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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

प्रणोत्स्यामि ज्वलितैर्बाणवर्षैः शत्रूंस्तदा तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥ ६० ॥ ‘जब मैं सायकोंकी अविच्छिन्न वर्षा करते हुए मुख फैलाये खड़े हुए कालकी भाँति अपने प्रज्वलित बाणोंकी बौछारोंसे शत्रुपक्षके झुंड-के-झुंड पैदलों तथा रथियोंके समूहोंको छिन्न-भिन्न करने लगूँगा, उस समय मन्दबुद्धि दुर्योधनको बड़ा संताप होगा ।। ६० ।।

सर्वा दिशः सम्पत्तता रथेन रजोध्वस्तं गाण्डिवेन प्रकृत्तम् । यदा द्रष्टा स्वबलं सम्प्रमूढं तदा पश्चात् तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥ ६१ ॥ ‘मन्दबुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र जब यह देखेगा कि सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़नेवाले मेरे रथके द्वारा उड़ायी हुई धूलिसे आच्छादित हो उसकी सारी सेना धराशायी हो रही है और मेरे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उसके समस्त सैनिक छिन्न-भिन्न होते चले जा रहे हैं, तब उसे बड़ा पछतावा होगा ।। ६१ ।।

कान्दिग्भूतं छिन्नगात्रं विसंज्ञं दुर्योधनो द्रक्ष्यति सर्वसैन्यम् । हताश्ववीराग्रयनरेन्द्रनागं पिपासितं श्रान्तपत्रं भयार्तम् ॥ ६२ ॥ आर्तस्वरं हन्यमानं हतं च विकीर्णकेशास्थिकपालसंघम् । प्रजापतेः कर्म यथार्थनिश्चितं तदा दृष्ट्वा तप्स्यति मन्दबुद्धिः ॥ ६३ ॥ ‘दुर्योधन अपनी आँखों यह देखेगा कि उसकी सारी सेना (भयसे भागने लगी है और उस)-को यह भी नहीं सूझता है कि किस दिशाकी ओर जाऊँ? कितने ही योद्धाओंके अंग-प्रत्यंग छिन्न-भिन्न हो गये हैं। समस्त सैनिक अचेत हो रहे हैं। हाथी, घोड़े तथा वीराग्रगण्य नरेश मार डाले गये हैं। सारे वाहन थक गये हैं और सभी योद्धा प्यास तथा भयसे पीड़ित हो रहे हैं। बहुतेरे सैनिक आर्त स्वरसे रो रहे हैं, कितने ही मारे गये और मारे जा रहे हैं। बहुतोंके केश, अस्थि तथा कपालसमूह सब ओर बिखरे पड़े हैं। मानो विधाताका यथार्थ निश्चित विधान हो, इस प्रकार यह सब कुछ होकर ही रहेगा। यह सब देखकर उस समय मन्दबुद्धि दुर्योधनके मनमें बड़ा पश्चात्ताप होगा ।। ६२-६३ ।।

यदा रथे गाण्डिवं वासुदेवं दिव्यं शङ्खं पाञ्चजन्यं हयांश्च । तूणावक्षय्यौ देवदत्तं च मां च द्रष्टा युद्धे धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ॥ ६४ ॥

‘जब धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन रथपर मेरे गाण्डीव धनुषको, सारथि भगवान् श्रीकृष्णको, उनके दिव्य पांचजन्य शंखको, रथमें जुते हुए दिव्य घोड़ोंको, बाणोंसे भरे हुए दो अक्षय तूणीरोंको, मेरे देवदत्त नामक शंखको और मुझको भी देखेगा, उस समय युद्धका परिणाम सोचकर उसे बड़ा संताप होगा ।। ६४ ।।

उद्धर्तयन् दस्युसङ्घान् समेतान् प्रवर्तयन् युगमन्यद् युगान्ते । यदा धक्ष्याम्यग्निवत् कौरवेयां- स्तदा तप्ता धृतराष्ट्रः सपुत्रः ।। ६५ ।।

‘जिस समय युद्धके लिये एकत्र हुए इन डाकुओंके दलोंका संहार करके प्रलयकालके पश्चात् युगान्तर उपस्थित करता हुआ मैं अग्निके समान प्रज्वलित होकर कौरवोंको भस्म करने लगूँगा, उस समय पुत्रोंसहित महाराज धृतराष्ट्रको बड़ा संताप होगा ।। ६५ ।।

सभ्राता वै सहसैन्यः सभृत्यो भ्रष्टैश्वर्यः क्रोधवशोऽल्पचेताः । दर्पस्यान्ते निहतो वेपमानः पश्चान्मन्दस्तप्स्यति धार्तराष्ट्रः ।। ६६ ।।

‘सदा क्रोधके वशमें रहनेवाला अल्पबुद्धि मूढ़ दुर्योधन जब भाई, भृत्यगण तथा सेनाओंसहित ऐश्वर्यसे भ्रष्ट एवं आहत होकर काँपने लगेगा, उस समय सारा घमंड चूर-चूर हो जानेपर उसे (अपने कुकृत्योंके लिये) बड़ा पश्चात्ताप होगा ।। ६६ ।।

पूर्वाह्ने मां कृतजप्यं कदाचिद् विप्रः प्रोवाचोदकान्ते मनोज्ञम् । कर्तव्यं ते दुष्करं कर्म पार्थ योद्धव्यं ते शत्रुभिः सव्यसाचिन् ।। ६७ ।।

इन्द्रो वा ते हरिमान् वज्रहस्तः पुरस्ताद् यातु समरेऽरीन् विनिघ्नन् । सुग्रीवयुक्तेन रथेन वा ते पश्चात् कृष्णो रक्षतु वासुदेवः ।। ६८ ।।

‘एक दिनकी बात है, मैं पूर्वाह्नकालमें संध्या-वन्दन एवं गायत्रीजप करके आचमनके पश्चात् बैठा हुआ था, उस समय एक ब्राह्मणने आकर एकान्तमें मुझसे यह मधुर वचन कहा—‘कुन्तीनन्दन! तुम्हें दुष्कर कर्म करना है। सव्यसाचिन्! तुम्हें अपने शत्रुओंके साथ युद्ध करना होगा। बोलो, क्या चाहते हो? इन्द्र उच्चैःश्रवा घोड़ेपर बैठकर वज्र हाथमें लिये तुम्हारे आगे-आगे समरभूमिमें शत्रुओंका नाश करते हुए चलें अथवा सुग्रीव आदि अश्वोंसे जुते हुए रथपर बैठकर वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण पीछेकी ओरसे तुम्हारी रक्षा करें ।। ६७-६८ ।।

वव्रे चाहं वज्रहस्तान्महेन्द्रा- दस्मिन् युद्धे वासुदेवं सहायम्। स मे लब्धो दस्युवधाय कृष्णो मन्ये चैतद् विहितं दैवतैर्मे ॥ ६९ ॥ ‘उस समय मैंने वज्रपाणि इन्द्रको छोड़कर इस युद्धमें भगवान् श्रीकृष्णको अपना सहायक चुना था, इस प्रकार इन डाकुओंके वधके लिये मुझे श्रीकृष्ण मिल गये हैं। मालूम होता है, देवताओंने ही मेरे लिये ऐसी व्यवस्था कर रखी है ।। ६९ ।।

अयुद्ध्यमानो मनसापि यस्य जयं कृष्णः पुरुषस्याभिनन्देत्। एवं सर्वान् स व्यतीयादमित्रान् सेन्द्रान् देवान् मानुषे नास्ति चिन्ता ॥ ७० ॥ ‘भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध न करके मनसे भी जिस पुरुषकी विजयका अभिनन्दन करेंगे, वह अपने समस्त शत्रुओंको, भले ही वे इन्द्र आदि देवता ही क्यों न हों, पराजित कर देता है, फिर मनुष्य-शत्रुके लिये तो चिन्ता ही क्या है? ।। ७० ।।

स बाहुभ्यां सागरमुत्तितीर्षे- न्महोदधिं सलिलस्याप्रमेयम्।

तेजस्विनं कृष्णमत्यन्तशूरं युद्धेन यो वासुदेवं जिगीषेत् ॥ ७१ ॥ ‘जो युद्धके द्वारा अत्यन्त शौर्यसम्पन्न तेजस्वी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णको जीतनेकी इच्छा करता है, वह अनन्त अपार जलनिधि समुद्रको दोनों बाँहोंसे तैरकर पार करना चाहता है ॥ ७१ ॥

गिरिं य इच्छेत् तु तलेन भेत्तुं शिलोच्चयं श्वेतमतिप्रमाणम् । तस्यैव पाणिः सनखो विशीर्ये- न्न चापि किंचित् स गिरेस्तु कुर्यात् ॥ ७२ ॥ ‘जो अत्यन्त विशाल प्रस्तरराशिपूर्ण श्वेत कैलास-पर्वतको हथेलीसे मारकर विदीर्ण करना चाहता है, उस मनुष्यका नखसहित हाथ ही छिन्न-भिन्न हो जायगा। वह उस पर्वतका कुछ भी बिगाड़ नहीं कर सकता ॥ ७२ ॥

अग्निं समिद्धं शमयेद् भुजाभ्यां चन्द्रं च सूर्यं च निवारयेत । हरेद् देवानाममृतं प्रसह्य युद्धेन यो वासुदेवं जिगीषेत् ॥ ७३ ॥ ‘जो युद्धके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णको जीतना चाहता है, वह प्रज्वलित अग्निको दोनों हाथोंसे बुझानेकी चेष्टा करता है, चन्द्रमा और सूर्यकी गतिको रोकना चाहता है तथा हठपूर्वक देवताओंका अमृत हर लानेका प्रयत्न करता है ॥ ७३ ॥

यो रुक्मिणीमेकरथेन भोजा- नुत्साद्य राज्ञः समरे प्रसह्य । उवाह भार्यां यशसा ज्वलन्तीं यस्यां जज्ञे रौक्मिणेयो महात्मा ॥ ७४ ॥ ‘जिन्होंने एकमात्र रथकी सहायतासे युद्धमें भोजवंशी राजाओंको बलपूर्वक पराजित करके (रूप, सौन्दर्य और) सुयशके द्वारा प्रकाशित होनेवाली उस परम सुन्दरी रुक्मिणीको पत्नीरूपसे ग्रहण किया, जिसके गर्भसे महामना प्रद्युम्नका जन्म हुआ है ॥ ७४ ॥

अयं गान्धारांस्तरसा सम्प्रमथ्य जित्वा पुत्रान् नग्नजितः समग्रान् । बद्धं मुमोच विनदन्तं प्रसह्य सुदर्शनं वै देवतानां ललामम् ॥ ७५ ॥ ‘इन श्रीकृष्णने ही गान्धारदेशीय योद्धाओंको अपने वेगसे कुचलकर राजा नग्नजित्‌के समस्त पुत्रोंको पराजित किया और वहाँ कैदमें पड़कर क्रन्दन करते हुए राजा सुदर्शनको, जो देवताओंके भी आदरणीय हैं, बन्धनमुक्त किया ॥ ७५ ॥

अयं कपाटेन जघान पाण्ड्यं तथा कलिङ्गान् दन्तकूरे ममर्द । अनेन दग्धा वर्षपूगान् विनाथा वाराणसी नगरी सम्बभूव ॥ ७६ ॥ ‘इन्होंने पाण्ड्यनरेशको किंवाड़के पल्लेसे मार डाला, भयंकर युद्धमें कलिंगदेशीय योद्धाओंको कुचल डाला तथा इन्होंने ही काशीपुरीको इस प्रकार जलाया था कि वह बहुत वर्षोंतक अनाथ पड़ी रही ॥ ७६ ॥

अयं स्म युद्धे मन्यतेऽन्यैरजेयं तमेकलव्यं नाम निषादराजम् । वेगेनैव शैलमभिहत्य जम्भः शेते स कृष्णेन हतः परासुः ॥ ७७ ॥ ‘ये भगवान् श्रीकृष्ण उस निषादराज एकलव्यको सदा युद्धके लिये ललकारा करते थे, जो दूसरोंके लिये अजेय था; परंतु वह श्रीकृष्णके हाथसे मारा जाकर प्राणशून्य हो सदाके लिये रणशय्यामें सो रहा है, ठीक उसी तरह, जैसे जम्भ नामक दैत्य स्वयं ही वेगपूर्वक पर्वतपर आघात करके प्राणशून्य हो महानिद्रामें निमग्न हो गया था ॥ ७७ ॥

तथोग्रसेनस्य सुतं सुदुष्टं वृष्ण्यन्धकानां मध्यगतं सभास्थम् । अपातयद् बलदेवद्वितीयो हत्वा ददौ चोग्रसेनाय राज्यम् ॥ ७८ ॥ ‘उग्रसेनका पुत्र कंस बड़ा दुष्ट था। वह जब भरी सभामें वृष्णि और अन्धकवंशी क्षत्रियोंके बीचमें बैठा हुआ था, श्रीकृष्णने बलदेवजीके साथ वहाँ जाकर उसे मार गिराया। इस प्रकार कंसका वध करके इन्होंने मथुराका राज्य उग्रसेनको दे दिया ॥ ७८ ॥

अयं सौभं योधयामास खस्थं विभीषणं मायया शाल्वराजम् । सौभद्वारि प्रत्यगृह्णाच्छतघ्नीं दोर्भ्यां क एनं विषहेत मर्त्यः ॥ ७९ ॥ ‘इन्होंने सौभ नामक विमानपर बैठे हुए तथा मायाके द्वारा अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके आये हुए आकाशमें स्थित शाल्वराजके साथ युद्ध किया और सौभ विमानके द्वारपर लगी हुई शतघ्नीको अपने दोनों हाथोंसे पकड़ लिया था। फिर इनका वेग कौन मनुष्य सह सकता है? ॥ ७९ ॥

प्राग्ज्योतिषं नाम बभूव दुर्गं पुरं घोरमसुराणामसह्यम् । महाबलो नरकस्तत्र भौमो

जहारादित्या मणिकुण्डले शुभे ॥ ८० ॥ ‘असुरोंका प्राग्ज्योतिषपुर नामसे प्रसिद्ध एक भयंकर किला था, जो शत्रुओंके लिये सर्वथा अजेय था। वहाँ भूमिपुत्र महाबली नरकासुर निवास करता था, जिसने देवमाता अदितिके सुन्दर मणिमय कुण्डल हर लिये थे॥ न तं देवाः सह शक्रेण शेकुः समागता युधि मृत्योरभीताः । दृष्ट्वा च तं विक्रमं केशवस्य बलं तथैवास्त्रमवारणीयम् ॥ ८१ ॥ जानन्तोऽस्य प्रकृतिं केशवस्य न्ययोजयन् दस्युवधाय कृष्णम् । स तत् कर्म प्रतिशुश्राव दुष्कर- मैश्वर्यवान् सिद्धिषु वासुदेवः ॥ ८२ ॥ ‘मृत्युके भयसे रहित देवता इन्द्रके साथ उसका सामना करनेके लिये आये, परंतु नरकासुरको युद्धमें पराजित न कर सके। तब देवताओंने भगवान् श्रीकृष्णके अनिवार्य बल, पराक्रम और अस्त्रको देखकर तथा इनकी दयालु एवं दुष्टदमनकारिणी प्रकृतिको जानकर इन्हींसे पूर्वोक्त डाकू नरकासुरका वध करनेकी प्रार्थना की, तब समस्त कार्योंकी सिद्धिमें समर्थ भगवान् श्रीकृष्णने वह दुष्कर कार्य पूर्ण करना स्वीकार किया ।। ८१-८२ ।। निर्मोचने षट् सहस्राणि हत्वा संच्छिद्य पाशान् सहसा क्षुरान्तान् । मुरं हत्वा विनिहत्यौघरक्षो निर्मोचनं चापि जगाम वीरः ॥ ८३ ॥ ‘फिर वीरवर श्रीकृष्णने निर्मोचन नगरकी सीमापर जाकर सहसा छः हजार लोहमय पाश काट दिये, जो तीखी धारवाले थे। फिर मुर दैत्यका वध और राक्षस-समूहका नाश करके निर्मोचन नगरमें प्रवेश किया ।। ८३ ।। तत्रैव तेनास्य बभूव युद्धं महाबलेनातिबलस्य विष्णोः । शेते स कृष्णेन हतः परासु- र्वातेनेवोन्मथितः कर्णिकारः ॥ ८४ ॥ ‘वहीं उस महाबली नरकासुरके साथ अत्यन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्णका युद्ध हुआ। श्रीकृष्णके हाथसे मारा जाकर वह प्राणोंसे हाथ धो बैठा और आँधीके उखाड़े हुए कनेरवृक्षकी भाँति सदाके लिये रणभूमिमें सो गया ।। ८४ ।। आहृत्य कृष्णो मणिकुण्डले ते हत्वा च भौमं नरकं मुरं च ।

श्रिया वृतो यशसा चैव विद्वान् प्रत्याजगामाप्रतिमप्रभावः ॥ ८५ ॥ 'इस प्रकार अनुपम प्रभावशाली विद्वान् श्रीकृष्ण भूमिपुत्र नरकासुर तथा मुरका वध करके देवी अदितिके वे दोनों मणिमय कुण्डल वहाँसे लेकर विजयलक्ष्मी और उज्ज्वल यशसे सुशोभित हो अपनी पुरीमें लौट आये ॥ ८५ ॥ अस्मै वराणयददंस्तत्र देवा दृष्ट्वा भीमं कर्म कृतं रणे तत् । श्रमश्च ते युध्यमानस्य न स्या- दाकाशे चाप्सु च ते क्रमः स्यात् ॥ ८६ ॥ शस्त्राणि गात्रे न च ते क्रमेर- न्नित्येव कृष्णश्च ततः कृतार्थः । एवंरूपे वासुदेवेऽप्रमेये महाबले गुणसम्पत् सदैव ॥ ८७ ॥ 'युद्धमें भगवान् श्रीकृष्णका वह भयंकर पराक्रम देखकर देवताओंने वहाँ इन्हें इस प्रकार वर दिये—‘केशव! युद्ध करते समय आपको कभी थकावट न हो, आकाश और जलमें भी आप अप्रतिहत गतिसे विचरें और आपके अंगोंमें कोई भी अस्त्र-शस्त्र चोट न पहुँचा सके।' इस प्रकार वर पाकर श्रीकृष्ण पूर्णतः कृतकार्य हो गये हैं। इन असीम शक्तिशाली महाबली वासुदेवमें समस्त गुण-सम्पत्ति सदैव विद्यमान है ॥ ८६-८७ ॥ तमसह्यं विष्णुमनन्तवीर्य- माशंसते धार्तराष्ट्रो विजेतुम् । सदा ह्येनं तर्कयते दुरात्मा तच्चाप्ययं सहतेऽस्मान् समीक्ष्य ॥ ८८ ॥ 'ऐसे अनन्त पराक्रमी और अजेय श्रीकृष्णको धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन जीत लेनेकी आशा करता है। वह दुरात्मा सदैव इनका अनिष्ट करनेके विषयमें सोचता रहता है, परंतु हमलोगोंकी ओर देखकर उसके इस अपराधको भी ये भगवान् सहते चले जा रहे हैं ॥ ८८ ॥ पर्यागतं मम कृष्णस्य चैव यो मन्यते कलहं सम्प्रसह्य । शक्यं हर्तुं पाण्डवानां ममत्वं तद् वेदिता संयुगं तत्र गत्वा ॥ ८९ ॥ 'दुर्योधन मानता है कि मुझमें और श्रीकृष्णमें हठात् कलह करा दिया जा सकता है। पाण्डवोंका श्रीकृष्णके प्रति जो ममत्व (अपनापन) है, उसे मिटा दिया जा सकता है; परंतु

कुरुक्षेत्रकी युद्धभूमिमें पहुँचनेपर उसे इन सब बातोंका ठीक-ठीक पता चल जायगा ॥ ८९ ॥

नमस्कृत्य शान्तनवाय राज्ञे द्रोणायाथो सहपुत्राय चैव । शारद्वतायाप्रतिद्वन्द्विने च योत्स्याम्यहं राज्यमभीप्समानः ॥ ९० ॥

'मैं शान्तनुनन्दन महाराज भीष्मको, आचार्य द्रोणको, गुरुभाई अश्वत्थामाको और जिनका सामना कोई नहीं कर सकता, उन वीरवर कृपाचार्यको भी प्रणाम करके राज्य पानेकी इच्छा लेकर अवश्य युद्ध करूँगा ॥ ९० ॥

धर्मेणाप्तं निधनं तस्य मन्ये यो योत्स्यते पाण्डवैः पापबुद्धिः । मिथ्या ग्लहे निर्जिता वै नृशंसैः संवत्सरान् वै द्वादश राजपुत्राः ॥ ९१ ॥

'जो पापबुद्धि मानव पाण्डवोंके साथ युद्ध करेगा, धर्मकी दृष्टिसे उसकी मृत्यु निकट आ गयी है, ऐसा मेरा विश्वास है। कारण कि इन क्रूर स्वभाववाले कौरवोंने हम सब लोगोंको कपटद्यूतमें जीतकर बारह वर्षोंके लिये वनमें निर्वासित कर दिया था; यद्यपि हम भी राजाके ही पुत्र थे ॥ ९१ ॥

वासः कृच्छ्रो विहितश्चाप्यरण्ये दीर्घं कालं चैकमज्ञातवर्षम् । ते हि कस्माज्जीवतां पाण्डवानां नन्दिष्यन्ते धार्तराष्ट्राः पदस्थाः ॥ ९२ ॥

'हम वनमें दीर्घकालतक बड़े कष्ट सहकर रहे हैं और एक वर्षतक हमें अज्ञातवास करना पड़ा है। ऐसी दशामें पाण्डवोंके जीते-जी वे कौरव अपने पदोंपर प्रतिष्ठित रहकर कैसे आनन्द भोगते रहेंगे? ॥ ९२ ॥

ते चेदस्मान् युध्यमानाञ्जयेयु- र्देवैर्महेन्द्रप्रमुखैः सहायैः । धर्मादधर्मश्चरितो गरीयां- स्ततो ध्रुवं नास्ति कृतं च साधु ॥ ९३ ॥

'यदि इन्द्र आदि देवताओंकी सहायता पाकर भी धृतराष्ट्रपुत्र हमें युद्धमें जीत लेंगे तो यह मानना पड़ेगा कि धर्मकी अपेक्षा पापाचारका ही महत्त्व अधिक है और संसारसे पुण्यकर्मका अस्तित्व निश्चय ही उठ गया ॥ ९३ ॥

न चेदिमं पुरुषं कर्मबद्धं न चेदस्मान् मन्यतेऽसौ विशिष्टान् ।

आशांसेऽहं वासुदेवद्वितीयो
दुर्योधनं सानुबन्धं निहन्तुम् ॥ ९४ ॥
‘यदि दुर्योधन मनुष्यको कर्मोंके बन्धनसे बँधा हुआ नहीं मानता है अथवा यदि वह हमलोगोंको अपनेसे श्रेष्ठ तथा प्रबल नहीं समझता है, तो भी मैं यह आशा करता हूँ कि भगवान् श्रीकृष्णको अपना सहायक बनाकर मैं दुर्योधनको उसके सगे-सम्बन्धियों-सहित मार डालूँगा ॥ ९४ ॥
न चेदिदं कर्म नरेन्द्र वन्ध्यं
न चेद् भवेत् सुकृतं निष्फलं वा ।
इदं च तच्चाभिसमीक्ष्य नूनं
पराजयो धार्तराष्ट्रस्य साधुः ॥ ९५ ॥
‘राजन्! यदि मनुष्यका किया हुआ यह पापकर्म निष्फल नहीं होता अथवा पुण्यकर्मोंका फल मिले बिना नहीं रहता तो मैं दुर्योधनके वर्तमान और पहलेके किये हुए पापकर्मका विचार करके निश्चयपूर्वक कह सकता हूँ कि धृतराष्ट्रपुत्रकी पराजय अनिवार्य है और इसीमें जगत्की भलाई है ॥ ९५ ॥
प्रत्यक्षं वः कुरवो यद् ब्रवीमि
युध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति ।
अन्यत्र युद्धात् कुरवो यदि स्यु-
र्न युद्धे वै शेष इहास्ति कश्चित् ॥ ९६ ॥
‘कौरवो! मैं तुमलोगोंके समक्ष यह स्पष्टरूपसे बता देना चाहता हूँ कि धृतराष्ट्रके पुत्र यदि युद्धभूमिमें उतरे तो जीवित नहीं बचेंगे। कौरवोंके जीवनकी रक्षा तभी हो सकती है, जब वे युद्धसे दूर रहें। युद्ध छिड़ जानेपर तो उनमेंसे कोई भी यहाँ शेष नहीं रहेगा ॥ ९६ ॥
हत्वा त्वहं धार्तराष्ट्रान् सकर्णान्
राज्यं कुरूणामवजेता समग्रम् ।
यद् वः कार्यं तत् कुरुध्वं यथास्व-
मिष्टान् दारानात्मभोगान् भजध्वम् ॥ ९७ ॥
‘मैं कर्णसहित धृतराष्ट्रपुत्रोंका वध करके कुरुदेशका सम्पूर्ण राज्य जीत लूँगा, अतः तुम्हारा जो-जो कर्तव्य शेष हो, उसे पूरा कर लो। अपने वैभवके अनुसार प्रियतमा पत्नियोंके साथ सुख भोग लो और अपने शरीरके लिये भी जो अभीष्ट भोग हों, उनका उपभोग कर लो ॥ ९७ ॥
अप्येवं नो ब्राह्मणाः सन्ति वृद्धा
बहुश्रुताः शीलवन्तः कुलीनाः ।
सांवत्सरा ज्योतिषि चाभियुक्ता
नक्षत्रयोगेषु च निश्चयज्ञाः ॥ ९८ ॥

‘हमारे पास कितने ही ऐसे वृद्ध ब्राह्मण विद्यमान हैं, जो अनेक शास्त्रोंके विद्वान्, सुशील, उत्तम कुलमें उत्पन्न, वर्षके शुभाशुभ फलोंको जाननेवाले, ज्योतिष-शास्त्रके मर्मज्ञ तथा ग्रह-नक्षत्रोंके योगफलका निश्चित-रूपसे ज्ञान रखनेवाले हैं ।। ९८ ।।

उच्चावचं दैवयुक्तं रहस्यं दिव्याः प्रश्ना मृगचक्रा मुहूर्ताः । क्षयं महान्तं कुरुसृंजयानां निवेदयन्ते पाण्डवानां जयं च ।। ९९ ।।

‘वे दैवसम्बन्धी उन्नति एवं अवनतिके फलदायक रहस्य बता सकते हैं। प्रश्नोंके अलौकिक ढंगसे उत्तर देते हैं, जिससे भविष्य घटनाओंका ज्ञान हो जाता है। वे शुभाशुभ फलोंका वर्णन करनेके लिये सर्वतोभद्र आदि चक्रोंका भी अनुसंधान करते हैं और मुहूर्तशास्त्रके तो वे पण्डित ही हैं। वे सब लोग निश्चितरूपसे यह निवेदन करते हैं कि कौरवों और सृंजयवंशके लोगोंका बड़ा भारी संहार होनेवाला है और इस महायुद्धमें पाण्डवोंकी विजय होगी ।। ९९ ।।

यथा हि नो मन्यतेऽजातशत्रुः संसिद्धार्थो द्विषतां निग्रहाय । जनार्दनश्चाप्यपरोक्षविद्यो न संशयं पश्यति वृष्णिसिंहः ।। १०० ।।

‘अजातशत्रु महाराज युधिष्ठिर मानते हैं, मैं अपने शत्रुओंका दमन करनेमें निश्चय सफल होऊँगा। वृष्णिवंशके पराक्रमी वीर भगवान् श्रीकृष्णको भी सारी विद्याओंका अपरोक्ष ज्ञान है। वे भी हमारे इस मनोरथके सिद्ध होनेमें कोई संदेह नहीं देखते हैं ।। १०० ।।

अहं तथैवं खलु भाविरूपं पश्यामि बुद्ध्या स्वयमप्रमत्तः । दृष्टिश्च मे न व्यथते पुराणी संयुध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति ।। १०१ ।।

‘मैं भी स्वयं प्रमादशून्य होकर अपनी बुद्धिसे भावीका ऐसा ही स्वरूप देखता हूँ। मेरी चिरंतन दृष्टि कभी तिरोहित नहीं होती। उसके अनुसार मैं यह निश्चितरूपसे कह सकता हूँ कि युद्धभूमिमें उतरनेपर धृतराष्ट्रके पुत्र जीवित नहीं रह सकते ।। १०१ ।।

अनालब्धं जृम्भति गाण्डिवं धनु- रनाहता कम्पति मे धनुर्ज्या । बाणाश्च मे तूणमुखाद् विसृत्य मुहुर्मुहुर्गन्तुमुशन्ति चैव ।। १०२ ।।

'गाण्डीव धनुष बिना स्पर्श किये ही तना जा रहा है, मेरे धनुषकी डोरी बिना खींचे ही हिलने लगी है और मेरे बाण बार-बार तरकससे निकलकर शत्रुओंकी ओर जानेके लिये उतावले हो रहे हैं ।। १०२ ।।

खड्गः कोशान्निःसरति प्रसन्नो
हित्वेव जीर्णामुरगस्त्वचं स्वाम् ।
ध्वजे वाचो रौद्ररूपा भवन्ति
कदा रथो योक्ष्यते ते किरीटिन् ।। १०३ ।।

'चमचमाती हुई तलवार म्यानसे इस प्रकार निकल रही है, मानो सर्प अपनी पुरानी केंचुल छोड़कर चमकने लगा हो तथा मेरी ध्वजापर यह भयंकर वाणी गूँजती रहती है कि अर्जुन! तुम्हारा रथ युद्धके लिये कब जोता जायगा ।। १०३ ।।

गोमायुसंघाश्च नदन्ति रात्रौ
रक्षांस्यथो निष्पतन्त्यन्तरिक्षात् ।
मृगाः शृगालाः शितिकण्ठाश्च काका
गृध्रा बकाश्र्चैव तरक्षवश्च ।। १०४ ।।

'रातमें गीदड़ोंके दल कोलाहल मचाते हैं, राक्षस आकाशसे पृथिवीपर टूटे पड़ते हैं तथा हिरण, सियार, मोर, कौआ, गीध, बगुला और चीते मेरे रथके समीप दौड़े आते हैं ।। १०४ ।।

सुवर्णपत्राश्च पतन्ति पश्चाद्
दृष्ट्वा रथं श्वेतहयप्रयुक्तम् ।
अहं ह्येकः पार्थिवान् सर्वयोधान्
शरान् वर्षन् मृत्युलोकं नयेयम् ।। १०५ ।।

'श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए मेरे रथको देखकर सुवर्ण-पत्र नामक पक्षी पीछेसे टूटे पड़ते हैं। इससे जान पड़ता है, मैं अकेला बाणोंकी वर्षा करके समस्त राजाओं और योद्धाओंको यमलोक पहुँचा दूँगा ।। १०५ ।।

समाददानः पृथगस्त्रमार्गान्
यथाग्निरिद्धो गहनं निदाघे ।
स्थूणाकर्णं पाशुपतं महास्त्रं
ब्राह्मं चास्त्रं यच्च शक्रोऽप्यदान्मे ।। १०६ ।।
वधे धृतो वेगवतः प्रमुञ्चन्
नाहं प्रजाः किंचिदिहावशिष्ये ।
शान्तिं लप्स्ये परमो ह्येष भावः
स्थिरो मम ब्रूहि गावलगणे तान् ।। १०७ ।।

‘जैसे गर्मीमें प्रज्वलित हुई आग जब वनको जलाने लगती है, तब किसी भी वृक्षको बाकी नहीं छोड़ती, उसी प्रकार मैं शत्रुओंके वधके लिये सुसज्जित हो अस्त्रसंचालनकी विभिन्न रीतियोंका आश्रय ले स्थूणाकर्ण, महान् पाशुपतास्त्र, ब्रह्मास्त्र तथा जिसे इन्द्रने मुझे दिया था, उस इन्द्रास्त्रका भी प्रयोग करूँगा और वेगशाली बाणोंकी वर्षा करके इस युद्धमें किसीको भी जीवित नहीं छोड़ूँगा। ऐसा करनेपर ही मुझे शान्ति मिलेगी। संजय! तुम उनसे स्पष्ट कह देना कि मेरा यह दृढ़ और उत्तम निश्चय है ।। १०६-१०७ ।।

ये वैजय्याः समरे सूत लब्ध्वा
देवानपीन्द्रप्रमुखान् समेतान् ।
तैर्मन्यते कलहं सम्प्रसह्य
स धार्तराष्ट्रः पश्यत मोहमस्य ।। १०८ ।।

‘सूत! जो पाण्डव समरभूमिमें इन्द्र आदि समस्त देवताओंको भी पाकर उन्हें पराजित किये बिना नहीं रहेंगे, उन्हीं हम पाण्डवोंके साथ यह दुर्योधन हठपूर्वक युद्ध करना चाहता है, इसका मोह तो देखो ।। १०८ ।।

वृद्धो भीष्मः शान्तनवः कृपश्च
द्रोणः सपुत्रो विदुरश्च धीमान् ।
एते सर्वे यद् वदन्ते तदस्तु
आयुष्मन्तः कुरवः सन्तु सर्वे ।। १०९ ।।

‘फिर भी मैं चाहता हूँ कि बूढ़े पितामह शान्तनु-नन्दन भीष्म, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और बुद्धिमान् विदुर—ये सब लोग मिलकर जैसा कहें, वही हो। समस्त कौरव दीर्घायु बने रहें ।। १०९ ।।

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि अर्जुनवाक्यनिवेदने
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें अर्जुनवाक्यनिवेदनविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४८ ।।

अध्याय (पृष्ठ 419)

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एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

भीष्मका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना एवं कर्णपर आक्षेप करना, कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसका पुनः उपहास एवं द्रोणाचार्यद्वारा भीष्मजीके कथनका अनुमोदन

वैशम्पायन उवाच

समवेतेषु सर्वेषु तेषु राजसु भारत ।
दुर्योधनमिदं वाक्यं भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत! वहाँ एकत्र हुए उन समस्त राजाओंकी मण्डलीमें शान्तनुनन्दन भीष्मने दुर्योधनसे यह बात कही— ॥ १ ॥
बृहस्पतिश्चोशना च ब्रह्माणं पर्युपस्थितौ ।
मरुतश्च सहेन्द्रेण वसवश्चाग्निना सह ॥ २ ॥
आदित्याश्चैव साध्याश्च ये च सप्तर्षयो दिवि ।
विश्वावसुश्च गन्धर्वः शुभाश्चाप्सरसां गणाः ॥ ३ ॥
एक समयकी बात है, बृहस्पति और शुक्राचार्य ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुए। उनके साथ इन्द्रसहित मरुद्गण, अग्नि, वसुगण, आदित्य, साध्य, सप्तर्षि, विश्वावसु गन्धर्व और श्रेष्ठ अप्सराएँ भी वहाँ मौजूद थीं ॥ २-३ ॥
नमस्कृत्योपजग्मुस्ते लोकवृद्धं पितामहम् ।
परिवार्य च विश्वेशं पर्यासत दिवौकसः ॥ ४ ॥
ये सब देवता संसारके बड़े-बूढ़े पितामह ब्रह्माजीके पास गये और उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् उन लोकेश्वरको सब ओरसे घेरकर बैठ गये ॥ ४ ॥
तेषां मनश्च तेजश्चाप्याददानाविवौजसा ।
पूर्वदेवौ व्यतिक्रान्तौ नरनारायणावृषी ॥ ५ ॥
इसी समय पुरातन देवता नर-नारायण ऋषि उधर आ निकले और अपनी कान्ति तथा ओजसे उन सबके चित्त और तेजका अपहरण-सा करते हुए उस स्थानको लाँघकर चले गये ॥ ५ ॥

बृहस्पतिस्तु पप्रच्छ ब्रह्माणं काविमाविति । भवन्तं नोपतिष्ठेते तौ नः शंस पितामह ॥ ६ ॥ यह देख बृहस्पतिजीने ब्रह्माजीसे पूछा—'पितामह! ये दोनों कौन हैं, जिन्होंने आपका अभिनन्दन भी नहीं किया। हमें इनका परिचय दीजिये' ॥ ६ ॥

ब्रह्मोवाच यावेतौ पृथिवीं द्यां च भासयन्तौ तपस्विनौ । ज्वलन्तौ रोचमानौ च व्याप्यातीतौ महाबलौ ॥ ७ ॥ नरनारायणावेतौ लोकाल्लोकं समास्थितौ । ऊर्जितौ स्वेन तपसा महासत्त्वपराक्रमौ ॥ ८ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**बृहस्पते! ये जो दोनों महान् शक्तिशाली तपस्वी पृथ्वी और आकाशको प्रकाशित करते हुए हमलोगोंका अतिक्रमण करके आगे बढ़ गये हैं, नर और नारायण हैं। ये अपने तेजसे प्रज्वलित और कान्तिसे प्रकाशित हो रहे हैं। इनका धैर्य और पराक्रम महान् है। ये अपनी तपस्यासे अत्यन्त प्रभावशाली होनेके कारण भूलोकसे ब्रह्मलोकमें आये हैं ॥ ७-८ ॥ एतौ हि कर्मणा लोकं नन्दयामासतुर्ध्रुवम् ।

द्विधाभूतौ महाप्राज्ञौ विद्धि ब्रह्मन् परंतपौ । असुराणां विनाशाय देवगन्धर्वपूजितौ ॥ ९ ॥ इन्होंने अपने सत्कर्मोंसे निश्चय ही सम्पूर्ण लोकोंका आनन्द बढ़ाया है। ब्रह्मन्! ये दोनों अत्यन्त बुद्धिमान् और शत्रुओंको संताप देनेवाले हैं। इन्होंने एक होते हुए भी असुरोंका विनाश करनेके लिये दो शरीर धारण किये हैं। देवता और गन्धर्व सभी इनकी पूजा करते हैं ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच

जगाम शक्रस्तच्छ्रुत्वा यत्र तौ तेपतुस्तपः । सार्धं देवगणैः सर्वैर्बृहस्पतिपुरोगमैः ॥ १० ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर इन्द्र बृहस्पति आदि सब देवताओंके साथ उस स्थानपर गये जहाँ उन दोनों ऋषियोंने तपस्या की थी ॥ १० ॥

तदा देवासुरे युद्धे भये जाते दिवौकसाम् । अयाचत महात्मानौ नरनारायणौ वरम् ॥ ११ ॥ उन दिनों देवासुर-संग्राम उपस्थित था और उसमें देवताओंको महान् भय प्राप्त हुआ था; अतः उन्होंने उन दोनों महात्मा नर-नारायणसे वरदान माँगा ॥ ११ ॥

तावब्रूतां वृणीष्वेति तदा भरतसत्तम । अथैतावब्रवीच्छक्रः साह्यं नः क्रियतामिति ॥ १२ ॥ भरतश्रेष्ठ! देवताओंकी प्रार्थना सुनकर उस समय उन दोनों ऋषियोंने इन्द्रसे कहा—'तुम्हारी जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।' तब इन्द्रने उनसे कहा—'भगवन्! आप हमारी सहायता करें' ॥ १२ ॥

ततस्तौ शक्रमब्रूतां करिष्यावो यदिच्छसि । ताभ्यां च सहितः शक्रो विजिग्ये दैत्यदानवान् ॥ १३ ॥ तब नर-नारायण ऋषियोंने इन्द्रसे कहा—'देवराज! तुम जो कुछ चाहते हो, वह हम करेंगे।' फिर उन दोनोंको साथ लेकर इन्द्रने समस्त दैत्यों और दानवोंपर विजय पायी ॥ १३ ॥

नर इन्द्रस्य संग्रामे हत्वा शत्रून् परंतपः । पौलोमान् कालखञ्जांश्च सहस्राणि शतानि च ॥ १४ ॥ एक समय शत्रुओंको संताप देनेवाले नरस्वरूप अर्जुनने युद्धमें इन्द्रसे शत्रुता रखनेवाले सैकड़ों और हजारों पौलोम एवं कालखंज नामक दानवोंका संहार किया ॥ १४ ॥

एष भ्रान्ते रथे तिष्ठन् भल्लेनापाहरच्छिरः । जम्भस्य ग्रसमानस्य तदा ह्यर्जुन आहवे ॥ १५ ॥

उस समय ये नरस्वरूप अर्जुन सब ओर चक्कर लगानेवाले रथपर बैठे हुए थे, तो भी इन्होंने सबको अपना ग्रास बनानेवाले जम्भ नामक असुरका मस्तक अपने एक भल्लसे काट गिराया ॥ १५ ॥

एष पारे समुद्रस्य हिरण्यपुरमारुजत् ।
जित्वा षष्टिं सहस्राणि निवातकवचान् रणे ॥ १६ ॥
इन्होंने ही संग्राममें साठ हजार निवातकवचोंको पराजित करके समुद्रके उस पार बसे हुए दैत्योंके हिरण्यपुर नामक नगरको तहस-नहस कर डाला ॥ १६ ॥

एष देवान् सहेन्द्रेण जित्वा परपुरञ्जयः ।
अतर्पयन्महाबाहुरर्जुनो जातवेदसम् ॥ १७ ॥
शत्रुओंके नगरपर विजय पानेवाले इन महाबाहु अर्जुनने खाण्डवदाहके समय इन्द्रसहित समस्त देवताओंको जीतकर अग्निदेवको पूर्णतः तृप्त किया था ॥ १७ ॥

नारायणस्तथैवात्र भूयसोऽन्याञ्जघान ह ।
एवमेतौ महावीर्यौ तौ पश्यत समागतौ ॥ १८ ॥
इसी प्रकार नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णने भी खाण्डवदाहके समय दूसरे बहुत-से हिंसक प्राणियोंको यमलोक पहुँचाया था। इस प्रकार ये दोनों महान् पराक्रमी हैं। दुर्योधन! इस समय ये दोनों एक-दूसरेसे मिल गये हैं, इस बातको तुमलोग अच्छी तरह देख और समझ लो ॥ १८ ॥

वासुदेवार्जुनौ वीरौ समवेतौ महारथौ ।
नरनारायणौ देवौ पूर्वदेवाविति श्रुतिः ॥ १९ ॥
परस्पर मिले हुए महारथी वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन पुरातन देवता नर और नारायण ही हैं; यह बात विख्यात है ॥ १९ ॥

अजेयौ मानुषे लोके सेन्द्रैरपि सुरासुरैः ।
एष नारायणः कृष्णः फाल्गुनश्च नरः स्मृतः ।
नारायणो नरश्चैव सत्त्वमेकं द्विधा कृतम् ॥ २० ॥
इस मनुष्यलोकमें इन्हें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता और असुर भी नहीं जीत सकते। ये श्रीकृष्ण नारायण हैं और अर्जुन नर माने गये हैं। नारायण और नर दोनों एक ही सत्ता हैं, परंतु लोकहितके लिये दो शरीर धारण करके प्रकट हुए हैं ॥ २० ॥

एतौ हि कर्मणा लोकानश्नुवातेऽक्षयान् ध्रुवान् ।
तत्र तत्रैव जायेते युद्धकाले पुनः पुनः ॥ २१ ॥
ये दोनों अपने सत्कर्मके प्रभावसे अक्षय एवं ध्रुवलोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं। लोकहितके लिये जब-जब जहाँ-जहाँ युद्धका अवसर आता है, तब-तब वहाँ-वहाँ ये बार-बार अवतार ग्रहण करते हैं ॥ २१ ॥

तस्मात् कर्मैव कर्तव्यमिति होवाच नारदः ।

एतद्धि सर्वमाचष्ट वृष्णिचक्रस्य वेदवित् ॥ २२ ॥
दुष्टोंका दमन करके साधु पुरुषों एवं धर्मका संरक्षण ही इनका कर्तव्य है, ये सारी बातें वेदोंके ज्ञाता नारदजीने समस्त वृष्णिवंशियोंके सम्मुख कही थीं ॥ २२ ॥

शङ्खचक्रगदाहस्तं यदा द्रक्ष्यसि केशवम् ।
पर्याददानं चास्त्राणि भीमधन्वानमर्जुनम् ॥ २३ ॥
सनातनौ महात्मानौ कृष्णावेकरथे स्थितौ ।
दुर्योधन तदा तात स्मर्तासि वचनं मम ॥ २४ ॥
वत्स दुर्योधन! जब तुम देखोगे कि दोनों सनातन महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन एक ही रथपर बैठे हैं, श्रीकृष्णके हाथमें शंख, चक्र और गदा है और भयंकर धनुष धारण करनेवाले अर्जुन निरन्तर नाना प्रकारके अस्त्र लेते और छोड़ते जा रहे हैं, तब तुम्हें मेरी बातें याद आयेंगी ॥ २३-२४ ॥

नोचेदयमभावः स्यात् कुरूणां प्रत्युपस्थितः ।
अर्थाच्च तात धर्माच्च तव बुद्धिरुपप्लुता ॥ २५ ॥
यदि तुमने मेरी बात नहीं मानी तो समझ लो, कौरवोंका विनाश अवश्य ही उपस्थित हो जायगा। तात! तुम्हारी बुद्धि अर्थ और धर्म दोनोंसे भ्रष्ट हो गयी है ॥ २५ ॥

न चेद् ग्रहीष्यसे वाक्यं श्रोतासि सुबहून् हतान् ।
तवैव हि मतं सर्वे कुरवः पर्युपासते ॥ २६ ॥
यदि मेरा कहना नहीं मानोगे तो एक दिन सुनोगे कि हमारे बहुत-से सगे-सम्बन्धी मार डाले गये; क्योंकि सब कौरव तुम्हारे ही मतका अनुसरण करते हैं ॥ २६ ॥

त्रयाणामेव च मतं तत् त्वमेकोऽनुमन्यसे ।
रामेण चैव शप्तस्य कर्णस्य भरतर्षभ ॥ २७ ॥
दुर्जातेः सूतपुत्रस्य शकुनेः सौबलस्य च ।
तथा क्षुद्रस्य पापस्य भ्रातुर्दुःशासनस्य च ॥ २८ ॥
भरतश्रेष्ठ! एक तुम्हीं ऐसे हो, जो कि परशुरामजीके द्वारा अभिशप्त खोटी जातिवाले सूतपुत्र कर्ण एवं सुबलपुत्र शकुनि तथा अपने नीच एवं पापात्मा भाई दुःशासन—इन तीनोंके मतका अनुमोदन एवं अनुसरण करते हो ॥ २७-२८ ॥

कर्ण उवाच

नैवमायुष्मता वाच्यं यन्मामात्थ पितामह ।
क्षत्रधर्मे स्थितो ह्यस्मि स्वधर्मादनपेयिवान् ॥ २९ ॥
**कर्ण बोला—**पितामह! आपने मेरे प्रति जिन शब्दोंका प्रयोग किया है, वे अनुचित हैं। आप-जैसे वृद्ध पुरुषको ऐसी बातें मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये। मैं क्षत्रियधर्ममें स्थित हूँ और अपने धर्मसे कभी भ्रष्ट नहीं हुआ हूँ ॥ २९ ॥

किं चान्यन्मयि दुर्वृत्तं येन मां परिगर्हसे ।
न हि मे वृजिनं किंचिद् धार्तराष्ट्रा विदुः क्वचित् ॥ ३० ॥
नाचरं वृजिनं किंचिद् धार्तराष्ट्रस्य नित्यशः ।
मुझमें कौन-सा ऐसा दुराचार है जिसके कारण आप मेरी निन्दा करते हैं। महाराज धृतराष्ट्रके पुत्रोंने कभी मेरा कोई पापाचार देखा या जाना हो ऐसी बात नहीं है। मैंने दुर्योधनका कभी कोई अनिष्ट नहीं किया है ॥ ३० १/२ ॥

अहं हि पाण्डवान् सर्वान् हनिष्यामि रणे स्थितान् ॥ ३१ ॥
प्राग्विरुद्धैः शमं सद्भिः कथं वा क्रियते पुनः ।
मैं युद्धभूमिमें खड़े होनेपर समस्त पाण्डवोंको अवश्य मार डालूँगा। जो लोग पहले अपने विरोधी रहे हों, उनके साथ पुनः संधि कैसे की जा सकती है? ॥ ३१ १/२ ॥

राज्ञो हि धृतराष्ट्रस्य सर्वं कार्यं प्रियं मया ।
तथा दुर्योधनस्यापि स हि राज्ये समाहितः ॥ ३२ ॥
मुझे जिस प्रकार राजा धृतराष्ट्रका समस्त प्रिय कार्य करना चाहिये, उसी प्रकार दुर्योधनका भी करना उचित है; क्योंकि अब वे ही राज्यपर प्रतिष्ठित हैं ॥

वैशम्पायन उवाच

कर्णस्य तु वचः श्रुत्वा भीष्मः शान्तनवः पुनः ।
धृतराष्ट्रं महाराज सम्भाष्येदं वचोऽब्रवीत् ॥ ३३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज जनमेजय! कर्णकी बात सुनकर शान्तनुनन्दन भीष्मने राजा धृतराष्ट्रको सम्बोधित करके पुनः इस प्रकार कहा— ॥ ३३ ॥

यदयं कत्थते नित्यं हन्ताहं पाण्डवानिति ।
नायं कलापि सम्पूर्णा पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ ३४ ॥
‘राजन्! यह कर्ण जो प्रतिदिन यह डींग हाँका करता है कि मैं पाण्डवोंको मार डालूँगा, वह व्यर्थ है। मेरी रायमें यह महात्मा पाण्डवोंकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं है ॥ ३४ ॥

अनयो योऽयमागन्ता पुत्राणां ते दुरात्मनाम् ।
तदस्य कर्म जानीहि सूतपुत्रस्य दुर्मतेः ॥ ३५ ॥
‘तुम्हारे दुरात्मा पुत्रोंपर अन्यायके फलस्वरूप जो यह महान् संकट आनेवाला है, वह सब इस दूषित बुद्धिवाले सूतपुत्र कर्णकी ही करतूत समझो ॥ ३५ ॥

एतमाश्रित्य पुत्रस्ते मन्दबुद्धिः सुयोधनः । अवामन्यत तान् वीरान् देवपुत्रानरिंदमान् ॥ ३६ ॥ 'तुम्हारे मन्दबुद्धि पुत्र दुर्योधनने इसीका सहारा लेकर शत्रुओंका दमन करनेवाले उन वीर देवपुत्र पाण्डवोंका अपमान किया है ॥ ३६ ॥

किं चाप्येतेन तत्कर्म कृतपूर्वं सुदुष्करम् । तैर्यथा पाण्डवैः सर्वैरेकैकेन कृतं पुरा ॥ ३७ ॥ 'आजसे पहले समस्त पाण्डवोंने मिलकर अथवा उनमेंसे एक-एकने अलग-अलग जैसे-जैसे दुष्कर पराक्रम किये हैं, वैसा कौन-सा कठिन पुरुषार्थ इस सूतपुत्रने पहले कभी किया है? ॥ ३७ ॥

दृष्ट्वा विराटनगरे भ्रातरं निहतं प्रियम् । धनंजयेन विक्रम्य किमनेन तदा कृतम् ॥ ३८ ॥ 'जब विराटनगरमें अर्जुनने अपना पराक्रम दिखाते हुए इसके सामने ही इसके प्यारे भाईको मार डाला था, तब इसने सब कुछ अपनी आँखोंसे देखकर भी अर्जुनका क्या बिगाड़ लिया? ॥ ३८ ॥

सहितान् हि कुरून् सर्वानभियातो धनंजयः । प्रमथ्य चाच्छिनद् वासः किमयं प्रोषितस्तदा ॥ ३९ ॥

‘जब धनञ्जयने अकेले ही समस्त कौरवोंपर आक्रमण किया और सबको मूर्च्छित करके उनके वस्त्र छीन लिये थे, उस समय यह कर्ण क्या कहीं परदेश चला गया था? ।। ३९ ।।

गन्धर्वैर्घोषयात्रायां ह्रियते यत् सुतस्तव ।
क्व तदा सूतपुत्रोऽभूद् य इदानीं वृषायते ।। ४० ।।
‘घोषयात्राके समय जब गन्धर्वलोग तुम्हारे पुत्रको कैद करके लिये जा रहे थे, उस समय यह सूतपुत्र कहाँ था? जो इस समय साँड़की तरह डँकार रहा है ।। ४० ।।

ननु तत्रापि भीमेन पार्थेन च महात्मना ।
यमाभ्यामेव संगम्य गन्धर्वास्ते पराजिताः ।। ४१ ।।
‘वहाँ भी तो महात्मा भीमसेन, अर्जुन और नकुल-सहदेवने ही मिलकर उन गन्धर्वोंको परास्त किया था ।।

एतान्यस्य मृषोक्तानि बहूनि भरतर्षभ ।
विकत्थनस्य भद्रं ते सदा धर्मार्थलोपिनः ।। ४२ ।।
‘भरतश्रेष्ठ! तुम्हारा भला हो। यह कर्ण व्यर्थ ही शेखी बघारता रहता है। इसकी कही हुई बहुत-सी बातें इसी तरह झूठी हैं। यह तो धर्म और अर्थ—दोनोंका ही लोप करनेवाला है ।। ४२ ।।

भीष्मस्य तु वचः श्रुत्वा भारद्वाजो महामनाः ।
धृतराष्ट्रमुवाचेदं राजमध्येऽभिपूजयन् ।। ४३ ।।
भीष्मजीकी यह बात सुनकर महामना द्रोणाचार्यने समस्त राजाओंके मध्यमें उनकी प्रशंसा करते हुए राजा धृतराष्ट्रसे इस प्रकार कहा— ।। ४३ ।।

यदाह भरतश्रेष्ठो भीष्मस्तत् क्रियतां नृप ।
न काममर्थलिप्सूनां वचनं कर्तुमर्हसि ।। ४४ ।।
‘नरेश्वर! भरतकुलतिलक भीष्मजीने जो कहा है, वही कीजिये। जो लोग अर्थ और कामके लोभी हैं, उनकी बातें आपको नहीं माननी चाहिये ।। ४४ ।।

पुरा युद्धात् साधु मन्ये पाण्डवैः सह संगतुम् ।
यद् वाक्यमर्जुनेनोक्तं संजयेन निवेदितम् ।। ४५ ।।
सर्वं तदपि जानामि करिष्यति च पाण्डवः ।
‘मैं तो युद्धसे पहले पाण्डवोंके साथ संधि करना ही अच्छा समझता हूँ। अर्जुनने जो बात कही है और संजयने उनका जो संदेश यहाँ सुनाया है, मैं वह सब जानता और समझता हूँ। पाण्डुनन्दन अर्जुन वैसा करके ही रहेंगे ।। ४५ ½ ।।

न ह्यस्य त्रिषु लोकेषु सदृशोऽस्ति धनुर्धरः ।। ४६ ।।
‘तीनों लोकोंमें अर्जुनके समान कोई धनुर्धर नहीं है ।। ४६ ।।

अनादृत्य तु तद् वाक्यमर्थवद् द्रोणभीष्मयोः ।