महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
रत्नाकरास्तथा नद्यस्तेषां नामानि मे शृणु ।
**संजय बोले—**राजन्! शाकद्वीपमें भी मणियोंसे विभूषित सात पर्वत हैं। वहाँ रत्नोंकी बहुत-सी खानें तथा नदियाँ भी हैं। उनके नाम मुझसे सुनिये ।। १३ १/२ ।।
अतीव गुणवत् सर्वं तत्र पुण्यं जनाधिप ।। १४ ।।
देवर्षिगन्धर्वयुतः प्रथमो मेरुरुच्यते ।
प्रागायतो महाराज मलयो नाम पर्वत: ।। १५ ।।
जनेश्वर! वहाँका सब कुछ परम पवित्र और अत्यन्त गुणकारी है। वहाँका प्रधान पर्वत है मेरु, जो देवर्षियों तथा गन्धर्वोंसे सेवित है। महाराज! दूसरे पर्वतका नाम मलय है, जो पूर्वसे पश्चिमकी ओर फैला हुआ है ।। १४-१५ ।।
ततो मेघाः प्रवर्तन्ते प्रभवन्ति च सर्वशः ।
ततः परेण कौरव्य जलधारो महागिरिः ।। १६ ।।
मेघ वहींसे उत्पन्न होते हैं, फिर वे सब ओर फैलकर जलकी वर्षा करनेमें समर्थ होते हैं। कुरुनन्दन! उसके बाद जलधार नामक महान् पर्वत है ।। १६ ।।
ततो नित्यमुपादत्ते वासवः परमं जलम् ।
ततो वर्षं प्रभवति वर्षकाले जनेश्वर ।। १७ ।।
जनेश्वर! इन्द्र वहींसे सदा उत्तम जल ग्रहण करते हैं। इसीलिये वर्षाकालमें वे यथेष्ट जल बरसानेमें समर्थ होते हैं ।। १७ ।।
उच्चैर्गिरी रैवतको यत्र नित्यं प्रतिष्ठिता ।
रेवती दिवि नक्षत्रं पितामहकृतो विधिः ।। १८ ।।
उसी द्वीपमें उच्चतम रैवतक पर्वत है, जहाँ आकाशमें रेवती नामक नक्षत्र नित्य प्रतिष्ठित है। यह ब्रह्माजीका रचा हुआ विधान है ।। १८ ।।
उत्तरेण तु राजेन्द्र श्यामो नाम महागिरिः ।
नवमेघप्रभः प्रांशुः श्रीमानुज्ज्वलविग्रहः ।। १९ ।।
राजेन्द्र! उसके उत्तर भागमें श्याम नामक महान् पर्वत है, जो नूतन मेघके समान श्याम शोभासे युक्त है। उसकी ऊँचाई बहुत है। उसका कान्तिमान् कलेवर परम उज्ज्वल है ।। १९ ।।
यतः श्यामत्वमापन्नाः प्रजा जनपदेश्वर ।
जनपदेश्वर! वहाँ रहनेसे ही वहाँकी प्रजा श्यामताको प्राप्त हुई है ।। १९ १/२ ।।
धृतराष्ट्र उवाच
सुमहान् संशयो मेऽद्य प्रोक्तोऽयं संजय त्वया ।
प्रजाः कथं सूतपुत्र सम्प्राप्ताः श्यामतामिह ।। २० ।।
**धृतराष्ट्र बोले—**सूतपुत्र संजय! यह तो तुमने आज मुझसे महान् संशयकी बात कही है। भला, वहाँ रहनेमात्रसे प्रजा श्यामताको कैसे प्राप्त हो गयी? ।। २० ।।
संजय उवाच
सर्वेष्वेव महाराज द्वीपेषु कुरुनन्दन ।
गौरः कृष्णश्च वर्णौ द्वौ तयोर्वर्णान्तरं नृप ।। २१ ।।
श्यामो यस्मात् प्रवृत्तो वै तत् ते वक्ष्यामि भारत ।
आस्तेऽत्र भगवान् कृष्णस्तत्कान्त्या श्यामतां गतः ।। २२ ।।
**संजयने कहा—**महाराज कुरुनन्दन! सम्पूर्ण द्वीपोंमें गौर, कृष्ण तथा इन दोनों वर्णोंका सम्मिश्रण देखा जाता है। भारत! यह पर्वत जिस कारणसे श्याम होकर दूसरोंमें भी श्यामता उत्पन्न करनेवाला हुआ, वह आपको बताता हूँ। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण निवास करते हैं; अतः उन्हींकी कान्तिसे यह (स्वयं भी) श्यामताको प्राप्त हुआ है (और अपने समीप रहनेवाली प्रजामें भी श्यामता उत्पन्न कर देता है) ।। २१-२२ ।।
ततः परं कौरवेन्द्र दुर्गशैलो महोदयः ।
केसरः केसरयुतो यतो वातः प्रवर्तते ।। २३ ।।
कौरवराज! श्यामगिरिके बाद बहुत ऊँचा दुर्ग शैल है। उसके बाद केसर पर्वत है, जहाँसे चली हुई वायु केसरकी सुगन्ध लिये बहती है ।। २३ ।।
तेषां योजनविष्कम्भो द्विगुणः प्रविभागशः ।
वर्षाणि तेषु कौरव्य सप्तोक्तानि मनीषिभिः ।। २४ ।।
इन सब पर्वतोंका विस्तार दूना होता गया है। कुरुनन्दन! मनीषी पुरुषोंने उन पर्वतोंके समीप सात वर्ष बताये हैं ।। २४ ।।
महामेरुर्महाकाशो जलदः कुमुदोत्तरः ।
जलधारो महाराज सुकुमार इति स्मृतः ।। २५ ।।
महामेरु पर्वतके समीप महाकाशवर्ष है, जलद या मलयके निकट कुमुदोत्तरवर्ष है। महाराज! जलधार गिरिका पार्श्ववर्ती वर्ष सुकुमार बताया गया है ।। २५ ।।
रैवतस्य तु कौमारः श्यामस्य मणिकाञ्चनः ।
केसरस्याथ मोदाकी परेण तु महापुमान् ।। २६ ।।
रैवतक पर्वतका कुमारवर्ष तथा श्यामगिरिका मणिकांचनवर्ष है। इसी प्रकार केसरके समीपवर्ती वर्षको मोदाकी कहते हैं। उसके आगे महापुमान् नामक एक पर्वत है ।। २६ ।।
परिवार्य तु कौरव्य दैर्घ्यं ह्रस्वत्वमेव च ।
जम्बूद्वीपेन संख्यातस्तस्य मध्ये महाद्रुमः ।। २७ ।।
शाको नाम महाराज प्रजा तस्य सदानुगा ।
तत्र पुण्या जनपदाः पूज्यते तत्र शंकरः ।। २८ ।।
वह उस द्वीपकी लंबाई और चौड़ाई सबको घेरकर खड़ा है। महाराज! उसके बीचमें शाक नामक एक बड़ा भारी वृक्ष है, जो जम्बूद्वीपके समान ही विशाल है। महाराज! वहाँकी प्रजा सदा उस शाकवृक्षके ही आश्रित रहती है। वहाँ बड़े पवित्र जनपद हैं। उस द्वीपमें भगवान् शंकरकी आराधना की जाती है ।। २७-२८ ।।
तत्र गच्छन्ति सिद्धाश्च चारणा दैवतानि च । धार्मिकाश्च प्रजा राजंश्चत्वारोऽतीव भारत ।। २९ ।। राजन्! भरतनन्दन! वहाँ सिद्ध, चारण और देवता जाते हैं। वहाँके चारों वर्णोंकी प्रजा अत्यन्त धार्मिक होती है ।। २९ ।।
वर्णाः स्वकर्मनिरता न च स्तेनोऽत्र दृश्यते । दीर्घायुषो महाराज जरामृत्युविवर्जिताः ।। ३० ।। सभी वर्णके लोग वहाँ अपने-अपने वर्णाश्रमोचित कर्मका पालन करते हैं। वहाँ कोई चोर नहीं दिखायी देता। महाराज! उस द्वीपके निवासी दीर्घायु तथा जरा और मृत्युसे रहित होते हैं ।। ३० ।।
प्रजास्तत्र विवर्धन्ते वर्षास्विव समुद्रगाः । नद्यः पुण्यजलास्तत्र गङ्गा च बहुधा गता ।। ३१ ।। जैसे वर्षा-ऋतुमें समुद्रगामिनी नदियाँ बढ़ जाती हैं, उसी प्रकार वहाँकी समस्त प्रजा सदा वृद्धिको प्राप्त होती रहती है। उस द्वीपमें अनेक पवित्र जलवाली नदियाँ बहती हैं। वहाँ गंगा भी अनेक धाराओंमें विभक्त देखी जाती हैं ।। ३१ ।।
सुकुमारी कुमारी च शीताशी वेणिका तथा । महानदी च कौरव्य तथा मণিজला नदी ।। ३२ ।। चक्षुर्वर्धनिका चैव नदी भरतसत्तम । तत्र प्रवृत्ताः पुण्योदा नद्यः कुरुकुलोद्वह ।। ३३ ।। कुरूनन्दन! भरतश्रेष्ठ! उस द्वीपमें सुकुमारी, कुमारी, शीताशी, वेणिका, महानदी, मণিজला तथा चक्षुर्वर्धनिका आदि पवित्र जलवाली नदियाँ बहती हैं ।। ३२-३३ ।।
सहस्त्राणां शतान्येव यतो वर्षति वासवः । न तासां नामधेयानि परिमाणं तथैव च ।। ३४ ।। शक्यन्ते परिसंख्यातुं पुण्यास्ता हि सरिद्वराः । तव पुण्या जनपदाश्चत्वारो लोकसम्मताः ।। ३५ ।। वहाँ लाखों ऐसी नदियाँ हैं, जिनसे जल लेकर इन्द्र वर्षा करते हैं। उनके नाम और परिमाणकी संख्या बताना कठिन ही नहीं, असम्भव है। वे सभी श्रेष्ठ नदियाँ परम पुण्यमयी हैं। उस द्वीपमें लोकसम्मानित चार पवित्र जनपद हैं ।। ३४-३५ ।।
मङ्गाश्च मशकाश्चैव मानसा मन्दगास्तथा । मङ्गा ब्राह्मणभूयिष्ठाः स्वकर्मनिरता नृप ।। ३६ ।।
उनके नाम इस प्रकार हैं—मंग, मशक, मानस तथा मन्दग। नरेश्वर! उनमेंसे मंग जनपदमें अधिकतर ब्राह्मण निवास करते हैं। वे सब-के-सब अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहते हैं॥ ३६॥
मशकेषु तु राजन्या धार्मिकाः सर्वकामदाः।
मानसाश्च महाराज वैश्यधर्मोपजीविनः॥ ३७॥
सर्वकामसमायुक्ताः शूरा धर्मार्थनिश्चिताः।
महाराज! मशक जनपदमें सम्पूर्ण कामनाओंके देनेवाले धर्मात्मा क्षत्रिय निवास करते हैं। मानस जनपदके निवासी वैश्यवृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते हैं। वे सर्वभोगसम्पन्न, शूरवीर, धर्म और अर्थको समझनेवाले एवं दृढ़निश्चयी होते हैं॥ ३७ १/२॥
शूद्रास्तु मन्दगा नित्यं पुरुषा धर्मशीलिनः॥ ३८॥
मन्दग जनपदमें शूद्र रहते हैं। वे भी धर्मात्मा होते हैं॥ ३८॥
न तत्र राजा राजेन्द्र न दण्डो न च दण्डिकः।
स्वधर्मेणैव धर्मज्ञास्ते रक्षन्ति परस्परम्॥ ३९॥
राजेन्द्र! वहाँ न कोई राजा है, न दण्ड है और न दण्ड देनेवाला है। वहाँके लोग धर्मके ज्ञाता हैं और स्वधर्मपालनके ही प्रभावसे एक-दूसरेकी रक्षा करते हैं॥ ३९॥
एतावदेव शक्यं तु तत्र द्वीपे प्रभाषितुम्।
एतदेव च श्रोतव्यं शाकद्वीपे महौजसि॥ ४०॥
महाराज! उस महान् तेजोमय शाकद्वीपके सम्बन्धमें इतना ही कहा जा सकता है और इतना ही सुनना चाहिये॥ ४०॥
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भूमिपर्वणि शाकद्वीपवर्णने एकादशोऽध्यायः॥ ११॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भूमिपर्वमें शाकद्वीपवर्णनविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ११॥
कुश, क्रौंच और पुष्कर आदि द्वीपोंका तथा राहु, सूर्य एवं चन्द्रमाके प्रमाणका वर्णन
द्वादशोऽध्यायः
कुश, क्रौंच और पुष्कर आदि द्वीपोंका तथा राहु, सूर्य एवं चन्द्रमाके प्रमाणका वर्णन
संजय उवाच
उत्तरेषु च कौरव्य द्वीपेषु श्रूयते कथा ।
एवं तत्र महाराज ब्रुवतश्च निबोध मे ॥ १ ॥
**संजय बोले—**महाराज! कुरुनन्दन! इसके बादवाले द्वीपोंके विषयमें जो बातें सुनी जाती हैं, वे इस प्रकार हैं; उन्हें आप मुझसे सुनिये ॥ १ ॥
घृततोयः समुद्रोऽत्र दधिमण्डोदकोऽपरः ।
सुरोदः सागरश्चैव तथान्यो जलसागरः ॥ २ ॥
क्षीरोद समुद्रके बाद घृतोद समुद्र है। फिर दधिमण्डोदक समुद्र है। इनके बाद सुरोद समुद्र है, फिर मीठे पानीका सागर है ॥ २ ॥
परस्परेण द्विगुणाः सर्वे द्वीपा नराधिप ।
पर्वताश्च महाराज समुद्रैः परिवारिताः ॥ ३ ॥
महाराज! इन समुद्रोंसे घिरे हुए सभी द्वीप और पर्वत उत्तरोत्तर दुगुने विस्तारवाले हैं ॥ ३ ॥
गौरस्तु मध्यमे द्वीपे गिरिर्मनःशिलो महान् ।
पर्वतः पश्चिमे कृष्णो नारायणसखो नृप ॥ ४ ॥
नरेश्वर! इनमेंसे मध्यम द्वीपमें मनःशिला (मैनसिल)-का एक बहुत बड़ा पर्वत है; जो 'गौर' नामसे विख्यात है। उसके पश्चिममें 'कृष्ण' पर्वत है, जो नारायणको विशेष प्रिय है ॥ ४ ॥
तत्र रत्नानि दिव्यानि स्वयं रक्षति केशवः ।
प्रसन्नश्चाभवत् तत्र प्रजानां व्यदधत् सुखम् ॥ ५ ॥
स्वयं भगवान् केशव ही वहाँ दिव्य रत्नोंको रखते और उनकी रक्षा करते हैं। वे वहाँकी प्रजापर प्रसन्न हुए थे, इसलिये उनको सुख पहुँचानेकी व्यवस्था उन्होंने स्वयं की है ॥ ५ ॥
कुशस्तम्बः कुशद्वीपे मध्ये जनपदैः सह ।
सम्पूज्यते शाल्मलिश्च द्वीपे शाल्मलिके नृप ॥ ६ ॥
नरेश्वर! कुशद्वीपमें कुशोंका एक बहुत बड़ा झाड़ है, जिसकी वहाँके जनपदोंमें रहनेवाले लोग पूजा करते हैं। उसी प्रकार शाल्मलिद्वीपमें शाल्मलि (सेंमर) वृक्षकी पूजा की जाती है ॥ ६ ॥
क्रौञ्चद्वीपे महाक्रौञ्चो गिरी रत्नचयाकरः ।
सम्पूज्यते महाराज चातुर्वर्ण्येन नित्यदा ॥ ७ ॥
क्रौञ्चद्वीपमें महाक्रौञ्च नामक एक महान् पर्वत है, जो रत्नराशिकी खान है। महाराज! वहाँ चारों वर्णोंके लोग सदा उसीकी पूजा करते हैं ॥ ७ ॥
गोमन्तः पर्वतो राजन् सुमहान् सर्वधातुकः ।
यत्र नित्यं निवसति श्रीमान् कमललोचनः ॥ ८ ॥
मोक्षिभिः संस्तुतो नित्यं प्रभुर्नारायणो हरिः ।
राजन्! वहीं गोमन्त नामक विशाल पर्वत है, जो सम्पूर्ण धातुओंसे सम्पन्न है। वहाँ मोक्षकी इच्छा रखनेवाले उपासकोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए सबके स्वामी श्रीमान् कमलनयन भगवान् नारायण नित्य निवास करते हैं ॥ ८ ½ ॥
कुशद्वीपे तु राजेन्द्र पर्वतो विद्रुमैश्चितः ॥ ९ ॥
सुधामा नाम दुर्धर्षो द्वितीयो हेमपर्वतः ।
राजेन्द्र! कुशद्वीपमें सुधामा नामसे प्रसिद्ध दूसरा सुवर्णमय पर्वत है, जो मूँगोंसे भरा हुआ और दुर्गम है ॥ ९ ½ ॥
द्युतिमान् नाम कौरव्य तृतीयः कुमुदो गिरिः ॥ १० ॥
चतुर्थः पुष्पवान् नाम पञ्चमस्तु कुशेशयः ।
षष्ठो हरिगिरिर्नाम षडेते पर्वतोत्तमाः ॥ ११ ॥
कौरव्य! वहीं परम कान्तिमान् कुमुद नामक तीसरा पर्वत है। चौथा पुष्पवान्, पाँचवाँ कुशेशय और छठा हरिगिरि है। ये छः कुशद्वीपके श्रेष्ठ पर्वत हैं ॥ १०-११ ॥
तेषामन्तरविष्कम्भो द्विगुणः सर्वभागशः ।
औद्भिदं प्रथमं वर्षं द्वितीयं वेणुमण्डलम् ॥ १२ ॥
इन पर्वतोंके बीचका विस्तार सब ओरसे उत्तरोत्तर दूना होता गया है। कुशद्वीपके पहले वर्षका नाम उद्भिद् है। दूसरेका नाम वेणुमण्डल है ॥ १२ ॥
तृतीयं सुरथाकारं चतुर्थं कम्बलं स्मृतम् ।
धृतिमत् पञ्चमं वर्षं षष्ठं वर्षं प्रभाकरम् ॥ १३ ॥
तीसरेका नाम सुरथाकार, चौथेका कम्बल, पाँचवेंका धृतिमान् और छठे वर्षका नाम प्रभाकर है ॥ १३ ॥
सप्तमं कापिलं वर्षं सप्तैते वर्षलम्भकाः ।
एतेषु देवगन्धर्वाः प्रजाश्च जगतीश्वर ॥ १४ ॥
विहरन्ते रमन्ते च न तेषु म्रियते जनः ।
न तेषु दस्यवः सन्ति म्लेच्छजात्योऽपि वा नृप ॥ १५ ॥
सातवाँ वर्ष कापिल कहलाता है। ये सात वर्षसमुदाय हैं। पृथ्वीपते! इन सबमें देवता, गन्धर्व तथा मनुष्य सानन्द विहार करते हैं। उनमेंसे किसीकी मृत्यु नहीं होती है। नरेश्वर!
वहाँ लुटेरे अथवा म्लेच्छ-जातिके लोग नहीं हैं ।। १४-१५ ।। गौरप्रायो जनः सर्वः सुकुमारश्च पार्थिव । अवशिष्टेषु सर्वेषु वक्ष्यामि मनुजेश्वर ।। १६ ।। मनुजेश्वर! इन वर्षोंके सभी लोग प्रायः गोरे और सुकुमार होते हैं। अब मैं शेष सम्पूर्ण द्वीपोंके विषयमें बताता हूँ ।। १६ ।। यथाश्रुतं महाराज तदव्यग्रमनाः शृणु । क्रौञ्चद्वीपे महाराज क्रौञ्चो नाम महागिरिः ।। १७ ।। महाराज! मैंने जैसा सुन रखा है, वैसा ही सुनाऊँगा। आप शान्तचित्त होकर सुनिये। क्रौंचद्वीपमें क्रौंच नामक विशाल पर्वत है ।। १७ ।। क्रौञ्चात् परो वामनको वामनादन्धकारकः । अन्धकारात् परो राजन् मैनाकः पर्वतोत्तमः ।। १८ ।। मैनाकात् परतो राजन् गोविन्दो गिरिरुत्तमः । गोविन्दात् परतो राजन् निबिडो नाम पर्वतः ।। १९ ।। राजन्! क्रौंचके बाद वामन पर्वत है, वामनके बाद अन्धकार और अन्धकारके बाद मैनाक नामक श्रेष्ठ पर्वत है। प्रभो! मैनाकके बाद उत्तम गोविन्द गिरि है। गोविन्दके बाद निबिड नामक पर्वत है ।। १८-१९ ।। परस्तु द्विगुणस्तेषां विष्कम्भो वंशवर्धन । देशांस्तत्र प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु ।। २० ।। कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले महाराज! इन पर्वतोंके बीचका विस्तार उत्तरोत्तर दूना होता गया है। उनमें जो देश बसे हुए हैं, उनका परिचय देता हूँ; सुनिये ।। २० ।। क्रौञ्चस्य कुशलो देशो वामनस्य मनोनुगः । मनोनुगात् परश्चोष्णो देशः कुरुकुलोद्वह ।। २१ ।। क्रौंचपर्वतके निकट कुशल नामक देश है। वामन-पर्वतके पास मनोनुग देश है। कुरुकुलश्रेष्ठ! मनोनुगके बाद उष्ण देश आता है ।। २१ ।। उष्णात् परः प्रावरकः प्रावारादन्धकारकः । अन्धकारकदेशात् तु मुनिदेशः परः स्मृतः ।। २२ ।। उष्णके बाद प्रावरक, प्रावरकके बाद अन्धकारक और अन्धकारकके बाद उत्तम मुनिदेश बताया गया है ।। २२ ।। मुनिदेशात् परश्चैव प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः । सिद्धचारणसंकीर्णो गौरप्रायो जनाधिप ।। २३ ।। एते देशा महाराज देवगन्धर्वसेविताः ।
मुनिदेशके बाद जो देश है, उसे दुन्दुभिस्वन कहते हैं। वह सिद्धों और चारणोंसे भरा हुआ है। जनेश्वर! वहाँके लोग प्रायः गोरे होते हैं। महाराज! इन सभी देशोंमें देवता और गन्धर्व निवास करते हैं ।। २३ १/२ ।।
पुष्करे पुष्करो नाम पर्वतो मणिरत्नवान् ।। २४ ।। पुष्करद्वीपमें पुष्कर नामक पर्वत है, जो मणियों तथा रत्नोंसे भरा हुआ है ।। २४ ।।
तत्र नित्यं प्रभवति स्वयं देवः प्रजापतिः । तं पर्युपासते नित्यं देवाः सर्वे महर्षयः ।। २५ ।। वाग्भिर्मनोऽनुकूलाभिः पूजयन्तो जनाधिप । वहाँ स्वयं प्रजापति भगवान् ब्रह्मा नित्य निवास करते हैं। जनेश्वर! सम्पूर्ण देवता और महर्षि मनोनुकूल वचनोंद्वारा प्रतिदिन उनकी पूजा करते हुए सदा उन्हींकी उपासनामें लगे रहते हैं ।। २५ १/२ ।।
जम्बूद्वीपात् प्रवर्तन्ते रत्नानि विविधान्युत ।। २६ ।। द्वीपेषु तेषु सर्वेषु प्रजानां कुरुसत्तम । ब्रह्मचर्येण सत्येन प्रजानां हि दमेन च ।। २७ ।। आरोग्यायःप्रमाणाभ्यां द्विगुणं द्विगुणं ततः । जम्बूद्वीपसे अनेक प्रकारके रत्न अन्यान्य सब द्वीपोंमें वहाँकी प्रजाओंके उपयोगके लिये भेजे जाते हैं। कुरुश्रेष्ठ! ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्द्रियसंयमके प्रभावसे उन सब द्वीपोंकी प्रजाओंके आरोग्य और आयुका प्रमाण जम्बूद्वीपकी अपेक्षा उत्तरोत्तर दूना माना गया है ।।
एको जनपदो राजन् द्वीपेष्वेतेषु भारत । उक्ता जनपदा येषु धर्मश्चैकः प्रदृश्यते ।। २८ ।। भरतवंशी नरेश! वास्तवमें इन देशोंमें एक ही जनपद है। जिन द्वीपोंमें अनेक जनपद बताये गये हैं, उनमें भी एक प्रकारका ही धर्म देखा जाता है ।। २८ ।।
ईश्वरो दण्डमुद्यम्य स्वयमेव प्रजापतिः । द्वीपानेतान् महाराज रक्षंस्तिष्ठति नित्यदा ।। २९ ।। महाराज! सबके ईश्वर प्रजापति ब्रह्मा स्वयं ही दण्ड लेकर इन द्वीपोंकी रक्षा करते हुए इनमें नित्य निवास करते हैं ।। २९ ।।
स राजा स शिवो राजन् स पिता प्रपितामहः । गोपायति नरश्रेष्ठ प्रजाः सजडपण्डिताः ।। ३० ।। नरश्रेष्ठ! प्रजापति ही वहाँके राजा हैं। वे कल्याणस्वरूप होकर सबका कल्याण करते हैं। राजन्! वे ही पिता और प्रपितामह हैं। जडसे लेकर चेतनतक समस्त प्रजाकी वे ही रक्षा करते हैं ।। ३० ।।
भोजनं चात्र कौरव्य प्रजाः स्वयमुपस्थितम् । सिद्धमेव महाबाहो तद्धि भुञ्जन्ति नित्यदा ।। ३१ ।।
महाबाहु कुरुनन्दन! यहाँकी प्रजाओंके पास सदा पका-पकाया भोजन स्वयं उपस्थित हो जाता है और उसीको खाकर वे लोग रहते हैं ।। ३१ ।। ततः परं समा नाम दृश्यते लोकसंस्थितिः । चतुरस्रं महाराज त्रयस्त्रिंशत् तु मण्डलम् ।। ३२ ।। उसके बाद समानामवाली लोगोंकी बस्ती देखी जाती है। महाराज! वह चौकोर बसी हुई है। उसमें तैंतीस मण्डल हैं ।। ३२ ।। तत्र तिष्ठन्ति कौरव्य चत्वारो लोकसम्मताः । दिग्गजा भरतश्रेष्ठ वामनैरावतादयः ।। ३३ ।। कुरुनन्दन! भरतश्रेष्ठ! वहाँ लोकविख्यात वामन, ऐरावत, सुप्रतीक और अंजन—ये चार दिग्गज रहते हैं ।। सुप्रतीकस्तथा राजन् प्रभिन्नकरटामुखः । तस्याहं परिमाणं तु न संख्यातुमिहोत्सहे ।। ३४ ।। असंख्यातः स नित्यं हि तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा । राजन्! इनमेंसे सुप्रतीक नामक गजराज, जिसके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती रहती है, उसका परिमाण कैसा और कितना है, यह मैं नहीं बता सकता। वह नीचे-ऊपर तथा अगल-बगलमें सब ओर फैला हुआ है। वह अपरिमित है ।। ३४ १/२ ।। तत्र वै वायवो वान्ति दिग्भ्यः सर्वाभ्य एव हि ।। ३५ ।। असम्बद्धा महाराज तान् निगृह्णन्ति ते गजाः । पुष्करैः पद्मसंकाशैर्विकसद्भिर्महाप्रभैः ।। ३६ ।। शतधा पुनरेवाशु ते तान् मुञ्चन्ति नित्यशः । श्वसद्भिर्मुच्यमानास्तु दिग्गजैरिह मारुताः ।। ३७ ।। आगच्छन्ति महाराज ततस्तिष्ठन्ति वै प्रजाः । वहाँ सब दिशाओंसे खुली हुई हवा आती है। उसे वे चारों दिग्गज ग्रहण करके रोक रखते हैं। फिर वे विकसित कमलसदृश परम कान्तिमान् शुण्डदण्डके अग्रभागसे उस हवाको सैकड़ों भागोंमें करके तुरंत ही सब ओर छोड़ते हैं, यह उनका नित्यका काम है। महाराज! साँस लेते हुए उन दिग्गजोंके मुखसे मुक्त होकर जो वायु यहाँ आती है, उसीसे सारी प्रजा जीवन धारण करती है ।।
धृतराष्ट्र उवाच परो वै विस्तरोऽत्यर्थं त्वया संजय कीर्तितः ।। ३८ ।। दर्शितं द्वीपसंस्थानमुत्तरं ब्रूहि संजय । धृतराष्ट्र बोले—संजय! तुमने द्वीपोंकी स्थितिके विषयमें तो बड़े विस्तारके साथ वर्णन किया है। अब जो अन्तिम विषय—सूर्य, चन्द्रमा तथा राहुका प्रमाण बताना शेष रह गया है,
उसका वर्णन करो ।। ३८ ½ ।।
संजय उवाच
उक्ता द्वीपा महाराज ग्रहं वै शृणु तत्त्वतः ।। ३९ ।। स्वर्भानोः कौरवश्रेष्ठ यावदेव प्रमाणतः । परिमण्डलो महाराज स्वर्भानुः श्रूयते ग्रहः ।। ४० ।। **संजय बोले—**महाराज! मैंने द्वीपोंका वर्णन तो कर दिया। अब ग्रहोंका यथार्थ वर्णन सुनिये। कौरव-श्रेष्ठ! राहुकी जितनी बड़ी लंबाई-चौड़ाई सुननेमें आती है, वह आपको बताता हूँ। महाराज! सुना है कि राहु ग्रह मण्डलाकार है ।। ३९-४० ।। योजनानां सहस्राणि विष्कम्भो द्वादशास्य वै । परिणाहेन षट्त्रिंशद् विपुलत्वेन चानघ ।। ४१ ।। निष्पाप नरेश! राहु ग्रहका व्यासगत विस्तार बारह हजार योजन है और उसकी परिधिका विस्तार छत्तीस हजार योजन है ।। ४१ ।। षष्टिमाहुः शतान्यस्य बुधाः पौराणिकास्तथा । चन्द्रमास्तु सहस्राणि राजन्नेकादश स्मृतः ।। ४२ ।। पौराणिक विद्वान् उसकी विपुलता (मोटाई) छः हजार योजनकी बताते हैं। राजन्! चन्द्रमाका व्यास ग्यारह हजार योजन है ।। ४२ ।। विष्कम्भेन कुरुश्रेष्ठ त्रयस्त्रिंशत् तु मण्डलम् । एकोनषष्टिविष्कम्भं शीतरश्मेर्महात्मनः ।। ४३ ।। कुरुश्रेष्ठ! उनकी परिधि या मण्डलका विस्तार तैंतीस हजार योजन बताया गया है और महामना शीतरश्मि चन्द्रमाका वैपुल्यगत विस्तार (मोटाई) उनसठ सौ योजन है ।। ४३ ।। सूर्यस्त्वष्टौ सहस्राणि द्वे चान्ये कुरुनन्दन । विष्कम्भेन ततो राजन् मण्डलं त्रिंशता समम् ।। ४४ ।। अष्टपञ्चाशतं राजन् विपुलत्वेन चानघ । श्रूयते परमोदारः पतगोऽसौ विभावसुः ।। ४५ ।। कुरुनन्दन! सूर्यका व्यासगत विस्तार दस हजार योजन है और उनकी परिधि या मण्डलका विस्तार तीस हजार योजन है तथा उनकी विपुलता अट्ठावन सौ योजनकी है। अनघ! इस प्रकार शीघ्रगामी परम उदार भगवान् सूर्यके त्रिविध विस्तारका वर्णन सुना जाता है ।। ४४-४५ ।। एतत् प्रमाणमर्कस्य निर्दिष्टमिह भारत । स राहुश्छादयत्येतौ यथाकालं महत्तया ।। ४६ ।। चन्द्रादित्यौ महाराज संक्षेपोऽयमुदाहृतः । इत्येतत् ते महाराज पृच्छतः शास्त्रचक्षुषा ।। ४७ ।।
सर्वमुक्तं यथातत्त्वं तस्माच्छममवाप्नुहि ।
भारत! यहाँ सूर्यका प्रमाण बताया गया, इन दोनोंसे अधिक विस्तार रखनेके कारण राहु यथासमय इन सूर्य और चन्द्रमाको आच्छादित कर लेता है। महाराज! आपके प्रश्नके अनुसार शास्त्रदृष्टिसे ग्रहोंके विषयमें संक्षेपसे बताया गया। ये सारी बातें मैंने आपके सामने यथार्थरूपसे उपस्थित की हैं। अतः आप शान्ति धारण कीजिये ।। ४६-४७ १/२ ।।
यथोद्दिष्टं मया प्रोक्तं सनिर्माणमिदं जगत् ।। ४८ ।।
तस्मादाश्वस कौरव्य पुत्रं दुर्योधनं प्रति ।
इस जगत्का स्वरूप कैसा है और इसका निर्माण किस प्रकार हुआ है, ये सब बातें मैंने शास्त्रोक्त रीतिसे बतायी हैं; अतः कुरुनन्दन! आप अपने पुत्र दुर्योधनकी ओरसे निश्चिन्त रहिये ।। ४८ १/२ ।।
श्रुत्वेदं भरतश्रेष्ठ भूमिपर्व मनोऽनुगम् ।। ४९ ।।
श्रीमान् भवति राजन्यः सिद्धार्थः साधुसम्मतः ।
आयुर्बलं च कीर्तिश्च तस्य तेजश्च वर्धते ।। ५० ।।
भरतश्रेष्ठ! जो राजा इस भूमिपर्वको मनोयोगपूर्वक सुनता है, वह श्रीसम्पन्न, सफलमनोरथ तथा श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित होता है और उसके बल, आयु, कीर्ति तथा तेजकी वृद्धि होती है ।। ४९-५० ।।
यः शृणोति महीपाल पर्वणीदं यतव्रतः ।
प्रीयन्ते पितरस्तस्य तथैव च पितामहाः ।। ५१ ।।
भूपाल! जो मनुष्य दृढ़तापूर्वक संयम एवं व्रतका पालन करते हुए प्रत्येक पर्वके दिन इस प्रसंगको सुनता है, उसके पितर और पितामह पूर्ण तृप्त होते हैं ।। ५१ ।।
इदं तु भारतं वर्षं यत्र वर्तामहे वयम् ।
पूर्वैः प्रवर्तितं पुण्यं तत् सर्वं श्रुतवानसि ।। ५२ ।।
राजन्! जिसमें हमलोग निवास करते हैं और जहाँ हमारे पूर्वजोंने पुण्यकर्मोंका अनुष्ठान किया है, यह वही भारतवर्ष है। आपने इसका पूरा-पूरा वर्णन सुन लिया है ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भूमिपर्वणि उत्तरद्वीपादिसंस्थानवर्णने
द्वादशोऽध्यायः ।। १२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भूमिपर्वमें उत्तरद्वीपादिसंस्थानवर्णनविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।
(श्रीमद्भगवद्गीतापर्व)
(श्रीमद्भगवद्गीतापर्व)
त्रयोदशोऽध्यायः
संजयका युद्धभूमिसे लौटकर धृतराष्ट्रको भीष्मकी मृत्युका समाचार सुनाना
वैशम्पायन उवाच
अथ गावलगणिर्विद्वान् संयुगादेत्य भारत ।
प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य भूतभव्यभविष्यवित् ॥ १ ॥
ध्यायते धृतराष्ट्राय सहसोत्पत्य दुःखितः ।
आचष्ट निहतं भीष्मं भरतानां पितामहम् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतनन्दन! तदनन्तर एक दिनकी बात है कि भूत, वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता एवं सब घटनाओंको प्रत्यक्ष देखनेवाले गवलगणपुत्र विद्वान् संजयने युद्धभूमिसे लौटकर सहसा चिन्तामग्न धृतराष्ट्रके पास जा अत्यन्त दुःखी होकर भरतवंशियोंके पितामह भीष्मके युद्धभूमिमें मारे जानेका समाचार बताया ॥ १-२ ॥
संजय उवाच
संजयोऽहं महाराज नमस्ते भरतर्षभ ।
हतो भीष्मः शान्तनवो भरतानां पितामहः ॥ ३ ॥
संजय बोले— महाराज! भरतश्रेष्ठ! आपको नमस्कार है। मैं संजय आपकी सेवामें उपस्थित हूँ। भरतवंशियोंके पितामह और महाराज शान्तनुके पुत्र भीष्मजी आज युद्धमें मारे गये ॥ ३ ॥
ककुदं सर्वयोधानां धाम सर्वधनुष्मताम् ।
शरतल्पगतः सोऽद्य शेते कुरुपितामहः ॥ ४ ॥
जो समस्त योद्धाओंके ध्वजस्वरूप और सम्पूर्ण धनुर्धरोंके आश्रय थे, वे ही कुरुकुलपितामह भीष्म आज बाणशय्यापर सो रहे हैं ॥ ४ ॥
यस्य वीर्यं समाश्रित्य द्यूतं पुत्रस्तवाकरोत् ।
स शेते निहतो राजन् संख्ये भीष्मः शिखण्डिना ॥ ५ ॥
राजन्! आपके पुत्र दुर्योधनने जिनके बाहुबलका भरोसा करके जूएका खेल किया था, वे भीष्म शिखण्डीके हाथों मारे जाकर रणभूमिमें शयन करते हैं ॥ ५ ॥
यः सर्वान् पृथिवीपालान् समवेतान् महामृधे । जिगायैकरथेनैव काशिपुर्यां महारथः ॥ ६ ॥ जामदग्न्यं रणे रामं योऽयुध्यदपसम्भ्रमः । न हतो जामदग्न्येन स हतोऽद्य शिखण्डिना ॥ ७ ॥ जिन महारथी वीर भीष्मने काशिराजकी नगरीमें एकत्र हुए समस्त भूपालोंको अकेला ही रथपर बैठकर महान् युद्धमें पराजित कर दिया था, जिन्होंने रणभूमिमें जमदग्निनन्दन परशुरामजीके साथ निर्भय होकर युद्ध किया था और जिन्हें परशुरामजी भी मार न सके, वे ही भीष्म आज शिखण्डीके हाथसे मारे गये ॥ ६-७ ॥ महेन्द्रसदृशः शौर्ये स्थैर्ये च हिमवानिव । समुद्र इव गाम्भीर्ये सहिष्णुत्वे धरासमः ॥ ८ ॥ जो शौर्यमें देवराज इन्द्रके समान, स्थिरतामें हिमालयके समान, गम्भीरतामें समुद्रके समान और सहनशीलतामें पृथ्वीके समान थे ॥ ८ ॥ शरदंष्ट्रो धनुर्वक्त्रः खड्गजिह्वो दुरासदः । नरसिंहः पिता तेऽद्य पाञ्चाल्येन निपातितः ॥ ९ ॥ जो मनुष्योंमें सिंह थे, बाण ही जिनकी दाढ़ें थीं, धनुष जिनका फैला हुआ मुख था, तलवार ही जिनकी जिह्वा थी और इसीलिये जिनके पास पहुँचना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन था, वे ही आपके पिता भीष्म आज पांचालराजकुमार शिखण्डीके द्वारा मार गिराये गये ॥ ९ ॥ पाण्डवानां महासैन्यं यं दृष्ट्वोद्यतमाहवे । प्रावेपत भयोद्विग्नं सिंहं दृष्ट्वेव गोगणः ॥ १० ॥ परिरक्ष्य स सेनां ते दशरात्रमनीकहा । जगामास्तमिवादित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ ११ ॥ जैसे गौओंका झुंड सिंहके देखते ही भयसे व्याकुल हो उठता है, उसी प्रकार जिन्हें युद्धमें हथियार उठाये देख पाण्डवोंकी विशाल वाहिनी भयसे उद्विग्न होकर थरथर काँपने लगती थी, वे ही शत्रुसैन्यसंहारक भीष्म दस दिनोंतक आपकी सेनाका संरक्षण करके अत्यन्त दुष्कर पराक्रम प्रकट करते हुए अन्तमें सूर्यकी भाँति अस्ताचलको चले गये ॥ १०-११ ॥ यः स शक्र इवाक्षोभ्यो वर्षन् बाणान् सहस्रशः । जघान युधि योधानामर्बुदं दशभिर्दिनैः ॥ १२ ॥ स शेते निहतो भूमौ वातभग्न इव द्रुमः । तव दुर्मन्त्रिते राजन् यथा नार्हः स भारत ॥ १३ ॥ जिन्होंने इन्द्रकी भाँति क्षोभरहित होकर हजारों बाणोंकी वर्षा करते हुए दस दिनोंमें शत्रुपक्षके दस करोड़ योद्धाओंका संहार कर डाला, वे ही आज आँधीके उखाड़े हुए वृक्षकी
भाँति मारे जाकर युद्धभूमिमें सो रहे हैं। भरतवंशी नरेश! यह सब आपकी कुमन्त्रणाका फल है; नहीं तो भीष्मजी इस दुर्दशाके योग्य नहीं थे ।। १२-१३ ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि भीष्ममृत्युश्रवणे
त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत श्रीमद्भगवद्गीतापर्वमें
भीष्ममृत्युश्रवणविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३ ।।
अध्याय (पृष्ठ 1305)
चतुर्दशोऽध्यायः
धृतराष्ट्रका विलाप करते हुए भीष्मजीके मारे जानेकी घटनाको विस्तारपूर्वक जाननेके लिये संजयसे प्रश्न करना
धृतराष्ट्र उवाच
कथं कुरूणामृषभो हतो भीष्मः शिखण्डिना ।
कथं रथात् स न्यपतत् पिता मे वासवोपमः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्र बोले—संजय! कुरुकुलके श्रेष्ठतम पुरुष मेरे पितृतुल्य भीष्म शिखण्डीके हाथसे कैसे मारे गये? वे इन्द्रके समान पराक्रमी थे, वे रथसे कैसे गिरे? ॥ १ ॥
कथमाचक्ष्व मे योधा हीना भीष्मेण संजय ।
बलिना देवकल्पेन गुर्वर्थे ब्रह्मचारिणा ॥ २ ॥
संजय! जिन्होंने अपने पिताके संतोषके लिये आजीवन ब्रह्मचर्यका पालन किया और जो देवताओंके समान बलवान् थे, उन्हीं भीष्मसे रहित होकर आज हमारे सैनिकोंकी कैसी अवस्था हुई है? यह बताओ ॥ २ ॥
तस्मिन् हते महाप्राज्ञे महेष्वासे महाबले ।
महासत्त्वे नरव्याघ्रे किमु आसीन्मनस्तव ॥ ३ ॥
महाज्ञानी, महाधनुर्धर, महाबली और महान् धैर्यशाली नरश्रेष्ठ भीष्मजीके मारे जानेपर तुम्हारे मनकी कैसी अवस्था हुई? ॥ ३ ॥
आर्तिं परामाविशति मनः शंससि मे हतम् ।
कुरूणामृषभं वीरमकम्पं पुरुषर्षभम् ॥ ४ ॥
संजय! तुम कहते हो, अकम्प्य वीर पुरुषसिंह, कुरुकुलशिरोमणि भीष्मजी मारे गये—इसे सुनकर मेरे हृदयमें बड़ी पीड़ा हो रही है ॥ ४ ॥
के तं यान्तमनुप्राप्ताः के वास्यासन् पुरोगमाः ।
केऽतिष्ठन् के न्यवर्तन्त केऽन्ववर्तन्त संजय ॥ ५ ॥
संजय! जिस समय वे युद्धके लिये अग्रसर हुए थे, उस समय इनके पीछे कौन गये थे अथवा उनके आगे कौन-कौन वीर थे? कौन उनके साथ युद्धमें डटे रहे? कौन युद्ध छोड़कर भाग गये? और किन लोगोंने सर्वथा उनका अनुसरण किया था? ॥ ५ ॥
के शूरा रथशार्दूलमद्भुतं क्षत्रियर्षभम् ।
तथानीकं गाहमानं सहसा पृष्ठतोऽन्वयुः ॥ ६ ॥
किन शूरवीरोंने शत्रुसेनामें प्रवेश करते समय रथियोंमें सिंहके समान अद्भुत पराक्रमी, क्षत्रियशिरोमणि भीष्मजीके पास सहसा पहुँचकर सदा उनके पृष्ठभागका अनुसरण
किया? ॥ ६ ॥ यस्तमोऽर्क इवापोहन् परसैन्यममित्रहा । सहस्ररश्मिप्रतिमः परेषां भयमादधत् ॥ ७ ॥ जैसे सूर्य अन्धकारको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार शत्रुसूदन भीष्म शत्रुसेनाका नाश करते थे। जिनका तेज सहस्र किरणोंवाले सूर्यके समान था, जिन्होंने शत्रुओंको भयभीत कर रखा था ॥ ७ ॥ अकरोद् दुष्करं कर्म रणे पाण्डुसुतेषु यः । ग्रसमानमनीकानि य एनं पर्यवारयन् ॥ ८ ॥ कृतिनं तं दुराधर्षं संजयास्य त्वमन्तिके । कथं शान्तनवं युद्धे पाण्डवाः प्रत्यवारयन् ॥ ९ ॥ जिन्होंने युद्धमें पाण्डवोंपर दुष्कर पराक्रम किया था तथा जो उनकी सेनाका निरन्तर संहार कर रहे थे, उन अस्त्रविद्याके ज्ञाता दुर्जय वीर भीष्मजीको जिन्होंने रोका है, वे कौन हैं? संजय! तुम तो उनके पास ही थे, पाण्डवोंने युद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मको किस प्रकार आगे बढ़नेसे रोका? ॥ ८-९ ॥ निकृन्तन्तमनीकानि शरदंष्ट्रं मनस्विनम् । चापव्यात्ताननं घोरमसिजिह्वं दुरासदम् ॥ १० ॥ अनर्हं पुरुषव्याघ्रं ह्रीमन्तमपराजितम् । पातयामास कौन्तेयः कथं तमजितं युधि ॥ ११ ॥ जो शत्रुपक्षकी सेनाओंका निरन्तर उच्छेद करते थे, बाण ही जिनकी दाढ़ें थीं, धनुष ही खुला हुआ मुख था, तलवार ही जिनकी जिह्वा थी, उन भयंकर एवं दुर्धर्ष पुरुषसिंह भीष्मको कुन्तीनन्दन अर्जुनने युद्धमें कैसे मार गिराया? मनस्वी भीष्म इस प्रकार पराजयके योग्य नहीं थे। वे लज्जाशील और पराजय-शून्य थे ॥ उग्रधन्वानमुग्रेषुं वर्तमानं रथोत्तमे । परेषामुत्तमाङ्गानि प्रचिन्वन्तमथेषुभिः ॥ १२ ॥ जो उत्तम रथपर बैठकर भयंकर धनुष और भयानक बाण लिये शत्रुओंके मस्तकोंको सायकोंद्वारा काट-काटकर उनके ढेर लगा रहे थे ॥ १२ ॥ पाण्डवानां महत् सैन्यं यं दृष्ट्वोद्यतमाहवे । कालाग्निमिव दुर्धर्षं समचेष्टत नित्यशः ॥ १३ ॥ पाण्डवोंकी विशाल सेना दुर्धर्ष कालाग्निके समान जिन्हें युद्धके लिये उद्यत देख सदा काँपने लगती थी ॥ १३ ॥ परिकृष्य स सेनां तु दशरात्रमनीकहा । जगामास्तमिवादित्यः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ १४ ॥
वे ही शत्रुसूदन भीष्म दस दिनोंतक शत्रुओंकी सेनाका संहार करते हुए अत्यन्त दुष्कर पराक्रम दिखाकर सूर्यकी भाँति अस्त हो गये ।। १४ ।।
यः स शक्र इवाक्षय्यं वर्षं शरमयं क्षिपन् ।
जघान युधि योधानामर्बुदं दशभिर्दिनैः ।। १५ ।।
स शेते निहतो भूमौ वातभग्न इव द्रुमः ।
मम दुर्मन्त्रितेनाजौ यथा नार्हति भारत ।। १६ ।।
जिन्होंने इन्द्रके समान युद्धमें दस दिनोंतक अक्षय बाणोंकी वर्षा करके दस करोड़ विपक्षी सेनाओंका संहार कर डाला, वे ही भारतवंशी वीर भीष्म मेरी कुमन्त्रणाके कारण आँधीसे उखाड़े गये वृक्षकी भाँति युद्धमें मारे जाकर पृथ्वीपर शयन कर रहे हैं, वे कदापि इसके योग्य नहीं थे ।। १५-१६ ।।
कथं शान्तनवं दृष्ट्वा पाण्डवानामनीकिनी ।
प्रहर्तुमशकत् तत्र भीष्मं भीमपराक्रमम् ।। १७ ।।
शान्तनुनन्दन भीष्म तो बड़े भयंकर पराक्रमी थे, उन्हें सामने देखकर पाण्डवसेना उनपर प्रहार कैसे कर सकी? ।। १७ ।।
कथं भीष्मेण संग्रामं प्राकुर्वन् पाण्डुनन्दनाः ।
कथं च नाजयद् भीष्मो द्रोणे जीवति संजय ।। १८ ।।
संजय! पाण्डवोंने भीष्मके साथ संग्राम कैसे किया? द्रोणाचार्यके जीते-जी भीष्म विजयी कैसे नहीं हो सके? ।। १८ ।।
कृपे संनिहिते तत्र भरद्वाजात्मजे तथा ।
भीष्मः प्रहरतां श्रेष्ठः कथं स निधनं गतः ।। १९ ।।
उस युद्धमें कृपाचार्य तथा भरद्वाजपुत्र द्रोणाचार्य दोनों ही उनके निकट थे, तो भी योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म कैसे मारे गये? ।। १९ ।।
कथं चातिरथस्तेन पाञ्चाल्येन शिखण्डिना ।
भीष्मो विनिहतो युद्धे देवैरपि दुरासदः ।। २० ।।
भीष्म तो युद्धमें देवताओंके लिये भी दुर्जय एवं अतिरथी थे, फिर पांचालराजकुमार शिखण्डीके हाथसे वे किस प्रकार मारे गये? ।। २० ।।
यः स्पर्धते रणे नित्यं जामदग्न्यं महाबलम् ।
अजितं जामदग्न्येन शक्रतुल्यपराक्रमम् ।। २१ ।।
तं हतं समरे भीष्मं महारथकुलोदितम् ।
संजयाचक्ष्व मे वीरं येन शर्म न विद्महे ।। २२ ।।
जो रणभूमिमें महाबली जमदग्निनन्दन परशुरामसे भी टक्कर लेनेकी सदा इच्छा रखते थे, जिनका पराक्रम इन्द्रके समान था और परशुरामजी भी जिन्हें पराजित न कर सके थे;
संजय! महारथियोंके कुलमें प्रकट हुए वे महावीर भीष्म समरभूमिमें किस प्रकार मारे गये, यह मुझे बताओ; क्योंकि मुझे शान्ति नहीं मिल रही है ।। २१-२२ ।।
मामकाः के महेष्वासा नाजहुः संजयाच्युतम् ।
दुर्योधनसमादिष्टाः के वीराः पर्यवारयन् ।। २३ ।।
संजय! कभी युद्धसे पीछे न हटनेवाले भीष्मजीका मेरे पक्षके किन महाधनुर्धरोंने साथ नहीं छोड़ा? दुर्योधनकी आज्ञा पाकर किन-किन वीरोंने उन्हें सब ओरसे घेर रखा था? ।। २३ ।।
यच्छिखण्डिमुखाः सर्वे पाण्डवा भीष्ममभ्ययुः ।
कच्चित् ते कुरवः सर्वे नाजहुः संजयाच्युतम् ।। २४ ।।
संजय! जब शिखण्डी आदि समस्त पाण्डव वीरोंने भीष्मपर आक्रमण किया, उस समय समस्त कौरवोंने कहीं अच्युत भीष्मका साथ छोड़ तो नहीं दिया था? ।। २४ ।।
अश्मसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम ।
यच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं हतं भीष्मं न दीर्यते ।। २५ ।।
अवश्य ही मेरा यह हृदय लोहेके समान सुदृढ़ है, तभी तो पुरुषसिंह भीष्मको मारा गया सुनकर विदीर्ण नहीं होता है! ।। २५ ।।
यस्मिन् सत्यं च मेधा च नीतिश्च भरतर्षभे ।
अप्रमेयाणि दुर्धर्षे कथं स निहतो युधि ।। २६ ।।
जिन दुर्जय वीर भरतभूषण भीष्ममें सत्य, मेधा और नीति—ये तीन अप्रमेय शक्तियाँ थीं, वे युद्धमें कैसे मारे गये? ।। २६ ।।
मौर्वीघोषस्तनयित्नुः पृषत्कपृषतो महान् ।
धनुर्ह्रादमहाशब्दो महामेघ इवोन्नतः ।। २७ ।।
वे युद्धमें महान् मेघके समान ऊँचे उठे हुए थे। धनुषकी टंकार ही उनकी गर्जना थी, बाण ही उनके लिये वर्षाकी बूँदें थीं और धनुषका महान् शब्द ही बिजलीकी गड़गड़ाहटका भयंकर शब्द था ।। २७ ।।
योऽभ्यवर्षत कौन्तेयान् सपाञ्चालान् ससृंजयान् ।
निघ्नन् पररथान् वीरो दानवानिव वज्रभृत् ।। २८ ।।
वीरवर भीष्मने शत्रुपक्षके रथियों—कुन्तीकुमारों, पांचालों तथा सृंजयोंको मारते हुए उनके ऊपर उसी प्रकार बाणोंकी बौछार की, जैसे वज्रधारी इन्द्र दानवोंपर बाणवर्षा करते हैं ।। २८ ।।
इष्वस्त्रसागरं घोरं बाणग्राहं दुरासदम् ।
कार्मुकोर्मिणमक्षय्यमद्वीपं चलमप्लवम् ।। २९ ।।
उनका धनुष-बाण आदि अस्त्रसमूह भयंकर एवं दुर्गम समुद्रके समान था, बाण ही उसमें ग्राह थे, धनुष लहरोंके समान जान पड़ता था, वह अक्षय, द्वीपरहित, चंचल तथा
नौका आदि तैरनेके साधनोंसे शून्य था ॥ २९ ॥ गदासिमकरावासं हयावर्तं गजाकुलम् । पदातिमत्स्यकलिलं शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनम् ॥ ३० ॥ गदा और खड्ग आदि ही उसमें मगरके समान थे। वह अश्वरूपी भँवरोंसे भयावह प्रतीत होता था, उसमें हाथी जलहस्तीके समान प्रतीत होते थे, पैदल सेना उसमें भरे हुए मत्स्योंके समान जान पड़ती थी तथा शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनि ही उस समुद्रकी गर्जना थी ॥ ३० ॥ हयान् गजपदातींश्च रथांश्च तरसा बहून् । निमज्जयन्तं समरे परवीरापहारिणम् ॥ ३१ ॥ भीष्मजी उस समुद्रमें शत्रुपक्षके हाथियों, घोड़ों, पैदलों तथा बहुसंख्यक रथोंको वेगपूर्वक डुबो रहे थे। वे समरभूमिमें शत्रुवीरोंके प्राणोंका अपहरण करनेवाले थे ॥ ३१ ॥ विदह्यमानं कोपेन तेजसा च परंतपम् । वेलेव मकरावासं के वीराः पर्यवारयन् ॥ ३२ ॥ अपने क्रोध और तेजसे दग्ध एवं प्रज्वलित-से होते हुए शत्रुसंतापी भीष्मको जैसे तट समुद्रको रोक देता है उसी प्रकार किन वीरोंने आगे बढ़नेसे रोका था ॥ ३२ ॥ भीष्मो यदकरोत् कर्म समरे संजयारिहा । दुर्योधनहितार्थाय के तस्यास्य पुरोऽभवन् ॥ ३३ ॥ केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं भीष्मस्यामिततेजसः । पृष्ठतः के परान् वीरानपासेधन् यतव्रताः ॥ ३४ ॥ शत्रुहन्ता भीष्मने दुर्योधनके हितके लिये समरभूमिमें जो पराक्रम किया था, वह अनुपम है। उस समय कौन-कौनसे योद्धा उनके आगे थे? किन-किन वीरोंने अमिततेजस्वी भीष्मके रथके दाहिने पहियेकी रक्षा की थी? किन लोगोंने दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करते हुए उनके पीछेकी ओर रहकर शत्रुपक्षके वीरोंको आगे बढ़नेसे रोका था? ॥ ३३-३४ ॥ के पुरस्तादवर्तन्त रक्षन्तो भीष्ममन्तिके । केऽरक्षन्नुत्तरं चक्रं वीरा वीरस्य युध्यतः ॥ ३५ ॥ कौन-कौनसे वीर निकटसे भीष्मकी रक्षा करते हुए उनके आगे खड़े थे? और किन वीरोंने युद्धमें लगे हुए शूरशिरोमणि भीष्मके बायें पहियेकी रक्षा की थी? ॥ ३५ ॥ वामे चक्रे वर्तमानाः केऽघ्नन् संजय सृंजयान् । अग्रतोऽग्र्यमनीकेषु केऽभ्यरक्षन् दुरासदम् ॥ ३६ ॥ संजय! उनके बायें चक्रकी रक्षामें तत्पर होकर किन-किन योद्धाओंने सृंजयवंशियोंका विनाश किया था? तथा किन्होंने आगे रहकर सेनाके अग्रणी दुर्जय वीर भीष्मकी सब ओरसे रक्षा की थी? ॥ ३६ ॥ पार्श्वतः केऽभ्यरक्षन्त गच्छन्तो दुर्गां गतिम् ।
समूहे के परान् वीरान् प्रत्ययुध्यन्त संजय ॥ ३७ ॥ संजय! किन लोगोंने दुर्गम संग्राममें आगे बढ़ते हुए उनके पार्श्वभागका संरक्षण किया था? और किन्होंने उस सैन्यसमूहमें आगे रहकर वीरतापूर्वक शत्रुयोद्धाओंका डटकर सामना किया था? ॥ ३७ ॥
रक्ष्यमाणः कथं वीरैर्गोप्यमानाश्च तेन ते ।
दुर्जयानामनीकानि नाजयंस्तरसा युधि ॥ ३८ ॥
जब मेरे पक्षके बहुत-से वीर उनकी रक्षा करते थे और वे भी उन वीरोंकी रक्षामें दत्तचित्त थे, तब भी उन सब लोगोंने मिलकर शत्रुपक्षकी दुर्जय सेनाओंको कैसे वेगपूर्वक परास्त नहीं कर दिया? ॥ ३८ ॥
सर्वलोकेश्वरस्येव परमेष्ठिप्रजापतेः ।
कथं प्रहर्तुमपि ते शेकुः संजय पाण्डवाः ॥ ३९ ॥
संजय! भीष्मजी सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी परमेष्ठी प्रजापति ब्रह्माजीके समान अजेय थे; फिर पाण्डव उनके ऊपर कैसे प्रहार कर सके? ॥ ३९ ॥
यस्मिन् द्वीपे समाश्वस्य युध्यन्ते कुरवः परैः ।
तं निमग्नं नरव्याघ्रं भीष्मं शंससि संजय ॥ ४० ॥
संजय! जिन द्वीपस्वरूप भीष्मजीके आश्रयमें निर्भय एवं निश्चिन्त होकर समस्त कौरव शत्रुओंके साथ युद्ध करते थे, उन्हीं नरश्रेष्ठ भीष्मको तुम मारा गया बता रहे हो, यह कितने दुःखकी बात है? ॥ ४० ॥
यस्य वीर्यं समाश्रित्य मम पुत्रो बृहद्बलः ।
न पाण्डवानगणयत् कथं स निहतः परैः ॥ ४१ ॥
जिनके पराक्रमका आश्रय लेकर विशाल सेनाओंसे सम्पन्न मेरा पुत्र पाण्डवोंको कुछ नहीं गिनता था, वे शत्रुओंद्वारा किस प्रकार मारे गये? ॥ ४१ ॥
यः पुरा विबुधैः सर्वैः सहाये युद्धदुर्मदः ।
काङ्क्षितो दानवान् घ्नद्भिः पिता मम महाव्रतः ॥ ४२ ॥
यस्मिञ्जाते महावीर्ये शान्तनुलोकविश्रुतः ।
शोकं दैन्यं च दुःखं च प्राजहात् पुत्रलक्ष्मणि ॥ ४३ ॥
प्रोक्तं परायणं प्राज्ञं स्वधर्मनिरतं शुचिम् ।
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञं कथं शंससि मे हतम् ॥ ४४ ॥
पहलेकी बात है, दानवोंका संहार करनेवाले सम्पूर्ण देवताओंने जिन मेरे महान् व्रतधारी पिता रणदुर्मद भीष्मजीको अपना सहायक बनानेकी अभिलाषा की थी, जिन महापराक्रमी पुत्ररत्नके जन्म लेनेपर लोकविख्यात महाराज शान्तनुने शोक, दीनता और दुःखका सदाके लिये त्याग कर दिया था, जो सबके आश्रयदाता, बुद्धिमान्, स्वधर्मपरायण,