लगे ॥ ९ ॥

पाण्डुरेणातपत्रेण चामरव्यजनेन च । सर्ववादित्रनादैश्च समलंचक्रिरे ततः ॥ १० ॥ शिबिकाके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ था। चँवर डुलाये जा रहे थे। सब प्रकारके बाजों-गाजोंसे उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी ॥ १० ॥

रत्नानि चाप्युपादाय बहूनि शतशो नराः । प्रददुः काङ्क्षमाणेभ्यः पाण्डोस्तस्यौर्ध्वदेहिके ॥ ११ ॥ सैकड़ों मनुष्योंने उन महाराज पाण्डुके दाह-संस्कारके दिन बहुत-से रत्न लेकर याचकोंको दिये ॥ ११ ॥

अथच्छत्राणि शुभ्राणि चामराणि बृहन्ति च । आजह्रुः कौरवस्यार्थे वासांसि रुचिराणि च ॥ १२ ॥ इसके बाद कुरुराज पाण्डुके लिये अनेक श्वेत छत्र, बहुतेरे बड़े-बड़े चँवर तथा कितने ही सुन्दर-सुन्दर वस्त्र लोग वहाँ ले आये ॥ १२ ॥

याजकैः शुक्लवासोभिर्हूयमाना हुताशनाः । अगच्छन्नग्रतस्तस्य दीप्यमानाः स्वलंकृताः ॥ १३ ॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चैव सहस्रशः । रुदन्तः शोकसंतप्ता अनुजग्मुर्नराधिपम् ॥ १४ ॥ पुरोहितलोग सफेद वस्त्र धारण करके अग्निहोत्रकी अग्निमें आहुति डालते जाते थे। वे अग्नियाँ माला आदिसे अलंकृत एवं प्रज्वलित हो पाण्डुकी पालकीके आगे-आगे चल रही थीं। सहस्रों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र शोकसे संतप्त हो रोते हुए महाराज पाण्डुकी शिबिकाके पीछे जा रहे थे ॥ १३-१४ ॥

अयमस्मानपाहाय दुःखे चाधाय शाश्वते ।

कृत्वा चास्माननाथांश्च क्व यास्यति नराधिपः ॥ १५ ॥
वे कहते जाते थे—'हाय! ये महाराज हमलोगोंको छोड़कर, हमें सदाके लिये भारी दुःखमें डालकर और हम सबको अनाथ करके कहाँ जा रहे हैं' ॥ १५ ॥
क्रोशन्तः पाण्डवाः सर्वे भीष्मो विदुर एव च ।
रमणीये वनोद्देशे गङ्गातीरे समे शुभे ॥ १६ ॥
न्यासयामासुरथ तां शिबिकां सत्यवादिनः ।
सभार्यस्य नृसिंहस्य पाण्डोरक्लिष्टकर्मणः ॥ १७ ॥
समस्त पाण्डव, भीष्म तथा विदुरजी क्रन्दन करते हुए जा रहे थे। वनके रमणीय प्रदेशमें गङ्गाजीके शुभ एवं समतल तटपर उन लोगोंने, अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले सत्यवादी नरश्रेष्ठ पाण्डु और उनकी पत्नी माद्रीकी उस शिबिकाको रखा ॥ १६-१७ ॥
ततस्तस्य शरीरं तु सर्वगन्धाधिवासितम् ।
शुचिकालीयकादिग्धं दिव्यचन्दनरूषितम् ॥ १८ ॥
पर्यषिञ्चञ्जलेनाशु शातकुम्भमयैर्घटैः ।
चन्दनेन च शुक्लेन सर्वतः समलेपयन् ॥ १९ ॥
कालागुरुविमिश्रेण तथा तुङ्गरसेन च ।
अथैनं देशजैः शुक्लैर्वासोभिः समयोजयन् ॥ २० ॥
तदनन्तर राजा पाण्डुकी अस्थियोंको सब प्रकारकी सुगन्धोंसे सुवासित करके उनपर पवित्र काले अगरका लेप किया गया। फिर उन्हें दिव्य चन्दनसे चर्चित करके सोनेके कलशोंद्वारा लाये हुए गङ्गाजलसे भाई-बन्धुओंने उसका अभिषेक किया। तत्पश्चात् उनपर सब ओरसे काले अगरसे मिश्रित तुंगरस नामक गन्ध-द्रव्यका एवं श्वेत चन्दनका लेप किया गया। इसके बाद उन्हें सफेद स्वदेशी वस्त्रोंसे ढक दिया गया ॥ १८—२० ॥
संछन्नः स तु वासोभिर्जीवन्निव नराधिपः ।
शुशुभे स नरव्याघ्रो महार्हशयनोचितः ॥ २१ ॥
इस प्रकार बहुमूल्य शय्यापर शयन करनेयोग्य नरश्रेष्ठ राजा पाण्डुकी अस्थियाँ वस्त्रोंसे आच्छादित हो जीवित मनुष्यकी भाँति शोभा पाने लगीं ॥ २१ ॥
(हयमेधाग्निना सर्वे याजकाः सपुरोहिताः ।
वेदोक्तेन विधानेन क्रियाश्चक्रुः समन्त्रकम् ॥)
याजकैरभ्यनुज्ञाते प्रेतकर्मण्यनुष्ठिते ।
घृतावसिक्तं राजानं सह माद्र्या स्वलंकृतम् ॥ २२ ॥
समस्त याजकों और पुरोहितोंने अश्वमेधकी अग्निसे वेदोक्त विधिके अनुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारी क्रियाएँ सम्पन्न कीं। याजकोंकी आज्ञा लेकर प्रेतकर्म आरम्भ करते समय माद्रीसहित अलंकारयुक्त राजाका घृतसे अभिषेक किया गया ॥ २२ ॥

तुङ्गपद्मकमिश्रेण चन्दनेन सुगन्धिना । अन्यैश्च विविधैर्गन्धैर्विधिना समदाहयन् ॥ २३ ॥ फिर तुंग और पद्मकमिश्रित सुगन्धित चन्दन तथा अन्य विविध प्रकारके गन्ध-द्रव्योंसे भाई-बन्धुओंने युधिष्ठिरद्वारा विधिपूर्वक उन दोनोंका दाह-संस्कार कराया ॥ २३ ॥ ततस्तयोः शरीरे द्वे दृष्ट्वा मोहवशं गता । हा हा पुत्रेति कौसल्या पपात सहसा भुवि ॥ २४ ॥ उस समय उन दोनोंकी अस्थियोंको देखकर माता कौसल्या (अम्बालिका) 'हा पुत्र! हा पुत्र!' कहती हुई सहसा मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २४ ॥ तां प्रेक्ष्य पतितामार्तां पौरजानपदो जनः । रुरोद दुःखसंतप्तो राजभक्त्या कृपान्वितः ॥ २५ ॥ उसे इस प्रकार शोकातुर हो भूमिपर पड़ी देख नगर और जनपदके लोग राजभक्ति तथा दयासे द्रवित एवं दुःखसे संतप्त हो फूट-फूटकर रोने लगे ॥ २५ ॥ कुन्त्याश्चार्त्तनादेन सर्वाणि च विचुक्रुशुः । मानुषैः सह भूतानि तिर्यग्योनिगतान्यपि ॥ २६ ॥ कुन्तीके आर्तनादसे मनुष्योंसहित समस्त पशु और पक्षी आदि प्राणी भी करुणक्रन्दन करने लगे ॥ २६ ॥ तथा भीष्मः शान्तनवो विदुरश्च महामतिः । सर्वशः कौरवाश्चैव प्राणदन् भृशदुःखिताः ॥ २७ ॥ शन्तनुनन्दन भीष्म, परम बुद्धिमान् विदुर तथा सम्पूर्ण कौरव भी अत्यन्त दुःखमें निमग्न हो रोने लगे ॥ २७ ॥ ततो भीष्मोऽथ विदुरो राजा च सह पाण्डवैः । उदकं चक्रिरे तस्य सर्वाश्च कुरुयोषितः ॥ २८ ॥ तदनन्तर भीष्म, विदुर, राजा धृतराष्ट्र तथा पाण्डवोंके सहित कुरुकुलकी सभी स्त्रियोंने राजा पाण्डुके लिये जलांजलि दी ॥ २८ ॥ चुक्रुशुः पाण्डवाः सर्वे भीष्मः शान्तनवस्तथा । विदुरो ज्ञातयश्चैव चक्रुश्चाप्युदकक्रियाः ॥ २९ ॥ उस समय सभी पाण्डव पिताके लिये रो रहे थे। शन्तनुनन्दन भीष्म, विदुर तथा अन्य भाई-बन्धुओंकी भी यही दशा थी। सबने जलांजलि देनेकी क्रिया पूरी की ॥ २९ ॥ कृतोदकांस्तानादाय पाण्डवाञ्छोककर्शितान् । सर्वाः प्रकृतयो राजन् शोचमाना न्यवारयन् ॥ ३० ॥ जलांजलिदान करके शोकसे दुर्बल हुए पाण्डवोंको साथ ले मन्त्री आदि सब लोग स्वयं भी दुःखी हो उन सबको समझा-बुझाकर शोक करनेसे रोकने लगे ॥ ३० ॥ यथैव पाण्डवा भूमौ सुषुपुः सह बान्धवैः ।

तथैव नागरा राजन् शिश्यिरे ब्राह्मणादयः ॥ ३१ ॥
तद्गतानन्दमस्वस्थमाकुमारमहृष्टवत् ।
बभूव पाण्डवैः सार्धं नगरं द्वादश क्षपाः ॥ ३२ ॥
राजन्! बारह रात्रियोंतक जिस प्रकार बन्धु-बान्धवों-सहित पाण्डव भूमिपर सोये, उसी प्रकार ब्राह्मण आदि नागरिक भी धरतीपर ही सोते रहे। उतने दिनोंतक हस्तिनापुर नगर पाण्डवोंके साथ आनन्द और हर्षोल्लाससे शून्य रहा। बूढ़ोंसे लेकर बच्चेतक सभी वहाँ दुःखमें डूबे रहे। सारा नगर ही अस्वस्थचित्त हो गया था ॥ ३१-३२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुदाहे
षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डुके दाहसंस्कारसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं)

१२७-

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रपुत्रोंकी बालक्रीड़ा, दुर्योधनका भीमसेनको विष खिलाना तथा गंगामें ढकेलना और भीमका नागलोकमें पहुँचकर आठ कुण्डोंके दिव्य रसका पान करना

वैशम्पायन उवाच

ततः कुन्ती च राजा च भीष्मश्च सह बन्धुभिः ।
ददुः श्राद्धं तदा पाण्डोः स्वधामृतमयं तदा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर कुन्ती, राजा धृतराष्ट्र तथा बन्धुओंसहित भीष्मजीने पाण्डुके लिये उस समय अमृतस्वरूप स्वधामय श्राद्धदान किया ॥ १ ॥

कुरूंश्च विप्रमुख्यांश्च भोजयित्वा सहस्रशः ।
रत्नौघान् विप्रमुख्येभ्यो दत्त्वा ग्रामवरांस्तथा ॥ २ ॥
उन्होंने समस्त कौरवों तथा सहस्रों मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें रत्नोंके ढेर तथा उत्तम-उत्तम गाँव दिये ॥ २ ॥

कृतशौचांस्ततस्तांस्तु पाण्डवान् भरतर्षभान् ।
आदाय विविशुः सर्वे पुरं वारणसाह्वयम् ॥ ३ ॥
मरणाशौचसे निवृत्त होकर भरतवंशशिरोमणि पाण्डवोंने जब शुद्धिका स्नान कर लिया, तब उन्हें साथ लेकर सबने हस्तिनापुर नगरमें प्रवेश किया ॥ ३ ॥

सततं समानुशोचन्तस्तमेव भरतर्षभम् ।
पौरजानपदाः सर्वे मृतं स्वमिव बान्धवम् ॥ ४ ॥
नगर और जनपदके सभी लोग मानो कोई अपना ही भाई-बन्धु मर गया हो, इस प्रकार उन भरतकुलतिलक पाण्डुके लिये निरन्तर शोकमग्न हो गये ॥ ४ ॥

श्राद्धावसाने तु तदा दृष्ट्वा तं दुःखितं जनम् ।
सम्मूढां दुःखशोकार्तां व्यासो मातरमब्रवीत् ॥ ५ ॥
श्राद्धकी समाप्तिपर सब लोगोंको दुःखी देखकर व्यासजीने दुःख-शोकसे आतुर एवं मोहमें पड़ी हुई माता सत्यवतीसे कहा— ॥ ५ ॥

अतिक्रान्तसुखाः कालाः पर्युपस्थितदारुणाः ।
श्वः श्वः पापिष्ठदिवसाः पृथिवी गतयौवना ॥ ६ ॥
‘माँ! अब सुखके दिन बीत गये। बड़ा भयंकर समय उपस्थित होनेवाला है। उत्तरोत्तर बुरे दिन आ रहे हैं। पृथिवीकी जवानी चली गयी ॥ ६ ॥