महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
मया शाल्वपतिर्वीरो मनसाभिवृतः पतिः ।
न मामर्हसि धर्मज्ञ दातुं भ्रात्रेऽन्यमानसाम् ॥ ५१ ॥
‘धर्मज्ञ! मैंने मन-ही-मन वीरवर शाल्वराजको अपना पति चुन लिया है; अतः मेरा मन अन्यत्र अनुरक्त होनेके कारण आपको अपने भाईके साथ मेरा विवाह नहीं करना चाहिये’ ॥ ५१ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं भीष्मः सम्मन्त्र्य सह मन्त्रिभिः ।
निश्चित्य विससर्जैमां सत्यवत्या मते स्थितः ॥ ५२ ॥
अम्बाका यह वचन सुनकर भीष्मने मन्त्रियोंके साथ सलाह करके माता सत्यवतीकी सम्मति प्राप्त करके एक निश्चयपर पहुँचकर इस कन्याको छोड़ दिया ॥ ५२ ॥
अनुज्ञाता तु भीष्मेण शाल्वं सौभपतिं ततः ।
कन्येयं मुदिता तत्र काले वचनमब्रवीत् ॥ ५३ ॥
भीष्मकी आज्ञा पाकर यह कन्या मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हो सौभ विमानके स्वामी शाल्वके यहाँ गयी और वहाँ उस समय इस प्रकार बोली— ॥ ५३ ॥
विसर्जितास्मि भीष्मेण धर्मं मां प्रतिपादय ।
मनसाभिवृतः पूर्वं मया त्वं पार्थिवर्षभ ॥ ५४ ॥
‘नृपश्रेष्ठ! भीष्मने मुझे छोड़ दिया है; क्योंकि पूर्वकालमें मैंने अपने मनसे आपको ही पति चुन लिया था, अतः आप मुझे धर्मपालनका अवसर दें’ ॥ ५४ ॥
प्रत्याचख्यौ च शाल्वोऽस्याश्चारित्रस्याभिशङ्कितः ।
सेयं तपोवनं प्राप्ता तापस्येऽभिरता भृशम् ॥ ५५ ॥
शाल्वराजको इसके चरित्रपर संदेह हुआ; अतः उसने इसके प्रस्तावको ठुकरा दिया है। इस कारण तपस्यामें अत्यन्त अनुरक्त होकर यह इस तपोवनमें आयी है ॥ ५५ ॥
मया च प्रत्यभिज्ञाता वंशस्य परिकीर्तनात् ।
अस्य दुःखस्य चोत्पत्तिं भीष्ममेवेह मन्यते ॥ ५६ ॥
इसके कुलका परिचय प्राप्त होनेसे मैंने इसे पहचाना है। यह अपने इस दुःखकी प्राप्तिमें भीष्मको ही कारण मानती है ॥ ५६ ॥
अम्बोवाच
भगवन्नेवमेवेह यथाऽऽह पृथिवीपतिः ।
शरीरकर्ता मातुर्मे सृञ्जयो होत्रवाहनः ॥ ५७ ॥
अम्बा बोली—भगवन्! जैसा कि मेरी माताके पिता सृंजयवंशी महाराज होत्रवाहनने कहा है, ठीक ऐसी ही मेरी परिस्थिति है ॥ ५७ ॥
न ह्युत्सहे स्वनगरं प्रतियातुं तपोधन ।
अपमानभयाच्चैव व्रीडया च महामुने ॥ ५८ ॥
तपोधन! महामुने! लज्जा और अपमानके भयसे अपने नगरको जानेके लिये मेरे मनमें उत्साह नहीं है ।।
यत् तु मां भगवान् रामो वक्ष्यति द्विजसत्तम ।
तन्मे कार्यतमं कार्यमिति मे भगवन् मतिः ॥ ५९ ॥
भगवन्! द्विजश्रेष्ठ! अब भगवान् परशुराम मुझसे जो कुछ कहेंगे, वही मेरे लिये सर्वोत्तम कर्तव्य होगा, यही मैंने निश्चय किया है ।। ५९ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि होत्रवाहनाम्बासंवादे
षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें अम्बा-होत्रवाहनसंवादविषयक एक सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७६ ।।
१७७-
सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
अकृतव्रण और परशुरामजीकी अम्बासे बातचीत
अकृतव्रण उवाच
दुःखद्वयमिदं भद्रे कतरस्य चिकीर्षसि ।
प्रतिकर्तव्यमबले तत् त्वं वत्से वदस्व मे ॥ १ ॥
अकृतव्रणने कहा— भद्रे! तुम्हें दुःख देनेवाले दो कारण (भीष्म और शाल्व) उपस्थित हैं। वत्से! तुम इन दोनोंमेंसे किससे बदला लेनेकी इच्छा रखती हो? यह मुझे बताओ ॥ १ ॥
यदि सौभपतिर्भद्रे नियोक्तव्यो मतस्तव ।
नियोक्ष्यति महात्मा स रामस्त्वद्धितकाम्यया ॥ २ ॥
भद्रे! यदि तुम्हारा यह विचार हो कि सौभपति शाल्वराजको ही विवाहके लिये विवश करना चाहिये तो महात्मा परशुराम तुम्हारे हितकी इच्छासे शाल्वराजको अवश्य इस कार्यमें नियुक्त करेंगे ॥ २ ॥
अथापगेयं भीष्मं त्वं रामेणेच्छसि धीमता ।
रणे विनिर्जितं द्रष्टुं कुर्यात् तदपि भार्गवः ॥ ३ ॥
अथवा यदि तुम गङ्गानन्दन भीष्मको बुद्धिमान् परशुरामजीके द्वारा युद्धमें पराजित देखना चाहती हो तो वे महात्मा भार्गव यह भी कर सकते हैं ॥ ३ ॥
सृञ्जयस्य वचः श्रुत्वा तव चैव शुचिस्मिते ।
यदत्र ते भृशं कार्यं तदद्यैव विचिन्त्यताम् ॥ ४ ॥
शुचिस्मिते! सृञ्जयवंशी राजा होत्रवाहनकी बात सुनकर और अपना विचार प्रकट करके जो कार्य तुम्हें अत्यन्त आवश्यक प्रतीत हो उसका आज ही विचार कर लो ॥ ४ ॥
अम्बोवाच
अपनीतास्मि भीष्मेण भगवन्नविजानता ।
नाभिजानाति मे भीष्मो ब्रह्मन् शाल्वगतं मनः ॥ ५ ॥
अम्बा बोली— भगवन्! भीष्म बिना जाने-बूझे मुझे हर लाये थे। ब्रह्मन्! उन्हें इस बातका पता नहीं था कि मेरा मन शाल्वमें अनुरक्त है ॥ ५ ॥
एतद् विचार्य मनसा भवानेतद् विनिश्चयम् ।
विचिनोतु यथान्यायं विधानं क्रियतां तथा ॥ ६ ॥
इस बातपर मन-ही-मन विचार करके आप ही कुछ निश्चय करें और जो न्यायसंगत प्रतीत हो, वही कार्य करें ॥ ६ ॥
भीष्मे वा कुरुशार्दूले शाल्वराजेऽथवा पुनः । उभयोरेव वा ब्रह्मन् युक्तं यत् तत् समाचर ॥ ७ ॥ ब्रह्मन्! कुरुश्रेष्ठ भीष्मके साथ अथवा शाल्वराजके साथ अथवा दोनोंके ही साथ जो उचित बर्ताव हो, वह करें ॥ ७ ॥ निवेदितं मया ह्येतद् दुःखमूलं यथातथम् । विधानं तत्र भगवन् कर्तुमर्हसि युक्तितः ॥ ८ ॥ मैंने अपने दुःखके इस मूल कारणको यथार्थरूपसे निवेदन कर दिया। भगवन्! अब आप अपनी युक्तिसे ही इस विषयमें न्यायोचित कार्य करें ॥ ८ ॥
अकृतव्रण उवाच
उपपन्नमिदं भद्रे यदेवं वरवर्णिनि । धर्मं प्रति वचो ब्रूयाः शृणु चेदं वचो मम ॥ ९ ॥ अकृतव्रण बोले—भद्रे! तुम जो इस प्रकार धर्मानुकूल बात कहती हो, यही तुम्हारे लिये उचित है। वरवर्णिनि! अब मेरी यह बात सुनो ॥ ९ ॥ यदि त्वामापगेयो वै न नयेद् गजसाह्वयम् । शाल्वस्त्वां शिरसा भीरु गृह्णीयाद् रामचोदितः ॥ १० ॥ भीरु! यदि गङ्गानन्दन भीष्म तुम्हें हस्तिनापुर न ले जाते तो राजा शास्त्र परशुरामजीके कहनेपर तुम्हें आदरपूर्वक स्वीकार कर लेता ॥ १० ॥ तेन त्वं निर्जिता भद्रे यस्मान्नीतासि भाविनि । संशयः शाल्वराजस्य तेन त्वयि सुमध्यमे ॥ ११ ॥ परंतु भद्रे! भीष्म तुम्हें जीतकर अपने साथ ले गये। भाविनि! सुमध्यमे! यही कारण है कि शाल्वराजके मनमें तुम्हारे प्रति संशय उत्पन्न हो गया है ॥ ११ ॥ भीष्मः पुरुषमानी च जितकाशी तथैव च । तस्मात् प्रतिक्रिया युक्ता भीष्मे कारयितुं तव ॥ १२ ॥ भीष्मको अपने पुरुषार्थका अभिमान है और वे इस समय अपनी विजयसे उल्लसित हो रहे हैं। अतः भीष्मसे ही बदला लेना तुम्हारे लिये उचित होगा ॥ १२ ॥
अम्बोवाच
ममाप्येष सदा ब्रह्मन् हृदि कामोऽभिवर्तते । घातयेयं यदि रणे भीष्ममित्येव नित्यदा ॥ १३ ॥ भीष्मं वा शाल्वराजं वा यं वा दोषेण गच्छसि । प्रशाधि तं महाबाहो यत्कृतेऽहं सुदुःखिता ॥ १४ ॥ अम्बा बोली—ब्रह्मन्! मेरे मनमें भी सदा यह इच्छा बनी रहती है कि मैं युद्धमें भीष्मका वध करा दूँ। महाबाहो! आप भीष्मको या शाल्वराजको जिसे भी दोषी समझते
हों, उसीको दण्ड दीजिये, जिसके कारण मैं अत्यन्त दुःखमें पड़ गयी हूँ ।। १३-१४ ।।
भीष्म उवाच
एवं कथयतामेव तेषां स दिवसो गतः । रात्रिश्च भरतश्रेष्ठ सुखशीतोष्णमारुता ।। १५ ।। भीष्मजी कहते हैं—भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार बातचीत करते हुए उन सब लोगोंका वह दिन बीत गया। सुखदायिनी सरदी, गरमी और हवासे युक्त रात भी समाप्त हो गयी ।। १५ ।।
ततो रामः प्रादुरासीत् प्रज्वलन्निव तेजसा । शिष्यैः परिवृतो राजन् जटाचीरधरो मुनिः ।। १६ ।। राजन्! तदनन्तर अपने शिष्योंसे घिरे हुए जटावल्कलधारी मुनिवर परशुरामजी वहाँ प्रकट हुए। वे अपने तेजके कारण प्रज्वलित-से हो रहे थे ।। १६ ।।
धनुष्पाणिरदीनात्मा खड्गं बिभ्रत् परश्वधी । विरजा राजशार्दूल सृञ्जयं सोऽभ्ययान्नृपम् ।। १७ ।। नृपश्रेष्ठ! उनके हृदयमें दीनताका नाम नहीं था। उन्होंने अपने हाथोंमें धनुष, खड्ग और परसा ले रखे थे। उनके हृदयसे रजोगुण दूर हो गया था, वे राजा सृंजयके निकट आये ।। १७ ।।
ततस्तं तापसा दृष्ट्वा स च राजा महातपाः । तस्थुः प्राञ्जलयो राजन् सा च कन्या तपस्विनी ।। १८ ।। राजन्! उन्हें देखकर वे तपस्वी मुनि, महातपस्वी नरेश तथा वह तपस्विनी राजकन्या—ये सब-के-सब हाथ जोड़कर खड़े हो गये ।। १८ ।।
पूजयामासुरव्यग्रा मधुपर्केण भार्गवम् । अर्चितश्च यथान्यायं निषसाद सहैव तैः ।। १९ ।। फिर उन्होंने स्वस्थचित्त होकर मधुपर्कद्वारा भार्गव परशुरामजीका पूजन किया। विधिपूर्वक पूजित होनेपर वे उन्हींके साथ वहाँ बैठे ।। १९ ।।
ततः पूर्वव्यतीतानि कथयन्तौ स्म तावुभौ । आसातां जामदग्न्यश्च सृञ्जयश्चैव भारत ।। २० ।। भारत! तत्पश्चात् परशुरामजी और सृंजय (होत्रवाहन) दोनों मित्र पहलेकी बीती बातें कहते हुए एक जगह बैठ गये ।। २० ।।
तथा कथान्ते राजर्षिर्भृगुश्रेष्ठं महाबलम् । उवाच मधुरं काले रामं वचनमर्थवत् ।। २१ ।। बातचीतके अन्तमें राजर्षि होत्रवाहनने महाबली भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीसे मधुर वाणीमें उस समय यह अर्थयुक्त वचन कहा— ।। २१ ।।
रामेयं मम दौहित्री काशिराजसुता प्रभो ।
अस्याः शृणु यथातत्त्वं कार्यं कार्यविशारद ॥ २२ ॥
‘कार्यसाधनकुशल प्रभो! परशुराम! यह मेरी पुत्रीकी पुत्री काशिराजकी कन्या है। इसका कुछ कार्य है, उसे आप इसीके मुँहसे ठीक-ठीक सुन लें’ ॥ २२ ॥
परमं कथ्यतां चेति तां रामः प्रत्यभाषत ।
ततः साभ्यगमद् रामं ज्वलन्तमिव पावकम् ॥ २३ ॥
ततोऽभिवाद्य चरणौ रामस्य शिरसा शुभौ ।
स्पृष्ट्वा पद्मदलाभाभ्यां पाणिभ्यामग्रतः स्थिता ॥ २४ ॥
‘बहुत अच्छा, कहो बेटी’ इस प्रकार उस कन्याको जब परशुरामजीने प्रेरित किया; तब वह प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी परशुरामजीके पास आयी और उनके कल्याणकारी चरणोंको सिरसे प्रणाम करके कमलदलके समान सुशोभित होनेवाले दोनों हाथोंसे उनका स्पर्श करती हुई सामने खड़ी हो गयी ॥ २३-२४ ॥
रुरोद सा शोकवती बाष्पव्याकुललोचना ।
प्रपेदे शरणं चैव शरण्यं भृगुनन्दनम् ॥ २५ ॥
उसके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वह शोकसे आतुर होकर रोने लगी और सबको शरण देनेवाले भृगुनन्दन परशुरामजीकी शरणमें गयी ॥ २५ ॥
राम उवाच
यथा त्वं सृञ्जयस्यास्य तथा मे त्वं नृपात्मजे ।
ब्रूहि यत् ते मनोदुःखं करिष्ये वचनं तव ॥ २६ ॥
परशुरामजी बोले— राजकुमारी! जैसे तू इन संजयकी दौहित्री है, उसी प्रकार मेरी भी है। तेरे मनमें जो दुःख है, उसे बता। मैं तेरे कथनानुसार सब कार्य करूँगा ॥ २६ ॥
अम्बोवाच
भगवञ्छरणं त्वाद्य प्रपन्नास्मि महाव्रतम् ।
शोकपङ्कार्णवान्मग्नां घोरादुद्धर मां विभो ॥ २७ ॥
अम्बा बोली— भगवन्! आप महान् व्रतधारी हैं। आज मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। प्रभो! इस भयंकर शोकसागरमें डूबनेसे मुझे बचाइये ॥ २७ ॥
भीष्म उवाच
तस्याश्च दृष्ट्वा रूपं च वपुश्चाभिनवं पुनः ।
सौकुमार्यं परं चैव रामश्चिन्तापरोऽभवत् ॥ २८ ॥
किमियं वक्ष्यतीत्येवं विममर्श भृगूद्वहः ।
इति दध्यौ चिरं रामः कृपयाभिपरिप्लुतः ॥ २९ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! उसके सुन्दर रूप, नूतन (तरुण) शरीर तथा अत्यन्त सुकुमारताको देखकर परशुरामजी चिन्तामें पड़ गये कि न जाने यह क्या कहेगी? उसके प्रति दयाभावसे परिपूर्ण हो भृगुकुलभूषण परशुराम बहुत देरतक उसीके विषयमें चिन्ता करते रहे ॥ २८-२९ ॥
कथ्यतामिति सा भूयो रामेणोक्ता शुचिस्मिता ।
सर्वमेव यथातत्त्वं कथयामास भार्गवे ॥ ३० ॥
तदनन्तर परशुरामजीके पुनः यह कहनेपर कि तुम अपनी बात कहो, पवित्र मुसकानवाली अम्बाने उनसे अपना सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बता दिया ॥ ३० ॥
तच्छ्रुत्वा जामदग्न्यस्तु राजपुत्र्या वचस्तदा ।
उवाच तां वरारोहां निश्चित्यार्थविनिश्चयम् ॥ ३१ ॥
राजकुमारी अम्बाका यह कथन सुनकर जमदग्निनन्दन परशुरामने क्या करना है, इसका निश्चय करके उस सुन्दर अंगोंवाली राजकुमारीसे कहा ॥ ३१ ॥
राम उवाच
प्रेषयिष्यामि भीष्माय कुरुश्रेष्ठाय भाविनि ।
करिष्यति वचो मह्यं श्रुत्वा च स नराधिपः ॥ ३२ ॥
**परशुरामजी बोले—**भाविनि! मैं तुझे कुरुश्रेष्ठ भीष्मके पास भेजूँगा। नरपति भीष्म सुनते ही मेरी आज्ञाका पालन करेगा ॥ ३२ ॥
न चेत् करिष्यति वचो मयोक्तं जाह्नवीसुतः ।
धक्ष्याम्यहं रणे भद्रे सामात्यं शस्त्रतेजसा ॥ ३३ ॥
भद्रे! यदि गङ्गानन्दन भीष्म मेरी बात नहीं मानेगा तो मैं युद्धमें अस्त्र-शस्त्रोंके तेजसे मन्त्रियोंसहित उसे भस्म कर डालूँगा ॥ ३३ ॥
अथवा ते मतिस्तत्र राजपुत्रि न वर्तते ।
यावच्छाल्वपतिं वीरं योजयाम्यत्र कर्मणि ॥ ३४ ॥
अथवा राजकुमारी! यदि वहाँ जानेका तेरा विचार न हो तो मैं वीर शाल्वराजको ही पहले इस कार्यमें नियुक्त करूँ (उसके साथ तेरा ब्याह करा दूँ) ॥ ३४ ॥
अम्बोवाच
विसर्जिताहं भीष्मेण श्रुत्वैव भृगुनन्दन ।
शाल्वराजगतं भावं मम पूर्वं मनीषितम् ॥ ३५ ॥
**अम्बा बोली—**भृगुनन्दन! शाल्वराजमें मेरा अनुराग है और मैं पहलेसे ही उन्हें पाना चाहती हूँ। यह सुनते ही भीष्मने मुझे विदा कर दिया था ॥ ३५ ॥
सौभराजमुपेत्याहमवोचं दुर्वचं वचः ।
न च मां प्रत्यगृह्णात् स चारित्र्यपरिशङ्कितः ॥ ३६ ॥
तब सौभराजके पास जाकर मैंने उनसे ऐसी बातें कहीं जिन्हें अपने मुँहसे कहना स्त्रीजातिके लिये अत्यन्त दुष्कर होता है; परंतु मेरे चरित्रपर संदेह हो जानेके कारण उसने मुझे स्वीकार नहीं किया ॥ ३६ ॥
एतत् सर्वं विनिश्चित्य स्वबुद्ध्या भृगुनन्दन ।
यदत्रौपयिकं कार्यं तच्चिन्तयितुमर्हसि ॥ ३७ ॥
भृगुनन्दन! इन सब बातोंपर बुद्धिपूर्वक विचार करके जो उचित प्रतीत हो, उसी कार्यकी ओर आप ध्यान दें ॥ ३७ ॥
मम तु व्यसनस्यास्य भीष्मो मूलं महाव्रतः ।
येनाहं वशमानीता समुत्क्षिप्य बलात् तदा ॥ ३८ ॥
मेरी इस विपत्तिका मूल कारण महान् व्रतधारी भीष्म है, जिसने उस समय बलपूर्वक मुझे उठाकर रथपर रख लिया और इस प्रकार मुझे वशमें करके वह हस्तिनापुर ले आया ॥ ३८ ॥
भीष्मं जहि महाबाहो यत्कृते दुःखमीदृशम् ।
प्राप्ताहं भृगुशार्दूल चराम्यप्रियमूत्तमम् ॥ ३९ ॥
महाबाहु भृगुसिंह! आप भीष्मको ही मार डालिये, जिसके कारण मुझे ऐसा दुःख प्राप्त हुआ है और मैं इस प्रकार विवश होकर अत्यन्त अप्रिय आचरणमें प्रवृत्त हुई हूँ ॥ ३९ ॥
स हि लुब्धश्च नीचश्च जितकाशी च भार्गव ।
तस्मात् प्रतिक्रिया कर्तुं युक्ता तस्मै त्वयानघ ॥ ४० ॥
निष्पाप भार्गव! भीष्म लोभी, नीच और विजयोल्लाससे परिपूर्ण है; अतः आपको उसीसे बदला लेना उचित है ॥ ४० ॥
एष मे क्रियमाणाया भारतेन तदा विभो ।
अभवद्धृदि संकल्पो घातयेयं महाव्रतम् ॥ ४१ ॥
प्रभो! भरतवंशी भीष्मने जबसे मुझे इस दशामें डाल दिया है, तबसे मेरे हृदयमें यही संकल्प उठता है कि मैं उस महान् व्रतधारीका वध करा दूँ ॥ ४१ ॥
तस्मात् कामं ममाद्येमं राम सम्पादयानघ ।
जहि भीष्मं महाबाहो यथा वृत्रं पुरंदरः ॥ ४२ ॥
निष्पाप महाबाहु राम! आज आप मेरी इसी कामनाको पूर्ण कीजिये। जैसे इन्द्रने वृत्रासुरका वध किया था, उसी प्रकार आप भी भीष्मको मार डालिये ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामाम्बासंवादे
सप्तसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें अम्बा-परशुराम-संवादविषयक एक सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७७ ॥
अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना
अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना
भीष्म उवाच
एवमुक्तस्तदा रामो जहि भीष्ममिति प्रभो ।
उवाच रुदतीं कन्यां चोदयन्तीं पुनः पुनः ॥ १ ॥
काश्ये न कामं गृह्णामि शस्त्रं वै वरवर्णिनि ।
ऋते ब्रह्मविदां हेतोः किमन्यत् करवाणि ते ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! अम्बाके ऐसा कहनेपर कि प्रभो! भीष्मको मार डालिये। परशुरामजीने रो-रोकर बार-बार प्रेरणा देनेवाली उस कन्यासे इस प्रकार कहा—'सुन्दरी! काशिराजकुमारी! मैं अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार किसी वेदवेत्ता ब्राह्मणको आवश्यकता हो तो उसीके लिये शस्त्र उठाता हूँ। वैसा कारण हुए बिना इच्छानुसार हथियार नहीं उठाता। अतः इस प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए मैं तेरा दूसरा कौन-सा कार्य करूँ ॥ १-२ ॥
वाचा भीष्मश्च शाल्वश्च मम राज्ञि वशानुगौ ।
भविष्यतोऽनवद्याङ्गि तत् करिष्यामि मा शुचः ॥ ३ ॥
'राजकन्ये! भीष्म और शाल्व दोनों मेरी आज्ञाके अधीन होंगे। अतः निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! मैं तेरा कार्य करूँगा। तू शोक न कर ॥ ३ ॥
न तु शस्त्रं ग्रहीष्यामि कथंचिदपि भाविनि ।
ऋते नियोगाद् विप्राणामेष मे समयः कृतः ॥ ४ ॥
'भाविनि! मैं किसी तरह ब्राह्मणोंकी आज्ञाके बिना हथियार नहीं उठाऊँगा, ऐसी मैंने प्रतिज्ञा कर रखी है' ॥
अम्बोवाच
मम दुःखं भगवता व्यपनेयं यतस्ततः ।
तच्च भीष्मप्रसूतं मे तं जहीश्वर मा चिरम् ॥ ५ ॥
अम्बा बोली—भगवन्! आप जैसे हो सके वैसे ही मेरा दुःख दूर करें। वह दुःख भीष्मने पैदा किया है; अतः प्रभो! उसीका शीघ्र वध कीजिये ॥ ५ ॥
राम उवाच
काशिकन्ये पुनर्ब्रूहि भीष्मस्ते चरणावुभौ ।
शिरसा वन्दनार्होऽपि ग्रहीष्यति गिरा मम ॥ ६ ॥
परशुरामजी बोले— काशिराजकी पुत्री! तू पुनः सोचकर बता। यद्यपि भीष्म तेरे लिये वन्दनीय है, तथापि मेरे कहनेसे वह तेरे चरणोंको अपने सिरपर उठा लेगा ॥
अम्बोवाच
जहि भीष्मं रणे राम गर्जन्तमसुरं यथा ।
समाहूतो रणे राम मम चेदिच्छसि प्रियम् ।
प्रतिश्रुतं च यदपि तत् सत्यं कर्तुमर्हसि ॥ ७ ॥
अम्बा बोली— राम! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो युद्धमें आमन्त्रित हो, असुरके समान गर्जना करनेवाले भीष्मको मार डालिये और आपने जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे भी सत्य कीजिये ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच
तयोः संवदतोरेवं राजन् रामाम्बयोस्तदा ।
ऋषिः परमधर्मात्मा इदं वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! परशुराम और अम्बामें जब इस प्रकार बातचीत हो रही थी, उसी समय परम धर्मात्मा ऋषि अकृतव्रणने यह बात कही— ॥ ८ ॥
शरणागतां महाबाहो कन्यां न त्यक्तुमर्हसि ।
यदि भीष्मो रणे राम समाहूतस्त्वया मृधे ॥ ९ ॥
निर्जितोऽस्मीति वा ब्रूयात् कुर्याद् वा वचनं तव ।
कृतमस्या भवेत् कार्यं कन्याया भृगुनन्दन ॥ १० ॥
‘महाबाहो! यह कन्या शरणमें आयी है; अतः आपको इसका त्याग नहीं करना चाहिये। भृगुनन्दन राम! यदि युद्धमें आपके बुलानेपर भीष्म सामने आकर अपनी पराजय स्वीकार करे अथवा आपकी बात ही मान ले तो इस कन्याका कार्य सिद्ध हो जायगा ॥ ९-१० ॥
वाक्यं सत्यं च ते वीर भविष्यति कृतं विभो ।
इयं चापि प्रतिज्ञा ते तदा राम महामुने ॥ ११ ॥
जित्वा वै क्षत्रियान् सर्वान् ब्राह्मणेषु प्रतिश्रुता ।
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चैव रणे यदि ॥ १२ ॥
ब्रह्मद्विड् भविता तं वै हनिष्यामीति भार्गव ।
शरणार्थे प्रपन्नानां भीतानां शरणार्थिनाम् ॥ १३ ॥
न शक्ष्यामि परित्यागं कर्तुं जीवन् कथंचन ।
यश्च कृत्स्नं रणे क्षत्रं विजेष्यति समागतम् ॥ १४ ॥
दीप्तात्मानमहं तं च हनिष्यामीति भार्गव ।
'महामुने राम! प्रभो! ऐसा होनेसे आपकी कही हुई बात सत्य सिद्ध होगी। वीरवर भार्गव! आपने समस्त क्षत्रियोंको जीतकर ब्राह्मणोंके बीचमें यह प्रतिज्ञा की थी कि यदि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करेगा तो मैं उसे निश्चय ही मार डालूँगा। साथ ही भयभीत होकर शरणमें आये हुए शरणार्थियोंका परित्याग मैं जीते-जी किसी प्रकार नहीं कर सकूँगा और जो युद्धमें एकत्र हुए सम्पूर्ण क्षत्रियोंको जीत लेगा, उस तेजस्वी पुरुषका भी मैं वध कर डालूँगा ।। ११—१४ १/२ ।। स एवं विजयी राम भीष्मः कुरुकुलोद्वहः । तेन युध्यस्व संग्रामे समेत्य भृगुनन्दन ।। १५ ।। 'भृगुनन्दन राम! इस प्रकार कुरुकुलका भार वहन करनेवाला भीष्म समस्त क्षत्रियोंपर विजय पा चुका है; अतः आप संग्राममें उसके सामने जाकर युद्ध कीजिये' ।। १५ ।।
राम उवाच
स्मराम्यहं पूर्वकृतां प्रतिज्ञामृषिसत्तम । तथैव च चरिष्यामि यथा साम्नैव लप्स्यते ।। १६ ।। **परशुरामजी बोले—**मुनिश्रेष्ठ! मुझे अपनी पहलेकी की हुई प्रतिज्ञाका स्मरण है, तथापि मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि सामनीतिसे ही काम बन जाय ।। १६ ।। कार्यमेतन्महद् ब्रह्मन् काशिकन्यामनोगतम् । गमिष्यामि स्वयं तत्र कन्यामादाय यत्र सः ।। १७ ।। ब्रह्मन्! काशिराजकी कन्याके मनमें जो यह कार्य है, वह महान् है। मैं उसकी सिद्धिके लिये इस कन्याको साथ लेकर स्वयं ही वहाँ जाऊँगा, जहाँ भीष्म है ।। १७ ।। यदि भीष्मो रणश्लाघी न करिष्यति मे वचः । हनिष्याम्येनमुद्रिक्तमिति मे निश्चिता मतिः ।। १८ ।। यदि युद्धकी स्पृहा रखनेवाला भीष्म मेरी बात नहीं मानेगा तो मैं उस अभिमानीको मार डालूँगा; यह मेरा निश्चित विचार है ।। १८ ।। न हि बाणा मयोत्सृष्टाः सज्जन्तीह शरीरिणाम् । कायेषु विदितं तुभ्यं पुरा क्षत्रियसंगरे ।। १९ ।। मेरे चलाये हुए बाण देहधारियोंके शरीरमें अटकते नहीं हैं। (उन्हें विदीर्ण करके बाहर निकल जाते हैं।) यह बात तुम्हें पूर्वकालमें क्षत्रियोंके साथ होनेवाले युद्धके समय ज्ञात हो चुकी है ।। १९ ।। एवमुक्त्वा ततो रामः सह तैर्ब्रह्मवादिभिः । प्रयाणाय मतिं कृत्वा समुत्तस्थौ महातपाः ।। २० ।। ऐसा कहकर महातपस्वी परशुरामजी उन ब्रह्मवादी महर्षियोंके साथ प्रस्थान करनेका निश्चय करके उसके लिये उद्यत हो गये ।। २० ।।
ततस्ते तामुषित्वा तु रजनीं तत्र तापसाः । हुताग्नयो जप्तजप्याः प्रतस्थुर्मज्जिघांसया ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् रातभर वहीं रहकर प्रातःकाल संध्योपासन, गायत्री-जप और अग्निहोत्र करके वे तपस्वी मुनि मेरा वध करनेकी इच्छासे उस आश्रमसे चले ॥ २१ ॥
अभ्यगच्छत् ततो रामः सह तैर्ब्रह्मवादिभिः । कुरुक्षेत्रं महाराज कन्यया सह भारत ॥ २२ ॥ महाराज भरतनन्दन! फिर उन वेदवादी मुनियोंको साथ ले परशुरामजी राजकन्या अम्बाके साथ कुरुक्षेत्रमें आये ॥ २२ ॥
न्यविशन्त ततः सर्वे परिगृह्य सरस्वतीम् । तापसास्ते महात्मानो भृगुश्रेष्ठपुरस्कृताः ॥ २३ ॥ वहाँ भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीको आगे करके उन सभी तपस्वी महात्माओंने सरस्वती नदीके तटका आश्रय ले रात्रिमें निवास किया ॥ २३ ॥
भीष्म उवाच
ततस्तृतीये दिवसे संदेश व्यवस्थितः । कुरु प्रियं स मे राजन् प्राप्तोऽस्मीति महाव्रतः ॥ २४ ॥ भीष्मजी कहते हैं—तदनन्तर तीसरे दिन (हस्तिनापुरके बाहर) एक स्थानपर ठहरकर महान् व्रतधारी परशुरामजीने मुझे संदेश दिया—‘राजन्! मैं यहाँ आया हूँ। तुम मेरा प्रिय कार्य करो’ ॥ २४ ॥
तमागतमहं श्रुत्वा विषयान्तं महाबलम् । अभ्यगच्छं जवेनाशु प्रीत्या तेजोनिधिं प्रभुम् ॥ २५ ॥ तेजके भण्डार और महाबली भगवान् परशुरामको अपने राज्यकी सीमापर आया हुआ सुनकर मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ वेगपूर्वक उनके पास गया ॥ २५ ॥
गां पुरस्कृत्य राजेन्द्र ब्राह्मणैः परिवारितः । ऋत्विग्भिर्देवकल्पैश्च तथैव च पुरोहितैः ॥ २६ ॥ राजेन्द्र! उस समय एक गौको आगे करके ब्राह्मणोंसे घिरा हुआ मैं देवताओंके समान तेजस्वी ऋत्विजों तथा पुरोहितोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ २६ ॥
स मामभिगतं दृष्ट्वा जामदग्न्यः प्रतापवान् । प्रतिजग्राह तां पूजां वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २७ ॥ मुझे अपने समीप आया हुआ देख प्रतापी परशुरामजीने मेरी दी हुई पूजा स्वीकार की और इस प्रकार कहा ॥ २७ ॥
राम उवाच
भीष्म कां बुद्धिमास्थाय काशिराजसुता तदा ।
अकामेन त्वयाऽऽनीता पुनश्चैव विसर्जिता ॥ २८ ॥
परशुरामजी बोले— भीष्म! तुमने किस विचारसे उन दिनों स्वयं पत्नीकी कामनासे रहित होते हुए भी काशिराजकी इस कन्याका अपहरण किया, अपने घर ले आये और पुनः इसे निकाल बाहर किया ॥ २८ ॥
विभ्रंशिता त्वया हीयं धर्मदास्ते यशस्विनी ।
परामृष्टां त्वया हीमां को हि गन्तुमिहार्हति ॥ २९ ॥
तुमने इस यशस्विनी राजकुमारीको धर्मसे भ्रष्ट कर दिया है। तुम्हारे द्वारा इसका स्पर्श कर लिया गया है, ऐसी दशामें इसे दूसरा कौन ग्रहण कर सकता है? ॥ २९ ॥
प्रत्याख्याता हि शाल्वेन त्वयाऽऽनीतेति भारत ।
तस्मादिमां मन्नियोगात् प्रतिगृह्णीष्व भारत ॥ ३० ॥
भारत! तुम इसे हरकर लाये थे। इसी कारणसे शाल्वराजने इसके साथ विवाह करनेसे इन्कार कर दिया है; अतः अब तुम मेरी आज्ञासे इसे ग्रहण कर लो ॥ ३० ॥
स्वधर्मं पुरुषव्याघ्र राजपुत्री लभत्वियम् ।
न युक्तस्त्ववमानोऽयं राज्ञां कर्तुं त्वयानघ ॥ ३१ ॥
पुरुषसिंह! तुम्हें ऐसा करना चाहिये, जिससे इस राजकुमारीको स्वधर्मपालनका अवसर प्राप्त हो। अनघ! तुम्हें राजाओंका इस प्रकार अपमान करना उचित नहीं है ॥ ३१ ॥
ततस्तं वै विमनसमुदीक्ष्याहमथाब्रुवम् ।
नाहमेनां पुनर्दद्यां ब्रह्मन् भ्रात्रे कथंचन ॥ ३२ ॥
तब मैंने परशुरामजीको उदास देखकर इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन्! अब मैं इसका विवाह अपने भाईके साथ किसी प्रकार नहीं कर सकता ॥ ३२ ॥
शाल्वस्याहमिति प्राह पुरा मामेव भार्गव ।
मया चैवाभ्यनुज्ञाता गतेयं नगरं प्रति ॥ ३३ ॥
'भृगुनन्दन! इसने पहले मुझसे ही आकर कहा कि मैं शाल्वकी हूँ, तब मैंने इसे जानेकी आज्ञा दे दी और यह शाल्वराजके नगरको चली गयी ॥ ३३ ॥
न भयान्नाप्यनुक्रोशान्नार्थलोभान्न काम्यया ।
क्षात्रं धर्ममहं जह्यामिति मे व्रतमाहितम् ॥ ३४ ॥
'मैं भयसे, दयासे, धनके लोभसे तथा और किसी कामनासे भी क्षत्रियधर्मका त्याग नहीं कर सकता, यह मेरा स्वीकार किया हुआ व्रत है' ॥ ३४ ॥
अथ मामब्रवीद् रामः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ।
न करिष्यसि चेदेतद् वाक्यं मे नरपुङ्गव ॥ ३५ ॥
हनिष्यामि सहामात्यं त्वामद्येति पुनः पुनः ।
तब यह सुनकर परशुरामजीके नेत्रोंमें क्रोधका भाव व्याप्त हो गया और वे मुझसे इस प्रकार बोले—‘नरश्रेष्ठ! तुम यदि मेरी यह बात नहीं मानोगे तो आज मैं मन्त्रियोंसहित तुम्हें मार डालूँगा।’ इस बातको उन्होंने बार-बार दुहराया ॥ ३५१/२ ॥ संरम्भादब्रवीद् रामः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥ ३६ ॥ तमहं गीर्भिरिष्टाभिः पुनः पुनररिंदम । अयाचं भृगुशार्दूलं न चैव प्रशशाम सः ॥ ३७ ॥ शत्रुदमन दुर्योधन! परशुरामजीने क्रोधभरे नेत्रोंसे देखते हुए बड़े रोषावेशमें आकर यह बात कही थी, तथापि मैं प्रिय वचनोंद्वारा उन भृगुश्रेष्ठ महात्मासे बार-बार शान्त रहनेके लिये प्रार्थना करता रहा; पर वे किसी प्रकार शान्त न हो सके ॥ ३६-३७ ॥ प्रणम्य तमहं मूर्ध्ना भूयो ब्राह्मणसत्तमम् । अब्रुवं कारणं किं तद् यत् त्वं युद्धं मयेच्छसि ॥ ३८ ॥ इष्वस्त्रं मम बालस्य भवतैव चतुर्विधम् । उपदिष्टं महाबाहो शिष्योऽस्मि तव भार्गव ॥ ३९ ॥ तब मैंने उन ब्राह्मणशिरोमणिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर पुनः प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा—‘भगवन्! क्या कारण है कि आप मेरे साथ युद्ध करना चाहते हैं? बाल्यावस्थामें आपने ही मुझे चार प्रकारके धनुर्वेदकी शिक्षा दी है। महाबाहु भार्गव! मैं तो आपका शिष्य हूँ’ ॥ ३८-३९ ॥ ततो मामब्रवीद् रामः क्रोधसंरक्तलोचनः । जानीषे मां गुरुं भीष्म गृह्णासीमां न चैव ह ॥ ४० ॥ सुतां काश्यस्य कौरव्य मत्प्रियार्थं महामते । न हि ते विद्यते शान्तिरन्यथा कुरुनन्दन ॥ ४१ ॥ तब परशुरामजीने क्रोधसे लाल आँखें करके मुझसे कहा—‘महामते भीष्म! तुम मुझे अपना गुरु तो समझते हो; परंतु मेरा प्रिय करनेके लिये काशिराजकी इस कन्याको ग्रहण नहीं करते हो; किंतु कुरुनन्दन! ऐसा किये बिना तुम्हें शान्ति नहीं मिल सकती ॥ ४०-४१ ॥ गृहाणेमां महाबाहो रक्षस्व कुलमात्मनः । त्वया विभ्रंशिता हीयं भर्तारं नाधिगच्छति ॥ ४२ ॥ ‘महाबाहो! इसे ग्रहण कर लो और इस प्रकार अपने कुलकी रक्षा करो। तुम्हारे द्वारा अपनी मर्यादासे गिर जानेके कारण इसे पतिकी प्राप्ति नहीं हो रही है’ ॥ तथा ब्रुवन्तं तमहं रामं परपुरंजयम् । नैतदेवं पुनर्भावि ब्रह्मर्षे किं श्रमेण ते ॥ ४३ ॥ ऐसी बातें करते हुए शत्रुनगरविजयी परशुरामजीसे मैंने स्पष्ट कह दिया—‘ब्रह्मर्षे! अब फिर ऐसी बात नहीं हो सकती। इस विषयमें आपके परिश्रमसे क्या होगा? ॥ ४३ ॥
गुरुत्वं त्वयि सम्प्रेक्ष्य जामदग्न्य पुरातनम् । प्रसादये त्वां भगवंस्त्यक्तैषा तु पुरा मया ॥ ४४ ॥ 'जमदग्निनन्दन! भगवन्! आप मेरे प्राचीन गुरु हैं, यह सोचकर ही मैं आपको प्रसन्न करनेकी चेष्टा कर रहा हूँ। इस अम्बाको तो मैंने पहले ही त्याग दिया था ॥ ४४ ॥ को जातु परभावां हि नारीं व्यालीमिव स्थिताम् । वासयेत गृहे जानन् स्त्रीणां दोषो महात्ययः ॥ ४५ ॥ 'दूसरेके प्रति अनुराग रखनेवाली नारी सर्पिणीके समान भयंकर होती है। कौन ऐसा पुरुष होगा, जो जान-बूझकर उसे कभी भी अपने घरमें स्थान देगा; क्योंकि स्त्रियोंका (परपुरुषमें अनुरागरूप) दोष महान् अनर्थका कारण होता है ॥ ४५ ॥ न भयाद् वासवस्यापि धर्मं जह्यां महाव्रत । प्रसीद मा वा यद् वा ते कार्यं तत् कुरु मा चिरम् ॥ ४६ ॥ 'महान् व्रतधारी राम! मैं इन्द्रके भी भयसे धर्मका त्याग नहीं कर सकता। आप प्रसन्न हों या न हों। आपको जो कुछ करना हो, शीघ्र कर डालिये ॥ ४६ ॥ अयं चापि विशुद्धात्मन् पुराणे श्रूयते विभो । मरुत्तेन महाबुद्धे गीतः श्लोको महात्मना ॥ ४७ ॥ “गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते” ॥ ४८ ॥ 'विशुद्ध हृदयवाले परम बुद्धिमान् राम! पुराणमें महात्मा मरुत्तके द्वारा कहा हुआ यह श्लोक सुननेमें आता है कि यदि गुरु भी गर्वमें आकर कर्तव्य और अकर्तव्यको न समझते हुए कुपथका आश्रय ले तो उसका परित्याग कर दिया जाता है ॥ ४७-४८ ॥ स त्वं गुरुरिति प्रेम्णा मया सम्मानितो भृशम् । गुरुवृत्तिं न जानीषे तस्माद् योत्स्यामि वै त्वया ॥ ४९ ॥ 'आप मेरे गुरु हैं, यह समझकर मैंने प्रेमपूर्वक आपका अधिक-से-अधिक सम्मान किया है; परंतु आप गुरुका-सा बर्ताव नहीं जानते; अतः मैं आपके साथ युद्ध करूँगा ॥ ४९ ॥ गुरुं न हन्यां समरे ब्राह्मणं च विशेषतः । विशेषतस्तपोवृद्धमेवं क्षान्तं मया तव ॥ ५० ॥ 'एक तो आप गुरु हैं। उसमें भी विशेषतः ब्राह्मण हैं। उसपर भी विशेष बात यह है कि आप तपस्यामें बढ़े-चढ़े हैं। अतः आप-जैसे पुरुषको मैं कैसे मार सकता हूँ? यही सोचकर मैंने अबतक आपके तीक्ष्ण बर्तावको चुपचाप सह लिया ॥ ५० ॥ उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा ब्राह्मणं क्षत्रबन्धुवत् । यो हन्यात् समरे क्रुद्धं युध्यन्तमपलायिनम् ॥ ५१ ॥ ब्रह्महत्या न तस्य स्यादिति धर्मेषु निश्चयः ।
क्षत्रियाणां स्थितो धर्मे क्षत्रियोऽस्मि तपोधन ॥ ५२ ॥
'यदि ब्राह्मण भी क्षत्रियकी भाँति धनुष-बाण उठाकर युद्धमें क्रोधपूर्वक सामने आकर युद्ध करने लगे और पीठ दिखाकर भागे नहीं तो उसे इस दशामें देखकर जो योद्धा मार डालता है, उसे ब्रह्महत्याका दोष नहीं लगता, यह धर्मशास्त्रोंका निर्णय है। तपोधन! मैं क्षत्रिय हूँ और क्षत्रियोंके ही धर्ममें स्थित हूँ' ॥ ५१-५२ ॥
यो यथा वर्तते यस्मिंस्तस्मिन्नेव प्रवर्तयन् ।
नाधर्मं समवाप्नोति न चाश्रेयश्च विन्दति ॥ ५३ ॥
'जो जैसा बर्ताव करता है, उसके साथ वैसा ही बर्ताव करनेवाला पुरुष न तो अधर्मको प्राप्त होता है और न अमंगलका ही भागी होता है' ॥ ५३ ॥
अर्थे वा यदि वा धर्मे समर्थो देशकालवित् ।
अर्थसंशयमापन्नः श्रेयान्निःसंशयो नरः ॥ ५४ ॥
'अर्थ (लौकिक कृत्य) और धर्मके विवेचनमें कुशल तथा देश-कालके तत्त्वको जाननेवाला पुरुष यदि अर्थके विषयमें संशय उत्पन्न होनेपर उसे छोड़कर संशयशून्य हृदयसे केवल धर्मका ही अनुष्ठान करे तो वह श्रेष्ठ माना गया है' ॥ ५४ ॥
यस्मात् संशयितेऽप्यर्थेऽयथान्यायं प्रवर्तसे ।
तस्माद् योत्स्यामि सहितस्त्वया राम महाहवे ॥ ५५ ॥
'राम! 'अम्बा ग्रहण करनेयोग्य है या नहीं' यह संशयग्रस्त विषय है तो भी आप इसे ग्रहण करनेके लिये मुझसे न्यायोचित बर्ताव नहीं कर रहे हैं; इसलिये महान् समरांगणमें आपके साथ युद्ध करूँगा' ॥ ५५ ॥
पश्य मे बाहुवीर्यं च विक्रमं चातिमानुषम् ।
एवं गतेऽपि तु मया यच्छक्यं भृगुनन्दन ॥ ५६ ॥
तत् करिष्ये कुरुक्षेत्रे योत्स्ये विप्र त्वया सह ।
द्वन्द्वे राम यथेष्टं मे सज्जीभव महाद्युते ॥ ५७ ॥
'आप उस समय मेरे बाहुबल और अलौकिक पराक्रमको देखियेगा। भृगुनन्दन! ऐसी स्थितिमें भी मैं जो कुछ कर सकता हूँ, उसे अवश्य करूँगा। विप्रवर! मैं कुरुक्षेत्रमें चलकर आपके साथ युद्ध करूँगा। महातेजस्वी राम! आप द्वन्द्वयुद्धके लिये इच्छानुसार तैयारी कर लीजिये' ॥ ५६-५७ ॥
तत्र त्वं निहतो राम मया शरशतार्दितः ।
प्राप्स्यसे निर्जिताँल्लोकान् शस्त्रपूतो महारणे ॥ ५८ ॥
'राम! उस महान् युद्धमें मेरे सैकड़ों बाणोंसे पीड़ित एवं शस्त्रपूत हो मारे जानेपर आप पुण्यकर्मोंद्वारा जीते हुए दिव्य लोकोंको प्राप्त करेंगे' ॥ ५८ ॥
स गच्छ विनिवर्तस्व कुरुक्षेत्रं रणप्रिय ।
तत्रैष्यामि महाबाहो युद्धाय त्वां तपोधन ॥ ५९ ॥
‘युद्धप्रिय महाबाहु तपोधन! अब आप लौटिये और कुरुक्षेत्रमें ही चलिये। मैं युद्धके लिये वहीं आपके पास आऊँगा।। ५९ ।। अपि यत्र त्वया राम कृतं शौचं पुरा पितुः । तत्राहमपि हत्वा त्वां शौचं कर्तास्मि भार्गव ।। ६० ।। ‘भृगुनन्दन परशुराम! जहाँ पूर्वकालमें अपने पिताको अंजलि-दान देकर आपने आत्मशुद्धिका अनुभव किया था, वहीं मैं भी आपको मारकर आत्मशुद्धि करूँगा।। तत्र राम समागच्छ त्वरितं युद्धदुर्मद । व्यपनेष्यामि ते दर्पं पौराणं ब्राह्मणब्रुव ।। ६१ ।। ‘ब्राह्मण कहलानेवाले रणदुर्मद राम! आप तुरंत कुरुक्षेत्रमें पधारिये। मैं वहीं आकर आपके पुरातन दर्पका दलन करूँगा’।। ६१ ।। यच्चापि कत्थसे राम बहुशः परिषत्सु वै । निर्जिताः क्षत्रिया लोके मयैकेनेति तच्छृणु ।। ६२ ।। ‘राम! आप जो बहुत बार भरी सभाओंमें अपनी प्रशंसाके लिये यह कहा करते हैं कि मैंने अकेले ही संसारके समस्त क्षत्रियोंको जीत लिया था तो उसका उत्तर सुन लीजिये।। ६२ ।। न तदा जातवान् भीष्मः क्षत्रियो वापि मद्विधः । पश्चाज्जातानि तेजांसि तृणेषु ज्वलितं त्वया ।। ६३ ।। ‘उन दिनों भीष्म अथवा मेरे-जैसा दूसरा कोई क्षत्रिय नहीं उत्पन्न हुआ था। तेजस्वी क्षत्रिय तो पीछे उत्पन्न हुए हैं। आप तो घास-फूसमें ही प्रज्वलित हुए हैं (तिनकोंके समान दुर्बल क्षत्रियोंपर ही अपना तेज प्रकट किया है)।। ६३ ।। यस्ते युद्धमयं दर्पं कामं च व्यपनाशयेत् । सोऽहं जातो महाबाहो भीष्मः परपुरंजयः । व्यपनेष्यामि ते दर्पं युद्धे राम न संशयः ।। ६४ ।। ‘महाबाहो! जो आपकी युद्धविषयक कामना तथा अभिमानको नष्ट कर सके, वह शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला यह भीष्म तो अब उत्पन्न हुआ है। राम! मैं युद्धमें आपका सारा घमंड चूर-चूर कर दूँगा, इसमें संशय नहीं है’।। ६४ ।।
भीष्म उवाच
ततो मामब्रवीद् रामः प्रहसन्निव भारत । दिष्ट्या भीष्म मया सार्धं योद्धुमिच्छसि संगरे ।। ६५ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**भरतनन्दन! तब परशुरामजीने मुझसे हँसते हुए-से कहा—‘भीष्म! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम रणक्षेत्रमें मेरे साथ युद्ध करना चाहते हो।। ६५ ।।
अयं गच्छामि कौरव्य कुरुक्षेत्रं त्वया सह । भाषितं ते करिष्यामि तत्रागच्छ परंतप ॥ ६६ ॥ तत्र त्वां निहतं माता मया शरशताचितम् । जाह्नवी पश्यतां भीष्म गृध्रकङ्कबलाशनम् ॥ ६७ ॥ 'कुरुनन्दन! यह देखो, मैं तुम्हारे साथ युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें चलता हूँ। परंतप! वहीं आओ। मैं तुम्हारा कथन पूरा करूँगा। वहाँ तुम्हारी माता गंगा तुम्हें मेरे हाथसे मरकर सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त और कौओं, कंकों तथा गीधोंका भोजन बना हुआ देखेगी ॥ ६६-६७ ॥ कृपणं त्वामभिप्रेक्ष्य सिद्धचारणसेविता । मया विनिहतं देवी रोदतामद्य पार्थिव ॥ ६८ ॥ 'राजन्! तुम दीन हो। आज तुम्हें मेरे हाथसे मारा गया देख सिद्ध-चारणसेविता गंगादेवी रुदन करें ॥ ६८ ॥ अतदर्हा महाभागा भगीरथसुतानघा । या त्वामजीजनन्मन्दं युद्धकामुकमातुरम् ॥ ६९ ॥ 'यद्यपि वे महाभागा भगीरथपुत्री पापहीना गंगा यह दुःख देखनेके योग्य नहीं हैं, तथापि जिन्होंने तुम-जैसे युद्धकामी, आतुर एवं मूर्ख पुत्रको जन्म दिया है, उन्हें यह कष्ट भोगना ही पड़ेगा ॥ ६९ ॥ एहि गच्छ मया भीष्म युद्धकामुक दुर्मद । गृहाण सर्वं कौरव्य रथादि भरतर्षभ ॥ ७० ॥ 'युद्धकी इच्छा रखनेवाले मदोन्मत्त भीष्म! आओ, मेरे साथ चलो। भरतश्रेष्ठ कुरुनन्दन! रथ आदि सारी सामग्री साथ ले लो' ॥ ७० ॥ इति ब्रुवाणं तमहं रामं परपुरंजयम् । प्रणम्य शिरसा राममेवमस्त्वित्यथाब्रुवम् ॥ ७१ ॥ शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले परशुरामजीको इस प्रकार कहते देख मैंने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और 'एवमस्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की ॥ ७१ ॥ एवमुक्त्वा ययौ रामः कुरुक्षेत्रं युयुत्सया । प्रविश्य नगरं चाहं सत्यवत्यै न्यवेदयम् ॥ ७२ ॥ ऐसा कहकर परशुरामजी युद्धकी इच्छासे कुरुक्षेत्रमें गये और मैंने नगरमें प्रवेश करके सत्यवतीसे यह सारा समाचार निवेदन किया ॥ ७२ ॥ ततः कृतस्वस्त्ययनो मात्रा च प्रतिनन्दितः । द्विजातीन् वाच्य पुण्याहं स्वस्ति चैव महाद्युते ॥ ७३ ॥ रथमास्थाय रुचिरं राजतं पाण्डुरैर्हयैः । सूपस्करं स्वधिष्ठानं वैयाघ्रपरिवारणम् ॥ ७४ ॥
उपपन्नं महाशस्त्रैः सर्वोपकरणान्वितम् । तत्कुलीनेन वीरेण हयशास्त्रविदा रणे ॥ ७५ ॥ यन्तृं सूतेन शिष्टेन बहुशो दृष्टकर्मणा । महातेजस्वी नरेश! उस समय स्वस्तिवाचन कराकर माता सत्यवतीने मेरा अभिनन्दन किया और मैं ब्राह्मणोंसे पुण्याहवाचन करा उनसे कल्याणकारी आशीर्वाद ले सुन्दर रजतमय रथपर आरूढ़ हुआ। उस रथमें श्वेत रंगके घोड़े जुते हुए थे। उसमें सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री सुन्दर ढंगसे रखी गयी थी। उसकी बैठक बहुत सुन्दर थी। रथके ऊपर व्याघ्रचर्मका आवरण लगाया गया था। वह रथ बड़े-बड़े शस्त्रों तथा समस्त उपकरणोंसे सम्पन्न था। युद्धमें जिसका कार्य अनेक बार देख लिया गया था, ऐसे सुशिक्षित, कुलीन, वीर तथा अश्वशास्त्रके पण्डित सारथिद्वारा उस रथका संचालन और नियन्त्रण होता था ॥ ७३—७५ १/२ ॥
दंशितः पाण्डुरेणाहं कवचेन वपुष्मता ॥ ७६ ॥ पाण्डुरं कार्मुकं गृह्य प्रायां भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ! मैंने अपने शरीरपर श्वेतवर्णका कवच धारण करके श्वेत धनुष हाथमें लेकर यात्रा की ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ॥ ७७ ॥ पाण्डुरैश्चापि व्यजनैर्वीज्यमानो नराधिप । शुक्लवासाः सितोष्णीषः सर्वशुक्लविभूषणः ॥ ७८ ॥ नरेश्वर! उस समय मेरे मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था और मेरे दोनों ओर सफेद रंगके चँवर डुलाये जाते थे। मेरे वस्त्र, मेरी पगड़ी और मेरे समस्त आभूषण श्वेतवर्णके ही थे ॥ ७७-७८ ॥
स्तूयमानो जयाशीर्भिर्निष्क्रम्य गजसाह्वयात् । कुरुक्षेत्रं रणक्षेत्रमुपायां भरतर्षभ ॥ ७९ ॥ विजयसूचक आशीर्वादोंके साथ मेरी स्तुति की जा रही थी। भरतभूषण! उस अवस्थामें मैं हस्तिनापुरसे निकलकर कुरुक्षेत्रके समरांगणमें गया ॥ ७९ ॥
ते हयाश्चोदितास्तेन सूतेन परमाहवे । अवहन् मां भृशं राजन् मनोमारुतरंहसः ॥ ८० ॥ राजन्! मेरे घोड़े मन और वायुके समान वेगशाली थे। सारथिके हाँकनेपर उन्होंने बात-की-बातमें मुझे उस महान् युद्धके स्थानपर पहुँचा दिया ॥ ८० ॥
गत्वाहं तत् कुरुक्षेत्रं स च रामः प्रतापवान् । युद्धाय सहसा राजन् पराक्रान्तौ परस्परम् ॥ ८१ ॥ राजन्! मैं तथा प्रतापी परशुरामजी दोनों कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर युद्धके लिये सहसा एक-दूसरेको पराक्रम दिखानेके लिये उद्यत हो गये ॥ ८१ ॥